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रविवार, 27 सितंबर 2009

लोकवादी भाषाचिंतक आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी

  • पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी देवोपम व्यक्तित्व के धनी थे।

  • पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी आकाशधर्मी आचार्य थे।

  • पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी हिंदी साहित्येतिहास की दूसरी परंपरा के प्रवर्तक थे।

  • पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी सांस्कृतिक इतिहास की सर्जनात्मक अभिव्यक्ति करने वाले कालजयी उपन्यासकार थे।

  • पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी मनुष्य की जययात्रा में आस्थावान अनन्य ललित निबंधकार थे।

  • पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी सम्मोहन डालने वाले प्रभावशाली वक्ता थे।

ऐसे और भी अनेक निष्कर्ष आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी और उनके साहित्य के संबंध में हमें उपलब्ध हैं और उनके शताब्दी वर्ष में इनकी बार-बार पुष्टि भी हुई है। इन निष्कर्षों में हम एक और निष्कर्ष जोड़ सकते हैं कि पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी इतिहास, मनुष्य और लोक को केंद्र में रखकर भारत की भाषा समस्या पर मौलिक चिंतन करने वाले लोकवादी भाषा चिंतक और भाषा नियोजक भी थे। द्विवेदी जी का यह भाषा-चिंतक रूप उनके कतिपय भाषणों, निबंधों तथा पं. बनारसी दास चतुर्वेदी के नाम लिखे ढेर सारे पत्रों में उभर कर सामने आया है।

भाषा का मूलभूत प्रयोजन है संप्रेषण। द्विवेदी जी यहीं से भाषा की चर्चा आरंभ करते हैं कि एक मन के भाव को दूसरे तक संप्रेषित करना वस्तुतः भाषा का उद्देश्य है। उनकी दृष्टि में भाषा द्वारा दो प्रकार के संप्रेषण होते हैं : एक तो सूचनात्मक संप्रेषण है जिसमें हम श्रोता के चित्त में किसी बात की सूचना का संचार करते हैं और दूसरा रचनात्मक संप्रेषण होता है, जो श्रोता के चित्त में गाढ़ अनुभूति द्वारा जगाई गई संवेदनाओं को मूर्त और अनुभव योग्य बनाता है। उनकी दृढ़ मान्यता है कि वस्तुतः इस दूसरी श्रेणी के संप्रेषण को ही सही अर्थों में संप्रेषण कहा जाता है तथा जब हम साहित्य की संप्रेषणीयता पर विचार करते हैं तब हम इस दूसरी श्रेणी के संप्रेषण पर ही बल देते हैं। द्विवेदी जी आगे स्पष्ट करते हैं कि सूचनात्मक संप्रेषण उतना प्रभावशाली नहीं होता जितना रचनात्मक संप्रेषण। ऐसा क्यों होता है? इस प्रश्न पर विचार करते हुए वे शब्द और अर्थ के संबंध तथा सामान्य भाषा और साहित्य भाषा के अंतर की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए बताते हैं कि ऐसा इसलिए होता है कि (सामान्य) भाषा साधारणतः शब्दों के सामान्य अर्थ का ही कारबार करती है। प्रत्येक शब्द जिस अर्थ को अभिव्यक्त करता है, वह सामान्य अर्थ होता है। परंतु संवेदनशील रचनात्मक साहित्यकार, सामान्य अर्थों से संतुष्ट नहीं होता। वह सामान्य अर्थों को व्यक्त करने वाली भाषा के माध्यम से ही अपनी विशिष्ट अनुभूतियों को लोकचित्त में संप्रेषित करने के लिए व्याकुल रहता है।

इसी संदर्भ में भाषा व्यवस्था की समरूपता और भाषा व्यवहार की विषमरूपता पर भी उनके विचार द्रष्टव्य हैं। भाषा के संदर्भ में आचार्य द्विवेदी ज्ञान को दो-मुँहा पदार्थ मानते हैं। उनके अनुसार एक ओर वैयक्तिक तथ्य जगत है, जो व्यक्तिसापेक्ष होता है, दूसरी तरफ अंतर्वैयक्तिक तथ्य जगत है जो समाजसापेक्ष होता है। इन दोनों के संबंधों की प्रकृति पर विचार करते हुए उनका यह मत है कि वैयक्तिक तथ्य जगत निरंतर दूसरे लोगों के उपलब्ध तथ्य जगत से टकराते रहने के कारण अंतर्वैयक्तिक तथ्य जगत के रूप में परिवर्तित होता रहता है। यह संसार दूसरों की उपलब्धि और स्मृति से बनी तथ्यात्मक ज्ञान राशि से टकरा-टकरा कर बना हुआ पदार्थ है।” (डॉ. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव, आचार्य द्विवेदी का भाषा विषयक चिंतन, १९९१)।

