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सोमवार, 4 मार्च 2019

यह महान दृश्य है...

यह महान दृश्य है...

@01मार्च,2019
भारतीय वायु सेना के विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान को अंतत: पाकिस्तान ने विधिवत भारत को सौंप दिया। भारत भर में दीवाली का हर्ष छा गया। वह क्षण अत्यंत रोमांचकारी और गौरवपूर्ण था जब भारतमाता के इस सपूत ने मातृभूमि की सीमा में वापस प्रवेश किया। उस ऐतिहासिक पल में विंग कमांडर का धैर्य, संतुलन, स्वाभिमान और आत्मविश्वास देखने लायक था। वे सचमुच ‘अग्निपथ’ पार करके आए हैं। शायद ऐसे ही अवसर के लिए डॉ. हरिवंश राय बच्चन ने कहा हो-
यह महान दृश्य है
चल रहा मनुष्य है
अश्रु, स्वेद, रक्त से
लथपथ लथपथ लथपथ
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ

इतिहास याद रखेगा, किस तरह पाकिस्तानी वायुसेना के हमलावर विमानों का पीछा करते हुए विंग कमांडर अभिनंदन वर्धमान ने उन्हें भगाने और मार गिराने में सफलता पाई थी। भले ही उनका अपना विमान दुर्घटनाग्रस्त हो गया हो। उन्होंने अपने प्राण तो बचा लिए, लेकिन संयोगवश पाकिस्तान के क्षेत्र में जा गिरे और पाकिस्तानी सेना के कब्जे में चले गए।  जाहिर है, वहाँ उनके साथ कोई बहुत अच्छा व्यवहार तो नहीं ही किया गया होगा। लेकिन अंतरराष्ट्रीय दबाव के सामने झुकते हुए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को उनके भारत को लौटाने की घोषणा करनी पड़ी। पाकिस्तान ने पूरी कोशिश की कि यह वापसी उसकी अपनी शर्त पर हो और भारत उससे वार्ता के लिए आगे आ जाए। पर उसकी एक न चली। इसे भारत की कूटनीति की जीत ही कहा जाएगा कि अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण इस मामले में पाकिस्तान अलग-थलग पड़ गया। फिर भी वियना संधि का उल्लंघन करके इस घटना का अपने प्रचार के लिए भरपूर इस्तेमाल करने से वह बाज नहीं आया।  अभिनंदन वर्धमान की सकुशल देश वापसी को बार-बार किसी न किसी कारण टाला गया और उनका बयान रिकॉर्ड करके पाकिस्तान मीडिया पर प्रचारित किया गया। जगजाहिर है कि पाक-फौज की प्रशंसा और भारतीय मीडिया की आलोचना करनेवाला यह बयान दबाव में दिया गया बयान है। किसी प्रमाण के रूप में इसकी कोई विश्वसनीयता नहीं हो सकती। यही नहीं, यह वीडियो बुरी तरह संपादित है, जिससे पता चलता है कि तथाकथित बयान को अपने अनुकूल बनाने के लिए उसमें भारी काट-छांट की गई है। ऐसा करके पाकिस्तान ने साफ कर दिया कि जिसे वह ‘शांति की दिशा में सदाशयता का एक कदम’ कह रहा है, उसके पीछे उसकी नीयत बिल्कुल भी साफ नहीं है। इसलिए यह उम्मीद करना अभी दूर की कौड़ी भर है कि इस घटना से दोनों देशों के बीच तनाव घट जाएगा।

पाकिस्तान की नीयत साफ नहीं है और वह विश्व-जनमत को गुमराह करने के लिए भलेपन का नाटक कर रहा है। वरना अभिनंदन वर्धमान के लौटाए जाने की घोषणा के साथ ही सीमा और एलओसी पर शांति छा जानी चाहिए थी। पर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। उलटे पाकिस्तान की ओर से लगातार सीजफायर को तोड़ने और हमले की वारदातें इस तरह चलती रहीं, मानो उसकी फौज ने अपने प्रधानमंत्री का बयान सुना ही न हो। अगर थोड़ी देर को मान भी लिया जाए कि युद्धबंदी को लौटाने के पीछे इमरान खान का इरादा नेक था, तो इसके बावजूद पाकिस्तान की ओर से हमले जारी रहने से यह भी पता चलता है कि सेना के इरादे कतई नहीं।  अतः, पाकिस्तान के साथ सुलह-सफाई का समय अभी नहीं आया है।

इस बीच, पाकिस्तान की कूटनीतिक घेराबंदी करने में भारत को एक और सफलता इस्लामिक सहयोग संगठन (आईओसी) के मंच पर भी मिली है। इसमें भारत की विदेश मंत्री ने ‘सम्मानित अतिथि’ के रूप में भाग लिया और पाकिस्तान के विदेश मंत्री की कुर्सी खाली रही! संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भी पाकिस्तान को लगातार घेरा जा रहा है। आर्थिक नाकेबंदी भी चलती रहनी चाहिए। इस वक्त भारत को नाहक ही पिघलना नहीं चाहिए।  पाक को शांति के लिए कदम बढ़ाना ही है, तो अपनी जमीन से आतंकवाद को उखाड़ फेंके। उससे न होता हो, तो भारत से सहायता के लिए कहे; और अपनी सदाशयता प्रमाणित करे! 000

