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बुधवार, 23 सितंबर 2009

ब्रह्मोत्सव से लौटकर

प्रतिवर्ष शारदीय नवरात्र के अवसर पर आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से तिरुपति में नौ दिन तक श्री वेंकटेश्वर बालाजी का ब्रह्मोत्सव सम्पन्न होता है. एस वी भक्ति चैनल [टी वी] द्वारा इसका सीधा प्रसारण किया जाता है. इसके हिंदी प्रसारण के लिए महाशेषवाहन और लघुशेषवाहन की शोभायात्रा का आँखों देखा हाल प्रस्तुत करने का आमंत्रण प्राप्त हुआ तो मैंने सहज ही स्वीकृति दे दी. अच्छा अनुभव रहा . पता चला कि प्रसारण चार भाषाओं में चार अलग अलग चैनलों पर होता है.

देखने में आया कि प्रायः उद्घोषक [सभी भाषाओं के] कथावाचन और प्रवचन के अभ्यासी हैं. संस्कृत के मंत्रों और श्लोकों की भरमार में शोभायात्रा का दृश्यवर्णन गौण हो जाता है.अपनी बारी में मैंने इस परिपाटी को बदलने की कोशिश की तो कार्यक्रम के संयोजकों को अच्छा लगा .

उत्सव मूर्ति के बाद मंदिर में प्रतिष्ठित मूर्ति के भी दर्शन का सौभाग्य मिला...कई वर्ष बाद. अब व्यवस्था वहां पहले से बेहतर है. भीड़ उत्सव के दिनों में सामान्य दिनों से कम से कम दोगुनी तो थी ही. पर कोई असुविधा नहीं हुई. हाँ. लड्डू इस बार नहीं मिल पाए. उतनी प्रतीक्षा करने का धैर्य न था.

वापसी में पर्वतयात्रा का असर देखा. ऐसी घुमेर आई कि अपनी तबीयत टैं बोल गई. पसीने छूटने लगे. जीभ सूख गई. हाथों की अंगुलियाँ झनझनाने लगीं. लगा कि ऐंठ रही हैं. जोर की उबकाई. गाड़ी से उतरना पड़ा. यह असर यों तो कभी भी पहाड़ से उतरते होता है. अभी जून में ऊटी से उतरते वक़्त भी हुआ था. पर पहले अँगुलियों में यह झनझनाहट और ऐंठन-सी न होती थी.

लगता है , बुढ़ापा कुछ जल्दी आ गया , ऋषभ!

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