द्विवेदी जी मानते हैं कि हमारी भाषा सामान्य वैयक्तिक तथ्यात्मक अनुभूतियों को एक व्यक्ति के चित्त से दूसरे के चित्त तक ढोने का साधन भी है; और दीर्घकाल से अनेक अंतर्वैयक्तिक तथ्य-जगतों के संघर्ष से विकसित होनेवाली और संचित होती रहनेवाली ज्ञान-राशि का वाहन भी। वस्तुतः यहाँ आचार्य द्विवेदी ने भाषा व्यवस्थाऔर भाषा व्यवहारकी संकल्पनाओं के द्वैतवाद की व्याख्या की है और निष्कर्षतः यह प्रतिपादित किया है कि भाषा हमारी सामान्य अंतर्वैयक्तिक उपलब्धियों के गांभीर्य और प्रसार का पता बताती है। वे निरंतर परिवर्तनशील और परिवर्धमान इन उपलब्धियों के लिखित रूप को ही सामान्य रूप से साहित्यकहते हैं। अन्यत्र उन्होंने वाक्और अर्थकी पारस्परिकता तथा प्रतीक के रूप में शब्द चयन की यादृच्छिकताकी अत्यंत सरल ढंग से व्याख्या करते हुए कहा है कि शब्द इस उद्देश्य से बनाए गए हैं कि व्यक्ति की भावना (अर्थ) दूसरे के चित्त में आसानी से उतार दी जा सके। इसके लिए वे कागजी मुद्रा का दृष्टांत देते हुए बताते हैं कि रुपए का यह कागजी नोट हमारी उलझी हुई सामाजिक व्यवस्था को प्रतीक-रूप में उपस्थित करता है। अति परिचयवश उसके इस रूप की हम उपेक्षा करते हैं। जिस प्रकार बाजार में हमारे श्रम और उत्पादन के जटिल संबंधों को रुपए का नोट प्रतीक-रूप में सामने ला देता है, ठीक उसी प्रकार शब्द हमारी सामाजिक भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।द्विवेदी जी द्वारा गढ़े गए रुपए के इस रूपक के संबंध में डॉ. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव ने बताया है किप्रमुख अर्थशास्त्री टाल्कट पार्सन्स (१९५४) के अनुसार कागजी नोट एक विशिष्ट भाषा रूप है,आर्थिक व्यापार एक विशेष प्रकार का वार्तालाप एवं संचार है, पैसे का वितरण विशिष्ट कोटि का संप्रेषण है और संपूर्ण अर्थतंत्र भाषा की व्याकरणिक व्यवस्था के समरूप है। पार्सन्स यह मानते हैं कि रुपए के नोट तथा भाषा में समानता का आधार उसके व्यवहारकर्ता के अंतर्वैयक्तिक संबंधों की समानधर्मी प्रकृति है जिस तथ्य की ओर द्विवेदी जी बार-बार संकेत करते हैं।

यहाँ स्मरणीय है कि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के साहित्य और भाषाविषयक चिंतन के कद्र में परंपरा और इतिहासबोध अवस्थित है। उन्होंने परंपरा और इतिहास-बोध की सहायता से समसामयिक भाषा-समस्या को भी सुलझाने के सूत्र अपने निबंधों में दिए हैं। उदाहरण के लिए, हिंदी के सार्वदेशिक या अखिल भारतीय महत्व की व्याख्या करने के लिए हिंदी तथा अन्य भाषाएँशीर्षक निबंध में आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने विस्तार से उन सभी विषयों पर प्रकाश डाला है; जिन पर विचार करना भाषा-नियोजन की आधारभूत आवश्यकता है - यथा, १. हिंदी का संस्कृत आदि प्राचीन भाषाओं से संबंध, २. हिंदी का हिंदीतर प्रदेशों की आधुनिक भाषाओं के साथ संबंध, ३. हिंदी का उसकी जनपदीय बोलियों के साथ संबंध, ४. हिंदी का उर्दू के साथ संबंध और ५. हिंदी और अंग्रेजी का संबंध।

