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गुरुवार, 12 सितंबर 2019

(गवेषणा-110) हिंदी भाषाचिंतन को प्रो. दिलीप सिंह का अवदान




हिंदी भाषाचिंतन को प्रो. दिलीप सिंह का अवदान

-ऋषभदेव शर्मा



हिंदी भाषाविज्ञान की परिवर्तनशील प्रकृति और उसके व्यापक होते जा रहे सरोकारों पर जिन इने-गिने भाषा अध्येताओं का ध्यान गया है उनमें प्रो. दिलीप सिंह (1951) का नाम अग्रगण्य है। उन्होंने भाषावैज्ञानिक चिंतन को नवीन भाषा संदर्भों में परखने और तदनुरूप निष्पत्तियाँ प्रतिपादित करने का चुनौतीपूर्ण दायित्व निभाया है। उन्होंने अपने लेखन द्वारा भाषावैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुप्रयोग पर केंद्रित भाषा संदर्भ को सुनिश्चित समृद्धि प्रदान की है। वे एक ऐसे मर्मवेधी भाषावैज्ञानिक-समीक्षक के रूप में प्रतिष्ठित हैं जिसकी दृष्टि सदा सकारात्मक, वस्तुनिष्ठ तथा कृतिकेंद्रित रहती है। वे साहित्य और भाषा को संस्कृति की ऐसी निष्पत्ति मानते हैं जिसका लक्ष्य मनुष्य और उसकी सामाजिकता है क्योंकि उनके लिए साहित्य और भाषा का विश्लेषण वस्तुतः मानव जीवन को सुंदरतर और समृद्धतर बनाने की साधना का ही दूसरा नाम है। उनकी यह मान्यता केवल लेखन तक सीमित नहीं है बल्कि उनका व्यक्तित्व भी इसी के ताने-बाने से बुना हुआ प्रतीत होता है। भाषा, समाज, संस्कृति और साहित्य इन चारों को आंतरिक रूप से संबंधित और परस्पर आश्रित मानने वाले प्रो. दिलीप सिंह अपने व्यक्तिगत जीवन और सामाजिक आचरण में भी इन चारों के समीकरण को चरितार्थ करने वाले आधुनिक भाषाचिंतक हैं। वे बौद्धिक जड़ता को तनिक भी बर्दाश्त नहीं करते और समय की माँग के अनुरूप हर परिस्थिति में कुछ नया करने के लिए तत्पर रहते हैं।

समाज को भाषा का नियामक मानने वाले प्रो. दिलीप सिंह व्यक्त वाणी के साथ ही देह भाषा और संकेतों में निहित संस्कृति के भी गहन पारखी और प्रयोक्ता हैं। आँखों में अजीब आत्मीयताभरी चमक, मूँछों में रहस्यपूर्ण स्मित और होठों पर निश्छल अट्टहास उनके धीर-गंभीर व्यक्तित्व को रुक्ष होने से बचाते हैं। सामान्य वार्तालाप में विनम्रता और शालीनता का प्रतिपल ध्यान रखने वाले प्रो. दिलीप सिंह वक्ता के रूप में अत्यंत ओजस्वी और दृढ़ संप्रेषक माने जाते हैं जो प्रमाणों और उदाहरणों के बिना कभी नहीं बोलते और किसी भी निष्कर्ष तक पहुँचने से पहले विषय की आंतरिक तहों का अलग-अलग कोणों से खुलासा करते हैं। उनका लेखकीय व्यक्तित्व शोधकर्ता और सर्जक के अद्भुत सामंजस्य से निर्मित है।

प्रो. दिलीप सिंह ने भाषाचिंतन की दीक्षा प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव और पंडित विद्यानिवास मिश्र सरीखे भाषाविदों से प्राप्त की। उनकी भाषावैज्ञानिक मेधा वाराणसी, आगरा, धारवाड़, हैदराबाद और मद्रास जैसे भारत के अलग-अलग भाषिक स्वभाव वाले केंद्रों में शाणित हुई तथा फ्रांस और अमेरिका की भट्टियों में तपकर निखरी। ‘समसामयिक हिंदी कविता’ (1981) और ‘व्यावसायिक हिंदी’ (1983) जैसी क्रमशः संपादित और मौलिक पुस्तकों के माध्यम से उन्होंने आरंभ में ही यह संकेत दे दिया था कि वे साहित्य अध्ययन और भाषाविज्ञान को परस्पर निरपेक्ष अनुशासन नहीं मानते। काव्य-भाषा और काव्य-शैली की भी उनकी समझ उतनी ही निर्मल हैं जितनी प्रयोजनमूलक भाषा और अनुवाद चिंतन की। आगे बढ़ने से पहले यह और जान लेना आवश्यक है कि प्रो. सिंह ने साहित्य और भाषा क्षेत्र के विशिष्ट और वरिष्ठ विद्वानों के साथ मिलकर प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव की हिंदी और अंग्रेज़ी में रचित संपूर्ण ग्रंथावली का संपादन किया है तथा विविध विश्वविद्यालयों और संस्थानों के भाषाविज्ञान के पाठ्यक्रमों की पाठ्यसामग्री भी विकसित, संपादित और प्रकाशित की है। इन सारे ही कामों में उनकी समाजभाषिक चेतना को प्रतिफलित देखा जा सकता है। वे संप्रेषण पर सर्वाधिक बल देनेवाले व्यावहारिक भाषाविज्ञानी हैं, इसमें संदेह नहीं। अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के व्यावहारिक प्रयोक्ता भाषाचिंतक के रूप में प्रो. दिलीप सिंह की ख्याति का आधार बनने वाले उनके ग्रंथों में ‘भाषा, साहित्य और संस्कृति’ (2007), ‘पाठ विश्लेषण’ (2007), ‘भाषा का संसार’ (2008), ‘हिंदी भाषाचिंतन’ (2009), ‘अन्य भाषा शिक्षण के बृहत संदर्भ’ (2010), ‘अनुवाद की व्यापक संकल्पना’ (2011) और ‘कविता पाठ विमर्श’ (2013) जैसी कृतियाँ शामिल हैं।

प्रो. दिलीप सिंह के इस समस्त भाषावैज्ञानिक लेखन के अवलोकन से यह स्पष्ट होता है कि उन्होंने साहित्य विमर्श और भाषाचिंतन दोनों ही दृष्टियों से हिंदी जगत को समृद्ध किया है। एक ओर उन्होंने हिंदी साहित्य की विभिन्न विधाओं के पाठों के मर्म का भेदन करके उनके सौंदर्य का उद्घाटन किया है तथा दूसरी ओर सैद्धांतिक और अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान के विविध पक्षों को व्यवहारतः घटित करके दिखाया है। उनका समस्त चिंतन भारतीय मनीषा की परंपरानुसार भाषाकेंद्रित चिंतन है तथा अपने लेखन द्वारा उन्होंने इस परंपरा को आधुनिक दृष्टि से भी संपन्नतर बनाने का महत्कार्य किया है।

सामान्यतः आज भी यह माना जाता है कि भाषाविज्ञान जटिल वैचारिकता का शास्त्र है। लोग यह भी सोचते हैं कि भाषाविज्ञान सैद्धांतिकी में बुरी तरह जकड़ा हुआ एक ऐसा तथ्यपरक अध्ययनक्षेत्र है जिसका आदि ही उसका अंत होता है। परंतु पिछले पाँच दशकों में भाषाविज्ञान अथवा भाषावैज्ञानिक अध्ययन की प्रविधियों में उल्लेखनीय बदलाव आया है। एक ओर भाषा विवरण की सरणियाँ अर्थकेंद्रित हुईं तो दूसरी ओर अर्थ की सीमाएँ, जो परंपरागत भाषाविज्ञान में बोध तक सीमित थीं, प्रैगमेटिक्स तक फैल गईं। फिर भाषावैज्ञानिक सिद्धांतों के अनुप्रयोग पर जो विमर्श हुए उन्होंने इस धारणा को तो कमज़ोर किया ही कि भाषाविज्ञान सिर्फ भाषा सिद्धांत अथवा भाषा विवरण की संरचनात्मक बुनावट को खोलने वाला शास्त्र है, यह भी प्रतिपादित किया कि वह अनुप्रयोग की जा सकने वाली एक उपयोगी प्रणाली भी है। इसी संदर्भ में प्रो. दिलीप सिंह ने भाषा सैद्धांतिकी और इसके अनुप्रयोग की सभी दिशाओं को टटोला और अपनी अवधारणाएँ प्रकट कीं। उनका लेखन भाषावैज्ञानिक चिंतन की संप्रेषणीयता का हामी है। सिद्धांतों को वे अपने भीतर जिलाते हैं और फिर उन्हें अनुप्रयोगात्मक स्तर पर भाषा, साहित्य, संस्कृति और समाज के घटकों के भीतर से प्रतिफलित करने का यत्न करते हैं। भाषावैज्ञानिक चिंतन में उनका अवदान यह माना जाएगा कि समय-समय पर उद्घाटित भाषिक और भाषावैज्ञानिक लेखन की अवधारणाओं को उन्होंने डाटा, पाठ और व्यावहारिक भाषा सामग्री के सहारे प्रस्तुत किया है। उनके भाषावैज्ञानिक लेखन का विस्तृत क्षेत्र ही यह जताने के लिए काफी है कि उनकी अध्ययन पीठिका कितनी मजबूत, तर्कबद्ध और पारदर्शी है। दूसरे शब्दों में उनका अवदान उनके सुदीर्घ चिंतन-मनन का निचोड़ है।

समाजभाषाविज्ञान
प्रो. दिलीप सिंह ने पिछली शताब्दी के सातवें दशक में ‘सामाजिक स्तर भेद और भाषा स्तर भेद’ विषय पर पीएचडी की थी। यह वह समय था जब भारत में भाषावैज्ञानिक विमर्श में समाजभाषाविज्ञान घुटनों के बल चल रहा था। दिलीप सिंह ने समाजभाषावैज्ञानिक सिद्धांतों को हिंदी भाषासमुदाय के भाषा वैविध्य के नज़रिए से विश्लेषित किया जिसमें यह अछूता पक्ष भी उजागर किया कि सामाजिक संरचना ही भाषा वैविध्य और भाषा विकास को संभव बनाती है। आगे चलकर समाजभाषाविज्ञान उनके लेखन का एक मूलाधार भी बना। उन्होंने पहली बार ‘समाजभाषाविज्ञान’ और ‘भाषा का समाजशास्त्र’ की वैचारिकता को ही स्पष्ट नहीं किया बल्कि ‘भाषा का समाजशास्त्र’ की सैद्धांतिकी में उल्लिखित उन सभी पक्षों को हिंदी भाषा के संदर्भ में व्याख्यायित किया जिनका उस समय तक तो अभाव था ही, आज भी जितना विस्तार इसे हिंदी भाषा की भाषिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक छवियों के संदर्भ में मिलना चाहिए था, नहीं मिल सका है। प्रो. सिंह निरंतर इस दिशा में विचार करते आ रहे हैं। चाहे वे साहित्यिक पाठों का विश्लेषण कर रहे हों, चाहे हिंदी प्रयुक्तियों की व्याख्या, और चाहे अनुवाद प्रक्रिया और अन्य भाषा शिक्षण - सभी में एक संकेत की तरह वे समाजभाषावैज्ञानिक और भाषा की समाजशास्त्रीय प्रविधियों का निर्माण और प्रयोग करने की पहल करते हैं।

इस दृष्टि से उन्होंने विकल्पन, संप्रेषण और भाषा की सर्जनात्मकता पर जो चर्चाएँ की हैं, वे भारतीय भाषाओं और खासकर हिंदी भाषा के लिए आधार बनाई जा सकती हैं। प्रो. सिंह ने समाजभाषाविज्ञान की अपनी अध्ययन दृष्टि को बहुत व्यापक बनाकर प्रस्तुत किया है, जिसमें सस्यूर और चाम्स्की के वैचारिक द्वंद्वों से भी वे टकराए हैं ; लेबाव और हैलीडे की व्यावहारिकता को भी उन्होंने नए ढंग से देखा है तथा डेल हाइम्स के बहाने भाषा में संस्कृति के अंतस्थ होने की अनिवार्यता का भी पता उन्होंने दिया है। प्रयोग, संदर्भ, परिस्थिति और संप्रेषण जैसी सैद्धांतिक संकल्पनाओं को प्रो. सिंह ने हिंदी भाषा और साहित्य के विवेचन द्वारा जिस तरह पठनीय, संप्रेषणीय और वैज्ञानिक रूप में सामने रखा है वह उनके प्रवीण समाजभाषावैज्ञानिक होने का स्वतः प्रमाण है।

शैलीविज्ञान
इसमें संदेह नहीं कि शैलीविज्ञान की जिन अवधारणाओं से प्रो. दिलीप सिंह प्रभावित दिखाई देते हैं, वह रवींद्रनाथ श्रीवास्तव का शैलीवैज्ञानिक चिंतन है। यह कहने की आवश्यकता नहीं कि श्रीवास्तव का चिंतन एक जटिल वैचारिक प्रक्रिया से उद्बुद्ध है अतः उसे ठीक ढंग से समझना, उसके भीतरी बिंदुओं की पहचान करना और फिर उन्हें पाठ के संदर्भ में उपयोग में लाना आसान काम नहीं है। इस बात से ही पता चलता है कि वे शैलीविज्ञान के गहन अध्येता हैं और यह भी कि श्रीवास्तव में उद्धृत अन्य संदर्भों को उन्होंने अलग से भी पढ़ा-समझा और फिर अपनी एक राह बनाई। प्रो. सिंह ने भाषा, समाज और साहित्य को अविच्छिन्न देखा है। उनकी साहित्यिक अभिरुचि पाठ के भाषिक विधान से तय होती दिखाई देती है। संस्कृति संबंधी उनकी धारणाएँ भी रीति-रिवाज और आचरण से आगे जाकर प्रोक्ति में इनको घटित होते हुए देखती हैं। उनका समाजभाषावैज्ञानिक पक्ष भी प्रबल है क्योंकि यहाँ भी उन्होंने सामाजिक शैली, शैली वैविध्य, पाठों में गठाव और भाषिक अभिव्यंजना को मात्र चयन, विचलन, समांतरता और अग्रप्रस्तुति के खाँचों में न बाँट कर पाठ में द्वंद्व या तनाव तथा अभिव्यंजनात्मक औज़ारों के नजरिये से शैली की सहजता को आँकने की कोशिश की है। शैलीविज्ञान में इनका अवदान यह माना जा सकता है कि शैलीविज्ञान को शुद्ध भाषाई और संरचनात्मक मानने वाली विचारधारा को उन्होंने चुनौती दी और विभिन्न पाठों का विश्लेषण करके यह सिद्ध किया कि शैलीविज्ञान साहित्यिक पाठ के विश्लेषण की ऐसी प्रविधि है जो सामाजिक शैलीविज्ञान तक जाने का रास्ता भी हमें दिखलाती है। उनका अवदान यह भी है कि वे शैलीविज्ञान को समाजशैलीविज्ञान के दायरे में ले जाते हैं और हिंदी के पाठों के जरिये यह दिखा पाते हैं कि शैलीविज्ञान केवल भाषिक संरचना पर केंद्रित न होकर कला, संस्कृति और सभ्यता के विकास से भी साहित्य को जोड़ने का मार्ग दिखाता है।

