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बुधवार, 18 मार्च 2020

डॉ. निशंक की उदात्त मूल्यदृष्टि और ‘कृतघ्न’


डॉ निशंक के उपन्यासों में जीवन-दर्शन, संपादक- डॉ. योगेंद्र नाथ शर्मा 'अरुण', प्रकाशक- हिंदी साहित्य निकेतन, 16, साहित्य विहार, बिजनौर, उत्तर प्रदेश. आईएसबीएन-
978 93 8681 2612 

डॉ. निशंक की उदात्त मूल्यदृष्टि और ‘कृतघ्न’
  • प्रो. ऋषभ देव शर्मा 
डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक (ज. 15 अगस्त, 1959) राजनीति और साहित्य को एक साथ साधने वाले सव्यसाची हैं। राजनीति और साहित्य दोनों ही उनके लिए समाज के उत्थान और आदर्श की प्रतिष्ठा के उपकरण हैं। उनकी अधिकांश कृतियाँ राष्ट्रीय चेतना, सामाजिक सरोकार और मानवतावाद की भावना से ओतप्रोत हैं। राजनेता और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में भी उन्हें एक ऐसे जमीन से जुड़े नायक के रूप में जाना जाता है जो लोक की मिट्टी में समाई अपनी जड़ों को कभी भी भूलता नहीं है। 30 (या शायद इससे भी अधिक) काव्य संकलनों, कथा संग्रहों और उपन्यासों के रचनाकार डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रह चुके हैं तथा लोकसभा सांसद के रूप में भी अपने क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने का उन्हें गौरव प्राप्त है। राजनेता और साहित्यकार दोनों ही रूपों में उन्होंने प्रभूत यश अर्जित किया है। लेकिन अपनी जमीन से जुड़े रहने के कारण इन तमाम उपलब्धियों के बावजूद वे अपने निरभिमान सहज स्वभावी पारदर्शी व्यक्तित्व को बचाकर रख सके हैं। उनके इस व्यक्तित्व में एक विशेष प्रकार की उदारता और उदात्तता दिखाई देती है। 
प्रमुख पाश्चात्य काव्यशास्त्री लोंजाइनस की मान्यता है कि किसी साहित्यिक कृति में उदात्त तत्व का अवतरण तभी संभव है जबकि उसके रचनाकार के अपने जीवन और व्यक्तित्व में औदात्य विद्यमान हो। यह उक्ति डॉ. निशंक के व्यक्तित्व और कृतित्व पर पूरी तरह लागू होती है। अर्थात उनके व्यक्तित्व में विद्यमान औदार्य और औदात्य ही उनके कृतित्व में उदात्त तत्व के रूप में प्रतिबिंबित होता है। उनका उपन्यास कृतघ्न (2015. नई दिल्ली : प्रभात प्रकाशन) भी इस कथन को प्रमाणित करता है। 
कृतघ्न का केंद्रीय चरित्र अंबुज वास्तव में उपन्यासकार की आदर्श और उदात्त चरित्रसृष्टि का पर्याय है। लोंजाइनस ने किसी रचना में औदात्य के साधक तत्व के रूप में उदात्त चरित्र के चयन और तदनुरूप उदात्त घटनाक्रम के संयोजन को अत्यंत आवश्यक माना है क्योंकि हीन चरित्र और क्षुद्र घटनाक्रम के सहारे उदात्त जीवन मूल्यों की स्थापना नहीं की जा सकती। अंबुज के माध्यम से लेखक ने जहाँ एक ओर व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के उच्च मूल्यों की प्रतिष्ठा की है, वहीं यह भी दर्शाया है कि आदर्श और मूल्यनिष्ठ जीवन जीना अपने आप में कोई सरल कार्य नहीं है। समाज में परमार्थ का टकराव सदा स्वार्थ से होता रहता है। क्षुद्रताएँ येन केन प्रकारेण उच्चता को पराजित करने के लिए घात लगाए बैठी रहती हैं। अंबुज के जीवन में भी एक ऐसा समय आता है जब उसकी तमाम सदाशयता और उदारता असफल होती दिखाई देती है। पूनम की महत्वाकांक्षा और ईर्ष्या जैसी क्षुद्र मनोवृत्तियाँ चरमोत्कर्ष पर इतनी विकराल हो उठती हैं कि अंबुज की तमाम प्रतिष्ठा मिट्टी में मिलती हुई प्रतीत होने लगती है। वह (मी टू अभियान की तर्ज पर) अंबुज पर अपने शोषण का शर्मनाक लांछन लगाती है। एक बार को तो ऐसा प्रतीत होता है कि क्षुद्रता ने उदारता को पराजित कर दिया है। यदि ऐसा हो जाता तो एक ओर तो आदर्शवादी जीवन मूल्यों की पराजय घटित होती तथा दूसरी ओर पूनम जैसे हीन चरित्र की सृष्टि करने के कारण रचनाकार पर यह आक्षेप किया जा सकता था कि उसने जानबूझकर अपने स्त्री पात्र को कपट, विश्वासघात और कृतघ्नता की प्रतिमूर्ति के रूप में रचा है। यदि