इसी प्रकार नई समस्याएँशीर्षक निबंध में भी संस्कृत और हिंदी भाषा के परस्पर संबंधों के सांस्कृतिक एवं जातीय आधार को विशेषतः रेखांकित किया गया है। साथ ही हिंदी और उसकी जनपदीय बोलियों के संबंध तथा हिंदी और उर्दू के संबंध के विविध पहलुओं की भी पड़ताल की गई है। द्विवेदी जी भाषा की जोड़ने के साथ-साथ तोड़ने की ताकत से भी भली प्रकार परिचित थे। इसीलिए भाषा नियोजकों को उन्होंने आगाह किया है कि इन समस्याओं पर अगर हमने तत्काल ध्यान नहीं दिया तो नाना प्रकार की जातियों-उपजातियों में विभक्त संप्रदायों और पन्थों में उद्भ्रांत और शतछिद्र हमारे देश के कलशको ये और भी क्षत-विक्षत कर देंगी। ..... और हम देख रहे हैं कि भाषा नीति विषयक अनिश्चय की परिणति आज भारतीय लोकतंत्र की अराजकता के विकराल रूप में हमारे सामने उपस्थित है और नए सिरे से भाषाई विद्वेष की चिंगारियाँ सुलगने लगी हैं!

वर्तमान परिस्थितियों में, क्षेत्रीय राजनीति की महत्वाकांक्षाओं के विशेष संदर्भ में,आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी का यह प्रश्न अत्यंत प्रासंगिक है कि आखिर इस गरीब देश में आप कितने विश्वविद्यालय और कितने हाइकोर्ट चलाएँगे? एक-एक जिले का दावा अलग-अलग हो सकता है।उन्होंने खासतौर से विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच चलने वाली राजनैतिक खींचतान के साथ-साथ हिंदी की सहयोगी आधारभूत बोलियों के संघर्ष की ओर ध्यान आकृष्ट करते हुए व्यंग्यपूर्वक कहा है कि मैथिली मातृभाषियों की तरह वे भी अपनी मातृबोली भोजपुरी को देश की सर्वाधिक शक्तिशाली भाषा सिद्ध कर सकते हैं। इसके लिए, कई तरह के तर्क हो सकते हैं। जैसे इतिहास से गवाही ढूँढ कर कहा जा सकता है कि भारतवर्ष का ज्ञात इतिहास भोजपुरियों से प्रारंभ होता है। जिन सैनिकों के नाम मात्र से सम्राट सिकंदर काँप उठे थे, वे भोजपुरी थे। जिन भिक्षुओं ने पर्वत और समुद्र लाँघकर चीन से जापान तक भारतीय संस्कृति की पताका फहराई थी, वे अधिकांश भोजपुरी थे। चंद्रगुप्त और कुमारजीव भोजपुर की संतान थे और मध्ययुग का सबसे बड़ा प्राणवान पुरुष भोजपुरी था : मेर मतलब कबीर से है, आदि।इस प्रकार के तर्क प्रस्तुत करते समय हमारा ध्यान राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के उन भाषणों की ओर जाना चाहिए जिनमें उन्होंने कहा था कि राष्ट्रभाषा के संबंध में निर्णय लेते समय हमें संकीर्ण स्वार्थों से बचना होगा। पं. हजारी प्रसाद द्विवेदी भी ध्यान दिलाते हैं कि यदि हमारे तर्कों और युक्तियों के मूल में कोई संकीर्ण स्वार्थ है या व्यक्तिगत रुचि-अरुचि का प्राबल्य है तो निष्कर्ष दोषयुक्त होगा।

द्विवेदी जी ने व्यापक दृष्टि से बहुभाषिकता के प्रश्न पर तटस्थ भाषावैज्ञानिक की तरह चिंतन करते हुए कहा है कि नाना कारणों से इस देश में और बाहर यह बार-बार विज्ञापित किया जाता है कि इस महादेश में सैकड़ों भाषाएँ प्रचलित हैं और इसीलिए इसमें अखंडता या एकता की कल्पना नहीं की जा सकती। इस मिथ का निराकरण करते हुए वे याद दिलाते हैं कि हमारे इस देश ने हजारों वर्ष पहले से भाषा की समस्या हल कर ली थी। हिमालय से सेतुबंध तक सारे भारतवर्ष के धर्म, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा आदि विषयों की भाषा कुछ सौ वर्ष पहले तक एक ही रही है। द्विवेदी जी के इस मत से सहमत न होने का कोई कारण नहीं है कि यह भाषा संस्कृत थी। वे याद दिलाते हैं कि भारतवर्ष का जो कुछ श्रेष्ठ है, जो कुछ उत्तम है, जो कुछ रक्षणीय है, वह इस भाषा के भंडार में संचित किया गया है। फिर भी भाषा की समस्या इस देश में कभी उठी ही नहीं हो, सो बात नहीं है। भगवान बुद्ध और भगवान महावीर ने संस्कृत के एकाधिपत्य को अस्वीकार किया था, उन्होंने लोकभाषा को आश्रय करके अपने उपदेश प्रचार किए थे। इसकी व्याख्या द्विवेदी जी भाषा को जनपदसुखबोध्य बनाने के प्रयास के रूप में करते हैं क्योंकि भाषा का चरम उद्देश्य तो सहज संप्रेषण है, पांडित्य प्रदर्शन नहीं। उनकी यह उक्ति ध्यान देने योग्य है कि मैंने जैन-प्रबंधों की प्राकृतगन्धी संस्कृत देखी है और मैं साहसपूर्वक कह सकता हूँ कि संस्कृत को इतना सरल और प्रांजल बनाना एकदम नवीन और स्फूर्तिदायक प्रयास था। जैन मुनियों ने इसमें प्रांजलता ले आने में कमाल का काम किया है।

