समर्थक

बुधवार, 14 सितंबर 2016

बदलती चुनौतियाँ और हिंदी की आवश्यकता

दैनिक भास्कर, नागपुर : 14 सितंबर, 20 16 : पृष्ठ 15 

सितंबर माह आते ही हिंदी पर्व की गहमागहमी शुरू हो जाती है। हिंदी पढ़ने-पढ़ाने की वकालत करने वालों से लोग लगभग बेशर्मी के साथ, नहीं तो शरारत के साथ, ये प्रश्न पूछने लगते हैं कि आज की बदलती दुनिया में आम आदमी हिंदी क्यों पढ़े? पढ़े तो कैसे पढ़े? और हिंदी आगे बढ़े तो कैसे बढ़े? ये ऐसे शाश्वत प्रश्न हैं जो कम से कम सौ साल से तो इसी तरह पूछे जा रहे हैं। लेकिन इनके उत्तर सदा एक से नहीं रहते। दुनिया बदलती है तो हमारे चारों ओर का वातावरण बदलता है, चुनौतियाँ बदलती हैं और परिणामस्वरूप उनका सामना करने की तकनीकें भी बदलती हैं। इसमें संदेह नहीं कि इन चुनौतियों के कई उत्तर भी गढ़े-गढ़ाए और शाश्वत हैं। जैसे कि, हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है इसलिए सीखनी ही चाहिए अथवा कि हिंदी भारत संघ की राजभाषा है इसलिए उसका व्यवहार हमारा संवैधानिक कर्तव्य है। लेकिन इस सच्चाई से भी मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में कोई संविधानदत्त स्वीकृति और शक्ति प्राप्त नहीं हैं तथा राजभाषा के रूप में भी अंग्रेजी उसे नीचे गिराकर छाती पर चढ़ी बैठी है। अस्तु... 

इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि तमाम परिवर्तन और विकास के बावजूद वर्तमान समय में भी शिक्षा की दृष्टि से भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। अब भी हमारे देश की बहुत बड़ी जनसंख्या अशिक्षित या अल्पशिक्षित है। यह अशिक्षित या अल्पशिक्षित जन मुख्य रूप से शहरों से दूर, ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करता है तथा प्रायः खेतीबाड़ी, छोटा-मोटा कारोबार, मजदूरी या कुटीर उद्योग से अपनी आजीविका कमाता है। इन लोगों और इनके व्यवसायों की अपनी समस्याएँ हैं। प्रायः ये लोग उन्नति के अधुनातन साधनों से या तो परिचित नहीं है या उन तक इनकी पहुँच नहीं है। परिवर्तन और विकास की धारा में यह व्यापक जन समूह तभी शामिल हो सकता है, जब इसे खेतीबाड़ी की नई पद्धतियों की जानकारी हो, नई फसलों और नए बीजों की विशेषताओं और उपलब्धता का अता-पता हो, अपनी फसल के विक्रय के लिए बाजार और उससे जुड़ी ऊँच-नीच का ज्ञान हो, अपने उत्पादों का दाम तय करने के अधिकार का अहसास हो, सरकारी योजनाओं और स्वयंसेवी संगठनों से प्राप्त हो सकने वाली सहयाता विषयक पूरे तंत्र की समझ हो। कृषि, मजदूरी, रोजगार, लघु कुटीर और मध्यम उद्योग धंधों से संबंधित सभी पक्षों का ज्ञान और आवश्यक प्रशिक्षण जब तक इस अनपढ़ अथवा कम पढ़े लिखे साधारण जन तक नहीं पहुँचेगा, तब तक विकास को इस देश की जमीनी सच्चाई नहीं बनाया जा सकता। इसमें कोई दो राय नहीं कि ये समस्त सूचनाएँ और प्रशिक्षण साधारण जन को उसकी अपनी अपनी भाषा में ही दिए जाने चाहिए। कम-से-कम अंग्रेजी भाषा में तो ऐसा करना इस देश में न तो संभव है और न ही उचित। 

लगभग सौ वर्ष पहले 1918 में जब महात्मा गांधी ने हिंदी को भारतीय स्वाधीनता संग्राम की राष्ट्रभाषा के रूप में प्रस्तावित और स्वीकृत किया था, तब का भी और अब का भी यही सच है कि जिस व्यापक जन गण को हमें संबोधित करना है या जिस तक तमाम तरह की प्रगति की सूचनाओं को ले जाना है या जिसे विकास की धारा में जोड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जाना है, उसकी अधिकांश संख्या किसी न किसी बोली के रूप में हिंदी का व्यवहार करती है या अपनी मातृभाषा के साथ-साथ हिंदी का भी कार्यसाधक ज्ञान रखती है। अतः इस तमाम जनसंख्या को स्वतंत्रता के बाद के भारत की उन्नति में भागीदार बनाने के लिए हिंदी पढ़ना-पढ़ाना जरूरी है। अभिप्राय यह है कि हिंदी पढ़कर यह साधारण जन विभिन्न सूचनाओं को प्राप्त कर सकेगा, समझ सकेगा और उनका अपने तथा देश के लिए उपयोग कर सकेगा। साथ ही, अपने अधिकारों को भी वाणी प्रदान कर सकेगा जो किसी भी लोकतंत्र के लिए बुनियादी जरूरत है। 

दैनिक हिंदी मिलाप, 14 सितंबर '16 : पृष्ठ 9 
अब आप कहेंगे कि, देश के जिन हलकों में हिंदी का संप्रेषण घनत्व अपेक्षाकृत कम है, वहाँ क्या किया जाए? तो इस बारे में मेरा स्पष्ट मत है कि ये समस्त सूचनाएँ और प्रशिक्षण उन्हें उनकी अपनी भाषा में ही मिलने चाहिए। लेकिन प्रशिक्षकों को अंग्रेजी की तुलना में हिंदी के माध्यम से इस ज्ञान को अर्जित करना अधिक वांछनीय है। अर्थात केरल के किसी मछुआरे तक कोई सूचना मलयालम या उसकी बोली में ही पहुँचनी चाहिए, लेकिन इस सूचना की स्रोत भाषा इक्कीसवीं शताब्दी के भारत में अंग्रेजी नहीं, बल्कि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएँ ही होनी चाहिए। मेरा दृढ़ मत है कि भारत के सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी विकास और तत्संबंधी ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने का काम अंग्रेजी नहीं कर सकती, क्योंकि आज भी ज्ञान के साहित्य को ग्रहण करने योग्य अंग्रेजी जाने वालों की संख्या बेहद-बेहद कम है। अतः हिंदी और भारतीय भाषाओं का वह कभी भी विकल्प नहीं बन सकती। 

हिंदी पढ़ने-पढ़ाने की जरूरत का गहरा रिश्ता इस बात से भी है कि भारत की संस्कृति, धर्म और इतिहास की परंपराएँ अत्यंत प्रामाणिकता के साथ इस भाषा में सुरक्षित और उपलब्ध हैं। दरअसल, अपनी सांस्कृतिक जड़ों तक पहुँचने का माध्यम या साधन किसी राष्ट्र के लिए उसकी अपनी भाषा को ही होना चाहिए। आज इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि हिंदी भारत की पहचान बन चुकी है। अन्य भाषाभाषी भी भारतीय नागरिक के रूप में अपनी पहचान हिंदी के माध्यम से रेखांकित करना गौरव का विषय समझते हैं। विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच हिंदी ऐसी माध्यमिक भाषा के रूप में स्थापित हो चुकी है जिसमें आने पर किसी भी अन्य भारतीय भाषा का ज्ञान अथवा साहित्य अधिक व्यापक जनसमूह तक पहुँचने की संभावनाओं से सम्वृद्ध हो उठता है। यही कारण है कि आज तमिल और तेलुगु से लेकर असमी और मणिपुरी तक के लेखक यह कामना करते हैं कि उनकी कृतियों का अनुवाद हिंदी में उपलब्ध हो। आवश्यकता इस बात की है कि भारत की संपूर्ण सांस्कृतिक पहचान को ग्रहण करने के लिए तमिलनाडु से मणिपुर तक के सारे साहित्य और ज्ञान-विज्ञान को हिंदी में उपलब्ध कराया जाए। यहाँ मैं अपने अनुभव से यह भी जोड़ना चाहूँगा कि इस दिशा में बहुत सारा काम हो चुका है। यह संभव है कि भारत के बारे में हिंदी में उपलब्ध सूचनाएँ और विश्लेषण मात्रा की दृष्टि से अंग्रेजी में उपलब्ध जानकारी की तुलना में कम हो, लेकिन प्रामाणिकता की दृष्टि से वह अधिक सटीक और अधुनातन है। यदि आप अरुणाचल प्रदेश की जनजातियों और उनकी सांस्कृतिक परंपराओं के बारे में जानना चाहें तो पाएँगे कि अंग्रेजी में उपलब्ध अधिकतर सामग्री अब पुरानी हो चुकी है और उसकी दृष्टि भी उपनिवेशवादी है। इसकी तुलना में हिंदी में अधिक प्रामाणिक, निष्पक्ष और अद्यतन सूचनाएँ उपलब्ध हैं। यही बात अन्य क्षेत्रों और समुदायों के बारे में भी सच हो सकती है। इसलिए यदि इस विशाल राष्ट्र की बहुविध परंपराओं की तह तक पहुँचना है, तो वह भी हिंदी और भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही संभव है। 