ऐसा होता तो यह निष्कर्ष निकलता कि लेखक स्त्री-विरोधी पुरुषवादी सामंती सोच से ग्रसित है। लेकिन डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक यह किसी भी प्रकार प्रतिपादित नहीं करना चाहते कि स्त्री कपटी, विश्वासघाती और कृतघ्न होती है। इसीलिए उन्होंने पूनम के समानांतर सुकन्या का चरित्र गढ़ा है जो अंबुज की खोई हुई प्रतिष्ठा को पुनः प्राप्त करने का माध्यम बनती है और पूनम द्वारा लगाया गया लांछन पूरी तरह निराधार और असत्य सिद्ध होता है। मिथ्या पर सत्य की विजय द्वारा इस प्रकार लेखक ने उस मूलभूत भारतीय जीवन मूल्य को प्रतिष्ठित किया है जिसके अनुसार अंधकार और मृत्यु नहीं, प्रकाश और जीवन ही शाश्वत हैं। इस सारी सकारात्मकता को पुंजीभूत करने के लिए केवल अंबुज और सुकन्या ही सक्रिय हों, ऐसा नहीं है। बल्कि पूनम के अतिरिक्त उपन्यास के शेष तमाम पात्र इसी के लिए सचेष्ट दिखाई देते हैं। इससे यह भी निष्कर्ष प्राप्त होता है कि यदि व्यक्ति का प्रयोजन सकारात्मक और सामाजिक हित में हो तो विपरीत परिस्थितियाँ होने पर भी उसे अपने कार्य में साथ देने वाली शक्तियों का संबल अवश्य मिलता है। आदर्श का मार्ग कठिन और दुर्गम अवश्य है लेकिन उस पर चलकर महान उद्देश्य की पूर्ति अगम और असंभव नहीं है – यह संदेश देने के कारण कृतघ्न सकारात्मक जीवन मूल्यों की प्रेरक कृति बन गई है। 
कृतघ्न के स्थापत्य में भी पर्याप्त औदात्य निहित है। होना भी चाहिए; क्योंकि उदात्त विषयवस्तु, उदात्त चरित्र और उदात्त विचार को व्यक्त करने के लिए स्थापत्य और भाषा का भी उदात्त होना आवश्यक है। अन्यथा रचना में औदात्य के स्थान पर व्यंग्य की सृष्टि हो जाएगी। डॉ. निशंक ने यद्यपि इस उपन्यास में संयोग, दुर्घटना, मृत्यु और दुर्भाग्य चक्र का सहारा लेकर बार-बार त्रासदी रची है लेकिन इन तमाम त्रासद परिस्थितियों के समांतर एक विश्वसनीय संभाव्यता भी सक्रिय दिखाई देती है। इस विश्वसनीय संभाव्यता का स्रोत उस मनोवैज्ञानिकता में निहित है जिसके सहारे रचनाकार ने अंबुज, वर्षा, सुकन्या, गुंजन और पूनम जैसे पात्र रचे हैं। उपन्यास के शीर्षक के अनुरूप जिस नारी पात्र में तमाम तरह की नकारात्मकता को साकार किया गया है उसकी मनोविज्ञान से संगति इतनी स्वाभाविक बन पड़ी है कि उसकी गतिविधि और भावनाएँ न तो कहीं असंभव लगती हैं और न रंच भर अविश्वसनीय। अभावों में पली मातृ-पितृ विहीन एक लड़की दादी से सुनी लोक कथाओं की राजकुमारी की तरह अपने आपको देखना शुरू कर देती है। राजमहल और राजकुमार का सपना उसके अवचेतन में इतने गहरे पैठ जाता है कि उसका समूचा व्यक्तित्व उसी के अंधेरे में कैद हो जाता है। हठ और जिद से भरी हुई वह लड़की जब देखती है कि उसका राजकुमारी की तरह राजमहल में बसने का सपना टूट रहा है तो हताशा में वह चरम नकारात्मक कदम उठाती है। लेकिन उसके भीतर एक सच्ची औरत भी विद्यमान है जो उसकी डायरी के पन्नों पर अपने अस्तित्व को अंकित करती रहती है। इससे यह भी प्रकट होता है कि लेखक अपने इस खल पात्र को मूलतः खल नहीं मानता। विपरीत परिस्थितियों ने उसे खलनायिका बना दिया, अन्यथा वह तो सेवा सुश्रूषा की प्रतिमूर्ति एक नर्स मात्र थी। यहाँ पुनः यह संदेश निहित है कि कोई व्यक्ति मूलतः क्षुद्र और तुच्छ नहीं होता, उसकी ऐसी मनोवैज्ञानिक विकृति के लिए वह परिवेश और परिस्थितियाँ जिम्मेदार होती हैं जो उसे मिली। 
अंबुज हो या सुकन्या हो, या फिर पूनम हो – इन सबके माध्यम से डॉ. रमेश पोखरियाल निशंक यह भी दर्शाते हैं कि उच्च और यथार्थवादी लक्ष्य रखने वाला व्यक्ति सकारात्मक मूल्यों का विकास करता है जबकि अयथार्थवादी काल्पनिक लक्ष्य नकारात्मकता की ओर प्रवृत्त करते हैं। सकारात्मकता और नकारात्मकता के इस संघर्ष में लेखक ने मनुष्यता की अंतिम विजय में विश्वास व्यक्त किया है जो उसकी मानवतावादी आदर्श मूल्य दृष्टि के सर्वथा अनुरूप है।        