प्रो. सिंह ने शैली की अवधारणा को भी नए आयाम दिए। सामाजिक शैली, बातचीत में लोक और सांस्कृतिक तत्वों का अवमिश्रण, संवादों की परिस्थितिजन्य बुनावट तथा प्रोक्ति के स्तर पर पाठों की अभिव्यंजनापरक संघटना को वे इस दृष्टि से देखते हैं कि यह स्पष्ट हो सके कि कृति के भीतर सन्निहित शैलीतत्व अपनी विविधता तो प्रकट करते ही हैं, वे कृति की आत्मा और मार्मिकता को भी उभार दे सकते हैं, देते हैं।

प्रो. सिंह ने अपने शैलीवैज्ञानिक अनुप्रयोगों में एक उल्लेखनीय काम यह भी किया है कि उन्होंने हिंदी की व्याकरणिक इकाइयों के सृजनात्मक प्रयोग की पड़ताल गद्य और पद्य दोनों प्रकार के पाठों मंे की है। इसके पहले पाठ विष्लेषण में इस प्रविधि का उपयोग दिखाई नहीं देता। इसके अतिरिक्त भाषा और संवेदना के नजरिए से भी प्रो. सिंह ने कभी षिल्प तो कभी पाठों की संरचना के द्वारा यह उद्घाटित किया है कि भाव और संवेदना को अपेक्षित उत्कर्ष देने में भाषिक विधान तथा भाषायी संयोजन की कितनी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। उन्होंने शैलीविज्ञान को व्यावहारिकता में ढालकर यह जता देने का यत्न किया है कि मात्र सैद्धांतिकता किसी शाास्त्र का न तो मूल होती है और न ही उसकी अंतिम परिणाति। जब तक उसका अनुप्रयोग नहीं किया जाता और सही प्रविधि से उसका इस्तेमाल नहीं किया जाता तब तक उसके प्रति भ्रांतियाँ बने रहने की तथा निरर्थक बहस की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। शैलीविज्ञान की पृष्ठभूमि अत्यंत ठोस है तथा हिंदी के साहित्यिक पाठों की सटीक समीक्षा में इसे किस तरह अपनाया और पनपाया जा सकता है यह उनके पाठ विष्लेषण से समझने में हमें कोई दिक्कत पेष नहीं आती। एक विषेषता यह भी कि शैलीविज्ञान के सिद्धांतों को उन्होंने अपने भीतर पचाया है और फिर पाठों के जरिये उन्हें रूपाकार दिया है। इसीलिए उनके इन अध्ययनों में हमें न तो कोई झोल दिखाई देता है, न अस्पष्टता और न ही भ्रांति। संप्रेषणीयता उनके इस लेखन का अतिरिक्त गुण है जो ऐसे लेखनों में कदाचित ही दीख पड़ता है।

(अन्य) भाषा शिक्षण
यह जानकारी हो सकती है कि प्रो. सिंह ने अपने कैरियर की शुरूआत पहले विदेश और फिर देश में हिंदी शिक्षण से की। विदेशियों को हिंदी पढ़ाने का उनका सुदीर्घ अनुभव रहा है। साथ ही दक्षिण भारत में बरसों हिंदी पाठ्यक्रमों से और शोध से जुड़े होने के कारण उनकी दृष्टि भाषा अधिगम की उन समस्याओं पर स्वतः पड़ती रही है जिनकी वजह से दूसरी भाषा के ग्रहण में अथवा समझ में व्यवधान उत्पन्न होता है। अपने इन्हीं अनुभवों को प्रो. सिंह ने भाषा शिक्षण संबंधी लेखन में हमारे साथ बाँटा है। यहाँ भी व्यावहारिकता का दामन उन्होंने कहीं नहीं छोड़ा है। इसके पहले उनके सामने हिंदी में भाषाविज्ञान और भाषा शिक्षण, लेंगुएज टीचिंग एंड स्टाइलिस्टिक्स और व्यतिरेकी विश्लेषण प्रस्तुत करने वाली अनेक पुस्तकें थीं। इनमें से अधिकतर सैद्धांतिक ज्यादा थीं, व्यावहारिक कम। उन्होंने एक काम महत्वपूर्ण किया; और जिसका अनुभव वे विदेश में कर चुके थे कि मसला केवल भाषा शिक्षण भर का नहीं है इसकी परिधि में साहित्य और संस्कृति शिक्षण का भी समावेश होना चाहिए। ऐसा उन्होंने करके भी दिखाया। भाषाशिक्षण की बात करते समय प्रो. दिलीप सिंह ने पहली बार उसकी ऐतिहासिकता को ही नहीं बल्कि इतिहास के माध्यम से उसकी विकास प्रक्रिया को भी समझने की कोशिश की क्योंकि इन्हें समझे बिना उन समस्याओं को समझ पाना भी कठिन है जो भाषा अधिगम में अवरोध उत्पन्न करती हैं। इस संदर्भ में पुनः उनका जोर संप्रेषणपरक भाषा शिक्षण पर है। भाषा शिक्षण के संदर्भ में इसे उन्होंने ‘अभिव्यक्ति की व्यवस्था’ कहा और इस अभिव्यक्ति की व्यवस्था में उन्होंने भाषिक के साथ-साथ भाषेतर उपादानों को अन्य भाषा शिक्षण के लिए महत्वपूर्ण ही नहीं अनिवार्य सिद्ध किया है, ऐसा हिंदी में पहली बार घटित हुआ। इसके साथ ही अन्य भाषा शिक्षण में लिखित और उच्चरित भाषा के बीच भेदों और अंतर्संबंधों दोनों को लेकर चलने की जो प्रविधियाँ उन्होंने तैयार की हैं, वे अनूठी तो हैं ही, भाषिक सामग्री का उपयोग करने की वजह से ये कक्षा में उपयोग करने योग्य भी बन गई हैं। इस धरातल पर ही रूप के स्थान पर अर्थ पर बल देने तथा भाषा के प्रकार्यात्मक रूपों को अधिक स्थान देने की जो बात उन्होंने कही है वह संप्रेषण से भी आगे जाकर अन्य भाषा में बोधगम्यता और दक्षता तक पहुँचती है। इसीलिए भाषा दक्षता को प्रो सिंह ने अलग नजरिये से देखा है। तभी उन्होंने संप्रेषण सिद्धांत के अंतर्गत रोमन याकोब्सन और हैलीडे के विचारों को इतना उदाहरणपुष्ट और पारदर्शी बना दिया है जैसा कि कर पाना किसी सामान्य के बूते का नहीं है।

साहित्य शिक्षण (अभी तक जिस पर हिंदी में कोई चर्चा ही नहीं हो पाई है) की उनकी स्थापनाएँ अनुभवसिद्ध हैं। साहित्यिक पाठों में भाषा शिक्षण के साथ-साथ सांस्कृतिक तथा समाजमनोवैज्ञानिक घटकों को कैसे शिक्षणीय बनाया जा सकता है, यह प्रो. सिंह ने प्रक्रियात्मक पद्धति अपनाते हुए समझाया है। यहाँ यह बता देना जरूरी है कि साहित्यिक पाठ के जो अंश उन्होंने साहित्य शिक्षण की बात करते हुए उदाहरणस्वरूप चुने हैं, वे वहीं से उठाए गए हैं जिन्हें वे पाठ विश्लेषण के लिए पहले चुन चुके थे। इस तरह उन्होंने यह भी दिखा दिया है कि पाठ विश्लेषण की परिधि में वे जिन शैलीवैज्ञानिक प्रविधियों का इस्तेमाल कर रहे थे वे बड़ी आसानी से भाषा शिक्षण की प्रक्रिया में भी इस्तेमाल की जा सकती हैं। यहाँ उनका शैलीवैज्ञानिक और समाजभाषावैज्ञानिक दोनों मुखर हैं।
संस्कृति शिक्षण पर उनका लेखन पहली बार दिखाई दिया है जिसके माध्यम से उन्होंने यह प्रतिपादित करने का यत्न किया है कि भाषा और संस्कृति का संबंध बेजोड़ होता है तथा पहली बार यह भी कि सांस्कृतिक तत्वों के घुलन के बिना न तो किसी सामाजिक भाषा का निर्माण होता है और न ही किसी सभ्यता का।

इस क्षेत्र में प्रो. सिंह ने भाषा शिक्षण की सैद्धांतिकी को भी प्रस्तुत किया है। इस सैद्धांतिक भूमिका को उन्होंने निःसंकोच प्रो. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव से ग्रहण कर लिया है और जहाँ जरूरत पड़ी है उसमें अपना कुछ जोड़ा है। जोड़ना और आगे की दिशा तय करना अथवा एक चिंतनबिंदु से दूसरे-तीसरे तक पहुँचना, प्रो. सिंह की भाषावैज्ञानिक लेखन पद्धति की अनोखी विशेषता है जिसे न तो दुहराव ही कहा जा सकता है और न ही पिष्टपेषण। उन्होंने भाषा षिक्षण के अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान से जुड़ने की या उसका अंग होने की चर्चा में अपनी इसी प्रतिभा का परिचय दिया है। जहाँ अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान को सैद्धांतिक भाषाविज्ञान के अनुप्रयोग तक सीमित न करके उन्होंने शुद्ध भाषाविज्ञान, समाजभाषाविज्ञान, मनोभाषाविज्ञान और यहाँ तक कि अनुवाद शास्त्र को भी इस तरह इसमें समाहित कर दिया है कि भाषा शिक्षण की जिन प्रविधियों को वे व्यावहारिक स्वरूप देते हैं वे यहाँ अपनी सैद्धांतिकता में भी दृढ़ बनी दिखाई देती हैं।

भाषा शिक्षण की अधुनातन आवश्यकताओं की ओर भी उनकी दृष्टि बराबर रही है। संप्रेषणपरक व्याकरण को तो वे वरीयता देते ही हैं लेकिन इसके भीतर वे सिर्फ बोलचाल की हिंदी या बातचीत की हिंदी की दक्षता तक ही इसकी सफल परिणति नहीं मानते हैं। उन्होंने पहली बार संप्रेषणपरक व्याकरण के भीतर अखबारों, फिल्मों, टीवी, रेडियो, लोक कलाओं, विशेष रूप से नाटकों के पाठों और भाषाविधान को भी अन्य भाषा शिक्षण में समाविष्ट करने का आग्रह किया है। इसीलिए विदेशी भाषा शिक्षण में विशेष रूप से उन्होंने ‘मीडिया और हिंदी’ पर अलग से बात की है और अन्य भाषा शिक्षण प्रकार्य को ‘लेंगुएज एफीशिएंसी’ की दृष्टि से प्रबल बनाने के लिए कंप्यूटर साधित भाषा शिक्षण पर भी उनके विचार अत्यंत वैज्ञानिक और सामग्रीपुष्ट हैं। यह भी शिक्षणीय है और यही उनकी चरम उपलब्धि भी है। जैसा कि उनसे अपेक्षित भी था, अन्य भाषा शिक्षण के समाजभाषिक पक्ष पर उन्होंने अलग से और विस्तार से विचार किया है। और एक अनूठा प्रयोग भी कि ‘तराना-ए-हिंदी’ के माध्यम से भाषाई तनाव और राष्ट्रीय भावना को उद्वेलित करने वाली भाषिक संरचना को उन्होंने भाषा शिक्षण की दृष्टि से संप्रेषित किया है। एक विषेष बात यह भी है कि भाषा शिक्षण पर उनके चिंतन में व्यावहारिकता अथवा इन्हें कक्षा में इस्तेमाल कर पाने की सहजता तो निहित है ही, इनमें ऐसे अनेक प्रारूप हैं जिनका सीधा उपयोग करके अन्य भाषा शिक्षण के मार्ग को, और अन्य भाषा शिक्षार्थी को भी, अधिक दक्ष, समर्थ और सक्षम बनाया जा सकता है। उनके भाषा शिक्षण संबंधी लेखन का यह सबसे बड़ा अवदान है।

अनुवाद विज्ञान
अनुवाद संबंधी अध्ययन भी प्रो. दिलीप सिंह का प्रमुख क्षेत्र है। इसकी वजह अनुवाद की व्यावसायिकता अथवा अनुवाद पाठ्यक्रमों की अधिकता नहीं है बल्कि ऐसा लगता है कि उनको शैलीविज्ञान, समाजभाषाविज्ञान और भाषा शिक्षण इन तीनों को जोड़ते हुए देखने का एक रास्ता इस चिंतन में सुझाई देता है। वे अनुवाद विज्ञान की परिपाटीगत व्याख्या में एकदम प्रवेश नहीं करते। न तो वे अनुवाद प्रकारों पर बीसियों पृष्ठ खर्च करते हैं, न ही उसकी प्रक्रिया पर और न ही उसकी उन घिसी पिटी परिभाषाओं पर जिनका अब न तो कोई ओर रह गया है न छोर। उनकी दृष्टि केवल सिद्धांत और समस्याओं पर भी टिकी नहीं है और अगर कहीं टिकी भी है तो पूरी नव्यता के साथ और अनुवाद को उस तरह देखने की अनिवार्यता के साथ कि अनुवाद एक शास्त्र और एक क्रिया की तरह आधुनिक समाज ही नहीं बल्कि वैश्विक समाज को किस रूप में आगे ले जा सकता है अथवा जोड़ सकता है। इसी कारण वे अपनी बात को प्राकृतिक अनुवाद से शुरू करते हैं जिसे एकभाषी भी अंजाम देता है। उन्होंने पहली बार यह बताया कि कोडीकरण और विकोडीकरण की प्रक्रिया द्विभाषी ही नहीं होती, एकभाषी भी होती है। इस संदर्भ में उन्होंने अनूदित पाठ का जो सिद्धांत दिया है वह एक ओर उनकी समाजभाषावैज्ञानिक दृष्टि के प्रस्थान को प्रतिबिंबित करता है तो दूसरी ओर उनकी शैलीवैज्ञानिक प्रविधियों की पकड़ को। ऐसा इसलिए कि इस नई भूमिका को स्थापित करते समय वे जिन दो संकल्पनाओं को आधार बनाते हैं वे हैं पाठभाषाविज्ञान और संकेतविज्ञान। अनुवाद चर्चा में यह दृष्टि अन्यत्र सुलभ नहीं है। शायद इसीलिए वे अनुवाद के सामाजिक संदर्भ को भी उभार सके हैं जिसे उनकी नव्यता निःसंकोच होकर कहा जा सकता है।

