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मंगलवार, 31 जुलाई 2018

(रामायण संदर्शन) लोकाभिराम श्रीराम

राम लोक के देवता हैं। लोकप्रिय हैं। लोक रक्षक हैं। लोकाभिराम हैं। इसलिए अयोध्या के राजमहल से बाहर निकलते ही वे स्वयं को लोक में विलीन कर देते हैं। लोक जितनी तीव्रता से अपने राम की ओर उमड़ता है, राम भी उतनी उत्कटता से लोक को अपने में समेटते हैं। तुलसी बाबा बताते हैं कि राम के आने का समाचार मिलते ही कोल-भीलों को ऐसा लगा जैसे वे सब प्रकार की निधियाँ पा गए हों। राम से मिलने के लिए वे इस तरह दौड़ पड़े जैसे भिखारियों की भीड़ सोना लूटने जा रही हो। पर वे भिखारी नहीं थे। लोक की सारी संपदा उनके पास थी। वे तो दोनों में कंद-मूल-फल भर-भर कर अपने राम को भेंट करने को दौड़ रहे थे । राम के दर्शन करते ही अनुराग उमड़ पड़ा। वे सब चित्रलिखे से खड़े के खड़े रह गए। शरीर रोमांचित। आँखें भर आईं। राम ने लोक के इस सहज अनुराग को पहचान लिया और प्रिय वचन कहकर उन सबका यथायोग्य स्वागत किया। हालचाल पूछने पर सहज भाव से कोल-भील जो कुछ कहते हैं वह उनकी अनुभूति का सार है। उन्हें लगता है कि राम ने जहाँ-जहाँ चरण धरे, वे सब स्थान धन्य हो गए। वन में जाने कब से भटक रहे पशु-पक्षी भी राम के दर्शन पाकर धन्य हो गए लगते हैं। सपरिवार राम को आँख भर देखने में ही जीवन की धन्यता है। वे राम की सब प्रकार से सेवा करने के लिए प्रस्तुत हैं। जंगल के एक एक कोने से वे परिचित हैं। अपने राम को सारा जंगल घुमाएंगे। बस आज्ञा की देर है। राम बड़े मन से उनके प्रेमपूर्ण शब्दों को सुनते हैं और प्रमुदित होते हैं। इस सहज प्रेमपूर्ण व्यवहार में ही तो राम का ईश्वर रूप निखरता है। प्रेम ही राम का ऐश्वर्य है – ‘रामहिं केवल प्रेमु पिआरा। जानि लेउ जो जाननिहारा।।' (संपादक)

(रामायण संदर्शन) उघरहिं अंत न होइ निबाहू

आजकल जिसे देखिए वही गठबंधन और समझौते की बातें करता दिखाई देता है। किसी तात्कालिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए किए जाने वाले ऐसे गठबंधन बिखर भी बहुत जल्दी जाते हैं। दरअसल किन्हीं दो व्यक्तियों या संस्थाओं का लंबे समय तक या आजीवन साथ-साथ चलना तब तक संभव नहीं जब तक उनके परस्पर जुडने का आधार विवेकसंगत न हो। अविवेक पूर्वक किसी प्रकार के आवेश में बनाए गए संबंध बहुत दूर तक नहीं चलते। इसीलिए तुलसी बाबा सावधान करते हैं कि भली प्रकार पहचान कर ही ‘संग्रह’ और ‘त्याग’ का निर्णय करना चाहिए, अन्यथा परिणाम दुखद होते हैं। यह विश्व गुण-दोषमय है। नीर और क्षीर के विवेक से ही संग्रह और त्याग की तमीज़ आती है। विवेक को बहुत बार भ्रमित करने की भी कोशिश की जाती है – जैसे चुनाव की वेला में नेतागण जनता को भ्रमित किया करते हैं। ऐसे समय किसी तात्कालिक लाभ और लोभ में न पड़कर धैर्यपूर्वक परीक्षा की आवश्यकता होती है, क्योंकि यदि कोई ठग भले आदमी का सा वेश बना ले तो भले ही लोग कुछ समय तक उस वेश के प्रताप से उसे पूजते रहें, लेकिन एक न एक दिन ऐसे कपटी लोगों की पोल खुल ही जाती है। तब पता चलता है कि वे तो रक्षक के वेश में भक्षक थे। कालनेमि, रावण और राहु का भेद अंततः खुल ही जाता है। (संपादक)

शुक्रवार, 6 जुलाई 2018

[दो शब्द] हिंदी की दुनिया : दुनिया में हिंदी



दो शब्द

‘हिंदी है हम विश्व मैत्री मंच’ की स्थापना तथा ‘हिंदी की दुनिया और दुनिया में हिंदी’ का प्रकाशन एक सपने के फलीभूत होने जैसी सुखद घटनाएँ हैं. सपने को फालतू चीज न समझें, वह भी चेतना की अवस्थाओं में से एक है. सपना देखे बिना कुछ हो भी नहीं सकता. यह सृष्टि ईश्वर का और ईश्वर भी मनुष्य का स्वप्न ही तो है. एक सपना तेलंगाना राज्य के कुछ हिंदी प्रेमियों ने देखा और ‘हिंदी हैं हम विश्व मैत्री मंच’ के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी, देशांतर भ्रमण और ग्रंथ प्रकाशन का श्रीगणेश हो गया. इसके मूल में हमारा हिंदी के प्रति समर्पण छिपा हुआ है.