आगे चलकर भारतीय भाषाओं का सामना एकदम नई परिस्थिति से हुआ। इसे भाषा-त्रैत कहा जा सकता है, क्योंकि कुछ शताब्दियों तक भारतवर्ष एक विचित्र अवस्था में से गुजरा। उसके न्याय, राजनीति और व्यवहार की भाषा फारसी रही है, हृदय की भाषा तत्तत् प्रदेशों की प्रांतीय भाषाएँ रही हैं और मस्तिष्क की भाषा संस्कृत रही है।द्विवेदी जी ने बलपूर्वक दुहराया है कि हृदय की भाषा बराबर किसी-न-किसी रूप में देशी भाषाएँ रही हैं। इस सूत्र को भारत के भाषा-नीति-निर्धारकों को ध्यान में रखना चाहिए। द्विवेदी जी यह भी याद दिलाते है कि सिर्फ यही बात नहीं है कि इस देश में देशी भाषाओं में सदा काव्य लिखे जाते रहे, बल्कि महत्वपूर्ण यह है कि उनका भरपूर सम्मान भी बराबर होता रहा। अभिप्राय यह कि संस्कृत का कभी किसी भारतीय भाषा के साथ झगड़ा नहीं रहा। इसी प्रकार अब जब कि संस्कृत की भूमिका में हिंदी को अपनाया गया है तो उसका भी किसी भारतीय भाषा से द्वेष संभव नहीं है।

द्विवेदी जी ने संपर्क भाषा/राजभाषा/राष्ट्रभाषा के वांछित गुणों की चर्चा करते हुए कहा है कि हमें एक ऐसी भाषा चुन लेनी है जो हमारी हजारों वर्ष की परंपराओं से कम-से-कम विच्छिन्न हो और हमारी नूतन परिस्थिति का सामना अधिक-से-अधिक मुस्तैदी से कर सकती हो, संस्कृत न होकर भी संस्कृत-सी हो और साथ ही जो प्रत्येक नए विचार को, प्रत्येक नयी भावना को अपना लेने में एकदम हिचकिचाती न हो, जो प्राचीन परंपरा की उत्तराधिकारिणी भी हो और नवीन चिंता की वाहिका भी। यहाँ जब द्विवेदी जी प्राचीन और नवीन की बात करते हैं तो प्रकारांतर से वे समाजभाषाविज्ञान की जीवंत भाषा की अवधारणा की पुष्ट करने के साथ-साथ हिंदी के आधुनिकीकरण, मानकीकरण और पारिभाषिक शब्दावली के स्थिरीकरण की आवश्यकता का भी समर्थन करते हैं। वे जब यह याद दिलाते हैं कि वस्तुतः हिंदी और अन्यान्य भारतीय भाषाओं में चौदह आना साम्य ही है, दो आना ही हमें नए सिरे से गढ़ना हैतथा हमें ऐसी भाषा का सहारा लेना है जो इन बोलियों से समता रखती होतो सीधे सीधे उनका इशारा भारतीय संविधान के अनुच्छेद ३५१ में प्रतिपादित हिंदी के विकास संबंधी निर्देशों की ओर है। निःसंदेहद्विवेदी जी एक सतर्क भाषा नियोजक थे। अतः उनका स्पष्ट निर्देश है कि केंद्रीय भाषा के रूप में हिंदी के प्रति श्रद्धा-भाव और अपनी-अपनी बोलियों के प्रति अनुराग दोनों बातें आवश्यक हैं। यह आवश्यक है कि केंद्रीय भाषा हिंदी इन बोलियों के नजदीक आए।डॉ.रवींद्रनाथ श्रीवास्तव ने सप्रमाण यह दिखाया है कि भाषा-नियोजन के संबंध में द्विवेदी जी की दृष्टि अत्यंत व्यापक है। वेइतिहासऔर मनुष्यको सारे भाषा-नियोजन का आधार बनाना चाहते हैं। इस संबंध में उनकी दो स्पष्ट मान्यताएँ हैं :-

