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रविवार, 12 फ़रवरी 2017

(पुस्तक) 'कथाकारों की दुनिया' : अनुक्रम

कथाकारों की दुनिया/ ऋषभदेव शर्मा 
I.S.B.N. : 978-81-7965-278-7
प्रथम संस्करण, 2017 
पृष्ठ 392, मूल्य : रु. 800
 तक्षशिला प्रकाशन, 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
दूरभाष : 011-43528469, 23258802
ईमेल : info@taxshilabooks.in, taxshilabooks@gmail.com

अनुक्रम 



दो शब्द 
अभिमत 
आशंसा 
आभार 

                 ∫∫ खंड 1∫∫ : हिंदी उपन्यासकारों की दुनिया 

1. प्रेमचंद की वर्तमानता : 'रंगभूमि' और 'गोदान'
2. प्रेमचंद की दुनिया में स्त्री 
3. जैनेंद्र की दुनिया और मनोविश्लेषण का दबाव 
4. सामंती अवशेषों की औपन्यासिक अभिव्यक्ति
5. आंचलिक उपन्यासों की दुनिया 
6. रामदरश मिश्र की दुनिया में मिथकीय संदर्भ
7. स्त्री-दोस्त पुरुष की संभावना : अनामिका के उपन्यास

           ∫∫ खंड 2 ∫∫ : रचना संदर्भ : हिंदी उपन्यास

1. समाज-समीक्षा और गांधी दर्शन : राम-रहीम
2. प्रगतिशील साहित्य का नमूना : बिल्लेसुर बकरिहा
3. समलैंगिक विमर्श : कुल्लीभाट
4. क्षण सनातन है : नदी के द्वीप
5. भारतमाता ग्रामवासिनी : मैला आँचल
6. आदिवासी समुदाय की व्यथा : कब तक पुकारूँ
7. समकालीन भारतीय जीवन का व्यंग्य चित्र : राग दरबारी
8. भ्रष्ट व्यवस्था की बाढ़ में प्रतिरोध की तलाश : जल टूटता हुआ
9. लोकतंत्र की हत्या का दस्तावेज : महाभोज
10. एक अपरिपक्व महास्वप्न : अपने अपने राम
11. वर्णव्यवस्था और जातिभेद के विरुद्ध : छप्पर
12. महावृत्तांतों के विघटन का यथार्थ : कलिकथा : वाया बाइपास
13. रजऊ से ऋतु तक स्वाधीनता संग्राम : कही ईसुरी फाग
14. मृत्यु के बहाने राग की परीक्षा : अपना पराया
15. विकिरण और विस्थापन से जूझते आदिवासी : मरंग गोडा नीलकंठ हुआ
16. भीरु पुरुषों से चिढ़ती हैं स्त्रियाँ : गणित 
17. सबकी शुभेच्छा : नीम की छाया 
18. युद्ध कथा के बहाने मनुष्यता के प्रश्न : जय! हिंद की सेना

             ∫∫ खंड 3 ∫∫ : हिंदी कहानीकारों की दुनिया 

1. कहानीकारों की दुनिया में गाँव 
2. कहानीकारों की दुनिया में बच्चे 
3. प्रेमचंद की दुनिया में क्रूर यथार्थ 
4. प्रेमचंद की भदेस भनिति : गुल्ली डंडा 
5. हाशिये की दुनिया और शिवप्रसाद सिंह
6. दलित कहानीकारों की दुनिया : अभिव्यक्ति का संदर्भ 
7. दलित कहानीकारों की दुनिया : मानवाधिकार का संदर्भ
8. इक्कीसवीं शताब्दी की कहानी और मनुष्य : वैश्वीकरण का यथार्थ 
9. इक्कीसवीं शताब्दी की कहानी : अंतर्यात्रा 

            ∫∫ खंड 4 ∫∫ : हिंदी लघुकथा साहित्य 

1. लघुकथा की दुनिया में लोकतंत्र : बलराम अग्रवाल
2. लघुकथा की दुनिया में अतिरंजना : सुकेश साहनी 

            ∫∫ खंड 5 ∫∫ : तेलुगु कथासाहित्य

1. सामाजिक विद्रूप और हास्य : बैरिस्टर पार्वतीशम
2. मिथक की परीक्षा : द्रौपदी 
3. सेरोगेट मदर : क्रतु
4. एड्स : इमारत के खंडहर 
5. पाँच लंबी कहानियाँ : खंजर और खंजन
6. तेलंगाना के किसानों की व्यथा : आक्रमण कब का हो चुका
7. तेलुगु समाज का दर्पण : लघुकथाएँ 

           ∫∫ खंड 6 ∫∫ : तमिल कथासाहित्य

1. तमिल कहानी : उद्भव और विकास

(पुस्तक) 'कथाकारों की दुनिया' : आशंसा

कथाकारों की दुनिया/ ऋषभदेव शर्मा 
I.S.B.N. : 978-81-7965-278-7
प्रथम संस्करण, 2017 
पृष्ठ 392, मूल्य : रु. 800
 तक्षशिला प्रकाशन, 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
दूरभाष : 011-43528469, 23258802
ईमेल : info@taxshilabooks.in, taxshilabooks@gmail.com

आशंसा

साहित्य का संसार अपार है - अपार संभावनाओं से भरा हुआ. ये अपार संभावनाएँ साहित्यकार के भीतर निहित होती हैं. इसीलिए लेखक साहित्य-जगत के प्रजापति होते हैं. प्रत्यक्ष जगत का अतिक्रमण करते हुए उनकी नवोन्मेषकारी प्रतिभा अपनी अपनी रुचि का संसार रचा करती है. खास बात यह है कि लेखकों का यह संसार शून्य में नहीं रचा जाता, बल्कि उपलब्ध दुनिया से प्राप्त अनुभवों, अनुभूतियों और संवेदनाओं के साथ लेखक की कल्पना के संयोग से जन्म लेता है. प्रो. ऋषभदेव शर्मा की आलोचना कृति ‘कथाकारों की दुनिया’ के मूल में यही विचार निहित है. 