‘हिंदी हैं हम’! यह ‘हिंदी’ क्या है? क्या यह भाषा का नाम है? नहीं, यह भाषा का नाम नहीं है. इसकी व्याख्या अल्लामा इक़बाल ने पहले ही कर दी है- ‘हिंदी हैं हम, वतन है हिंदोस्तां हमारा’. हिंदी यहाँ ‘भारतीय’ का वाचक है. हिंदी एक भाषा का वाचक नहीं, बल्कि ‘हिंदी’ भारतीय संस्कार, भारतीय संस्कृति, भारतीय सभ्यता, भारतीय इतिहास, भारतीय परंपरा, भारतीय मानस, भारतीय चेतना का वाचक है. यह शब्द ‘हिंदी’ भारतीयता का प्रतीक है. यह शब्द कहाँ से आया है ? इसकी कितनी अर्थछवियाँ हैं ? इसके क्या-क्या इतिहास हैं? ये सारे प्रश्न अपनी जगह हैं. हमारे लिए ‘हिंदी’ भारतीय होने का प्रतीक है. अनेक भारतीयों ने विदेशों में इस बात को महसूस किया है कि भारत के बाहर हमारी पहचान पंजाबी, तेलुगु, तमिल और बंगाली नहीं है. भारत के बाहर हमारी पहचान ‘हिंदी’ है. ‘हिंदी’ अर्थात हिंद का, अर्थात हम हिंद के हैं, हम भारत के हैं. भले ही राजनीतिबाज़ लोग हमारी इस पहचान को धूमिल करने जैसी कितनी ही बदमाशियाँ करते रहें. कभी किसी ने लालकिले से देश को हिंदुस्तान क्या कह दिया कि बस अगले दिन बवाल मच गया कि क्या यह देश सिर्फ हिंदुओं का है! यह बड़ी गड़बड़ है. यह फिर से भाषा को धर्म के साथ जोड़कर फिर से देश को लड़वाने, तोड़ने और अपनी राजनैतिक रोटियाँ सेंकने का षड्यंत्र है. इस ‘हिंदी’ को भारतीयता का प्रतीक बनाए रखने में या फिर इसको ‘लैंग्वेज ऑफ़ पॉवर इंडेक्स’ में ऊपर का स्थान मिलने में जो चीजें बाधक हैं, उन्हें समझना हमारे लिए बेहद जरूरी है. यह ‘लैंग्वेज ऑफ़ पॉवर इंडेक्स’ 2016 में अचानक पैदा हुआ है. इससे पहले भाषाओँ के क्षेत्र में इस तरह के इंडेक्स की चर्चा नहीं थी. सवाल है, यह क्यों पैदा हो गया. क्योंकि जयंती प्रसाद नौटियाल जैसे लोग यह सिद्ध कर रहे थे/हैं कि भारत सहित विदेशों में भी जहाँ-जहाँ हिंदी को समझनेवाले लोग हैं,, अगर उन सबकी संख्या को जोड़ा जाए अर्थात हिंदी की तमाम क्षेत्रीय भाषाओँ/ मातृभाषाओं के प्रयोक्ताओं को जोड़ा जाए, उर्दू के तमाम प्रयोक्ताओं को जोड़ा जाए और बौद्धकाल एवं उपनिवेशवादी काल के दौरान भारत से जो प्रव्रजन/प्रवासन हुआ है, उस काल में विदेशों में गए हुए लोगों ने जिस रूप में भाषा को थोड़ा-बहुत बचा कर रखा हुआ है उन सबको जोड़ा जाए और आज अर्थात आजादी के बाद, विशेष रूप से सन 1990 के बाद जो तमाम लोग विदेशों में जाकर वहाँ की नागरिकता ग्रहण कर रहे हैं, उन तमाम लोगों की संख्या को अगर जोड़ा जाता है तो विश्व भर में ‘हिंदी प्रयोक्ताओं’ की संख्या सर्वाधिक है. 35 साल के गहन अनुसंधान और सर्वेक्षण के बाद इस तथ्य को स्थापित किया जा सका है कि विश्व भर में हिंदी प्रयोक्ताओं की संख्या सर्वाधिक है. अब तक यह बात जैसे अब तक यह बात ‘चीनी भाषा’ के प्रयोक्ताओं के बारे में कही जाती रही थी. इसे शायद ‘चीनी भाषा’ के लिए खतरे की घंटी समझा गया; इसलिए ‘लैंग्वेज ऑफ़ पॉवर इंडेक्स’ की अवधारणा वहीं से निकल कर सामने आई कि ठीक है ‘हिंदी’ प्रथम स्थान पर तो है पर ‘हिंदी’ को आप मातृबोलियों के रूप में बोलते होंगे ‘हिंदी’ के रूप में नहीं और वह सत्ता का प्रतीक नहीं है. इसलिए यह बहुत जरूरी है कि हम अपनी तमाम बोलियों/मातृभाषाओँ को जीवित रखें लेकिन अपनी सहयोजित मातृभाषा अर्थात हिंदी को अपदस्थ किए बिना. चीनवालों से हम कम से कम हम यह तो सीख लें कि उन्हें एक नाम ‘हिंदी’ से पुकारें . हम यह न कहें कि मैं ब्रजभाषा वाला हूँ या मैं मैथिली वाला हूँ, हम कहें, “हम हिंदी हैं”. आज राजनैतिक कारणों से मैथिली, नेपाली भले ही संविधान की अष्टम अनुसूची में आ गई हों, लेकिन ये भाषाएँ भी उसी प्रकार से ‘हिंदी भाषा समुदाय’ के विविध भाषिक आचरण या ‘कोड’ हैं जिस प्रकार अवधी, ब्रज, राजस्थानी, भोजपुरी, छतीसगढ़ी या वे बीसों भाषाएँ हैं जिन्हें पश्चिमी भाषावैज्ञानिकों ने डाइलेक्ट या बोली कहकर छोटा कर दिया है. ये तमाम क्षेत्रीय भाषाएँ मिलकर ही व्यापक ‘हिंदी भाषा समुदाय’ की रचना करती हैं.