शनिवार, 5 जनवरी 2019

साहित्य : सुधारात्मक दृष्टिकोण


साहित्य : सुधारात्मक दृष्टिकोण
- ऋषभदेव शर्मा एवं पूर्णिमा शर्मा

साहित्य की भारतीय अवधारणा ‘सहित’ अर्थात सामाजिकता, सामूहिकता और लोकमंगल के साथ जुड़ी हुई है। साहित्य के प्रयोजनों की चर्चा करते हुए यहाँ ‘शिवेतर’ की ‘क्षति’ का भी  बलपूर्वक आख्यान किया गया है। समाज के लिए जो अश्रेयस्कर है उस पर चोट करना और जो श्रेयस्कर है उसकी पुष्टि करना साहित्य का मूलभूत सामाजिक प्रयोजन है। इसे इस रूप में भी कहा जा सकता है कि यथार्थ की गहन पड़ताल करते हुए समाज को आदर्श की दिशा में प्रवृत्त करना साहित्य का परम उद्देश्य है। ऐसा करने के क्रम में स्वाभाविक रूप से एक रचनात्मक और सुधारात्मक दृष्टिकोण उभर कर सामने आता है। हिंदी साहित्य के इतिहास का अवलोकन करें तो पता चलता है कि आरंभ से ही यह लोकमंगल प्रधान  रचनात्मक और सुधारात्मक दृष्टिकोण हिंदी साहित्य की मूल प्रेरणा रहा है। गुरु गोरखनाथ, संत कबीरदास, गोस्वामी तुलसीदास और भूषण जैसे आदिकाल और मध्यकाल के साहित्यकारों ने अपनी रचनाधर्मिता के प्रभाव से समाज को सकारात्मक दिशा में प्रेरित करने का सदा प्रयास किया। आधुनिक काल का तो आरंभ ही नवजागरण और सुधार के आंदोलनों के बीच में हुआ जिससे साहित्य में यथार्थ के साथ-साथ आदर्श स्थापित करने की प्रवृत्ति को प्रतिष्ठा मिली। आगे चलकर हिंदी साहित्य में यथार्थ और उसके विविध रूपों का क्रमशः विस्तार हुआ; लेकिन कभी भी साहित्यकार की दृष्टि से यह सामाजिक लक्ष्य ओझल नहीं हुआ कि मनुष्य को रहने के लिए बेहतर व्यवस्था, बेहतर धरती और बेहतर भविष्य की आवश्यकता है। मनुष्य जीवन की इस बेहतरी के लिए साहित्यकारों ने अपने समय के विद्रूप चेहरे का अंकन अवश्य किया लेकिन साथ ही किसी न किसी प्रकार अपनी अभीष्ट बेहतर व्यवस्था की ओर भी इशारा किया।
यहाँ यह भी समझ लेना जरूरी है कि सुधारात्मक दृष्टिकोण से संचालित साहित्यकार उपलब्ध यथार्थ के ध्वंस की अपेक्षा उसकी चिकित्सा और उसके पुनर्निर्माण में विश्वास रखता है। इसीलिए उसका साहित्य समाधान के लिए सुझाव भी प्रस्तुत करता है। दूसरी ओर अपने सामाजिक यथार्थ से अत्यधिक असंतुष्ट होने के कारण जो साहित्य उसे ध्वस्त करके आमूलचूल परिवर्तन चाहता है, उसका लक्ष्य सुधार की तुलना में क्रांति हुआ करता है।  इन दोनों ही प्रकार के साहित्यों की एक बड़ी सीमा यही है कि इनके पास समस्याओं के पूर्व-निर्धारित समाधान होते हैं जो किसी आदर्श अथवा यूटोपिया की स्थापना करते हैं। इससे पाठक द्वारा  अपना पाठ निर्मित करने और अपने समाधान तलाशने की संभावना सीमित हो जाती है। अतः सुधारात्मक दृष्टिकोण की तुलना में या समाधान प्रस्तुत करने वाले साहित्य की तुलना में खुले अंत वाला साहित्य अधिक संभावनापूर्ण होता है। तथापि समाधान प्रस्तुत करने वाला अर्थात सुधारात्मक साहित्य लगातार लिखा जाता रहता है।  इस प्रकार के साहित्य के केंद्र में कोई न कोई ‘समस्या’ होती है।  रचनाकार उस समस्या के विभिन्न आयामों का उद्घाटन करता है, उसके कारणों की पड़ताल करता है और अपनी ओर से कोई संभावित समाधान भी सुझाता है। यही सुधारात्मक साहित्य की रचना-प्रक्रिया है।
केवल भारत ही नहीं संभवतः सभी देशों और समाजों में किसी न किसी रूप में देह व्यापार से जुड़ी हुई सामाजिक समस्या पाई जा सकती है। हिंदी साहित्य में इसे केंद्र बनाकर विभिन्न विधाओं में अनेक कृतियों की रचना हुई है। यहाँ इस समस्या पर सुधारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत करने वाले तीन उपन्यासों पर चर्चा की जा रही है। 
कथा सम्राट प्रेमचंद (1880 1936) ने अपने पहले उपन्यास ‘सेवासदन’ (1916) में वेश्या जीवन  को केंद्र में रखा है। इस उपन्यास में दर्शाया गया है कि भारतीय समाज में प्रचलित दहेज प्रथा किस प्रकार भोली-भाली लड़कियों को नारकीय जीवन में धकेल देती है।  लेखक ने गरीबी और विलासिता पूर्ण जीवन की ललक के द्वंद्व को उभारते हुए स्त्री-पुरुष संबंधों के भी अर्थ-केंद्रित होते जाने के क्रूर यथार्थ को अत्यंत मार्मिक ढंग से उद्घाटित किया है। लेकिन अपने सुधारात्मक दृष्टिकोण के कारण प्रेमचंद तमाम तरह की दानवता के बीच ही मानवता का अंकुर उगाने में भी सफल हुए हैं। भारी दुर्भाग्य झेलने के बाद अंततः इस उपन्यास की नायिका सुमन दुनिया के प्रति उदार हो जाती है और उसका पति भी साधु बनकर अपने दुष्कर्म का प्रायश्चित करता है। सुमन को स्वामी जी के रूप में एक सच्चा मार्गदर्शक मिलता है जो उसे यह बोध कराता है कि “सतयुग में मनुष्य की मुक्ति ज्ञान से होती थी, त्रेता में सत्य से, द्वापर में भक्ति से; पर इस कलयुग में इसका केवल एक ही मार्ग है और वह है सेवा।  इसी मार्ग पर चलो और तुम्हारा उद्धार होगा। जो लोग तुमसे भी दीन-दुखी-दलित हैं, उनकी शरण में जाओ और उनका आशीर्वाद तुम्हारा उद्धार करेगा। कलयुग में परमात्मा इसी सुख-सागर में निवास करते हैं।“ (प्रेमचंद,सेवासदन : 342 343)। वेश्या जीवन की समस्या का समाधान अपराधबोध से ग्रस्त होकर आत्महत्या कर लेना नहीं है। लेखक ने इसका उपाय समाजसेवा के रूप में प्रस्तावित किया है। अनाथाश्रम का संचालन करने वाले गजानंद सुमन के भीतर की ममतामयी स्त्री को जगाते हैं, “इस अनाथालय के लिए एक पवित्र आत्मा की आवश्यकता है और तुम ही वह आत्मा हो। मैंने बहुत ढूँढा पर कोई ऐसी महिला न मिली जो यह काम प्रेम भाव से करे, जो कन्याओं का माता की भाँति पालन करे और अपने प्रेम से अकेली उनकी माताओं का स्थान पूरा कर दे। वे बीमार पड़ें तो उनकी सेवा करे। उनके फोड़े-फुंसियाँ, मल-मूत्र देखकर घृणा न करे और अपने व्यवहार से उनमें धार्मिक भावों का ऐसा संचार कर दे कि उनके पिछले कुसंस्कार मिट जाएँ और उनका जीवन सुख से कटे। वात्सल्य के बिना यह उद्देश्य पूरा नहीं हो सकता। ईश्वर ने तुम्हें ज्ञान और विवेक दिया है, तुम्हारे हृदय में दया है, करुणा है, धर्म है और तुम ही इस कर्तव्य का भार सँभाल सकती हो।“ (वही : 346-347)। इस आश्रम से ही सुमन को अपने जीवन का चरम लक्ष्य मिलता है जिसकी परिणति ‘सेवासदन’ के रूप में चरितार्थ होती है। 
सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’(1899-1961)ने अपने पहले उपन्यास ‘अप्सरा’(1931) में एक अलग अवलोकन बिंदु से वेश्या जीवन को देखा है।  गंधर्व जाति और अप्सरा के रूपक का समावेश करते हुए लेखक ने रूपजीवा कनक की इस विवशता को उभारा है कि उसे प्रेम करने का अधिकार नहीं है। सर्वेश्वरी अपनी पुत्री कनक का पालन-पोषण इस प्रकार करती है कि  उसके मन में पुरुष के प्रति प्रेम नहीं बल्कि उसकी स्वभावगत कमजोरियों का लाभ उठाने की भावना दृढ़ होती जाती है। इस वृत्ति द्वारा उसे अपार संपत्ति की प्राप्ति तो होती है, लेकिन प्रेम से प्राप्त होने वाले आत्मतोष का परिचय उसे नहीं मिल पाता। माता सर्वेश्वरी ने कनक को सिखलाया था, “किसी को प्यार मत करना।  हमारे लिए प्यार करना आत्मा की कमजोरी है।  यह हमारा धर्म नहीं।“ (निराला : अप्सरा :15)। लेकिन जब इस प्रेम की उसे अनुभूति होती है तो वह माँ को दिए वचन  से मुक्ति के लिए तड़प उठती है। उल्लेखनीय है कि इस उपन्यास की संक्षिप्त सी ‘भूमिका’ में निराला ने यह कहा है कि “मैंने किसी विचार से ‘अप्सरा’ नहीं लिखी। किसी उद्देश्य की पुष्टि इसमें नहीं। अप्सरा स्वयं मुझे जिस-जिस ओर ले गई, मैं दीपक-पतंग की तरह उसके साथ रहा। अपनी ही इच्छा से अपने मुक्त जीवन प्रसंग का प्रांगण छोड़ प्रेम की सीमित पर दृढ़ बाहों में सुरक्षित, वैध रहना उसने पसंद किया।“ (अप्सरा :भूमिका)। कहना न होगा कि इस कथन के माध्यम से लेखक ने ‘मुक्त जीवन’ के स्थान पर ‘प्रेम’ पूर्ण दांपत्य के विकल्प को सुरक्षित और वैध घोषित किया है जो उनके सुधारात्मक दृष्टिकोण का प्रतीक है।  इसीलिए तो अपने चरित्र बल से सर्वेश्वरी के विकृत परमाणुओं को रोकती है। उसकी अविचल स्त्रीत्व के प्रति निष्ठा के समक्ष आप ही आप सर्वेश्वरी का मस्तक झुक गया।  इससे सर्वेश्वरी के हृदय में शांति का उद्रेक हुआ। (अप्सरा: 210-211)। सर्वेश्वरी ने जिंदगी में उपार्जन उसने बहुत किया था लेकिन अब उसकी चित्तवृत्ति बदल रही थी। इस प्रकार निराला ने अप्सरा को वेश्या जीवन से मुक्त करके प्रेमपूर्ण दांपत्य से युक्त पारिवारिक जीवन का चुनाव करने का अवसर दिया तथा इसका विरोध करने वाले तत्वों पर तारा की सदाशयता की विजय दर्शाई।
वस्तुतः वेश्या जीवन पर उपन्यास लिखते समय सुधारात्मक दृष्टिकोण वाले साहित्यकार के समक्ष मुख्य समस्या वेश्या के सम्मान पूर्ण सामाजिक जीवन में पुनर्वास की होती है।  प्रेमचंद ने इस हेतु सुमन के माध्यम से सेवासदन रूपी आश्रम की स्थापना कराई और निराला ने अपनी नायिका कनक को विधिवत वैवाहिक जीवन में प्रतिष्ठित किया और पारिवारिक तथा सामाजिक सम्मान दिलवाया। वेश्या अथवा सेक्स-वर्कर के पुनर्वास की समस्या से इक्कीसवीं  शताब्दी की लेखिका अनामिका (1961) भी अपने उपन्यासों ‘तिनका तिनके पास’ और ‘दस द्वारे का पींजरा’ (2008) में जूझती हुई दिखाई देती हैं। इन दोनों ही उपन्यासों में उन्होंने वेश्यावृत्ति के पारंपरिक से लेकर आधुनिक तक विविध रूपों को उजागर किया है।‘दस द्वारे का पींजरा’ के आरंभ में ही यह विद्रूप यथार्थ उद्घाटित हो जाता है कि  ‘‘भारतीय रेल के डिब्बों-सी हैं ये सेक्स वर्कर्स- तरह-तरह की भाषिक अस्मिताएं इनमें घुली हैं। सादा कपड़ों में (पुलिस की वर्दी उतारकर) उनसे और तकलीफों से रू-ब-रू होना एक अनुभव है जो जिन्दगी में कभी आदमी को चैन से नहीं सोने दे। बिहार-बंगाल और नेपाल में दारिद्रय और लावण्य-दोनों ज्यादा हैं, इसलिए वहाँ की लड़कियों की तो भरमार है।’’ लेकिन वेश्यावृत्ति में पहुंची हुई इन  स्त्रियॉं को अनामिका अपराधबोध से ग्रस्त नहीं बनातीं। तारा और ढेलाबाई ऐसी ही स्त्रियाँ हैं जो अपनी इस नियति के कारण किसी प्रकार ग्लानि में नहीं डूबतीं। लेखिका ने उन्हें स्वाभिमान और मर्यादा से युक्त ऐसी उच्च सामाजिक चेतना संपन्न स्त्रियों के रूप में चित्रित किया है जो वेश्या के रूप में स्त्री के वस्तूकरण का प्रतिकार उसके पुनः मानुषीकरण द्वारा करती हैं। पूरा जीवन वेश्या के रूप में जीने वाली ढेलाबाई  अपनी नातिन काननबाला से पूछती है कि औरत की देह मिली है तो क्या? वह इस देह को रूह का कैदखाना बनाए रखने के लिए तनिक भी सहमत नहीं। उसके अनुसार इस समस्या का सुधारात्मक समाधान यह है कि स्त्री को अपना संसार और बड़ा करना होगा।
 वेश्यावृत्ति में फंसी महिलाओं और उनके परिवारों के पुनर्वास के निमित्त प्रेमचंद के सेवासदन की ही तर्ज पर अनामिका भी आधारशिला और जोगिनिया कोठी के माध्यम से ऐसे कम्यून की कल्पना करती हैं जहाँ इन अभिशप्त परिवारों को सम्मानजनक जीवन मिल सके। ये स्त्रियाँ अपने ही अनुभव से यह सीखती हैं कि “शिक्षा ही इस दलदल से निकलने का एकमात्र उपाय है- अस्मिता के विकास की एकमात्र गारंटी। हमारी वंशपरंपरा,जाति, वर्ग, नस्लें व्यक्तित्व का आरोपित सत्य ही होते हैं- महज एक संयोग- उसके लिए शर्मिदा या गौरवान्वित होना दुनिया की बड़ी बेवकूफियों में एक है!” ढेलाबाई आध्यात्मिक साधना और कुंडलिनी शक्ति के जागरण द्वारा देह से ऊपर उठ जाती है, मुक्त हो जाती है। वह अफसाना बेगम के आह्वान पर दिल्ली में ‘मुक्ति मिशन’ में जाकर पंडिता रमाबाई से भेंट करती है। इन जागरूक स्त्रियॉं से मिलने पर उसकी समझ में यह भी आता है कि औरतों को चाँद  बनकर रहने से कोई फायदा नहीं, खुद सूरज बनकर दमक उठना है। इसीलिए वह दुनिया भर की बेसहारा औरतों को ‘मुक्ति मिशन’ में एकजुट करने के काम में लग जाती है। लेखिका ने शमीम पुतली तवायफ के गुप्त संगठन के बारे में भी यह रहस्योद्घाटन किया है कि उसमें शामिल  तवायफें अपनी देह की कमाई  क्रांतिकारियों को हथियार दिलवाने में खर्च करती हैं। अभिप्राय यह कि लेखिका ने सुधारात्मक दृष्टिकोण अपनाते हुए वेश्याओं के समक्ष सामाजिक कार्य, सार्वजनिक जीवन में भागीदारी तथा कम्यून के माध्यम से अपने समुदाय के कल्याण के लिए काम करने का रचनात्मक विकल्प प्रस्तुत किया है।
निष्कर्षतः यह कहा जा सकता है कि प्रेमचंद, निराला और अनामिका तीनों ने वेश्या जीवन पर केंद्रित अपने उपन्यासों में जहाँ इस समस्या के स्वरूप और कारणों का यथार्थपरक चित्रण किया है, वहीं वेश्याओं व उनके परिवार के पुनर्वास के संबंध में समाधान सुझाते हुए अपने सुधारात्मक दृष्टिकोण का भी सफलता पूर्वक प्रतिपादन किया है। 000

