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सोमवार, 22 मई 2017

(संपादकीय) सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोहं रामवल्लभां

लंबी सांस्कृतिक परंपरा से प्राप्त किसी कथा को महाकाव्य का आधार बनाते समय रचनाकार के समक्ष अनेक विकल्प हो सकते हैं. तब तो और भी अधिक जब वह कथा लोक और शास्त्र में अनेकानेक भिन्न-भिन्न पाठों के रूप में विद्यमान रामकथा हो. बाबा तुलसी ने स्वविवेक के बल पर इन पाठों के समांतर ‘मानस’ का पाठ-निर्माण किया है. हो सकता है कि पूर्वपाठों में अति महत्वपूर्ण समझा गया कोई प्रसंग कवि को न रुचे, तो उसे उसकी चर्चा न करने की स्वतंत्रता है. यह स्वतंत्रता ही नई कृति को मौलिक बनाती है. इस संदर्भ में एक रोचक प्रसंग सीता के जन्म से संबंधित है. वाल्मीकि रामायण में स्वयं विदेह जनक ऋषि विश्वामित्र के समक्ष स्पष्ट करते हैं कि खेत में हल चलाने पर उन्हें शिशु सीता की प्राप्ति हुई. अन्य भी अनेक कथाएँ सीता-जन्म के संबंध में प्रचलित हैं. लेकिन तुलसी बाबा मानस में इस प्रसंग का कोई उल्लेख नहीं करते. यहाँ सीता भूमिपुत्री के रूप में नहीं, बल्कि जानकी और वैदेही अर्थात विदेहराज जनक की पुत्री के रूप में वर्णित हैं और उनकी माता का नाम सुनयना है. जन्म किन परिस्थितियों में हुआ, इसका उल्लेख न करते हुए कवि ने उनके जन्म के कारण को भगवन राम के अवतार के हेतु के साथ स्वाभाविक रूप से जोड़ दिया है. नारद के शाप को चरितार्थ करने और पृथ्वी का भार हरने के लिए महाविष्णु सपरिकर अवतार लेते हैं, तो महालक्ष्मी को तो अवतरित होना ही है! 

मानस के आरंभ में ही बाबा तुलसी ध्यान दिलाते हैं कि कोई सीता को लौकिक स्त्री समझकर उनके आचरण को वाद-विवाद-प्रवाद-अपवाद का विषय न बनाए क्योंकि वे तो स्वयं इस चराचर जगत का उद्भव, स्थिति और संहार करने वाली महाशक्ति हैं; वे समस्त क्लेशों को नष्ट करने वाली तथा सर्वमंगला हैं; वे संपूर्ण कारणों के कारणस्वरूप राम की प्रिया हैं. यही कारण है कि पुष्पवाटिका में कंकन-किंकिनि-नूपुर-धुनि सुनकर राम भले ही चकित हों कि संयम का अभ्यासी मन सीता की ओर क्यों खिंच रहा है, सीता के मन में ऐसा कोई प्रश्न नहीं उठता. वे तो राम का आना सुनते ही दर्शन को आतुर हो उठती हैं और मन में पुरातन-प्रीति जगने से रोमांचित हो उठती हैं. नारद का शाप उन्हें याद आ जाता है और अपना व राम का शाश्वत रिश्ता भी! 

ऐसी महाशक्ति सीता की तुलना बाबा स्वयं लक्ष्मी से भी करने को तैयार नहीं हैं क्योंकि समुद्रतनया होने के कारण लक्ष्मी के तो विष और वारुणी जैसे खतरनाक भाई-बहन हैं. हाँ, अगर समुद्र छवि के अमृत से लबालब भरा हो और परमरूपमय कच्छपावतार पर धरकर रसराज शृंगार रूपी मंदराचल की मथानी को शोभा की रस्सी से लपेटकर कामदेव अपने दोनों हाथों से उसे मथे, तो सुख और सौंदर्य के जिस स्रोत का जन्म होगा , मेरी सीता मैया उससे कहीं अधिक सुखसौंदर्यमयी हैं; रूपवती हैं, गुणवती हैं, जगज्जननी हैं!