मैं अपना एक अनुभव आपको बताता हूँ. मुझे समूचे दक्षिण भारत और कुछ-कुछ पूर्वोत्तर भारत में हिंदी का अध्यापन करने के बाद अतिथि अध्यापक के रूप में भारत के ही एक विश्वविद्यालय में चीन, थाइलैंड, बल्गारिया फ़्रांस और इटली से आए छात्रों को भी हिंदी सिखाने का अवसर मिला. ऐसे ही एक बैच में क्लासरूम में बराबर-बराबर बैठी हुई दो चीनी बालिकाओं (इंदु और निशा - भारतीय उपनाम) से, हिंदी भाषा समाज की प्रकृति पर चर्चा के दौरान मैंने पूछा कि क्या आप घर में भी अपनी भाषा चीनी/मंदारिन में ही बात करती हैं. वार्तालाप कुछ इस प्रकार था : 

- आप परस्पर किस भाषा में बात करती हैं ?
- हम कक्षा में हिंदी में बात करते हैं. सामान्यतः हम परस्पर मंदारिन में बात करते हैं .
- आप अपने-अपने घरों में भी क्या मंदारिन ही बोलती हैं?
- नहीं, घर में हम अपनी-अपनी मातृभाषा में बोलती हैं. हम दोनों की मातृभाषाएँ अलग-अलग हैं और मंदारिन से भी अलग हैं.
- आप एक दूसरे की मातृभाषा समझ सकती हैं?
- बिलकुल नहीं, इसीलिए हम आपस में मंदारिन बोलती हैं. हिंदी पढने के कारण हम अब हिंदी में तो एक-दूसरे के भाव समझ सकती हैं, लेकिन एक-दूसरे की मातृभाषाएँ अब भी परस्पर उतनी ही दूर हैं. मंदारिन ही विभिन्न चीनी भाषियों को परस्पर जोडती हैं.

इस वार्तालाप से स्पष्ट है कि चीनी भाषा के अंतर्गत आनेवाली सारी भाषाएँ भी एक-दूसरे से इतनी दूर हैं जितनी उत्तर भारत की भाषाएँ दक्षिण भारत या पूर्वोत्तर भारत की भाषाओँ से. इसके बावजूद उन सबकी गणना चीनी भाषा के रूप में बतौर एक भाषा की जाती है. इस तर्क से तो हिंद की सारी भाषाएँ हिंदी ही हैं – कम से कम वे सब तो हैं ही जिनकी सहयोजित मातृभाषा हिंदी है. उल्लेखनीय है कि चीनी भाषा की वर्णमाला/ चित्रलिपि दुनिया की सबसे बड़ी वर्णमाला है जिसमें लगभग 5000 से कुछ अधिक लिपिचिह्न हैं. इस भाषा में कुल 254 बोलियाँ हैं. ऐसी भाषा एकजुट होने के कारण अपने आप को दुनिया की ‘प्रथम भाषा’ कहती है. इस द्रष्टांत के यहाँ उल्लेख का प्रयोजन यह आवाहन करने से है कि अष्टम अनुसूची की राजनीति के बावजूद हम ‘हिंदी’ के रूप में एकजुट रहकर अपनी मातृभाषाओं के गौरव और राष्ट्रीय अस्मिता दोनों की रक्षा कर सकते हैं, अतः एकजुट रहें – यही लोकतंत्र का तकाज़ा है. आज ज़रूरत इस बात की है कि एक ऐसा जागरूकता अभियान चलाया जाए जिसके तहत हम जाएँ राजस्थानी के लोगों के बीच, मैथिली के लोगों के बीच, भोजपुरी और छत्तीसगढ़ी के लोगों के बीच; और उन्हें कहें कि आपकी अपनी अस्मिता अपनी जगह है जिसके संघर्ष में हम आपके साथ हैं, लेकिन राष्ट्रीय अस्मिता के रूप में आप अपनी भाषा को ‘हिंदी’ कहें. 

राष्ट्रीय अस्मिता के हवाले से हमें यह भी याद रखना होगा कि भारत में अंग्रेजी विदेशी भाषा है और इसीलिए भारत के संविधान की अष्टम अनुसूची में नहीं पाई जाती है बावजूद इसके वह भारत की ‘सह राजभाषा’ है . खेद की बात है कि हमने व्यवहार में इस व्यवस्था को उलट दिया है अर्थात हिंदी को ‘सह राजभाषा’ बनाकर हाशिए पर सिमटी रहने को मजबूर कर दिया है. विश्व-व्यवस्था में राजनैतिक और आर्थिक परिदृश्य पर आज जब भारत पुनः उभर रहा है, यही सही समय है कि हम अपनी राष्ट्रभाषा-राजभाषा-संपर्कभाषा हिंदी का संवैधानिक सम्मान व्यावहारिक रूप में बहाल करें. विश्वभाषा के रूप में हिंदी की प्रतिष्ठा का यही वरेण्य मार्ग है. 

इस ग्रंथ के प्रणयन के पीछे यही दृष्टि रही है कि हिंदी आज किसी क्षेत्रविशेष की भाषा नहीं है वह पारंपरिक भौगोलिक सीमाओं का अतिक्रमण करती हुई सार्वदेशिक ही नहीं सार्वभौमिक भाषा बन गई है. दैनंदिन व्यवहार से लेकर साहित्य और नए मीडिया तक, देसी राजनीति और वैदेशिक कूटनीति से लेकर विज्ञान और तकनीक तक तथा कुटीर उद्योग से लेकर फिल्म उद्योग तक हिंदी ने अपने सामर्थ्य को सिद्ध कर दिया है. उसकी इस यात्रा में मातृभाषा के रूप में उसका व्यवहार करने वालों के अलावा हिंदीतरभाषियों, गिरमिटिया देशों के भारतवंशियों, दक्षेश राष्ट्रों तथा खाड़ी देशो के हिंदी-उर्दू जानने-समझने वालों, दुनिया भर में फैले प्रवासी भारतीयों और विदेशी हिंदीसेवियों का समग्र रूप में योगदान ही उसका अक्षुण्ण पाथेय रहा है. इस योगदान के भूत, वर्तमान और भविष्य के आकलन का अत्यंत सीमित सा प्रयास आप इस ग्रंथ में पाएँगे जो वास्तव में इस शृंखला की पहली कड़ी है. हम प्रयास करेंगे कि यह क्रम आगे भी चलता रहे और आप सबका साथ निरंतर मिलता रहे. 

‘हिंदी की दुनिया और दुनिया में हिंदी’ के प्रकाशन के अवसर पर सभी सहयोगी लेखकों और संपादक गण को बधाई देने के साथ ही मैं प्रो. गोपाल शर्मा (इथियोपिया), प्रो. घनश्याम शर्मा (इनाल्को, पेरिस) और प्रो. देवराज (वर्धा) के प्रति आभार व्यक्त करना ज़रूरी समझता हूँ क्योंकि ये तीनों महानुभाव हैदराबाद के हिंदी सेवियों के सपने को अपने स्नेह का संबल न देते तो इसका साकार होना दुष्कर होता. 

