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शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

'लिए लुकाठी हाथ' के लेखक प्रवीण प्रणव का वक्तव्य

 

ऋषभदेव शर्मा  के साहित्य पर एकाग्र अपनी आलोचना पुस्तक 'लिए लुकाठी हाथ' (2024: हैदराबाद; बिभूति प्रकाशन) पर लेखक प्रवीण प्रणव का

           लेखकीय ...

एक साहित्यिक परिवेश से आने की वजह से साहित्य में रुचि होना स्वाभाविक है लेकिन यह रुचि बस शौकिया ही रही। 2007 में मैं नौकरी के सिलसिले में हैदराबाद आया। तब तक मेरी कविताओं में रुचि थी, यदा-कदा कुछ लिख भी लेता था लेकिन इससे ज्यादा मेरी निकटता साहित्य से नहीं रही। 2014-15 के आस-पास मेरी सक्रियता हैदराबाद में साहित्यिक जगत में हुई और जल्द ही मेरा परिचय प्रो. ऋषभदेव शर्मा से हुआ।


कम ही लोग ऐसे होते हैं जिनके साथ बात करते हुए आप हर बार कुछ नया सोचने पर विवश होते हैं, हर बार आप कुछ नया सीखते हैं, हर बार आप कुछ नया करने की प्रेरणा पाते हैं और प्रो. ऋषभदेव शर्मा ऐसे ही व्यक्ति हैं। आरंभ में मेरी पहचान उनसे सिर्फ साहित्यिक कार्यक्रमों से हुई जहाँ उनके वक्तव्यों को सुनते हुए और उनकी कविताओं को सुनते हुए मैं उनसे प्रभावित होता रहा। तब तक यह ज्ञात भी नहीं था कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा विपुल साहित्य के रचयिता भी हैं। धीरे-धीरे मेरा परिचय उनके साहित्य से हुआ और फिर मैं उनके साहित्य से इस कदर प्रभावित हुआ कि आज शायद ही उनके द्वारा लिखा हुआ कुछ प्रकाशित/अप्रकाशित हो, जिसे मैंने न पढ़ा हो। उनकी कुछ किताबों की मैंने समीक्षा लिखी, उनके साहित्य पर आधारित कुछ साहित्यिक लेख लिखे, कुछ साहित्यिक कार्यक्रमों में प्रो. ऋषभदेव शर्मा के साहित्य पर वक्तव्य दिया।  विगत दस वर्षों में इस तरह प्रो. ऋषभदेव शर्मा के साहित्य पर मेरी समीक्षात्मक टिप्पणियों की एक लंबी फेहरिस्त बन गई। मैंने कई बार सोचा कि इन आलेखों को एक जगह एकत्रित कर पुस्तकाकार कर दिया जाय ताकि प्रो. ऋषभदेव शर्मा के साहित्य को समझने वालों के लिए यह एक उपयोगी किताब साबित हो सके। जो प्रो. ऋषभदेव शर्मा से या उनके साहित्य से परिचित नहीं हैं उनके लिए भी इन आलेखों को पढ़ना रुचिकर होगा। इसी सोच की परिणति के रूप में यह किताब ‘लिए लुकाठी हाथ’ आपके सामने है। 



प्रो. #ऋषभदेवशर्मा का रचनाकर्म जनवादी है। बिना ‘वामपंथ’ या ‘प्रगतिशील’ होने का ठप्पा लगाए, उनकी रचनाएँ सत्ता के विरुद्ध एवं जनता के हक़ में आवाज़ उठाती रही हैं। शोषक वर्ग के विरुद्ध और शोषितों के साथ खड़े होना उनकी कविताओं की मूल भावना है। #तेवरी आंदोलन के प्रवर्तकों में से एक प्रो. ऋषभदेव शर्मा की रचनाएँ किसी ‘वाद’ का समर्थन नहीं करतीं बल्कि उनके लिए ‘वाद’ का अर्थ ही वंचित वर्ग है। ऐसे में स्वाभाविक है कि उनकी रचनाओं पर दृष्टिपात करते हुए, इन बिंदुओं की चर्चा हो। अपनी समीक्षाओं में मैंने कोशिश की है कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की रचनाओं का मूल्यांकन करते हुए इनकी तुलना समकालीन और कालजयी साहित्य के साथ भी की जाए ताकि पाठकों के लिए न सिर्फ अधिक जानकारी मिले बल्कि इस तुलनात्मक अध्ययन से प्रो. ऋषभदेव शर्मा के साहित्य को वृहत अर्थों में समझा जा सके। 


जिनके साहित्य पर इस संग्रह के सभी लेख आधारित हैं, उन प्रो. ऋषभदेव शर्मा को धन्यवाद कहना उनकी शख्सियत को छोटा करने जैसा है। सच यह है कि मैं और मेरे जैसे कई नवांकुरों ने साहित्य की समझ प्रो. ऋषभदेव शर्मा से ही पाई है। उन्होंने अपना अमूल्य समय और सुझाव देकर, कई साहित्यकारों को इस योग्य बनाया है कि आज वे हिंदी साहित्य का जाना-पहचाना चेहरा बन सके हैं। उनके मार्गदर्शन के बिना इस किताब की कल्पना नहीं की जा सकती थी। 