22 मई, 2017                                                                                                          - ऋषभ देव शर्मा 

शनिवार, 20 मई 2017

(भूमिका) रामकिशोर उपाध्याय की काव्यकृति 'दीवार में आले'

भूमिका 


रामकिशोर उपाध्याय अपने इस कविता संग्रह ‘दीवार में आले’ के माध्यम से एक ऐसे सुपरिचित संवेदनशील कवि के रूप में अपनी पहचान को गहराते हुए सामने आते हैं जिसके निकट वैयक्तिक और निजी अनुभूतियाँ भी तभी सार्थक और व्याख्येय हैं जब वे किसी सामान्य और सामाजिक अनुभव के यथार्थ से जुड़कर व्यापक संदर्भ प्राप्त करती हैं. साधारण प्रतीत होने वाली दैनंदिन घटनाओं के माध्यम से सहृदय के मानस को झकझोरने और कचोटने के अद्भुत सामर्थ्य से संपन्न ये कविताएँ अपनी सादगी से भी पाठक को मुग्ध कर जाती हैं. सरोकार की यह व्यापकता और अभिव्यक्ति की यह व्यंजकता कवि रामकिशोर उपाध्याय ने लोक जीवन के सहज सामीप्य से र्जित की है. यह संग्रह उनकी लोकप्राण रचनाधर्मिता को बखूबी रेखांकित करता है. यही नई शती के कवियों के बीच उनकी निजी और मौलिक छवि का आधार है. 

इस संग्रह में प्रस्तुत कुल 52 कविताओं में से अधिकतर में कवि ने समकालीन भारतीय जनमानस की चिंताओं को लाग-लपेट के बिना अभिव्यक्ति प्रदान की है. धार्मिक, सांप्रदायिक , क्षेत्रीय और भाषायी आग्रहों के तुमुल कोलाहल में ये कविताएँ धर्म-संप्रदाय से परे हवा और नदी की तरह मनुष्य से मन की बात करती हैं. इनकी जीवनी शक्ति लोकजीवन के प्रति इनकी आसक्ति में निहित है जो संग्रह की शीर्षक कविता से भी संक्षेप में, किंतु भली भांति, व्यक्त हुई है. रचनाकार के स्मृतिलोक में विलुप्तप्राय लोक की स्मृतियाँ आज भी दर्ज हैं जिनके सहारे वह विडंबना और विवशता का ऐसा पाठ रचता है कि पाठक एक ख़ास तरह की कसक और चुभन महसूस करता है. यह अनुभूति तब और भी गहराती जब इसका संबंध पाठक की चेतना में पहले से विद्यमान किसी व्यापक लोकानुभूति, पौराणिक प्रसंग या मिथक से जुड़ जाता है. अभिव्यक्ति की यह तकनीक ही रामकिशोर उपाध्याय की कविताओं की व्यंजन शक्ति को बढाती है. यथा – 

भुरभुरी यादों की 
चिकनी दोमट मिट्टी से 
खुद ही दीपक बनाकर 
अपनी आँखों की ज्योति से....
अपनी निद्रा के घी से ...... 
हर रोज रात में आलों को प्रकाशित करता 
काश ! आज मेरे घर की दीवारों में आले होते .... | 

वस्तुतः कवि रामकिशोर उपाध्याय उन स्थलों पर सर्वाधिक ध्यान आकर्षित करते हैं जहाँ वे कविता के चालू मुहावरे के पार जाकर देशजता और तद्भवता में अपनी काव्यभाषा की तलाश करते हैं. इस तलाश ने उन्हें लोक से नाभिनालबद्ध अनेक प्रभावी उपमान, रूपक,प्रतीक और बिंब प्रदान किए हैं. कुछ मिश्रित उदाहरण देखते हुए आइए इस कविता संग्रह के लोकधर्मी पाठ का विहंगावलोकन करते चलें : उबल-उबल कर आलू हो गया सारा जिस्म/ जब गर्म हवा छू गई उर्मियाँ तो सिंक गया ज़हन/ बैल की जोट/ गूँगी बिंदी/ पर इनकी आँखें चीखती हैं दर्द से, जब इनको निचोड़ा जाता है/ समय की कुक्षी में पल रहे भविष्य के बच्चे/ अवनि की बड़ी सी चादर हो, किसी पीर की दरगाह पर जैसे क्षितिज तक फैली/ कभी नंगे पाँव दौडती, गायों के खुरों से मिट्टी उड़ाती/ झील में पड़ी काई को कंकड़ से नहीं हटाया गया, कहीं बेवजह लहरों की नींद न टूट जाए / लाल लाल लावा, नीला नीला अंबर, दौडती रगें, नई चिकनी कोंपलें/ पानीदार नदी/ खुश हो पराग बिखेरता पुष्प/ आसमानी छतरी/ तितलियों के पंखों पर बैठकर आते शब्द/ अटरिया पर बैठा सावन/ और बूँदें ऐसे गिराते, जैसे किसी की खुश्क आँखों से टपकती हों यादें/ मन के सूखे तवे पर छू छू करके नाचते हे सूखे सावन/ जलते अलाव, टाट की बोरी के टुकड़े/ बरखा झमझमाकर गीत गा गई. इस तरह के तमाम प्रयोग इस कवि के सरोकार की व्यापकता के साथ ही अनुभूतियों की गहराई और अभिव्यक्ति की ताजगी का विश्वास दिलाते हैं और संकेत भी करते हैं कि कवि रामकिशोर उपाध्याय की अपनी ज़मीन यही है – इसी में उन्हें अपनी भावी रचनाओं की फसलें उगानी चाहिए.