कवि, समीक्षक और गद्यकार प्रो. ऋषभदेव शर्मा पच्चीस वर्ष से अधिक समय से उच्च स्तरीय भाषा और साहित्य संबंधी अध्यापन एवं शोध निर्देशन से जुड़े हुए हैं. साहित्य की विभिन्न विधाओं के विश्लेषण और मूल्यांकन पर केंद्रित उनके अनेक समीक्षात्मक आलेख एवं शोधपत्र प्रकाशित हैं. काव्य, काव्य समीक्षा, अनुवाद चिंतन और भाषा चिंतन पर उनके मौलिक और संपादित ग्रंथ सुधी पाठकों द्वारा खूब सराहे गए हैं. अब ‘कथाकारों की दुनिया’ के माध्यम से उनका कथा चिंतक रूप समग्रतः सामने आ रहा है. 

‘कथाकारों की दुनिया’ में हिंदी कहानी और उपन्यास साहित्य के विशिष्ट हस्ताक्षरों और उनकी दुनिया का तो विवेचन-विश्लेषण है ही, कुछ प्रमुख तेलुगु कथाकारों की दुनिया की भी एक झाँकी प्रस्तुत की गई है. इसके अलावा तमिल कहानी साहित्य के उद्भव और विकास का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने के बहाने आलोचक ने तमिल कथाकारों की दुनिया की भी एक झलक प्रस्तुत की है. इस तरह इस ग्रंथ में हिंदी, तेलुगु और तमिल के मध्य राष्ट्रभाषा के माध्यम से सेतु-रचना का भी स्तुत्य कार्य किया गया है. 

प्रेमचंद ने अपने कथासाहित्य के माध्यम से आदर्शोन्मुख यथार्थ से प्रेरित अपनी दुनिया रची. उनकी इस दुनिया में गाँव और किसान तो हैं ही, अपने समय को चुनौती देती हुईं स्त्रियाँ भी हैं. प्रेमचंद जहाँ एक ओर जिजीविषा और संघर्ष की दुनिया रचते हैं वहीं दूसरी ओर फक्कड़पने से लेकर अमानुषिकता तक के अलग-अलग लोक भी निर्मित करते हैं. जैनेंद्र अपनी दुनिया मनोविश्लेषण के ताने-बाने से बुनते हैं तो अज्ञेय क्षणों के सहारे निजता के द्वीप उगाते हैं. नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, शिवप्रसाद सिंह और रामदरश मिश्र की दुनिया गाँवों और अंचलों की वह दुनिया है जिसकी यातना अनंत है और जिजीविषा असीम. निराला प्रगतिशीलता से लेकर किन्नर और समलैंगिक विमर्श तक की पहली ईंटें रखते हैं तो रांगेय राघव, श्रीलाल शुक्ल, मन्नू भंडारी और भगवान सिंह क्रमशः आदिवासी विमर्श, सत्ता विमर्श, लोकतंत्र विमर्श और जनवाद की शिलाओं से अपनी अपनी दुनिया बनाते हैं. अनामिका, मैत्रेयी पुष्पा, अलका सरावगी, महुआ माजी और अहिल्या मिश्र जैसी लेखिकाएँ स्त्री विमर्श की भींतों पर अपनी दुनिया खड़ी करती हैं तो ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश कर्दम, श्योराजसिंह बेचैन और मुद्राराक्षस जैसे कथाकार दलितों की अधिकार चेतना और अंबेडकरवाद के सहारे अपनी नई दुनिया का निर्माण करते हैं. बलराम अग्रवाल और सुकेश साहनी अपनी लघुकथाओं में जिस संसार की रचना करते हैं उसके एक सिरे पर लोक और लोकतंत्र है तो दूसरे सिरे पर अतिरंजना और महास्वप्न. अभिप्राय यह है कि अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से हर संवेदनशील कथाकार अपनी रुचि के अनुसार अपनी समानांतर दुनिया का सृजन करता है. प्रस्तुत ग्रंथ में हिंदी के प्रमुख कथाकारों द्वारा रची गई उनकी इसी अपनी दुनिया की प्रामाणिक पड़ताल की गई है. 

बहुत सी कथा कृतियाँ अपनी निजी दुनिया के कारण देश-कालांतरगामी महत्व प्राप्त कर लेती हैं. ’रंगभूमि’, ‘गोदान’, ‘राम-रहीम’, ‘बिल्लेसुर बकरिहा’, ‘कुल्ली भाट’, ‘नदी के द्वीप’, ‘मैला आंचल’, ‘कब तक पुकारूँ’, ‘रागदरबारी’, ‘जल टूटता हुआ’, ‘महाभोज’, ‘अपने-अपने राम’, ‘छप्पर’, ‘कलिकथा : वाया बाईपास’, ‘कही ईसुरी फाग’, ‘अपना पराया’, मरंग गोडा नीलकंठ हुआ’, ‘गणित’, ‘नीम की छाया’, ‘त्रिकाल संध्या’, ‘जय! हिंद की सेना’ जैसे उपन्यास और ‘गुल्लीडंडा’, ‘पूस की रात’, ‘सद्गति’, ‘कफन’, ‘कर्मनाशा की हार’ आदि कहानियाँ कभी उस दुनिया का पता देती हैं जो कथाकार को बनी बनाई मिली है तो कभी उस दुनिया की ओर इशारा करती हैं जिसे कथाकार बनाना चाहता है. आलोचक ने इन दोनों ही दुनियाओं का अच्छे से खुलासा किया है. 