उनके अनुवाद चिंतन में तीन बातें बहुत खुलकर और पहली बार आई हैं -एक अनुवाद समीक्षा और मूल्यांकन वाला पक्ष, दो - तुलनात्मक साहित्य और अनुवाद के अंतःसंबंध और इनकी अन्योन्याश्रयता का संदर्भ तथा तीन - साहित्येतर अनुवाद का संदर्भ। कहना न होगा कि प्रो. सिंह के पहले इन तीनों पर विचार तो क्या संकेत भी नहीं मिलते।

समतुल्यता के सिद्धांत को उन्होंने संप्रेषणपरक मूल्यों से भी और भाषाविकल्पन से जोड़कर अनुवाद को मात्र एक भाषिक रूपांतरण न मानकर एक समाजसांस्कृतिक रूपांतरण प्रक्रिया सिद्ध कर दिया है। इन चर्चाओं में भी वे अपनी व्यावहारिकता कायम किए हुए हैं जिसे वे मूल और अनूदित पाठों की तुलनीयता के द्वारा सिद्ध करते हैं। नाइडा के समतुल्यता सिद्धांत को प्रो. सिंह ने अलग ढंग से विवेचित किया है जिसमें रूपात्मक समतुल्यता और गत्यात्मक समतुल्यता को उन्होंने हिंदी पाठ के संदर्भ में देखा है और यहाँ भी भाषिक उपादानों से अधिक महत्व उन्होंने सामाजिक अर्थ को दिया है। संभवतः इसीलिए अनुवाद समस्या को भी वे एक नए नजरिये से देख सके हैं। यहाँ उनका बल भाषावैज्ञानिक समीक्षा से अधिक अर्थ, भाषेतर संदर्भ, विशिष्ट प्रयोग, सांस्कृतिक रूपांतरण और भाषा प्रकार्य संबंधी समस्याओं तक फैलता चला गया है। इसमें क्या संदेह है कि साहित्यिक और साहित्येतर दोनों प्रकार के पाठों में ये तमाम तरह की समस्याएँ उभरती रहती हैं। फिर भी इस पर हमें कोई चर्चा दिखाई नहीं देती। ऐसा करके प्रो.सिंह ने अनुवाद कार्य को रूपांतरण के एक तरीके से कहीं आगे ले जाकर भाषाविकास की एक प्रक्रिया माना है। कहना न होगा कि इसके पहले भाषा विकास के संदर्भ में अनुवाद की भूमिका को अथवा उसके देय को नज़रअंदाज कर दिया गया था।

हिंदी में पहली बार अनुवाद समीक्षा और मूल्यांकन को प्रो. सिंह ने तरजीह दी। यहाँ भी उन्होंने तब तक उपलब्ध इस संकल्पना पर प्रकाशित अंग्रेजी पुस्तकों और एकाध हिंदी पुस्तक की सैद्धांतिकी से किनारा करते हुए अंग्रेजी-हिंदी तथा हिंदी-अंग्रेजी पाठों की समीक्षा के प्रारूप तैयार किए। उल्लेखनीय यह भी है कि उनके इस प्रारूप में कहीं ओट में हिंदी भाषा का इतिहास भी झाँकता है तो कहीं अंग्रेजी भाषासमाज की दुनिया को देखने वाली सीमित मानसिकता भी। ‘अनूदित पाठ में संप्रेषणीयता’ अथवा ‘अनूदित पाठ की संप्रेषणीयता’ यहाँ भी उनके लिए सर्वोपरि है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल की समीक्षा शैली में अनुवादनीयता की परख संभवतः उन्होंने पहली बार की और इसी तरह ‘लाइट ऑफ एशिया’ के अनुवाद ‘बुद्धचरित’ की भी। इस दृष्टि से ‘गोदान’ के अंग्रेजी अनुवाद पर उनका जो विश्लेषण है उसमें डिस्कोर्स, शैली, समाज सांस्कृतिक पक्ष और लोकजीवन को तो केंद्र में रखा ही गया है; इस बहाने उन्होंने ‘साहित्यिक कृति भाषाबद्ध होती है’ इस कथन को भी बड़ी सहजता से हमारे सामने खोल दिया है। इस अध्ययन का प्रारंभिक हिस्सा अत्यंत विचारपुष्ट है जिसमें अनुवाद की चुनौतियों, अनुवादनीयता तथा अनुवाद समीक्षा/मूल्यांकन की तकनीक पर प्रो. सिंह ने अनूठा विमर्श किया है। इसका मूल्यांकन वाला पक्ष भी अत्यंत स्पष्ट और यह जतानेवाला है कि अनूदित पाठ की सीमाएँ लक्ष्य भाषा की सीमाएँ नहीं होतीं वे अनुवादक की सीमाएँ होती हैं।

अनुवाद विज्ञान को सामयिक संदर्भ देने का काम भी प्रो. सिंह ने बखूबी किया है। यह काम वे अपने लेखन में ही नहीं बल्कि संगोष्ठियाँ आयोजित करके, स्मारिकाएँ प्रकाशित करके भी एक लंबे अरसे से करते रहे हैं। उनके सुदीर्घ अनुभव और सतत वैचारिक मंथन से ही यह संभव हुआ कि साहित्येतर अनुवाद की इतनी व्यापक और संपूर्ण पीठिका हमारे सामने आ सकी। इस संदर्भ में उन्होंने साहित्येतर पाठ की अनुवाद समीक्षा का भी प्रारूप हमें दिया है। उल्लेखनीय है कि अनुवाद समीक्षा में भी वे संप्रेषण की भूमिका को भुलाते नहीं। इसके कारण ही उन्होंने व्यावसायिक अनुवाद तथा संचार क्रांति में अनुवाद की भूमिका जैसे अछूते विषयों पर भी अपनी लेखनी चलाई और अत्यंत उपयोगी संकेत हमें दिए हैं जिनके आधार पर हम इन दोनों ही दिशाओं में भारतीय भाषाओं की अनुवादनीय संभावनाओं और चाहें तो उनकी समस्याओं की भी परख कर सकते है। हिंदी पत्रकारिता की भाषा में अनुवाद को देखने के महत्वपूर्ण सूत्र भी वे हमारे सामने रख चुके हैं ; जरूरत इन्हें दिशा देने की है। बहुभाषिकता और बहुसांस्कृतिकता प्रो. सिंह की वैचारिकता का आधार रहे हैं। संभवतः इसीलिए उनका समाजभाषावैज्ञानिक भी, उनका शैलीवैज्ञानिक भी और साथ ही उनके भीतर का अनुवाद चिंतक भी चयन और संयोजन या एक ही शब्द में कहें तो समायोजन को जिस प्रकार देख पाता है वह अन्यत्र दुर्लभ है। यह भी कह दिया जाए कि अनुवाद विज्ञान की सैद्धांतिकी में निविष्ट उन बिंदुओं में प्रो. सिंह की विषेष रुचि है जो स्रोत भाषा के संस्कारों को लक्ष्यभाषा के भीतर समाविष्ट करने की एक प्रक्रिया है, एक जरिया है और उनकी दृष्टि में यही संभवतः अनुवादक और अनुवाद कार्य दोनों का लक्ष्य है; और यदि नहीं है तो होना चाहिए।

भाषाविज्ञान/ हिंदी भाषा
अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान की सभी शाखाओं में पैठ रखने के साथ ही प्रो. दिलीप सिंह विवरणात्मक अथवा संरचनात्मक भाषाविज्ञान के भी सजग अध्येता हैं। उनकी यह पकड़ उनके पीछे उल्लिखित अवदानों से भी साफ झलकती है क्योंकि यह तो मानी हुई बात है कि जो व्यक्ति शुद्ध भाषविज्ञान में दीक्षित नहीं होगा वह उसकी सैद्धांतिकी का अनुप्रयोग कर पाने में भी समर्थ न हो सकेगा। भाषावैज्ञानिक परंपरा और उसके विकास के मद्देनज़र ही उन्होंने हिंदी भाषा को देखने का सर्वथा एक नया दृष्टिकोण हमें दिया। इस प्रकार के उनके लेखन से यह स्पष्ट भान हो जाता है कि वे न तो भाषाविज्ञान की रूढ़ियों का अनुकरण करने के पक्ष में हैं और न ही हिंदी भाषा को संस्कृत से अपभ्रंष और फिर खड़ीबोली आंदोलन से जोड़ते हुए उन्हीं-उन्हीं बातों को फिर-फिर दुहराने के, जो ‘हिंदी भाषा संरचना’ अथवा ‘हिंदी भाषा का इतिहास’ के नाम से अनेकानेक बार छापी जा चुकी हैं।

भाषाविज्ञान को उन्होंने एक प्रगतिगामी शास्त्र के रूप में स्वीकारा और प्रतिपादित किया है। इसीलिए वे अपने भाषावैज्ञानिक लेखन में भाषा प्रयोग की दिशाओं का संकेत करते हैं जिसमें उनकी दृष्टि भाषा संरचना और भाषा व्यवहार के परस्पर संबंधों से भाषाविज्ञान के उस ढांचे पर टिकी हुई है जिसे वे भाषा प्रयोग की दिशाओं में देखते हैं। यह उनका वैशिष्ट्य है कि भाषा संरचना के वास्तविक प्रयोग की सरणियाँ उन्होंने इस तरह तैयार की हैं कि भाषाविज्ञान का वह आधुनिक स्वरूप हमें दिखाई दे सका है जो इसके पहले दिखाई नहीं दिया था। बहुभाषिकता तथा कोडमिश्रण/ परिवर्तन की प्रक्रिया में भाषावैज्ञानिक चिंतनधारा उन्हें रुची है जिसके परिणामस्वरूप उन्होंने भाषावैज्ञानिक इकाइयों के ध्वन्यात्मक से लेकर वाक्यात्मक अवमिश्रणों को विश्लेषित कर दिखाया है। कहना न होगा कि इस भाषावैज्ञानिक विचार विमर्श में वे हिंदी भाषा को साथ लेकर चलना नहीं भूले हैं। यह देखा गया है कि भाषाविज्ञान पर बात करते समय सिद्धांत हावी हो जाते हैं। लेकिन प्रो. सिंह ने सिद्धांतों को महत्व देते हुए भी भाषाविज्ञान की उस सामयिक पृष्ठभूमि को महत्व दिया है जिसके कारण परंपरागत भाषाविज्ञान की अवधारणाएँ अब चुकी हुई मालूम पड़ने लगी हैं। इस संदर्भ में भाषिक इकाइयों के मानकीकरण के हवाले से भी उन्होंने भाषाविज्ञान का एक नया पाठ रचा है। इस विचार के अंतर्गत ही उनका यह मानना है कि मानक रूप समाज में प्रचलित अन्य रूपों में से एक विकल्प मात्र होता है। मानक मान लेने भी से अवमानक अथवा अमानक संरचनाओं का महत्व कम नहीं हो जाता। अतः भाषावैज्ञानिक अध्ययन में अब इन्हें भी सही जगह देने की जरूरत है। इसी धरातल पर भाषानियोजन के प्रश्न को भी प्रो. सिंह ने इस तरह देखा है कि यहाँ व्याकरणिक शुद्धता (जिसे कि अभी भी भाषा नियोजन का प्रमुख मुद्दा माना जाता है) की जगह पर भाषा समुदाय और उसके लोगों की प्रतिक्रिया को प्रमुख माना गया है। इसका तात्पर्य यह है कि प्रो. सिंह उस आगे के भाषाविज्ञान के साथ हैं जो भाषा समुदाय और भाषा समूहों की मान्यताओं को जगह देता है। भाषा नियोजन में उनके चिंतन की धुरी फिशमैन रहे हैं इसीलिए फिशमैन के बहाने उन्होंने व्याकरण की समस्त इकाइयों, शब्द भेदों, ध्वन्यात्मक भेदों, वर्तनी संशोधन तथा पारिभाषिक शब्दावली निर्माण की बात उठाई है जो परंपरागत भाषाविज्ञान के आमने-सामने रखकर देखने से अलग तो लगती ही है, यह भी पता देती है कि अब भाषाविज्ञान को विवरणात्मक ही न रहने देकर उस विवरणात्मकता को समय और समाज सापेक्ष बनाना जरूरी होगा।

भाषा नियोजन में पहली बार प्रो. सिंह ने उन संभावित संविन्यासों की चर्चा की है जहाँ भाषा का व्याकरण केवल इकाइयों में बँटा नहीं होता, उसकी परख उपरूपों के संदर्भ में की जाती है। उपरूपों की चर्चा से भी आगे बढ़कर प्रो. सिंह सूक्ष्म भाषाविज्ञान और प्रोक्तिविज्ञान तक का सफर तय करते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि आधुनिक भाषाविज्ञान की उन अवधारणाओं को वे आज की किसी भी जीवंत भाषा के भाषावैज्ञानिक विश्लेषण में प्रतिफलित होते देखना चाहते हैं जो वास्तव में भाषा संरचना का इकाईगत विवरण न होकर इनकी प्रकार्यता (फंकक्षनलिटी) को उजागर कर सके। इस ओर भी संकेत कर देना जरूरी है कि अपने भाषावैज्ञानिक चिंतन में प्रो. सिंह ने हिंदी भाषा को अथवा कहें उसकी संरचनात्मक इकाइयों को ही सामग्री के रूप में इस्तेमाल किया है।

