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रविवार, 4 अप्रैल 2021

भूमिका : यादों की पंखुड़ियों पर (सुषमा बैद)

 

भूमिका 

   

हैदराबाद के मंचों की चर्चित कवयित्री सुषमा बैद ने एक गृहिणी के रूप में निरंतर लेखन का निजी कीर्तिमान बनाया है। वे अपनी सतत लेखन यात्रा की स्वर्ण जयंती मना रही हैं। इस अवसर पर प्रस्तुत उनका यह कविता संग्रह यादों की पंखुड़ियों पर... अपनी संवेदनशीलता और भावुकता के कारण पाठक के मन को विचलित करने में समर्थ है। इस संग्रह को उन्होंने अपने दिवंगत जीवन-साथी निर्मल कुमार बैद जी की स्मृतियों को समर्पित किया है। स्वाभाविक है कि इसके प्रत्येक पृष्ठ पर उनके आँसुओं की कथा अंकित है। 

बहुत बार रचनाकारों से पूछा जाता है कि वे कविता क्यों करते हैं, या कि कविता रचने से उन्हें क्या मिलता है। इस तरह के प्रश्नों के अनेक उत्तर समय समय पर दिए जाते रहे हैं। परंतु इस संकलन की कवयित्री के लिए अपने भावों को प्रकट करने के अलावा लेखन का एक बड़ा प्रयोजन दुख झेलने की ताकत बटोरना भी है। कविता, या कहें कि सृजनात्मकता, अपने आप में वह बड़ी ताकत है, जो व्यक्ति को कष्टों के बीच जीने का सहारा देती है। शोक, दुख, त्रास और पीड़ा जब किसी व्यक्ति की छाती पर कुंडली मारकर बैठे हों, तो खिन्नता और अवसाद से निकलने का एक मार्ग कविता रचना भी है। कहना न होगा कि प्रस्तुत कृति के मूल में यही प्रयोजन सक्रिय है। 

कहा जाता है कि सबसे ईमानदार कविता वही होती है, जो दुख से उपजती है। शोक और करुणा इस संग्रह में आदि से अंत तक प्रवाहित हैं। इन रचनाओं में कलात्मकता हो या न हो, स्वानुभूति की ईमानदारी हर कहीं झलकती है। इनमें विरह वेदना अपने सच्चे रूप में प्रकट हुई है। विरह के तीन कारण माने जाते हैं – मान, प्रवास और मृत्यु। मृत्यु जनित विरह सर्वाधिक त्रासद और कारुणिक होता है। कवयित्री ने इसी करुणा और त्रास की अभिव्यक्ति इन रचनाओं में अलग अलग प्रकार से की है। कवयित्री को लगता है कि साथ-साथ लंबी जीवन यात्रा के बावजूद पता नहीं क्यों प्रिय ने प्रेम संबंध को एक पल में तोड़ दिया। उन्हें इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता कि दिन-रात की निकटता के बावजूद प्रिय ने अचानक मुँह क्यों मोड़ लिया। भारतीय परिवार व्यवस्था में स्त्री सदा स्वयं को पति के सबल हाथों में सुरक्षित अनुभव करती है और सुख-दुख साथ साथ सहने को तत्पर रहती है। लेकिन पति का निधन उसे बिना माँझी की नाव जैसे असुरक्षा भाव से भर देता है। ऐसे में सुखमय जीवन की यादें उसे और भी कचोटती हैं और उसे लगता है कि रणभूमि में लड़ता हुआ एक योद्धा उसे एकाकी छोड़कर चला गया है। वह अपने आप को समय के हाथों छली गई महसूस करती है। यह सोच सोच कर कवयित्री रोती रहती है कि अंतिम दिनों में प्रतिक्षण पति के साथ रहते हुए भी जैसे ही कुछ पल के लिए वह किसी और कार्य में व्यस्त हुई, तभी मृत्यु ने पति के प्राण हर लिए। उसे  लगता है कि प्रिय ने सोचा होगा, यह मेरे चिर वियोग को सह न सकेगी! 

