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शनिवार, 23 मार्च 2019

(पुस्तक समीक्षा) 'संपादकीयम्' : शांति लाने में है बहादुरी



शांति लाने में है बहादुरी : ‘संपादकीयम्’
- डॉ. रामनिवास साहू

आज का मानव अपनी सभ्यता के विकास को चरम स्थिति पर पाकर जहाँ गर्व से फूला जा रहा है, वहीं आज के चिंतक, दार्शनिक, वैज्ञानिक, साधु, ऋषि, मुनि, उपदेशक, रक्षक, संरक्षक, यहाँ तक कि उच्चतम पत्रकार, संपादक संसार  के, विश्व के, प्रकृति के यहाँ तक कि संपूर्ण ब्रह्मांड के समक्ष खड़े-पड़े विनाशक अणु-परमाणु बम के भंडारों को देखकर अपनी नींद उड़ाए जा रहे हैं। सचमुच कल क्या होगा? किसको पता? ऐसी परिस्थिति में कोई यह ध्वज फहराता चले कि ‘युद्ध करना नहीं, शांति लाना है बहादुरी’, तो सचमुच स्तुत्य है। इस विचार, दर्शन, सोच, व्यवहार, धर्म, कर्म से ही मानव जाति लुप्त होने से बच सकेगी। संसार में मानव है तो संपूर्ण जीव है, प्रकृति है, साधन है, संपन्नता है, ब्रह्मांड है, लोक है, परलोक है, स्वर्ग है, नरक है। समझदार मानव के चहुँओर चींटी से हाथी, दूब से महावट, धूल से चट्टान सुरक्षित, संरक्षित एवं सुव्यवस्थित है। रे मानव! कुछ तो सुन, पढ़, देख, समझ, फिर बोल, फिर कर। तुम कहीं भी एक नहीं हो।  तुम्हारे अनेक होने के क्रम में आज हम सात अरब मानव यत्र तत्र सर्वत्र हैं। कविवर हरिवंश राय बच्चन के शब्दों में, ‘यह महान दृश्य है/ चल रहा मनुष्य है/ अश्रु, स्वेद, रक्त से/ लथपथ! लथपथ!! लथपथ!!!’

पिछले दिनों मैसूर विश्वविद्यालय के परिसर में ‘प्रवासी हिंदी साहित्य : संवेदना के विविध संदर्भ‘ (मार्च 6-7, 2019) पर विशेष रूप से आमंत्रित साहित्यकार डॉ. ऋषभदेव शर्मा से भेंट हुई, तो आश्चर्यचकित करते हुए उन्होंने मुझे वहाँ लोकार्पित अपनी सद्य:प्रकाशित रचना “संपादकीयम्” (परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद: 2019: 140 रुपये: आईएसबीएन- 97893 84068 790) मंच पर भेंट की। मुझे और भी आश्चर्यचकित करते हुए उन्होंने पन्ने पलटते हुए इस पुस्तक का समर्पण-वाक्य पढ़कर सुनाया, “आदरणीय मित्रवर डॉ. रामनिवास साहू को सप्रेम!” मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैं नि:शब्द! धन्यवाद के दो-चार शब्द ही कह सका। पुनः धन्यवाद। पंद्रह दिन बाद पढ़ने के लिए विशेष रूप से बैठा, तो भी मेरा मुँह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया। मोरपंख के आधारस्तंभ की तरह ‘संपादकीयम्’  लिखा कवर बहुत कुछ कहता है।

पुस्तकों के अंतिम पृष्ठों में प्रायः सारांश, उपसंहार, मंतव्य आदि के साथ संदर्भ ग्रंथों एवं पत्र-पत्रिकाओं की सूची होती है, जो लेखक को समझने में सहायक होती है। उसी आदत के अनुसार मैंने पुस्तक के अंतिम पृष्ठ को देखा। यहाँ भी मुझे आश्चर्यचकित होना पड़ा। पुस्तक का ‘युद्ध करना नहीं, शांति लाना है बहादुरी’ (पृष्ठ 135-136) शीर्षक अंतिम आलेख अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तथा उत्तर कोरियाई राष्ट्रपति किम जोंग उन के ‘मधुर मिलन’ को चित्रित करते हुए संपूर्ण मानवता को संदेश देता प्रतीत होता है। यही लेखक का मंतव्य है, विश्वशांति के प्रयत्नों का अंतिम परिणाम है, आतंकित समाज, विश्व तथा मानवता का अभिवादन है।