विगत कई वर्षों से आदरणीय प्रो. गोपाल शर्मा (Gopal Sharma)   और आदरणीय अवधेश कुमार सिन्हा (Awadhesh Sinha)  से लगातार साहित्यिक विचार-विमर्श होता रहा है और यह मेरी खुशकिस्मती है कि इस किताब के लिए इन दोनों ने ही अपना आशीर्वचन दिया है। आदरणीया प्रो.निर्मला मौर्य जी (Nirmala S Mourya)  के प्रति विशेष रूप से आभारी हूँ कि उन्होंने इस पुस्तक को अपने आशीर्वचन से सुशोभित किया है। प्रो. देवराज (Dev Raj) जिनकी विद्वता का मैं कायल रहा हूँ और उससे भी ज्यादा उनकी सौम्यता और सरलता का। प्रो. ऋषभदेव शर्मा के तो वे गुरु भी रहे हैं। ऐसे में उनकी तरफ से इस पुस्तक के लिए लिखे गए शब्द हमारे लिए साहित्य के उत्कृष्ट सम्मान से कम नहीं हैं। मैं इन सभी महानुभावों के प्रति एक बार पुनः धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। पुस्तक के प्रकाशन के लिए बिभूति प्रकाशन और मुद्रण के लिए हरिओम प्रिंटर्स का भी विशेष धन्यवाद और आभार।


इस किताब पर आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।   


              -प्रवीण प्रणव            @Praveen Pranav 

praveen.pranav@gmail.com

फ़ोन :  9908855506

                    हैदराबाद 

                   4 जुलाई, 2024.




गुरुवार, 18 जुलाई 2024

शुभाशंसा_प्रो. निर्मला एस. मौर्य_'लिए लुकाठी हाथ' के लिए

 


 शुभाशंसा .....

जीने-भोगने के यथार्थ पलों का कच्चा चिट्ठा

  • निर्मला एस. मौर्य

… जो मंद-मंद मुस्कुराते हुए चुप रहते हैं और अचानक हँस कर कह देते हैं- ’प्रेम बना रहे!’... उनका यह कथन बरबस ही सामने वाले का मन अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। कुछ न कह कर अपने व्यवहार से बहुत कुछ कह जाने वाला एक अनोखा व्यक्तित्व… जिसका नाम है डॉ. ऋषभदेव शर्मा… पारिवारिक मित्र, सहकर्मी, बड़े भाई सा स्नेह रखने वाले, अग्रज… ऐसे कई संबोधन हैं जो उनके ऊपर जँचते हैं!...


जब जब मन में आक्रोश अपने पाँव पसारता है, तब-तब ‘लेखनी से शब्द उतरते हैं पन्नों पर चुपचाप’ और पाठकों के हृदय को आंदोलित तथा आलोड़ित कर देते हैं।… डॉ. ऋषभदेव शर्मा का साहित्य संसार बहुआयामी है और इनकी रचनाओं में कहीं अकेलापन है, कहीं आदमी और धूप की कथाएँ हैं, कहीं बूँदे बरसती हैं तो कहीं अधूरे सपनों को पूरा करने का ख़्वाब है। वह कई अनुभवों से गुजरते हैं; ऐसा लगता है मानो उनका रचना संसार स्वयं गुपचुप बतियाता है। कहीं वह मन से आह्लादित होते हैं तो कहीं रिक्त मन की व्यथाएँ और वेदनाएँ पंक्तियों में उतर आती हैं। उनका साहित्य मानव के अस्तित्व का साहित्य है। अब आसपास का संसार बड़ी तेजी से बदल रहा है। इन बदलती हुई परिस्थितियों को आपकी रचनाओं में देखा जा सकता है क्योंकि, इन घटती हुई घटनाओं ने रचनाकार के मन को लगातार प्रभावित किया है और इन्हीं में से रचनाकार ने अपनी कृतियों के लिए पंक्तियाँ ढूँढ़ ली हैं तथा शब्दों के सहारे अपनी अभिव्यक्तियाँ दे दी हैं।  उनकी इन्हीं अभिव्यक्तियों को ‘लिए लुकाठी हाथ’ समीक्षा कृति में बहुत शिद्दत से महसूस किया जा सकता है। इस समीक्षा कृति के समीक्षक प्रवीण प्रणव कहते हैं- ‘शोषक वर्ग के विरुद्ध और शोषितों के साथ खड़े होना उनकी कविताओं की मूल भावना है। उनकी रचनाएँ किसी वाद का समर्थन नहीं करतीं बल्कि उनके लिए वाद का अर्थ ही वंचित वर्ग में है।’ वह लिखते हैं कि- ‘ऋषभ जी की रचनाओं का मूल्यांकन करते हुए उनकी तुलना समकालीन और कालजयी साहित्य के साथ की जानी चाहिए।’ 


मैं यहाँ एक बात स्पष्ट कर दूँ कि किसी भी कृतिकार या रचनाकार की रचनाओं का मूल्यांकन अन्य कोई कर ही नहीं सकता, उस पर दृष्टिपात  करते हुए विचार अवश्य किया जा सकता है; मूल्यांकन तो रचनाकार स्वयं अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व से करता है तथा लगातार अपने कृतित्व में सुधार करते हुए आगे बढ़ता चला जाता है। रचनाकार का अपना संसार और अपनी दुनिया होती है। मानव जीवन सम और विषम रेखाओं के बीच पलता है तथा  रचनाकार इन्हीं रेखाओं की अभिव्यक्ति, शब्दों को संवेदनाओं के धागों में पिरोकर करता है। 