अब रहा सवाल यह कि, हिंदी बढ़ेगी कैसे? तो इसके जवाब में मेरा कहना है कि बदली हुई परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ और ‘राजभाषा’ जैसी नारेबाजी से दूर रखकर, ‘भाषा’ के रूप में प्रचारित-प्रसारित किए जाने की जरूरत है – जिसे मनुष्य सूचनाओं के आदान-प्रदान, जिज्ञासाओं की शांति, आत्मा की अभिव्यक्ति और संप्रेषण की सिद्धि के निमित्त सीखा करते हैं। भावुकता और बाध्यता दोनों ही अतियाँ हैं। भाषा मनुष्य की सहज आवश्यकता के रूप में सीखी जाती है। हम इस सहज आवश्यकता का अनुभव करें-कराएँ, तो हिंदी भी सहजता से पढ़ी-पढ़ाई, सीखी-सिखाई जा सकती है। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों से लेकर स्वैच्छिक हिंदी प्रचार संस्थाओं तक को चाहिए कि वे अपने घिसेपिटे रवैये को बदलें और हिंदी को अधुनातन ज्ञान की व्यावहारिक भाषा के रूप में प्रचारित-प्रसारित करें। इसके लिए उन्हें अन्य भारतीय भाषाओं को साथ लेकर चलना पड़ेगा। भारत जैसे बहुभाषी समाज में यह बहुत जरूरी है कि हिंदी और अन्य सभी भारतीय भाषाएँ साथ-साथ एक-दूसरे को समृद्ध  करते हुए अपनी संपन्नता बढ़ाएँ। 

यह भी जरूरी है कि हिंदीतर क्षेत्रों में अब तक हिंदी में जो कुछ काम हुआ है, उसका मूल्यांकन किया जाए और उसकी सार्थकता, प्रामाणिकता तथा आवश्यकता की पहचान करते हुए उसे अखिल भारतीय स्तर पर प्रतिष्ठा प्रदान की जाए। आज जो खुली अर्थ व्यवस्था और भूमंडलीकृत बाजार हमें उपलब्ध है वह एक दोधारी तलवार की तरह है, जिसके द्वारा हम अपनी भाषाओं का विस्तार भी कर सकते हैं और, अगर जागरूक न रहें तो, अपनी भाषाओं को उपेक्षित होते और मरते भी देख सकते हैं। 

अंत में एक बात और। हिंदी की ‘पठनीयता’ और ‘पाठक संख्या’ दोनों को बढ़ाने की जरूरत है। यह अत्यंत चिंताजनक दृश्य है कि हिंदी विभागों से जुड़े हुए हमारे विद्वान प्रायः अपनी साहित्य की दुनिया के कुएँ के ही मेंढक बने रहते हैं। उन्हें साहित्येतर विषय भी पढ़ने चाहिए और पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी की भाँति विज्ञान, राजनीति, कला, अर्थशास्त्र अर्थात समस्त ज्ञान क्षेत्रों का अध्ययन करते हुए अपने आपको अद्यतन रखना चाहिए और सरल, सहज, सुबोध हिंदी में इस तमाम ज्ञान को साधारण पाठक के लिए सुलभ बनाना चाहिए। पठनीयता बढ़ेगी तो पाठक स्वयं ही बढ़ेंगे। 

- ऋषभदेव शर्मा

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

विश्वशांति और हिंदी


ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:, 
पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। 
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:, 
सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ 
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥


भारतीय मनीषा ने ऋग्वेद के समय से ही यह समझ लिया था कि मनुष्य के निरापद अस्तित्व के लिए संपूर्ण ब्रह्मांड का सहयोग अपेक्षित होता है. यही कारण है कि उसने पृथ्वी और आकाश सहित संपूर्ण ब्रह्मांड की शांति की कामना की थी. दैहिक, दैविक और भौतिक स्वास्थ्य के लिए संपूर्ण जगत का शांति को प्राप्त होना आवश्यक है. भारतीयों ने मोक्ष की कल्पना शांति और आनंद के लोक के रूप में की और समस्त जड़-चेतन सृष्टि के लिए शांति की कामना की तो इसके पीछे निश्चय ही यह धारणा रही होगी कि शांति किसी एकाकी व्यक्ति अथवा एकाकी समुदाय का विषय नहीं है. अर्थात शांति को अकेले प्राप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि सबकी शांति में ही अपनी शांति है. यदि जगत का परिवेश, जगत का जीवन, जगत का मानस अशांति, विक्षोभ और परस्पर संघर्ष से परिपूर्ण हो, तो व्यक्ति की शांति कैसे संभव है? इसलिए शांति की भारतीय संकल्पना अपने मूल में ही विश्वशांति की संकल्पना है. 

भारतीय ऋषियों ने हमें संपूर्ण विश्व को एक नीड़ समझने का अथवा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का जो उदात्त दर्शन दिया था, कहना न होगा कि उसी के कारण भारतीय लोक की प्रकृति समभाव और सह-अस्तित्व की रही तथा भारतीय सभ्यता और संस्कृति ने अपना विकास और विस्तार करने के लिए कभी किसी अन्य सभ्यता या संस्कृति पर आक्रमण नहीं किया. उसने तो ‘परस्पर अविरोध’ को धर्म का लक्षण माना तथा सत्य, प्रेम और अहिंसा जैसे वैश्विक मूल्यों को सभ्यता के उषाकाल से ही अपने चित्त और व्यवहार में अपनाया. इसके विपरीत आधुनिक कहे जाने वाले पश्चिमी समाज ने अधिक से अधिक अभी कुछ पचास वर्ष पहले ही खुद को ‘पृथ्वी ग्रह के नागरिक’ के रूप में देखना शुरू किया है – दो विश्वयुद्धों और परमाणु बमों की विभीषिका देखने के बाद. अन्यथा इसके पहले राष्ट्रीय नागरिकताएँ सर्वोपरि थीं और राष्ट्रीय समुदाय की रक्षा करना ही सबसे बड़ा मूल्य था. यही कारण है कि बहुत से इतिहासवेत्ता यह कहते नहीं अघाते कि भारत में तो राष्ट्रीय चेतना थी ही नहीं, वह तो भला हो पश्चिमी देशों का कि वे खुदाई फौजदार बनकर हमारे यहाँ राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाने आ गए! वस्तुतः भारतीय और पश्चिमी दृष्टिकोण में यही मूलभूत अंतर है – भारत विश्वनागरिकता और विश्वमानवता के गुणसूत्र लेकर निर्मित हुआ राष्ट्र है जबकि पश्चिमी राष्ट्रवाद अधिकारलिप्सा से उत्पन्न प्रभुता की हदबंदी से संबंधित विचारधारा है. यह संकीर्ण राष्ट्रवाद असुरक्षा की भावना से ग्रस्त रहता है, मनुष्यों को मनुष्यों से भयभीत रखता है और युद्धों का प्रणयन करता है. संकीर्ण राष्ट्रवाद ही आज के समय में विश्वव्यापी आतंकवाद और अशांति का हेतु है. राष्ट्रीयता की सकारात्मक संकल्पना में एक-दूसरे की स्वतंत्रता, संप्रभुता और राष्ट्रीयता का अतिक्रमण करने की प्रवृत्ति के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए. यदि धर्मों की परस्पर अविरोधी अवधारणा का विस्तार किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि कोई भी शांतिप्रिय राष्ट्र किसी दूसरे राष्ट्र का विरोधी नहीं हो सकता. अर्थात अलग-अलग राष्ट्रों के राष्ट्रहित परस्पर अविरोधी होने चाहिए. यदि ऐसा हो तो शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की संकल्पना साकार हो सकती है. 

