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गुरुवार, 2 मई 2019

(पुस्तक समीक्षा ) संपादकीयम्— भविष्य का आईना, वर्तमान की नज़र


संपादकीयम्— भविष्य का आईना, वर्तमान की नज़र

डा० ऋषभदेव शर्मा ने बहुत स्नेह के साथ अपनी ये पुस्तक लगभग एक महीने पहले भेंट की, लेकिन इसे पढ़ने का अवसर अब मिला। इन दिनों व्यस्तता बहुत रही लेकिन ऐसा नहीं कि इस बीच कुछ पढ़ा ही नहीं। कुछ मिठाई ऐसी होती है जिसे आप स्वाद ले कर खाना चाहते हैं, और यही वजह है कि डा० ऋषभदेव शर्मा की कोई रचना मैं जल्दबाजी में नहीं पढ़ता।
यदि इस किताब की बात करूँ तो सबसे पहले इसके मुख्य पृष्ठ पर अंकित मोर पंख ध्यान आकृष्ट करता है और बरबस ही पौराणिक काल के पाण्डुलिपियों की याद ताज़ा हो उठती है, जिसमें कलम की जगह मोर पंख का इस्तेमाल होता था। जैसा कि इस किताब की भूमिका में आदरणीय योगेन्द्रनाथ मिश्र ने लिखा है कि ‘सामान्यतः संपादकीय एक बार ही पढ़ा जाता है’, लेकिन संपादकीय यदि ऐसे विषयों पर लिखी गई हो जिसका दीर्घकालिक प्रभाव हो, तो फिर ऐसे लेख की उम्र एक दिन की नहीं हो सकती और यदि ये लेख ऐसी तटस्थता और निरपेक्षता से लिखे गए हों कि कलम की स्याही के किसी खास रंग में रंगे होने का भ्रम तक न हो तो फिर ये किसी पौराणिक पाण्डुलिपि की तरह ही संग्रहणीय हो उठती है।
ऋषभदेव शर्मा की विनम्रता और ख़ुद से पहले दूसरों की सुविधा का ख़्याल रखने की कला का लोहा उनके सभी जानने वाले मानते हैं, इस पुस्तक में भी उन्होंने पाठकों की सुविधा के लिए संपादकीय लेखों को आठ खंडों में संकलित किया है। हर लेख के बाद उन्होंने इसके प्रकाशन की तिथि भी दी है जिससे भविष्य में शोधार्थियों को इस लेख की पृष्ठभूमि समझने में सहूलियत होगी।
पहले खंड ‘स्त्री संदर्भ’ के पहले लेख में ही वे डेनिस मुक्केगे और नादिया मुराद को 2018 का नोबेल शांति पुरस्कार दिए जाने पर लेख लिखते हुए, इराक में जन्मी नादिया मुराद पर इस्लामिक स्टेट द्वारा किए गए ज़ुल्मों का विवरण देते हैं। 2014 में इस्लामिक स्टेट द्वारा नादिया के गाँव को घेर कर 600 (यज़ीदी) पुरुषों को मार डाला गया और सभी औरतों और बच्चियों को यौन दासी बना लिया गया। नादिया तब सिर्फ़ 15 साल की थी। औरतों को न मारे जाने पर जब वो लिखते हैं “औरतों को मारने के बजाय ‘भोगना’ अधिक पौरुषपूर्ण (!) होता है न।“ तो ये एक पंक्ति आपको देर तक रोक लेती है और बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है। यही एक अच्छे संपादकीय की पहचान है।
13 अक्तूबर 2018 को ‘मी टू’ विषय पर लिखते हुए जहां एक ओर वे महिलाओं के इस प्रयास की ये कहते हुए सराहना करते हैं कि “आज भी उन्हें अपने इस बोलने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है लेकिन फिर भी अब वे साहस (दुस्साहस?) पूर्वक बोलने लगी हैं और इससे बहुत से चमकीले चेहरों के आवरण उतरने के कारण कुछ न कुछ असहजता अवश्य महसूस की जा रही है।“ तो लगे हाथ वे महिलाओं को नसीहत देते हुए कहते हैं “स्त्री-देह को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करने वाली महिलाएं भी समाज में सदा रही हैं। उनकी भी पहचान की जानी चाहिए और ख़ुद को ‘लुभाने वाली वस्तु’ की तरह पेश करने की प्रवृति की भी निंदा की जानी चाहिए।“ और संपादकीय ज़िम्मेदारी का निर्वाह करते हुए लिखते हैं “स्त्री और पुरुष दोनों ही अगर एक दूसरे की किसी भी प्रकार की स्वाभाविक कमजोरी का शोषण करते हैं, तो इसे वांछनीय नहीं माना जा सकता।
मुस्लिम महिलाओं के तीन तलाक का मामला हो या महिलाओं के ख़तना जैसी कुप्रथा, ‘संपादकीयम’ बेबाकी से अपनी राय रखता है। धारा 497 पर डा० शर्मा न्यायालय के आदेश का समर्थन तो करते हैं लेकिन साथ ही ये कहते हुए आगाह करना नहीं भूलते कि ‘अनैतिक संबन्धों की इस वैधानिक स्वीकृति का परिणाम भारत की सामाजिक व्यवस्था के लिए घातक भी हो सकता है।‘ ऐसे मामलों में न्यायालय की सीमा रेखा को रेखांकित करते हुए लिखते हैं कि ‘भले ही न्यायपालिका ने व्यभिचार को वैधता प्रदान कर दी हो, किंतु उसे नैतिकता प्रदान करना उसके वश की बात नहीं।‘ वहीं शबरीमला में महिलाओं के प्रवेश के मामले पर वे पूरी तरह से न्यायालय के फैसले से साथ खड़े नज़र आते है और लिखते हैं “भक्तों पर प्रतिबंध लगाने वाली कोई भी प्रथा उनके आराध्य देव को जड़-रूढ़ियों का बंदी बनाने के समान है। देवता तो लोक का है, उसे लोक से दूर करना हर प्रकार से अनुचित है — लोकद्रोह है।
दूसरा खंड ‘लोकतन्त्र और राजनीति’ संभवतः भविष्य की दृष्टि से सबसे महत्वपूर्ण हो क्योंकि इस खंड में 12 संपादकीय लेखों के माध्यम से डा० शर्मा आज के ज्वलंत मुद्दों पर अपनी राय रखते हैं। सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुंबई में डांस बार को पुनः खोलने की अनुमति देने के बाद 21 जनवरी 2019 के अपने लेख में वे चुभते हुए व्यंग से इस घटना को आज की राजनीति से जोड़ते हैं। उन्होंने लिखा है “चुनावी राजनीति ने देश को डांस बार बना रखने में कोई कोर-कसर तो छोड़ी नहीं है। जिधर देखिए उधर ही डांस चल रहा है। प्रत्यक्ष में तो नेता जनता को रिझाने के लिए नाचते-कूदते दिखाई देते हैं। पर है ये नज़रों का फेर ही। असल में तो वे खुद अपनी धुन और ताल पर जनता को नचा रहे होते हैं। ग्राहक को लगता है कि बार-बाला नाच रही है लेकिन सच में तो वह अपने संकेतों पर ग्राहक को नचा रही होती है।