हिंदी भाषा की शक्ति को अथवा उसकी समृद्ध परंपरा को प्रकट करने की प्रो. सिंह की प्रणाली एकदम अलहदा है। वे शब्दों की बात करते हैं जिसमें शब्दविज्ञान की समस्त अवधारणाएँ आ मिली हैं तो वे केंद्र में रखते हैं डॉ. रघुवीर को। यह चर्चा वास्तव में डॉ. रघुवीर के बहाने हिंदी शब्दशास्त्र पर है। हिंदी व्याकरण पर भी उनका दृष्टिकोण कुछ ऐसा ही है। उन्होंने शुरू किया है हिंदी के व्याकरणों के परिचय से, और फिर इन व्याकरणों की कोटियाँ तैयार की हैं जो हिंदी के शैक्षिक व्याकरण पर पहुँच कर पूरी होती हैं। उनका यह विवेचन वास्तव में हिंदी का संक्षिप्त व्याकरणी भी है और इस ओर संकेत भी कि यदि आज हिंदी का कोई व्याकरण तैयार करना हो तो उसके अनिवार्य मुद्दे कौन कौन से होंगे। हिंदी के ढेरों व्याकरण हमें मिल जाते हैं लेकिन उसके भूत, वर्तमान और भविष्य को समेटते हुए इस तरह का आकलन मिलना मुश्किल है।

प्रो. सिंह ने देवनागरी लिपि पर भी लिखा है, दक्खिनी हिंदी पर भी और हिंदी की विभिन्न प्रयुक्तियों पर भी। हिंदी भाषा के संदर्भ में ये तीनों पक्ष कितने महत्वपूर्ण हैं यह कहने की आवश्यकता नहीं है। इनमें भी प्रो. सिंह ने अपनी उस दृष्टि को सुरक्षित रखा है कि यह केवल चर्चा भर न बने बल्कि इनके भीतर से कभी हिंदी भाषा की वैज्ञानिकता प्रकट हो, कभी उसकी क्षेत्रगत व्यापकता तो कभी आधुनिकता; और इन बातों को वे बार-बार रेखांकित भी करते चलते हैं ताकि हिंदी भाषा का वह सशक्त ढांचा नितांत भाषावैज्ञानिक दृष्टि से प्रस्तुत किया जा सके जो वास्तव में हिंदी भाषा की प्राणशक्ति है। हिंदी, उर्दू, प्रयोजनमूलक हिंदी, हिंदी की संवैधानिक स्थिति पर की गई उनकी टिप्पणियाँ आधुनिक भाषाविज्ञान की अवधारणाओं से पुष्ट हैं। ऐसा करने से विषय सिर्फ विचार बनकर नहीं रह जाते बल्कि इनके माध्यम से हिंदी का वह सामाजिक यथार्थ भी फूटफूटकर बाहर निकलता है जिसे निकाल कर प्रवाहित करना ही उनका लक्ष्य भी रहा है।

प्रयोजनमूलक भाषा एक लंबे अरसे से अकादमिक बहस का विषय रही है। अभी भी इसके बारे में सोच विचार की सही लीक नहीं बन पाई है। प्रो. सिंह ने प्रयोजनमूलक हिंदी पर विस्तीर्ण चर्चा की है। प्रयोजनमूलक भाषा, उस पर चर्चा के इतिहास और इससे संबंधित देश विदेश की चिंतनधारा को समेट कर उन्होंने उन सारी अनर्गल बहसों को विराम दिया है जो अभी तक घटाटोप की तरह छाई हुई थीं। हिंदी की प्रयोजनमूलक शैलियों पर उनका जो कार्य है वह अतुलनीय है अर्थात ऐसा करके वे कई कदम आगे बढ़ गए हैं। व्यावसायिक हिंदी, पत्रकारिता की हिंदी, साहित्य समीक्षा की हिंदी और यहाँ तक कि पाक विधि की हिंदी के स्वरूप और संरचनागत वैशिष्ट्य का जिस तरह उन्होंने आकलन और विश्लेषण किया है उसे निःसंकोच होकर हिंदी की प्रयोजनमूलक शैलियों के आगामी अध्ययनों के लिए पद्धतियों अथवा प्रविधियों का पुंज माना जा सकता है।

हिंदी भाषा पर बात करते समय जैसा कि उनके जैसे भाषाविद के लिए स्वाभाविक है, उन्होंने हिंदी के सर्वदेशीय और अंतरराष्ट्रीय संदर्भों की भी खोज खबर ली है। यहाँ भी वे आकलन मात्र से संतोष नहीं करते बल्कि उन्हें भाषिक यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में उजागर करते हैं और यह दिखाने का यत्न करते हैं कि हिंदी भाषा का व्याकरणिक, व्यावहारिक और साहित्यिक स्वरूप इतना सघन और फिर भी सहज है कि उसकी व्याप्ति में किसी अतिरिक्त प्रयास की आवश्यकता नहीं पड़ती। हिंदी भाषा प्रो. सिंह के लिए एक ऐसी भाषा है जो एक भाषा के रूप में ही नहीं, भारत की अस्मिता के रूप में पहचानी और स्वीकार की जाती है।

प्रो. दिलीप सिंह का भाषावैज्ञानिक संश्लिष्ट है। उसके भीतर भाषाविज्ञान की पूरी परंपरा पिरोई हुई है। वह भाषा को सिर्फ एक व्यवस्था मानने को तैयार नहीं है क्योंकि उसे लगता है कि इससे अधिक आवश्यक यह है कि भाषा को उसके प्रकार्य, उसकी संप्रेषणीयता, उसकी परिवर्तनशीलता, उसकी अभिव्यंजनात्मक बहुरूपता और उसकी सामाजिकता के संदर्भ में देखा जाए। इसीलिए वे भाषाविज्ञान की उन अवधारणाओं को फलीभूत करना चाहते हैं जिनसे भाषा अध्ययन का ही नहीं, भाषा अस्तित्व का भी पूरा का पूरा परिदृश्य बदल जाता है। प्रो. दिलीप सिंह का एक अवदान यह भी है कि उन्होंने भाषावैज्ञानिक लेखन की एक संप्रेषणीय परंपरा कायम की है। यह उनकी विचार प्रक्रिया की भी विशेषता है और उनके संपूर्ण लेखन की भी।
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- प्रो. ऋषभदेव शर्मा

[पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा], # 208 ए - सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद – 500013, ईमेल : rishabhadeosharma@yahoo.com

शनिवार, 17 अगस्त 2019

(भूमिका) खूँटी पर आकाश : ज्ञानचंद मर्मज्ञ का निबंध संग्रह


भूमिका

‘खूँटी पर आकाश’ ज्ञानचंद मर्मज्ञ के बाईस निबंधों का संग्रह है। वैसे तो ज्ञानचंद मर्मज्ञ की प्रसिद्धि मुख्यतः ओज के कवि और सरस गीतकार के रूप में है, लेकिन एक राष्ट्रीय और सामाजिक चेतना संपन्न पत्रकार तथा निबंधकार के रूप में भी उनकी उपलब्धियां रेखांकित करने योग्य हैं। धीर-गंभीर और सौम्य स्वभाव के धनी ज्ञानचंद मर्मज्ञ ने अपने निबंधों के माध्यम से उस जीवन दर्शन को सरल, सहज और रोचक ढंग से रूपायित किया है, जिसकी जड़ें भारतीय मनीषा में हैं। अपने इस सांस्कृतिक बोध को वे युगबोध के साथ जोड़कर प्रायः अत्यंत समयोचित और प्रासंगिक प्रश्नों पर सटीक टिप्पणी करते हैं। भारतीय चिंतन परंपरा से उन्होंने समन्वय और सामंजस्य की दीक्षा प्राप्त की है तथा ‘खूँटी पर आकाश’ टाँगने का उनका उपक्रम यथार्थ और स्वप्न के सामंजस्य का ही उपक्रम है।

इन निबंधों में अभिव्यक्त लेखक के जीवन दर्शन की केंद्रीय स्थापना यह है कि क्षणिक होने के बावजूद मनुष्य के अस्तित्व की सार्थकता उसकी अदम्य जिजीविषा और लोक कल्याण की चेष्टा में निहित है। इसी मूल विचार को अलग अलग समस्याओं के संदर्भ में ये निबंध पल्लवित-पुष्पित करते हैं। इसके लिए लेखक भारी-भरकम विचारात्मक गद्य की अपेक्षा काव्यात्मक अथवा ललित गद्य की बुनावट का सहारा लेता है। प्रायः सभी निबंध आरंभ से ही कथा के समान रोचकता, उत्सुकता और जिज्ञासा जगाते हैं। दृष्टांतों के माध्यम से भी लेखक आरंभ से ही पाठक को अपने साथ जोड़ने का सफल प्रयास करता है। दरअसल ज्ञानचंद मर्मज्ञ इन निबंधों को पढ़ने के लिए नहीं, कहने और सुनने के लिए लिखते हुए प्रतीत होते हैं। यही कारण है कि वे सदा अपने पाठक को सामने रखते हैं,उसे संबोधित करते हैं और अपने साथ जोड़ कर ले चलते हैं। इसके लिए वे कथा तत्वों का भी भली प्रकार समावेश करते हैं। यह अकारण नहीं है कि उनके ये निबंध काव्यात्मकता और कथात्मकता दोनों के सहारे, अथवा कहें कि काव्य और कथा के ताने-बाने के सहारे, बहुत कुशलता से अपनी अभिप्रेत वैचारिकता को प्रभावी अभिव्यक्ति दे पाते हैं।

यदि यह कहा जाए कि ज्ञानचंद मर्मज्ञ विचारों की मिट्टी को शैलीय उपकरणों के पानी में गूँथ कर ऐसे निबंधों की रचना करते हैं जिन्हें पढ़ते समय बीच बीच में कविता, कहानी और किस्सागोई का सा आनंद मिलता है, तो गलत न होगा। इसके लिए वे कभी शब्दों के साथ खिलवाड़ करते हैं, कभी शब्द और पदबंधों की आवृत्ति के द्वारा आकर्षण उत्पन्न करते हैं। कभी समानांतर क्रियाओं की झड़ी लगाते हैं, कभी सूक्तियाँ गठित करते हैं, कभी प्रतीकों, बिंबों, उपमानों और खासकर रूपकों के प्रयोग द्वारा कथन में चमत्कार जगाया करते हैं। अभिव्यक्ति पर लेखक का यह विचक्षण अधिकार ही इन निबंधों को सहज बोधगम्य और सुग्राह्य बनाता है। पाठक को पता ही नहीं चलता कि किस तरह कांतासम्मित उपदेश की तर्ज पर लेखक समाज, देश, लोकतंत्र, राजनीति, परिवार, भाषा, रिश्ते और दुनिया की तमाम तरह की चिंताओं के यथार्थ से उसका साक्षात्कार कराते हुए उसके मानस में सकारात्मकता और सक्रियता के बीजों को छींटता चला जाता है। इस तरह हर निबंध पढ़ने के साथ पाठक मानसिकता, चेतना और आनंदानुभूति जैसे सभी धरातलों पर अपने आप को संपन्नतर महसूस करता है।

साहित्य को लोकमंगल की साधना तथा मनुष्य को साहित्य का परम लक्ष्य मानने वाली विचारधारा के समर्थक ज्ञानचंद मर्मज्ञ अपनी लेखकीय जिम्मेदारी के प्रति बेहद सचेत और ईमानदार हैं। इसीलिए वे समसामयिक जीवन यथार्थ के हर उस पहलू को अनावृत करते हैं जहाँ कोई विडंबना या विसंगति है। सात्विक क्रोध और करुणा से संचालित निबंधकार ज्ञानचंद मर्मज्ञ का कवि-हृदय जिन स्थितियों और दृश्यों से विचलित होता है, उन्हें बदल कर आदर्श की स्थापना भी करना चाहता है। स्त्री-जीवन की त्रासदी, पुरुष प्रधान समाज में उसकी नियति, अपनी जमीन से कटते हुए आज के मनुष्य का दोगला चरित्र, प्रकृति और पर्यावरण को नष्ट करते हुए आदमी के भीतर बढ़ते हुए जंगलीपन, नैसर्गिकता का क्षरण, सब प्रकार की लालसा और विलासिता की बढ़ती हुई भूख, प्रकाश और अंधकार के भेद तक से भी अपरिचित लोगों पर समाज को तम से मुक्त करने की जिम्मेदारी आने से उत्पन्न संकट, कर्मशीलता और धैर्य के स्थान पर झपट कर प्रभुत्व हासिल करने की चालाकी, वर्ग,जाति, धर्म, वर्ण, नस्ल और भाषा के भेदों में लगातार बंटते जाते और खंडित होते मानव समाज की शोकांतिका, भारतीय संस्कृति के मूलभूत कुटुंब-मूल्यों के विघटन तथा इस सबके बीच विलुप्त होते जा रहे मनुष्यत्व को खोज लाने की बेचैनी ज्ञानचंद मर्मज्ञ के निबंधों में बार-बार झलकती है; और पाठक को सोचने के लिए मजबूर करती है कि आने वाली पीढ़ियों को यदि हम बेहतर कल सौंपना चाहते हैं तो हमें अपने आज को उदार मानवीय मूल्यों के सहारे परिष्कृत और परिमार्जित करना होगा। इस कार्य में साहित्यकारों की बड़ी भूमिका हो सकती है; लेकिन यदि साहित्यकार यश, अर्थ, उपाधि और पुरस्कार के पीछे ही दौड़ते रहें, तो उनसे ऐसी उम्मीद नहीं की जा सकती। इसलिए ज्ञानचंद मर्मज्ञ चाहते हैं कि साहित्यकार पहले अपने जीवन में औदात्य का समावेश करें और तब समाज को उच्च मनोभूमि की दिशा में प्रेरित करें ताकि उनका साहित्य पाठकों के मन के मर्म स्थलों को छू सके। स्वयं लेखक का भी प्रयास यही है और कहना न होगा कि इसमें उन्हें सफलता प्राप्त हुई है क्योंकि उनकी अपनी कथनी और करनी में कोई फर्क नहीं है।