जब से आधुनिक दुनिया ने इस अविरोधी राष्ट्रीयता को समझना शुरू किया है तब से भिन्न-भिन्न देशों के बीच परस्पर सहयोग की प्रवृत्ति में वृद्धि हुई है. और यह प्रवृत्ति अब भी विकसित हो रही है. परस्पर भयमुक्त वातावरण में व्यापार, व्यवसाय, लेन-देन से लेकर तकनीक और ज्ञान तक की साझेदारी तभी तो संभव है जब विभिन्न देश परस्पर लोकतांत्रिक मूल्यों के सम्मान के सिद्धांत से जुड़े हुए हों. अभिप्राय यह है कि विश्वशांति के लिए विश्व के विभिन्न देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की आवश्यकता है. तानाशाही व्यवस्था चाहे वह प्रत्यक्ष रूप में हो अथवा प्रच्छन्न, दूसरों के अधिकारों को हड़पने की प्रवृत्ति को जन्म देती है. इसलिए तानाशाही व्यवस्था कभी भी विश्वशांति की पोषक नहीं हो सकती. इसके विपरीत लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ इस सिद्धांत पर टिकी होती हैं कि उन्हें किसी अन्य का अधिकार नहीं हड़पना है. अतः यदि उनके बीच यह पारस्परिक विश्वास कायम हो जाए कि विश्व समुदाय के हम सब सदस्य देश एक-दूसरे के हितों को नुकसान नहीं पहुँचाएँगे और छोटे-बड़े का भेद किए बिना सबकी संप्रभुता को समान सम्मान देंगे तो विश्वशांति स्वतः ही स्थापित हो जाएगी. इससे विश्व समुदाय में विभिन्न देशों की परस्पर निर्भरता भी पुष्ट होगी. 

लेकिन, विश्वशांति की यह संपूर्ण व्यवस्था आज एक आदर्श अवधारणा मात्र है. जैसा कि यूनेस्को की ‘इंटरनेशनल लिंगुवापैक्स कमेटी’ के अध्यक्ष फेलिक्स मार्टी ने ध्यान दिलाया है, पिछली शताब्दी में विश्व ने जो वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति की है उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा युद्ध उद्योग (वार इंडस्ट्री) को समर्पित है. यह बात दीगर है कि युद्धोन्माद की खेती करने वाली शक्तियों के फलने-फूलने के बावजूद विश्व के अधिकतर राष्ट्र लोकतंत्र और शांति की राह पर अग्रसर हैं. राष्ट्र-राज्य (नेशन स्टेट) की संकल्पना अब पुरानी पड़ती जा रही है क्योंकि अलग-अलग दिशाओं में विश्व के अनेक राष्ट्र अपने-अपने समूह बनाकर वैश्विक अर्थ व्यवस्था, वाणिज्य-व्यापार, कूटनीति और सभ्यता व संस्कृति की नई परिभाषाएँ गढ़ रहे हैं. राष्ट्र-राज्य की सीमाओं के परे अंतरराष्ट्रीय सहयोग के उदाहरण के रूप में संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न प्रयासों का उल्लेख किया जा सकता है. जैसे, पर्यावरण और विकास सम्मलेन (1992), मानवाधिकार सम्मेलन (1993), जनसंख्या और विकास सम्मलेन (1994), स्त्री विषयक सम्मलेन (1995), आवास विषयक सम्मेलन (1996), जैवविविधता सम्मलेन (2012). इन सब प्रयासों से यह तथ्य उभकर सामने आया है कि आज का विश्वनागरिक अराजकता और हिंसा में नहीं तर्क और एकजुटता में विश्वास रखता है. और शांति की संस्कृति लोकतंत्र से गहरे जुड़ी हुई है. इस लोकतंत्र का विस्तार मनुष्यों के राज्य ही नहीं ईश्वर के राज्य तक करना होगा, तभी विश्वशांति स्थापित हो सकेगी. अर्थात प्रकृति और मनुष्य के संबंधों को आज पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता है, बढ़ती हुई पर्यावरण चेतना इसी दिशा में संकेत करती है. पश्चिमी संस्कृति और भारतीय संस्कृति में जिस मूलभूत अंतर की बात आरंभ में की गई थी उसी का विस्तार करते हुए यह कहा जा सकता है कि ये दोनों संस्कृतियाँ क्रमशः भोग और त्याग की संस्कृतियाँ हैं. यही कारण है कि पश्चिम ने प्रकृति को संसाधन माना और मनुष्य को उसका स्वामी. इसके विपरीत भारत ने प्रकृति को माँ माना और मनुष्य को उसकी संतान. अतः पश्चिमी संस्कृति ने दोहन और शोषण को अपनाया तथा प्रकृति को कंगाल बना दिया. इस प्रकार एक तरफ युद्धों तथा दूसरी तरफ प्रकृति के साथ खिलवाड़ ने मनुष्य जीवन में शांति-दारिद्रय अथवा अशांति के बाहुल्य को जन्म दिया. 

प्रगति के रथ को तो पीछे ले जाना संभव नहीं है – उचित भी नहीं. लेकिन मनुष्य-मनुष्य तथा मनुष्य-प्रकृति के संबंधों को सुधारना बेहद जरूरी है. अन्यथा भूमंडल तेजी से ध्वंस की दिशा में बढ़ता चला जाएगा. हमें आज ऐसे दर्शन की आवश्यकता है जो मानव प्रजातियों और प्रकृति के बीच सकारात्मक संबंध की स्थापना कर सके. सभ्यताओं के संघर्ष की बात करने वाले पश्चिमी जगत को विनम्रता का पाठ सीखना होगा और उन सभ्यताओं का सम्मान करना सीखना होगा जिन्होंने प्रकृति के साथ अपने प्रेमपूर्ण संबंध को आज भी खोया नहीं है. इसलिए विश्वशांति की दिशा में अंतरराष्ट्रीय राजनैतिक संस्थाएँ बनाते जाने से कुछ नहीं होगा, जरूरत है भूमंडल के भविष्य को सुरक्षित करने वाले नैतिक मूल्यों पर ईमानदारी से सहमत होने और उन्हें अपनाने की. यदि ऐसा नहीं किया गया तो अंधराष्ट्रवादी शक्तियों और हथियार उत्पादक देशों की मिलीभगत से दुनिया भर में आतंकवाद और युद्धोन्माद फैलता ही रहेगा. इन युद्धोन्मादी शक्तियों को यूनेस्को के इस विचार से सहमत होना ही होगा कि विश्व की समस्त संस्कृतियाँ और भाषाएँ समान रूप से समर्थ और कल्याणकारी हैं. किसी भी देश की संस्कृति और भाषा तुच्छ नहीं है – चाहे वह देश कितना ही छोटा क्यों न हो. 