“ इस घटना को सामान्य संपादकीय की तरह न लिख कर जिस तरह से उन्होंने इसे आज की राजनीति से जोड़ते हुए इस पर व्यंग किया है, इसे न सिर्फ पठनीय बनाता है अपितु राजनीति के गिरते स्तर को भी हमारे सामने ला खड़ा करता है। उन्होंने लिखा, सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि डांस बार में सीसीटीवी लगाने की अनिवार्यता नहीं है क्योंकि इससे ‘निजता’ का उल्लंघन होता है तो क्यों न नेताओं के करतूतों की भी रिकॉर्डिंग की इजाजत नहीं होनी चाहिए। बेचारे वोटरों को रिझाने के लिए न जाने क्या-क्या करते हैं और लोग इसे रेकॉर्ड कर उन पर बाद में हमला बोलते हैं। ये उनकी ‘निजता’ का हनन है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बार-बालाओं पर पैसे बरसाए नहीं जा सकते, हाँ उन्हें टिप दिया जा सकता है। नेताओं के लिए भी इसकी अनिवार्यता जताते हुए वो लिखते हैं जनता पर बरसाए पैसे का हिसाब रखने में दिक्कत होती है, तो बेहतर है कि सीधे-सीधे जनता के हाथ में टिप दिए जाएँ ताकि बाद में गला पकड़ने में सहूलियत हो। डांस बार के धार्मिक स्थानों से एक किलोमीटर की दूरी पर होने के नियम को भी सुप्रीम कोर्ट ने हटा दिया तो डा0 शर्मा ‘राजनीति के नचनियों’ के लिए भी ये सुविधा चाहते हैं जहां वे धार्मिक स्थानों और शिक्षण संस्थानों का अपने मतलब के लिए उपयोग कर सकें। वो लिखते हैं “चुनाव नृत्य में धर्म और शिक्षा की जुगलबंदी के बिना मजा ही कहाँ आता है। इसके बिना उन्माद नहीं जागता और उन्माद जगाए बिना चुनाव नृत्य पूरा नहीं हो सकता।“ लेख के अंत में वो लिखते हैं “खूब नाच-गाना हो, शराब बहें, उपहार लिए-दिए जाएँ, उन्माद की वर्षा हो, वशीकरण के लिए यह जरूरी है — बार में भी, और चुनाव में भी।
एक राजनीतिक विश्लेषक द्वारा लिखे गए लेख से राजनीति की जटिलताएँ समझने में शायद मदद मिले लेकिन जब डा0 शर्मा जैसे साहित्यकार इस विषय पर लिखते हैं तो इसकी पठनीयता कई गुणा बढ़ जाती है। 22 दलों के साथ आ कर महागठबंधन बनाने पर वो लिखते हैं “संकल्प के सहारे बड़े-बड़े लक्ष्य प्राप्त किए जाने की कहानियाँ मिलती हैं। पर यह तभी हो पाता है जब समस्याओं के ‘जाल’ में फंसे सारे ‘कबूतर’ एक ही दिशा में उड़ें। इसके लिए एक दिशा में ले जाने वाला ‘मुखिया कबूतर’ भी चाहिए होता है। प्रस्तावित महागठबंधन की सबसे बड़ी कमजोरी यही है कि ‘मुखिया कबूतर’ नदारद है।
रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा “समर शेष है, नहीं पाप का भागी केवल व्याध। जो तटस्थ हैं,समय लिखेगा उनका भी अपराध।“ डा० शर्मा ये अपराध नहीं करते। मुद्दा चाहे कश्मीर का हो, लद्दाख का, आरक्षण का या राजनीति के गिरते स्तर का, सभी विषयों पर डा० शर्मा न सिर्फ वस्तु-स्थिति को सरल भाषा में पाठकों के सामने रखते हैं बल्कि हर मुद्दे पर अपने विचार भी सामने रखते हैं। संपादकीय में अमूमन कविता देखने को नहीं मिलती लेकिन जब संपादकीय लिखने वाले ‘कवि’ ऋषभ देव शर्मा हों तो वे इस बंधन को अपने ऊपर हावी नहीं होने देते। जातिगत राजनीति का दर्द बयान करते हुए वो लिखते हैं
मानचित्र को चीरती, मज़हब की शमशीर
या तो इसको तोड़ दो, या टूटे तस्वीर।
मुहर-महोत्सव हो रहा, पाँच वर्ष के बाद
जाति पूछ कर बंट रही, लोकतन्त्र की खीर।
किसानों की समस्याओं पर आधारित तीसरे खंड में चार लेखों के माध्यम से उन्होंने ‘अन्नदाता से दिल्ली दूर क्यों?’ और ‘आत्महत्याओं का इलाज़ कर्जमाफ़ी नहीं’ जैसे सटीक शीर्षक से लेख लिखे हैं।
‘शहर में दावानल’ नाम से लिखे गए खंड चार में 6 लेखों का संकलन है जिसमें भीड़-तंत्र द्वारा कानून अपने हाथ में लिए जाने पर चिंता व्यक्त की गई है। ‘अब किसके पिता की बारी है?’ शीर्षक, हालात की भयावहता के बारे में सोचने को विवश करता है। इसी विषय पर ‘अब जिसे भी देखिए, उस पर गुलेले हैं।“ शीर्षक से लिखे लेख में उन्होंने अपनी कविता की पंक्तियों को रेखांकित किया है:
ईंट, ढेले, गोलियाँ, पत्थर, गुलेलें हैं
अब जिसे भी देखिए, उस पर गुलेलें हैं
क्या पाता क्या दंड दे, यह आज क़ातिल को
भीड़ पर तलवार हैं, खंजर गुलेलें हैं।
‘ऊपरवाला देख रहा है’ शीर्षक से भारत सरकार द्वारा पारित आदेश जिसमें 10 सरकारी एजेंसियों को अधिकार दिया गया है कि ये किसी भी नागरिक के फोन और कंप्यूटर की निगरानी बिना किसी अतिरिक्त आदेश के कर सकते हैं, पर लेख लिखते हुए उन्होंने लिखा है “इसमें दो राय नहीं कि किसी भी देश की सुरक्षा सर्वोपरि है और उसके समक्ष नागरिकों के व्यक्तिगत अधिकार गौण एवं स्थगित हो जाने चाहिए। लेकिन ऐसा केवल असामान्य स्थिति या आपात स्थिति में ही स्वीकार्य है। साधारण परिस्थितियों में भी यदि नागरिक को यह लगता है कि कोई एक आँख लगातार उसकी हर गतिविधि को ताक-झांक कर देख रही है, तो सरकार का यह अबाध अधिकार नागरिक के लोकतान्त्रिक अधिकार का अतिक्रमण है।“ सनद रहे कि ऐसा कहने वाले डा० शर्मा खुद इंटेलिजेंस ब्यूरो के लंबे समय तक अधिकारी रह चुके हैं।
अगले तीन खंड ‘व्यवस्था का सच’, ‘हमारी बेड़ियाँ’ और ‘अस्तित्व के सवाल’ हैं जिनमें कई समसामयिक विषय जैसे सड़कों की बदहाली, पानी की किल्लत, जातिगत समस्याएँ, बच्चों की सुरक्षा, बुढ़ापे की असुरक्षा और ग्लोबल वार्मिंग पर महत्वपूर्ण लेख संकलित हैं।
अंतिम खंड में उन्होंने ‘वैश्विक संदर्भ’ के नाम से 7 लेख रखे हैं। ये ऐसे विषय हैं जिनमें गंभीरता की आवश्यकता है और डा० शर्मा इनके साथ पूर्ण न्याय करते हैं। इस खंड में वो सिर्फ साहित्यकार न हो कर वैश्विक राजनीति के जानकार के तौर पर नज़र आते हैं और अपने लेखों में अमेरिका, चीन, फ्रांस, संयुक्त राष्ट्र, उत्तर कोरिया जैसे विषयों पर ऐसे लेख लिखे हैं जिनकी उपयोगिता आने वाले समय बढ़ती जाएगी।
महाभारत के युद्ध में जैसे कौरव और पांडव दो पक्ष थे लेकिन संजय ने इस युद्ध का हाल किसी एक पक्ष के तौर पर नहीं सुनाया। संजय ने वो सुनाया जो उन्होंने देखा और समझा। समाचार में भी हर सिक्के के दो पहलू होते हैं। ‘संपादकीयम’ इन दोनों पक्षों को उजागर तो करता ही है, साथ ही संजय की तरह डा० शर्मा इसमें अपने विचार रखकर इन दो पक्षों में एक तीसरा आयाम जोड़ते हैं। इस पुस्तक के विषय ऐसे हैं जिन्हें वर्षों बाद भी इसलिए देखा जाएगा कि अमुक विषय पर डा० शर्मा के विचार क्या थे और क्या उनका आकलन सही निकला। इन मायने में ये पुस्तक निश्चय ही संग्रहणीय है। पुस्तक की बाइंडिंग और बेहतर हो सकती थी। एक बार आद्योपांत पढ़ने से ही यदि किताब से पन्ने, शरीर से आत्मा की तरह निकलने को मचलने लगे तो लंबे समय तक इसकी संग्रहणीयता मुश्किल हो जाएगी।
‘संपादकीयम’ पुस्तक का सही आकलन भविष्य में होगा जब डा० शर्मा के विभिन्न विषयों पर रखे विचार मूर्त रूप लेंगे। इस पुस्तक के लिए उन्हें मेरी बहुत बहुत शुभकामनाएँ इस उम्मीद के साथ कि ‘संपादकीयम’ सिर्फ एक पुस्तक न हो कर इस नाम से एक शृंखला होगी जिसमें ऐसे कई महत्वपूर्ण लेख संग्रहीत किए जाएंगे।