चिर वियोग से पार पाने का एक ही सहारा विरहिणी के पास होता है – बीते दिनों की यादें। यह सोच सोच कर कवयित्री को कैसा तो लगता होगा कि अंतिम विदा से पहले पति ने बार बार यह कहा था कि मेरी मृत्यु के बाद भी सौभाग्य के चिह्नों को न उतारना, सदा सुहागिन बनकर रहना, क्योंकि मैं जहाँ कहीं भी रहूँ, सदा तुम्हें प्रसन्न देखना चाहूँगा! इन यादों में डूबी हुई कवयित्री अपनी कविताओं के माध्यम से बार-बार अपने प्रिय को आवाज़ देती है – एक बार आ जाओ। वह कहती है- मैं चुपचाप अकेली जी रही हूँ, बहुत तन्हा हो गई हूँ, तुम्हारे पास रहना चाहती हूँ, तुम्हारे लिए रचनाएँ लिख रही हूँ; तुम चले आओ, तुम्हारा हाथ छूटने से मेरा दिल बहुत घबराता है! कवयित्री बहुत चाहती है कि समय अतीत में वहीं जाकर ठहर जाए, जहाँ दोनों साथ साथ थे। लेकिन अब समय रो-रोकर काटना पड़ रहा है। कभी-कभी उसे लगता है कि इस तरह घुट-घुटकर और नहीं जिया जा सकता। लेकिन मजबूरी यह है कि कहीं दूर दूर तक कोई ऐसा नहीं, जिससे मन की वेदना कही जा सके। कहीं कोई ऐसा नहीं दीखता, जो इस निराश्रित हाथ को थाम ले। यही वह समय है, जब भारतीय स्त्री के जीवन में चुटकी भर सिंदूर की भारी कीमत का पता चलता है! 

कवयित्री ने अपनी संवेदनाओं के संसार को बच्चों के स्नेह से पुष्पित-पल्लवित करना चाहा है। ऐसे में उन्हें बेटी का स्नेह बहुत संबल देता है। उन्हें लगता है कि पूरे जगत में बेटी ही है – जो सुख दुख में साथ होती है, संस्कारों के बीज लिए होती है, घर आँगन में चिड़िया की तरह फुदकती है, माँ-बाप के नयनों की ज्योति होती है। वही है, जो देर रात तक बाट जोहती है। लेकिन यह भी सच है कि हमारी परिवार व्यवस्था में बेटी चार दिनों की मेहमान भर होती है। फिर भी कवयित्री को संतोष है कि बेटी सबके दिलों में प्यार बोती है। इसी भरोसे कवयित्री अक्सर यादों को सिराहने रख कर सो जाती हैं। यादों के काफिले अनव्ररत चलते हैं और तकिया आँसुओं से सींचा जाता रहता है। अकेलेपन की इस यात्रा में सुख-चैन भला कहाँ? बस, हरदम यादों के समुद्र में डूबते चले जाना है। कवयित्री शेष जीवन सुख-शांति से जीना चाहती है और यह भी जानती है कि एक दिन उसे भी स्वयं सदा-सदा के लिए दूसरी दुनिया में चले जाना है। वैसे भी यह स्वार्थी दुनिया रहने योग्य नहीं लगती। इसलिए हिचकी और आँसू को ही उसने साथी बना लिया है। उसे मालूम है कि जीवन की गाड़ी एक पहिये से ज़्यादा दूर तक नहीं खींची जा सकती। फिर भी यादों के सहारे चलते तो रहना ही है- क्योंकि यही तो प्यार है!

आशा है, कवयित्री सुषमा बैद की अन्य कृतियों की भाँति उनके इस संग्रह को भी पाठकों का भरपूर प्यार मिलेगा। 

शुभकामनाओं सहित, 

  • ऋषभदेव शर्मा  

पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष, 

उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, 

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद 

मो. 8074742572

शनिवार, 9 जनवरी 2021

भूमिका : रक्षा अनुसंधान एवं विकास क्षेत्र में विज्ञान लेखन




हिंदी आज अपने संख्याबल के आधार पर अंग्रेजी और मंदारिन जैसी अंतरराष्ट्रीय भाषाओं के साथ प्रथम पंक्ति में साधिकार खड़ी दीख रही है। लेकिन, विश्वभाषा के रूप में स्थापित होने के लिए केवल संख्याबल से काम नहीं चलेगा।  न ही केवल संयुक्त राष्ट्र की आधिकारिक भाषा हो जाने पर कोई भाषा व्यावहारिक स्तर पर विश्वभाषा बन सकती है। इसके लिए उसे विश्व-भूगोल, अर्थव्यवस्था, संवाद, ज्ञान-विज्ञान-तकनीक, जनसंचार और कूटनीति जैसे तमाम अंतरराष्ट्रीय विषय-क्षेत्रों में अपनी शक्तिमत्ता दर्शानी होगी। तभी यह माना जा सकता है कि समूचे ग्लोब पर उसकी जीवंत उपस्थिति है। कहना न होगा कि विश्वभाषा तक जाने वाली यह राह राष्ट्रीय स्तर पर संपर्कभाषा- राष्ट्रभाषा-राजभाषा के वृहद तिराहे से होकर गुजरती है। अर्थात, यह तिहरी राष्ट्रीय भूमिका निभाते हुए ही हिंदी व्यापक सार्वभौमिक भूमिका निभा सकती है। यह भाषिक शक्ति उसे तभी प्राप्त होगी, जब हम जीवन और जगत के विविध व्यवहार-क्षेत्रों में उसका प्रयोग करेंगे। इन व्यवहार-क्षेत्रों में अनुसंधान और विकास कार्यक्रमों से जुड़े वैज्ञानिक साहित्य की रचना एक बेहद महत्वपूर्ण और विशाल व्यवहार-क्षेत्र है। प्रस्तुत ग्रंथ में युवा लेखिका डॉ. अर्चना पांडेय ने इसी व्यवहार-क्षेत्र में व्यवहृत और विकसित हिंदी की प्रयुक्तिगत शक्ति का आकलन करने का महत्कार्य किया है। 