प्रवीण प्रणव द्वारा लिखित यह समीक्षा कृति अपने आप में अनूठी है। इसमें कुल 9 आलेख शामिल हैं। ‘दीवानों की बस्ती में उम्मीदों का रोशनदान’ में ऋषभ जी के साहित्यिक व्यक्तित्व और उनके अवदान की चर्चा है। प्रणव जी कहते हैं- ‘साहित्य समाज दर्पण होता है लेकिन साहित्य साहित्यकार का भी दर्पण होता है।’ इस आलेख में ऋषभ जी के कवि कर्म की विस्तार से चर्चा की गई है और इसके साथ ही ‘देहरी’ जैसी कृति में किस प्रकार स्त्री पक्ष की चर्चा ऋषभ जी ने की है इसका बड़ा ही सूक्ष्म अवलोकन दिखाई देता है। समीक्षक कहते हैं- ‘प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा की कविताओं की नायिका किसी भी जुल्म को खामोशी से सह जाने की परंपरा के खिलाफ आवाज़ उठाती है।’ ‘प्रेम बना रहे’, ताकि सनद रहे, धूप ने कविता लिखी है,कविता के पक्ष में, कथाकारों की दुनिया, हिंदी कविता : अतीत से वर्तमान, कविता का समकाल, हिंदी भाषा के बढ़ते कदम, जैसी अनेकानेक रचनाओं पर विचारोत्तेजक समीक्षा देखने को मिलती है।  समय-समय पर लिखे जाने वाले संपादकीयों  की चर्चाओं को ‘संपादकीयम - भविष्य का आईना, वर्तमान की नज़र’ में समेटा गया है। एक अच्छा व्यंग्य भी है ‘तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है’। यह रचना सियासत का कच्चा चिट्ठा खोलती है। ‘हम हैं बिलोकना चाहते जिस तरु को फूला- फला’ जैसे लंबे लेख में भाषिक संस्कृति के प्रति चिंता की दृष्टि दिखाई देती है। ‘कबहूँ न जाइ ख़ुमार’ बहुत ही सुंदर प्रस्तुति है। ये सभी शीर्षक अपने आप में एक-एक पुस्तक के समान हैं और कभी मौका मिला तो इस समीक्षा पुस्तक पर अलग से अपने विचार अवश्य विस्तार से व्यक्त करूँगी। 


इसी प्रकार ‘अपने शिल्प की सीमा से बाहर जाकर लिखने की कला’ में डॉक्टर ऋषभ जी के लेखन सौंदर्य और लेखन प्रक्रिया की चर्चा है। ‘आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे’ में जीवन के भिन्न-भिन्न रंग दिखाई देते हैं। कोरोना काल की विभीषिकाओं के कई रंग इस आलेख को विचारोत्तेजक बनाते हैं। कोरोना महामारी के समय पूरा विश्व मृत्यु की काली छायाओं में लिपटा हुआ था, शहरों में सन्नाटा था। इस समीक्षा को पढ़ना उस लंबी काली रात के अँधेरों की याद दिलाता है।


इस तरह, लेखक प्रवीण प्रणव का यह समीक्षा ग्रंथ अपने हर शीर्षक में अनुभूतियों का ज़खीरा समेटे हुए है। समग्रतः, यह ग्रंथ पाठक के मन को बाँध लेने में समर्थ है, क्योंकि पाठक अपने मन  के सभी भावों और रंगों को  इन शीर्षकों में पाता है और स्वयं को इनसे जोड़ पाता है। चारों तरफ नज़र दौड़ाएँ तो यह  देखने में आता है कि अब समय जितनी तेज़ी से बदल रहा है, उतनी ही तेज़ी से मानव का अस्तित्व भी बदल रहा है। आज का साहित्य अपनी परिधि से बाहर निकल कर विश्व के विशाल प्रांगण में आ खड़ा हुआ है। रचनाकार बदलती हुई घटनाओं से तेज़ी से प्रभावित होता है और इन्हीं घटनाओं को अपनी कृतियों में जगह देता है। इन जीती- जागती कृतियों को समीक्षक ने जीने-भोगने के यथार्थ पलों का कच्चा चिट्ठा बनाकर प्रस्तुत कर दिया है। हर व्यक्ति जिस लक्ष्य को लेकर चलता है; उसका वह लक्ष्य पूरा हो, वह नव-सृजन कर पाए, यही मेरी कामना है। मनुष्य और मनुष्य के बीच संवाद अत्यंत आवश्यक होता हैं, तभी एक मजबूत रिश्ता बनता है।  यदि संवाद सार्थक न हो तो बरसों से बंद  हृदय के कपाट भी नहीं खुल पाते। प्रवीण प्रणव की समीक्षात्मक कृति ’लिए लुकाठी हाथ’ एक व्यक्तित्व  ही नहीं बल्कि एक अस्तित्व के मन के सफ़र की दास्तां है। साहित्य जगत में यह समीक्षा कृति सदैव अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रहेगी। 

शुभमस्तु…

  • प्रो. निर्मला एस. मौर्य 

    पूर्व कुलपति 

वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, उत्तर प्रदेश  





मंगलवार, 16 जुलाई 2024

अभिमत_प्रो. गोपाल शर्मा_'लिए लुकाठी हाथ' पर


आत्मीय संस्मरणों से संचित, सुवासित और सुव्यवस्थित

                     - गोपाल शर्मा

यदि हम किसी साहित्यकार को जानते, पहचानते और सम्मानते हैं तो उन पर लिखना और उनकी रचनाओं पर स्वाधीन समीक्षात्मक लेखन की पेशकश करना कठिन हो जाता है।  कभी- कभी  इन्ही कारणों से आसान  भी हो जाता है।  इसलिए इस पुस्तक में संकलित   9  आलेखों  की पाठकोन्मुख समीक्षा करना कठिन और उनका क़िस्त-दर-क़िस्त पाठ करना आसान है।  