१. अपने देश की भाषा और साहित्य-विषयक नीति स्थिर करते समय हमें अपने देश के विशाल इतिहास को याद रखना होगा।

२. मनुष्य को चरम लक्ष्य मानकर तथा उसके सुख-दुःख का विचार करके हमें अपनी भाषा विषयक नीति स्थिर करनी चाहिए।

इसी प्रकार भाषा, साहित्य और देशतथा मनुष्य ही साहित्य का लक्ष्य हैमें व्याख्यायित हिंदी भाषा के संदर्भ में भी उनके दो मुख्य वक्तव्य सदा ध्यान में रखने योग्य हैं :-

१. हिंदी केंद्रीय भाषा है। बड़े परिश्रम से और बड़ी कठिनाइयों के भीतर से इसके उपासकों ने इसे सार्वदेशिक भाषा का रूप दिया है।

२. हिंदी को किसी केंद्रीय राजशक्ति की अंगुली पकड़ाकर आगे नहीं बढ़ाया गया है। विरोधों, आघात-प्रतिघातों के भीतर से ही इसकी शानदार सवारी निकली है।

द्विवेदी जी हिंदी को मनोवृत्ति प्रधान भाषा मानते हैं। उनके अनुसार इसी मनोवृत्ति के आधार पर सभी हिंदी भाषियों के अंतस में यह बात जमी हुई है कि हिंदी वह भाषा है जिसमें कबीर, तुलसी, मीरा आदि ने कविता लिखी थी। वे सब बोलियाँ, जिनका मुख केंद्राभिमुख है,अर्थात् जिनके बोलनेवालों की नाड़ियों में मूल केंद्रीय भाषा से संबद्ध बने रहने के संस्कार दृढ़ निबद्ध हैं - हिंदी हैं। जो बोलियाँ केंद्राभिमुख न होकर अपने आप में ही केंद्रित हो जाती हैं, और तुलसी और सूर को अपना कवि नहीं मानना चाहतीं, वे टूटकर अलग हो जाती हैं।

द्विवेदी जी मानते हैं कि प्रत्येक मातृभाषी को अपनी भाषा को विकसित करने का अधिकार है, पर इसके साथ हमें यह भी ध्यान में रखना चाहिए कि भाषा हमारे भावी महालक्ष्य की पूर्ति का साधन है। हमें ऐसी भाषा बनानी चाहिए जिसके द्वारा हम अधिक से अधिक व्यक्तियों को शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक क्षुधा निवृत्ति का संदेश दे सकें। स्मरण रहे किहिंदी मात्र व्याकरण नहीं और न ही वह केवल खड़ीबोली के रूप में एक विशिष्ट भाषिक संरचना है। भाषा के रूप में वह एक सामाजिक संस्था है, संस्कृति के रूप में भाषाई प्रतीक भी है, और साहित्य के रूप में वह एक जातीय परंपरा भी है।” (र ना श्री)। इसीलिए द्विवेदी जी जहाँ यह मानते हैं कि हिंदी भारत के केंद्रीय प्रदेशों की भाषा है, कई करोड़ आदमियों की ज्ञानपिपासा उसे शांत करनी है जिसके लिए उसे संपूर्ण ज्ञान-विज्ञान के विकास का वाहन बनाना आवश्यक है;वहीं इस बात की ओर भी ध्यान दिलाते हैं कि समाज के नाना स्तरों के लिए अलग-अलग ढंग की भाषा होगी तथा नाना उद्देश्यों की सिद्धि के लिए नाना भाँति के प्रयत्न करने होंगे। इसका अर्थ है भाषा को प्रयोजनीयता से जोड़ना। अर्थात यहाँ द्विवेदी जी ने विविध ज्ञान क्षेत्रों और प्रयोजनों के अनुरूप हिंदी की विविध प्रयुक्तियों-उपप्रयुक्तियों के विकास की आवश्यकता का प्रतिपादन किया है।