डॉ. अर्चना पांडेय स्वयं रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन में बतौर एक जिम्मेदार राजभाषा-कर्मी कार्यरत हैं। उन्होंने गहन शोधदृष्टि का परिचय देते हुए, संगठन में रचित मौलिक और अनूदित वैज्ञानिक साहित्य के विविध प्रकार के पाठों का सूक्ष्म विवेचन-विश्लेषण किया है। इसके लिए पारिभाषिकता, प्रोक्ति गठन और प्रयुक्ति निर्माण जैसी कसौटियों पर कसकर यह प्रतिपादित किया गया है कि हिंदी किसी भी गंभीर से गंभीर विषय से जुड़े वैज्ञानिक और तकनीकी लेखन और विमर्श के लिए पूर्णतः समर्थ भाषा है। हिंदी को यह सामर्थ्य उसकी लचीली प्रकृति, ग्रहणशीलता, पारदर्शिता और संप्रेषणीयता जैसे गुणों से प्राप्त होता है।


लेखिका ने अपने इस ग्रंथ द्वारा इस भ्रम का तो निवारण किया ही है कि हिंदी वैज्ञानिक लेखन के उपयुक्त भाषा नहीं है; साथ ही, इस मिथ को भी तोड़ा है कि भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक चिंतन और तकनीकी लेखन की परंपरा नहीं है। उन्होंने परिश्रमपूर्वक  संस्कृत से लेकर आधुनिक भाषाओं तक में भारतीयों के वैज्ञानिक लेखन के बारे में ऐतिहासिक महत्व की जानकारी दी है। इससे इस ग्रंथ की उपादेयता और प्रासंगिकता और भी बढ़ गई है।


इस ग्रंथ के प्रकाशन के अवसर पर मैं प्रिय डॉ. अर्चना पांडेय को शुभाशीष और प्रकाशक हिंदुस्तानी एकेडमी को साधुवाद देता हूँ क्योंकि इस प्रकार के ग्रंथ ही हिंदी को विविध प्रयोजनवती बनाते हैं तथा विश्व स्तर पर 'शक्ति की भाषा' (पावर लैंग्वेज) होने  के उसके दावे को पुष्ट करते हैं। 


विश्व हिंदी दिवस की शुभकामनाओं सहित…


ऋषभदेव शर्मा,

पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष,

उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा,

हैदराबाद-500004 (तेलंगाना)


विश्व हिंदी दिवस

10 जनवरी, 2020

शुक्रवार, 13 नवंबर 2020

'लोकतंत्र के घाट पर' की समीक्षा : डॉ. चंदन कुमारी

 

पुस्तक चर्चा

लोकतंत्र के घाट पर...

डॉ. चंदन कुमारी

 


समय बीतता जाता है। भविष्य के कालखंड में अब के बीते हुए समय की प्रवृत्ति और प्रकृति को यदि कोई अनुसंधित्सु जानना-समझना चाहेगा, तो वह अतीत के पन्नों में अंकित अक्षरों को ढूँढेगा। पन्ने जिनमें समय के सत्य का प्रामाणिक और तटस्थ अंकन हो। पन्ने जिनमें समय की सरगर्मी, दिलेरी, बेबसी, आत्मीयता और उड़ान का अंकन हो। पन्ने जिनमें समय की मार खाए मनुज के आँसू को मोती में तब्दील कर अपनी माला में पिरोने की ताक में बैठे अवसरवादियों का भी अंकन हो। ऐसे ही कुछ पन्नों पर अपने समय के सत्य को प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने अपनी पुस्तक ‘लोकतंत्र के घाट पर’ में अंकित किया है।