शुभकामनाओं सहित

- ऋषभदेव शर्मा 
पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष 
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा 
खैरताबाद, हैदराबाद – 500004 (भारत)

सोमवार, 28 मई 2018

रहनुमा तो नहीं हो, साँप ही तो हो : पं. गोपाल प्रसाद व्यास

पुण्य तिथि 28 मई पर विशेष

रहनुमा तो नहीं हो, साँप ही तो हो : पं. गोपाल प्रसाद व्यास
- ऋषभ देव शर्मा

उन्होंने कक्षा सात की भी परीक्षा नहीं दी थी, लेकिन वे अलंकारशास्त्र, रससिद्धांत, नायिकाभेद और समस्त ललित कलाओं के विशेषज्ञ थे. उनका जन्म ब्रजमंडल के एक छोटे से गाँव में हुआ था, लेकिन उन्होंने समस्त हिंदी जगत को अपनी वाणी के प्रसाद से प्रमुदित किया. वे स्कूली शिक्षा को बीच में ही छोड़कर स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे, लेकिन महात्मा गांधी के निर्देश पर उन्होंने सक्रिय राजनीति से परहेज़ करते हुए रचनात्मक कार्यों और आंदोलन में अपने को झोंक दिया. दुनिया उन्हें लाल किले के कवि सम्मेलन के जनक के रूप में जानती है, लेकिन कम लोग यह जानते हैं कि वे केवल हास्य और व्यंग्य के ही अनन्य हस्ताक्षर नहीं थे, बल्कि वीर रस की ओजस्वी कविताओं के क्षेत्र में भी उन्हें बेजोड़ सफलता मिली थी.

ऐसे कविकुल शिरोमणि पंडित गोपाल प्रसाद व्यास का जन्म 13 फरवरी, 1915 को हुआ था और उन्होंने साहित्य की दीक्षा नवनीत चतुर्वेदी, कन्हैया लाल पोद्दार, वासुदेव शरण अग्रवाल और डॉ. सत्येंद्र जैसे अपने समय के मूर्धन्य विद्वानों से ग्रहण की थी. वे साहित्य संदेश, दैनिक हिंदुस्तान, राजस्थान पत्रिका, सन्मार्ग और विकासशील भारत से संपादक के रूप में तो जुड़े ही थे; पर खास बात यह कि बाईस वर्ष की आयु से जो स्तंभ लेखन का कार्य आरंभ किया, उसे अत्यंत जागरूक पत्रकार के रूप में अपने अंतिम समय तक बखूबी निभाया.

हिंदी भाषा और साहित्य के लिए अपने आप को पूरी तरह समर्पित कर देने वाले कवि गोपाल प्रसाद व्यास ने ब्रज साहित्य मंडल की ही स्थापना नहीं की, दिल्ली हिंदी साहित्य सम्मेलन और  श्री पुरुषोत्तम हिंदी भवन न्यास समिति की भी नींव रखी. इतना ही नहीं, होली के अवसर पर ‘मूर्ख महासम्मेलन’ की परंपरा को भी सरलता, सहजता, सरसता और जीवंतता के साक्षात अवतार गोपाल प्रसाद व्यास  ने ही जन्म दिया. आशय यह कि उन्होंने ही हिंदी में हास्य-व्यंग्य की लगभग सूखी धारा को पुनर्जीवित किया.

इसमें संदेह नहीं कि हास-परिहास से लेकर चुटीले व्यंग्य तक उनका कोई सानी नहीं. हिंदी हास्य कविता को पत्नी का आलंबन पहले पहल उन्होंने ही प्रदान किया. पत्नी ही क्या, ससुराल के अन्य सदस्यों साली सलहज और सास के बहाने भी उन्होंने अपने समय और समाज की अनेक दुखती रगों को कभी सहलाया, तो कभी चटकाया भी. साली क्या है रसगुल्ला है, पत्नी को परमेश्वर मानो, साला ही गरम मसाला है, सास नहीं भारतमाता है, पलकों पर किसे बिठाऊँ मैं, एजी कहूँ कि ओजी कहूँ, समधिन मेरी रसभीनी है और भाभीजी नमस्ते जैसी कविताओं के द्वारा वे हिंदीभाषी जनगण के कंठहार बन गए थे. हिंदी कवि सम्मेलन को उन्होंने शिष्ट हास्य द्वारा आम जनता तक पहुँचाने का बड़ा कार्य संपन्न किया.

इसी प्रकार उनकी व्यंग्य कविताओं में खासतौर से आराम करो, नई क्रांति, बोए गुलाब, साँप ही तो हो, सत्ता, सुकुमार गधे और सरकार कहते हैं तो आज भी उतनी ही प्रासंगिक हैं, जितनी अपने रचनाकाल में रही होंगी. आइए, बानगी देखते चलें.
कुंभकर्णी दोपहरी मंदोदरी साँझ/ रात शूर्पणखा सी बेहया बाँझ/ मेघनाद छाया है/ दसों दिशा क्रुद्ध/ चाह रही बीस भुजा तापस से युद्ध / और तुम कहते हो/ सृजन को सँवारो/ कंटकित करीलों की आरती उतारो! (बोए गुलाब).
साँप,/ दो-दो जीभें होने पर भी/ भाषण नहीं देते?/ आदमी न होकर भी/ पेट के बल चलते हो./यार! हम तुम्हारे फूत्कार से नहीं डरते/ साँप ही तो हो,/भारत के रहनुमा तो नहीं हो! (साँप ही तो हो).
कमर में जो लटकती है उसे सलवार कहते हैं/ जो आपस में खटकती है उसे तलवार कहते हैं/ उजाले में भटकती है उसे हम तारिका कहते/ अँधेरे  में भटकती जो उसे सरकार कहते हैं! (सरकार कहते हैं).
लेकिन आज की पीढ़ी में बहुत कम हिंदीवालों को यह जानकारी होगी कि हास्य रसावतार गोपाल प्रसाद व्यास ने वीर रस से भरी ऐसी कविताएँ भी रची हैं जिन्हें सुनकर आज भी शरीर रोमांचित हो उठता है और मन में ओज भाव का संचार होता है. दरअसल उनका कवि-मन अपने कैशोर्य में सुभाष चंद्र बोस से सर्वाधिक प्रभावित था. उन्होंने सुभाष पर और  स्वतंत्रता संग्राम पर कई ओजस्वी कविताएँ लिखीं जिनमें नेताजी सुभाष चंद्र बोस, नेताजी का तुलादान, खूनी हस्ताक्षर, हिंदुस्तान हमारा है, मुक्ति पर्व, प्रयाण गीत और शहीदों में तू नाम लिखा ले रे! जैसे मर्मस्पर्शी गीत शामिल हैं.