पुस्तक के आरंभ में ही लेखक ने सूचित किया है कि इसमें प्रस्तुत आलेख मूलतः  हैदराबाद के समाचार पत्र ‘डेली हिंदी मिलाप’ में प्रकाशित समसामयिक विषयों पर लिखी उनकी संपादकीय टिप्पणियाँ हैं।  दो-दो पृष्ठों के इन 61 संपादकीयों को 8 खंडों में विभाजित किया गया है, जो इस प्रकार हैं- स्त्री संदर्भ, लोकतंत्र और राजनीति, जो उपजाता अन्न, शहर में दावानल, व्यवस्था का सच, हमारी बेड़ियाँ, अस्तित्व के सवाल,  वैश्विक संदर्भ। लेखक ने अपनी व्यापक सर्वग्राह्य संवेदना से संपूर्ण मानवता के प्रति अपना हृदय स्पंदित किया है तथा अपनी दिव्य दृष्टि से ‘जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि’ की तर्ज पर मानव को आतंकित, पीड़ित, दलित, कुंठित करने वाली हर घटना का अवलोकन कर साहित्यकार की भाषा शैली एवं बिंब से विवेचित किया है। पुस्तक पठनीयता के उच्चतम शिखर पर है। एक बार अवश्य पढ़ें।  शुभमस्तु!
- डॉ रामनिवास साहू,  मैसूर
मोबाइल 7489117706.

(प्राक्कथन) हरियाणा का सामाजिक एवं साहित्यिक परिदृश्य



प्राक्कथन 

डॉ. सत्यनारायण के ग्रंथ “हरियाणा का सामाजिक एवं साहित्यिक परिदृश्य” की पांडुलिपि देखने का सौभाग्य मिला। इस सामग्री से गुजरते हुए मैं जहाँ लेखक की गहन शोध दृष्टि का कायल होता गया, वहीं इस ग्रंथ की नींव में निहित हरियाणा की सामाजिक और साहित्यिक चेतना से अभिभूत भी होता गया। हरियाणा के हिंदी लेखकों द्वारा इक्कीसवीं शताब्दी में रचित-प्रकाशित कहानियों में गुंथे सामाजिक जीवन के विविध पहलुओं पर प्रकाश डालने वाला यह ग्रंथ आनुषंगिक रूप में हरियाणा के सामाजिक और ऐतिहासिक वृत्त को भी सफलतापूर्वक रेखांकित करता है जिसके कारण इसके अभिप्रेत विषय में पर्याप्त विस्तार और समग्रता का समावेश हो गया है। 

यों तो भारत-गणराज्य के एक प्रदेश के रूप में हरियाणा का गठन स्वातंत्र्योत्तर काल में 1966 में हुआ, लेकिन अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपरा और परिपुष्ट जड़ों की दृष्टि से हरियाणा भरत खंड की प्राचीनतम सभ्यताओं के उत्थान-पतन का साक्षी रहा है। सिंधु सभ्यता, वैदिक सभ्यता, कुरुक्षेत्र, गीता का उपदेश, नाथ संप्रदाय, जैन संप्रदाय, सूरदास, गरीबदास, निश्चलदास, सूफी परंपरा – कहाँ तक गिना जाए? हरियाणा की उर्वरा भूमि सभ्यता, संस्कृति और साहित्य की दृष्टि से भी उतनी ही उपजाऊ रही है जितनी खाद्यान्न के उत्पादन की दृष्टि से। साथ ही, इस सच को नकारना संभव नहीं कि आधुनिक काल में हरियाणा के विविध विधाओं के साहित्यकारों और पत्रकारों की सूची अत्यंत विस्तृत है। इस पूरी परंपरा का अंकन और आकलन करते हुए विद्वान लेखक ने हरियाणा के सामाजिक जीवन के सौंदर्य से पाठक का साक्षात्कार कराया है। हरियाणा की प्राकृतिक सुषमा, समृद्ध अर्थव्यवस्था और सुसंपन्न लोक संस्कृति इसे स्वर्गीय सुखोपभोग की धरती बनाती है। कृषि, उद्योग, राजनीति, खेल और युद्ध जैसे तमाम क्षेत्रों में अपना डंका बजाने वाली हरियाणा की यह धरती जिन संतानों को जन्म देती है उनकी नस-नस में जुझारूपन और स्वाभिमान भरा रहता है। साथ ही, एक विशेष प्रकार की सहज-स्वाभाविक ग्राम्य जीवन की नैसर्गिक सुगंध उन्हें संपूर्ण भूमंडल पर अलग निजी पहचान प्रदान करती है। हरियाणा का यह समाज अपनी आस्तिकता, लोक धर्म में आस्था, विविध संस्कारों की लौकिक परंपरा, सर्वधर्म समभाव की व्यावहारिक चेष्टा और सब का कल्याण चाहने की वसुधैव कुटुंबकम् की उदार मूल्य चेतना का वाहक है। कुल मिलकर, ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ को सटीक कृतार्थता प्रदान करने वाला हरियाणा का समाज सौंदर्य, शौर्य और और औदार्य के मूल त्रिकोण पर अपने अस्तित्व को रूपायित करता है। 