गुरुवार, 4 अप्रैल 2019

(पुस्तक समीक्षा) ‘संपादकीयम्’ : वर्तमान का आईना


पुस्तक समीक्षा 

‘संपादकीयम्’ : 

वर्तमान का आईना 

- डॉ. चंदन कुमारी 

chandan82hindi@gmail.com 


‘संपादकीयम्’(2019) ऋषभदेव शर्मा के चुनिंदा संपादकीयों का संग्रह है। ये संपादकीय नियमित रूप से हैदराबाद के एक दैनिक अख़बार में प्रकाशित होते रहे हैं और यह क्रम अब भी जारी है। डॉ. योगेंद्रनाथ मिश्र (गुजरात) उनके शब्द चयन के कायल हैं तो रवि श्रीवास्तव (हैदराबाद) उनकी पक्षकारिता-मुक्त पत्रकारिता के। डॉ. रामनिवास साहू का मानना है कि यह सब लिखने के लिए साहस चाहिए। सत्ता और व्यवस्था को उसका वास्तविक चेहरा दिखाने के लिए साहस तो चाहिए। वर्तमान को उसका चेहरा दिखाने वाली इस पुस्तक में कुल आठ खंड है जो विविध समसामयिक विषयों पर केंद्रित है। प्रो. गोपाल शर्मा ने इसे ‘भव’ साधना माना है जो अनायास ही सध गई। 

