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बुधवार, 30 नवंबर 2016

तेलुगु ग्राम-जीवन की कहानियाँ

भूमिका 


भारत की विविध भाषाओँ में अनेक रचनाकार विविध विधाओं में साहित्य सृजन करते हुए इस महादेश की साझा सांस्कृतिक विरासत को सहेजते और अगली पीढ़ियों को हस्तांतरित करने का कार्य करते रहते हैं. इनमें से केवल कुछ को भाषा और साहित्य के गढ़ों और मठों का सान्निध्य मिल पाता है और उनके कार्य को व्यापक पहचान मिल जाती है. लेकिन अन्य बहुत सारे रचनाकार प्रकाशन-सरणियों से अपरिचित होने के कारण अपने छोटे से संप्रेषण-क्षेत्रों तक सीमित रहकर सेवा भाव से लिखते और संतुष्ट रहते हैं. सही अर्थ में ऐसे रचनाकार प्रायः लोकाश्रयी होते हैं और लोक के जीवन को लाग-लपेट के बिना अभिव्यक्त करते हैं. तेलुगु से हिंदी में अनूदित इस कथा-संग्रह के लेखक नरसिम्हा राजु और अनुवादक वेत्सा पांडुरंगा राव, दोनों ही, इसी कोटि के रचनाकार हैं. 

कहानीकार नरसिम्हा राजु इस समय 78 वर्ष के हैं. वे लंबे समय तक ओरिएंटल कॉलेज, एलुरु [आंध्र प्रदेश] के प्राचार्य पद पर आसीन रहे. अपने सेवाकाल में तथा सेवामुक्ति के उपरांत उन्होंने तेलुगु में कुछ कहानियों की रचना की. उनमें से छह कहानियों का हिंदी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है. अनुवादक वेत्सा पांडुरंगा राव यों तो 40 वर्ष एलुरु [आंध्र प्रदेश] में ग्रामीण सहकारी बैंक की सेवा में रहे, लेकिन दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के प्रमाणित प्रचारक और उनके एक संगठन ‘हिंदी प्रचार रुचिकर्म प्रमाणित प्रचारक’ के अध्यक्ष के रूप में निरंतर हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में भी लगे रहे. उनकी हिंदी-निष्ठा का इससे सहज अनुमान किया जा सकता है कि आज 79 वर्ष की आयु में भी उन्होंने अनथक श्रम करके यह अनुवाद तैयार किया है ताकि हिंदी के पाठक गढ़ों और मठों से दूर स्थित एक मौन साहित्य-साधक के रचनाकर्म से परिचित हो सकें.

नरसिम्हा राजु की ये तेलुगु कहानियाँ इस अर्थ में विशेष मानी जा सकती हैं कि इनमें प्रस्तुत तेलुगु लोक जीवन लेखक का जिया और भोगा हुआ, अतः पूर्णतः विश्वसनीय और प्रामाणिक, है. इनका रचनाकाल लगभग तीन दशकों तक फैला है और इन्हें इस कालावधि में आंध्र-जीवन में उपस्थित हुए बदलावों के संदर्भ में भी देखा जा सकता है. आंध्र लोक की सुंदरता और सहजता को अभिव्यंजित करने के साथ-साथ लेखक ने उसकी कुरूप होती शक्ल को भी उघाड़कर सामने रखा है. 

इन कहानियों का परिवेश अधिकतर ग्रामीण है. लेखक को गाँवों से प्यार है. उनका मन बार-बार गाँव की ओर जाना चाहता है. जाता भी है; लेकिन सब कुछ बदला-बदला देखकर अपने पूर्व-परिचित, अतीत के अथवा बचपन के गाँव को खोजने लगता है. यही कारण है कि ये कहानियाँ अनेक स्थलों पर पूर्वदीप्ति शैली और गर्भकथा सुनाने की तकनीक को अपनाती दिखाई देती हैं. लोक संस्कृति में ग्रामदेवता की आराधना, लोकगाथाओं, लोककथाओं, लोकगीतों और लोकशैलियों के जो प्रसंग इन कहानियों में गूँथे गए हैं, उनसे हिंदी पाठक तेलुगु लोक के बारे में जानकारी तो प्राप्त करता ही है, उसके मन में इस भाषा-समाज के विश्वासों और अनुष्ठानों के बारे में नई जिज्ञासाएँ भी करवटें बदलती हैं. यह चिता केवल तेलुगु समाज की ही नहीं है बल्कि पूरे देश की है कि मनुष्य और मनुष्य के बीच सहज संबंध टूट रहे हैं और व्यावसायिक तथा औपचारिक रिश्ते भर बचे रह गए हैं. लेखक ने ध्यान दिलाया है कि पारंपरिक समाज में धर्म और जाति की मर्यादाओं के बावजूद जाति-द्वेष नहीं था जबकि वर्तमान परिदृश्य इसके एकदम उलट है. 

इस संग्रह की कहानियों में आपको लेखक की मूल्य-चिंता बार-बार झकझोरेगी. ग्रामीण स्वभाव की निश्छलता, कर्म सिद्धांत में विश्वास, नगण्य व्यक्ति का बलिदान, तथाकथित भद्रजन की स्वार्थपरता और क्रूरता, ग्रामीण पंचायत का न्याय, गम होता हुआ बचपन, शिक्षा और परीक्षा तंत्र की हृदयहीनता, संवेदनशील व्यक्ति की सहृदयता, आंचलिक भूगोल और प्राकृतिक पर्यावरण, बाल मनोविज्ञान, ग्रामाधिकारी की निरंकुशता, बाढ़ की विनाशक विकरालता, निर्धन का स्वाभिमान, पौराणिक प्रसंग, लोभ जनित भष्टाचार और संयोग की संभावना इन कहानियों में कहीं आधिकारिक तो कहीं प्रासंगिक कथासूत्रों के रूप में विद्यमान हैं. 

सभी कहानियाँ रोचक और पठनीय बन पडी हैं. साथ ही, लोक शब्दावली, लोकोक्तियों और मुहावरों का समावेश इस पुस्तक की रोचकता और पठनीयता बढ़ाने में विशेष भूमिका निभाता है. अनुवादक ने नामों के अलावा भी तेलुगु के बहुत से सांस्कृतिक शब्दों को ज्यों का त्यों रखते हुए उनका अर्थ भी साथ में सूचित किया है. जैसे - मदुरु दीवार [ताड़ के पत्तों से बनी छप्परदार ऊँची दीवार, गाजुल मुसलय्या [कंगन बूढा], मुसलम्मा [बुढ़िया], गोल्लसुद्दलु [ग्वालों के लोकगीत], रागाल सत्ति [गानेवाला सत्ति], गुंडिगा [पीतल का बड़ा बरतन]. निश्चय ही, इससे हिंदी पाठक की शब्द-संपदा और समृद्ध होगी, तेलुगु-हिंदी-सेतु और सुदृढ़ होगा तथा हिंदी भारत की सामासिक संस्कृति के अनुरूप नए स्वरूप में ढल सकेगी.

पुस्तक के प्रकाशन के अवसर पर लेखक और अनुवादक को हार्दिक बधाई! 

30 नवंबर, 2016.                                                                                                      ऋषभदेव शर्मा 

[पूर्व आचार्य-अध्यक्ष,
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद]

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