रामकिशोर की कविताओं का एक और मार्मिक पाठ ग्रामीण जन की असुविधाग्रस्त जीवनी से रचा गया है. इस पाठ में एक ओर भारतीय लोकतंत्र की विफलता से उत्पन्न पीड़ा शामिल है तो दूसरी ओर परिवर्तन के प्रति अंतिम विश्वास रखने वाली वह जिजीविषा है जिसके बल पर इस देश का साधारण आदमी खुद को आत्महत्या से बचाता है. इस संग्रह में अनेक सथालों पर अलग–अलग प्रकार से कवि ने बाढ़ के संदर्भ जुटाए हैं. बाढ़ कहीं न कहीं कवि के भीतर भी है. इस अंतर्बाह्य बाढ़ के साथ पर्यावरण विमर्श से लेकर आदिवासी विमर्श तक के वे तमाम मुद्दे जुड़े हुए हैं जो प्रगति और विकास के नाम पर विनाश और विस्थापन की समस्याओं को उपजाकर लोक और प्रकृति को ही नष्ट नहीं कर रहे है, पृथ्वीग्रह और मनुष्यजाति के भविष्य के साथ भी खिलवाड़ कर रहे हैं. ऐसे संदर्भ स्थानीयता का अतिक्रमण करके इन कविताओं को वैश्विक परिप्रेक्ष्य प्रदान करते हैं. इस पाठ में जन की यातना को कवि कभी प्रश्नों के माध्यम से व्यक्त करता है तो कभी कथात्मकता, संवाद और चित्रनिर्माण की तकनीकों का सहारा लेता है. लोकसमाज की सरलता और भद्रसमाज की धूर्तता को कवि समांतरता द्वारा उभारता है तो दरिद्रता और संपन्नता के द्वंद्व को विडंबना और विसंगति के सहारे व्यक्त करता है. परिवर्तन की आकांक्षा को सतत जिलाए रखने में इस यातना-पाठ का मर्म निहित है – 

अफ़सोस है कि मैं बकरी नही हूँ 
इस मुल्क की प्रजा हूँ 
अब देखना हैं कि यह बाड़ा 
मुझे कब तक रोक कर रखता है..
आखिर वो सुबह कभी तो आएगी ...... |

यहाँ यह भी कहना ज़रूरी लग रहा है कि रामकिशोर केवल लोकवेदना के ही गायक नहीं हैं, प्रेम और सौंदर्य के भी चितेरे हैं. उन्होंने प्रेम की पीर को भी समान शिद्दत से उकेरा है. उपमानों की एक माला देखते चलें- 

छोटे से वृक्ष की लंबी छाया हो 
ताल में खिला कँवल हो 
सूर्य की किरणों में दिखा चंद्रमा हो 
मोहक चांदनी में खिली तेज धूप हो 
साहित्यिक अभिव्यक्ति से परे 
लालित्य का अनुपम भंडार हो 
किसी विशेषण से अधिक विशेष 
अलभ्य सौदर्य को चिढाता शृंगार हो 
क्या फर्क पड़ता है ...............तुम क्या हो! 

बहुत कुछ है अभी कहने को. अभी तो बात शुरू ही की है मैंने. लेकिन,बाकी बातें फिर कभी विस्तार से.

... आज तो ‘दीवार में आले’ की अपनी पसंद की इस कविता के साथ आपसे विदा लूँगा कि- 

दर्द में बिलकुल न झुके
आस में तनकर खड़े
विश्वास में चुप-चुप दिखे
क्या तुम कभी पिता थे .................