पहला खंड ‘स्त्री संदर्भ’ है। इक्कीसवीं सदी में जब माना जा रहा है कि हर स्त्री सशक्त और सक्षम है – यह पुस्तक उस घोषित सच का आवरण हटाकर समाज में स्त्री की वास्तविक स्थिति दिखाती है। स्त्री समाज के लिए सामाजिक वातावरण की असहजता का हिसाब बताती है। आंकड़ों के हिसाब से लेखक ने बताया है कि ग्लोबल एक्सपर्ट सर्वे में यह पाया गया कि भारत महिलाओं के लिए सबसे खतरनाक देश है। महिलाओं से गुलाम जैसा व्यवहार करने और यौन हिंसा में यह देश ‘नंबर वन’ है तथा स्त्री अधिकारों की हत्या करने में इसने अफगानिस्तान व सीरिया जैसे युद्धग्रस्त देशों को भी पीछे छोड़ दिया है। वैसे लेखक का मानना है कि इस रिपोर्ट में कुछ अतिरंजना भी हो सकती है। 

युद्ध और संघर्ष में यौन हिंसा की भुक्तभोगी नादिया जिसका संबंध यजीदी समुदाय से है, उस यौन दासी की आपबीती एक किताब ‘द लास्ट गर्ल : माइ स्टोरी ऑफ़ कैप्टिविटी एंड माइ फाइट अगेंस्ट द इस्लामिक स्टेट’ (2017) के रूप में सामने आई। खुद को उस नारकीय जीवन से मुक्त करने के बाद नादिया ने यौन हिंसा के खिलाफ जागरूकता अभियान चलाया। उनके इस अभियान के लिए उन्हें और यौन हिंसा की शिकार स्त्रियों की चिकित्सा के लिए समर्पित डेनिस मुक्वेगो (स्त्री रोग विशेषज्ञ, कांगो) को 2018 का नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया। संघर्षशील नादिया की जिजीविषा सबके लिए प्रेरणा है। जरा सी बात पर मायूसियत ओढ़ने की फितरत जीते जी अपनी कब्र खोदना है। हर फ़िक्र से दूर एक जूनून कुछ कर गुजरने का होना ही चाहिए। शबरीमला मंदिर में 10–50वर्ष की महिला के प्रवेश पर रोक को लेखक ने लोकद्रोह की संज्ञा देते हुए, इसे लोक और भक्त के अधिकार से जोड़ा है। इस प्रतिबन्ध को समाप्त करने के न्यायालय के फैसले का स्वागत किया है। स्त्री का वस्तुकरण रोकते हुए न्यायालय ने कई महत्वपूर्ण कदम उठाए हैं जिनका जिक्र इस पुस्तक में है। भारतीय दंड संहिता की धारा 497 को असंवैधानिक मानते हुए ख़ारिज किया गया क्योंकि स्त्री की सहमति और असहमति से कोई सरोकार न रखनेवाली इस धारा में स्त्री को पुरुष की संपत्ति माना गया था। इसके साथ ही अब विवाहेतर संबंध या व्यभिचार को अपराध की श्रेणी से मुक्त कर दिया गया है। ‘एक साथ तीन तलाक’ दंडनीय अपराध माना गया है। साथ ही स्त्री-खतना प्रथा को खत्म किया गया है। 

कानूनन स्त्री की इच्छा को तवज्जो दिए के बावजूद देश में स्त्रियों के लिए भयमुक्त वातावरण नहीं बन पाया है और इस सच का भयावह चेहरा ‘मी टू’ के माध्यम से बहुत बार सामने आया। संयुक्त राष्ट्र के एक अध्ययन में यह स्पष्ट हुआ है कि स्त्री के लिए घर सबसे खतरनाक जगह है। न सिर्फ गाँव, घर और शहर बल्कि बड़े से बड़े सफेदपोश स्थल भी स्त्री-शोषक के किरदार में फिट बैठते हैं। भारत के राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार महिलाओं की कुल हत्या के मामले में 40 से 50 प्रतिशत तक दहेज़ हत्या के मामले होते हैं। इन तथ्यों का जिक्र करते हुए लेखक पुरुष वर्चस्व वाले समाज में पुरुष आयोग की सिफारिश को यह कहते हुए ख़ारिज करते हैं कि “पुरुष को किस उत्पीडन का भय? उत्पीड़न की स्थिति में न्यायालय तो है।” कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय में 30 छात्राओं की पिटाई का जो मामला सामने आया वह भी इसमें शामिल है। अश्लीलता का विरोध न करने की नसीहत विद्यालय में दी गई। उसे न मानते हुए जब छात्राओं ने अपने विवेक की सुनी और विरोध किया तो क्या पाया? उनकी दुर्गति करनेवालों में तीन महिलाओं का शामिल होना विडंबना ही तो है! सच को सच और झूठ को झूठ बताना गुनाह बन गया! ये अपनी दुनिया के सारे समीकरण कैसे उलट-पुलट हो रहे हैं! डर और दर्द से सबकी मुक्ति की दास्तान है ‘‘संपादकीयम्’’! 