'लिए लुकाठी हाथ' के रचयिता (डॉ.) प्रवीण प्रणव उन जातकों में से हैं जो अंक 9 के प्रभाव से दूसरों की मदद करने वाले और अपनी ऊर्जा को परहित में लगाना पसंद करते हैं। आप भी अब जब इन 9 आलेखों का पाठ करने वाले हैं तो इस पुस्तक के शीर्षक के तीन बीज  शब्दों   का ध्यान रखें । लेखक प्रवीण प्रणव के 'लिए'  प्रो. ऋषभदेव शर्मा  की तेवरियाँ कबीर की 'लुकाठी' सी मार करती - मार्ग दिखाती हैं जो  अंतर 'हाथ' का सहारा देती है। इसलिए जब आलोचक प्रवर के रूप में कवि प्रवीण  इनका गूढ़ अध्ययन करके प्रसन्न होकर प्रसन्नवदन कवि ऋषभ को विलोकते हैं तो उनके रचना संसार में कभी भविष्य का  आईना  देखते हैं और कभी वर्तमान की नज़र।

इस रचना कर्म में इस बात को रेखांकित तो किया ही गया है कि कवि साहित्यकार  के रूप में  ऋषभ शिल्प की सीमा के पार जाकर अर्थ की खुमारी को उम्मीदों के रोशनदान से आलोकित करते हैं, यह भी बता दिया गया है कि कवि ऋषभ दीवानों की जिस बस्ती में रहते हैं  उसमें  नादान का प्रवेश कठिन है। यही इस संग्रह के सहेजक का मंतव्य दिखाई देता है जिसे वे इन पंक्तियों से क्या खूब समेटते हैं-  मुमकिन नहीं कि  शाम-ए-अलम की सहर न हो!  'खूबसूरत फूलों की खुशबू और बारूद की गंध से लबरेज़ होकर लिखी कविताओं से मानस मुकुल सुवासित होता है'-  क्या खूब पकड़े हैं!

अतः  इस संग्रह के पाठक इन आलेखों को उस कुंजी के समान लें, उस कर-ताली के मानिंद समझें जिससे भावों का अनुवाद कविता के अनुवाद से कई गुना बेहतर हो जाता है।  इस संग्रह में  उस तरफ भी दृष्टि दौड़ाई गई है जिस तरफ कवि की कविता का पुनर्जन्म होता है और  न ख़त्म होती कविता अंग्रेजी अनुवाद के माध्यम से पुनः  प्रकट हो जाती है।  यही नहीं, जब ‘गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति' सूक्ति को  सत्य चरितार्थ करते नित्य प्रति बरसों से संपादकीय लिखते उस गद्यकार  के चोखे गद्य से आलोचक प्रवीण   परिचय कराते हैं जिनके नाम में ही 'देव' है तो पाठक नए आलोक में  ऋषभदेव शर्मा के रचना कर्म को देखने-जाँचने-परखने का  सलीका और सुभीता सहज में ही पा जाता है।  

आत्मीय और आदरयुक्त संस्मरणों से संचित, सुवासित और सुव्यवस्थित इन आलेखों के पाठ से  पाठक को गंभीर  समीक्षाओं के साथ-साथ यत्र-तत्र इनके रचनाकार के लेखन अनुभवों से परिचय भी हो जाता  है। यह 'लुकाठी' भावी लेखकों के लिए दिग्दर्शक भी  होगी, इसमें संदेह नहीं। 

साहित्यिक अभिरुचि रखने वाले पाठकों   को पुस्तक की  अपनी  प्रति सुलभ हो, इसी अभिलाषा को पूरी होते देखना चाहता हूँ। इन आलेखों को पुस्तक के रूप में देखकर अपनी प्रसन्नता को व्यक्त करने का यह सुअवसर मैं क्यों  गँवाता? मेरी भी आभा इसमें है और रहे। इसके लिए  उन सब  हाथों को  धन्यवाद जिन्होंने इस पुस्तक के प्रकाशन को संभव बनाया।  

पुस्तकों की शताधिक भूमिकाएँ  लिखकर संवीक्षक, संरक्षक और  साहित्य-संपन्न हो गए  ऋषभदेव शर्मा के सम्मुख एक और  यथायोग्य  प्रस्तुति !   

- गोपाल शर्मा            

पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, 

भाषा विज्ञान विभाग, 

अरबा मींच विश्वविद्यालय, इथोपिया।

सोमवार, 15 जुलाई 2024

भूमिका_श्री अवधेश कुमार सिन्हा_'लिए लुकाठी हाथ' के लिए

 ::भूमिका::


लुकाठी की चिनगारियों से बनता दीप-स्तंभ

अवधेश कुमार सिन्हा

कोई ‘किसी’ के साथ बात करते हुए हर बार कुछ नया सोचने पर विवश हो जाए, हर बार कुछ नया सीखे, कुछ नया करने की प्रेरणा पाए, तो वह ‘किसी’ व्यक्ति निश्चित ही बहुमुखी और विलक्षण प्रतिभा का धनी होगा। और खासकर तब जब सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में दैनन्दिन इनोवेट, दूसरों को इनफ्लुएंस व कनविन्स करने वाला कॉर्पोरेट जगत का एक उच्चस्थ प्रबंधन विशेषज्ञ उस ‘किसी’ से मिलने के बाद स्वयं इनफ्लुएंस हो रहा हो, इनोवेट करने की प्रेरणा पा रहा हो तो वह ‘किसी’ व्यक्ति कई मामलों में वाकई असाधारण एवं अनुकरणीय होगा। इस पुस्तक ‘लिए लुकाठी हाथ’  में वह ‘किसी’ प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा हैं और कॉर्पोरेट जगत का वह प्रबंधन विशेषज्ञ प्रवीण प्रणव हैं यानि इस कृति के रचनाकार। 