लोगों, समुदायों, बौद्धिकताओं, नैतिकताओं और सौंदर्यदृष्टियों की विविधता में ही विश्व की सुंदरता है. विविधता है तो सौंदर्य है. हमारी तमाम भाषाएँ इस विविधता को अपने-अपने ढंग से अभिव्यक्त करती हैं. शब्दबद्ध करती हैं. इन विविधताओं की स्वीकृति और समझ से ही सहिष्णुता का विकास होता है. सहिष्णुता एक-दूसरे को ‘बर्दाश्त’ करने का नाम नहीं है बल्कि एक-दूसरे के ‘साथ होना-जीना’ सहिष्णुता का आधार है. और यही विश्वशांति का मूलमंत्र भी है. 1995 में यूनेस्को ने सहिष्णुता के घोषणापत्र (डिक्लेरेशन ऑफ टोलरेंस) की प्रथम पंक्ति में यह स्वीकार किया है कि हमारी दुनिया में विद्यमान सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करने, उसे स्वीकार करने और उसकी प्रशंसा करने की प्रवृत्ति में ही सहिष्णुता निहित है. (टॉलरेंस कांसिस्ट्स इन रेस्पेक्टिंग, एक्सेप्टिंग एंड एप्प्रिशिएटिंग द रिच डाईवर्सिटी ऑफ कल्चर्स इन अवर वर्ल्ड.). इस प्रवृत्ति का सीधा संबंध विविध संस्कृतियों के परस्पर संवाद से है और संवाद निर्भर है भाषा पर. अतः विविध भाषाओँ की भिन्नता के बावजूद उनके साथ जुड़े हुए सामाजिक-सांस्कृतिक समान तत्वों की पहचान करना आवश्यक है ताकि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में यह चरितार्थ किया जा सके कि नर लोक से किन्नर लोक तक एक ही रागात्मक हृदय व्याप्त है. 

भाषा वैविध्य इस जगत के अन्य तमाम वैविध्यों की तरह ही एक अपरिहार्य यथार्थ है. इसलिए यह कामना करना कि पूरी दुनिया में केवल एक ही भाषा रहे अप्राकृतिक, अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक होगा. लेकिन इस आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता कि वैश्वीकरण (ग्लोबलाइजेशन) और स्थानिक अस्मिताओं के उभार (एफरमेशन ऑफ कम्यूनिटी आइडेंटिटीज) जैसी परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाली प्रक्रियाओं के इस दौर में बाजार, तकनीक, ज्ञान-विज्ञान, राजनैतिक व कूटनैतिक रिश्तों तथा बेहतर सांस्कृतिक समझ और समन्वय के लिए विविध भाषा-भाषी मानव समुदायों के बीच परस्पर संवाद कायम हो सके. यहीं विश्वभाषा की अवधारणा सामने आती है.

“विश्व के दृश्य फलक पर हम अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश, पुर्तगाली आदि भाषाओं को भी विश्वभाषा के रूप में व्यवहृत पाते हैं. पर विश्वभाषा बनने की इनकी प्रक्रिया विश्वभाषा हिंदी से भिन्न है. ये भाषाएँ साम्राज्यवाद की उस नींव के आधार पर फैलीं जो प्रभुता और शक्ति की रक्तरंजित प्रवृत्ति से सींची गई थीं. इसके विपरीत विश्वभाषा हिंदी का आधार रहा है उसके प्रति श्रमजीवियों की श्रद्धा और आत्मीयता. और जैसा कि मारीशस के हिंदी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष श्री जयनारायण राम का कहना है – हिंदी उपनिषद, रामायण, गीता की बेटी बनकर आई. यह उनके धर्म एवं संस्कृति का अंग बनकर अभी भी जीवित है.” (डॉ. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव (1996), भाषाई अस्मिता और हिंदी, नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन, पृ. सं. 57). विश्वभाषा के रूप में अपनी इसी विशेषता के कारण हिंदी विश्वशांति में एक बड़ी भूमिका निभा सकती है. 

दरअसल, विश्वयुद्ध को लगातार टालते जाने की विभिन्न देशों की बुद्धिमत्ता के बावजूद विश्वशांति के लिए सबसे बड़ा ख़तरा तरह-तरह के अंतरराष्ट्रीय संघर्षों या टकरावों से बना हुआ है. इन टकरावों का कारण संघर्ष में जुटे राष्ट्रों के अपने राष्ट्रीय हितों के टकराव में तो निहित है ही, एक-दूसरे की स्थितियों को समझ न पाने के कारण भी है. यह नासमझी कई बार एक-दूसरे के बारे में कम परिचय से पैदा होती है तो कई बार गलत परिचय से. परस्पर अपरिचय, अल्पपरिचय अथवा मिथ्यापरिचय से मिथ्याधारणाएँ उत्पन्न होती हैं. मिथ्याधारणाएँ परस्पर अविश्वास को जन्म देती हैं. परस्पर अविश्वास से भय उपजता है और भय से असुरक्षा भाव. इस शृंखला की परिणति आक्रामकता को जन्म देती है. आक्रामकता युद्ध में बदल जाती है. अतः परस्पर परिचय के अभाव आदि की समस्या को हल किए बिना युद्धों को टालना और विश्वशांति कायम करना संभव हो ही नहीं सकता. ऐसे अवसर पर भाषा की भूमिका सामने आती है. भाषा के द्वारा ही विभिन्न राष्ट्रों के बीच आपसी समझदारी बढ़ाई जा सकती है, गलत सूचनाओं और मिथ्याधारणाओं को निर्मूल किया जा सकता है और एक-दूसरे की इच्छाओं, आकांक्षाओं तथा सीमाओं का सही परिचय विकसित किया जा सकता है. विश्व में सबसे अधिक जनसंख्या द्वारा समझी जाने वाली पहली या दूसरी भाषा के रूप में हिंदी विश्व समुदाय के विभिन्न राष्ट्रों के बीच आपसी समझ पैदा करने वाला संवाद कायम करने और उसे विकसित करने का काम कर सकती है. विश्वभाषा के रूप में यह हिंदी की बड़ी उपलब्धि होगी कि वह एक-दूसरे से डरे हुए देशों के बीच आपसी समझ पैदा करके विश्वशांति की राह को सुगम बना दे. 

विश्वशांति के मार्ग में आर्थिक और राजनैतिक साम्राज्यवादी ताकतों की स्वार्थी रणनीति बड़ी बाधा उत्पन्न करती है. आर्थिक क्षेत्र में अपना प्रभुत्व कायम करने और राजनैतिक दृष्टि से अन्य राष्ट्रों को अपना पिछलग्गू बनाए रखने के दोहरे उद्देश्य की पूर्ति के लिए साम्राज्यवादी ताकतें युद्धों और कूटनैतिक संघर्षों को जन्म देती हैं. अपने स्वार्थ के लिए लोकतंत्र की दुहाई देकर ये ताकतें अन्य राष्ट्रों की संप्रभुता तक पर डाका डालने में नहीं हिचकतीं. इस प्रकार इनके साम्राज्यवादी स्वार्थ विश्वशांति के लिए ख़तरा बने रहते हैं. हमारा विचार है कि इस समस्या को हल करने में भी भाषाएँ कारगर औजार की तरह कम कर सकती हैं. विश्वभाषा के अपने दावे के साथ हिंदी व्यापक विश्व-बाजार की भाषा बनकर उन देशों के पारस्परिक व्यापारिक, राजनैतिक और कूटनैतिक संबंधों की भाषा बन सकती है जिन पर साम्राज्यवादी ताकतों ने अपना शिकंजा कस रखा है. इस प्रकार उन राष्ट्रों के परस्पर सहयोग और लोकतांत्रिक सह-अस्तित्व द्वारा हिंदी उनकी आवाज को विश्वमंच पर उठाकर विश्वशांति के रास्ते की बाधाओं से उन्हें बचा सकती है. 