‘लोकतंत्र और राजनीति’ दूसरा खंड है इसमें राजनीति की भाषा में बढती अशिष्टता, जाति और गोत्र की वेदी पर लोकतंत्र, मतदाता की उदासीनता का अर्थ, उपेक्षित लद्दाख का दर्द, रिश्ता वोट का शराब से, विरोध भी समर्थन भी -जैसे आलेखों में चुनावी मौसम का मिज़ाज मापते हुए लोकतंत्र और राजनीति की वास्तविक स्थिति को उघाड़ा गया है। 

तीसरा खंड ‘जो उपजाता अन्न’ किसान की दुर्दशा पर केंद्रित है। किसान की आत्म्हत्याओं का हल निकलना चाहिए। हमने आत्महत्या की, आपने कर्ज माफ़ कर दिया; बस हो गया। इस व्यवस्था/ तंत्र से किसान को ‘कर्ज की जरूरत की परिस्थिति’ से मुक्ति चाहिए । चौथे खंड ‘शहर में दावानल’ में ‘लोकतंत्र को कलंकित करता भीड़ न्याय’, ‘अब किसके पिता की बारी है’ जैसे आलेख हैं। 

पाँचवाँ खंड ‘व्यवस्था का सच’ में ‘इंतजाम की पोल खोलती पहली बारिश’, ‘ये मौत की सड़कें’ अपने काम के प्रति हमारी ईमानदारी पर प्रश्न चिह्न हैं। छठा खंड ‘हमारी बेड़ियाँ’ है। इस खंड में शामिल कुछ आलेख हैं - ‘प्रणय की हत्या प्रतिष्ठा के नाम पर’, ‘तुम्हारी जाति क्या है डॉक्टर’, ‘तो शब्दकोश में नहीं रहेगा दलित’, ‘आधुनिक गुलामी और हम’ इत्यादि। सभी आलेखों का इशारा उन बेड़ियों की तरफ है जिनमें हमने जबरन खुद को जकड़ कर अपनी जिन्दगी को जटिल बना रखा है। उन्मुक्त हवा में बोझिल मन से दुरूहता जीने की हमारी स्व-अर्जित बेबसी की ओर महज ध्यान खींचना लेखक का उद्देश्य नहीं रहा होगा। व्यवस्था बदलनी चाहिए और इसे जीने वाले ही इसे बदल सकते हैं। 

सातवाँ खंड ‘अस्तित्व के सवाल’ है। इसमें इंसान का ही नहीं, पर्यावरण का अस्तित्व भी शामिल है। ग्लोबल वार्मिंग से समुद्र का जल स्तर निरंतर बढ़ रहा है। यह तटीय इलाकों के लिए विशेष चिंताजनक है। पर्यावरण संरक्षण के साथ बच्चों की असुरक्षा, भुखमरी और असहाय बुढ़ापा से संबंधित आलेख भी इस खंड में हैं। ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट 2018 के अनुसार जिन 44 देशों को भूख के मामले में गंभीर स्थिति वाला माना गया है उनमें भारत भी एक है। भारत के झारखंड राज्य में 50% से अधिक परिवारों को जरूरत के मुताबिक खाना नहीं मिलता है। 4% लोग एक वक्त के अपर्याप्त खाने पर असंतोष करते हैं। 

अंतिम खंड ‘वैश्विक संदर्भ’ में दुर्गा पूजा में विदेशी रुचि का अर्थ समझाते हुए लेखक का मानना है, “धार्मिक-सांस्कृतिक मेलजोल का फायदा उठाकर वे भारतीयों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव बनाना चाहते हैं। सारी कवायद वाणिज्य के वास्ते है; संस्कृति तो बहाना है।” इसके अतिरिक्त युद्ध का विकल्प शांति, विश्व व्यापार संगठन नीति, आतंक बनाम सभ्य रिश्तों का पाखंड जैसे आलेख भी हैं जिनमें मानवीय सभ्यता और संस्कृति को वैश्विक परिप्रेक्ष्य में देखने-समझने की कोशिश नजर आती है। इंसानों ने धरती और समुद्र नाप लिया,अब आसमान नापने की तैयारी में व्यस्त हैं। अंतरिक्ष पर कब्जा ज़माने की मंशा को भांपते हुए लेखक के भीतर का तेवरीकार कहता है : 

“हिंसा की दूकान खोलकर, बैठे ऊँचे देश। 
आशंका से दबी हवाएँ, आतंकित परिवेश।। 
गर्म हवाओं के पंखों पर, लदा हुआ बारूद; 
खुसरो कैसे घर जाएगा, रैन हुई चहुँ देस।।” 

इस प्रकार यह पुस्तक एक ओर तो लेखक के व्यापक सरोकारों का पता देती है तथा दूसरी ओर किसी भी प्रकार की नारेबाजी और फतवेबाजी से परे रहकर पाठक को अपने समय और समाज से जुड़े सवालों से रूबरू कराते हुए उन पर सोचने के लिए विवश करती हैं। निष्कर्षत:, ढेर सारी विविधतापूर्ण और पौष्टिक बौद्धिक खुराक देने वाली यह पुस्तक ध्यान से पढ़ने और विचारने योग्य है। 

समीक्षित कृति : संपादकीयम् (लेख/ पत्रकारिता)/ लेखक- ऋषभदेव शर्मा/ आईएसबीएन: 97893-84068-790/ प्रकाशक- परिलेख, नजीबाबाद/ वितरक- श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद : मोबाइल +91 98499 86346 


- डॉ. चंदन कुमारी 

(पुस्तक समीक्षा) ‘संपादकीयम्’ : शब्दहीन का बेमिसाल सफर



पुस्तक समीक्षा 

‘संपादकीयम्’ : 

शब्दहीन का बेमिसाल सफर 


समीक्षक : प्रो. गोपाल शर्मा 


‘संपादकीयम्’ पुस्तक में संकलित और ‘डेली हिंदी मिलाप’ में पूर्व प्रकाशित विभिन्न सामयिक विषयों पर डॉ. ऋषभदेव शर्मा द्वारा लिखे गए ‘संपादकीय’ हिंदी पत्रकारिता के क्षेत्र में पदार्पण करने के इच्छुक और अनुभवी दोनों प्रकार के पत्रकारों के लिए समान रूप से पठनीय हैं, क्योंकि इनमें आदर्श संपादकीय के सभी गुण हैं। विषय-चयन और शीर्षक के चुनाव से लेकर वर्णन की सहज शैली से होते हुए उनके समापन संदर्भ तक लेखनी का गतिशील रहना पाठक को अनायास ही बाँधता चला जाता है। 

संपादकीय–शीर्षकों पर नजर दौड़ाते ही ठहर जाती है। कहीं प्रश्न हैं- अब किसके पिता की बारी है? कहीं विस्मययुक्त प्रश्न- सबका अन्नदाता हड़ताल पर है !? कहीं कविता के शिल्प में- जलाओ पटाखे पर रहे ध्यान इतना; और कहीं लोक और लोकवाणी सिंचित- ऊपरवाला देख रहा है! 