मुझे आशा ही नहीं, बल्कि दृढ़ विश्वास है कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की इस आलोचना कृति को सुधी पाठकों का भरपूर स्नेह और आशीर्वाद मिलेगा. इस ग्रंथ के लिए ‘आशंसा’ लिखना मैं अपना परम सौभाग्य मानती हूँ. 

14 मई, 2016 
                                                                                                               
                                                                                                                 - गुर्रमकोंडा नीरजा 
                                                                                                           उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, 
                                                                                                            दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, 
                                                                                                                  हैदराबाद – 500004. 

(पुस्तक) 'कथाकारों की दुनिया' :अभिमत

कथाकारों की दुनिया/ ऋषभदेव शर्मा 
I.S.B.N. : 978-81-7965-278-7
प्रथम संस्करण, 2017 
पृष्ठ 392, मूल्य : रु. 800
 तक्षशिला प्रकाशन, 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
दूरभाष : 011-43528469, 23258802
ईमेल : info@taxshilabooks.in, taxshilabooks@gmail.com

अभिमत 

कवि,समीक्षक, समालोचक, भाषाविद और साहित्य की अन्यान्य विधाओं के गंभीर अध्येता डॉ. ऋषभदेव शर्मा की अद्यतन कृति ‘कथाकारों की दुनिया’ उनके साहित्य चिंतन की निर्विराम साधना का प्रामाणिक साक्ष्य है. साहित्यान्वेषण की व्याकुलता उनकी सृजन शक्ति का मूल स्रोत है। साहित्य विमर्श के नित नूतन संदर्भों का अनुसंधान ही उनके सतत अध्ययनशील मानस की ऊर्जा है। प्रस्तुत कृति ‘कथाकारों की दुनिया’ लेखक की हिंदी और भारतीय कथा-साहित्य के प्रति एक विशेष शोधपरक दृष्टि को उद्घाटित करती है ।

डॉ. ऋषभदेव शर्मा हिंदी साहित्य जगत में काव्य विमर्श की पुरोगामी और प्रगतिशील दृष्टि के लिए विशेष रूप से समादृत हैं। उनके साहित्य विमर्श की विशेषता उनकी विविधोन्मुखी पाठानुसंधान की प्रवृत्ति में निहित है। हिंदी के साथ साथ इतर भारतीय भाषाओं के साहित्य पाठ को अनुवाद के माध्यम से आत्मसात कर रचना के तल में छिपे वैशिष्ट्य को उद्घाटित करने की नैपुण्यता उन्होंने हासिल की है। गद्य और पद्य दोनों प्रारूपों में रचित लगभग सभी विधाओं के वे विशद अध्येता हैं। उन्होंने प्रत्येक पठित कृति के प्रति सजग विश्लेषक की ख्याति अर्जित की है। साहित्य विमर्श लेखन में उनकी निरंतरता और सातत्य, साहित्य के अध्येताओं को अचंभित कर देती है। हिंदी के साथ तेलुगु और तमिल साहित्य की गद्य विधाओं के प्रति लेखक की आसक्ति गौरतलब है। भारतीय भाषाओं की साहित्य विधाओं के प्रति उनकी सहज संवेदना, भारतीय साहित्य की मूलभूत एकता को रेखांकित करती है। लेखक ने प्रस्तुत ग्रंथ में संकलित अपने आलेखों से इस सत्य की पुष्टि की है कि हिंदी और इतर भारतीय भाषाओं में रचित गद्य और पद्य को अनुवाद के माध्यम से आत्मसात करना कठिन या दुष्कर उद्यम नहीं है। 

प्रस्तुत ग्रंथ में 44 वैचारिक आलेख छह खंडों में संकलित हैं। प्रत्येक खंड का शीर्षक उस खंड के अंतर्गत सँजोए गए आलेखों की विषयवस्तु का परिचायक है। प्रथम खंड मे प्रेमचंद, जैनेंद्र, रेणु, रामदरश मिश्र और अनामिका जैसे हिंदी के मूर्धन्य उपन्यासकारों की रचनाओं के प्रतिपाद्य को विश्लेषित किया गया है। इन आलेखों में लेखक की नवीन आलोचना दृष्टि से पाठक परिचित होता है। ‘प्रेमचंद की वर्तमानता : रंगभूमि और गोदान’ शीर्षक आलेख इन उपन्यासों की प्रासंगिकता को वर्तमान संदर्भ में दर्शाता है। प्रेमचंद की रचना दृष्टि और उनकी दूरदर्शिता का रेखांकन, इस आलेख की विशिष्टता है। उसी प्रकार अनामिका के उपन्यास, समकालीन हिंदी उपन्यास साहित्य में स्त्री-चेतना को भिन्न दृष्टि से व्याख्यायित करते हैं जिसे लेखक ने अपने आलेख में नवीन दृष्टिकोण से विवेचित किया है। 