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बुधवार, 29 जनवरी 2020

(भूमिका) प्रो.एन. गोपि का कविता संकलन 'वसीयतनामा'

भूमिका

प्रोफ़ेसर एन. गोपि  (1948) समकालीन भारतीय कविता और तेलुगु आलोचना के प्रथम पंक्ति के रचनाकारों में शामिल हैं। उनकी कविताओं का देश-विदेश की 25 से अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उन्होंने अपने साहित्य अकादमी से पुरस्कृत काव्य 'समय को सोने नहीं दूँगा' के माध्यम से तो प्रभूत यश अर्जित किया ही है, नई काव्य विधा 'नानीलु' के प्रवर्तन के माध्यम से समकालीन तेलुगु मुक्तक काव्य जगत में एक आंदोलन का श्रेय भी अर्जित किया है। 'जलगीतम'  जैसी लंबी कविता से उन्होंने जल-चेतना फैलाने के लिए साहित्य के सार्थक उपयोग का अन्यतम उदाहरण प्रस्तुत किया है, तो 'वृद्धोपनिषद' के रूप में वृद्धावस्था विमर्श को नया सकारात्मक आयाम प्रदान किया है। उनके विभिन्न संकलनों से गृहीत कुछ कविताओं का यह हिंदी अनुवाद पाठकों को उनकी काव्य-प्रतिभा के विविध आयामों के दर्शन एक स्थान पर कराने की सदिच्छा से प्रेरित है। 'अनुवाद श्री' के विरुद से सम्मानित हिंदी और तेलुगु के प्रकांड विद्वान और संवेदनशील कवि डॉ. एम. रंगैया ने यह अनुवाद-कार्य अत्यंत समर्पण भाव के साथ संपन्न किया है। निस्संदेह यह कार्य भारतीय साहित्य की श्रीवृद्धि करने वाला तथा तेलुगु-हिंदी-सेतु को और सुदृढ़ करने वाला सिद्ध होगा।