शनिवार, 29 दिसंबर 2018

(भूमिका) किन्नर विमर्श : समाज और साहित्य


सं. बिश्नोई, मिलन (2018), किन्नर विमर्श : साहित्य और समाज, कानपुर : विद्या 

भूमिका 

उत्तर आधुनिक विमर्श का दौर आने पर हिंदी साहित्य सृजन और समीक्षा के क्षेत्र में परिधि का केंद्र की ओर सरकने का जो क्रम शुरू हुआ था, उसके काफी अच्छे परिणाम निकले हैं। कल तक जो समुदाय और मुद्दे साहित्य-चिंतन के हाशिए पर थे तथा जिनकी निरंतर उपेक्षा हुई थी, वे नए-नए कई केंद्रों के रूप में उभर कर सामने आए। इससे हिंदी साहित्य की एककेंद्रीयता टूटी और समाज की बहुलता के अनुरूप साहित्य में लोकतंत्र संभव हुआ। स्त्री,दलित, अल्पसंख्यक और आदिवासी विमर्श इसी नई प्रवृत्ति के परिणामस्वरूप प्रकट और विकसित हुए। साथ ही, हाशिया कृत विमर्श के भी हाशिए पर इधर क्रमशः जो अन्य विमर्श उभरे हैं या उभर रहे हैं, उनमें तृतीयलिंगी विमर्श और समलैंगिक विमर्श खास तौर पर ध्यान खींचने वाले हैं। 

तृतीयलिंगी विमर्श को प्रायः ‘किन्नर विमर्श’ के रूप में संबोधित किया जाता है। स्मरणीय है कि ‘किन्नर’ शब्द से यहाँ ऐसे हाशियकृत समुदाय का बोध होता है जो स्त्री और पुरुष से इतर अथवा तृतीय जेंडर के अंतर्गत परिगणित है। ‘किन्नर’ शब्द का इस पारिभाषिक अर्थ में प्रयोग नया और आधुनिक है। इसे संस्कृत आदि स्रोत के साथ जोड़कर प्राचीन अर्थ में ग्रहण नहीं किया जा सकता। संस्कृत में ‘किन्नर’ शब्द का प्रयोग यक्ष, गंधर्व, राक्षस और अप्सरा आदि स्वर्ग वर्ग की योनियों अथवा जातियों के लिए किया जाता था। हिंदी साहित्य में भी यह इसी रूप में गृहीत रहा है। इसके अलावा किन्नौर के निवासियों को भी किन्नर कहे जाने की परंपरा रही है। परंतु जब ‘थर्ड जेंडर’ के लिए हिंदी में किसी तत्सम/ संस्कृतनिष्ठ शब्द की आवश्यकता पड़ी तो इसे ‘हिजड़ा’ शब्द के पर्याय के रूप में ग्रहण कर लिया गया क्योंकि हिंदी भाषासमाज में वह एक टैबू/ वर्जित शब्द है। ‘किन्नर विमर्श’ इस प्रकार उस समुदाय की अपनी अस्मिता को रेखांकित करने के लिए प्रयत्नशील विमर्श है जिसे जेंडर संबंधी किसी विकृति के कारण ‘हिजड़ा’कहे जाने का अभिशाप भोगना पड़ता है। इसमें संदेह नहीं कि पुरुष और स्त्री जितने पुराने हैं, मानव सभ्यता में शायद तृतीयलिंगी अथवा इतरलिंगी मनुष्यों की उपस्थिति भी उतनी ही पुरानी हो। लेकिन इसका यह भी अर्थ नहीं है कि प्राचीनता की दुहाई देते हुए कोई ‘अर्धनारीश्वर’ के मिथक को भी ‘हिजड़ा’ में बदल दे। ‘किन्नर’ का वर्तमान अर्थ आधुनिक युग की देन है जिसे आज की परिस्थितियों में ग्रहण किया गया है। इसलिए इस शब्द की प्राचीन साहित्य में उपलब्धता के आधार पर उस समय की किन्नर जाति को अति उत्साह वश तृतीयलिंगी समुदाय घोषित करना उचित नहीं माना जा सकता। 

तृतीयलिंगी समुदाय की उपस्थिति के प्राचीन प्रमाण ‘किन्नर’ शब्द से इतर भी बहुत सारे उपलब्ध होते हैं और वही तर्कसंगत भी है। शरीरविज्ञान और मनोविज्ञान की दृष्टि से ‘सुश्रुत संहिता’ में एक संपूर्ण प्रकरण ही इस समुदाय पर केंद्रित है।वहाँ इसके लिए ‘षंढ’ शब्द का प्रयोग किया गया है। इससे पता चलता है कि सुश्रुत के समय ‘षंढत्व’ के विविध कारणों, प्रकारों, संभावनाओं,औषधि और शल्यक्रिया द्वारा चिकित्सा की ठोस परंपरा विद्यमान थी। 

