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बुधवार, 2 सितंबर 2009

शोध, यात्रा और साक्षात्कार



हैदराबाद के हिंदी साहित्यिक परिदृश्य के संबंध में कुछ समय पूर्व तक यह समझा जाता था कि यहाँ हिंदी कवियों, और उनमें भी अभ्यास कवियों, की भरमार है, या फिर शोध प्रबंधों का बोलबाला है। परंतु इधर स्थिति काफी बदली है। कवियों और शोध प्रबंधकारों की फसल तो पहले की तरह ही लहलहा रही है लेकिन नए गद्यकारों की संख्या भी तेज़ी से बढ़ रही है। प्रसन्नता की बात यह है कि व्यंग्य, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, समीक्षा, यात्रावृत्त, निबंध सहित विविध आधुनिक गद्य विधाओं में जो लेखन इधर सामने आ रहा है वह विषय और प्रस्तुति दोनों ही दृष्टियों से ध्यान आकृष्ट करता है तथा उसकी गुणवत्ता भी हैदराबाद के हिंदी गद्य के भविष्य के संबंध में आश्वस्त करती है। इसी संदर्भ में इस बार जहाँ हम एक शोध (कहानी का रंगमंच और नाट्य रूपांतरण) की चर्चा कर रहे है वहीं एक-एक यात्रावृत्तांत (यात्राक्रम) तथा साक्षात्कार/भेंटवार्ता (सुर्ख़ियों में लोग) से भी पाठकों को परिचित कराना चाहते हैं।

1.

साहित्य की विविध विधाओं में नाटक का शास्त्र सबसे पहले तैयार हुआ क्योंकि इसका संबंध जीवंत प्रस्तुति से है। किसी भी विधा को नाटक में ढाला जा सकता है। कहानियों का मंचन तो बहुत प्रचलित है ही। डॉ.. करण सिंह ऊटवाल ने अपनी पुस्तक ‘कहानी का रंगमंच और नाट्य रूपांतरण’ (2008) में इसी विषय पर शोध प्रस्तुत किया है। विभिन्न साहित्यिक और मीडिया विषयक विधाओं का परिचय देने के बाद उन्होंने किसी एक साहित्यिक रूप के दूसरे रूप में अंतरण के चार भेद किए हैं - रूपांतरण, भाषांतरण, माध्यमांतरण और लिप्यंतरण।

इसमें संदेह नहीं कि नाट्य रूपांतरण का इतिहास बहुत पुराना है। पौराणिक आख्यानों, भक्ति साहित्य में वर्णित लीलाओं, रामायण-महाभारत और लोकसाहित्य से लेकर कथा, कहानी, उपन्यास और संचार के माध्यमों से संबंधित विधाओं तक का नाट्य रूपांतर समय-समय पर होता रहा है। रामलीला और रासलीला हो या हरिकथा और तमाशा सब इस विषय क्षेत्र में समा जाते हैं। परंतु करण सिंह ने अपने संक्षिप्त ग्रंथ में केवल कहानी के रंगमंच और नाट्य रूपांतरों पर विचार किया है। इसके अंतर्गत उपन्यास के नाट्य रूपांतर को भी नहीं लिया गया है।

हिंदी में रूपांतरण का इतिहास बताने के बाद लेखक ने अलग-अलग अध्यायों में धूप का एक टुकड़ा (निर्मल वर्मा), डेढ़ इंच ऊपर (निर्मल वर्मा) तथा इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर (हरिशंकर परसाई) की मंचीय प्रस्तुतियों का विवेचन किया है। इस विवेचन के लिए प्रस्तुतीकरण के विधान, प्रस्तुति के रूप, दृश्य विधान, आरंभ, अंत, संवाद, समय, स्थान, वातावरण, पात्र, भाषा शैली, दृश्य परिवर्तन, कथा परिवर्तन, संवाद परिवर्तन, प्रभाव और प्रतिक्रिया को आधार बनाया गया है। इन्हीं आधारों पर और भी विस्तुत कार्य किया जा सकता है। डॉ. करण सिंह ऊटवाल सक्रिय रूप से नाटक और रंगमंच से जुड़े हुए है, इसलिए उनसे ऐसे अधिक व्यापक ग्रंथ की अपेक्षा करना उचित ही होगा।


2.