ग्रंथ के द्वितीय खंड ‘हिंदी उपन्यास : रचना संदर्भ’ के अंतर्गत लेखक ने लीक से हटकर ऐसे उपन्यासों का चयन किया है जो या तो अचर्चित हैं या आलोचकों की दृष्टि से उपेक्षित रहे हैं। चयनित उपन्यासों में रचना के विविध संदर्भों की व्याख्या भिन्न मानदंडों के आधार की गई है जो कि महत्वपूर्ण है। राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह कृत ‘राम-रहीम’ (समाज-समीक्षा और गांधी दर्शन), अज्ञेय कृत ‘नदी के द्वीप ‘ में अस्तित्ववादी दर्शन (क्षण सनातन है), निराला कृत कुल्लीभाट में समलैंगिक विमर्श, रेणु कृत ‘मैला आँचल’ में भारत की ग्रामवासिनी संस्कृति का विश्लेषण, रांगेय राघव कृत ‘कब तक पुकारूँ ‘ में आदिवासी विमर्श, श्रीलाल शुक्ल कृत ‘राग दरबारी’ में चित्रित राजनीतिक व्यंग्य, आपातकाल के संदर्भ में मन्नू भंडारी द्वारा रचित उपन्यास ‘महाभोज’ जिसने राजनीतिक चेतना-प्रधान उपन्यासों का व्याकरण ही बदल दिया, कि पड़ताल – इस खंड के विशिष्ट आलेख है। ऐसे उपन्यासों पर विचार कर, लेखक ने प्रस्तुत ग्रंथ में अध्ययन के नए मानकों को स्थापित किया है और हिंदी कथा-साहित्य के अध्येताओं के लिए चिंतन की नई दिशा प्रदान की है। इसी क्रम में अलका सरावगी कृत ‘कलिकथा : वाया बाइपास’ के कथ्य एवं प्रतिपाद्य के प्रति लेखक की आलोचकीय दृष्टि अनेक नए बिंदुओं को उद्घाटित करती है। 

इधर पिछले दशकों में भारतीय साहित्य में प्रतिरोध की संस्कृति बहुत तेजी से विकसित हुई है। सत्ता, व्यवस्था एवं स्थापित मूल्यों, स्वीकृत मान्यताओं एवं नैतिक मूल्यों के प्रति नई पीढ़ी में प्रतिरोध के स्वर तीव्र हुए हैं। आदिवासी विमर्श, नारी विमर्श, दलित विमर्श और अल्पसंख्यक विमर्श जैसे सैद्धांतिक वाद-प्रतिवाद के अनेक मत-अभिमत साहित्य विमर्श के अहाते में अपनी जगह तलाश रहे हैं। इस कारण प्रस्तुत ग्रंथ के लेखक भी स्थापित मानदंडों के बरक्स नए सिरे से चयनित उपन्यासों का पुनर्पाठ करते हैं। लेखक ने इस खंड में समकालीन परिदृश्य में रचित हिंदी कथा साहित्य के जटिल शिल्प एवं कथ्य पर ध्यान केंद्रित किया है। मैत्रेयी पुष्पा कृत ‘कही ईसुरी फाग’ लोकतत्व और आंचलिक परिवेश में रचित चरित्र प्रधान उपन्यास है जिसके प्रति लेखक विशेष संवेदनशील है। विकिरण और विस्थापन से जूझते आदिवासी समुदायों की विवशता का जो चित्रण महुआ माजी ने अपने उपन्यास  ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ में किया है, इसे लेखक ने अपनी विशेष शैली में विश्लेषित किया है। 

स्तुत ग्रंथ का तीसरा खंड ‘हिंदी कहानीकारों की दुनिया’ शीर्षक से नौ विशिष्ट आलेखों का संग्रह है। हिंदी कहानियों में वर्णित ग्रामीण जीवन, प्रेमचंद युगीन कहानियों का मूल स्वर रहा है जिसे लेखक ने इस खंड के प्रारभिक लेखों में विश्लेषित किया है। समकालीन हिंदी कहानी मुख्यत: दलित विमर्श और स्त्री विमर्श के इर्दगिर्द ही रूपायित होती रही है जिसे लेखक ने चयनित कहानियों के माध्यम से इस खंड में विश्लेषित किया है। दलित कहानीकारों की रचनाओं में मूलत: मानवाधिकारों का प्रश्न निरंतर उठता रहा है, इसकी ओर भी बलपूर्वक लेखक ने ध्यान आकर्षित किया है। हिंदी कहानी का समकालीन परिदृश्य दलित लेखन और दलित विमर्श प्रधान है जिसे लेखक ने प्रस्तुत ग्रंथ में रेखांकित किया है। इसके साथ ही इक्कीसवीं सदी की कहानी का आकलन भी लेखन ने प्रस्तुत किया है जो कि समकालीन हिंदी कहानी के गंभीर अध्येताओं के लिए अकादमिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

ग्रंथ का चौथा खंड दो आलेखों का लघु-खंड है जिसमें लघु कथा साहित्य पर लेखक ने समुचित प्रकाश डाला है। लेखक ने अनुवाद के माध्यम से तेलुगु और तमिल कथा साहित्य का अध्ययन पूरे मनोयोग से किया है जो ग्रंथ के खंड-पाँच और छह में प्रस्तुत उनके समालोचकीय आलेखों से सिद्ध होता है। तेलुगु कथा-साहित्य के प्रति लेखक की विशेष अभिरुचि ने उन्हें न केवल तेलुगु के कतिपय महत्वपूर्ण लेखकों की कृतियों को अनुवाद के माध्यम से समझने का अवसर प्रदान किया बल्कि उन्हें इन कृतियों के माध्यम से तेलुगु समाज और संस्कृति से रूबरू होने का अवसर प्राप्त हुआ। लेखक ने हिंदी में अनूदित तेलुगु कथा-कृतियों की समीक्षा बेबाकी और पूर्वाग्रहरहित होकर की है, जिससे हिंदी पाठक वर्ग के लिए उन कृतियों के प्रति यथार्थपूर्ण दृष्टि विकसित होगी। ‘बैरिस्टर पार्वशीतम’ तेलुगु कथा-साहित्य की हास्य-व्यंग्य प्रधान औपन्यासिक कृति है जिसे लेखक ने भलीभाँति परखकर आलोचना की है। उसी क्रम में तेलुगु की कुछ अन्य अनूदित कृतियों पर भी लेखक ने विचार किया है जैसे, द्रौपदी, क्रतु, एड्स आदि। तेलुगु की कुछ लघु कथाओं को भी लेखक ने अध्ययन का विषय बनाया है जो कि सराहनीय है। लेखक की वैचारिकता में स्थानीय तत्व का समावेश, इतर भाषा साहित्य के प्रति उनकी आस्था और प्रतिबद्धता का सूचक है। इसका साक्ष्य उनके द्वारा तेलंगाना के किसानों की व्यथा को चित्रित करने वाली कहानियों का अध्ययन एवं समीक्षा है। 