*
भार से झुककर चले
धैर्य में डटकर खड़े
प्यार में पल- पल बहे
क्या तुम कभी माँ थे ........................

*
धूप में सीधे खड़े
साँझ को नीचे झुके
वर्षा में टप-टप झरे
तुम क्या कभी वटवृक्ष थे ....................

‘’दीवार में आले’’ के प्रकाशन पर कवि रामकिशोर उपाध्याय को समस्त शुभकामनाएँ! 

4 नवंबर, 2016                                                                                                            . – ऋषभ देव शर्मा
पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष 
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद.
# 08074742572/ 08121435033.

शुक्रवार, 12 मई 2017

काणे भगत की स्त्री चेतना

काणे भगत जी का ओजपूर्ण प्रवचन चल रहा था - स्त्री मोह है, स्त्री माया है, स्त्री नरक का द्वार है।
अचानक चपला जी उठीं और झूमती-झामती जाकर काणे भगत जी की गोद में गिर पड़ीं।
काणे भगत जी का सुर बदल गया - स्त्री शक्ति है और शक्ति के बिना तो शिव भी अधूरे रहते हैं!

पहली पंक्ति में बैठा रिसर्चर तोताराम हक्का-बक्का देखता रह गया। [26/4/2017]



बुधवार, 19 अप्रैल 2017

(संपादकीय) निज इच्छा निर्मित तनु, माया गुन गो पार !

बाबा तुलसी के लिए दशरथ सुत राम और भगवान राम दो नहीं हैं. हो ही नहीं सकते. वे विष्णु का अवतार भर भी नहीं हैं. ब्रह्मा-विष्णु-महेश तो पहले ही साकार और सगुण हैं. हमारे राम ये सब होते हुए रूपातीत और गुणातीत हैं. कुछ भी उनसे परे नहीं है. वे परात्पर ब्रह्म हैं; जगनिवास अखिल लोक विश्राम हैं. जगत की आपाधापी से थका लोक जब राम की ओर उन्मुख होता है, तभी वह विश्राम पाता है – जन्मों के पाप ताप कट जाते हैं. इसीलिए लोक चाहता है कि उसके जीवन में राम का उदय हो; अवतरण हो. यह चाह जब उत्कट हो जाती है – कौसल्या की तरह, तो परात्पर प्रभु राम प्रकट हो जाते हैं.  
राम का प्राकट्य समग्र लोक के लिए है. इस लोक में राक्षस भी शामिल हैं. उनके प्रति राम करुणावान हैं; उनका उद्धार करने का वचन निभाने भी तो आए हैं धराधाम पर. वे कृपालु हैं, दीन जन के बंधु हैं. किसी को उनकी मानव लीला से भ्रम न हो जाए इसलिए बाबा याद दिलाते हैं कि वे माया, गुण और ज्ञान से परे हैं. वे मर्यादाएँ स्थापित करने के लिए आए हैं, लेकिन हैं अपरिमेय. मूल्यांकन का कोई भी लौकिक आधार उन्हें माप नहीं सकता. कौसल्या माँ को बोध है कि जिसे उन्होंने गर्भ में धारण किया, उसके रोम रोम में माया निर्मित जाने कितने ब्रह्मांड समाए हैं. राम का आकार माया, त्रिगुण प्रकृति और इंद्रियों से नहीं, उसी सृजनात्मक स्वेच्छा से निर्मित है जिसके कारण ‘वह’ एक ही निरंतर अनेक प्रकार से अभिव्यक्त होता रहता है. कौसल्या माँ को मातृत्व का परम सुख देने के लिए मेरे प्रभु राम अविगत गति छोड़कर शिशु लीला स्वीकार करते हैं. राम का प्राकट्य मातृत्व की परम पुकार की अनिवार्य स्वीकृति का प्रतीक है! 
18 अप्रैल, 2017                                                                                           - ऋषभ देव शर्मा