जिस प्रवीण प्रणव के लिए सत्रह वर्षों पूर्व जॉब के लिए हैदराबाद आने के समय साहित्य में अभिरुचि शौकिया थी, लेकिन वही प्रवीण जब पिछले लगभग नौ वर्षों के अंतराल में एक मुकम्मल कवि, ग़ज़लकार, कहानीकार, समीक्षक, संपादक बन जाते हैं, राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक पत्रिका का संपादन करने लगते हैं, इस कृति को लेकर सात पुस्तकों के लेखक/संपादक बन जाते हैं, अनेकों साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित होते हुए भारत के सौ प्रमुख युवा साहित्यकारों की सूची में शामिल हो जाते हैं, हैदराबाद के युवा आईटी प्रोफेशनल्स के बीच कविता के प्रति अभिरुचि पैदा करने के लिए कई मंचों के द्वारा अलख जगाते हैं, साहित्य उनके लिए मानसिक शांति का पर्याय बन जाता है, तो इन परिवर्त्तनों के पीछे कहीं-न-कहीं सहृदय प्रेरणा के स्रोत गुरुवर ऋषभदेव शर्मा का प्रभाव होना स्वाभाविक लगता है।

उच्च शिक्षा और शोध संस्थान में हिंदी साहित्य के आचार्य रहे तथा वर्तमान में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य के परामर्शी के तौर पर कार्यरत कवि, भाषाविद, समीक्षक, पत्रकार, संपादक एवं मंत्रमुग्ध कर देने वाले प्रखर वक्ता तथा सम्मोहक व्यक्तित्व वाले प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा का साहित्यिक वर्णपट सतरंगी और उसका फलक विस्तृत है। सत्य की लुकाठी लेकर पाखंड में चिनगारियाँ लगाने वाले (सत्य की लेकर लुकाठी/ वह खड़ा बाजार में;/ पाखंड ने/ चिनगारियाँ महसूस कीं/ अपने परों में !)  तेवरी काव्यांदोलन के प्रवर्तकों में से एक प्रो. शर्मा एक ओर अपनी कविताओं में जहाँ आक्रोश में निरंकुश सत्ता के विरुद्ध जनमानस को आंदोलन के लिए उठ खड़े होने का आह्वान करते हैं, युग के स्वरों में आग बोते हैं- ‘बो रहा है आग वह/ युग के स्वरों में/ और हम दुबके हुए/ अपने घरों में’,  वहीं दूसरी ओर वह इतने कोमल हो जाते हैं कि फूल की पंखुड़ियों को नोचने से भी परहेज करते हैं- ‘उस दिन मैंने फूल को छुआ/ सहलाया और सूँघा/ हर दिन की तरह/ उसकी पंखुड़ियों को नहीं नोचा’। पुरानी ज़मीन की मिट्टी से काफी खुबसूरत एवं सार्थक मूर्तियाँ गढ़ने में सिद्धहस्त प्रो. शर्मा  अपनी कई कविताओं में पौराणिक आख्यानों  का उद्धरण लेकर आज की समस्याओं की जटिलताओं का बखूबी विश्लेषण करते हैं, बदलते परिवेश में उनकी स्वीकार्यता पर सवाल खड़े करते हैं- ‘मैं मेघदूत की यक्षिणी नहीं थी/ नहीं थी मैं नैषध की दमयंती/ मैं शकुंतला भी नहीं थी/ राधा बनना भी मुझे स्वीकार न था’। स्त्री-विमर्श पर उनकी कविताएँ उस स्त्री के साथ मज़बूती के साथ खड़ी दिखाई देती हैं ‘जिसका एक पैर/ ज्वालामुखी के मुँह पर है/ और दूसरा/ समुद्र की गहराई में छिपी/ सबसे निचली पहाड़ी पर’। ये कविताएँ न केवल स्त्रियों को उनके अधिकारों के प्रति जागृत कर उन्हें मुक्ति का मार्ग दिखाती हैं, वरन् पुरुषों को भी उनके दायित्वबोध का अहसास कराती हैं। एक दैनिक समाचार-पत्र के संपादकीय लेखक/ पत्रकार के रूप में भी उनके प्रतिदिन के साहित्यिक फ्लेवर से संपृक्त संपादकीय लेख समसामयिक होते हुए भी भविष्य की राह दिखाते हैं और सत्ता को सचेत करते हुए जन-साधारण के लिए दीप-स्तंभ का काम करते हैं। एक समीक्षक के तौर पर बिना किसी सख़्त टिप्पणी के कंसट्रक्टिव फीडबैक वाली उनकी समीक्षाएँ लेखकों को प्रोत्साहित करते हुए उन्हें आगे बढ़ने को प्रेरित करती  हैं। यही कारण है कि बहुसंख्यक नवोदित लेखकों के वे सबसे पसंदीदा समीक्षक, भूमिका-लेखक हैं। आज के लगातार बदल रहे आधुनिक परिवेश में जहाँ भारत की प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का क्षरण होता जा रहा है, वहीं प्रो. ऋषभदेव शर्मा उन विरले आचार्यों में से हैं जिनके वर्षों पुराने परा-स्नातक छात्र-छात्राएँ, एमफिल व पीएचडी के शोधार्थी आज भी अपने गुरु प्रो. शर्मा को वही सम्मान देते हैं, वही आदर-भाव रखते हैं जो वर्षों पूर्व उनकी कक्षा में पढ़ते हुए और उनके निर्देशन में शोध करते हुए देते थे । आज के समाज का यह एक अनुकरणीय उदाहरण है। 