कहने को बहुत बातें हैं, लेकिन उन्हें लोकार्पण के अवसर के लिए बचाकर रखता हूँ। फिलहाल ‘खूँटी पर आकाश’ के प्रकाशन के अवसर पर मैं लेखक को हार्दिक बधाइयाँ देता हूँ। मुझे पूरा विश्वास है कि यह कृति उनके यश को चतुर्दिक प्रसारित करने वाली सिद्ध होगी।

1 जनवरी, 2019                                                                         - ऋषभदेव शर्मा

शनिवार, 13 जुलाई 2019

(पुस्तक) हैदराबाद के हिंदी जगत का दस्तावेजी आकलन और संकलन

समीक्षित पुस्तक : कादंबिनी क्लब, हैदराबाद रजतोत्सव संस्मारिका/  
संपादक मंडल : डॉ. रमा द्विवेदी, मीना मुथा, अवधेश कुमार सिन्हा, डॉ. आशा मिश्र एवं प्रवीण प्रणव/
 प्रकाशक : कादंबिनी क्लब
, हैदराबाद/ संस्करण : 2019/ पृष्ठ : 140  

पुस्तक समीक्षा 

हैदराबाद के हिंदी जगत का दस्तावेजी आकलन और संकलन 

समीक्षक : ऋषभदेव शर्मा 

हैदराबाद की जलवायु साहित्य-सृजन के काफी अनुकूल है। तेलुगु, उर्दू और हिंदी तीनों की ही यहाँ अत्यंत पुष्ट साहित्यिक परंपरा रही है। स्मरणीय है कि इस शहर की स्थापना के समय से ही यहाँ दक्खिनी हिंदी के अनेक साहित्यकार हुए तथा स्वतंत्रता आंदोलन काल में महात्मा गांधी के एकादश व्रत के अनिवार्य अंग के रूप में हिंदी भाषा का व्यापक प्रचार-प्रसार हुआ। यह शहर एक प्रकार से दक्षिण का द्वार है और यहाँ उत्तर भारत तथा दक्षिण भारत दोनों की भाषिक संस्कृतियाँ मिलकर अपनी इंद्रधनुषी छटा बिखेरती हैं। इसकी छाया में पल्लवित-पुष्पित अनेक साहित्यिक संस्थाएँ वर्ष भर विभिन्न प्रकार की गतिविधियों में संलग्न रहती हैं। हिंदी भाषा और साहित्य की ऐसी ही चेतनाप्रवण गतिविधियों में लिप्त एक अग्रणी संस्था है कादंबिनी क्लब, हैदराबाद। इस संस्था की विधिवत स्थापना देश भर में कादंबिनी क्लबों की शृंखला की एक कड़ी के रूप में 2 जून, 1994 को इस योजना के सूत्रधार डॉ. राजेंद्र अवस्थी के नेतृत्व में हुई, जिसकी बागडोर क्लब संयोजक के रूप में डॉ.अहिल्या मिश्र को सौंपी गई। उनके मार्गदर्शन में इस संस्था ने अपनी सतत और अटूट यात्रा के पच्चीस वर्ष अभी 2019 में संपन्न किए हैं। इस अवसर पर अत्यंत गरिमापूर्ण द्विदिवसीय रजतोत्सव मनाया गया। इसके अंतर्गत समसामयिक एवं प्रासंगिक विषयों पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई, जिसमें कादंबिनी क्लब, हैदराबाद की उपलब्धियों का तटस्थ आकलन करने के अलावा आगे की यात्रा की दिशा पर भी गंभीर विचार-विमर्श हुआ। 

इस उत्सव को अविस्मरणीय बनाने के लिए रजतोत्सव संस्मारिका भी प्रकाशित की गई जिसमें एक ओर तो हैदराबाद के हिंदी जगत की उपलब्धियों का इतिवृत्त प्रस्तुत किया गया है तथा दूसरी तरफ विभिन्न विधाओं को समुन्नत करने वाले दिवंगत और वर्तमान साहित्यकारों की प्रतिनिधि रचनाओं की बानगी भी प्रस्तुत की गई है। साथ में कादंबिनी क्लब, हैदराबाद की गतिविधियों का लेखा-जोखा तो है ही। 

इस संस्मारिका को दस्तावेजी महत्व प्रदान करने में डॉ.अहिल्या मिश्र द्वारा प्रस्तुत ‘अथ हैदराबाद हिंदी कथा’ की केंद्रीय भूमिका है। यह कथा अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त हास्य-व्यंग्य कवि वेणुगोपाल भट्टड की स्मृतियों पर आधारित है। वे ही इस कथा के वाचक हैं, जिसे मीना मुथा के सहयोग से लिपिबद्ध किया गया है। एक तरह से यह हैदराबाद की हिंदी गतिविधियों का वाचिक इतिहास है, जिसे लिखित रूप में पहली बार यहाँ सँजोया गया है। हैदराबाद में हिंदी साहित्य के लेखन एवं प्रकाशन के साथ विशेष रूप से कविता के उन्नायक हिंदी साहित्यकारों की जानकारी देने वाली इस कथा से यह महत्वपूर्ण सूचना भी मिलती है कि हिंदी की गतिविधियों को निज़ाम शासन के दौरान हतोत्साहित ही नहीं, प्रतिबंधित तक किया गया था; क्योंकि उसकी दृष्टि में हैदराबाद के लिए हिंदी विदेशी भाषा थी। ऐसे में 1931 में अर्जुन प्रसाद मिश्र कंटक ने ‘भाग्योदय’ मासिक निकाला। कंटक जी इस क्षेत्र के ‘अच्छी हिंदी जानने वाले प्रथम व्यक्ति’ और स्वयं कवि थे। आगे चलकर 1939 में ‘आर्यसंदेश’ का प्रकाशन आरंभ हुआ तथा 1945 में यहाँ हिंदी साहित्य सम्मेलन का अधिवेशन बुलाया गया था। इसी प्रकार की अनेक महत्वपूर्ण सूचनाएँ इस हिंदी कथा को संग्रहणीय बनाती हैं। आशा है, इस क्षेत्र के हिंदी आंदोलन और साहित्य सृजन पर शोध करने वाले विद्वान इस सामग्री का अवश्य ही लाभ उठाएँगे।

साथ ही 1994 से 2019 तक की कादंबिनी क्लब, हैदराबाद की यात्रा कथा को भी संस्था के मासिक रिकॉर्ड के आधार पर मीना मुथा ने लेखबद्ध किया है। इस अवधि में विविध कार्यक्रमों के अंतर्गत समय-समय पर जिन अनेक पुस्तकों का लोकार्पण किया गया उनके विवरण के अवलोकन से किसी भी पाठक को इस संस्था के विस्तार और गहराई का सहज बोध हो सकता है। 

इस तमाम ऐतिहासिक पीठिका के बाद एक खंड में कहानियों और लेखों को रखा गया है जिनमें अतिथि साहित्यकार मृदुला सिन्हा के अलावा बीस महत्वपूर्ण स्थानीय लेखक-लेखिकाओं की गद्य रचनाएँ शामिल हैं। एक अन्य खंड में वर्तमान काल में सृजनरत हैदराबाद के हिंदी कवियों की प्रतिनिधि कविताएँ सँजोयी गई हैं, जिनसे इस नगर की संवेदनशीलता और भावप्रवणता का जीवंत साक्ष्य प्राप्त होता है। 

इन दोनों खंडों के बीच में एक छोटा सा खंड हैदराबाद के दिवंगत कवियों की रचनाओं का भी है। ये रचनाएँ सचमुच धरोहर हैं और इनकी उपस्थिति इस संस्मारिका को सहेजकर रखने का सर्वाधिक महत्वपूर्ण आधार है। इन धरोहर रचनाकारों में डॉ. प्रतिभा गर्ग, डॉ. इंदु वशिष्ठ, शशिनारायण स्वाधीन, वीर प्रकाश लाहोटी सावन, दिवाकर पांडेय, हरनाम सिंह प्रवासी, डॉ.रोहिताश्व, दुर्गादत्त पांडेय, गायत्री शरण शर्मा, विजय विशाल, तेजराज जैन, पुरुषोत्तम प्रशांत, विश्वेश्वरराज अस्थाना, डॉ.हरिश्चंद्र विद्यार्थी, शिवकुमार गुप्ता, विभा वर्मा, डॉ.संतोष गुप्ता, हरिश्चचंद्र गुप्ता, गौतम दीवाना, डॉ.वेणुगोपाल और चंद्रमौलेश्वर प्रसाद सम्मिलित हैं। 

इस संग्रहणीय संस्मारिका के प्रकाशन हेतु संपादक मंडल तथा कादंबिनी क्लब, हैदराबाद निश्चय ही अभिनंदनीय है। ... और हाँ, दृष्टि को बाँध लेने वाले इंद्रधनुषी आवरण चित्र के लिए कवि चित्रकार नरेंद्र राय की तूलिका प्रणम्य है! 

समीक्षक : ऋषभदेव शर्मा 
मो. 8074742572

दक्षिण के अग्रणी हिंदी साहित्यकार प्रो. आदेश्वर राव और उनकी कविता


आचार्य पी.आदेश्वर राव (ज. 20 दिसंबर, 1936) दक्षिण भारत में हिंदी के उन आचार्यों में अग्रणी हैं जिन्होंने अपनी मौलिक साहित्य सर्जना के बल पर देश भर में प्रभूत यश अर्जित किया है। वे ‘गुरूणाम् गुरु’ हैं। हिंदी भाषा और साहित्य उनकी रग-रग में रमे हैं। उन्होंने काशी हिंदू विश्वविद्यालय में भाषा, साहित्य और हिंदी की भाषिक संस्कृति का लंबे समय तक अध्ययन करके उसे इस तरह आत्मसात कर लिया कि दक्षिण में अपने शिष्यों की कई-कई पीढ़ियों के लिए वे स्वयं हिंदी संस्कृति के पर्याय बन गए हैं। 

ॐ आदेश्वराय नमः 
(आचार्य पी.आदेश्वर राव जी का अभिनंदन ग्रंथ)
संपादक : आचार्य यार्लगड्डा लक्ष्मीप्रसाद
प्रकाशक : माया प्रकशन, कानपुर
                     
पुरुगुल्ला आदेश्वर राव ने दक्षिण भारत में हिंदी की सृजनात्मक परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने मौलिक लेखन भी किया, अनुवाद भी किया; और खूब किया। ‘अंतराल’, ‘धार के आर-पार’, ‘वातायन ये प्रेम सौध के’ – उनके तीन मौलिक काव्य संकलन हैं। उन्होंने अनेक कविताओं का अनुवाद तेलुगु से हिंदी में करके हिंदी और तेलुगु के बीच साहित्य-सेतु का निर्माण किया। इस दृष्टि से तेलुगु उपन्यास ‘पंडित परमेश्वर शास्त्री की वसीयत’ और ‘मोहभंग’ के अनुवाद भी उल्लेखनीय हैं। इसके अलावा उन्होंने समीक्षा के क्षेत्र में भी अनेक कृतियों की रचना की। उनके द्वारा संपादित ग्रंथ ‘हिंदी साहित्य के विकास में दक्षिण का योगदान’ बार-बार संदर्भित ग्रंथ है। दक्षिण भारत के हिंदी साहित्य को समझने के लिए वह एक अनिवार्य संदर्भ सामग्री है। एक भाषाशास्त्री के रूप में भी उन्होंने हिंदी तथा द्रविड भाषाओं के समानरूपी भिन्नार्थी शब्दों पर जो अपना अध्ययन प्रस्तुत किया है, वह भी अपना सानी नहीं रखता। 

ऐसे आचार्य पी.आदेश्वर राव के नाम और काम से तो मैं दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में आने से बहुत पहले ही परिचित हो चुका था। लेकिन उनके दर्शन का सौभाग्य मुझे 1990 में चेन्नै आने पर प्रो. के. रामा नायुडु के सौजन्य से ही प्राप्त हुआ। प्रथम साक्षात्कार से ही उनकी जो छवि मेरे मन में बनी, वह आज भी ज्यों की त्यों है। इस छवि की सबसे पहली विशेषता है इसका उदात्त खुलापन। मैं प्रो. पी. आदेश्वर राव को एक ऐसे उदात्त चित्त व्यक्ति के रूप में जानता हूँ जिसके ठहाके अपने मन को भी निर्मल करते हैं और दूसरों को भी निष्कलुष बनाने की शक्ति रखते हैं। पहली ही मुलाक़ात से मेरी समझ में यह आ गया कि आदरणीय आदेश्वर राव जी साहित्यिक किस्सों और संस्मरणों की जीवित खान हैं। और जब वे कोई किस्सा सुनाते, किसी संस्मरण का डूबकर विवरण देते तो उनके शब्दों में भाषा का ऐसा अविरल प्रवाह फूट पड़ता कि लगता शायद इसे ही वर्ड्सवर्थ ने वह सुंदर कविता कहा है जो अत्यंत भावावेग के साथ कवि के मानस से अपनी प्रबलता के कारण अनायास ही फूट पड़ती है। कथन की यह शैली और भाषा का यह प्रवाह जो प्रो. पी. आदेश्वर राव के व्यक्तित्व का ऐसा हिस्सा है जो किसी को भी विस्मित कर सकता है। 