जहाँ साहित्य भाषा के विषय में उनकी धारणा है कि रचनात्मक साहित्य लोकचित्त को नए संदर्भ में नई ग्राहिका शक्ति देता है, इसलिए वह सामान्य भाषा की अपेक्षा अधिक शक्तिशाली साधन होता है; वहीं वे रोजगारमूलक प्रयोजनपरक भाषा के बारे में भी सजग हैं। यथा, “भाषा को ही लीजिए। मनुष्य अपने आहार और निद्रा के साधनों को जुटाने के लिए जिस भाषा का व्यवहार करता है, वह उनकी अनायासलब्ध भाषा है; परंतु यदि उसे इस धरातल से ऊपर उठाना है तो उतने से काम नहीं चलेगा। सहज भाषा आवश्यक है। पर सहज भाषा का मतलब है सहज ही महान् बनाने वाली भाषा, रास्ते में बटोरकर संग्रह की हुई भाषा नहीं।कहना न होगा कि पारिभाषिक शब्दावली का निर्धारण करते समय उनके इस सूत्र पर ध्यान देना जरूरी है अन्यथा वह सचमुच ही रास्ते से बटोरकर संग्रह की हुई भाषा बनकर रह जाएगी जिसकी स्वीकार्यता प्रमाणित न हो पाने के कारण उसे अव्यावहारिक और अप्रयुक्त बनकर ही रहना पड़ सकता है। द्विवेदी जी ने यह भी ध्यान दिलाया है कि सीधी लकीर खींचना टेढ़ा काम है। सहज भाषा पाने के लिए कठोर तप आवश्यक है। जब तक आदमी सहज नहीं होता तब तक भाषा का सहज होना असंभव है।वे हिंदी को सार्वदेशिक सहजता प्रदान करना चाहते हैं और उसके साहित्य को भी अखिल भारतीयता से मंडित देखना चाहते हैं, “एक साहित्य बनाइए। गलतफहमी दूर कीजिए। ऐसा कीजिए कि एक संप्रदाय दूसरे संप्रदाय को समझ सके। एक धर्मवाले दूसरे धर्मवालों की कदर कर सकें। एक प्रदेशवाले दूसरे प्रदेशवाले के अंतर में प्रवेश कर सकें। ऐसा कीजिए कि इस सामान्य माध्यम के द्वारा आप सारे देश में एक आशा, एक उमंग और एक उत्साह भर सकें। और फिर ऐसा कीजिए कि हम इस भाषा के जरिए इस देश की और अन्य देशों की, इस काल की और अन्य कालों की समूची ज्ञान-संपत्ति आपस में विनिमय कर सकें।

यहाँ आचार्य द्विवेदी जी की यह प्रसिद्ध उक्ति उद्धृत करना प्रासंगिक होगा कि मैं साहित्य को मनुष्य की दृष्टि से देखने का पक्षपाती हूँ। जो वाग्जाल मनुष्य को दुर्गति, हीनता और परमुखापेक्षिता से बचा न सके, जो उसकी आत्मा को तेजोद्दीप्त न बना सके, जो उसके हृदय को परदुःखकातर और संवेदनशील न बना सके, उसे साहित्य कहने में मुझे संकोच होता है।उन्होंने बार-बार ध्यान दिलाया है कि इस युग का मुख्य उद्देश्य मनुष्य है। इस युग का सबसे बड़ा अभिशाप यह है कि विज्ञान की सहायता से जहाँ बाह्य भौगोलिक बंधन तड़ातड़ टूट गए हैं वहाँ मानसिक संकीर्णता दूर नहीं हुई है। हम एक-दूसरे को पहचानते नहीं। तीन दिन में सारे संसार की यात्रा करके लौटे हुए यात्रा-विलासी लोगों और नाना प्रकार के स्वार्थपरायणों की पुस्तकों ने संसार में घोर गलतफहमी फैला रखी है। इस देश में ही हम एक प्रदेश वाले दूसरे प्रदेश के लोगों को समझ नहीं रहे, एक संप्रदाय के लोग दूसरे संप्रदाय के लोगों को पहचान नहीं रहे। इसीलिए इतनी मारामारी काटाकाटी चल रही है।