और फिर आता है- लीड वाक्य। संपादकीय वह उत्तम माना जाता है जिसमें पाठक को बेकार में ही वर्णन-विवरण की हवाई पट्टी पर न दौड़ना पड़े। उसकी उड़ान हैलीकॉप्टर सी बुलंद और उत्तुंग हो। इस निगाह से ये संपादकीय प्रिंट-मीडिया के पहले पाठ को आत्मसात करके लिखे गए लगते हैं। पहला वाक्य सब कुछ तो कहता ही है, और कुछ पढ़ने की ललक भी जगाता है। एक उदाहरण है - ‘मी टू अभियान के तहत मनोरंजन उद्योग, मीडिया, राजनीति, शिक्षा जगत और अध्यात्म की दुनिया तक से महिलाओं के यौन उत्पीड़न की घटनाओं के खुलासों से आम लोग सहमे हुए हैं।’ 

इसी प्रकार संपादकीय का समापन वाक्य चिंतन का समाहार उपसंहार की तरह करता है और पाठक को वांछित ‘फूड फॉर थॉट’ देता चलता है- ‘जब तक व्यवस्था की ओर से यह संदेश आपराधिक तत्वों तक नहीं जाएगा, तब तक वे भीड़ का मुखौटा लगाकर इसी तरह उपद्रव मचाते रहेंगे , हत्याएँ करते रहेंगे और हर बार किसी बेटे को यह पूछना ही पड़ेगा कि- अब किसके पिता की बारी है?’ 

लेखन में शब्दों की धार यूँ तो सहजता को निभाती चली है, किंतु मार्मिक स्थलों पर धार नुकीली भी हो जाती है – धनुष की टंकार हो जाती है। ‘समानता और पूजा-पद्धति के अधिकारों का टकराव’ और ‘परंपरा के नाम पर भेदभाव कब तक’ में लेखक धर्म और उपासना जैसे नाजुक मसलों पर क्षुब्ध होकर कहता है- “यदि प्रभु के राज्य में भी असमानता-पूर्ण नियम लागू हैं तो या तो वह राज्य प्रभु का नहीं (पुजारियों का है), या फिर वह नियम प्रभु का नहीं (दरबानों का है)।” 

अपने वक्तव्यों को धार देने के लिए और उपसंहार करने के लिए कई बार लेखक के मन में उकड़ू बैठने को मजबूर सा हो गया कवि तेवरी चढ़ाकर काव्य पंक्तियाँ उधार भी लेता है – वैभव की दीवानी दिल्ली – और कभी थोड़ा बदलकर – जलाओ पटाखे पर रहे ध्यान इतना – बोलता है; और कभी फिलहाली बयान करने के लिए कह उठता है- भीड़ पर तलवार हैं, खंजर गुलेले हैं। कल्लो क्या कल्लोगे ? है तो है। चुटकी ली जाए तो चुटकी लगे और चूँटी काटी जाए तो वही लगे। ऐसे अवसर भी रंदे पर घिसे गए, पर पेशे खिदमत रहे हैं- ‘खूब नाच-गाना हो, शराबे बहें, उपहार लिए-दिए जाएँ, उन्माद की वर्षा हो, वशीकरण के लिए यह जरूरी है । बार में भी, और चुनाव में भी।’ 

कहा जाता है कि अखबारी दुनिया से जुड़ने के बाद भाव, भाषा, भंगिमा और भूमिका को नए सिरे से साधना पड़ता है और लोगों को बहुत उठना-गिरना पड़ता है। वे और होंगे शोर-ए-तलातुम में खो जाने वाले! ‘संपादकीयम्’ में ‘कोरे कागद’ कारे भर नहीं किए गए हैं, बल्कि एक युगधर्म का पालन भी किया गया है। इसलिए ‘भव’ साधना संभव हुआ है। लगता है, यह खेल खेल में ही हो गया है; और जो हुआ वो ग्रेट है। तोप मुक़ाबिल हो तो अखबार निकालने के दिन अब नहीं रहे, पर तरवार की धार पर दौड़ने वाले दीवानों को कोई ‘रवि’ तभी प्रकाशित कर सकता है, जब कलम में कमाल हो और उसकी श्री वास्तव में हो! 

‘संपादकीयम्’ के इस पाठ को लिखने से किसी पत्रकारिता महाविद्यालय में फीस भरे बिना मुझे पहला पाठ मिल गया। इसका शुक्रगुजार होना बनता है। यह भी मेरा फर्ज़ बनता है कि नाई की ताईं आपको बुलावा दे दूँ, ‘परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद’ से प्रकाशित इस मोर-पंखी पुस्तक के साथ फ़र्स्ट डेट पर जरूर-बेजरूर जाना । दूसरी-तीसरी किताब की प्रतीक्षा न करना; वे पाइप-लाइन में हैं। 

समीक्षित कृति : संपादकीयम् (लेख/ पत्रकारिता)/ लेखक- ऋषभदेव शर्मा/ आईएसबीएन: 97893-84068-790/ प्रकाशक- परिलेख, नजीबाबाद/ वितरक- श्रीसाहिती प्रकाशन, हैदराबाद : मोबाइल +91 98499 86346 

- गोपाल शर्मा 
प्रोफेसर, अंग्रेजी विभाग, अरबा मींच विश्वविद्यालय, अरबा मींच, इथियोपिया 