किसी भी साहित्य चिंतक के लिए स्थानिकताबोध एक आवश्यक सामाजिक दायित्व होता है जिसके प्रति डॉ. ऋषभदेव शर्मा सदैव जागरूक और प्रतिबद्ध रहे हैं। यह उनके साहित्य चिंतन का प्राण तत्व और अभिन्न अंग रहा है। स्थानीय उदीयमान लेखकों एवं कवियों के प्रति उनमें सदैव सकारात्मक प्रेरणादायक भाव विद्यमान रहे हैं। हिंदी एवं इतर भारतीय भाषा-साहित्य के मध्य अनुवाद सेतु के निर्माण में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। वे प्रादेशिक और प्रांतीय तत्वों से ऊपर उठकर समेकित भारतीय साहित्य के समावेशी स्वरूप को अपनी संपूर्ण भौतिक और मानसिक शक्तियों से सुदृढ़ करने के लिए कृतसंकल्प हैं। दक्षिण में निवास करते हुए, तेलुगु, तमिल, कन्नड तथा मलयालम साहित्य के प्रति लेखक की विशेष आसक्ति रही है जिसे उन्होंने अनुवाद के माध्यम से साधने का प्रयास किया है। इसी प्रयास को लेखक ग्रंथ के अंतिम आलेख ( खंड छह ) ‘तमिल कहानी : उद्भव और विकास’ में सिद्ध करते हैं। स्मरणीय है कि डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने चेन्नई में रहने की अवधि के दौरान दो लघुपत्रिकाओं ‘आदर्श कौमुदी’ और ‘कर्णवती’ के तमिल साहित्य संबंधी विशेषांकों का संपादन किया था। उसी समय उन्हें तमिल कहानी के इतिहास को निकट से जानने-समझने का अवसर मिला। हिंदी पाठकों के लिए तमिल कहानी के प्रारंभ और उसके उत्तरोत्तर विकास क्रम को अति संक्षेप में लेखक ने इस आलेख में प्रस्तुत किया है जो कि किसी भी हिंदी पाठक को तमिल कहानी साहित्य का समुचित परिचय उपलब्ध कराने में सहायक होगा । 

हिंदी, तेलुगु और तमिल कथा साहित्य के प्रति लेखक की अभिरुचि प्रस्तुत ग्रंथ से स्वत: सिद्ध होती है । प्रस्तुत ग्रंथ इस सत्य को प्रमाणित करता है कि डॉ. ऋषभदेव शर्मा बहुमुखी प्रतिभासंपन्न और मेधावी साहित्य एवं भाषा चिंतक हैं। भारतीय भाषाओं और साहित्य की भीतरी परतों को अनावृत्त कर उन्हें साहित्य के अध्येताओं को उपलब्ध कराने की उनकी ललक प्रशंसनीय है। वे एक प्रखर शब्द-चिंतक और रचनाकर्मी हैं जिन्होंने भाषा और प्रांत की सीमाओं को भेदकर भारतीय साहित्य को संपूर्णता के साथ आत्मसात किया है। 

‘कथाकारों की दुनिया’ ग्रंथ साहित्य के शोधकर्ताओं के लिए अकादमिक महत्व का तो है ही, साथ ही हिंदी कथा साहित्य के अध्येताओं के लिए यह हिंदी कथा-साहित्य के अनछुए पहलुओं की ओर गैर-पारंपरिक विचारदृष्टि विकसित करने में सहायक सिद्ध होगा। आधुनिक साहित्य विधाओं में उपन्यास, साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है जिसका समाजशास्त्रीय महत्व निर्विवाद है। इस दृष्टि से प्रस्तुत ग्रंथ की प्रयोजनीयता अक्षुण्ण है। भारतीय कथा साहित्य के समालोचनात्मक ग्रंथों की परंपरा को प्रस्तुत ग्रंथ निश्चित रूप से समृद्ध करेगा। डॉ. ऋषभदेव शर्मा ‘कथाकारों की दुनिया’ ग्रंथ की रचना के लिए बधाई एवं अभिनंदन के पात्र हैं । उन्हें मैं उनके इस नूतन प्रयास और प्रस्तुति के लिए शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ। 

                                                                                                                
26 मई, 2016                                                                                
                                                                                                               - डॉ. एम. वेंकटेश्वर 
                                                                                                           पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष 
                                                                                                    हिंदी एवं भारत अध्ययन विभाग, 
                                                                                               अंग्रेजी एवं अंग्रेजी भाषा विश्वविद्यालय, 
                                                                                                                    हैदराबाद । 

(पुस्तक) 'कथाकारों की दुनिया' : दो शब्द

कथाकारों की दुनिया/ ऋषभदेव शर्मा 
I.S.B.N. : 978-81-7965-278-7
प्रथम संस्करण, 2017 
पृष्ठ 392, मूल्य : रु. 800
 तक्षशिला प्रकाशन, 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
दूरभाष : 011-43528469, 23258802
ईमेल : info@taxshilabooks.in, taxshilabooks@gmail.com