रविवार, 16 अप्रैल 2017

ऐसे मन लै जोगी खेलै : गुरु गोरखनाथ


परंपरा कनफटे जोगियों की
पुरानी रोमांटिक प्रणय-गाथाओं से लेकर आधुनिक सनसनीखेज मीडिया-कथाओं तक में एक रोचक रूढि की तरह ध्यान खींचने वाले ‘कनफटे जोगी’ असल में नाथ-पंथ के अनुयायी हठयोगी होते हैं. नाथ-पंथ और ‘हठयोग’ का प्रवर्तक गुरु गोरखनाथ को माना जाता है जो हिंदी के आदिकाल के सर्वाधिक प्रखर कवियों में अग्रणी हैं. गुरु गोरखनाथ के जन्म और मृत्यु की निश्चित तिथियाँ ज्ञात नहीं हैं, लेकिन अलग-अलग इतिहासकारों के हवाले से इतना तो निश्चित रूप से समझा जा सकता है कि वे नौवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच किसी समय विद्यमान थे. प्राच्य विद्या ग्रंथ संग्रहालय, चेन्नई में उपलब्ध ग्रंथ ‘चोलनपूर्व पट्टयम’ तथा कोयम्बत्तूर में प्राप्त शिलालेखों से पता चला है कि कोयंबत्तूर से लगभग 7 किलोमीटर दूरी पर स्थित उडुमलैपेट्टै नामक नगर (जिसका पुराना नाम चंद्रगिरि है) गोरखनाथ का जन्मस्थल है. 

क्या है हठयोग?
गुरु गोरखनाथ ने ‘सहज योग’ के विकारों को पहचान कर अपने ‘हठयोग’ की स्थापना की. इस मार्ग को ‘हठयोग’ के अलावा नाथ-संप्रदाय, नाथ-पंथ, सिद्ध-मत, सिद्ध-धर्म, योग-मार्ग, योग-संप्रदाय, अवधूत-मत और अवधूत-संप्रदाय जैसे नामों से भी जाना जाता है. दरअसल सहज योग में पंच मकार (मांस, मत्स्य, मुद्रा, मदिरा और मैथुन) की स्वीकृति के कारण विकृति आ गई थी. गुरु गोरखनाथ ने इस लोक-विरुद्ध स्थिति को पहचाना और विशेष रूप से नारी-भोग को साधना का अंग बनाने का दृढ़ता से खंडन किया और हठयोग के रूप में ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा की. यहाँ यह भी जान लें कि गोरखनाथ का योगमार्ग महर्षि पतंजलि के योगमार्ग से भिन्न है क्योंकि पतंजलि के ग्रंथ ‘योगसूत्र’ में नाड़ीशोधन, योगमुद्रा, कुंडलिनी शक्ति का जागरण और शिवशक्ति की समरसता आदि का उल्लेख नहीं मिलता, जिनका हठयोग में सबसे अधिक महत्त्व है. 

गोरखनाथ और उनका पंथ
नाथ संप्रदाय के हिंदी कवियों के रूप में यों तो गोरखनाथ, चौरंगीनाथ, गोपीचंद, चुणकरनाथ, भरथरी और जालंध्रीपाव का उल्लेख किया जाता है लेकिन वस्तु और अभिव्यक्ति की मौलिकता की दृष्टि से इनमें गोरखनाथ ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं. गुरु गोरखनाथ या गोरक्षनाथ को मध्यकालीन भारतीय पुनर्जागरण के संदर्भ में उन्हें शंकराचार्य के बाद दूसरा प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता है. उनके द्वारा चलाए गए पंथ को ‘गोरखपंथ’ कहा जाता है. हमारी मान्यता तो यह है कि विकृति पर सीधे-सीधे अक्खड़ शब्दों में चोट करने की बहुचर्चित प्रवृत्ति कबीरदास ने गुरु गोरखनाथ से ही विरासत में पाई है. उल्लेखनीय है कि ‘ज्ञानवेट्टीयान’ नामक तमिल ग्रंथ में भी गोरखनाथ को मध्यकालीन भारत का अद्वितीय रहस्यवादी सिद्ध, धर्मगुरु और राष्ट्रनायक बताया गया है. ‘गोरखनाथ’ या ‘गोरक्षनाथ’ उनका दीक्षानाम है. उनका दीक्षापूर्व नाम ‘पशुपति’ माना जाता है.

गुरु गोरखनाथ द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 40 बताई जाती है जिनमें से ‘गोरखबानी’ के संपादक डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल ने 14 को ही प्रामाणिक माना है. ये हैं – (1) सबदी, (2) पद, (3) प्राणसंकली, (4) सिस्यादरसन, (5) नरवैबोध, (6) अभैमात्रा जोग, (7) आतम-बोध, (8) पंद्रह तिथि, (9) सप्तवार, (10) मछींद्र गोरख बोध, (11) रोमावली, (12) ज्ञानतिलक, (13) ज्ञान चौंतीसा, (14) पंचमात्रा. 