28 मई, 2005 को यह पार्थिव संसार छोड़ गए कवि गोपाल प्रसाद व्यास की कीर्ति-काया अजर-अमर है. उनकी पुण्यतिथि पर उन्हें प्रणाम करते हुए ‘नेताजी सुभाष चंद्र बोस’ का यह अंश श्रद्धापूर्वक निवेदित है :

बाँधे जाते इंसान, कभी तूफ़ान न बाँधे जाते हैं।/
 काया ज़रूर बाँधी जाती, बाँधे न इरादे जाते हैं।।/
 वह दृढ़-प्रतिज्ञ सेनानी था,जो मौका पाकर निकल गया।/
वह पारा था अंग्रेज़ों की मुट्ठी में आकर फिसल गया।।   (नेताजी सुभाष चंद्र बोस).

शुक्रवार, 25 मई 2018

रामकथा आधारित एनिमेशन ‘सीता सिंग्स द ब्ल्यूज़’ : एक अध्ययन


रामकथा आधारित एनिमेशन ‘सीता सिंग्स द ब्ल्यूज़’ : एक अध्ययन

ऋषभदेव शर्मा और कुमार लव


‘रामायण’, ‘महाभारत’ और ‘बृहत्कथा’ भारतीय वाङ्मय के ऐसे आकर-ग्रंथ हैं जिनकी कथाएँ अनेक रूपों में देसी लोकसाहित्य से लेकर विदेशी साहित्य तक में फैली हुई हैं. इनमें भी विशेष रूप से अपनी सरलता, पारदर्शिता, मूल्यनिष्ठता और मानवीय पुरुषार्थ केंद्रिकता के कारण रामकथा संभवतः सर्वाधिक वैविध्य के साथ देश-विदेश के नाना भाषा समुदायों में प्रचलित मिलती है. इस मूलतः पौराणिक- ऐतिहासिक कथा का ढाँचा कुछ इतना लचीला है कि एक जगह से दूसरी जगह जाते-जाते इसका पाठ लगातार बदलता रहता है. एक काल से दूसरे काल तक जाने पर तो और भी बदलाव हो जाते हैं. देश-काल के भेद से उत्पन्न पाठ भेदों के कारण प्रायः इसे मिथक की कोटि में भी गिन लिया जाता है लेकिन विभिन्न प्रकार के पुरातात्विक, भाषिक, साहित्यिक और सांस्कृतिक साक्ष्य यह प्रमाणित करते हैं कि रामकथा मूलतः ऐतिहासिक है लेकिन उसके पात्र इतने अधिक लोकाभिराम हैं कि उसमें पुरावृत्त और लोकसाहित्य जैसी परिवर्तनीयता आ गई है. सहज रूप में लोकचित्त के अत्यंत निकट होने के कारण आज भी यह कथा नए-नए अवतार धारण करके रामत्व अथवा राम संस्कृति के मूल्यों को अधुनातन पीढ़ियों को सौंपने का काम कर रही है. 


अपनी इस विश्वयात्रा में रामकथा ने यदि हजारों हजार वर्ष पहले विभिन्न लोककलाओं और माध्यमों का सहारा लिया तो क्रमशः मौखिक से लिखित साहित्य की ओर भी प्रस्थान किया. उसी समय से लिखित और मौखिक दोनों ही परंपराओं में रामकथा अनेक रूपों में मिलने लगती है. स्वयं संस्कृत में ही रामकथा के विभिन्न पात्रों के अवलोकन बिंदु से संचालित विविध पाठ मिलते हैं. यह इस कथा की लोकतांत्रिक प्रकृति ही है कि देश-दुनिना में राम संस्कृति साहित्य के अलावा बित्तिचित्रों, रेखांकनों, रंगचित्रों, मूर्तियों और स्मारकों के रूप में उपलब्ध होती है. इस लोकतांत्रिक प्रकृति के कारण ही इस कथा के मुख्य पात्रों के क्रियाकलापों पर प्रश्न उठाने की परंपरा भी आरंभ से ही चली आ रही है. कहने का आशय यह है कि रामकथा की विश्वयात्रा का एक आधार यदि इसमें निहित नैतिक मूल्य हैं तो दूसरा बड़ा आधार इसकी वह लोकतांत्रिक प्रकृति है जो इसे विभिन्न देश-काल तथा भाषा-समुदाय के अनुरूप ढल जाने देती है. यही कारण है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के वैश्विक विस्फोट के वर्तमान युग में भी यह कथा सिनेमा से लेकर सोशल मीडिया तक तथा कार्टून कथाओं से लेकर एनीमेशन फिल्मों तक के लिए सुग्राह्य और लोकप्रिय कथा है. इसके मोटिफ का इस्तेमाल करते हुए तो जाने कितनी कथाएँ विविध माध्यमों से रची जा चुकी हैं और निरंतर रची जा रही हैं, लेकिन एनिमेशन फिल्म जैसा माध्यम भी इससे अछूता नहीं है. एक ओर हनुमान जैसे पात्रों पर आधारित एनिमेशन विभिन्न टीवी चैनलों पर लोकप्रिय है और विभिन्न भाषाओँ में उनकी डबिंग की जा रही ही तो दूसरी ओर सीता के दृष्टिकोण से रचित एनिमेशन फिल्म ‘सीता सिंग्स द ब्ल्यूज़’ (2008) अमेरिका में रची जाकर रामत्व की विश्वयात्रा को नया आयाम देती देखी जा सकती है. 