इस तथ्य से यद्यपि इनकार नहीं किया जा सकता कि लंबे समय तक उपनिवेश रह चुके देश भारत की भाषा होने के कारण विश्वपटल पर हिंदी को वैश्विक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होने के लिए अभी बहुत संघर्ष करना पड़ सकता है तथापि यह भी सच है कि संयुक्त राष्ट्र में विविध अवसरों पर हमारे राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री या अन्य प्रतिनिधियों द्वारा हिंदी का प्रयोग किए जाने से हिंदी का मान बढ़ा है, उसकी प्रतिष्ठा में सुनिश्चित वृद्धि हुई है. यद्यपि भारत का संविधान हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित नहीं करता परंतु भारत का इतिहास इसे जन-मन में भारत-भारती के रूप में प्रतिष्ठित कर चुका है. ऐसी स्थिति में भारत के प्रतिनिधियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अंतरराष्ट्रीय संवाद के अवसरों पर हिंदी का व्यवहार करें ताकि दुनिया से यह भ्रम मिट सके कि भाषाओं का म्यूजियम होने के बावजूद भारत एक राष्ट्रभाषा विहीन गूँगा राष्ट्र है. संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की जगह बनने का अर्थ है भारत का कूटनैतिक प्रभाव बढ़ना और साथ ही दुनिया की दूसरी ताकतों के साथ रिश्तों में बदलाव आना. इसका लाभ उठाते हुए हिंदी विश्व समुदाय को सीधे-सीधे संबोधित करके विश्वशांति के भारतीय दर्शन की ओर आकर्षित कर सकती है. 

विश्वशांति का रास्ता बहुत बड़ा रास्ता है. जैसा कि पहले कहा गया है, मानव सभ्यता के विकास में विभिन्न राष्ट्रों और उनकी संस्कृतियों ने जो प्रयास किए हैं वे चाहे ज्ञान-विज्ञान और तकनीक से संबंधित हों, चाहे सौंदर्यदृष्टि और मूल्यबोध के विकास से जुड़े हों, चाहे भौतिक उपलब्धियों के हेतु हों अथवा आध्यात्मिक अनुभूतियों के आधार हों; सबके बीच परस्पर समझ और आदान-प्रदान आवश्यक है. यह कार्य संप्रेषण के बिना संपन्न नहीं हो सकता. संप्रेषण से यहाँ हमारा अभिप्राय वार्तालाप से आगे बढ़कर शिक्षा, इतिहास और संस्कृति की अपनी-अपनी जानकारी का आदान-प्रदान करने से है. जो एक का है, इस आदान-प्रदान के द्वारा ही वह सबका हो सकता है, साझा हो सकता है. विश्वशांति के लिए समझदारी से अगला चरण है साझेदारी. इसी से संप्रेषण पूरा होगा. इस क्षेत्र में हिंदी की महती भूमिका संभावित है. हिंदी की शिक्षा जहाँ हिंदीभाषी अपनी मातृभाषा के रूप में ग्रहण करते हैं, अन्य भारतीय भाषाभाषी देश में अबाध संचरण और व्यवसाय की दृष्टि से ग्रहण करते हैं वहीं प्रायः यह देखा गया है कि विदेशी छात्र हिंदी की शिक्षा भारत की परंपराओं, धर्म, संस्कृति, इतिहास और राजनीति के मर्म को आत्मसात करने के लिए ग्रहण करते हैं. विदेशी छात्रों को भारतीय परंपरा और भारतीय सोच की शिक्षा देने के लिए हिंदी सर्वोत्तम विकल्प है. इस उद्देश्य से अनेक विदेशी छात्र हर वर्ष भारत आते हैं और अनेक हिंदी अध्यापक दुनिया के अलग-अलग देशों में जाते हैं. हिंदी के ऐसे छात्र और अध्यापक एक-दूसरे के इतिहास और संस्कृति में रुचि दर्शाते हैं और विश्व की प्राचीनतम संस्कृति के रूप में भारत का परिचय लेते-देते हैं. भारत विषयक जिज्ञासा ही ऐसे शैक्षणिक कार्यक्रमों का केंद्रबिंदु है. हिंदी से रोजगार पाना ऐसे जिज्ञासुओं का मुख्य उद्देश्य नहीं होता. इस प्रकार की शैक्षणिक योजनाओं में हमें दुनिया के अधिक से अधिक देशों को शामिल करना होगा. भारत के इतिहास और दर्शन को अगर विश्व के अधिकाधिक देशों के छात्र पढ़ेंगे तो उनकी भारत के संबंध में तो समझ बढ़ेगी ही, पारस्परिक समझ भी बढ़ेगी. और इसमें कोई दो राय नहीं कि पारस्परिक समझ बढ़ने से ही हम विश्वशांति की ओर बढ़ते हैं. परस्पर समझ हमें विविधताओं के बावजूद परस्पर समीप लाएगी और इस समझ पर आधारित परस्पर समीपता से जो संबंध बनेंगे वे विश्वशांति की नींव को सुदृढ़ कर सकते हैं. अभिप्राय यह है कि हिंदी जैसी व्यापक परिप्रेक्ष्य वाली भाषा के माध्यम से विश्वशांति की पुष्टि कोई वायवीय कल्पना नहीं है, बल्कि ठोस संभावना है. इस संभावना का आधार यूनेस्को की भाषिक नीति के अंतर्गत स्वीकृत यह मान्यता है कि भाषा शिक्षक वस्तुतः शांति के प्रशिक्षक होते हैं. यदि हमें युद्ध की संस्कृति के स्थान पर शांति की संस्कृति को लाना है तो सबसे पहले विभिन्न राष्ट्रों और भाषाओं के नागरिकों की मानसिकता में परिवर्तन लाना होगा ताकि वे यह कह सकें कि ‘मैं उन लोगों को समझ सकता हूँ जो मेरे जैसे नहीं हैं.’ दूसरे स्तर पर अभिवृत्ति में बदलाव लाना होगा ताकि वे कह सकें कि ‘मैं उन लोगों का भी मित्र और सहचर हो सकता हूँ जो मुझसे भिन्न मानव समुदाय से आते हैं.’ यह कार्य भाषा अध्यापक के माध्यम से ही संभव है. यदि यह कार्य न किया जाए तो भाषा मनुष्यों को बाँटने और तोड़ने का अत्यंत घातक हथियार बन जाती है जिसका आधार हठवाद और अज्ञान है. सब प्रकार के भाषिक हठवाद और अज्ञान से मुक्त करके हिंदी अपने छात्र को विश्वनागरिक बनने का संस्कार दे सकती है. 

यह बात भी ध्यान रखने जैसी है कि विश्वशांति ऐसी कोई वस्तु नहीं है कि सारे देश दौड़ लगाकर उस तक पहुँच जाएँ. विश्व में शांति तो तब होगी जब विश्व के अलग-अलग तमाम क्षेत्रों में शांति होगी. अर्थात क्षेत्रीय शांति ही विश्वशांति का पुख्ता आधार है. हिंदी को विश्वशांति का वाहक बनने से पहले क्षेत्रीय शांति के वाहक के रूप में अपनी योग्यता सिद्ध करनी है. अर्थात आज आवश्यकता इस बात की है कि पहले तो संपूर्ण भारत में क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों और निहित स्वार्थों की राजनीति को ध्वस्त करते हुए हिंदी एकात्मता, सह-अस्तित्व, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो; इसके बाद दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों के बीच सहयोग और शांति की स्थापना करे. यदि ऐसा हो पाता है तो इसी मॉडल का विस्तार आगे हो सकता है – पहले एशिया की शांति और फिर विश्वशांति की ओर. 

हिंदी की एक साहित्यिक भूमिका भी है. इसके सहारे भी हम विश्वशांति की ओर बढ़ सकते हैं. हिंदी में वासियों और प्रवासियों द्वारा बड़ी मात्रा में साहित्य सृजन हो रहा है. इसके अलावा बड़ी बात यह है कि हिंदी में पूरी दुनिया से साहित्य अनुवाद के माध्यम से आ रहा है जो हिंदी के पाठक की विश्व और वैश्विक साहित्य की समझ का विस्तार करता है. लेकिन अभी हिंदी से दुनिया के अन्य देशों और उनकी भाषाओं में कम चीजें जा रही हैं. अन्य देशों में हिंदी के पाठक और अनुवादक अपेक्षाकृत कम हैं. यदि यह आवाजाही बढ़ाई जा सके और प्राचीन तथा आधुनिक भारतीय साहित्य को अन्य देशों और उनकी भाषाओं में पहुँचाया जा सके तो इसका दूरगामी प्रभाव यह होगा कि भारतीय साहित्य में निहित सत्य, प्रेम, अहिंसा, करुणा और शांति जैसे मूल्यों के प्रति उन देशों में जिज्ञासा और समझ बढ़ेगी. साथ ही इन उदात्त मानवीय मूल्यों की ग्रहणशीलता भी बढ़ेगी. इस तरह हिंदी का यह साहित्य अपने मौलिक और अनूदित दोनों ही रूपों में विश्व बिरादरी को जोड़ने की भूमिका अदा कर सकता है. कहना न होगा कि इसी माध्यम से बुद्ध, महावीर और गांधी जैसे शांतिदूतों का संदेश पहले भी दुनिया में गया है, आज भी जा रहा है और भविष्य में भी जाता रहेगा. 