संपतदेवी मुरारका सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यों में रुचिपूर्वक आगे रहने वाली धर्मप्राण महिला हैं। उन्हें तीर्थाटन का शौक है। अपने परिवार के साथ वे देश-विदेश में अनेक यात्राएँ कर चुकी हैं। समय-समय पर उनके कुछ यात्रावृत्त प्रकाशित भी हुए हैं। अब उन्होंने ‘यात्राक्रम’ : प्रथम भाग (2008) के माध्यम से उन यात्रावृत्तों को विधिवत पुस्तक के रूप में प्रस्तुत किया है।


‘यात्राक्रम’ के लगभग सभी यात्रावृत्त किसी ने किसी धार्मिक स्थल से संबंधित हैं। इस प्रथम खंड में कुल आठ यात्रावृत्त सम्मिलित हैं - यात्रा वैष्णवदेवी, यात्रा नैनादेवी, यात्रा रामनगर की, मथुरा वृंदावन की ओर (विषय सूची में इसका शीर्षक ‘मथुरा दक्षिण भारत की’ छपा है!), यात्रा दक्षिण भारत की, यात्रा बद्रीनाथ-केदारनाथ, गंगोत्री-यमुनोत्री और उत्तरांचल की यात्रा तथा हरिद्वार का महाकुम्भ । साथ ही आर्ट पेपर पर चौदह पृष्ठों की रंगीन चित्रावली भी संजोई गई है।


परिवार के साथ धार्मिक यात्राओं के ये वृत्तांत कई कारणों से ध्यान खींचते है। लेखिका का विनम्र परंतु स्वाभिमानी व्यक्तित्व उनके अस्थाशील और दृढ़ निश्चयी मानस की झांकियों के साथ स्थान-स्थान पर झलकता है। ये यात्रावृत्त कोरे विवरण भर नहीं है बल्कि लेखिका ने अनुभव के साथ-साथ अनुभूति को इस तरह पिरोया है कि उनकी भाव प्रवणता पाठक को किसी कहानी की तरह अपने साथ बहा ले जाती है। हर दर्शनीय स्थल के साथ किसी न किसी ऐतिहासिक संदर्भ, पौराणिक प्रसंग, लोक विश्वास या किंवदंती का संबंध होता है, लेखिका ने अपने यात्रावृत्तों में ऐसी अंतर्कथाओं का समावेश करके भी कथा रस की सृष्टि की है। प्रकृति और मनुष्यों के विवरण के साथ-साथ क्षेत्रीय संस्कृति और लोकाचार को भी इन यात्रावृत्तों में समेटा गया है जिससे इनकी प्रामाणिकता में वृद्धि हुई है। कुछ स्थलों पर भाषा की काव्यात्मकता भी आकर्षक बन पड़ी है।


कुल मिलाकर सरल और प्रवाहपूर्ण भाषा शैली में रचित यह पुस्तक पठनीय, दर्शनीय और यात्रा प्रेमियों के लिए संग्रहणीय भी है। ‘यात्राक्रम’ के दूसरे खंड की प्रतीक्षा रहेगी।


3.

‘सुर्ख़ियों में लोग’ (2008) में युवा पत्रकार फकीर मोहम्मद सलीम (1973) द्वारा समय-समय पर लिखी गई भेंटवार्ताएँ संकलित है। ये भेंटवार्ताएँ मुख्यतः हैदराबाद के साहित्य, कला और संस्कृति के क्षेत्र में सक्रिय भूमिका निभाने वाले विशिष्ट लोगों से संबंधित हैं। महाकवि शेषेन्द्र शर्मा, कमल प्रसाद ‘कमल’, वेमूरि आंजनेय शर्मा, पद्मविभूषण पंडित जसराज, पद्मश्री मुज्तबा हुसैन, प्रो. वसंत चक्रवर्ती, जीलानी बानो, नरेंद्र लूथर, राजबहादुर गौड़, प्रो. शमीम जयराजपुरी और पद्मश्री जगदीश मित्तल से लेकर गद्दर तक 27 व्यक्तित्वों की संक्षिप्त लेकिन बहुआयामी छवियाँ इन भेंटवार्ताओं में सजाई गई है।


इसमें संदेह नहीं कि ‘सुर्ख़ियों में लोग’ में संकलित सभी भेंटवार्ताएँ पूर्व निर्धारित प्रश्नावली के चौखटे में तराशी गई हैं , तथापि जहाँ कहीं अवसर मिला है मुक्त चर्चा से भी परहेज़ नहीं किया गया है। इन प्रश्नों और चर्चाओं से कई तरह की अंतरंग जानकारियाँ और व्यक्तिगत सूचनाएँ तो प्रकट हुई ही हैं, साक्षात्कृत व्यक्तित्व के जीवन संघर्ष की गाथा भी उजागर हुई है जो इन्हें पठनीयता और रोचकता प्रदान करती है।