प्रो. एन. गोपि समकालीन कवियों के बीच अपनी विशिष्ट काव्य-शैली के कारण निजी पहचान रखते हैं। वे वक्तव्य और विचारधारा की प्रधानता के इस युग में इस अर्थ में एक अपवाद की तरह हैं कि वे काव्यार्थ को संप्रेषित करने के लिए दैनिक जीवन से जुड़े चित्रों, रूपको,  उपमाओं, प्रतीकों और बिंबों की सहायता से अपनी काव्य-भाषा को गढ़ते हैं। सूक्ष्म लक्षणाओं और व्यंजनाओं से लबालब उनकी कविताएँ देखने में बड़ी मासूम लगती हैं, लेकिन तनिक निकट आते ही पाठक को अनुभूतियों के गहन गह्वर में खींच ले जाती हैं। साधारण से साधारण अनुभवों को काव्य-सत्य में ढलते हुए देखना हो, तो एन. गोपि की कविताओं में उसे बखूबी देखा जा सकता है। सड़क हो, या बस स्टॉप, या गुदड़ी, या बगीचा - प्रो. एन. गोपि  की सृजनात्मक कल्पना का संस्पर्श पाते ही सब नए-नए अर्थों से अभिमंत्रित विंबो में बदल जाते हैं। आँसू, काल (समय भी, मृत्यु भी), वर्षा और सूरज तो उनकी कविताओं के बीज-शब्द हैं ही; किसान, मजदूर, गाँव, शहर, भीड़ और प्रकृति के विभिन्न उपादान भी उनकी कविता के सर्व-परिचित प्रस्थान-बिंदु हैं, जहाँ से वे अपने पाठक को जीवन-यथार्थ और उसके पार तक की अंतरिक्ष यात्रा पर ले जाते हैं। यहाँ कवि और उसका परिवेश अलग-अलग नहीं रह जाते, बल्कि बिंब-प्रतिबिंब-भाव से एक दूसरे में गुँथ जाते हैं, मथ जाते हैं।

इस संकलन की कविताओं का एक मुख्य स्वर स्मृतियों का भी है।  वे स्मृतियाँ हैं - रिश्तों की, परिवार की और लोक की। कहना न होगा कि आज के मनुष्य के हाथ से स्मृतियों की यह संपदा छूटती जा रही है। इस स्मृतिविहीन  होते जा रहे उत्तरआधुनिक और अमानुषिक समय में कवि प्रो. एन. गोपि इन स्मृतियों को और मनुष्यता को केवल सहेजते और पुनः पुनः सिरजते ही नहीं हैं, अगली पीढ़ी को सौंपते भी हैं 

"कोई भी कल हो शायद मैं न रहूँ।
यदि कल सूरज उदित हो तो
कहिए कि निमिलीत मेरे नेत्रों में
आर्द्र एक अश्रु-बिंदु 
बचा रह गया है। 

"चाँद यदि दिखाई दे तो
अवश्य कहिए कि वह
किरणों का जाल बिछा रहा है लेकिन 
भीतर एक छोटी मछली 
अभी तक छटपटा रही है।

"… … …
कल की पीढ़ियों से 
विस्तार से कहिए कि 
मेरा अदृश्य होना मरण नहीं।
इस मिट्टी में
अक्षरों को बिखेरकर गया हूँ मैं।" 

इसके बाद कहने को क्या बचता है? 

समस्त शुभेच्छाओं सहित    
     
ऋषभदेव शर्मा 
परामर्शी (हिंदी),
मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी,  हैदराबाद-500032 
मोबाइल : 80 7474 2572

23 दिसंबर, 2019

बुधवार, 22 जनवरी 2020

(भूमिका) शून्य से लौटा हूँ - डॉ. एन. लक्ष्मी

हर कविता त्योहार है 


डॉ. एन. लक्ष्मी लंबे समय से हिंदी भाषा और साहित्य के अध्ययन-अध्यापन से जुड़ी हैं तथा अंडमान और निकोबार द्वीपसमूह में सेवारत हैं। अपनी इस प्रथम काव्यकृति के माध्यम से वे एक संभावनाशील तमिलभाषी हिंदी कवयित्री  के रूप में साहित्य के सुधी पाठकों के समक्ष उपस्थित हो रही हैं। मुख्यभूमि के पार हिंदी और उसकी सर्जनात्मकता के इस प्रसार का हिंदी जगत खुले मन से स्वागत करेगा। 