अंत में, एक और छोटी-सी बात जो बहुत बड़ी भी हो सकती है यह है कि यदि हिंदी के माध्यम से विश्व की विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, उपलब्धियों और साहित्यिक कृतियों का तुलनात्मक अध्ययन करने की दिशा में कुछ ठोस प्रयास किए जाएँ तो यह भाषा विश्व के विभिन्न मानव समुदायों और उनकी विश्वदृष्टि को समझने का सुदृढ़ बौद्धिक आधार प्रदान कर सकती है. यह समझ ही विश्वमानव को विश्वशांति की ओर ले जाएगी. 

- ऋषभदेव शर्मा 

बुधवार, 6 जुलाई 2016

भूमिका : मलयालम कवि सेबास्टियन की कविताएँ

अदृश्य तंबुओं की खोज में (सेबास्टियन की चुनिंदा कविताएँ)

भूमिका

अग्रणी समकालीन मलयालम कवि सेबास्टियन व्यापक सरोकारों और गहरे सौंदर्यबोध के कवि हैं. उनकी कविताओं से गुजरने पर मलयालम कविता का उत्तरआधुनिक चेहरा सहज ही उभरकर सामने आ जाता है. वस्तु विन्यास से लेकर अभिव्यंजना शिल्प तक एक खास तरह की विरलता उन्हें दूसरों से अलग व्यक्तित्व प्रदान करती है. 

एक ऐसे समय में जब आदमी के हाथ से आदमीयत छूटी जा रही है और जीवन मूल्य मुट्ठी में बंद रेत की तरह रिसते जा रहे हैं, सेबास्टियन आम आदमी की ‘सफरिंग’ का पाठ रचते हैं. एक ऐसे समय में जब सब ओर से हमला करता हुआ बाजार भावनाओं के संसार को निगलने में व्यस्त है, सेबास्टियन की कविताएँ राहत देती हैं क्योंकि वे खाँटी संवेदनाओं को शब्दबद्ध करती हैं. आज जब हम एक ऐसे ठंडे संसार में जीने को विवश हैं जिसमें बड़ी से बड़ी दुर्घटनाएँ भी सनसनीखेज समाचार से अधिक महत्व नहीं रखतीं – जिनका श्रोता समाज न तो विचलित होता है, न बौखलाता है, न गुस्साता है; ऐसे वक्त में सेबास्टियन का कवि-मन छोटी-छोटी चीजों से द्रवित हो जाता है, साधारण दीखने वाली घटनाओं से विचलित हो उठता है और दैनिक जीवन की जड़ताओं से असंतुष्ट होकर, असहमत होकर, कभी व्यंग्य करता है तो कभी अपनी समानांतर दुनिया खड़ी करता है – फैंटसी की दुनिया. इस कवि के लिए काव्य सृजन कुएँ की तह में डुबकी लगाकर अभिव्यक्ति की तलाश करने जैसा है – ‘आकाश में/ एक कुंआ प्रकट हुआ/ धरती से इसका पानी/ नीला नजर आया/ बाल्टी और रस्सी के/ नीचे उतरने पर/ गरारी ने आवाज की/ आश्चर्य की बात है/ मैंने रस्सी को पकड़/ जल्दबाजी में खींचा/ कुएँ की तह में पड़ी/ कविता बाहर निकली...’ 

यदि यह कहा जाए कि सेबास्टियन का काव्य संसार दैनिक सामान्य जीवन से उठाए गए बिंबों का संसार है, तो अनुचित न होगा. वे एक ऐसे काव्यशिल्पी हैं जिन्हें ‘परिचित’ चीजों के नए संयोजन द्वारा ‘अद्भुत’ की सृष्टि करने में महारत हासिल है. इस कविता संग्रह की शीर्षक पंक्ति ‘अदृश्य तंबुओं की खोज में’ जिस कविता से ली गई है वह भी इस तथ्य को प्रमाणित करती है. ‘भूख’ शीर्षक यह कविता सीधे-सीधे भूख को संबोधित है – ‘भूख!/ तेरा घर व पता/ मुझे नहीं मालूम.’ और इस न-मालूम होने का कारण है आख्याता की वह संपन्नता जिसके कारण वह दिन में तीन-तीन बार खाकर अघा चुका है. ऐसा व्यक्ति भूख और उसकी यातना से भला कैसे परिचित हो सकता है! लेकिन सूखे और अभाव के दिनों में जब उसका साक्षात्कार मृत्यु की ओर अग्रसर उन गरीबों से होता है जो किन्हीं अदृश्य तंबुओं की खोज में निकले हुए हैं तो उसके स्मृतिकोश से गरीबी और भूख के वे अनुभव सहसा बाहर आकर साधारणीकृत होते हैं जिन्हें भोगते हुए कभी साधनहीनता के बीच उसके दादा की मृत्यु हुई थी. इस प्रकार यह कविता ध्वनित करती है कि संपन्नता शाश्वत नहीं है, उसके पीछे भी विपन्नता का इतिहास है. यदि यह इतिहास याद रहे तो भूख से परिचय बना रह सकता है. इस प्रकार अपरिचय से आरंभ हुई कविता परिचय के साथ समाप्त होती है. लकड़ी के ढेर में दीमक-खाया दिवंगत दादा का चित्र इस परिचय का माध्यम बनता है – ‘वहाँ मैंने अनजाने में/ तेरा घर व पता/ पा लिया.’

इसी प्रकार - घिसी हुई चप्पल सीता हुआ मोची, शवपेटिका में लिटाई जाती हुई माँ को पहली बार जूता पहनाते हुए रिश्तेदार, केरल का नीली नसों वाला मानचित्र देखता हुआ बेटा, हथेली में खेती करने वाला किसान, खेत में गूँजती हुई सारस और मेंढक की आवाजें, रेल यात्रा में तीव्र गति से परिवर्तित होता हुआ बाहर का परिदृश्य, सूने घर की दीवार पर टंगा किसान का फटा हुआ चित्र, चट्टान पर बैठ पानी पीता एक छोटा मेंढक, चारों ओर से पानी की दीवारों के बंदीगृह में कैद व्यक्ति, वेश बदलकर साँप बनता हुआ प्रेमी, एक दूसरे को ढूँढ़ते हुए घर और गृहस्वामी, रास्ते में पाँव रखते ही बनते हुए गड्ढे और हर गड्ढे से बाहर निकलती काली बिल्ली, बाण की नोक से सिली जाती हुई फटी धरती, सीमेंट की बेंच पर बैठे हुए स्त्री और पुरुष, जाल में फँसी नदी को सुखाता मछुआरा, धूप में लाल झंडे सी बहती नदी, खिड़की के काँच पर दस्तक देता बारिश का मौसम, प्रतीक्षा में क्रमशः पेड़ में तब्दील होता हुआ व्यक्ति, रात भर गीले मैले कपड़े से थोडा-थोडा कर अंधेरे को पोंछता हुआ मनुष्य, सात भागों में फैली हुई इंद्रधनुष की स्याही, गले में अटका शब्द का काँटा और उससे घायल होता हुआ गला – ये सेबास्टियन की इन कविताओं में निर्मित कुछ बिंब हैं. इन्हें एक नजर देख लेने भर से कवि के विस्तृत अनुभव जगत और उतने ही विराट कल्पना संसार के वैभव का सहज ही अनुमान किया जा सकता है. 

यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि सेबास्टियन की कविताओं में यथार्थ का पर्याप्त आग्रह दिखाई देता है. इस आग्रह के कारण ही उनकी प्रेम कविताएँ भी पर्याप्त ठोस प्रतीत होती हैं. कुछ स्थलों पर रहस्य और अध्यात्म के संस्पर्श के साथ सेबास्टियन की प्रेम कविताएँ यथार्थमूलक फैंटेसी के रूप में मूर्त होती हैं. कवि जब प्रेमिका की दिगंबर देह का शब्दचित्र बनाने को उद्यत होता है तो चिड़िया, हवा, मेघ, नारियल का पेड़ और बारिश मिलकर अंगडाई ले रहे स्वयं उसके शरीर पर प्रेमिका के शरीर के सौंदर्य और गंध को लिख डालते हैं. (शरीर पर लेखन). कवि को विश्वास है कि नदी की खामोशी, लहरों के रुदन और धूप की प्रतीक्षा में सुबह की बेला में प्रेम जागेगा. (निर्मलता). यह ठीक है कि प्यार के दिनों की किताबें दीमक ने चाट ली हैं, फिर भी कभी न कभी तो दीमक ‘मैं’ नामक पुस्तक को पढ़ेगी. (आठ प्रेम कविताएँ). यह प्रेम कविता को एक ऐसी पारदर्शी कमीज बना देता है जिसके पार से सच्चाई झलकती है – ‘कविता भी एक कमीज है/ पारदर्शी/ हर कोई इसे पहन नहीं सकता/ कुलीन पहनेंगे तो/ इनकी नग्नता दिखायी देगी.’ (आठ प्रेम कविताएँ). 

सेबास्टियन की कविता में केरल केवल समुद्र, मछली और बारिश के ही रूप में नहीं आया है बल्कि आज के आदमी की इस विवशता के रूप में भी आया है कि – ‘सागर की रेलगाड़ी गुजर रही है/ मेरे पास काँटा नहीं है/ इसलिए मैंने खुद को उसमें लटका कर/ खिड़की से बाहर फेंका जोर से...’ (मत्स्यन). ‘ग्लोबल’ के दबाव में लुप्त होते ‘लोकल’ के प्रति कवि विशेष रूप से चिंतित हैं – ‘सब कुछ हटा दिया/ लेकिन चिमनियाँ बाकी हैं/ *** / हर दिन तीन बार काली चिमनियों में घुसकर/ दीवारों पर जीभ से चाटकर/ सारे गुणों का अनुभव करें/ कोई भी राज्य पेटेंट के लिए न आए/ स्थानीय लोग व रिश्तेदार इसमें शामिल न हो.’ (चिकित्सार्थ). अभिप्राय यह है कि बाजारीकरण के इस दौर में केरल की अपनी स्थानीय रंगत लुप्त होने के कगार पर है. प्रकृति और संस्कृति दोनों पर ही मंडराते हुए खतरे से आगाह करता हुआ कवि कहता है – ‘आंगन में/ कोई नहीं है/ फूलों के पेड़ नहीं है/ न कुंआ है/ न भरा हुआ/ पानी का घड़ा/ न/ नन्हों का पदचिह्न/ न लोरी/ दृष्टि के उस पार/ कुछ भी नहीं है/ आंगन में साफ़ जमीन है/ जिसमें से सब कुछ/ अलग कर दिया गया...’ (आंगन). 

कवि सेबास्टियन की इन समर्थ और सुंदर कविताओं से हिंदी जगत को परिचित कराने का श्रेय इनके अनुवादक डॉ. संतोष अलेक्स को जाता है. डॉ. संतोष अलेक्स की मातृभाषा मलयालम है और उन्हें हिंदी, अंग्रेजी और तेलुगु पर भी इतना अधिकार प्राप्त है कि वे निरंतर इन सब भाषाओं में मौलिक सृजन और अनुवादकर्म करते आ रहे हैं. मैं उनके द्वारा अनूदित इन मलयालम कविताओं के प्रकाशन पर उन्हें और मूल कवि सेबास्टियन को हार्दिक बधाई देता हूँ. 

4 जुलाई, 2016                                                                                                         - ऋषभदेव शर्मा

बुधवार, 15 जून 2016

संपादकीय : 'वृद्धावस्था विमर्श' (चंद्रमौलेश्वर प्रसाद) : नहि नहि रक्षति डुकृञ करणे