किसी व्यक्ति के षंढ या किन्नर या हिजड़ा होने के मूल में किसी न किसी प्रकार की जेनेटिक विकृति जिम्मेदार होती है। इसके लिए वह व्यक्ति या समुदाय स्वयं किसी भी प्रकार उत्तरदायी नहीं है। लेकिन ‘लिंगकेंद्रित (फैलोसेंट्रिक)’ व्यवस्था ने ऐसे व्यक्ति अथवा समुदाय के लिए अपने बीच कोई गुंजाइश नहीं छोड़ कर रखी है। हमारे समाज का यह दोगलापन भी विचित्र ही है कि एक ओर तो ऐसे व्यक्ति और समुदाय को समाज से बहिष्कृत, तिरस्कृत, अपमानित, अस्पर्शित और समाज की मूलकथा से पूरी तरह अनुपस्थित रखा जाता है तथा दूसरी ओर उसे देवत्व के मिथक के साथ जोड़कर रहस्यमय भी बना दिया जाता है। ‘किन्नर विमर्श’ इस लिंगभेदजनित अमानुषिकता का विरोध करता है और किन्नर समुदाय के मानवाधिकार को बहाल करने की माँग करता है। हिंदी के आधुनिक काल के साहित्य में ‘निराला’ के ‘कुल्ली भाट’ का चरित्र यदि समलैंगिक व्यक्ति का चरित्र है तो शिवप्रसाद सिंह की ‘बहाव वृत्ति’ तथा ‘बिंदा महाराज’ जैसी कहानियों के केंद्रीय चरित्र तृतीयलिंगी विमर्श की आरंभिक आहट देने वाले किन्नर चरित्र हैं जो समाज की मूलकथा में पुनर्वास के लिए जूझ रहे हैं। वृंदावन लाल वर्मा के एकांकी ‘नीलकंठ’का भी इस श्रेणी में उल्लेख किया जा सकता है। 

‘किन्नर विमर्श’ के हाशियाकृत समुदाय विमर्श के भी हाशिए पर रहने का एक बड़ा कारण यह है कि इन तमाम विमर्शों की प्रारंभिक स्थापना यह रही है कि जो कल तक अनुपस्थित रहा, वह आज उपस्थित होकर स्वयं अपने अस्तित्व की पहचान कराए। इसे स्वानुभूति अथवा इनसाइडर द्वारा दिया गया साक्ष्य माना जाता है। अभी तक हमारे समाज में किन्नर समुदाय अपने दैनिक जीवन के संघर्ष में ही इस बुरी तरह फँसा हुआ है कि उसके पास न तो वैसी शिक्षा है और नही अभिव्यक्ति की वैसी परंपरा कि वह अपनी व्यथा को अपनी ज़बानी बयान कर सके। इस विडंबना के बावजूद साहित्य में यदि इक्का-दुक्का किन्नर आत्मकथाएँ आ रही हैं तो इसे अत्यंत क्रांतिकारी पहल माना जाना चाहिए। इसके अलावा, स्वानुभूति के अतिरिक्त सहानुभूति का बहुत सा साहित्य किन्नर विमर्श के खाने में विविध विधाओं में रचा जा रहा है। इस नए रचे गए साहित्य में रचनाकारों ने काफी हद तक किन्नर समुदाय को निकट से देख कर उनकी जीवन गाथा, वेदना, प्रथाओं, सामुदायिकता और आकांक्षाओं को प्रकट करने का सफल प्रयास किया है। भिक्षाटन और नाचने-गाने से लेकर तरह-तरह के वेश्या वृत्ति और माफिया अपराधों तक में लिप्त होने के अलावा भी आधुनिक समाज में किन्नर अपनी उपस्थिति विभिन्न व्यवसायों, सामाजिक कार्यों और राजनीति में दर्ज करा रहे हैं। यह साहित्य इस सब को भी सामने लाने का काम कर रहा है। अतः स्वागत योग्य है। स्वागत हो भी रहा है। लेकिन विमर्श-साहित्य के अन्य प्रकारों की तरह इस साहित्य की भी एक बड़ी सीमा इसका सनसनीखेज हो जाना है जिसके कारण काफी हद तक ये रचनाएँ एक खास तरह के फार्मूले में बंधती दिखाई देने लगी हैं जिससे इनकी प्रामाणिकता संदिग्ध हो सकती है। किन्नर विमर्श को इस प्रकार रीतिबद्ध होने से बचना होगा,अन्यथा उसकी संभावनाएँ धूमिल हो जाएँगी। 

“किन्नर विमर्श : समाज और साहित्य”शीर्षक इस ग्रंथ में किन्नर विमर्श के तमाम पहलुओं समेटने का बहुत सफल प्रयास किया गया है। संपादक मिलन बिश्नोई स्वयं अत्यंत संभावनापूर्ण युवा कवयित्री हैं। उन्होंने एमफिल और पीएचडी के स्तर पर अपने शोध कार्य के लिए ‘किन्नर विमर्श’ को चुनकर हाशिए के इस समुदाय के प्रति अपनी संवेदनशीलता को क्रियात्मक रूप प्रदान किया है।इसमें संदेह नहीं कि यह ग्रंथ अपने शोध कार्य के प्रति मिलन बिश्नोई की गहन निष्ठा का परिणाम है। देश भर के विविध विश्वविद्यालयों/ महाविद्यालयों से जुड़े बहुत से शिक्षकों, शोधार्थियों और साहित्य-अध्येताओं ने इस ग्रंथ के लिए अपने आलेख उपलब्ध कराए; इस हेतु सभी सम्मिलित लेखकों सहित संपादक और प्रकाशक को पुनः पुनः साधुवाद और बधाई। मुझे पूरा विश्वास है कि सर्वथा नई ज़मीन तोड़ने वाले इस विचारोत्तेजक ग्रंथ का हिंदी जगत में यथोचित स्वागत और सम्मान होगा। 