प्रवीण प्रणव समय-समय पर प्रो. ऋषभदेव शर्मा के कविता-संग्रहों, आलोचना ग्रंथों एवं संपादकीय संकलनों पर समीक्षाएँ लिखते रहे हैं जो यत्र-तत्र पत्रिकाओं एवं पुस्तकों में प्रकाशित होती रही हैं। ‘लिए लुकाठी हाथ ’ उन्हीं समीक्षाओं और टिप्पणियों का एकत्रित संकलन है जिसमें प्रो. शर्मा के व्यक्तित्व व कृतित्व का समग्र आकलन नौ आलेखों में शामिल है। पुस्तकाकार रूप में यह संकलन निश्चित तौर पर प्रो. ऋषभदेव शर्मा जैसे विलक्षण एवं बहुआयामी प्रतिभा के साहित्यकार के व्यक्तित्व एवं उनकी रचनाओं को एक ही जगह समग्रता में समझने, उससे कुछ सीखने, प्रेरणा लेने के लिए न केवल हिंदी साहित्य के अध्येताओं के लिए वरन् इसमें अभिरुचि रखने वाले सामान्य पाठकों के लिए भी उपादेय है, संग्रहणीय है। मुझे विश्वास है कि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद अधिक से अधिक लोग प्रो. शर्मा के साहित्य के प्रति आकृष्ट होंगे और इनके साहित्य पर अधिक गहन विचार-विमर्श की प्रक्रिया आरंभ होगी ।


अवधेश कुमार सिन्हा

ग्रेटर नोएडा (पश्चिम), गौतमबुद्ध नगर

उत्तर प्रदेश

 

शनिवार, 13 जुलाई 2024

आशीर्वचन_प्रो. देवराज_'लिए लुकाठी हाथ' के लिए

 




::आशीर्वचन::

लुकाठी के गुणों का अंत नहीं...  


प्रिय प्रवीण जी, 

'लिए लुकाठी हाथ' की पाण्डुलिपि पढ़ने और फिर कुछ लिख भेजने के लिए इतना कम समय था कि गंभीरतापूर्वक लिखने लायक कुछ अधिक तत्व ढूँढना-खोजना मुश्किल हो गया। मैं जिस तरह का आलसी और कामचोर हूँ, उसके चलते यह काम और भी दुष्कर अनुभव हुआ। फिर भी आपने इतने परिश्रम पूर्वक प्रो. #ऋषभदेव_शर्मा के साहित्य की जो समालोचना की है, वह टुकड़े-टुकड़े ही सही, अपनी ओर खींचती रही। इसलिए जो कुछ और जितना कुछ पढ़ पाने पर जो भी अनुभव किया, चिट्ठी में लिखे दे रहा हूँ--


आपने अपनी विवेचना-बुद्धि का अधिकतम सदुपयोग करते हुए प्रो. ऋषभदेव शर्मा के काव्य (यद्यपि विवेचना के लिए कुछ ही काव्य-संकलन चुने हैं, लेकिन संदर्भानुसार बात उनके समग्र काव्य-संसार की कर दी है, अत: यह प्रो. ऋषभ के संपूर्ण काव्य-संसार की ही समालोचना है) में उनकी जन-पक्षधर-चेतना को प्रारंभ में ही मूल्यांकन के लिए चुना है। यह मेरे लिए अप्रत्याशित आश्चर्य और संतोष का विषय है कि आपने किसान-मजदूर, शोषित-पीड़ित, निर्धन-निर्बल तथा अधिकारहीन आम-जन में स्त्री को भी शामिल करके प्रो. ऋषभदेव शर्मा के काव्य में एक साथ सबकी खोज की है। आपके इस विवेचन-विश्लेषण के निष्कर्षों में प्रो. ऋषभदेव शर्मा के जन-पक्षधर-काव्य के कुछ वैशिष्ट्यों का उल्लेख है, जैसे--- ‘आम जन का जीवन, आम जन का दुख, आम जन का क्षोभ और क्रोध, आम जन की आवाज़ बन कर उनके साथ खड़े रहने की प्रतिबद्धता, आम जन को सावधान करना कि लड़ाई उस व्यवस्था से है, जिसकी मुट्ठी में हवा भी क़ैद है, आम जन का आह्वान कि अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी, जय-पराजय की न सोच कर सत्य के पक्ष में आवाज़ उठाने की जरूरत, धार्मिक उन्माद, भड़कते दंगे, भूखे पेट का व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाना हिंसा नहीं, न्याय की मांग,  स्त्रियों के भाव, क्षोभ, घुटन, प्रेम, दर्द का सजीव चित्रण, स्त्री सशक्तीकरण के नाम पर स्त्रियों के हाथों में पकड़ा दिए गए झुनझुने, स्त्रियाँ दोयम दर्जे की गुलाम, स्त्रियों को संगठित होकर आवाज़ उठाने की जरूरत’ आदि। कह सकता हूँ कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की तेवरियों और जनपक्षीय मुक्तछंद कविताओं को आपने उसी रचनात्मकता, समालोचक की ईमानदारी और संघर्ष-चेतना के दबाव में पढ़ा है, जिसने कवि से इन कविताओं की रचना कारवाई है।   