डॉ सत्यनारायण ने हरियाणा के सामाजिक जीवन की इन तमाम विशेषताओं के संदर्भ में इक्कीसवीं शताब्दी की हिंदी कहानी की हरियाणा की फसल की गहन पड़ताल की है और यह दर्शाया है कि हिंदी कहानी की समस्त प्रवृत्तियों और आंदोलनों की आहटें अत्यंत मुखर रूप में हरियाणा के कहानी साहित्य में अभिव्यक्त हुई हैं। अपनी यात्रा में यह कहानी समकालीन समाज के विविधवर्णी परिवर्तनों के सभी आयामों का प्रत्यंकन करती है और इस प्रकार अपनी सामाजिक प्रासंगिकता प्रमाणित करती है। 

लेखक ने इक्कीसवीं शताब्दी में सक्रिय इस क्षेत्र के यथासंभव सभी प्रमुख एवं गौण कहानीकारों का सर्वेक्षण एवं उनके योगदान का सूत्रात्मक शैली में जो मूल्यांकन किया है, वह कहानीकारों के एक कोश के लिए भी आधार प्रदान करने में समर्थ है। विवेच्य कहानियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक पक्षों का विशद एवं सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए डॉ. सत्यनारायण ने यह प्रतिपादित किया है कि हरियाणा के कथाकारों की रचनाएं हरियाणवी मानस के अनुरूप सब प्रकार के बनावटीपन से मुक्त और और समकालीन यथार्थ पर आधारित हैं। उन्होंने इनकी संवेदना के धरातलों की भी गहन विवेचना की है और साथ ही यह भी दर्शाया है कि अपनी मिट्टी से ग्रहण की हुई भाषा का इन कथाकारों ने सृजनात्मक स्वरूप गठित करने में पूर्ण सफलता हासिल की है। 

इस विद्वत्तापूर्ण ग्रंथ के लेखक डॉ. सत्यनारायण गहन अन्वेषी प्रवृत्ति के अध्येता हैं। वे पारदर्शी सरल सहज व्यक्तित्व के स्वामी हैं और शैक्षणिक से लेकर समाज सेवा तक के कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। हँसमुख स्वभाव का यह खिलाड़ी अध्यापक रेडक्रॉस की गतिविधियों में भी निरंतर आगे रहने के लिए सुपरिचित है। अपनी जमीन के लिए ललक, निष्ठा और आत्मीयता से लबालब डॉ. सत्यनारायण ने अपनी प्रकृति के अनुरूप ही इस ग्रंथ को अपनी जमीन के सामाजिक और साहित्यिक परिदृश्य पर केंद्रित किया है। मुझे विश्वास है कि हिंदी जगत में उनके इस ग्रंथ को समुचित सम्मान मिलेगा। 

शुभकामनाओं सहित 

ऋषभदेव शर्मा 
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष 
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा 
एरणाकुलम और हैदराबाद केंद्र 

सोमवार, 4 मार्च 2019

यह महान दृश्य है...

यह महान दृश्य है...