लोक गायन की परंपरा से यह ज्ञात होता है कि वाल्मीकि द्वारा लेखबद्ध किए जाने से पहले ही राम और सीता की गाथा ऐतिहासिक वृत्ति की सीमाओं को लांघकर लोकगाथा और निजंधरी कथा का रूप धारण कर चुकी थी. तब से अब तक जब जब भी इसे लिखा गया, मंचित किया गया या किसी भी कला माध्यम द्वारा अंगीकृत किया गया तब तब इन नए पाठ रचने वालों ने मौलिक उद्भावनाओं के नाम पर इस कथा को कभी विकसित किया, तो कभी विकृत भी किया. लोकगाथा बन चुके चरित्रों और घटनाओं के साथ ऐसा होणा स्वाभाविक ही है क्योंकि जन-मन ऐसी गाथाओं की अपने मनोनुकूल व्याख्या और पुनर्रचना करने के लिए स्वतंत्र होता है. ‘सीता सिंग्स द ब्ल्यूज़’ पर भी यह बात लागू होती है. निर्देशक के अनुसार यह फिल्म सत्य और न्याय की गाथा के साथ-साथ समानता के अधिकार के लिए स्त्री की चीख भी है. इस कथन में रामकथा की वैश्विक प्रासंगिकता निहित है. 


‘सीता सिंग्स द ब्ल्यूज़’ एक एनिमेटड फिल्म है. इसके बारे में रोचक तथ्य यह है कि निर्माता-निर्देशक ने इसे सर्जनात्मक सामान्य लाइसेंस (क्रिएटिव कॉमन्स लाइसेंस) के अंतर्गत सर्वसुलभ कराया है. अर्थात यह फिल्म इस फिल्म को कोई भी देखने के साथ-साथ संपादित, परिवर्तित और परिवर्धित कर सकता है. हाँ, यह बात उन कुछ गीतों पर लागू नहीं है जिनका मूल कॉपीराइट किसी दूसरे के पास है. निर्देशक नीना पेले ने इस फिल्म को ‘लोक’ को अर्पित करते हुए अपनी वेबसाइट पर लिखा है, “मैं ‘सीता सिंग्स द ब्ल्यूज़’ आपको सौंप रही हूँ. वैसे तो सारी संस्कृति की तरह यह पहले से ही आपकी है, लेकिन मैं इसका विधिवत उल्लेख कर रही हूँ. आप इसे मुक्त रूप से वितरित करें, कॉपी करें, शेयर करें, सहेज कर रखें और प्रदर्शित करें. यह गाथा साझा संस्कृति की विरासत है और उसीको समर्पित है.” वे आगे स्पष्ट करती हैं कि ‘सीता सिंग्स द ब्ल्यूज़’ को कॉपी करने, साझा करने, प्रकाशित करने, सहेजने, प्रदर्शित करने, प्रसारित करने या रीमिक्स करने के लिए किसी प्रकार की अनुमति की आवश्यकता नहीं है. व्यावसायिक बुद्धि भले ही इस सब का मूल्य निर्धारित करने को कहती हो, लेकिन निर्माता की इच्छा यह है कि यह रचना हर उस व्यक्ति तक भी पहुँचे जो किसी भी प्रकार का भुगतान करने में असमर्थ है. उन्होंने अपने दर्शक पर, संस्कृति पर और स्वतंत्रता की भावना पर विशवास जताया है. इसे रामकथा को नए माध्यम द्वारा जन-जन तक पहुँचाने के लिए प्रौद्योगिकी के मुक्त/मुफ्त उपयोग का अच्छा उदहारण मानना चाहिए. 

फिल्मकार को इस बात का अंदाजा है कि जिस कहानी पर यह फिल्म बनाई जा रही है, उससे दर्शक पहले से किसी न किसी रूप में परिचित हैं. इसलिए उन्होंने चरित्रों को स्थापित करने या कथा के किसी एक विशिष्ट पाठ को प्रतिपादित करने के बजाय शुरू से ही इस बात पर ध्यान दिया है कि एन्नेटे हैंशा की आवाज में सीता की निजी अनुभूति की अभिव्यक्ति हो सके.

यह फिल्म चार कथात्मक इकाइयों में बँटी हुई है. पहली इकाई का संबंध आधुनिक कथा से है. यह कथा नीना पाले की है. नीना अपने पति और बिल्ली के साथ सैन फ्रांसिस्को में सुखपूर्वक रह रही है. तभी (2002) पति को भारत में नौकरी मिल जाती है और वह त्रिवेंद्रम चला जाता है. महीने भर में पति का बस एक फोन आता है. इस उपेक्षा से आजिज़ आकर वह भी पति के साथ रहने के लिए भारत आ जाती है. पति किसी प्रकार की प्रसन्नता नहीं दर्शाता और पत्नी के प्रति पूरी तरह उदासीन रहता है. इसी बीच अपनी कॉमिक फिल्म के सिलसिले में पत्नी को न्यूयॉर्क जाना पड़ता है. पीछे-पीछे पति के ईमेल के रूप में संबंध-विच्छेद की घोषणा आ जाती है. अपने खालीपन को भरने के लिए वह ‘रामायण’ पढ़ना शुरू करती है. दरअसल अमेरिका में रहने वाली नीना भारत आने पर ही रामकथा से परिचित हुई थीं. एन्नेटे हैंशा को सुनने के बाद उन्हें लगा कि सीता की और उनकी अपनी कहानी मैं कुछ ऐसी समानांतरता है जिसे किसी संगीत-रूपक का आधार बनाया जा सकता है. उन्होंने इस विषय को लेकर एक संगीत-वीडियो बनाने का निश्चय किया. फलस्वरूप, यह एनिमेशन फिल्म ‘सीता सिंग्स द ब्ल्यूज़’ अस्तित्व में आई.