शायद इसीलिए, जब मैं आपके ‘लेखकीय’ में पढ़ रहा था कि “प्रो. ऋषभदेव शर्मा का रचना-कर्म जनवादी है। बिना ‘वामपंथ’ या ‘प्रगतिशील’ होने का ठप्पा लगाए उनकी रचनाएँ सत्ता के विरुद्ध एवं जनता के हक़ में आवाज़ उठाती रही हैं। शोषक वर्ग के विरुद्ध और शोषितों के साथ खड़े होना उनकी कविताओं की मूल भावना है”,  तभी लग गया था कि आपका निष्कर्ष होगा कि “प्रो. शर्मा वंचितों के कवि हैं, सदियों से दबी हुई स्त्रियॉं के कवि, किसान, मजदूरों के कवि हैं या यूँ कहें कि हर उस व्यक्ति के कवि हैं, जिसका रिश्ता पीड़ा से है और ऐसे हर व्यक्ति की आवाज़ प्रो. शर्मा की लेखनी उठाती रही है।”  

प्रो. ऋषभदेव शर्मा के काव्य-संसार में और गहरे उतरते हुए आप प्रेम के उस रूप तक पहुँच गए हैं, जिसकी आभा तो मोती की आभा को पराजित करती लगती है, लेकिन कहीं उसमें आपको खुरदरा प्रेम भी दिख गया है। यह आपकी बहुत पैनी अनुवीक्षण-दृष्टि की छाया लगी, जो मुझे अपने साए में नागार्जुन की उस एक कविता तक ले गई, जिसमें ‘कटहल के छिलके सी जीभ’ उपमा का प्रयोग है। बाबा की वह कविता पाठक को भीतर तक छील देती है और प्रो. ऋषभ की, आपकी नजर में आई यह प्रेम कविता भी प्रेम के साधक-अध्येताओं को सचाई के चाकू से चीर डालती है।   क्या आपको नहीं लगता की प्रो. ऋषभ की ये प्रेम कविताएँ ही उन कविताओं की भी स्रोत हैं, जिन्हें आपने ‘नदी, झील, संगम, फूल और मिठास’ की फुनगियों से बातें करती हुई कविताओं के रूप में बड़ी मेहनत से खोजा है और उन्हीं में से कुछ को ‘भेड़िए की बजाय मनुष्य बनने की कोशिश’ में लगे आदमी की कविताएँ कहा है; तभी तो कुल मिला कर प्रो. ऋषभ की ये कविताएँ ‘मानवता के बचे रहने की आशा’ की कविताएँ हैं। 

लेकिन भाई, एक अतिवादी निष्कर्ष से बच सके होते तो अच्छा लगता। आप कहते हैं कि “प्रेम को परिभाषित करने के लिए प्रयोग में लाए गए बिंब और प्रतीक न सिर्फ नए और अनसुने हैं, बल्कि ये प्रेम को लौकिक से अलौकिक और जीवन की क्षण भंगुरता से परे पवित्र, निश्चल और रूहानी प्रेम की तरफ ले जाते हैं।” इसमें बिंबों और प्रतीकों का नया या अनसुना होना तक तो बात ठीक है, परंतु यह प्रेम को अलौकिक या रूहानी दिशाओं की ओर ले जाने वाला निष्कर्ष धर्मराज के रथ की तरह ज़मीन से चार अंगुल ऊपर उठ गया लगता है। हाँ आपका यह अध्ययन-निष्कर्ष खूब गले उतरता है कि “प्रो. शर्मा की कविताओं में कुछ भी आयातित नहीं है--- कविता में जो भाषिक सौंदर्य है, पौराणिक घटनाओं या पात्रों का मिथक के रूप में प्रयोग है या बिलकुल ही अनोखे अलंकरणों के माध्यम से सौंदर्य की व्याख्या; सब कुछ प्रो. शर्मा के अपने हैं और जिन्हें कहीं और, किसी और की कविता में इस तरह नहीं पाया जा सकता।”         


प्रवीण जी, कमाल किया है आपने। आप अचानक प्रो. ऋषभदेव शर्मा की दो कालजयी कविताओं की ओर खींच ले गए। मुझे याद है, संग्रह में आने के पहले ही संयोगवश माँ और पिता पर रची गई ये कविताएँ पढ़ने को मिल गई थीं। मैं भी आप ही की तरह अपने आँसू नहीं रोक सका था। कविताओं में मुझे अपने अदेखे माँ-पिता बहुत याद आए थे। इन कविताओं की काव्यात्मकता अथवा काव्य-शिल्प पर मैं कभी विचार नहीं कर सका। साहित्य के पाठक का यह अक्षम्य दोष है, इस बात को स्वीकार करता हूँ, लेकिन क्या करूँ, ये कविताएँ काव्यशास्त्र की देहरी पर चढ़ने ही नहीं देतीं।   आपका मूल्यांकन सही है कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की “दो कविताएँ ऐसी हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद एक लंबे विराम की आवश्यकता होती है। आँखें भर आती हैं, मन विचलित होता है, कई स्मृतियाँ मानस-पटल पर कौंध जाती हैं। माँ और पिता के बारे में लिखी गई इन दो कविताओं के लिए प्रो. शर्मा को किसी भी बड़े से बड़े पुरस्कार से सम्मानित किया जा सकता है।”   