उसके बाद जाने कितनी बार ‘गुरु जी’ से मिलने का अवसर मिला। हाँ, मैं उन्हें आरंभ से ही ‘गुरु जी’ कहता रहा हूँ। बैठते ही कुछ ही देर में वे अतीत में खो जाते हैं। आप चाहें तो उन्हें अतीतप्रेमी और नॉस्टेल्जिक भी कह सकते हैं। शायद इसीलिए छायावाद उनका अत्यंत प्रिय काव्यक्षेत्र है। वे प्रो. के. रामा नायुडु, प्रो. चंद्रभान रावत, प्रो. रवींद्र कुमार जैन, प्रो. एस. टी. नरसिंहाचारी, कथाकार रमेश चौधरी आरिगपूडि और कवि आलूरि बैरागी चौधरी के जाने कितने संस्मरण धाराप्रवाह सुनाते चले जाते थे। सबसे अधिक प्रिय उन्हें आलूरि बैरागी के संस्मरणों में रहना है। एक बार यदि वे बैरागी की यादों में चले गए तो वहाँ से उन्हें वापस लाना आसान नहीं है। दिन बीत जाए, रात बीत जाए, लेकिन मजाल है कि आदेश्वर राव आलूरि के काव्यकुंज से बाहर आना चाहें। उन्होंने बैरागी के बारे में इतनी बार, इतनी घटनाएँ और इतनी काव्यपंक्तियाँ सुनाई हैं कि मेरे मन में कवि बैरागी का एक जीवित चित्र बन गया है। यह चित्र एक ऐसे फक्कड़ रचनाकार का है, जो अपने लेखकीय अहं में निराला से तुलनीय है। प्रो. राव ने अनेक शोधार्थियों को बैरागी पर शोध करने के लिए प्रेरित किया है। उनकी रचनाओं का संपादन और अनुवाद भी किया है। एक बार उन्होंने बताया कि उन्होंने विदेश में कभी अटल बिहारी वाजपेयी से मुलाक़ात होने पर उन्हें घंटों बैरागी की रचनाएँ और अनुवाद सुनाए थे। आदेश्वर राव जी की स्मरण शक्ति से किसी को भी ईर्ष्या होनी चाहिए। उन्हें ‘कामायनी’, ‘आँसू’, ‘कुरुक्षेत्र’ और ‘उर्वशी’ शायद अक्षरशः याद हैं। प्रसाद के नाटकों के लंबे-लंबे संवाद भी उनकी जिह्वा पर नाचते रहते हैं। 

एक लेखक और रचनाकार के रूप में, आदेश्वर राव द्वंद्व में रहने वाले रचनाकार हैं। द्वंद्व अतीत प्रेम और यथार्थ बोध का। द्वंद्व छायावादी संस्कार और प्रगतिशील चेतना का। द्वंद्व तेलुगु और संस्कृत की काव्य परंपरा तथा अंग्रेजी और हिंदी की काव्य परंपरा का। इस द्वंद्व के ही कारण एक आलोचक के रूप में जहाँ पी.आदेश्वर राव लगातार मार्क्सवादी चिंतक के रूप में अपनी पहचान बनाते हैं, वहीं दूसरी ओर सृजनात्मक लेखन अर्थात काव्य में उनका मन छायावादी काव्यभाषा तक आकर ठहर गया है। वे चाहे बम्मेरा पोतना के ‘भागवत नवनीत’ का अनुवाद करें या अजंता की नई कविता का अनुवाद करें, भाषिक संस्कार उनका वही तत्सम प्रधान छायावादी रुझान वाला रहता है। यदि यह कहा जाए कि स्वातंत्र्योत्तर हिंदी कविता और काव्यानुवाद के क्षेत्र में छायावादी काव्य संस्कार को जीवित रखने वाले कवियों और अनुवादकों में प्रो. पी.आदेश्वर राव का स्थान अग्रणी है, तो इसमें कोई अत्युक्ति नहीं होगी। 

1986 में प्रो. राव का कविता संग्रह ‘धार के आर-पार’(पराग प्रकाशन, शाहदरा, दिल्ली-32/ 1986/ 104 पृष्ठ/ 35 रुपये) प्रकाशित हुआ जो उनकी अत्यंत समादृत और चर्चित कृति के रूप में मान्य है। ‘धार के आर-पार’ में उन्होंने अपनी काव्यधारा के दो तटों की चर्चा की है। एक तट प्रेम और सौंदर्यबोध का है, तो दूसरा तट समाज और लोकबोध का। इन दो तटों के द्वंद्व में ही आदेश्वर राव की काव्यप्रतिभा प्रवाहित होती है। फिर भी यदि यह कहा जाए कि प्रेम और सौंदर्य ही उनकी काव्यप्रतिभा के नैसर्गिक क्षेत्र हैं, तो ज्यादती नहीं होगी। इसमें कोई दो राय नहीं कि समाज और लोक चेतना का तट उन्हें खूब भाया है, लेकिन उस तट पर वे उतना रमते नहीं। प्रेम और सौंदर्य के बोध वाला तट उन्हें बार-बार अपनी ओर खींचता रहता है। वहीं उनका मन सहज विश्राम का अनुभव करता है। इस तट पर कवि की कल्पना-सुंदरी है, प्रेमिका है। लेकिन छायावादी संस्कार के अनुरूप यह सुंदरी, यह प्रेमिका आलोकमयी अधिक है। सदेह होते हुए भी विदेह सी प्रतीत होती है। कवि प्रेयसी के सौंदर्य को जिन परंपरित उपमानों की सहायता से उकेरने की कोशिश करता है, वे क्रमशः सूक्ष्म और उदात्त होते जाते हैं तथा प्रेमिका का चित्र उभरते-उभरते परमतत्व का चित्र बन जाता है। आदेश्वर राव की इस काव्य नायिका के नयन नव नीलोत्पल सरीखे हैं, केश अलिदल की तरह चंचल हैं, चरण शतदल जैसे रक्तिम हैं और कुल मिलाकर उसका रूप मधुर मनोहर है। इससे अधिक मांसलता तो ‘मधुराष्टकम्’ के कृष्ण के चित्र में है। अभिप्राय यह कि आदेश्वर राव का सौंदर्यबोध उज्ज्वल, उदात और सूक्ष्म अप्रस्तुत विधानों से अभिव्यंजित होता है। वे प्रेयसी को पुरुष के नेत्रों से नहीं देखते, कवि के नेत्रों से देखते हैं। कवि के ये भाव-नयन जिस प्रेयसी को तन्मय होकर देख रहे हैं, उसका रूप विमल है और कवि के हृदय में उसने एक स्थायी आग्रह का स्थान बना लिया है- ‘पा चुका हृदय में अमर टेक।‘ अपनी इस अपरूप सुंदरी, काव्य-प्रेरणा रूपी प्रेयसी को पाने की चाह को ‘धार के आर-पार’ में कवि ने बार-बार अलग-अलग प्रकार से व्यंजित किया है। कवि की चाह है कि वह प्रेयसी की कुटिल अलकों में उलझ जाए। वह अपनी प्रेयसी को सारी प्रकृति में दीप्त देखता है। उषा की लालिमा में उसे अपनी प्रिया के दर्शन होते हैं; और यदि कहीं यह प्रेयसी तनिक मंद-मंद मुसका दे, तो कवि अपने अस्तित्व को ही भूल जाता है। प्रेम की आत्म-विस्मरण जैसी यह दशा तब और भी उदात्त भूमि का स्पर्श करती है, क्षितिज का स्पर्श करती है, जब इंद्रधनुष नील घन मंडल से सुशोभित होता है। कहने की आवश्यकता नहीं कि यहाँ नील घन मंडल स्वयं कवि का व्यंजक है और इंद्रधनुष प्रेमिका का। यह प्रेमी कवि अंधेरे में सोती सजनी को देखते हुए गीत रचने भर की पावन चाह रखता है। जिस प्रेमिका के सौंदर्य और अपरूप स्वरूप को लेकर इतनी इच्छाएँ और आकांक्षाएँ प्रेमी कवि ने पाल रखी हैं, वह कौन है? इस रहस्य पर से पर्दा कभी उठता ही नहीं। उठ भी नहीं सकता, क्योंकि कवि जिससे प्रेम कर रहा है वह उससे परिचित नहीं है। मिलने की इच्छा है, पर जान-पहचान तो हुई ही नहीं। बस एक अद्भुत सौंदर्य है, जिस पर कवि रीझता है और विस्मित होता है। मिलन भी होता है, लेकिन स्वप्न में; और तब भी यह पता नहीं चलता कि वह है कौन! विस्मित होकर कवि पूछ बैठता है – ‘तुम स्वप्न की अमराइयों में मुझे इस तरह अपने अंक में क्यों बाँध लेती हो? भला तुम स्वर्ग के मधुनंदनों में मुझे अपना प्रेम रूपी अधर मधु क्यों पिलाती हो? इस तरह अपनी लज्जा का अतिक्रमण करके मुझसे प्रेम करने वाली तुम कौन हो? अपना नाम तो बताओ।‘ लेकिन कवि की यह स्वप्नसुंदरी प्रेयसी सपनों के बाहर नहीं आती। वहीं मिलती है, आलिंगन में भरती है, चुंबन और परिरंभण करती है; और पहचान में आने से पहले ही रहस्य के पर्दे के पीछे चली जाती है। 

छायावादी भावबोध के ही विस्तार के रूप में मानव सौंदर्य से आगे बढ़कर प्रकृति सौंदर्य की चर्चा भी की जा सकती है। बादल, समुद्र और साँझ के जो मनोरम चित्र कवि आदेश्वर राव ने ‘धार के आर-पार’ की कई रचनाओं में खींचे हैं, वे छायावाद के समय के और बाद के भी कई रचनाकारों की याद दिलाते हैं। कहना न होगा कि इन दृश्यों को शब्दबद्ध करते समय कवि भारतीय प्रकृति-काव्य की संपूर्ण परंपरा से अनुप्राणित प्रतीत होते हैं। इसीलिए उन्होंने बादलों, समुद्रों और संध्या तीनों ही का जीवित मानवीकृत रूप वर्णित किया है। प्रकृति और मनुष्य के बीच बिंब-प्रतिबिंब भाव को भी इन रचनाओं में व्यंजित होते देखा जा सकता है। साथ ही प्रकृति में निरंतर प्रवाहित होने वाली ऊर्जा की प्रेरणा को भी कवि ने शब्दबद्ध किया है। 

कवि आदेश्वर राव ने महान कवियों और लोकनायकों के उज्ज्वल चरित्र को उजागर करने वाली कविताओं की भी पूरी शृंखला की रचना की है। इनमें एक ओर सूर, तुलसी, जयशंकर प्रसाद, महाप्राण निराला, सुमित्रानंदन पंत और हरिवंशराय बच्चन सरीखे अनुपम शब्दशिल्पी शामिल हैं, तो दूसरी ओर लालबहादुर शास्त्री और लोकनायक जयप्रकाश नारायण से लेकर चौधरी चरणसिंह, नंदमूरि तारक रामाराव और संजय गांधी तक भारतीय राजनीति के विविध चेहरे भी विद्यमान हैं। कहना न होगा की इन सभी व्यक्तित्वों ने सतत संघर्ष द्वारा अपने-अपने क्षेत्र में सुनिश्चित उत्कर्ष प्राप्त किया। संभवतः इस संघर्ष-तत्व ने ही कवि को इन चरित्रों को अपना काव्य-नायक बनाने की प्रेरणा दी। 

अंततः, कवि आदेश्वर राव राजनीति और सामाजिक विसंगतियों पर केंद्रित अपनी कविताओं में अपने समकालीन रचनाकारों से किसी भी प्रकार पीछे नहीं हैं –भले ही वह उनका प्रकृत क्षेत्र नहीं है। उदाहरण के रूप में, लोकतंत्र के मूल्यों के क्षरण और सारे के सारे राजनैतिक परिवेश के प्रदूषण के यथार्थ को व्यक्त करने वाली डॉ. पी.आदेश्वर राव की इन काव्य-पंक्तियों को उद्धृत करते हुए मैं अपने इस कथन को विराम देना चाहूँगा – 

चुनाव के उस समरांगण में 
विज्ञापन के रंग ढंगसे 
प्रलोभनों के जाल बिछाकर 
मतदाताओं को उलझाकर 
नोटों से वोटों को भरकर 
सत्ता को हाथों में लेकर 
लागत को सौ बार बढ़ाकर 
लोकतंत्र व्यापार बन गया। 000 

- डॉ. ऋषभदेव शर्मा 
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, 
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा। 
आवास`: 208-ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर, रामंतापुर,
 हैदराबाद- 500013 (तेलंगाना)। 
मो. 8074742572. ईमेल rishabhadeosharma@yahoo.com

(पुस्तक) प्राचीन भारत में खेल-कूद : स्वरूप एवं महत्व

पुस्तक - प्राचीन भारत में खेल-कूद (स्वरूप और महत्व)/
लेखक- अवधेश कुमार सिन्हा   +919849072673/
प्रकाशक - मिलिंद प्रकाशन, हैदराबाद/
संस्करण - प्रथम, 2018, पेपरबैक/ पृष्ठ - 158/ मूल्य - ₹ 250.


पुस्तक चर्चा 
प्राचीन भारत में खेल-कूद : स्वरूप एवं महत्व
समीक्षक- ऋषभदेव शर्मा 

बहुज्ञ, बहुपठ, बहुश्रुत और निरंतर अध्यवसायपूर्वक शोधदृष्टि से काम करनेवाले अवधेश कुमार सिन्हा (9 सितंबर, 1950) की पुस्तक “प्राचीन भारत में खेल-कूद (स्वरूप एवं महत्व)” (2018, हैदराबाद : मिलिंद) भारतीय इतिहास के एक नितांत अचर्चित पहलू का उद्घाटन करने वाली शोधपूर्ण मौलिक रचना है। 

इस ग्रंथ में लेखक ने साहित्यिक और साहित्येतर विविध भौतिक साक्ष्यों के आधार पर प्राचीन राज-समाज और जन-समाज के मनोरंजन से लेकर आजीविका तक से जुड़े खेलों के इतिहास की विकासरेखा प्रस्तुत की है, जो बड़ी सीमा तक भारतीय सभ्यता के इतिहास की भी विकासरेखा होने के कारण और भी रोचक, उपादेय और ज्ञानवर्धक बन गई है। हवाले भले ही राजाओं के हों, खेल तो आम जन के भी थे न! शतरंज हो या जलक्रीड़ा, या फिर मृगया, प्राचीन भारतीय समाज ने इन्हें विधिवत नियमित खेलों का रूप दिया, इसमें कोई संदेह नहीं। खेलों का यह इतिहास हमारे प्राचीन साहित्य में बिखरा पड़ा है। लेखक ने इसे सहेज कर कालक्रम के अनुसार विवेचित किया है, जो शायद हिन्दी में अपनी तरह का पहला कार्य है! 