प्रो. ऋषभ देव शर्मा हैदराबाद से प्रकाशित एक दैनिक पत्र का संपादकीय निरंतर लिख रहे हैं। भारत की चतुर्दिक परिस्थितियों पर पत्रकारिता के क्षेत्र में अपने सजग लेखन से वे पहले ही हिंदी भाषा और साहित्य के प्रतिष्ठित विद्वान तथा साहित्यकार के रूप में विशेष ख्याति अर्जित कर चुके हैं। समीक्ष्य पुस्तक में चुनावी रणनीति पर गंभीर विमर्श मौजूद है। राजनीति की दुरूहता और जटिलता को रेशा-रेशा कर एक सामान्य मनुष्य के लिए उसे सुगम्य बनाते हुए उसकी भेड़-चाल को स्पष्ट करने की सफल कोशिश यहाँ दिखाई देती है। कुल 81 संपादकीय इस संग्रह में संकलित हैं।

देश और दुनिया की पीड़ा की जड़ों को पहचानकर उसे तथ्यपरक और तर्कसंगत ढंग से इस पुस्तक के जरिये पुनः सामने रखा गया है। जन से सरोकार रखनेवाले विचारयोग्य तथ्यों पर विचार की अनिवार्यता बताते हुए कई महत्वपूर्ण संकेत यहाँ दिए गए हैं। उनमें से कुछ बिंदुओं का उल्लेख निम्नलिखित है-

·       संयुक्त राष्ट्र के अनुसार रोहिंग्या मुसलमान दुनिया के सबसे उत्पीड़ित अल्पसंख्यक समूहों में से एक है। पता नहीं क्यों किसी भी मुस्लिम राष्ट्र का इस्लामिक ब्रदरहुड का जज्बा इन लाचार भाइयों के लिए कभी जोर नहीं मारता? दूसरी ओर भारत का उच्चतम न्यायालय अवैध और अवांछित होने पर भी इन्हें बाहर धकेलने की इजाजत नहीं देता। 05.06.2018

·       यदि नीति आयोग और भारत सरकार को यह लगता है कि 2024 से लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना राष्ट्रीय हित में होगा, तो इसपर गंभीर विमर्श की आवश्यकता है। कहीं खर्च घटाने के चक्कर में निरंकुश शासन की राह आसान नहीं कर देंगे। ग्रासरूट लेवल के मुद्दे महत्वहीन हो जाएँगे। 12.06.2018

·       लोकतंत्र में असमहमति और संवाद के लिए हमेशा जगह रहनी चाहिए। अतिवादी गतिविधियाँ काले धन के बल पर ही चलती हैं। भारत विरोधी ताकतों से प्राप्त फंड अपनी जगह तो हैं ही। सैनिक कार्रवाई के साथ ये सारे रास्ते बंद होने चाहिए। 23.06.2018

·       बेहतर हो कि महिला-महिला चीखकर छाती पीटने के बजाय सारे राजनैतिक दल व्यावहारिक स्तर पर उनका समर्थक होना सिद्ध करें। इसके लिए उन्हें बस इतना करना होगा कि अगले आम चुनाव में 33% सीटों पर केवल महिलाओं को टिकट देकर अपनी नेकनीयती दर्शाएँ। 18.07.2018

·       शांतिपूर्ण ढंग से असहमति या विरोध प्रकट करना नागरिकों का मौलिक अधिकार है जिसके लिए उसे उचित स्थान मिलना ही चाहिए। 31.07.2018

·       राजनीति के अपराधीकरण के कैंसर का तुरंत और प्रभावी इलाज अति आवश्यक है। मार्च 2018 के आंकड़ों के अनुसार 4896 विधायकों में से 1765 के खिलाफ कुल 3065 आपराधिक मामले दर्ज हैं। 27.09.2018

·       किसानों की आय दुगुनी कब होगी? अन्ना हजारे से लेकर अखिल भारतीय किसान सभा, किसान मुक्ति संसद और तमिलनाडु के किसानों तक को बार-बार दिल्ली दरवाजे पर दस्तक देने के लिए मजबूर होना पड़ता है। 03.10.2018

·       निचले तबके के लोगों को अपराधी और अशिष्ट मानने की सामंती और साम्राज्यवादी (बल्कि, विलायती) मानसिकता आखिर कब जाएगी? 09.10.2018