दो शब्द

‘कथाकारों की दुनिया’ के लेखक की मान्यता है कि एक दुनिया कथाकार को मिलती है, जिस पर उसका कोई वश नहीं होता और एक दुनिया वह रचता है, जिस पर उसका शासन चलता है. उसे मिली हुई दुनिया दरअसल उस पर थोप दी गई होती है और उसे उसका एक टुकड़ा बना दिया गया होता है. जो दुनिया वह खुद निर्मित करता है, उसके नदी-नालों, खेत-जंगलों, बस्तियों-शहरों, उनमें रहने वाले लोगों के बारे में सारे निर्णय उसी के होते हैं. क़ानून व्यवस्था, लड़ाई-झगड़े, शांति-अशांति, अपराध-आंदोलन, न्याय-नियम, परिवार-समाज, दोस्ती-दुश्मनी, नैतिकता-अनैतिकता, रिश्ते-नाते, संवाद-संवादहीनता, भाषा के उचित-अनुचित प्रयोग आदि जो कुछ भी ज़रूरी है, उसे लेखक अपनी दुनिया के लिए अपने ढंग से तय करता है.

अगर इस अवधारणा को पूरा का पूरा सही मान लिया जाए, तो यह भी मानना होगा कि सामान्य लोगों की दुनिया और लेखक की दुनिया के बीच ढेर सारे अंतर्विरोध होंगे. भौगोलिक दशाओं और द्वंद्वात्मक स्थितियों से लेकर नागरिकों के व्यवहार तक में इन अंतर्विरोधों का वास होगा. तब सवाल है कि आलोचक किसी लेखक की कृति में कौन सी दुनिया की खोज करता है वह उसमें साधारण लोगों की दुनिया खोजता है या फिर रचना में लेखक की ही दुनिया की तलाश करता है अगर उसकी जिद है कि वह किसी रचना में साधारण दुनिया खोजता है, तो कोई लेखक उसके लिए अपने दरवाजे बंद कर सकता है ऐसे व्यवहार के औचित्य के लिए लेखक के पास यह दावा हो सकता है कि उसने जो दुनिया रची है, वह अपनी अवधारणा और उसमें रच-बस सकने वाले अपने नागरिकों के आधार पर टिकी है इसे लेखक की दुनिया के एक तार्किक आधार के रूप में ग्रहण भी किया जा सकता है इस आधार पर लेखक एक आलोचक के लिए यह चुनौती खड़ी कर सकता है कि वह किसी रचना में उस दुनिया की तलाश करे, जिसकी वास्तव में रचना की गई है. 

यहाँ एक संकट यह है कि लेखक स्वयं उस दुनिया का निवासी नहीं है, जो उसने रची हैं. वह उस दुनिया का सामान्य (या विशिष्ट) नागरिक है, जो वस्तुत: साधारण लोगों की दुनिया है. इससे भी आगे उसने जो दुनिया रची है, वह साधारण दुनिया के परिप्रेक्ष्य में ही रची है. यह अवश्य है कि यह परिप्रेक्ष्य सामान्य न होकर बहुत जटिल है, क्योंकि इसके मूल में साधारण दुनिया की सचाई सामने लाने या उस दुनिया को प्रभावित करने या बदल डालने के दावे होते हैं. यहाँ आलोचक के सामने और भी बड़ी चुनौती आ खड़ी होती है. क्योंकि उसे अपने आलोचना कर्म के हथियारों से उस दुनिया का दरवाजा भी खोलना होता है, जिसकी चाबी सिर्फ लेखक के पास है (कारण यह कि अपनी दुनिया की रचना प्रक्रिया केवल लेखक को ही पता होती है, आलोचक को नहीं) और लेखक की दुनिया का मूल्यांकन साधारण दुनिया के परिप्रेक्ष्य में भी करना होता है. यहाँ संकट यह है कि इस परिप्रेक्ष्य का दावा लेखक ने किया था, आलोचक ने नहीं, इसलिए उसकी सही-सही समझ केवल लेखक को ही हो सकती है, आलोचक अपने उपकरणों के सहारे लेखक की समझ के निकट पहुँचने की कोशिश भर कर सकता है.

यह परिस्थिति आलोचना-कर्म को अत्यधिक जटिल और संश्लिष्ट बनाती है तथा आलोचक को विश्लेषक के साथ रचनाकार की भूमिका में ला खड़ा करती है. प्रो. ऋषभदेव शर्मा अपनी इस नवीनतम कृति में दोनों ही रूपों में नज़र आते हैं. मेरी शुभकामनाएँ!
11 मई, 2016                                                                                                    

                                                                         - देवराज
                                                                 पूर्व अधिष्ठाता,
                                      अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ,
               महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,
                           गांधी हिल्स, वर्धा – 422005 (महारष्ट्र).

(पुस्तक) 'कथाकारों की दुनिया' : डॉ. ऋषभदेव शर्मा

कथाकारों की दुनिया/ ऋषभदेव शर्मा 
I.S.B.N. : 978-81-7965-278-7
प्रथम संस्करण, 2017 
पृष्ठ 392, मूल्य : रु. 800
 तक्षशिला प्रकाशन, 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
दूरभाष : 011-43528469, 23258802
ईमेल : info@taxshilabooks.in, taxshilabooks@gmail.com


पुस्तक के बारे में 

‘कथाकारों की दुनिया’ के लेखक की मान्यता है कि एक दुनिया कथाकार को मिलती है, जिस पर उसका कोई वश नहीं होता और एक दुनिया वह रचता है, जिस पर उसका शासन चलता है. उसे मिली हुई दुनिया दरअसल उस पर थोप दी गई होती है और उसे उसका एक टुकड़ा बना दिया गया होता है. जो दुनिया वह खुद निर्मित करता है, उसके नदी-नालों, खेत-जंगलों, बस्तियों-शहरों, उनमें रहने वाले लोगों के बारे में सारे निर्णय उसी के होते हैं. क़ानून व्यवस्था, लड़ाई-झगड़े, शांति-अशांति, अपराध-आंदोलन, न्याय-नियम, परिवार-समाज, दोस्ती-दुश्मनी, नैतिकता-अनैतिकता, रिश्ते-नाते, संवाद-संवादहीनता, भाषा के उचित-अनुचित प्रयोग आदि जो कुछ भी ज़रूरी है, उसे लेखक अपनी दुनिया के लिए अपने ढंग से तय करता है. 