कवयित्री एन. लक्ष्मी का रचना-लोक उतना ही वैविध्यपूर्ण है जितना किसी भी भाषा-अध्यापक का होता है। वे कई भाषाएँ जानती-समझती हैं, लेकिन उन्होंने अपनी अभिव्यक्ति का माध्यम हिंदी को बनाया है क्योंकि उनके लिए हिंदी भारत के राष्ट्रीय और सांस्कृतिक मूल्यों को वहन करने वाली ही नहीं, उन्हें एक सूत्र में पिरोने वाली भाषा है। बेशक, लक्ष्मी के इस संग्रह में उनकी अभ्यास कोटि से लेकर परिमार्जित कोटि तक की कविताएँ शामिल हैं; लेकिन सर्वत्र उनकी मूल चिंता राष्ट्रीय और मानवीय प्रश्नों से जुड़ी हुई है। उनके लिए हर कविता ऐसा त्योहार है जो मनुष्य को प्रमुदित-प्रफुल्लित होने का अवसर प्रदान करता है। संभवतः यही कारण है कि उनकी कविताएँ सकारात्मक ऊर्जा से भरपूर हैं। दरअसल अपने व्यक्तित्व और जीवन के स्तर पर लक्ष्मी जिस सकारात्मकता से लबरेज दिखाई देती हैं, उसे ही वे अपनी कविता में भी बिंबित और प्रक्षेपित करती हैं। 

लक्ष्मी की कुछ कविताओं में कथात्मकता, नाटकीयता, संवादात्मकता  तो कुछ में चित्रात्मकता और आत्मालाप  की उपलब्धता इस बात का विश्वास दिलाती है कि इस कवयित्री में भाषा-शैली के बहुविध प्रयोग की क्षमता निहित है। शहीदों की कहानी, बूढ़े पीपल की जुबानी  - में उन्होंने फैंटेसी का आकर्षक रूप रचते हुए इतिहास और वर्तमान को बखूबी आमने-सामने ला खड़ा किया है। वे नए-पुराने काव्यरूपों को भी खूब आजमाती दिखाई देती हैं। दोहों  से लेकर पिरामिड  तक रचने में उनकी रुचि के प्रमाण इस कविता संग्रह में मिल जाएँगे। 

यद्यपि कवयित्री एन. लक्ष्मी ने विवरणात्मक इतिवृत्त  रचने में काफी सफलता पाई है, लेकिन उनकी काव्य-प्रतिभा उन कविताओं में अधिक सर्जनात्मक रूप में मुखर हुई हैं जिनमें वे या तो स्त्री-प्रश्नों से जूझती हैं या स्त्री-मन के कोमल तारों को छेड़ती हैं। पहले प्रकार की रचनाओं में स्त्री के अस्तित्व और अस्मिता की खोज का संघर्ष  निहित है तो दूसरे प्रकार की रचनाओं में प्रेम की विविध दशाओं के अनुभवों में खो जाने की साध  छिपी है। प्रकृति, लोक और रिश्ते-नाते इन दोनों ही प्रकार की कविताओं को मार्मिकता और आकर्षण की योग्यता प्रदान करते हैं। 

मुझे पूरा विश्वास है कि डॉ. एन. लक्ष्मी की इन कविताओं को हिंदी जगत में भरपूर प्यार और यश मिलेगा तथा वे निरंतर सृजनशील रहकर अपनी श्रेष्ठ कृतियों से  राष्ट्रभाषा को समृद्ध करती रहेंगी। 

शुभकामनाओं सहित 

ऋषभदेव शर्मा 
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद 
rishabhadeosharma@yahoo.com
मोबाइल : 8074742572  