शुभकामनाओं सहित 

 - ऋषभदेव शर्मा 

बुधवार, 10 अक्तूबर 2018

भक्तिकाल की काव्य प्रवृत्तियाँ : राम भक्ति काव्य परंपरा

भक्तिकाल में सगुणमार्गीय कवियों का एक वर्ग रामभक्ति काव्यधारा के रूप में माना जाता है। इसमें सगुण भक्ति के आलंबन के रूप में विष्णु के अवतार राम की प्रतिष्ठा है। यहाँ ‘राम’ का अर्थ परब्रह्म या ऐसी परम शक्ति है जिसमें सभी देवता रमण करें। बाद में यह ‘दशरथपुत्र राम’ का वाचक बन गया। राम उत्तरवैदिक काल के दिव्य महापुरुष माने जाते हैं। राम कथा विषयक गाथाएँ कब से रची जाती रही हैं, यह कहना कठिन है। फिर भी पश्चिमी विद्वानों का अनुमान है कि वाल्मीकि ने आदिकाव्य ‘रामायण’ की रचना ग्यारहवीं शती ईसा पूर्व से तीसरी शती ईसा पूर्व के बीच कभी की होगी, जिसमें मौखिक रूप में प्रचलन के कारण बहुत सा परिवर्तन और परिवर्धन हुआ। वाल्मीकि ने रामकथा को ऐसा मार्मिक रूप प्रदान किया कि वह जनता और कवियों दोनों में समान रूप से आकर्षक और लोकप्रिय बन गई। विविध देशी-विदेशी भाषाओं में रामकाव्य की लंबी परंपरा है। ईस्वी सन के प्रारंभ से राम को विष्णु के अवतार के रूप में स्वीकृति मिलनी शुरू हुई, परंतु भक्ति के क्षेत्र में राम की प्रतिष्ठा विशेष रूप से ग्यारहवीं शताब्दी ईस्वी के आसपास मानी जाती है। तमिल आलवारों की भक्ति रचनाओं में राम का निरंतर उल्लेख प्राप्त होता है। नौवीं शताब्दी के कुलशेखर आलवार के पदों में प्रौढ़ रामभक्ति अंकित है। ग्यारहवीं शताब्दी से लेकर रामभक्ति संबंधी काव्य रचनाओं की संख्या बढ्ने लगी। पंद्रहवीं शताब्दी से लेकर राष्ट्रीय, सामाजिक और राजनैतिक परिस्थितियों में राम का लोकरक्षक रूप इतना अधिक प्रासंगिक सिद्ध हुआ कि तब से समस्त राम काव्य भक्तिभाव से ओतप्रोत होने लगा। यहाँ तक कि रामकथा की लोकप्रियता के कारण निर्गुण संत कवियों को भी ‘राम-नाम’ का सहारा लेना पड़ा। फादर कामिल बुल्के का मत है कि “हिंदी साहित्य के आदिकाल में रामानंद ने उत्तर भारत में जनसाधारण की भाषा में रामभक्ति का प्रचार किया था। इसके फलस्वरूप हिंदी राम साहित्य, आधुनिक काल को छोडकर प्रायः भक्ति भावना से ओतप्रोत है। इस साहित्य की चार प्रमुखताएँ प्रतीत होती हैं – (1) तुलसीदास का एकाधिपत्य, (2) लोकसंग्रही दास्य भक्ति का प्राधान्य, (3) कृष्ण काव्य का प्रभाव और (4) विविध रचना शैलियों, छंदों और साहित्यिक भाषाओं का प्रयोग। 

तुलसीदास से पहले रामकाव्य के अंतर्गत रामानंद के कुछ पदों के अतिरिक्त ‘पृथ्वीराज रासो’ के रामकथा विषयक 48 छंदों, ‘सूरसागर’ के रामकथा संबंधी 150 पदों और ईश्वरदास रचित ‘रामजन्म’, ‘अंगद पैज’ तथा ‘भरत मिलाप’ का उल्लेख करना आवश्यक है। तुलसी के समकालीन कवियों में अग्रदास (पदावली, ध्यान मंजरी) और नाभादास (रामचरित के पद) का महत्वपूर्ण स्थान है। इसी प्रकार मुनिलाल (रामप्रकाश), केशवदास (रामचंद्रिका), सोठी महरबान (आदि रामायण), प्राणचंद, हृदयराम (हनुमन्नाटक), रामानंद (लक्ष्मणायन) और माधवदास (रामरासो) भी तुलसी के समकालीन अन्य राम साहित्य के उन्नायक है। तुलसी के बाद प्राणचंद चौहान (रामायण महानाटक), लालदास (अवध विलास), सेनापति (कवित्त रत्नाकर) और नरहरिदास (अवतार चरित) का इस परंपरा में उल्लेख किया जा सकता है। 

गोस्वामी तुलसीदास (1532-1623) सही अर्थों में मध्यकाल में भारतवर्ष के ‘लोकनायक’ हैं। इनके द्वारा रचित अनेक ग्रंथ उपलब्ध हैं, जिनमें रामचरित मानस, कवितावली, विनयपत्रिका, दोहावली आदि सम्मिलित हैं। इनका ‘रामचरितमानस’ साहित्य, भक्ति और लोकसंग्रह की अनुपम कृति है। इसकी रचना को उत्तर भारत के सांस्कृतिक और धार्मिक इतिहास में मध्यकाल की सर्वाधिक महत्वपूर्ण घटना माना गया है। 

‘रामचरित मानस’ में शास्त्रीयता को लोकग्राही बनाने की प्रक्रिया द्रष्टव्य है। तुलसी ने ‘स्वांतः सुखाय’ काव्य रचना करते हुए ‘सब कहँ हित’ को भी साधा। वे राजनैतिक-सामाजिक संदर्भों में विदेशी आक्रमण और सांस्कृतिक संक्रमण के दौर में मर्यादा पुरुषोत्तम राम के रूप में एक सक्रिय प्रतिरोध की रचना करते हैं और उसे लोकरक्षण से जोड़ते हैं। साथ ही एक साधक के रूप में अपने अहं के विस्फोट से बचने के लिए राम के भरोसे अपने आत्मसंघर्ष से पार पाते हैं। उनका काव्य ‘विरुद्धों का सामंजस्य” का सर्वोत्तम उदाहरण है। समन्वय भावना के कारण ही उन्हें ‘लोकनायकत्व’ प्राप्त हैं। वे भारतीय लोक के कवि हैं तथा गृहस्थ-जीवन और आत्म-निवेदन जैसे दो अनुभव-क्षेत्रों के सिरमौर हैं, इसलिए भारतीय मानस के सर्वाधिक निकट हैं। सामाजिकता और वैयक्तिकता का अद्भुत संतुलन उनके काव्य के लोकपक्ष और साधनापक्ष को पुष्ट करता है। इस संदर्भ में कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं – 
राम की सर्वव्यापकता : 

निगम अगम, साहब सुगम, राम साचिली चाह। 
अंबु असन अवलोकियत सुलभ सबहिं जग माँह।। 

समन्वय भावना : 