·       अनिवार्य वोटिंग की तुलना में एक बेहतर विकल्प यह भी हो सकता है कि जैसे कुछ देशों में ‘जूरी ड्यूटी’ होती है तथा सब नागरिकों को कभी-न-कभी ‘जूरी’ पर होना ही होता है, वैसे ही विधायक और सांसद नियुक्त होने चाहिए। इससे राजनीति को व्यवसाय बनानेवाले हतोत्साहित होंगे। 23.11.2018

·       जीवन बीमा, फसल बीमा, चिकित्सा बीमा, फसलों की तुरंत खरीद और तुरंत भुगतान की गारंटी कर्ज माफ़ी की तुलना में बेहतर विकल्प हो सकते हैं। 26.12.2018

·       युद्ध जैसी आपात स्थिति में सेनाओं के साथ ही एकजुटता का ही नहीं बल्कि देश के राजनीतिक नेतृत्व के साथ भी सच्चे मन से एकजुटता का प्रदर्शन करने की जरूरत है तभी भारत विरोधी ताकतों तक यह संदेश जा सकता है कि देश की सुरक्षा का सवाल भारतीय जनता की तरह राजनीतिक दलों के लिए भी राजनीति से ऊपर की चीज है। 01.03.2019

इसके अतिरिक्त इन्होंने खासी-पंजाबी संघर्ष पर चर्चा के माध्यम से बताया है गया है कि सोशल मीडिया खतरनाक भी हो सकता है। ‘कश्मीर ग्लिम्पसेज ऑफ़ हिस्ट्री एंड स्टोरी ऑफ़ स्ट्रगल’ पुस्तक में पेश की गई लौहपुरुष सरदार बल्लभ भाई पटेल को खलनायक बनानेवाली छवि की थ्योरी का उल्लेख करते हुए उसका खंडन समीक्ष्य पुस्तक में किया गया है। लेखक ने किशोर कुणाल की पुस्तक ‘अयोध्या रिविजिटेड’ से संदर्भ लेते हुए बताया है, “बाबरी मस्जिद बाबर ने नहीं बनवाई थी। बाबर कभी अयोध्या नहीं गया। जो शिलालेख मस्जिद पर लगे थे वे फर्जी हैं। 1858 से पहले यहाँ नमाज और पूजा दोनों अदा की जाती थी।” अब तो राम मंदिर का शिलान्यास भी हो गया। तीन तलाक, महिला आरक्षण, नोटबंदी, शराबबंदी, शबरीमलै सहित विविध मुद्दों पर लेखक की बेबाक टिपण्णी अपनी भाषिक विलक्षणता के कार्न विशेष रुचिकर प्रतीत होती है। इन्होंने साफ शब्दों में कहा है कि शहादत, धर्म, जाति, गोत्र, संप्रदाय और सैन्य अभियान को चुनावी मुद्दों में शामिल नहीं किया जाना चाहिए। ‘गरीबी, अशिक्षा, नागरिक सुविधाओं का अभाव और ढाँचागत क्षेत्रों में गतिहीनता’ चुनाव के वास्तविक मुद्दे हैं। “कश्मीरियत सियासत से बहुत ऊपर है”- पुलवामा केंद्रित इस संपादकीय के जरिए शाश्वत मानवता के स्वरूप की व्याख्या की गई है। स्वाधीनता संग्राम के दौरान नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने आजाद हिंद फ़ौज की मदद से सबसे पहले पोर्ट ब्लेयर की सरजमीं पर तिरंगा फहराया था। विश्वविजेता अंग्रेज जाति की नाक में दम करने का जीवट रखने वाले अपराजेय पौरुष के प्रतीक स्वरूप नेताजी और स्वाधीनता संघर्ष में उनके अविस्मरणीय योगदान की याद स्वतः स्तुत्य है। पुस्तक में राष्ट्रीयता, एकता और स्थानीयता का स्वर बुलंद है। चुनावी नारों का विश्लेषण रोचक है। गाँधी चरित्र के प्रकाश में लेखक का कहना है कि जरूरत है प्रतीक से आगे बढ़कर उन प्रश्नों से टकराने की जिनसे यह देश रूबरू है। इसे एक गंभीर अंतःदर्शी वाक्य मानकर केवल सराहना कर देना समय की मांग नहीं है। इस अंतःदर्शिता को कार्यान्वित करना समय की मौलिक जरूरत है। अनुपस्थित वोट, गुणवत्तापूर्ण रोजगार की कमी और न्यूनतम आय जैसे विषय भी यहाँ उपस्थित हैं। पुस्तक प्रासंगिक है।

समीक्षित पुस्तक : लोकतंत्र के घाट पर

लेखक : ऋषभदेव शर्मा

संस्कारण : 2020 (किंडल/ ऑनलाइन)