शनिवार, 14 दिसंबर 2019

नपुंसकता पर रामनिवास साहू के उपन्यास 'तेरा मेरा साथ रहे' की भूमिका

भूमिका

"तेरा मेरा साथ रहे" (2019, कानपुर: माया प्रकाशन) डॉ रामनिवास साहू (1954)  का नया उपन्यास है। इसकी कथा स्त्री-पुरुष संबंध के अलग-अलग रंग के धागों से बुनी गई है। सरल रेखा में चलती इस कथा की नायिका भारतीय समाज की एक सामान्य स्त्री है। स्त्री के रूप में वह सामान्य है, लेकिन उसकी जीवन दशाएँ असामान्य हैं। हँसते-खेलते दांपत्य की कामना में विवाह की दहलीज पर पहला कदम रखते ही उसे अपने पति के असामान्य आचरण से दो-चार होना पड़ता है। औरतों से शर्माने वाला यह पुरुष एक रात खुद यह स्वीकार करता है कि वह नपुंसक है। उसकी यह नपुंसकता असाध्य है। इसके चलते पत्नी को बाँझ होने का लांछन ढोना पड़ता है। दोनों को घर छोड़ना पड़ता है। पर अधूरापन दोनों को ही राहु की छाया बनकर घेरे रहता है। सारे अपराध बोध के बावजूद, लेकिन, यह पुरुष भला मानुस है। सारे अभाव के बावजूद यह स्त्री समझदार गृहिणी है। उसका गऊपन पति को और भी अपराधी बना देता है। पत्नी तलाक लेने को तैयार नहीं होती, तो पति मर जाने, आत्महत्या,  का पाखंड करता है।

यहाँ से स्त्री सशक्तीकरण के सरकारी उपायों का लेखा-जोखा शुरू होता है। एक और पुरुष उस स्त्री के जीवन में आता है।  पुनर्विवाह और संतान भी। बाँझ होने का लांछन धुला तो सही, लेकिन लेखक ने एक और बड़ा तूफान क्रूरतापूर्वक रच डाला।

क्रूरता इस उपन्यास की उन स्त्रियों में भी पूरी कटुता के साथ विद्यमान है, जो अपने आचरण से उस युगों पुराने मिथ को चरितार्थ करती हैं कि स्त्री की शत्रु होती है। कई बार लगता है, लेखक स्वयं स्त्री के प्रति क्रूर हो रहा है। पर, यही तो इस तमाम किस्से की खूबसूरती है। एक पक्ष लेखक का है, जिसके केंद्र में स्त्री की पूजा का भाव है। दूसरा पक्ष उस तथाकथित पंथ का है जो स्त्री को पापमय मानता है और अबोध युवकों को नपुंसक बना देता है।  इन दो पक्षों के द्वंद में ही स्त्री-पुरुष संबंध की यह कथा पल्लवित होती है।

  • ऋषभदेव शर्मा
8074742572

रविवार, 8 दिसंबर 2019

हिंदी में अनूदित तेलंगाना की प्रतिनिधि तेलुगु कहानियों के संकलन 'अस्तित्व' की भूमिका : अथ




अथ ... 


तेलुगु कहानियों के इस प्रतिनिधि संकलन की पांडुलिपि से गुजरना मेरे लिए तेलुगु भाषा-समाज की अपने अस्तित्व को रेखांकित करने की जद्दोजहद के साहित्यिक साक्ष्य से गुजरने जैसा था। तेलंगाना साहित्य अकादमी ने हिंदी अनुवाद के माध्यम से समकालीन तेलुगु कहानी के विविध तेवरों से व्यापकतर पाठक समुदाय को परिचित कराने का जो अभियान छेड़ा है, वह स्तुत्य है। इस सारस्वत अभियान में सम्मिलित सभी कथाकार और अनुवादक साधुवाद के पात्र हैं। हिंदी भाषा-समाज उनके इस सत्प्रयास से तेलुगु कहानी की स्वस्थ और समृद्ध परंपरा से तो अवगत होगा ही; साथ ही, इन कहानियों के अत्यंत व्यापक सामाजिक सरोकारों से जुड़कर भारतीय कथा साहित्य के विराट परिसर का भी अनुभव प्राप्त कर सकेगा। 

यहाँ संकलित कहानियाँ विशेष रूप से समकालीन युगबोध से संपृक्त कहानियाँ हैं, तथापि ये उस पूरी परंपरा के ऋक्थ का भी बोध कराने में समर्थ हैं जो इनकी जड़ों में विद्यमान रहकर इनके अस्तित्व को अलग पहचान देता है। प्राचीन कथा-वाङ्मय से भिन्न आधुनिक बाना पहनते ही तेलुगु कहानी ने खुद को वैयक्तिक कूपमंडूकता से आगे निकालकर सामाजिक और सामूहिक सुख-दुख से जोड़ा। तभी से वह आदर्श और यथार्थ के समांतर रास्तों पर समान वेग से निरंतर विकसित हो रही है। आरंभिक सुधार और सामाजिक जागरण के युग से लेकर आज इक्कीसवीं शताब्दी के विविध उत्तर आधुनिक विमर्शों तक तेलुगु कहानी कभी भी अपनी ज़मीन और जनता से विमुख नहीं हुई। इस गहन सामाजिक संपृक्ति के बीज भले ही सारी भारतीय भाषाओं के कथा साहित्य के सदृश पुनर्जागरण आंदोलन और स्वतंत्रता संग्राम के रचनात्मक मौसम में अंकुरित हुए हों, लेकिन उनका पल्लवन तेलुगु प्रांत की उन विपरीत हवाओं के बीच हुआ है जिनका संबंध पहले तो हैदराबाद मुक्ति संग्राम से रहा और बाद में तेलंगाना की निजी पहचान की लंबी लड़ाई से रहा। यही कारण है कि इन कहानियों में आम आदमी के दुख-दर्द और तेलंगाना की धरती के रंगों को मुखर अभिव्यक्ति प्राप्त हुई है। यही वह केंद्रीय वस्तु है जो इन कहानियों को स्वतंत्र व्यक्तित्व प्रदान करती है। 