इस कथावृत्त की दूसरी इकाई का संबंध सीधे-सीधे रामायण से है.यहाँ कथावाचक के रूप में हमारे सामने तीन छाया कठपुतलियाँ आती हैं. आप इन्हें भारतीय भी समझ सकते हैं औरचाहें तो इंडोनेशियन भी मान सकते हैं. इन छायापुतलियों के पास रामकथा की धुंधली-धुंधली यादें हैं जिनका निर्माण रामलीलाओं, टीवी सीरियलों और उन तमाम दूसरे-दूसरे पाठों के आधार पर हुआ है जिन्हें अलग-अलग माध्यमों में रामकथा के रूप में टुकड़े टुकड़े दास्तान की तरह अपनाया और पेश किया जाता है. एक खास बात इन तीनों छायापुतलियों की यह है कि ये पूरी तरह लोकतांत्रिक हैं. इन तीनों का अपना-अपना नजरिया है, मगर कट्टरता नहीं. तीनों को यह भली प्रकार मालूम है कि मेरे अलावा दूसरों का नजरिया भी ठीक हो सकता है. उन्हें कतई जरूरी नहीं लगता कि सबका सच एक जैसा हो. बल्कि वे यह मान कर चलती हैं कि हम तीनों ही सही हो सकती हैं. कहना न होगा कि यह बात शायद हिंदू जनजागृति समिति की समझ में नहीं आ सकी थी इसीलिए उन्होंने राम कथा पर आधारित और परंपरागत माध्यम के साथ-साथ आधुनिक प्रौद्योगिकी के सहारे नव मीडिया का उपयोग करते हुए रचे जा रहे रामचरित के नए पाठ को जन भावनाओं को ठेस पहुँचाने और तिरस्कार करने वाला मानकर इस पर प्रतिबंध की माँग (2009) की थी.

कथावृत्त की तीसरी इकाई के रूप में हमारे सामने सीधे-सीधे रामायण के विविध कांड आते हैं. इसके लिए फिल्मकार ने अठारहवीं शताब्दी की राजपूत पेंटिंग शैली का उपयोग किया है. दरअसल राजपूत पेंटिंग् शैली को महाकाव्य का चित्रांकन करने के लिए बहुत उपयोगी और उपयुक्त माना जाता है. पारंपरिक रूप से रामायण का चित्रांकन इस शैली में होता रहा है. आप जानते ही हैं कि राजपूत एक युद्धक जाति है और इसीलिए इस शैली में रामायण को एक ऐसे युद्ध-महाकाव्य के रूप में चित्रांकित किया जाता है जिसमें काव्यनायक युद्ध करता है और नायिका को पृथ्वी की भांति जीतने-हारने की ‘वस्तु’ माना जाता है; नायिका का हरण हो जाता है और नायक उसे खलनायक के चंगुल से निकालने के लिए भीषण युद्ध करता है, अपना नायकत्व स्थापित करता है.

इस कथावृत्त की चौथी इकाई का निर्माण सीता की आत्माभिव्यक्ति पर आधारित संगीतमय प्रस्तुति से हुआ है. यह सीता पुराणों वाली सीता नहीं है. या कहें कि मध्यकाल की सीता नहीं है. यह तो आज की वह सीता है जो राम की छाया और अनुगामिनी मात्र नहीं बल्कि ऐसी स्वतंत्र चेतना संपन्न स्त्री है जो अपने साथ किए जा रहे तमाम तरह के लैंगिक भेदभाव और वस्तुकरण की परंपरा की आलोचना कर सकती है; उस पर अपना निर्णय सुना सकती है, विरोध दर्ज करा सकती है. यह सीता जहाँ आनंद से परिपूर्ण है, वहाँ अपने आनंद को नृत्य के माध्यम से व्यक्त करती है और जहाँ पीड़ा और क्रोध से तपती है, वहाँ करुणा और उग्रता को भी छिपाती नहीं है. वह अपनी कारुणिक परिस्थितियों के प्रति पूरी तरह सचेत है और इस बात का भी उसे पूरा ख्याल है कि उसे इस विश्व की सर्वाधिक पवित्र स्त्री और सतीत्व के आदर्श के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त है. इस एनिमेशन फिल्म की सीता बड़ी सीमा तक मैक्स फ्लीशर की एनिमेटेड कार्टून पात्र बेट्टी बूप के समान है जो अपनी कहानी खुद बयान करती है. यह कहानी नीना की कहानी के समानांतर चलती है जिन्होंने खुद अपनी कहानी के आधार पर इस एनिमेशन की रचना की है.

आधुनिक मीडिया और प्रौद्योगिकी की सहायता से रचित रामकथा के इस नए पाठ में जो बात सर्वाधिक आकर्षित करती है वह है सीता का सर्वथा नए संदर्भ में प्रतिष्ठापन. पारंपरिक सभी पाठों में सीता की महानता शूर्पणखा, अहल्या, ताड़का, कैकेयी और अन्य स्त्री पात्रों के बरक्स रची जाती रही है. लेकिन इस नए पाठ में सीता को पितृसत्तात्मक व्यवस्था के कारण अन्याय का शिकार होते हुए दिखाया गया है. इस कारुणिक दशा के बावजूद वह विलाप नहीं करती बल्कि अपने सम्मान का प्रश्न उपस्थित होने पर स्वाभिमान पूर्वक स्वयं राम का परित्याग कर देती है. यहाँ सीता महावृतांत का प्रस्तुतीकरण करने वाली छायापुतलियों के साथ एकाकार हो जाती है और दर्शकों को सावधान करती है कि किस तरह महान कथावृत्त रचे जाते रहे हैं और किस तरह उनकी पात्र परिकल्पना हमारे साधारणीकरण की प्रक्रिया को प्रभावित करती रही है. इस नए पाठ में राम-लक्ष्मण के चरित्र का प्रक्षालन किया गया है और शूर्पणखा के अंग-भंग की शर्मनाक घटना को छोड़ दिया गया है. यहाँ रावण बदले के लिए नहीं बल्कि शूर्पणखा के चालाकी भरे उकसावे में आकर सीता-हरण पर आमादा होता है. इसी प्रकार स्वर्ण-मृग पर सीता ही नहीं, स्वयं राम भी मुग्ध होते हैं और अपनी प्रिया को उपहार देने के लिए उसका शिकार करने निकलते हैं.