"भारत का लोकनायक वही हो सकता है जो समन्वय करने का अपार धैर्य लेकर आया हो। भारतीय जनता में नाना प्रकार की परस्पर विरोधिनी संस्कृतियाँ, साधनाएँ, जातियाँ, आचार-विचार और पद्धतियाँ प्रचलित हैं। तुलसीदास स्वयं नाना प्रकार के सामाजिक स्तरों में रह चुके थे। उनका सारा काव्य समन्वय की विराट चेष्टा है। उसमें केवल लोक और शास्त्र का ही समन्वय नहीं है – गार्हस्थ और वैराग्य का, भक्ति और ज्ञान का, भाषा और संस्कृति का, निर्गुण और सगुण का, पुराण और काव्य का, भावावेश और अनासक्त चिंतन का समन्वय ‘रामचरितमानस’ के आदि से अंत तक दो छोरों तक जाने वाली पराकोटियों को मिलाने का प्रयत्न है।" (डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी)। 

सामाजिकता : 

सब नर करहिं परस्पर प्रीती। 
चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीति।। 

राजनैतिक चेतना : 

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी। 
तो नृप अवसि नरक अधिकारी।। 

काव्य भाषा की मौलिकता : 

"उनकी भाषा में भी एक समन्वय की चेष्टा है। तुलसीदास की भाषा जितनी ही लौकिक है, उतनी ही शास्त्रीय। तुलसीदास के पहले किसी ने इतनी परिमार्जित भाषा का उपयोग नहीं किया था। काव्योपयोगी भाषा लिखने में तुलसीदास कमाल करते हैं। उनकी ‘विनय पत्रिका’ में भाषा का जैसा जोरदार प्रवाह है वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। जहाँ भाषा साधारण और लौकिक होती है वहाँ तुलसीदास की उक्तियाँ तीर की तरह चुभ जाती है और जहाँ शास्त्रीय और गंभीर होती हैं वहाँ पाठक का मन चील की तरह मंडरा कर प्रतिपाद्य सिद्धांत को ग्रहण कर उड़ जाता है।" (डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी)। 

संत कवियों की साखियों और पदों, जायसी के ‘पद्मावत’, सूरदास के सरस पदों के संग्रह ‘सूरसागर’ और गोस्वामी तुलसीदास की अन्यतम कृति ‘रामचरितमानस’ हिंदी साहित्य को भक्ति काल की महान देन हैं। इस काव्य ने ज्ञान और भक्ति के संदेश द्वारा मध्यकाल में सामाजिक मनोबल का निर्माण करके भारतीय अस्मिता को नवीन परिभाषा से महिमा मंडित किया। मनुष्य और मनुष्य की समानता, ईश्वर की सर्वापरिता, पाखंड के खंडन, आध्यात्मिक प्रेम में संपूर्ण समर्पण भाव, मानवतावाद, पारिवारिक और सामाजिक आदर्शों की स्थापना, लोक मर्यादा की स्थापना, मनुष्य की रागात्मक वृत्ति के परिष्कार और विभिन्न काव्यविधाओं और काव्यभाषा के निरंतर विकास की दृष्टि से भक्ति काल की उपलब्धियाँ अनेकविध और बहुआयामी हैं। इसे उचित ही ‘हिंदी साहित्य का स्वर्ण युग’ माना गया है।

भक्तिकाल की काव्य प्रवृत्तियाँ : कृष्ण भक्ति काव्य परंपरा

सगुणमार्गीय भक्तिकाव्य में कृष्ण को आराध्य मानने वाले कवियों ने कृष्ण भक्ति काव्य परंपरा का विकास किया। भारतीय संस्कृति में कृष्ण का व्यक्तित्व अत्यंत विलक्षण माना जाता है। ऋग्वेद, उपनिषद, महाभारत तथा हरिवंश, विष्णु, भागवत, ब्रह्मवैवर्त आदि पुराणों में उपलब्धता के साथ-साथ यह विश्वास किया जाता है कि कृष्ण की कथा मौखिक रूप में लोक प्रचलित रही है, जिसमें समय-समय पर अनेक काल्पनिक प्रसंग और रूपक जुड़ते चले गए। एक ओर कृष्ण योगी और परमपुरुष हैं तो दूसरी ओर ललित और मधुर गोपाल हैं तथा तीसरी ओर वे एक वीर राजनयिक हैं। उनके ये तीनों रूप उसे परमदैवत रूप के अधीन विकसित हुए हैं जो प्राचीन समय से वासुदेव के रूप में लोकप्रिय था। इसकी चरम परिणति अंततः साक्षात परब्रह्म में हुई। लोक साहित्य में कृष्ण के विषय में असंख्य आख्यान उपलब्ध होते हैं जिनसे प्रेरित होकर 12वीं शताब्दी में जयदेव ने संस्कृत में ‘गीत गोविंद’ की रचना की जिसे राधा-कृष्ण संबंधी प्रथम काव्य रचना माना जाता है। इसे ‘भक्ति और शृंगार का अनुपम माधुर्य मंडित गीतिकाव्य’ कहा गया है। 

इस परंपरा में हिंदी में सबसे पहली साहित्यिक अभिव्यक्ति चौदहवीं-पंद्रहवीं शताब्दी में विद्यापति की ‘पदावली’ के रूप में हुई। विद्यापति की ‘पदावली’ को हिंदी कृष्ण काव्य की पहली रचना होने का गौरव प्राप्त है, जिसमें राधाकृष्ण के प्रेम का वर्णन लौकिक शृंगार के स्तर पर लोक परंपरा के अनुसार भी किया गया है; और साथ ही भक्ति के माधुर्य भाव से संपन्न ‘उज्ज्वल शृंगार’ का भी निरूपण किया गया है। यही कारण है कि विद्यापति की ‘पदावली’ रसिकों और भक्तों दोनों ही में समान लोकप्रिय रही है। यहाँ तक कि चैतन्य महाप्रभु तक को उसने अपने अपरूप सौंदर्य वर्णन और प्रेम प्रवणता से रसमग्न किया है। वास्तव में भक्ति और शृंगार की विभाजक रेखा कितनी सूक्ष्म हो सकती है, इसे विद्यापति के काव्य में ही देखा जा सकता है। 

महाप्रभु वल्लभाचार्य द्वारा प्रवर्तित पुष्टिमार्ग में सूरदास सहित आठ कृष्ण भक्त कवियों का महत्वपूर्ण स्थान है जिन्हें ‘अष्टछाप’ के नाम से जाना जाता है। ये हैं सूरदास, कुंभनदास, परमानंद दास, कृष्णदास, नंददास, गोविंद स्वामी, छीतस्वामी और चतुर्भुजदास। इसी प्रकार निंबार्क संप्रदाय में श्रीभट्ट और परशुराम देव हुए। राधावल्लभ संप्रदाय में हित हरिवंश, दामोदर दास, हरिराम व्यास, चतुर्भुज दास, ध्रुवदास और नेही नागरी दास के नाम उल्लेखनीय हैं। हरिदासी (सखी) संप्रदाय में स्वामी हरिदास, गोस्वामी और विहारीदास जैसे कवि हुए जबकि चैतन्य (गौड़ीय) संप्रदाय में रामराय, सूरदास मदन मोहन, गदाधर भट्ट, चंद्रगोपाल, भगवान दास, माधवदास माधुरी और भगवत मुदित उल्लेखनीय हैं। 