शनिवार, 23 मार्च 2019

(पुस्तक समीक्षा) 'संपादकीयम्' : शांति लाने में है बहादुरी



शांति लाने में है बहादुरी : ‘संपादकीयम्’
- डॉ. रामनिवास साहू

आज का मानव अपनी सभ्यता के विकास को चरम स्थिति पर पाकर जहाँ गर्व से फूला जा रहा है, वहीं आज के चिंतक, दार्शनिक, वैज्ञानिक, साधु, ऋषि, मुनि, उपदेशक, रक्षक, संरक्षक, यहाँ तक कि उच्चतम पत्रकार, संपादक संसार  के, विश्व के, प्रकृति के यहाँ तक कि संपूर्ण ब्रह्मांड के समक्ष खड़े-पड़े विनाशक अणु-परमाणु बम के भंडारों को देखकर अपनी नींद उड़ाए जा रहे हैं। सचमुच कल क्या होगा? किसको पता? ऐसी परिस्थिति में कोई यह ध्वज फहराता चले कि ‘युद्ध करना नहीं, शांति लाना है बहादुरी’, तो सचमुच स्तुत्य है। इस विचार, दर्शन, सोच, व्यवहार, धर्म, कर्म से ही मानव जाति लुप्त होने से बच सकेगी। संसार में मानव है तो संपूर्ण जीव है, प्रकृति है, साधन है, संपन्नता है, ब्रह्मांड है, लोक है, परलोक है, स्वर्ग है, नरक है। समझदार मानव के चहुँओर चींटी से हाथी, दूब से महावट, धूल से चट्टान सुरक्षित, संरक्षित एवं सुव्यवस्थित है। रे मानव! कुछ तो सुन, पढ़, देख, समझ, फिर बोल, फिर कर। तुम कहीं भी एक नहीं हो।  तुम्हारे अनेक होने के क्रम में आज हम सात अरब मानव यत्र तत्र सर्वत्र हैं। कविवर हरिवंश राय बच्चन के शब्दों में, ‘यह महान दृश्य है/ चल रहा मनुष्य है/ अश्रु, स्वेद, रक्त से/ लथपथ! लथपथ!! लथपथ!!!’

पिछले दिनों मैसूर विश्वविद्यालय के परिसर में ‘प्रवासी हिंदी साहित्य : संवेदना के विविध संदर्भ‘ (मार्च 6-7, 2019) पर विशेष रूप से आमंत्रित साहित्यकार डॉ. ऋषभदेव शर्मा से भेंट हुई, तो आश्चर्यचकित करते हुए उन्होंने मुझे वहाँ लोकार्पित अपनी सद्य:प्रकाशित रचना “संपादकीयम्” (परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद: 2019: 140 रुपये: आईएसबीएन- 97893 84068 790) मंच पर भेंट की। मुझे और भी आश्चर्यचकित करते हुए उन्होंने पन्ने पलटते हुए इस पुस्तक का समर्पण-वाक्य पढ़कर सुनाया, “आदरणीय मित्रवर डॉ. रामनिवास साहू को सप्रेम!” मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मैं नि:शब्द! धन्यवाद के दो-चार शब्द ही कह सका। पुनः धन्यवाद। पंद्रह दिन बाद पढ़ने के लिए विशेष रूप से बैठा, तो भी मेरा मुँह आश्चर्य से खुला का खुला रह गया। मोरपंख के आधारस्तंभ की तरह ‘संपादकीयम्’  लिखा कवर बहुत कुछ कहता है।

पुस्तकों के अंतिम पृष्ठों में प्रायः सारांश, उपसंहार, मंतव्य आदि के साथ संदर्भ ग्रंथों एवं पत्र-पत्रिकाओं की सूची होती है, जो लेखक को समझने में सहायक होती है। उसी आदत के अनुसार मैंने पुस्तक के अंतिम पृष्ठ को देखा। यहाँ भी मुझे आश्चर्यचकित होना पड़ा। पुस्तक का ‘युद्ध करना नहीं, शांति लाना है बहादुरी’ (पृष्ठ 135-136) शीर्षक अंतिम आलेख अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप तथा उत्तर कोरियाई राष्ट्रपति किम जोंग उन के ‘मधुर मिलन’ को चित्रित करते हुए संपूर्ण मानवता को संदेश देता प्रतीत होता है। यही लेखक का मंतव्य है, विश्वशांति के प्रयत्नों का अंतिम परिणाम है, आतंकित समाज, विश्व तथा मानवता का अभिवादन है।

पुस्तक के आरंभ में ही लेखक ने सूचित किया है कि इसमें प्रस्तुत आलेख मूलतः  हैदराबाद के समाचार पत्र ‘डेली हिंदी मिलाप’ में प्रकाशित समसामयिक विषयों पर लिखी उनकी संपादकीय टिप्पणियाँ हैं।  दो-दो पृष्ठों के इन 61 संपादकीयों को 8 खंडों में विभाजित किया गया है, जो इस प्रकार हैं- स्त्री संदर्भ, लोकतंत्र और राजनीति, जो उपजाता अन्न, शहर में दावानल, व्यवस्था का सच, हमारी बेड़ियाँ, अस्तित्व के सवाल,  वैश्विक संदर्भ। लेखक ने अपनी व्यापक सर्वग्राह्य संवेदना से संपूर्ण मानवता के प्रति अपना हृदय स्पंदित किया है तथा अपनी दिव्य दृष्टि से ‘जहाँ न पहुँचे रवि, वहाँ पहुँचे कवि’ की तर्ज पर मानव को आतंकित, पीड़ित, दलित, कुंठित करने वाली हर घटना का अवलोकन कर साहित्यकार की भाषा शैली एवं बिंब से विवेचित किया है। पुस्तक पठनीयता के उच्चतम शिखर पर है। एक बार अवश्य पढ़ें।  शुभमस्तु!
- डॉ रामनिवास साहू,  मैसूर
मोबाइल 7489117706.