समीक्षक : डॉ. चंदन कुमारी

हिंदी विभाग, भवन्स श्री ए के दोशी महिला कॉलेज जामनगर-361008 (गुजरात)

         आवासः द्वारा श्री संजीव कुमार, आईएफए , एयर फ़ोर्स स्टेशन, जामनगर-361003 (गुजरात)

 मोबाइलः 8210915046, ई-मेलःchandan82hindi@gmail.com,

 

बुधवार, 11 नवंबर 2020

शुभाशंसा_'कोरोना काल की डायरी'_प्रो. गोपाल शर्मा





शुभाशंसा 
चाँदी के वर्क लगा आँवले का मुरब्बा 
- प्रो.  गोपाल शर्मा 

समाचारपत्रों के संपादकीय पाठकों को सूचना देने, जागरूक और शिक्षित बनाने के साथ साथ ही उनका मनोरंजन करने का दायित्व भी पूरा करते हैं। इसलिए इनके लेखक एक साथ ही पहरेदार, शिक्षक और जनमत निर्माता की भूमिका निभाते हैं। दक्षिण भारत की हिंदी पत्रकारिता में साहित्य ही नहीं, साहित्येतर लेखन के क्षेत्र में भी कई दशकों से प्रसिद्ध हो गए प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा की संपादकीय टिप्पणियों के पुस्तकाकार संकलनों का देश भर में जो स्वागत हुआ है, उसने ‘कोरोना काल की डायरी’ की प्रस्तुति के लिए मार्ग प्रशस्त किया है। 

वैसे दूसरों की डायरी पढ़ना अशिष्टता माना जाता है, पर जब यह डायरी खुली किताब के रूप में पन्ना-दर-पन्ना ‘रोजनामचा’ के रूप में सामने आने लगे, तो पाठकों का ध्यान जाना स्वाभाविक ही है। कोरोना काल-चक्र में दिनचर्या की बोरियत को दूर करने के लिए ऑक्सीज़न के समान ग्रहण की गई इन टिप्पणियों का अब पुस्तक के रूप में आ जाना एक कड़ी को आगे बढ़ाता है। ‘कोरोना काल की डायरी’ का महत्व इस बात में है कि आप इनमें अपने अन्तर्मन की आवाज सुनने लगते हैं। ‘लोहे का स्वाद’ जिस प्रकार लोहार से नहीं घोड़े से पूछा जाता है, उसी प्रकार इन टिप्पणियों का स्वाद इसके पाठकों से पूछा जाए, तो मैं पाठक के रूप में उत्तर देते समय यही कहूँगा, ‘स्वादिष्ट और सुपाच्य’ । कुछ कुछ चाँदी के वर्क लगे आँवले के मुरब्बे सा मुफीद। चाँदी का वर्क इन वक्तव्यों के शीर्षकों के लिए कहा जा रहा है और यह कहना कोई अत्युक्ति भी नहीं। ‘तो कोरोना जी अच्छे है!’ से लेकर ‘ह्यूमेनिटी पर्सोनिफाइड’ तक जो भी शीर्षक हैं, वे यदि पाठक को आकर्षित करते हैं, तो समापन-पद अपनी अमिट छाप छोड़ता है। समापन काव्य-पंक्तियाँ इस छाप को गहराई और वैचारिक ऊर्जा प्रदान करती हैं, साथ ही हिंदी के पत्रकारिता विमर्श को नई परिभाषा प्रदान करती हैं। विषयों की विविधता यहाँ इस डायरी को कोरोना तक सीमित नहीं रखती। राजनीति और अर्थनीति से लेकर साहित्य और संस्कृति तक भिन्न-भिन्न विषयों को विचारार्थ प्रस्तुत करते समय कभी आप यहाँ ‘रिश्तों की सेहत के लिए वैक्सीन’ पर संवाद देखते हैं तो कभी शिक्षा और स्वास्थ्य पर। फ़ेक-न्यूज़ के घटाटोप में नीर-क्षीर विवेकशीलता दिखाते हुए समाचार की पृष्ठभूमि में जाकर यहाँ जो कुछ लिखा गया है वह तात्कालिकता से प्रेरित होते हुए भी सदा के लिए है। तब से अब तक का यह वक्तव्य तब और भी अधिक सामयिक प्रतीत होगा, जब कोरोना न रहेगा । तब इन वक्तव्यों को पढ़ा जाएगा जब अर्थव्यवस्था व्यवस्थित हो पटरी पर आ जाएगी। अब जब आप इन्हें पढ़ेंगे तो मेरी तरह यह भी देख लेंगे कि इस डायरी में काल अवश्य ‘कोरोना’ से ग्रस्त है, किंतु ‘क्रम’ और ‘कर्म’ नहीं। यह अबाध गति से नदी के समान प्रवाहमान है। 