कृष्ण भक्ति के इन विविध संप्रदायों से स्वतंत्र कृष्ण भक्ति कवियों के रूप में मीराबाई और रसखान प्रमुख हैं। इन समस्त कृष्ण भक्त कवियों में सूरदास का स्थान निःसंदेह सर्वोपरि है। उन्होंने श्रीमद् भागवत को आधार बनाकर पुष्टि मार्ग को मान्यताओं के अनुरूप कृष्ण के गोकुल, वृंदावन और मथुरा के जीवन से संबंधित संपूर्ण कथा को ‘सूरसागर’ नामक गीति प्रबंध के रूप में प्रस्तुत किया तथा ब्रजभाषा को चित्रात्मकता, आलंकारिकता, भावात्मकता, सजीवता, प्रतीकात्मकता और बिंबात्मकता से युक्त करके जनभाषा से आगे अपने युग की काव्यभाषा के राजसिंहासन पर प्रतिष्ठित किया। 

सूरदास का काव्यक्षेत्र गृहस्थ जीवन और परिवार तक सीमित है। उसमें बाह्य जीवन के संघर्ष की अपेक्षा गृहस्थ जीवन की तन्मयता और परिवार की सुरक्षा कामना इस प्रकार व्यक्त हुई है कि उनका कथावृत्त जीवन के प्रति राग जगाता है। संपूर्ण भागवत को आधार बनाने के बावजूद उनका कवि मन कृष्ण की बाल लीलाओं और किशोरावस्था के भावपूर्ण चित्रण में अधिक रमा है। उनका भाव चित्रण कृष्ण भक्ति काव्य की एक बड़ी उपलब्धि है। बालभाव और वात्सल्य से सने मातृहृदय के प्रेमपूर्ण भावों के चित्रण में प्रज्ञाचक्षु सूरदास अद्वितीय हैं। इसी प्रकार शृंगार और भक्ति को जोड़कर माधुर्य भक्ति के संयोग और वियोग पक्षों का जैसा मार्मिक वर्णन सूर ने किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। प्रवास जनित वियोग के संदर्भ में भ्रमरगीत प्रसंग में दार्शनिकता और आध्यात्मिकता का भावात्मकता के साथ संयोग शास्त्रीय विषय को अभिव्यक्तिपरक संस्कृति में सफलतापूर्वक ढालने की प्रक्रिया का सुंदर उदाहरण है। सूरदास ने कृष्ण की लीलाओं के प्रसंग में प्रकृति सौंदर्य, जीवन के विविध पक्षों, बाल क्रीड़ाओं, गोचारण, रासलीला, उपालंभ, दानलीला, चीरहरणलीला आदि का वर्णन प्रचुर मात्रा में किया है क्योंकि परब्रह्म श्रीकृष्ण की इन लीलाओं का निरंतर वर्णन और कीर्तन ही उनके सान्निध्य को प्राप्त करने का मार्ग है। परंतु यह सब वर्णन करते हुए वे उपदेशक या सुधारक की मुद्रा धारण नहीं करते बल्कि सरल हृदय का भावपूर्ण उद्घाटन करते हैं। उनकी भक्ति में दास्य, सख्य और मधुर भाव की त्रिवेणी का प्रवाह है। उनके विभिन्न भावों और मनोदशाओं के कुछ उदाहरण द्रष्टव्य हैं – 

(1) वात्सल्य (संयोग) : मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो....... ।

(2) वात्सल्य (वियोग) : संदेसों देवकी सों कहियो......... । 

(3) प्रथम दर्शन : बूझत श्याम कौन तू गोरी....... । 

(4) तन्मयता : उर में माखन चोर गड़े....... । ऊधो, मन न भए दस बीस...... । 

(5) व्यग्रता : अँखियाँ हरि दर्शन की भूखी..... 

(6) विदग्धता : निर्गुण कौन देस को वासी..... । 

(7) नित्यविहार : बिहँसि कह्यौ हम तुम नहिं अंतर, यह कहिकैउन ब्रज पठई।/ 

सूरदास प्रभु राधा-माधव, ब्रज-विहार नित नई-नई॥

(8) अनुग्रह : जा पर दीनानाथ ढरैं....... ।

सूरदास की भक्ति पद्धति का मेरुदंड पुष्टिमार्गीय दर्शन है जिसमें भगवद्कृपा या अनुग्रह को पुष्टि (पोषण) माना गया है। इस अनुग्रह को प्राप्ति करने के लिए भक्त स्वयं को परब्रह्म कृष्ण की शरण में समर्पित कर देता है। वात्सल्य, दांपत्य और सख्य भाव के अनुरूप पुष्टि के तीन रूप हैं – मर्यादा, प्रवाह और पुष्टि। ब्रजांगनाएँ, गोपियाँ और गोपकुमारियाँ क्रमशः इन तीनों का आश्रय है। सूरकाव्य में पुष्टि के तीनों ही रूप उपलब्ध होते हैं। श्रीकृष्ण के प्रति भक्त का गोपीभाव से आत्मीयतापूर्ण संबंध पुष्टिमार्ग का आधार है। विभिन्न लीलाओं के वर्णन से भक्त को श्रीकृष्ण की कृपा या अनुग्रह की अनुभूति होती है और इसीलिए कवि ने माधुर्य भाव को स्पष्ट करने वाले मनोरम प्रसंगों का पुनः पुनः रसपूर्ण वर्णन किया है। इस वर्णन का आलंबन श्रीकृष्ण हैं जो साक्षात परब्रह्म, अद्वैत और परमेश्वर हैं तथा भक्त के उदात्तीकृत लौकिक जीवन का अभिन्न अंग है। डॉ. ब्रजेश्वर वर्मा के अनुसार, "भक्त कवियों के हाथ में कृष्ण काव्य उन मानवीय भावों के सहज परिष्करण और उदात्तीकरण का व्यावहारिक और प्रत्यक्ष द्रष्टांत बनकर प्रयुक्त हुआ था, जो मनुष्य को संसार के विषयों में लिप्त किए रहते हैं तथा पतन की ओर ले जाते हैं। परिवार के जो नाते मनुष्य के आध्यात्मिक विकास में उसके सबसे बड़े वैरी है, श्रीकृष्ण उन्हीं के रूप में भक्तों को प्राप्त होकर उनके तत्संबंधी रागद्वेष को अपने में समर्पित करा लेते हैं। गीता में श्रीकृष्ण ने जिस निःसंगता का उपदेश दिया था, उसी को भक्त कवियों ने चित्रित किया है, तथा उन्होंने आत्म समर्पण युक्त भक्ति योग का जो रूप अर्जुन को समझाया था, वही काव्य में उदाहृत किया गया है।"