ये कहानियाँ इस कारण भी अपने निजी अस्तित्व को मनवाने में समर्थ हैं कि इनमें तेलंगाना-वासियों का दैनिक जीवन-संघर्ष तो मुखर हुआ ही है, उनका सांस्कृतिक सौंदर्य भी अपने ठेठ देसीपन की खुशबू के साथ उभरकर सामने आया है। गाँव हो या शहर, मुक्ति के पहले का संदर्भ हो या बाद का – ये कहानियाँ तेलंगाना के अतीत और वर्तमान परिवेश को पूरी प्रामाणिकता के साथ पाठक के समक्ष तह-दर-तह खोलती चलती हैं। इन तहों से परिचित होने के क्रम में पाठक जीवन-स्थितियों और जीवन-मूल्यों के परिवर्तन का भी साक्षात्कार करता चलता है। वह जहाँ यह देख पाता है कि इस ज़मीन पर नवाबों, निजामों और रजाकारों ने ही नहीं, लोकतंत्र के नुमाइंदों ने भी तरह-तरह के अत्याचार ढाए हैं और इसकी संतानों को मौत के मुँह में धकेला है; वहीं उसे यह देखकर और भी धक्का लगता है कि पिछड़ेपन और अंधविश्वास की गुंजलक ने आज भी यहाँ के जन-जीवन को अपनी गिरफ्त में ले रखा है। गरीबी और बेकारी युवक-युवतियों को विद्रोही और नक्सली बनने के लिए मजबूर कर रही हैं। इस क्रूर यथार्थ के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक पहलुओं पर से भी ये कहानियाँ पर्दा उठाती हैं। इस यथार्थ का कारुणिक विद्रूप तब अपनी भयावहता के साथ सामने आता है जब हम भोले-भाले मनुष्यों को अमानुष आचरण करते देखते हैं। ऐसे अवसरों पर आर्थिक और सामाजिक विषमता तथा रूढ जातिप्रथा के दुष्परिणाम पाठक के रोंगटे खड़े कर देते हैं। कहानीकार प्रायः ऐसी स्थितियों को पाठक के सामने खोलकर तो रख देते हैं, लेकिन अपनी ओर से कोई बना-बनाया समाधान पेश नहीं करते। इससे पाठक विचलित तो होता ही है, अपने विवेक से समाधान खोजने की दिशा में भी प्रवृत्त होता है। कभी-कभी ऐसा भी लगता है कि अपने समय की विवश मूल्यमूढ़ता और समाधानहीनता (प्रिकेरिटी) को पाठक के जेहन में उतारना भर लेखक को पर्याप्त लगता है क्योंकि उसे विश्वास है कि अगर पाठक ने अपने देश-काल के इन प्रश्नों को ठीक से समझ लिया तो साहित्यकार के अभीष्ट लोकमंगल के लिए भूमिका स्वतः तैयार हो जाएगी। 

ऐसी सामयिक और सामाजिक चेतनासंपन्न कहानियों को पाकर हिंदी जगत गद्गद होगा और खुले मन से इनका स्वागत करेगा, इस विषय में मैं पूर्णतः आश्वस्त हूँ। इस महत्कार्य के लिए तेलंगाना साहित्य अकादमी का भूरिश: अभिनंदन! 


- ऋषभदेव शर्मा 

पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष 
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान 
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा 
हैदराबाद-500004