(प्राक्कथन) हरियाणा का सामाजिक एवं साहित्यिक परिदृश्य



प्राक्कथन 

डॉ. सत्यनारायण के ग्रंथ “हरियाणा का सामाजिक एवं साहित्यिक परिदृश्य” की पांडुलिपि देखने का सौभाग्य मिला। इस सामग्री से गुजरते हुए मैं जहाँ लेखक की गहन शोध दृष्टि का कायल होता गया, वहीं इस ग्रंथ की नींव में निहित हरियाणा की सामाजिक और साहित्यिक चेतना से अभिभूत भी होता गया। हरियाणा के हिंदी लेखकों द्वारा इक्कीसवीं शताब्दी में रचित-प्रकाशित कहानियों में गुंथे सामाजिक जीवन के विविध पहलुओं पर प्रकाश डालने वाला यह ग्रंथ आनुषंगिक रूप में हरियाणा के सामाजिक और ऐतिहासिक वृत्त को भी सफलतापूर्वक रेखांकित करता है जिसके कारण इसके अभिप्रेत विषय में पर्याप्त विस्तार और समग्रता का समावेश हो गया है। 

यों तो भारत-गणराज्य के एक प्रदेश के रूप में हरियाणा का गठन स्वातंत्र्योत्तर काल में 1966 में हुआ, लेकिन अपनी सांस्कृतिक और ऐतिहासिक परंपरा और परिपुष्ट जड़ों की दृष्टि से हरियाणा भरत खंड की प्राचीनतम सभ्यताओं के उत्थान-पतन का साक्षी रहा है। सिंधु सभ्यता, वैदिक सभ्यता, कुरुक्षेत्र, गीता का उपदेश, नाथ संप्रदाय, जैन संप्रदाय, सूरदास, गरीबदास, निश्चलदास, सूफी परंपरा – कहाँ तक गिना जाए? हरियाणा की उर्वरा भूमि सभ्यता, संस्कृति और साहित्य की दृष्टि से भी उतनी ही उपजाऊ रही है जितनी खाद्यान्न के उत्पादन की दृष्टि से। साथ ही, इस सच को नकारना संभव नहीं कि आधुनिक काल में हरियाणा के विविध विधाओं के साहित्यकारों और पत्रकारों की सूची अत्यंत विस्तृत है। इस पूरी परंपरा का अंकन और आकलन करते हुए विद्वान लेखक ने हरियाणा के सामाजिक जीवन के सौंदर्य से पाठक का साक्षात्कार कराया है। हरियाणा की प्राकृतिक सुषमा, समृद्ध अर्थव्यवस्था और सुसंपन्न लोक संस्कृति इसे स्वर्गीय सुखोपभोग की धरती बनाती है। कृषि, उद्योग, राजनीति, खेल और युद्ध जैसे तमाम क्षेत्रों में अपना डंका बजाने वाली हरियाणा की यह धरती जिन संतानों को जन्म देती है उनकी नस-नस में जुझारूपन और स्वाभिमान भरा रहता है। साथ ही, एक विशेष प्रकार की सहज-स्वाभाविक ग्राम्य जीवन की नैसर्गिक सुगंध उन्हें संपूर्ण भूमंडल पर अलग निजी पहचान प्रदान करती है। हरियाणा का यह समाज अपनी आस्तिकता, लोक धर्म में आस्था, विविध संस्कारों की लौकिक परंपरा, सर्वधर्म समभाव की व्यावहारिक चेष्टा और सब का कल्याण चाहने की वसुधैव कुटुंबकम् की उदार मूल्य चेतना का वाहक है। कुल मिलकर, ‘सादा जीवन, उच्च विचार’ को सटीक कृतार्थता प्रदान करने वाला हरियाणा का समाज सौंदर्य, शौर्य और और औदार्य के मूल त्रिकोण पर अपने अस्तित्व को रूपायित करता है। 

डॉ सत्यनारायण ने हरियाणा के सामाजिक जीवन की इन तमाम विशेषताओं के संदर्भ में इक्कीसवीं शताब्दी की हिंदी कहानी की हरियाणा की फसल की गहन पड़ताल की है और यह दर्शाया है कि हिंदी कहानी की समस्त प्रवृत्तियों और आंदोलनों की आहटें अत्यंत मुखर रूप में हरियाणा के कहानी साहित्य में अभिव्यक्त हुई हैं। अपनी यात्रा में यह कहानी समकालीन समाज के विविधवर्णी परिवर्तनों के सभी आयामों का प्रत्यंकन करती है और इस प्रकार अपनी सामाजिक प्रासंगिकता प्रमाणित करती है। 

लेखक ने इक्कीसवीं शताब्दी में सक्रिय इस क्षेत्र के यथासंभव सभी प्रमुख एवं गौण कहानीकारों का सर्वेक्षण एवं उनके योगदान का सूत्रात्मक शैली में जो मूल्यांकन किया है, वह कहानीकारों के एक कोश के लिए भी आधार प्रदान करने में समर्थ है। विवेच्य कहानियों के सामाजिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक पक्षों का विशद एवं सूक्ष्म विश्लेषण करते हुए डॉ. सत्यनारायण ने यह प्रतिपादित किया है कि हरियाणा के कथाकारों की रचनाएं हरियाणवी मानस के अनुरूप सब प्रकार के बनावटीपन से मुक्त और और समकालीन यथार्थ पर आधारित हैं। उन्होंने इनकी संवेदना के धरातलों की भी गहन विवेचना की है और साथ ही यह भी दर्शाया है कि अपनी मिट्टी से ग्रहण की हुई भाषा का इन कथाकारों ने सृजनात्मक स्वरूप गठित करने में पूर्ण सफलता हासिल की है। 

इस विद्वत्तापूर्ण ग्रंथ के लेखक डॉ. सत्यनारायण गहन अन्वेषी प्रवृत्ति के अध्येता हैं। वे पारदर्शी सरल सहज व्यक्तित्व के स्वामी हैं और शैक्षणिक से लेकर समाज सेवा तक के कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। हँसमुख स्वभाव का यह खिलाड़ी अध्यापक रेडक्रॉस की गतिविधियों में भी निरंतर आगे रहने के लिए सुपरिचित है। अपनी जमीन के लिए ललक, निष्ठा और आत्मीयता से लबालब डॉ. सत्यनारायण ने अपनी प्रकृति के अनुरूप ही इस ग्रंथ को अपनी जमीन के सामाजिक और साहित्यिक परिदृश्य पर केंद्रित किया है। मुझे विश्वास है कि हिंदी जगत में उनके इस ग्रंथ को समुचित सम्मान मिलेगा। 

शुभकामनाओं सहित 

ऋषभदेव शर्मा 
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष 
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा 
एरणाकुलम और हैदराबाद केंद्र