प्रकाशोन्मुखी पत्रकारिता के सारस्वत यज्ञ में प्रत्येक समिधा का स्वागत है। मैं इस डायरी का सहर्ष स्वागत करता हूँ और कृतिकार का अभिनंदन भी। विविध रुचियों, दृष्टियों और विचारों को एक साथ साधती कोरोना-काल-डायरी के पुस्तक रूप में प्रकाशन के अवसर पर कवि-हृदय लेखक को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ ! 



- गोपाल शर्मा 

पूर्व प्रोफेसर, अरबा मींच यूनिवर्सिटी 

अरबा मींच, इथियोपिया

'कोरोना काल की डायरी' : प्रवीण प्रणव का अभिमत






अभिमत 

आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे 

- प्रवीण प्रणव 

कैफ़ भोपाली ने फ़िल्म 'पाकीज़ा' के लिए एक मशहूर गाना लिखा जिसके बोल थे – “शमा हो जायेगी जल-जल के धुंआ आज की रात, आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे।“ यहाँ निराशा या हताशा नहीं है कि शायद हम सहर देख पाएँ या नहीं, बल्कि अंग्रेजी में जिसे ‘फर्स्ट थिंग फर्स्ट' कहते हैं, यानी अभी जो सामने है पहले उसकी चिंता करते हैं, बाद की बात, बाद में देखी जाएगी। प्रो. ऋषभदेव शर्मा की किताब ‘कोरोना काल की डायरी’, जो इनके द्वारा लिखे गए संपादकीय लेखों का संकलन है, हमें कोरोना काल में होने वाली घटनाओं से परत-दर-परत और पन्ना-दर-पन्ना रूबरू करवाती है। इस किताब के लेख कोरोना के बाद एक बेहतर सहर की उम्मीद तो जगाते हैं, लेकिन कोरोना की स्याह रात की विस्तृत तस्वीर भी पेश करते हैं। दीगर है कि इससे पहले भी प्रो. शर्मा के संपादकीय लेखों के संकलन ‘संपादकीयम्’ (2019), ‘समकाल से मुठभेड़’ (2019), ‘सवाल और सरोकार’ (2020) तथा ‘लोकतंत्र के घाट पर’ (2020) प्रकाशित हैं, प्रस्तुत पुस्तक इस शृंखला की पाँचवीं कड़ी है। कोरोना ने यूँ तो चीन में बहुत पहले अपनी आमद का अहसास करवा दिया था लेकिन तब दुनिया इसके प्रभाव को ले कर इतनी सतर्क नहीं थी। देखते ही देखते जब इसने अपने पाँव चीन से बाहर निकाले और समूचे विश्व को अपनी गिरफ़्त में ले लिया, तब जाकर वैश्विक स्तर पर इससे निबटने की योजनाएँ बननी शुरू हुईं। भारत में भी मार्च 2020 से सरकारी अमला हरकत में आया और कोरोना के प्रभाव को कम करने के प्रयास शुरू हुए। इस किताब के संपादकीय लेख 06 मार्च, 2020 से शुरू होते हैं और 04 नवंबर, 2020 तक की महत्वपूर्ण घटनाओं को 97 संपादकीय लेखों के माध्यम से पाठकों के सामने परोसा गया है। 