गोरखनाथ ने अपने समय में प्रचलित कई सारे संप्रदायों का विलय करके नाथपंथ या गोरखपंथ चलाया, इसलिए उनकी बानियों में उन संप्रदायों के विचारों की छाया भी दिखाई देती है. उनके समय में शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन और वैष्णव योगमार्ग प्रचलित थे. इन सबको अपने युग के संदर्भ में नई दिशा देते हुए और वर्णव्यवस्था तथा जातिभेद का खंडन करते हुए गोरखनाथ ने अपनी बानियों में गुरु महिमा, इंद्रिय संयम, प्राण साधना, वैराग्य, मनःसाधना, कुंडलिनी जागरण और शून्य समाधि की विशद चर्चा की. इन सबमें उन्होंने नीति और साधना पर बल दिया तथा हठयोग की प्रतिष्ठा की : “नौ लख पातरि आगे नाचैं, पीछे सहज अखाड़ा./ ऐसे मन लै जोगी खेलै, तब अंतरि बसै भंडारा.” अभिप्राय यह है कि वैष्णव महाप्रसाद और सहजयानी पंचमकार दोनों ही जिसे विचलित न कर सकें, ऐसे मन वाला योगी ही अपने भीतर बसे आनंद के भंडार में विहार करता है.

कहने की ज़रूरत नहीं की गोरखपंथी हठयोग में सांसारिक आकर्षण को हठपूर्वक रोकने के लिए शक्तिरूपा कुंडलिनी को जगाकर शिव के निवास सहस्रार चक्र में ले जाने की साधना की जाती है. कुंडलिनी साधना के नाम पर स्त्री-पुरुष-समागम के बहाने व्यभिचार को बढ़ावा देने वालों की गुरु गोरखनाथ ने कठोर शब्दों में निंदा की तथा ‘हठ’ साधना को ह अर्थात सूर्य और ठ अर्थात चंद्रमा की नाड़ियों के संयोग की साधना के रूप में प्रचारित किया. इस साधना का आधार ब्रह्मचर्य है जो भोग द्वारा समाधि के वाममार्ग का विरोधी है. 

योगमार्ग की प्राचीनता 
वास्तव में, एक साधना पद्धति के रूप में योग मार्ग बहुत पुराना है और एक प्रकार से गुरु गोरखनाथ ने उसका जीर्णोद्धार किया. योग की प्राचीनता के सबसे पुराने प्रमाण सिंधुघाटी सभ्यता के काल में प्राप्त होते हैं. यह सभ्यता आर्य और द्रविड कही जाने वाली दोनों ही सभ्यताओं की विशिष्टताओं से युक्त है. यदि द्रविड-आर्य-संघर्ष की पश्चिमी इतिहासकारों की कपोल कल्पना के स्थान पर आर्य-द्रविड-समन्वय की खोज करनी हो तो यह जानकारी बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है कि वर्तमान सामासिक हिंदू धर्म के बहुत से तत्व सिंधु घाटी सभ्यता की देन हैं. सिंधु सभ्यता की मूर्तियों का विवेचन करते हुए डॉ. नंजुंडन ने यह प्रतिपादित किया है कि उस समय योग की प्रतिष्ठा थी तथा योगमुद्रा धारण किए हुए योगियों की मूर्तियों का प्रचलन था. ऐसी योग मुद्राओं में मूर्तियों की प्राप्ति सिद्ध करती है कि उस अतीत काल में शिव-पशुपति योगियों के आराध्य माने जाते थे और उनके उपासक योगी जन समाज में थे. इस दृष्टि से योग-विज्ञान को सिंधु सभ्यता की सर्वाधिक महत्वपूर्ण देन कहा जाना चाहिए. 