इस आधार पर लेखक एक आलोचक के लिए यह चुनौती खड़ी कर सकता है कि वह किसी रचना में उस दुनिया की तलाश करे, जिसकी वास्तव में रचना की गई है. यह परिस्थिति आलोचना-कर्म को अत्यधिक जटिल और संश्लिष्ट बनाती है तथा आलोचक को विश्लेषक के साथ रचनाकार की भूमिका में ला खड़ा करती है. प्रो. ऋषभदेव शर्मा अपनी इस आलोचना-कृति में दोनों ही रूपों में नज़र आते हैं. 

प्रेमचंद ने अपने कथासाहित्य के माध्यम से आदर्शोन्मुख यथार्थ से प्रेरित अपनी दुनिया रची. उनकी इस दुनिया में गाँव और किसान तो हैं ही, अपने समय को चुनौती देती हुईं स्त्रियाँ भी हैं. प्रेमचंद जहाँ एक ओर जिजीविषा और संघर्ष की दुनिया रचते हैं वहीं दूसरी ओर फक्कड़पने से लेकर अमानुषिकता तक के अलग-अलग लोक भी निर्मित करते हैं. जैनेंद्र अपनी दुनिया मनोविश्लेषण के ताने-बाने से बुनते हैं तो अज्ञेय क्षणों के सहारे निजता के द्वीप उगाते हैं. नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, शिवप्रसाद सिंह और रामदरश मिश्र की दुनिया गाँवों और अंचलों की वह दुनिया है जिसकी यातना अनंत है और जिजीविषा असीम. निराला प्रगतिशीलता से लेकर किन्नर और समलैंगिक विमर्श तक की पहली ईंटें रखते हैं तो रांगेय राघव, श्रीलाल शुक्ल, मन्नू भंडारी और भगवान सिंह क्रमशः आदिवासी विमर्श, सत्ता विमर्श, लोकतंत्र विमर्श और जनवाद की शिलाओं से अपनी अपनी दुनिया बनाते हैं. अनामिका, मैत्रेयी पुष्पा, अलका सरावगी, महुआ माजी और अहिल्या मिश्र जैसी लेखिकाएँ स्त्री विमर्श की भींतों पर अपनी दुनिया खड़ी करती हैं तो ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश कर्दम, श्योराजसिंह बेचैन और मुद्राराक्षस जैसे कथाकार दलितों की अधिकार चेतना और अंबेडकरवाद के सहारे अपनी नई दुनिया का निर्माण करते हैं. बलराम अग्रवाल और सुकेश साहनी अपनी लघुकथाओं में जिस संसार की रचना करते हैं उसके एक सिरे पर लोक और लोकतंत्र है तो दूसरे सिरे पर अतिरंजना और महास्वप्न. अभिप्राय यह है कि अपनी कथा-रचना के माध्यम से हर संवेदनशील कथाकार अपनी रुचि के अनुसार अपनी समानांतर दुनिया का सृजन करता है. 

प्रस्तुत ग्रंथ में हिंदी के प्रमुख कथाकारों द्वारा रची गई उनकी इसी अपनी दुनिया की प्रामाणिक पड़ताल की गई है और यह दर्शाया गया है कि बहुत सी कथा कृतियाँ अपनी निजी दुनिया के कारण देश-कालांतरगामी महत्व प्राप्त कर लेती हैं. यह ग्रंथ कभी उस दुनिया का पता देता है जो कथाकार को बनी बनाई मिली है तो कभी उस दुनिया की ओर इशारा करता है जिसे कथाकार बनाना चाहता है. 

‘कथाकारों की दुनिया’ में हिंदी के अलावा कुछ प्रमुख तेलुगु कथाकारों की दुनिया की भी एक झाँकी प्रस्तुत है. साथ ही, तमिल कहानी साहित्य के उद्भव और विकास का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने के बहाने तमिल कथाकारों की दुनिया की भी एक झलक उपस्थित है. इस तरह इस ग्रंथ में हिंदी, तेलुगु और तमिल के मध्य राष्ट्रभाषा के माध्यम से सेतु-रचना का भी स्तुत्य कार्य किया गया है. 


लेखक के बारे में 

डॉ. ऋषभ देव शर्मा 

जन्म : 04 जुलाई 1957, ग्राम गंगधाड़ी, जिला मुजफ्फर नगर, उत्तर प्रदेश. 

शिक्षा : एमए (हिंदी), पीएचडी (उन्नीस सौ सत्तर के पश्चात की हिंदी कविता का अनुशीलन). 

कार्य : 1983-1990 : जम्मू और कश्मीर राज्य में गुप्तचर अधिकारी (इंटेलीजेंस ब्यूरो, भारत सरकार). 1990-2015 : उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के विभिन्न केंद्रों में अध्यापन एवं शोध निर्देशन. 4 जुलाई, 2015 को उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के हैदराबाद केंद्र के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष पद से अवकाशप्राप्त. 

संप्रति : स्वतंत्र लेखन. 

प्रकाशन : काव्य संग्रह – तेवरी (1982), तरकश (1996), ताकि सनद रहे (2002), देहरी (स्त्रीपक्षीय कविताएँ, 2011), प्रेम बना रहे (2012) [तेलुगु काव्यानुवाद : प्रेमा इला सागिपोनी (2013), प्रिये चारुशीले (2013)], सूँ साँ माणस गंध (2013), धूप ने कविता लिखी है (2014). 