लेखक के मन में हैदराबाद और हिंदी के प्रति विशेष लगाव है। इसीलिए सभी विशिष्ट व्यक्तियों से इन दोनों विषयों पर अवश्य बातचीत की गई है। परिणामस्वरूप बहुआयामी चित्र भी उभर सके है हैदराबादी तहजीब और यहाँ की हिंदी के। जैसे पंडित जसराज देवीबाग में बचपन में खेले कबड्डी और गिल्ली डंडे़ के खेलों को याद करते हैं और जोर देकर कहते हैं कि मैं हैदराबादी हूँ, हैदराबाद ने मुझे मिटाकर बनाया है, यहाँ के कण-कण से मुझे अपनापन झलकता है, मेरे हैदराबाद प्रेम का पहला कारण यही है कि मैंने भी तो गंडिपेट का पानी पिया है, यहाँ की मिट्टी में एक तरह की खुषबू महसूस करता हूँ और यही खुशबू श्रद्धा में बदल जाती है। शहर के बदलाव उन्हें अच्छे लगते हैं लेकिन ज़रा देखें मंजूर अहमद मंजूर इस बारे में क्या कहते है, ‘‘घर छोटे हो गए है, उसी तरह जहनों का विकास भी सीमित हो गया है। रेलवे कंपार्टमेंट जैसे घरों में रह कर लोगों की सोच भी सीमित हो गई है। ज़हनी सुकून नहीं है। पहले लोग मिरची-चटनी में ही खुश रहते थे। अब बिरियानी मिलती है, तो भी ज़बान पर शिकवा है।’’


वेमूरि आंजनेय शर्मा की इस चिंता को भी भेंटवार्ता में बखूबी उभारा गया है कि हिंदी को उसका समुचित स्थान तब तक नहीं मिलेगा जब तक तकनीकी पाठ्यक्रमों में हिंदी भाषा का प्रवेश न हो। इस भेंटवार्ता में यह बात भी उभर कर सामने आई है कि हिंदी प्रचार संस्थाओं का काम अब बहुत बढ़ गया है। गाँव-गाँव जाकर प्रचार करने और कक्षाएँ चलाने के लिए शिक्षकों की आवश्यकता है, पाठ्य पुस्तकों का प्रकाशन जरूरी है, परंतु इस कार्य के लिए सरकार से मिलने वाला अनुदान बहुत अपर्याप्त है। दूसरी ओर डॉ.. विजयराघव रेड्डी का राग एकदम अलग ही है। उन्हें लगता है, रुपया काफी खर्च किया जा रहा है, उसके अनुपात में काम नहीं हो रहा है। वे मानते हैं कि हिंदी सीखने और सिखाने वालों में अब पहले सी लगन नहीं रही।


इन तमाम विचारों पर बहस करने का यहाँ अवसर नहीं है। फिलहाल इतना ही कि इस संग्रह का सबसे महत्वपूर्ण और सफल साक्षात्कार जगदीश मित्तल का है जिसमें उनकी कलाप्रेरणा से लेकर रचना प्रक्रिया और वैचारिकता के साथ-साथ कई घरेलू प्रसंग भी उभरकर सामने आ सके हैं।


अंततः प्रसिद्ध लोकगायक, कवि एवं क्रांतिकारी गद्दर से भेंटवार्ता के एक अंश के साथ आज की पुस्तक चर्चा को विराम .........

‘‘जमीनदारी का विरोध करने वाले नक्सली आंदोलन को 30 वर्ष हो गए हैं, लेकिन आज भी कई आदिवासी गाँव जमीनदारों के चंगुल में हैं। दिन-प्रतिदिन पुलिस का जुल्म आम जनता पर बढ़ता ही जा रहा है। ऐसी स्थिति में सीने पर बंदूक रख कर क्या बातचीत हो सकती है?’’


1. कहानी का रंगमंच और नाट्य रूपांतरण/डॉ. करण सिंह ऊटवाल/जवाहर पुस्तकालय, सदर बाजार, मथुरा-281 001/2008/रु. 150/पृष्ठ 120 (सजिल्द)

2. यात्राक्रम: प्रथम भाग/संपत देवी मुरारका/मिलिंद प्रकाशन, हैदराबाद/2008/रु. 200/पृष्ठ 182 (सजिल्द)

3. सुर्ख़ियों में लोग/एफ.एम. सलीम/शगूफा पब्लिकेशन, 31, बैचलर्स क्वार्टर, एम.जे.मार्केट, हैदराबाद-1/2008/रु. 100/पृष्ठ 152 (पेपर बैक)

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