बिखरे साक्ष्यों के आधार पर इतिहास की रूपरेखा रचते समय यह एक स्वाभाविक चुनौती सामने आती है कि साहित्य में उपलब्ध उल्लेखों को उनके काल के संदर्भ में प्रमाणित कैसे किया जाए। यह ठीक है कि हमारे प्राचीन साहित्य में बहुत सारा इतिहास गुंथा हुआ है, लेकिन समस्या यह है कि, हमारा यह इतिहास लिखा कब गया? इसका सटीक और निर्भ्रांत उत्तर ही किसी घटना के काल-निर्धारण का आधार बन सकता है। उदाहरण के लिए, महाभारत में जिन खेलों का उल्लेख मिलता है, उन्हें इस महाकाव्य के लेखन काल का माना जाए अथवा उस युग का जब महाभारत की घटनाएँ वास्तव में घटित हुई होंगी। (आज उपलब्ध पाठ मूल घटना के बहुत बाद का है!) काल निर्धारण की इस समस्या का निराकरण अवधेश कुमार सिन्हा ने साहित्येतर सामग्री के आधार पर किया है। अतः यह कहा जा सकता है कि उनका यह ग्रंथ दोहरी प्रामाणिकता से युक्त और विश्वसनीय है। अन्यथा इसमें दो राय नहीं कि ज्ञात इतिहास से पहले का एक बड़ा अँधेरा इलाका है जिसमें गोता लगाने के लिए अवधेश कुमार सिन्हा उतरे। उस अँधेरे इलाके में जाकर वे ‘प्राचीन भारत में खेल-कूद : स्वरूप एवं महत्व’के रूप में कुछ ‘तेजस्क्रिय मणिदीप’ खोज कर लाए हैं जिनसे भारतीय सभ्यता के विकास का रहस्यलोक कुछ तो आलोकित अवश्य ही हुआ है। 

यहाँ यह सवाल उठना भी वाजिब है कि, आज अर्थात इक्कीसवीं शताब्दी में इस किताब की जरुरत क्या है ? इसका सीधा साजवाब है कि यह जो खेल-कूद नाम की चीज है, यह मुझे मेरी संस्कृति के करीब ले जाती है। यह मुझे मेरी जड़ों से जोड़ने का काम करती है। यह मुझे बताती है कि मेरी जड़ें कितनी पुरानी हैं। इसके अलावा, यह पुस्तक केवल प्राचीन भारत में खेल-कूद के इतिहास तक ही सीमित नहीं है, बल्कि प्रसंगवश प्राचीन भारत के साथ ही उसके समकालीन विश्व में खेल-कूद की दशा-दिशा से भी परिचित कराती है। लेखक ने अत्यंत परिश्रमपूर्वक प्राचीन साहित्य और उसके समानांतर प्राप्त ऐतिहासिक साक्ष्यों का अवगाहन करके भारत और शेष विश्व के सभ्यता-विकास का एक तुलनात्मक खाका पेश किया है। 

यदि यह कहा जाए कि इस ग्रंथ ने आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के ‘‘प्राचीन भारत के कलात्मक विनोद’’ (1963) की परंपरा को आगे बढ़ाया है, तो अतिशयोक्ति न होगी। चौदह विद्याओं और चौसठ कलाओं की चर्चा यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि प्राचीन भारतीय लोक उत्सवप्रिय और क्रीड़ाजीवी था। साहित्य से लेकर मूर्तियों, शिलालेखों तथा अन्य भौतिक प्रमाण यह सिद्ध करते हैं कि द्यूत और रथ-दौड़ से लेकर जलयुद्ध और दृष्टियुद्ध तक में राजन्यवर्ग से लेकर सामान्यवर्ग तक की व्यापक भागीदारी थी। मनोरंजन, आजीविका और उत्तरजीवन की चुनौतियों के बीच आदिम काल से जिस प्रकार के वीरतापूर्ण और मस्तीभरे मनोविनोद का विकास विश्व की अलग अलग सभ्यताओं ने किया, उसके विश्लेषण द्वारा मनुष्यता के विकास की रूपरेखा बनाई जा सकती है। ज्ञानक्षेत्र के इस विस्तार की दृष्टि से अवधेश कुमार सिन्हा का यह ग्रंथ अत्यंत उपादेय, मननीय और संग्रहणीय है। 

इस ग्रंथ के बारे में ठोकबजा कर यह कहा जा सकता है कि यह ग्रन्थ पूरी तरह तथ्यों पर आधारित है और लेखक ने प्रमाणिकता का सर्वत्र ध्यान रखा है। वह कहीं भी भावुकता में बहकने के लिए तैयार नहीं है और किसी भी शोध कार्य से, वह भी इतिहास के शोध कार्य से, ऐसी हीअपेक्षा की जाती है। इस विषय में बहकने की काफी गुंजाइश थी चूँकि आधार के रूप में साहित्य का इस्तेमाल किया गया है जिसकी अनेकविध व्याख्या संभव है। लेकिन यहाँ लेखक के सामने अपना लक्ष्य स्पष्ट है अतः वे बिना बहके और भटके, खेलकूद के बहाने, बार बार भारतवर्ष की सांस्कृतिक परंपरा, जीवनदर्शन की चिंताधारा और सभ्यता की विकास-सरणि को रेखांकित करते चलते हैं। अभिप्राय यह कि यह पुस्तक खेलकूद के पाठक के लिए नहीं है, बल्कि संस्कृति, इतिहास और सभ्यता का विकास समझने के लिए एक संदर्भ ग्रंथ है। इसमें तथ्यात्मकता और प्रमाणिकता है। और एक बड़ी चीज जो किसी भी वैज्ञानिक लेखन में होनी चाहिए वह है क्रमिकता। यहाँ चीजें क्रमशः आगे बढती हैं। लेखक अपने पाठक को विधिवत एक एक सोपान आगे ले जाते हुए सिंधु सभ्यता से वैदिक काल, सूत्र काल, मौर्य काल, गुप्त काल तक ले आता है। इस ज्ञानयात्रा को और भी समृद्ध बनाते हैं, दो परिशिष्ट – प्राचीन भारत के परवर्ती काल में खेल-कूद का स्वरूप तथा अन्य समकालीन सभ्यताओं/देशों में खेलों का स्वरूप। परंपरा के विकास और समकालीन विश्व से जुड़े संदर्भ इस ग्रंथ को अतिरिक्त महत्वपूर्ण बनाते हैं। 

अंतत:, भाषा और शैली की दृष्टि से अत्यंत ही सहज और प्रांजल हिंदी में लिखा हुआ यह ग्रंथ इतिहास के अध्येताओं से लेकर सामान्य जिज्ञासु पाठकों तक के लिए पठनीय है। कई जगह तो ऐसा लगता है कि जैसी औपचारिक हिंदी अवधेश जी प्रायः ‘बोलते’ हैं, उसकी तुलना में उनके ‘लेखन की भाषा’ अधिक लचीली और ललकभरी है, जो पाठक को बाँध लेती है। अतः इसे पढने के लिए शोधार्थी होना बिल्कुल ज़रूरी नहीं, शोध-दृष्टि हो यह जरूरी है। 000

गुरुवार, 11 जुलाई 2019

(भूमिका) "अनामिका : समकालीन स्त्री विमर्श" - चंदन कुमारी

अनामिका: समकालीन स्त्री विमर्श/
डॉ. चंदन कुमारी/2019/
 विद्या प्रकाशन, कानपुर/
176 पृष्ठ, सजिल्द/ 500 रुपये 



अभिमत 

डॉ. चंदन कुमारी की इस समीक्षा-कृति “अनामिका: समकालीन स्त्री विमर्श” की पांडुलिपि का पारायण करते समय बार-बार मुझे एक ओर चंदन कुमारी का जिज्ञासा और उत्सुकता से दीप्त चेहरा याद आता रहा और दूसरी ओर वैदुष्य तथा सृजनात्मकता से परिपूर्ण अनामिका की साहित्यकार छवि मानस-गोचर होती रही। ऐसा लगा कि चंदन ने अनामिका को और उनके साहित्यकार को बखूबी समझा ही नहीं है, प्रत्युत अपने आप में चरितार्थ भी किया है। इस विद्वत्तापूर्ण और सब प्रकार से प्रासंगिक पुस्तक के प्रकाशन पर मैं उन्हें हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ। 

मानव सभ्यता का इतिहास इस विडंबनापूर्ण सत्य का साक्षी है कि दुनिया भर के समाजों में स्त्री को केवल इसलिए बंधक जीवन जीना पड़ता रहा है कि उसने स्त्री के रूप में जन्म लिया है। प्रकृति ने भले ही स्त्री और पुरुष को बराबर बनाया हो, समाज ने उन्हें मालिक और गुलाम के रिश्ते में ढाल कर स्त्री के विरुद्ध भीषण षडयंत्र ही नहीं, घोर अपराध किया है। इसका परिणाम यह हुआ है कि अपने योगदान द्वारा जीवन और समाज के केंद्र में रहने की अधिकारी होने के बावजूद स्त्री को सदा मुखपृष्ठ से अनुपस्थित और अपदस्थ रखा गया। शायद सभ्यता के आरंभिक युगों में उसे बराबरी या उससे भी अधिक का सम्मान मिला हो, लेकिन कालांतर में उसे भोग्य वस्तु, पण्य पदार्थ और संतान जनने के यंत्र में तब्दील करके पुरुष ने हर प्रकार उसका दोहन और शोषण किया। ऊपर से तुर्रा यह कि तमाम मूल्यों और संस्कृति की रक्षा का भार भी उसी के मत्थे मढ़ दिया गया। एक ऐसी छवि गढ़ दी गई जो ममता, करुणा, प्रेम, समर्पण, बलिदान और निरीहता की प्रतीक थी। खासकर भारतीय स्त्री हजारों साल से ऐसी छवि में कैद रहकर छली जाती रही; और इस छले जाने पर भी गौरव का अनुभव करती रही। स्त्री के इर्द-गिर्द तरह-तरह के मिथ बुने गए और उसे अपने स्त्रीत्व तक के लिए लज्जित होना सिखाया गया। पिछले सौ-दोसौ वर्षों में धीरे-धीरे शिक्षा और लोकतंत्र के सहारे भारतीय स्त्री ने अपने चारों ओर खींची गई तथाकथित मर्यादाओं को उलाँघना आरंभ किया। इसका दंड भी भोगा। आज भी यह पुरुष-केंद्रित समाज उसे इस अपराध के लिए दंडित करने में किसी प्रकार की ढील नहीं करता। इसके बावजूद स्त्री है कि अपने अस्तित्व को प्रमाणित कर रही है; अपनी अस्मिता को उजागर कर रही है। इतना ही नहीं, स्त्री ही स्त्री की विरोधी होती है अथवा स्त्री तो कोमलता की प्रतिमा होने के कारण जीवन-संघर्षों में सदा पुरुष की मुखापेक्षी बनी रहने के लिए मजबूर होती है - जैसे थोपे गए मिथों को आज की भारतीय स्त्री ने खंडित और ध्वस्त कर दिया है। वह पुरुष-सभ्यता द्वारा विकसित परंपरागत शोषणकारी नारी-संहिता को ही अस्वीकार नहीं करती, वरन स्त्री-बहनापे की भी नई मिसाल पैदा करती है। वह सामाजिक-राजनैतिक हलकों में भी अपनी उपस्थिति द्वारा सार्वजनिक जीवन को दिशा प्रदान कर अपना सामर्थ्य सिद्ध करती है। इस नई स्त्री ने पुरुष-केंद्रित भाषा तक को चुनौती देना शुरू कर दिया है तथा अब यह समाज, संस्कृति, विज्ञान और अध्यात्म से लेकर भाषा और साहित्य तक का स्त्री-पाठ रचने में संलग्न है। यह समर्थ स्त्री शक्ति और सत्ता ही नहीं, यौन और नैतिकता को भी स्त्री-कोण से अपनी समग्र निजता के साथ परिभाषित करती दिखाई दे रही है। 

अनामिका अपने समग्र साहित्य में इसी स्त्री को कभी खोजती हैं, कभी सँवारती हैं और कभी सिरजती हैं। चंदन ने अनामिका की इस स्त्री के साथ गहरा अपनापा बना लिया है - उनकी यह कृति इस तथ्य को प्रमाणित करती है। 

मुझे दृढ़ विश्वास है कि स्त्री विमर्श विषयक डॉ. चंदन कुमारी की यह कृति सुधी पाठकों का हृदयहार बनेगी और इस क्षेत्र में आगे अध्ययन करने वाले जिज्ञासुओं का मार्गदर्शन भी करेगी। 

अनंत आशीष और समस्त मंगलकामनाओं सहित, 

- ऋषभदेव शर्मा 
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष 
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद 
मोबाइल : 807474 2572

 