रामकथा का यह नया पाठ इस मामले में भी नया है कि फिल्मकार ने रावण को समस्त बुराइयों के प्रतीक के रूप में अंकित नहीं किया है. नीना के रावण में एक ही बुराई है और वह है कि उसने शूर्पणखा के उकसाने पर सीता का अपहरण किया वरना तो रावण एक महान विद्वान, तपस्वी और अपनी आँतों से वीणा बजा सकने वाला सिद्धहस्त संगीतकार है. इस फिल्म को देखकर दर्शक को लगता है कि रावण कोई मोगेंबो जैसा अपराधी चरित्र नहीं है बल्कि हमारे अपने पूर्वग्रहों ने उसकी वैसे खलनायक वाली छवि बना रखी है. लेकिन यह भी ध्यान आकर्षित करने वाला तथ्य है कि भले ही रावण ने कभी भी सीता का स्पर्श तक नकिया हो तो भी यहाँ उसकी इस कारण से कोई प्रशंसा नहीं की गई. स्त्री विमर्श की दृष्टि से तो रावण और राम दोनों ही सीता के वस्तुकरण के अपराधी हैं; एक ने उनका अपहरण किया तो दूसरे ने मिथ्या आरोप लगाकर निर्वासित किया.

विश्व भर के दर्शकों के लिए निर्मित किए गए रामकथा के इस पुनर्पाठ की केंद्रीय घटना सीता की अग्नि परीक्षा है. जब सीता को पता चलता है कि राम तो अपने क्षात्रधर्म का पालन करते हुए अपने पुरुष पुरुषत्व को प्रमाणित करने के लिए युद्ध कर रहे थे और उनके समक्ष सीता के लिए अपनी पवित्रता अग्निपरीक्षा द्वारा प्रमाणित करना आवश्यक था, तो वह अपमान की अग्नि से दहकने लगती हैं और अग्निपरीक्षा देकर अपनी पवित्रता प्रमाणित करती हैं. इसके बावजूद उन्हें किसी धोबी के कथन के बहाने धोखे से निर्वासित कर दिया जाता है. बाद में, फिर से पवित्रता का प्रमाण माँगा जाता है. ये दोनों ही अवसर स्त्रीत्व के चरम अपमान के अवसर हैं. इनसे जुडी सीता की मनोदशा को ‘एन्नेटे हैंशा’ की दर्दभरी आवाज में ‘मीन टू मी’ गीत में मर्मस्पर्शी अभिव्यंजना प्राप्त हुई है .यहाँ वेक्टर ग्राफिक एनीमेशन की अद्यतन तकनीक का प्रयोग प्रौद्योगिकी के रचनात्मक संयोजन का सुंदर उदाहरण है. इसके अलावा यह घटना नीना के अपने विवाह-विच्छेद की घटना के साथ बिंब-प्रतिबिंब भाव से इस तरह जोड़ दी गई है कि युगों पूर्व की सीता और आज की नीना एक साथ आकर दर्शक के सामने खड़ी हो जाती हैं. इस हृदय विदारक क्षण को रीना शाह ने अपने उग्र नृत्य द्वारा इस तरह साकार किया है कि तिरस्कृत, निर्वासित और परित्यक्त स्त्री की आंतरिक वेदना की आग दर्शक सहज ही महसूस कर पाता है. आश्चर्य नहीं कि रामकथा का यह स्त्री पाठ सीता द्वारा राम के परित्याग के रूप में अपने चरमोत्कर्ष को प्राप्त करता है. सीता राम को त्याग देती हैं और अपनी माता पृथ्वी की गोद में चली जाती हैं. इसके बाद एक स्वप्न दृश्य है जिसमें लिंगभेद जनित भूमिकाएँ बदल जाती हैं और भगवान विष्णु शेषशय्या पर विराजमान लक्ष्मी के पाँव दबाते नज़र आते हैं. 


निष्कर्ष के रूप में यह कहा जा सकता है कि कंप्यूटर ग्राफिक्स और फ़्लैश एनीमेशन की अधुनातन प्रौद्योगिकी के सहारे निर्मित नीना पाले की यह फिल्म- 

- रामकथा में निहित स्त्री-पुरुष संबंधों के तनाव को सामने लाती है. (शायद ये तनाव ही परंपरागत सीता को छाया-सीता बनने के लिए मजबूर करते रहे हैं.) 
- रामकथा के लोकतांत्रिक चरित्र को उभारती है और ध्यान दिलाती है कि जन-जन द्वारा अंगीकार की गई इस गाथा को किसी एक जड़ फ्रेम में बाँधना इसकी हत्या करने जैसा है. (इस प्रकार यहाँ आधुनिक हठवादियों के आक्षेपों के औचित्य पर सवाल उठाया गया है.) 
- कथा सुनाने वाली तीन छायापुतलियों के बहाने सीता की पवित्रता के संबंध में अलग-अलग मत-वादों को सामने लाती है तथा नीना और सीता के बिंब-प्रतिबिंब भाव से अंकन द्वारा यह विश्वास दिलाने का प्रयास करती है कि एक स्वाभिमानी स्त्री के रूप में सीता ने पातिव्रत्य के प्रमाण की माँग के समय कैसा अनुभव किया होगा. 
- स्त्री-प्रश्नों के अलावा सत्य और न्याय के भी शाश्वत प्रश्नों पर सोचने के लिए अपने ग्लोबल दर्शक समुदाय को प्रेरित करती है और राम संस्कृति की विश्वयात्रा को आगे बढाती है.

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 http://blog.ninapaley.com/2013/01/18/ahimsa-sita-sings-the-blues-now-cc-0-public-domain/

Director Nina Paley's long synopsis from the press section at SitaSingstheBlues.com, retrieved May 4, 2008

https://openglam.org/2013/01/19/sitas-free-landmark-copyleft-animated-film-is-now-licensed-cc0/

Ekadashi, Chaitra Shuddha. Hindus, Strongly Protest against movie denigrating Devi Sita!Hindu Janajagruti Samiti. April 5, 2009

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· ऋषभदेव शर्मा, पूर्व प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद (तेलंगाना), भारत
 · कुमार लव, हेड, कस्टमर सक्सेस, सविशा, गोरेगाँव-पूर्व, मुंबई-400063 (महाराष्ट्र), भारत.