योग विज्ञान की यह धारा वेदों में भी उपलब्ध है. ऋग्वेद में वर्णित केशिन मुनि में योगी के लक्षण हैं. कुछ मंत्रद्रष्टा ऋषि अवश्य ही योग के रहस्यों से परिचित रहे होंगे. अथर्ववेद में तो पूर्ण विकसित योग प्रणाली का स्वरूप प्राप्त होता है जिसमें प्राण और अपान वायु को वश में करने के लिए प्राणायाम की महत्ता स्वीकार की गई है. विश्व के धारक और रक्षक के रूप में प्राण को आरण्यकों में सर्वत्र व्याप्त तथा आयु का कारण माना गया है. उपनिषदों में भी योगमार्ग का निरूपण मिलता है. कठोपनिषद और तैत्तिरियोपनिषद में सर्वप्रथम ‘योग’ शब्द का पारिभाषिक अर्थ में प्रयोग हुआ है और यह अर्थ है चित्त को विषयों से हटाकर आत्मा में लीन कर देना. श्वेताश्वतरोपनिषद की प्रतिष्ठा शैव योग के प्रतिपादक प्राचीनतम उपनिषद के रूप में है. इस उपनिषद में ध्यानयोग की विधि और उसके महत्व का उद्घाटन किया गया है तथा आसन, प्राणायाम आदि योग के अन्य अंगों की भी महत्ता स्पष्ट की गई है. मैत्रेय उपनिषद में खेचरी मुद्रा का भी परिचय उपलब्ध है, जबकि इसी के समकालीन अर्थात ईसा के दो शताब्दी इधर या उधर रचित चूलिकोपनिषद में सेश्वरयोग का विवेचन है. 

आठवीं शताब्दी के पूर्व रचित ‘योगोपनिषद’ में प्रतिपादित विषय का गोरखनाथ रचित ‘सिद्ध सिद्धांत पद्धति’ से आश्चर्यजनक साम्य है. ‘ध्यान बिंदु’ और ‘नाद बिंदु’ उपनिषदों तथा ‘मंडल ब्राह्मण’ के अनेक श्लोकों का भी गोरखनाथ की रचनाओं पर काफी असर दिखाई देता है. गोरखनाथ की योग प्रणाली इस परंपरा का ही समय के अनुकूल परिवर्तित और परिवर्द्धित रूप मात्र है. 

गोरखपंथ की मौलिकता 
यहाँ यह बताना जरूरी है कि योग की परंपरा का विस्तार होने के बावजूद गोरख-दर्शन अनुकरण या नक़ल नहीं है. बल्कि गोरखनाथ जिस निर्णय पर पहुँचे वह पूर्णतः उनकी स्वानुभूति पर आधारित है; अतः सर्वथा मौलिक है. गोरख-दर्शन में परमसत्ता को अनेक अवस्थाओं से युक्त अंड-पिंड के रूप में सर्वत्र विद्यमान माना गया है तथा अद्वयवाद को इस योग मार्ग का मूल तत्व सिद्ध किया गया है. इस मत में परम तत्व को ‘परासंवित’ कहा गया है. जो कि सत्, चित और आनंद स्वरूप है. उसके निष्क्रिय, निश्चल व निर्गुण रूप को शिव कहा जाता है तथा सक्रिय, चल व सगुण रूप को शक्ति. ये दोनों अभिन्न हैं. सृष्टि की इच्छा ही शिव की शक्ति है. अतः सृष्टि के निमित्त एवं उपादान कारण शिव हैं. नाथ मत में ब्रह्मांड की तमाम विविधता को मानव शरीर में सूक्ष्म रूप से विद्यमान माना जाता है. इन दोनों की एकता को समरसीकरण कहा गया है. यह समरसीकरण ही जीव का चरम लक्ष्य है. 

चंद्र, सूर्य और अग्नि को गोरखमत में शरीर के अंदर रहने वाली सूक्ष्म शक्ति माना गया है. ‘सिद्धसिद्धांत’ पद्धति’ में नाड़ी संस्थान के ज्ञान को बहुत महत्व दिया गया है तथा मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्धि, तालु, भ्रू, निर्वाण और आकाश नाम के नौ चक्रों के साथ सोलह आधारों, तीन लक्ष्यों और पाँच आकाशों के ज्ञान को सत्य के साक्षात्कार के लिए आवश्यक बताया गया है. इससे दुखों की निवृत्ति तो होती ही है, आनंद की उपलब्धि भी होती है. 

गोरखबानी 

गोरखनाथ की कुछ बानियों को देखने से उनके विचारों को ज्यादा अच्छी तरह समझा जा सकता है. आइए, देखें गोरखबानी के कुछ अंश :

बस्ती न सुन्यं सुन्यं न बस्ती अगम अगोचर ऐसा.
गगन सिषर मंहि बालक बोलै ताका नांव धरहुगे कैसा.
 