गुरुवार, 2 मई 2019

(पुस्तक समीक्षा ) संपादकीयम्— भविष्य का आईना, वर्तमान की नज़र


संपादकीयम्— भविष्य का आईना, वर्तमान की नज़र

डा० ऋषभदेव शर्मा ने बहुत स्नेह के साथ अपनी ये पुस्तक लगभग एक महीने पहले भेंट की, लेकिन इसे पढ़ने का अवसर अब मिला। इन दिनों व्यस्तता बहुत रही लेकिन ऐसा नहीं कि इस बीच कुछ पढ़ा ही नहीं। कुछ मिठाई ऐसी होती है जिसे आप स्वाद ले कर खाना चाहते हैं, और यही वजह है कि डा० ऋषभदेव शर्मा की कोई रचना मैं जल्दबाजी में नहीं पढ़ता।
यदि इस किताब की बात करूँ तो सबसे पहले इसके मुख्य पृष्ठ पर अंकित मोर पंख ध्यान आकृष्ट करता है और बरबस ही पौराणिक काल के पाण्डुलिपियों की याद ताज़ा हो उठती है, जिसमें कलम की जगह मोर पंख का इस्तेमाल होता था। जैसा कि इस किताब की भूमिका में आदरणीय योगेन्द्रनाथ मिश्र ने लिखा है कि ‘सामान्यतः संपादकीय एक बार ही पढ़ा जाता है’, लेकिन संपादकीय यदि ऐसे विषयों पर लिखी गई हो जिसका दीर्घकालिक प्रभाव हो, तो फिर ऐसे लेख की उम्र एक दिन की नहीं हो सकती और यदि ये लेख ऐसी तटस्थता और निरपेक्षता से लिखे गए हों कि कलम की स्याही के किसी खास रंग में रंगे होने का भ्रम तक न हो तो फिर ये किसी पौराणिक पाण्डुलिपि की तरह ही संग्रहणीय हो उठती है।
ऋषभदेव शर्मा की विनम्रता और ख़ुद से पहले दूसरों की सुविधा का ख़्याल रखने की कला का लोहा उनके सभी जानने वाले मानते हैं, इस पुस्तक में भी उन्होंने पाठकों की सुविधा के लिए संपादकीय लेखों को आठ खंडों में संकलित किया है। हर लेख के बाद उन्होंने इसके प्रकाशन की तिथि भी दी है जिससे भविष्य में शोधार्थियों को इस लेख की पृष्ठभूमि समझने में सहूलियत होगी।
पहले खंड ‘स्त्री संदर्भ’ के पहले लेख में ही वे डेनिस मुक्केगे और नादिया मुराद को 2018 का नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने पर लेख लिखते हुए, इराक में जन्मी नादिया मुराद पर इस्लामिक स्टेट द्वारा किए गए ज़ुल्मों का विवरण देते हैं। 2014 में इस्लामिक स्टेट द्वारा नादिया के गाँव को घेर कर 600 (यज़ीदी) पुरुषों को मार डाला गया और सभी औरतों और बच्चियों को यौन दासी बना लिया गया। नादिया तब सिर्फ़ 15 साल की थी। औरतों को न मारे जाने पर जब वो लिखते हैं “औरतों को मारने के बजाय ‘भोगना’ अधिक पौरुषपूर्ण (!) होता है न।“ तो ये एक पंक्ति आपको देर तक रोक लेती है और बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है। यही एक अच्छे संपादकीय की पहचान है।
13 अक्तूबर 2018 को ‘मी टू’ विषय पर लिखते हुए जहां एक ओर वे महिलाओं के इस प्रयास की ये कहते हुए सराहना करते हैं कि “आज भी उन्हें अपने इस बोलने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है लेकिन फिर भी अब वे साहस (दुस्साहस?) पूर्वक बोलने लगी हैं और इससे बहुत से चमकीले चेहरों के आवरण उतरने के कारण कुछ न कुछ असहजता अवश्य महसूस की जा रही है।“ तो लगे हाथ वे महिलाओं को नसीहत देते हुए कहते हैं “स्त्री-देह को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करने वाली महिलाएं भी समाज में सदा रही हैं। उनकी भी पहचान की जानी चाहिए और ख़ुद को ‘लुभाने वाली वस्तु’ की तरह पेश करने की प्रवृति की भी निंदा की जानी चाहिए।“ और संपादकीय ज़िम्मेदारी का निर्वाह करते हुए लिखते हैं “स्त्री और पुरुष दोनों ही अगर एक दूसरे की किसी भी प्रकार की स्वाभाविक कमजोरी का शोषण करते हैं, तो इसे वांछनीय नहीं माना जा सकता।
मुस्लिम महिलाओं के तीन तलाक का मामला हो या महिलाओं के ख़तना जैसी कुप्रथा, ‘संपादकीयम’ बेबाकी से अपनी राय रखता है। धारा 497 पर डा० शर्मा न्यायालय के आदेश का समर्थन तो करते हैं लेकिन साथ ही ये कहते हुए आगाह करना नहीं भूलते कि ‘अनैतिक संबन्धों की इस वैधानिक स्वीकृति का परिणाम भारत की सामाजिक व्यवस्था के लिए घातक भी हो सकता है।‘ ऐसे मामलों में न्यायालय की सीमा रेखा को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि ‘भले ही न्यायपालिका ने व्यभिचार को वैधता प्रदान कर दी हो, किंतु उसे नैतिकता प्रदान करना उसके वश की बात नहीं।‘ वहीं शबरीमला में महिलाओं के प्रवेश के मामले पर वे पूरी तरह से न्यायालय के फैसले से साथ खड़े नज़र आते है और लिखते हैं “भक्तों पर प्रतिबंध लगाने वाली कोई भी प्रथा उनके आराध्य देव को जड़-रूढ़ियों का बंदी बनाने के समान है। देवता तो लोक का है, उसे लोक से दूर करना हर प्रकार से अनुचित है — लोकद्रोह है।
दूसरा खंड ‘लोकतन्त्र और राजनीति’ संभवतः भविष्य की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण हो क्योंकि इस खंड में 12 संपादकीय लेखों के माध्यम से डा० शर्मा आज के ज्वलंत मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुंबई में डांस बार को पुनः खोलने की अनुमति देने के बाद 21 जनवरी 2019 के अपने लेख में वे चुभते हुए व्यंग से इस घटना को आज की राजनीति से जोड़ते हैं। उन्होंने लिखा है “चुनावी राजनीति ने देश को डांस बार बना रखने में कोई कोर-कसर तो छोड़ी नहीं है। जिधर देखिए उधर ही डांस चल रहा है। प्रत्यक्ष में तो नेता जनता को रिझाने के लिए नाचते-कूदते दिखाई देते हैं। पर है ये नज़रों का फेर ही। असल में तो वे खुद अपनी धुन और ताल पर जनता को नचा रहे होते हैं। ग्राहक को लगता है कि बार-बाला नाच रही है लेकिन सच में तो वह अपने संकेतों पर ग्राहक को नचा रही होती है।“ इस घटना को सामान्य संपादकीय की तरह न लिख कर जिस तरह से उन्होंने इसे आज की राजनीति से जोड़ते हुए इस पर व्यंग किया है, इसे न सिर्फ पठनीय बनाता है अपितु राजनीति के गिरते स्तर को भी हमारे सामने ला खड़ा करता है। उन्होंने लिखा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि डांस बार में सीसीटीवी लगाने की अनिवार्यता नहीं है क्योंकि इससे ‘निजता’ का उल्लंघन होता है तो क्यों न नेताओं के करतूतों की भी रिकॉर्डिंग की इजाजत नहीं होनी चाहिए। बेचारे वोटरों को रिझाने के लिए न जाने क्या-क्या करते हैं और लोग इसे रेकॉर्ड कर उन पर बाद में हमला बोलते हैं। ये उनकी ‘निजता’ का हनन है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बार-बालाओं पर पैसे बरसाए नहीं जा सकते, हाँ उन्हें टिप दिया जा सकता है। नेताओं के लिए भी इसकी अनिवार्यता जताते हुए वो लिखते हैं जनता पर बरसाए पैसे का हिसाब रखने में दिक्कत होती है, तो बेहतर है कि सीधे-सीधे जनता के हाथ में टिप दिए जाएँ ताकि बाद में गला पकड़ने में सहूलियत हो। डांस बार के धार्मिक स्थानों से एक किलोमीटर की दूरी पर होने के नियम को भी सुप्रीम कोर्ट ने हटा दिया तो डा0 शर्मा ‘राजनीति के नचनियों’ के लिए भी ये सुविधा चाहते हैं जहां वे धार्मिक स्थानों और शिक्षण संस्थानों का अपने मतलब के लिए उपयोग कर सकें। वो लिखते हैं “चुनाव नृत्य में धर्म और शिक्षा की जुगलबंदी के बिना मजा ही कहाँ आता है। इसके बिना उन्माद नहीं जागता और उन्माद जगाए बिना चुनाव नृत्य पूरा नहीं हो सकता।“ लेख के अंत में वो लिखते हैं “खूब नाच-गाना हो, शराब बहें, उपहार लिए-दिए जाएँ, उन्माद की वर्षा हो, वशीकरण के लिए यह जरूरी है — बार में भी, और चुनाव में भी।
एक राजनीतिक विश्लेषक द्वारा लिखे गए लेख से राजनीति की जटिलताएँ समझने में शायद मदद मिले लेकिन जब डा0 शर्मा जैसे साहित्यकार इस विषय पर लिखते हैं तो इसकी पठनीयता कई गुणा बढ़ जाती है। 22 दलों के साथ आ कर महागठबंधन बनाने पर वो लिखते हैं “संकल्प के सहारे बड़े-बड़े लक्ष्य प्राप्त किए जाने की कहानियाँ मिलती हैं। पर यह तभी हो पाता है जब समस्याओं के ‘जाल’ में फंसे सारे ‘कबूतर’ एक ही दिशा में उड़ें। इसके लिए एक दिशा में ले जाने वाला ‘मुखिया कबूतर’ भी चाहिए होता है। प्रस्तावित महागठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि ‘मुखिया कबूतर’ नदारद है।
रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा “समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध। जो तटस्थ हैं,समय लिखेगा उनका भी अपराध।“ डा० शर्मा ये अपराध नहीं करते। मुद्दा चाहे कश्मीर का हो, लद्दाख का, आरक्षण का या राजनीति के गिरते स्तर का, सभी विषयों पर डा० शर्मा न सिर्फ वस्तु-स्थिति को सरल भाषा में पाठकों के सामने रखते हैं बल्कि हर मुद्दे पर अपने विचार भी सामने रखते हैं। संपादकीय में अमूमन कविता देखने को नहीं मिलती लेकिन जब संपादकीय लिखने वाले ‘कवि’ ऋषभ देव शर्मा हों तो वे इस बंधन को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते। जातिगत राजनीति का दर्द बयान करते हुए वो लिखते हैं
मानचित्र को चीरती, मज़हब की शमशीर
या तो इसको तोड़ दो, या टूटे तस्वीर।
मुहर-महोत्सव हो रहा, पाँच वर्ष के बाद
जाति पूछ कर बंट रही, लोकतन्त्र की खीर।
किसानों की समस्याओं पर आधारित तीसरे खंड में चार लेखों के माध्यम से उन्होंने ‘अन्नदाता से दिल्ली दूर क्यों?’ और ‘आत्महत्याओं का इलाज़ कर्जमाफ़ी नहीं’ जैसे सटीक शीर्षक से लेख लिखे हैं।
‘शहर में दावानल’ नाम से लिखे गए खंड चार में 6 लेखों का संकलन है जिसमें भीड़-तंत्र द्वारा कानून अपने हाथ में लिए जाने पर चिंता व्यक्त की गई है। ‘अब किसके पिता की बारी है?’ शीर्षक, हालात की भयावहता के बारे में सोचने को विवश करता है। इसी विषय पर ‘अब जिसे भी देखिए, उस पर गुलेले हैं।“ शीर्षक से लिखे लेख में उन्होंने अपनी कविता की पंक्तियों को रेखांकित किया है:
ईंट, ढेले, गोलियाँ, पत्थर, गुलेलें हैं
अब जिसे भी देखिए, उस पर गुलेलें हैं
क्या पाता क्या दंड दे, यह आज क़ातिल को
भीड़ पर तलवार हैं, खंजर गुलेलें हैं।
‘ऊपरवाला देख रहा है’ शीर्षक से भारत सरकार द्वारा पारित आदेश जिसमें 10 सरकारी एजेंसियों को अधिकार दिया गया है कि ये किसी भी नागरिक के फोन और कंप्यूटर की निगरानी बिना किसी अतिरिक्त आदेश के कर सकते हैं, पर लेख लिखते हुए उन्होंने लिखा है “इसमें दो राय नहीं कि किसी भी देश की सुरक्षा सर्वोपरि है और उसके समक्ष नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकार गौण एवं स्थगित हो जाने चाहिए। लेकिन ऐसा केवल असामान्य स्थिति या आपात स्थिति में ही स्वीकार्य है। साधारण परिस्थितियों में भी यदि नागरिक को यह लगता है कि कोई एक आँख लगातार उसकी हर गतिविधि को ताक-झांक कर देख रही है, तो सरकार का यह अबाध अधिकार नागरिक के लोकतान्त्रिक अधिकार का अतिक्रमण है।“ सनद रहे कि ऐसा कहने वाले डा० शर्मा खुद इंटेलिजेंस ब्यूरो के लंबे समय तक अधिकारी रह चुके हैं।
अगले तीन खंड ‘व्यवस्था का सच’, ‘हमारी बेड़ियाँ’ और ‘अस्तित्व के सवाल’ हैं जिनमें कई समसामयिक विषय जैसे सड़कों की बदहाली, पानी की किल्लत, जातिगत समस्याएँ, बच्चों की सुरक्षा, बुढ़ापे की असुरक्षा और ग्लोबल वार्मिंग पर महत्वपूर्ण लेख संकलित हैं।
अंतिम खंड में उन्होंने ‘वैश्विक संदर्भ’ के नाम से 7 लेख रखे हैं। ये ऐसे विषय हैं जिनमें गंभीरता की आवश्यकता है और डा० शर्मा इनके साथ पूर्ण न्याय करते हैं। इस खंड में वो सिर्फ साहित्यकार न हो कर वैश्विक राजनीति के जानकार के तौर पर नज़र आते हैं और अपने लेखों में अमेरिका, चीन, फ्रांस, संयुक्त राष्ट्र, उत्तर कोरिया जैसे विषयों पर ऐसे लेख लिखे हैं जिनकी उपयोगिता आने वाले समय बढ़ती जाएगी।
महाभारत के युद्ध में जैसे कौरव और पांडव दो पक्ष थे लेकिन संजय ने इस युद्ध का हाल किसी एक पक्ष के तौर पर नहीं सुनाया। संजय ने वो सुनाया जो उन्होंने देखा और समझा। समाचार में भी हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। ‘संपादकीयम’ इन दोनों पक्षों को उजागर तो करता ही है, साथ ही संजय की तरह डा० शर्मा इसमें अपने विचार रखकर इन दो पक्षों में एक तीसरा आयाम जोड़ते हैं। इस पुस्तक के विषय ऐसे हैं जिन्हें वर्षों बाद भी इसलिए देखा जाएगा कि अमुक विषय पर डा० शर्मा के विचार क्या थे और क्या उनका आकलन सही निकला। इन मायने में ये पुस्तक निश्चय ही संग्रहणीय है। पुस्तक की बाइंडिंग और बेहतर हो सकती थी। एक बार आद्योपांत पढ़ने से ही यदि किताब से पन्ने, शरीर से आत्मा की तरह निकलने को मचलने लगे तो लंबे समय तक इसकी संग्रहणीयता मुश्किल हो जाएगी।
‘संपादकीयम’ पुस्तक का सही आकलन भविष्य में होगा जब डा० शर्मा के विभिन्न विषयों पर रखे विचार मूर्त रूप लेंगे। इस पुस्तक के लिए उन्हें मेरी बहुत बहुत शुभकामनाएँ इस उम्मीद के साथ कि ‘संपादकीयम’ सिर्फ एक पुस्तक न हो कर इस नाम से एक शृंखला होगी जिसमें ऐसे कई महत्वपूर्ण लेख संग्रहीत किए जाएंगे।