@01मार्च,2019
भारतीय वायु सेना के विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान को अंतत: पाकिस्तान ने विधिवत भारत को सौंप दिया। भारत भर में दीवाली का हर्ष छा गया। वह क्षण अत्यंत रोमांचकारी और गौरवपूर्ण था जब भारतमाता के इस सपूत ने मातृभूमि की सीमा में वापस प्रवेश किया। उस ऐतिहासिक पल में विंग कमांडर का धैर्य, संतुलन, स्वाभिमान और आत्मविश्वास देखने लायक था। वे सचमुच ‘अग्निपथ’ पार करके आए हैं। शायद ऐसे ही अवसर के लिए डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने कहा हो-
यह महान दृश्य है
चल रहा मनुष्य है
अश्रु, स्वेद, रक्त से
लथपथ लथपथ लथपथ
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

इतिहास याद रखेगा, किस तरह पाकिस्तानी वायुसेना के हमलावर विमानों का पीछा करते हुए विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान ने उन्हें भगाने और मार गिराने में सफलता पाई थी। भले ही उनका अपना विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया हो। उन्होंने अपने प्राण तो बचा लिए, लेकिन संयोगवश पाकिस्तान के क्षेत्र में जा गिरे और पाकिस्तानी सेना के कब्जे में चले गए।  जाहिर है, वहाँ उनके साथ कोई बहुत अच्छा व्यवहार तो नहीं ही किया गया होगा। लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव के सामने झुकते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को उनके भारत को लौटाने की घोषणा करनी पड़ी। पाकिस्तान ने पूरी कोशिश की कि यह वापसी उसकी अपनी शर्त पर हो और भारत उससे वार्ता के लिए आगे आ जाए। पर उसकी एक न चली। इसे भारत की कूटनीति की जीत ही कहा जाएगा कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण इस मामले में पाकिस्तान अलग-थलग पड़ गया। फिर भी वियना संधि का उल्लंघन करके इस घटना का अपने प्रचार के लिए भरपूर इस्तेमाल करने से वह बाज नहीं आया।  अभिनंदन वर्धमान की सकुशल देश वापसी को बार-बार किसी न किसी कारण टाला गया और उनका बयान रिकॉर्ड करके पाकिस्तान मीडिया पर प्रचारित किया गया। जगजाहिर है कि पाक-फौज की प्रशंसा और भारतीय मीडिया की आलोचना करनेवाला यह बयान दबाव में दिया गया बयान है। किसी प्रमाण के रूप में इसकी कोई विश्वसनीयता नहीं हो सकती। यही नहीं, यह वीडियो बुरी तरह संपादित है, जिससे पता चलता है कि तथाकथित बयान को अपने अनुकूल बनाने के लिए उसमें भारी काट-छांट की गई है। ऐसा करके पाकिस्तान ने साफ कर दिया कि जिसे वह ‘शांति की दिशा में सदाशयता का एक कदम’ कह रहा है, उसके पीछे उसकी नीयत बिल्कुल भी साफ नहीं है। इसलिए यह उम्मीद करना अभी दूर की कौड़ी भर है कि इस घटना से दोनों देशों के बीच तनाव घट जाएगा।

पाकिस्तान की नीयत साफ नहीं है और वह विश्व-जनमत को गुमराह करने के लिए भलेपन का नाटक कर रहा है। वरना अभिनंदन वर्धमान के लौटाए जाने की घोषणा के साथ ही सीमा और एलओसी पर शांति छा जानी चाहिए थी। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उलटे पाकिस्तान की ओर से लगातार सीजफायर को तोड़ने और हमले की वारदातें इस तरह चलती रहीं, मानो उसकी फौज ने अपने प्रधानमंत्री का बयान सुना ही न हो। अगर थोड़ी देर को मान भी लिया जाए कि युद्धबंदी को लौटाने के पीछे इमरान खान का इरादा नेक था, तो इसके बावजूद पाकिस्तान की ओर से हमले जारी रहने से यह भी पता चलता है कि सेना के इरादे कतई नहीं।  अतः, पाकिस्तान के साथ सुलह-सफाई का समय अभी नहीं आया है।

इस बीच, पाकिस्तान की कूटनीतिक घेराबंदी करने में भारत को एक और सफलता इस्लामिक सहयोग संगठन (आईओसी) के मंच पर भी मिली है। इसमें भारत की विदेश मंत्री ने ‘सम्मानित अतिथि’ के रूप में भाग लिया और पाकिस्तान के विदेश मंत्री की कुर्सी खाली रही! संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी पाकिस्तान को लगातार घेरा जा रहा है। आर्थिक नाकेबंदी भी चलती रहनी चाहिए। इस वक्त भारत को नाहक ही पिघलना नहीं चाहिए।  पाक को शांति के लिए कदम बढ़ाना ही है, तो अपनी जमीन से आतंकवाद को उखाड़ फेंके। उससे न होता हो, तो भारत से सहायता के लिए कहे; और अपनी सदाशयता प्रमाणित करे! 000