कहना न होगा कि आचार्य द्विवेदी ने भाषा को भी मनुष्य की दृष्टि से ही देखने पर बल दिया है। भाषा-संघर्ष का मूल इस दृष्टि की उपेक्षा में निहित है। तभी तो हिंदी और उर्दू की लड़ाई भाषा की लड़ाई कम और भाषाई अस्मिता की लड़ाई अधिक है। इसमें संदेह नहीं कि उर्दू का भाषाशास्त्रीय ढाँचा हिंदी के भाषाशास्त्रीय ढाँचे से अलग नहीं है। इतना ही नहीं, द्विवेदी जी तो यह भी स्वीकारते हैं कि जिस हिंदी को आजकल हम साहित्यिक हिंदी कहते हैं, वह उर्दू के पर से बनाई गई है तथा हिंदी, मुसलमानी भाषा है क्योंकि शुरू-शुरू में खड़ी बोली मुसलमानों की भाषा मानी जाती थी। उन्होंने उदारतापूर्वक इस तथ्य को रेखांकित किया है कि पुराने हिंदी कवियों ने जब मुसलमान पात्रों से कोई कविनिषिद्ध प्रौढ़ोक्ति कहलाई है तो खड़ीबोली में बुलवाया है। जिस भाषा को हम साहित्यिक हिंदी कहते हैं उसकी प्रथम भित्ति-प्रतिष्ठा मुसलमान भाइयों के हाथों हुई है।वे बलपूर्वक कहते हैं कि यह नहीं कि वह भाषा ही कोई नई बनाई गई है बल्कि यह कि इसे साहित्यिक, सामाजिक और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का वाहन मुसलमानों ने बनाया।

द्विवेदी जी ने यह प्रश्न भी उठाया है कि यदि उर्दू, हिंदी की एक विशिष्ट शैली है, तो हिंदी साहित्य के इतिहास में तथा पाठ्यक्रम में उसे पूर्ण स्थान क्यों नहीं मिला? उनके अनुसार इसके दो कारण संभव हैं - (एक) उर्दू एक संपूर्ण साहित्य है, (दो) हिंदी के अब तक के स्वीकृत साहित्य के इतिहास से उसका कोई संबंध नहीं रहा है और दोनों अपने-अपने रास्ते बिना एक दूसरे को प्रभावित किए विकसित होते रहे हैं। इसमें संदेह नहीं कि हिंदी साहित्य का इतिहास पढ़ने से ये दोनों धारणाएँ पुष्ट होती हैं। द्विवेदी जी की यह स्थापना भी द्रष्टव्य है कि हिंदी कोकदाचित केवल बाहरी रूप और बनाव सिंगार की प्रवृत्ति की प्रेरणा इस (उर्दू) भाषा से अवश्य मिली है, परंतु वह क्षणिक और अस्थाई ही बनी रही है।दूसरी ओर, “उर्दू अभी तक आत्मकेन्रिेवत भाषा बनी रही है क्योंकि केंद्राभिमुख-भाषा होने में वह हिंदी के समान है, न कि उसकी जनपदीय बोलियों के। इसीलिए वह सूर, तुलसी, कबीर की परंपरा को अपनी परंपरा नहीं मानती और अन्य संतों और भक्तों के सात्विक साहित्य को अपना साहित्य मानने में कुंठा अनुभव करती रही। साथ ही उसने इस देश की पुरानी परंपरा से, अपभ्रंश, प्राकृत और संस्कृत के साहित्य से, घनिष्ठ और अविच्छेद्य संबंध स्थापित करने का प्रयत्न कभी नहीं किया।परंतु डॉ. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव का यह कथन भी यहाँ विचारणीय है कि आचार्य द्विवेदी ने जिस उर्दू की बात उठाई है, उसका संबंध मुख्यतः मध्यकालीन काव्य परंपरा से रहा है, उस साहित्य से रहा है जिसे राजशक्ति का संबल मोहग्रस्त करता रहा है, उस काव्य चेतना से रहा है जो अपने प्रेरणा-स्रोत में जनमानस और बोलियों के संयोग को नकारता रहा है। अन्यथा आज लिखे जा रहे उर्दू साहित्य की भाषा-मनोवृत्ति उसे हिंदी के नजदीक ही ला रही है। इसी संभावना को देखते हुए उन्होंने उर्दू-हिंदी के सहज संयोग पर आधारित महाजाति की साहित्य चेतना का पक्ष लेते हुए यह भी कहा है कि उर्दू को हमें संपूर्ण रूप से स्वीकार करना ही होगा।डॉ. श्रीवास्तव ने उर्दू साहित्य की लोक तटस्थ धारा के पुरस्कर्ता सैयद अहमद देहलवी के फ़रंहगे असफ़ियामें व्यक्त इस संकल्प का हवाला दिया है कि हम अपनी जबान को मरहठीबाजों, लवनीबाजों की जबान,धोबियों के खंड, जाहिल ख्यालबंदों के ख़्याल, टेसू के राग यानी बेसरतोपा अल्फ़ाज का मज़बूआ बनाना कभी नहीं चाहते .....। परंतु आधुनिक उर्दू साहित्य की लोकधारा इस फ़तवे की परवाह नहीं करती। बल्कि, “आज वह आलमशाह खानद्वारा राजस्थान की बोलियों, ’राहीके अनुसार अवधी, मेहरुन्निसा परवेज और शानीद्वारा कन्नौजी तथा हबीब तनवीर द्वारा छत्तीसगढ़ी आदि से अपनी साहित्यिक शक्ति और शब्दावली लेने लगी है। इसमें संदेह नहीं कि हिंदी और उर्दू को एक महाजाति के साहित्य में बाँधनेवाली अगर कोई शक्ति काम कर सकती है तो उसका आधार बनेगी - जनशक्ति, जनपदीय बोलियाँ और इस महाजाति की अपनी सह-अनुभूति। आचार्य द्विवेदी के शब्दों में हिंदी और उर्दू का प्रश्न बहुत दिनों से हमारे देशवासियों के लिए टेढ़ा प्रश्न रहा है। मैं नहीं मानता कि यह प्रश्न अब उतना टेढ़ा रह गया है। परंतु फिर भी कभी-कभी पुराने इतिहास का भूत डराता ही रहता है।