[परम तत्व तक किसी की पहुँच नहीं है. वह इन्द्रियों का विषय नहीं है. वह ऐसा है कि न हम यह कह सकते है वह कुछ है और न यह कि वह कुछ नहीं है. वह भाव और अभाव, सत और असत दोनों से परे है. शून्य यानी आकाश में ही ब्रह्म का निवास माना जाता है. वहीं आत्मा को खोजना चाहिए. जैसे बालक पाप और पुण्य से अछूता है उसी प्रकार परमात्मा भी है. ज़रा मरण से दूर काल से परे सतत बाल स्वरूप ही योगियों का साध्य है.]  
वेद न कतेब न षानी बाणी, सब ढंकी तलि आणि.
गगनि सिषर महि सबद प्रकास्या, तहं बुझै अलष बिनाणी. 
[परब्रह्म की सही व्याख्या न वेद कर पाए हैं न किताबी धर्मों की पुस्तकें. ये सब तो उसे ढकने में लगे हैं, इन्होंने सत्य को प्रकट करने के बजाय उसके ऊपर आवरण डाल दिया है. यदि ब्रहम के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान चाहिए तो ऐसा समाधि में प्रकाशित शब्द के अनुभव द्वारा ही संभव है.]  
हसिबा षेलिवा रहिबा रंग. कांम क्रोध न करिबा संग.
हसिबा षेलिबा गा‍इबा गीत. दिढ़ करि राषि आपंन चीत.
 
[हँसना चाहिए, खेलना चाहिए, मस्त रहना चाहिए लेकिन कभी काम-क्रोध का साथ न करना चाहिए. हँसना, खेलना और गीत भी गाना चाहिए किंतु अपने चित को दृढ़ करके रखना चाहिए.]  
हसिबा षेलिवा धरिबा ध्यान. अहनिसि कथिबा ब्रह्म गियांन.
हसै षेलै न करै मन भंग. ते निहचल सदा नाथ के संग.
 
[हँसना, खेलना और ध्यान धरना चाहिए. रात दिन ब्रह्म ज्ञान का कथन करना चाहिए. इस प्रकार संयम पूर्वक हँसते-खेलते हुए जो अपने मन का भंग नहीं करते वे निश्चल होकर ब्रह्म के साथ रमण करते हैं.]  
मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा.
तिस मरणीं मरौ, जिस मरणीं गोरष मरि दीठा. 
[हे जोगी मरो, मरना मीठा होता है. किंतु वह मौत मरो जिस मौत से मरकर गोरखनाथ ने परमतत्व के दर्शन किए. यह मरना सामान्य मृत्यु नहीं इसे भौतिक अस्तित्व का अंत नहीं समझना चाहिए, योग मार्ग में तो विश्वास चला आता है कि योगी कभी मरता नहीं, यहाँ मरने का अर्थ है जीवन्मुक्ति.]  
मनवां जोगी काया मढ़ी पंच तत्त ले कथा गढ़ी.
षिमा षडासन ग्यान अधारी सुमति पावड़ी डंड बिचारी. 
[शरीर रूपी मढ़ी में मन रूपी जोगी रहता है. वह क्षमा का खडासन, ज्ञान की अधारी, सद्बुद्धि की खडाऊं, और विचार का डंडा उपयोग में लाता है. शरीर का नहीं मन का योग वास्तविक योग है. बाह्य युक्तियों को छोड़कर सही रूप से मन पर नियंत्रण लाना चाहिए.]  
यहू मन सकती यहू मन सिव, यहू मन पांच तत्त का जीव.
यहू मन ले जै उनमन रहै, तै तिनी लोकी की बातां कहै
[मन शिव है. यही मन शक्ति है. यही मन पंच तत्वों से निर्मित जीव है. माया के संयोग से ही ब्रह्म मन के रूप में अभिव्यक्त होता है और मन से ही शरीर की सृष्टि होती है. इस मन को लेकर उन्मनावस्था में लीन करने से साधक सर्वज्ञ हो जाता है.]

गोरखनाथ की इन बानियों के आलोक में यदि उनके बाद के कबीर जैसे संतों की बानियों को देखें तो स्पष्ट होता है कि गोरखनाथ ने भक्तिकाल के संतों की कविता के भाव पक्ष को तो प्रभावित किया ही, उनकी भाषा और भंगिमा पर भी दूरगामी असर छोड़ा.