इतिहास की घटनाओं के लिए जैसे ईसा पूर्व और ईसा के बाद का संदर्भ दिया जाता है, वैसे ही कोरोना की वजह से हमारे जन जीवन पर जो प्रभाव पड़ा है, उसका आकलन लंबे समय तक कोरोना से पहले और इसके बाद की परिस्थितियों के रूप में किया जाता रहेगा। और यह किताब इन दो काल खंडों (कोरोना से पहले और इसके बाद) के बीच की कड़ी है। आज हम कोरोना संक्रमण काल में हैं और इस दौरान की हर घटना ज़ेहन में ताज़ा है। लेकिन किसी घटना के वर्षों बाद जिस तरह पुरानी तस्वीरों को देखते ही घटना आँखों के सामने सजीव हो उठती है, वैसे ही इस किताब की उपयोगिता लंबे समय तक इस मायने में बनी रहेगी कि यह कोरोना काल में इस महामारी से निबटने की हमारी तैयारी, हमारी कमियों और न केवल भारत बल्कि वैश्विक स्तर पर कोरोना की वजह से हो रही उथल-पुथल का प्रामाणिक दस्तावेज़ है। जैसा कि नाम से स्पष्ट है, इस किताब में संगृहीत सभी लेख कोरोना या कोरोना से संबंधित विषयों पर आधारित हैं, लेकिन इन लेखों में विविधता है और यह प्रो. शर्मा की पैनी साहित्यिक दृष्टि और समाज के अंतिम व्यक्ति तक से अपने को जोड़ पाने की कला और उसके दर्द को समझने की परिपक्वता का परिचायक है। आरंभिक कई लेख कोरोना से बचाव के तरीकों, स्वास्थ्य कर्मियों की सुरक्षा और लापरवाही के खिलाफ जागरूकता फैलाने पर आधारित हैं। जैसे-जैसे समय बदला और वैश्विक स्तर पर परिस्थितियों में जिस तरह के बदलाव हुए, संपादकीय लेखों की धार भी चीन की विस्तारवादी नीतियों और अवसरवादी फ़ायदों के खिलाफ़ होती गईं है। अमेरिका और चीन के आमने-सामने आ खड़े होने पर भी कई लेख हैं। लेखों में एक तरफ चीन की अवसरवादिता पर प्रहार है, तो वहीं अमेरिका की दादागिरी और कोरोना से लड़ने में उसकी विफलताओं पर भी लेख हैं, जो प्रो. शर्मा की निष्पक्ष पत्रकारिता का सबूत हैं। जहाँ कहीं भी सरकार ने कोरोना की रोकथाम की दिशा में प्रभावी कदम उठाए, संपादकीय लेखों में ऐसे प्रयासों की सराहना की गई है लेकिन साथ ही रोजगार, मजदूरों के पलायन और अर्थव्यवस्था जैसे मुद्दों पर सरकार के खिलाफ़ आवाज़ भी उसी मजबूती से उठाई गई है। कोरोना के दौर में कोरोना से इतर भी कई महत्वपूर्ण लेख इसमें सम्मिलित किए गए हैं जिनमें अत्यधिक बारिश, बढ़ती जनसंख्या, निर्यात पर निर्भरता कम करने जैसे घरेलू मुद्दे हैं, तो टिड्डियों का हमला, तेल की कीमतों में गिरावट, इजराइल और संयुक्त अरब अमीरात के बीच समझौता जैसे अंतरराष्ट्रीय विषय भी हैं, जो परोक्षतः कोरोना काल को ही रूपायित करते हैं। किताब के उत्तरार्ध में कई लेख कोरोना वैक्सीन की आरंभिक जांच के नतीजों पर हैं, तो साथ ही कई लेख कोरोना काल में चरमराई अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने का संदेश देते हैं। इन लेखों को पढ़ कर सहज ही अनुभव होता है कि इस काली रात की ज्यादातर घड़ियाँ हमने काट ली हैं और अब हमें उस नई सहर के लिए तैयार होना है जिसके आते ही हमने इस रात में जो खोया है उसे फिर से हासिल करने और उससे और आगे जाने की दिशा में जुट जाना है। प्रो. शर्मा को साधुवाद कि उनके लेखों को पढ़ते हुए इस दौर के कई दृश्य आँखों के सामने तैरने लगते हैं और महसूस होता है आप समय का पहिया पीछे मोड़ कर उन घटनाओं के एक बार फिर से साक्षी हो रहे हैं। 

क्योंकि कोरोना का संक्रमण काल अभी खत्म नहीं हुआ है तो जाहिर है कि ‘कोरोना काल की डायरी’ का अंतिम लेख, इस डायरी का अंतिम पन्ना नहीं, लेकिन उम्मीद की जानी चाहिए कि इस डायरी के आगामी पन्ने संक्रमण की विभीषिका से उबर कर जीवन के वापस पटरी पर आने की दास्तान समेटे होंगे। फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ ने भी कहा “लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।" यह शाम पहले ही बहुत लम्बी हो चुकी है, वैक्सीन की उम्मीद में जनता उस सहर की मुंतज़िर है, जब हम खौफ़ के साये से बाहर निकल सकेंगे और इस इबारत के लिए ‘कोरोना काल की डायरी’ के अगले सफ़ों का इंतजार रहेगा। और तब तक आइए, हम सब मिल कर नरेश कुमार शाद के इस शेर को गुनगुनाएं: 

इतना भी ना-उम्मीद दिल-ए-कम-नज़र न हो 

मुमकिन नहीं कि शाम-ए-अलम की सहर न हो





- प्रवीण प्रणव