नहि नहि रक्षति डुकृञ करणे

अस्तित्ववादी दार्शनिक सिमोन द बुआ (9 जनवरी, 1908 -14 अप्रैल, 1986) को स्त्री-विमर्शकार के रूप में विशेष ख्याति प्राप्त है। उन्होंने उपन्यास, निबंध, जीवनी, आत्मकथा और व्यक्तिचित्र आदि विधाओं में दार्शनिक, राजनैतिक और सामाजिक विमर्शमूलक प्रभूत लेखन किया। 1949 में प्रकाशित ‘द सेकंड सेक्स’ (स्त्री : उपेक्षिता) ने उन्हें वैश्विक स्त्री मुक्ति आंदोलन का पुरोधा बना दिया। इस कृति के प्रभामंडल ने उनके शेष कृतित्व को मानो अंतर्धान कर रखा है। अन्यथा 1970 में प्रकाशित उनकी शोधपूर्ण कृति ‘ला विएलेस्से’ (फ्रेंच) भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ‘ला विएलेस्से’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘ओल्ड एज’ 1977 में आया। यह कृति वस्तुतः सिमोन की भविष्योन्मुखी विश्वदृष्टि का प्रमाण है और ‘वृद्धावस्था विमर्श’ की गीता है। इसके प्रकाशित होते ही दार्शनिक और सामाजिक हलकों में ‘वृद्धावस्था’ पर सर्वथा नई दृष्टि से बहस छिड़ गई। यह भी कहा जाता है कि सिमोन द बुआ के लेखन में आयु और लिंग विषयक विमर्श परस्पर संबंधित हैं। अथवा ‘सेकंड सेक्स’ और ‘ओल्ड एज’ ऊपर से भिन्न प्रतीत होते हुए भी मूलतः सिमोन के अस्तित्ववादी चिंतन के दो परस्पर गुंथे हुए आयाम हैं जिनका संबंध क्रमशः ‘स्त्री’ और ‘वृद्ध’ को परिवार और समाज की प्राथमिक नागरिकता से वंचित रखने के षड्यंत्र के प्रत्याख्यान से है जबकि ये दोनों ही समाज के अस्तित्व की धुरी हैं। इन दोनों कृतियों के माध्यम से सिमोन ने क्रमशः स्त्री और वृद्ध से जुड़े मिथों की शल्य परीक्षा की है क्योंकि इन मिथों के कारण ही आज भी बड़ी सीमा तक स्त्री और वृद्ध सामाजिक पराएपन के शिकार हैं।
सिमोन ने विश्व भर के विभिन्न समाजों में वृद्धावस्था से संबंधित रूढ़ियों और वृद्धों की दशा तथा उनके प्रति व्यवहार का अलग-अलग दृष्टियों से अध्ययन किया। उन्होंने यह भी देखा कि इन ‘वरिष्ठ नागरिकों’ की शारीरिक और मानसिक क्षमताओं तथा इच्छाओँ, आकांक्षाओं और सपनों की दशा और दिशा क्या होती है। दरअसल वरिष्ठ नागरिकों अथवा वृद्धों के संबंध में समाज का चरित्र व्यापक स्तर पर दोगलेपन का शिकार रहा है। एक ओर तो नित्य उनका आशीर्वाद लेने की बात की जाती है तथा दूसरी ओर उन्हें बोझ समझा जाता है। समाज, साहित्य और संस्कृति में सदा उपस्थित रहने के बावजूद वृद्धों की अवस्थिति केंद्र की अपेक्षा परिधि पर ही अधिक रही है। बुढ़ापा आने का अर्थ ही है व्यक्ति का केंद्र से उखड़कर परिधि की ओर जाने के लिए विवश होना। केंद्र से अपदस्थ होते ही व्यक्ति समाज की उपेक्षा का पात्र बन जाता है और यदि उसका सही ‘पुनर्वास’ न हो तो उसे अपना अस्तित्व ही अभिशाप लगने लगता है। इस प्रकार परिधि पर धकेले गए एक समुदाय के रूप में वृद्ध समुदाय दुनिया का बहुत बड़ा उपेक्षित जन समुदाय है जिसकी जनसंख्या में 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में तीव्रता से वृद्धि हुई है और 21वीं शताब्दी में और भी वृद्धि सुनिश्चित है क्योंकि इधर जन्म दर और मृत्यु दर दोनों ही घट रही हैं तथा चिकित्सा विज्ञान ने आदमी की औसत आयु बढ़ा दी है। वृद्धावस्था विमर्श इस उपेक्षित समुदाय की दृष्टि से - अथवा वृद्धावस्था को केंद्र में रखते हुए – समाज, साहित्य और संस्कृति की नई व्याख्या करने वाला विमर्श है। वृद्ध होने पर वानप्रस्थ और संन्यास की व्यवस्था की पुनर्व्याख्या की आज बड़ी जरूरत है ताकि वरिष्ठ नागरिकों के समुदाय को अपना अस्तित्व अनुपयोगी और अभिशाप प्रतीत न हो। वृद्धावस्था विमर्श वस्तुतः सामाजिक संबंधों को इन बदली हुई परिस्थितियों में नए ढंग से समझने की जरूरत पर बल देता है। शारीरिक अशक्यता, मानसिक समस्याएँ, परनिर्भरता, मूल्य परिवर्तन, आर्थिक संकोच, जीवनसाथी की मृत्यु, निराश्रित होने की आशंका, भविष्य की अनिश्चितता, संबंधों की निरर्थकता का बोध, राग-विराग का द्वंद्व, पराएपन और अलगाव की स्थिति, बचपन और युवावस्था की यादों से जुड़ा अतीत प्रेम, काम और क्रोध जैसी वृत्तियों का उदात्तीकरण न कर पाने से जुड़ी समस्याएँ और आध्यात्मिक विभ्रम जैसे अनेक पक्ष वृद्धावस्था विमर्श के विचारणीय बिंदु हैं।
दरअसल सिमोन द बुआ की अंतश्चेतना में कहीं-न-कहीं वृद्धावस्था और मृत्यु से जुड़े हुए प्रश्न बराबर उपस्थित थे। यही कारण है कि वे अपने सृजन और चिंतन दोनों में अस्तित्व की नश्वरता पर विचार करती दिखाई देती हैं। 1946 में आए अपने उपन्यास ‘ऑल मेन आर मोर्टल’ में उन्होंने फोस्का नामक अपने कथानायक की अमर होने की इच्छा के माध्यम से मनुष्य की नश्वरता और मरणशीलता की अनिवार्यता पर अस्तित्ववादी नजरिए से विचार किया। इसके बाद 1964 में ‘ए वेरी ईजी डेथ’ में उन्होंने मरने की प्रक्रिया का खुलासा तो जोर देकर किया ही, अपनी माँ की मृत्यु का भी चित्रण किया। ‘ओल्ड एज’ (1970) में तो यह विषय उठाया ही गया है – वृद्धावस्था मृत्यु की तैयारी का समय है! यही नहीं 1981 में अपने संस्मरण लिखते हुए भी उन्होंने ज्याँ पाल सार्त्र के अंतिम दस वर्षों का जो यथार्थ अंकन किया है उसमें उनकी बीमारी, दैहिक क्षरण और वृद्धावस्था का वर्णन शामिल है। अभिप्राय यह है कि सिमोन ने वृद्धावस्था पर केवल सैद्धांतिक चिंतन नहीं किया बल्कि अनुभूति के गहन धरातल पर उन्होंने उसे लंबे समय तक जिया भी। किसी को भले ही अविश्वसनीय और विस्मयकारी लगे मगर यह सच है कि मात्र 36 वर्ष की आयु में युवती सिमोन द बुआ ने अपने आपको वृद्ध होते महसूसना शुरू कर दिया था। इतना ही नहीं इस संवेनशील विदुषी ने 13 वर्ष की आयु से ही यह महसूस करना शुरू कर दिया था कि ‘समय गुजर रहा है’। काल की सापेक्षता में आयु का गुजरना महसूस करने के कारण ही वे अस्तित्व विषयक दर्शन की ओर मुड़ीं। बुढ़ापा शारीरिक है या मानसिक अथवा दोनों – मनोदैहिक? यह प्रश्न अपनी जगह है। लेकिन यह सच है कि मृत्यु और बुढ़ापे का साक्षात्कार मनुष्य को किसी भी आयु में नचिकेता, विदेह और तथागत बनाने के लिए पर्याप्त है। उसी ने सिमोन को सिमोन बनाया।
हमारे यहाँ यों तो वृद्धावस्था से जुड़े प्रश्नों पर विचार की पुरानी परंपरा रही है लेकिन इस अवस्था से जुड़ी समस्या का जो रूप आज हमारे सामने है वह पहले कभी ऐसा न था। भारत में जरा-चिकित्सा (जेरियाट्रिक्स) के अध्ययन का इतिहास अभी आरंभिक अवस्था में है। अध्येता वार्धक्य और आयु संबंधी समस्याओं के पहलुओं को आधुनिक, उत्तरआधुनिक, स्त्रीवादी, राजनैतिक और आर्थिक दृष्टियों से समझने-समझाने की कोशिश कर रहे हैं। आज हमारी चिंता का विषय विशाल वृद्ध जन समुदाय के जीवन को सुखमय बनाने से संबंधित है – चाहे वे पुरुष हों या स्त्री। यही कारण है कि वृद्धावस्था से जुड़े सेवामुक्ति से लेकर वृद्धाश्रम तक के, अथवा देह से लेकर आयु तक के क्षीण होने के, मुद्दे चिंतन और सृजन के विविध मंचों पर छाए हुए हैं। यदि यह कहा जाए कि आज का मनुष्य बुढ़ापे और मौत से कुछ ज्यादा ही आतंकित है तो भी शायद गलत न होगा।
सिमोन द बुआ कृत ‘ओल्ड एज’ को पहली बार देखने-पढ़ने का मौक़ा मुझे 2010 में मिला और मैं दीवानों की तरह अपने सब दोस्तों से इस किताब का जिक्र करने लगा। मेरे अभिभावकतुल्य वरिष्ठ मित्र श्री चंद्रमौलेश्वर प्रसाद (7 अप्रैल, 1942 - 13 सितंबर, 2012) ने मेरी यह दीवानगी देखी तो ‘ओल्ड एज’ उठा ले गए। उन दिनों वे ब्लॉग लेखन की दुनिया में बहुत सक्रिय थे। मुझसे चर्चा करने के बाद उन्होंने अपने ब्लॉग ‘कलम’ (cmpershad.blogspot.in) पर उस पुस्तक का सार-संक्षेप लिखना आरंभ किया। इस सार-संक्षेप की पहली किस्त 18 अगस्त, 2010 को तथा अंतिम (दसवीं) किस्त 30 दिसंबर, 2010 को प्रकाशित हुई। ‘कलम’ ब्लॉग के पाठकों ने इसे बहुत पसंद किया; सराहा। अभी हम लोग इसे पुस्तकाकार प्रकाशित करने की योजना बना ही रहे थे कि काल ने अकाल ही चंद्रमौलेश्वर जी को हमसे छीन लिया!
इस पुस्तक को कई वर्ष पूर्व प्रकाशित हो जाना था, पर यह अब आ पा रही है। इसके लिए मेरा प्रमाद ही उत्तरदायी है। अब भी यदि श्री अमन कुमार त्यागी (परिलेख प्रकाशन) और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने न जगाया होता, तो मैं तो सोता ही रहता।
सिमोन की तो हम नहीं जानते, लेकिन चंद्रमौलेश्वर प्रसाद आत्मा की अमरता में विश्वास रखते थे। यह पुस्तक – उनकी अपनी पुस्तक – श्रद्धांजलि के रूप में उन्हें समर्पित है।
1 जनवरी, 2016                                                           
                                              -  ऋषभदेव शर्मा