आलोचना - तेवरी चर्चा (1987), हिंदी कविता : आठवाँ नवाँ दशक (1994), साहित्येतर हिंदी अनुवाद विमर्श (2000), कविता का समकाल (2011), तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ (2013), तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय (2015), हिंदी भाषा के बढ़ते कदम (2015), कविता के पक्ष में (2016), कथाकारों की दुनिया (2016). 

संपादन : पदचिह्न बोलते हैं (1982) , शिखर-शिखर (डॉ.जवाहर सिंह अभिनंदन ग्रंथ, 1994), कच्ची मिट्टी – 2 (1994), माता कुसुमकुमारी हिंदीतरभाषी हिंदी साधक सम्मान : अतीत एवं संभावनाएँ (1996), अभिनंदन : जनकवि दुलीचंद शशि, हैं सरहदें बुला रहीं (2000), भारतीय भाषा पत्रकारिता (2000), अनुवाद : नई पीठिका, नए संदर्भ (2003), हिंदी कृषक (काजाजी अभिनंदन ग्रंथ, 2005), पुष्पक – 3 (2003), पुष्पक – 4 (2004), स्त्री सशक्तीकरण के विविध आयाम (2004), प्रेमचंद की भाषाई चेतना (2006), अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य (1999, 2009), भाषा की भीतरी परतें : भाषाचिंतक प्रो.दिलीप सिंह अभिनंदन ग्रंथ (2012), मेरी आवाज (2014), उत्तरआधुनिकता : साहित्य और मीडिया (2015) , संकल्पना (2016), वृद्धावस्था विमर्श (2016), ‘अंधेरे में’ का पुनर्पाठ (2016). 

मूलतः कवि. 1981 में तेवरी काव्यांदोलन (आक्रोश की कविता) का प्रवर्तन. हिंदी के प्रचार-प्रसार-अध्ययन-अध्यापन हेतु पूर्णत: समर्पित. अनेक शोधपरक समीक्षाएँ एवं शोधपत्र प्रकाशित. डीलिट, पीएचडी और एमफिल के 142 शोधकार्यों का निर्देशन. सौ से अधिक पुस्तकों के लिए भूमिका लेखन. 

सम्मान : 

वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक ट्रस्ट, हैदराबाद द्वारा ‘हिंदी साहित्य सम्मान’ (2015), तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी, चेन्नई द्वारा ‘जीवनोपलब्धि सम्मान’ (2015), प्रतिभा प्रकाशन, हैदराबाद द्वारा ‘सुगुणा स्मारक सम्मान’ (2015), कमला गोइन्का फाउण्डेशन, बैंगलोर द्वारा ‘रमादेवी गोइन्का हिंदी साहित्य सम्मान’(2013), जनजागृति सेवा सद्भावना पुरस्कार, हैदराबाद (2011), शिक्षा शिरोमणि पुरस्कार, हैदराबाद (2006), रामेश्वर शुक्ल अंचल सम्मान, जबलपुर (2002). 

विशेष : ऋषभदेव शर्मा का कविकर्म (2015 : डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह द्वारा समग्र काव्य का विमर्श मूलक मूल्यांकन) 

संपर्क : 208 ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद – 500013 (तेलंगाना). फोन : 08121435033, 040-42102132 

ईमेल : rishabhadeosharma@yahoo.com, rishabhadsharma@gmail.com


आभार

मुझे लगता है कि यदि कोई लेखक निश्चिंत और निर्द्वंद्व होकर कुछ लिख पाता है तो ऐसा तभी संभव है जब उसे परिवार और परिवेश का समर्थन प्राप्त हो. मैं बचपन से आज तक जो भी लिख पाया हूँ, घर से मिले प्रोत्साहन की उसमें बड़ी भूमिका रही है. ‘कथाकारों की दुनिया’ कभी न रची जाती, अगर मेरे जैसे व्यावहारिक बुद्धि से हीन और प्रमादी व्यक्ति को घर-परिवार का संबल न मिला होता. मेरे दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा से सेवानिवृत्त होने पर श्रीमती जी (डॉ.. पूर्णिमा शर्मा), बिटिया (लिपि भारद्वाज) और बेटे (कुमार लव) ने आदेश के स्वर में कहा था - अब आप लिखने में लग जाइए. यह पुस्तक उनके आदेश का पालन करते हुए लिखी गई है. ‘आभार’ में क्या कहूँ?... 

इस पुस्तक के लिए संदर्भ सामग्री जुटाने से लेकर प्रेस कॉपी तैयार करने तक की जिम्मेदारी सौभाग्यवती डॉ.. जी. नीरजा ने स्वेच्छा से अपने सिर पर ले ली और दिन-रात एक कर दिया. उन्हें और उनके पतिदेव तथा सुपुत्री को अनंत आशीर्वाद! 

पुस्तक को प्रकाशन के मुहाने तक पहुँचाने में डॉ. पोलवरपु जयलक्ष्मी तथा डॉ. सिरिपुरपु तुलसी देवी के आग्रह की भी बड़ी भूमिका रही है. मैं उनके प्रति भी आभारी हूँ. 

‘दो शब्द’ और ‘अभिमत’ लिख देकर मुझे भाग्यवान बनाने के लिए प्रो. देवराज जी और प्रो. एम. वेंकटेश्वर जी को विनम्र प्रणाम! 

... और पुस्तक को निर्धारित समय के भीतर सुरुचिपूर्वक प्रकाशित करने के लिए प्रिय भाई कमल बिष्ट और तक्षशिला प्रकाशन का विशेष आभार. 


- ऋषभदेव शर्मा