द्विवेदी जी के अनुसार हिंदी की असली शक्ति लोक की शक्ति है। उनका मत है कि हिंदी साधारण जनता की भाषा है। जनता के लिए ही उसका जन्म हुआ था और जब तक वह अपने को जनता के काम की चीज बनाए रहेगी, जन-चित्त में आत्मबल का संचार करती रहेगी,तब तक उसे किसी से डर नहीं है। वह अपने आपकी भीतरी अपराजेय शक्ति के बल पर बड़ी हुई है, लोक-सेवा के महान् व्रत के कारण बड़ी हुई है और यदि अपनी मूल-शक्ति के स्रोत को भूल नहीं गई तो निस्संदेह अधिकाधिक शक्तिशाली होती जाएगी।उन्हें विश्वास है कि उसका कोई कुछ भी नहीं बिगाड़ सकता। वह विरोधों और संघर्षों के बीच ही पली है। उसे जन्म के समय ही मार डालने की कोशिश की गई थी, पर वह मरी नहीं क्योंकि उसकी जीवन-शक्ति का अक्षय स्रोत जनचित्त है। वह किसी राजशक्ति की उँगली पकड़कर यात्रा तय करने वाली भाषा नहीं है, अपने-आपकी भीतरी शक्ति से महत्वपूर्ण आसन पर अधिकार करने वाली अद्वितीय भाषा है।वे यह भी ध्यान दिलाते हैं कि शायद ही संसार में कोई ऐसी भाषा हो, जिसकी उन्नति में पद-पद पर इतनी बाधा पहुँचाई गई हों, फिर भी जो इस प्रकार अपार शक्ति संचय कर सकी हो। इस शक्ति का रहस्य यह सामाजिक यथार्थ है कि वह करोड़ों नर-नारियों की आशा और आकांक्षा, क्षुधा और पिपासा, धर्म और विज्ञान की भाषा है। इसीलिए द्विवेदी जी के अनुसार, हिंदी की सेवा करने का अर्थ हिंदी की प्रतिमा बनाकर पूजना नहीं बल्कि इस लाक्षणिक प्रयोग का अर्थ है - हिंदी के माध्यम द्वारा समझनेवाली विशाल जनता की सेवा। वे समझाते हैं कि हमें ठीक-ठीक समझना चाहिए कि हिंदी की शक्ति कहाँ है। हिंदी इसलिए बड़ी नहीं है कि हममें से कुछ लोग इस भाषा में कहानी या कविता लिख लेते हैं या सभा-मंचों पर बोल लेते हैं। नहीं, वह इसलिए बड़ी है क्योंकि कोटि-कोटि जनता के हृदय और मस्तिष्क की भूख मिटाने में यह भाषा इस देश में सबसे बड़ा साधन हो सकती है।इतना ही नहीं, आचार्य द्विवेदी का यह दृढ़ मत है कि यदि देश में आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को हमें जन-साधारण तक पहुँचाना है तो इसी भाषा का सहारा लेकर हम यह काम कर सकते हैं। वास्तव में हिंदी इन्हीं संभावनाओं के कारण बड़ी है अन्यथा यदि वह यह कार्य नहीं कर सकती तो हिंदी-हिंदीचिल्लाना व्यर्थ है।


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