काव्य की ही तरह प्रो. ऋषभदेव शर्मा के गद्य का विश्लेषण भी आपने अत्यंत व्यापक और बहुज्ञ अध्ययन-दृष्टि का प्रयोग करते हुए किया है। आपके अध्ययन-निष्कर्षों को (भी) निचोड़ कर प्रो. ऋषभ के पत्रकारितेतर गद्य की विशेषताओं की छोटी-सी सूची बनाना चाहूँ, तो काटाकूटी करने के बाद उसमें कुछ-कुछ ये विशेषताएँ होंगी--- ‘मूलत: कवि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की आलोचना का मुख्य विषय भी कविता, गद्य में कविता जैसा ही भाषिक सौंदर्य, कम शब्दों में अपनी बात प्रभावशाली ढंग से कहने का कौशल, लेखकीय ईमानदारी का निर्वाह, भक्ति कालीन कवियों के मूल्यांकन में भक्ति से अधिक मानवीय मूल्यों की खोज, हिंदी के गोरखनाथ से लेकर अधुनातन कवियों और कथाकारों के मूल्यांकन के साथ ही तेलुगु, तमिल आदि भाषाओं के रचनाकारों का भी मूल्यांकन, हिंदी साहित्येतिहास में स्थान बना चुके छायावाद, प्रगतिवाद, समकालीन कविता आदि आंदोलनों की परीक्षा, लघुकथा जैसी चुनौतीपूर्ण विधाओं का विश्लेषण, कालजयी उपन्यासों की परीक्षा, कथा साहित्य में दलित और आदिवासी विमर्श की खोज, स्त्री-पुरुष संबंधों के चित्रण की परीक्षा, साहित्य में गाँव, बच्चे, मानवाधिकार, वैश्वीकरण का यथार्थ, इक्कीसवीं शताब्दी की कहानी की शक्ति और संभावनाओं की तलाश, हिंदी के भारतीय और वैश्विक संदर्भों का साक्षात्कार, कविता और कथा में शहरीकरण और जनपदीय चेतना की खोज’ आदि। प्रो. शर्मा के गद्य में इन विशेषताओं के खोजी होने के चलते आप समझ सकते हैं कि यह ‘आदि’ हाथी का पाँव है, जिसमें असंख्य पाँव समाए हुए हैं।   

‘साहित्य, संस्कृति और भाषा’ पुस्तक के लेखों की समालोचना करते हुए आप लेखक प्रो. ऋषभदेव शर्मा से टकराने की ओर भी बढ़े हैं। इसके एक लेख ‘रामकथा आधारित एनिमेशन ‘सीता सिंग्स द ब्ल्यूज’ : एक अध्ययन’ में प्रो. ऋषभदेव शर्मा रामकथा और उसके चरित्रों के साथ नीना पेले द्वारा किए गए व्यवहार पर टिप्पणी करते हुए ‘आस्थावादी प्रतिबद्ध संस्कृतिकर्मी’ के बदले कलाकार और लेखक की स्वतंत्र चेतना के पक्षधर ‘उत्तर आधुनिक व्यक्ति’ का रवैया अपनाते हैं। प्रवीण जी, आप इससे भीतर ही भीतर बेहद आहत अनुभव करते हैं, इतने अधिक कि अपने आप को यह कहने से नहीं रोक पाते कि “इसमें दो-राय नहीं कि इस फिल्म, जिसमें स्क्रिप्ट, एनिमेशन से लेकर निर्देशन तक का बीड़ा नीना पेले ने उठाया, में उन्होंने बेहतर काम किया है, लेकिन स्थापित मान्यताओं के विरुद्ध जाकर संदर्भ से अलग परिस्थितियों का चित्रण, अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर उस सीमा-रेखा का उल्लंघन है, जहाँ जनमानस की भावनाएँ आहत होती हैं।” इसके बाद इस एनीमेशन से ही अपने समर्थन में उदाहरण देते हैं--- “दशरथ की मृत्यु के समय कैकेयी की गोद में उनका सिर होना और कैकेयी का अश्लील फिल्मों की नायिका की तरह नर्स के कपड़ों में अर्धनग्न और उत्तेजक चित्रण समझ के परे है।” सीता, रावण और राम के संबंध में भी वहीं से कुछ प्रसंग चुन कर प्रस्तुत करते हैं, जो आपके लिए इससे भी वीभत्स लगने वाले हैं। अंत में आपकी टिप्पणी है कि आपको यह “उदारमना लेखक द्वारा ‘मूँदें आँखि कतहुं कोउ नाहीं’ वाली उदारता को जारी रखने जैसा लगता है।” सच कहूँ, यद्यपि आप अपने क्षोभ को पचा गए हैं, बहस से भी विरत से ही हो गए हैं, टिप्पणी भी अति संकोच पूर्वक ही की है, फिर भी यहाँ (मूल पाठ के) ‘लेखक प्रो. ऋषभदेव शर्मा’ से (इस पुस्तक के) ‘लेखक प्रवीण प्रणव’ का जो भी थोड़ा-बहुत टकराव दिखता है, वह बहुत प्यारा और ईमानदारी भरा लगता है। वरना, हिंदी में जो लोग प्रशस्तिपरक लेखन के अभ्यस्त हैं, वे अपने प्रिय लेखक के लिखे पर न कोई शंका करते हैं, न सवाल उठाते हैं, न बहस खड़ी करते हैं और न कोई ऐसा आलोचनात्मक टकराव पैदा होने देते हैं, जो उनकी रीढ़ की हड्डी सीधी होने की गवाही दे।   

लेकिन भाई, आपकी इतनी प्रभावकारी लेखकीय ईमानदारी के बाद ‘साहित्य, संस्कृति और भाषा’ पुस्तक के ही बहाने प्रो. ऋषभदेव शर्मा के गद्य-लेखन में आई पुनरावृत्ति का स्पष्टीकरण मुझे नहीं जमा। आपने लेखन का एक नितांत सही पक्ष खोजा है--- समय-समय पर किए गए लेखन में कहीं-कहीं पुनरावृत्ति-दोष का आ जाना। यह किसी भी ऐसे लेखक के संदर्भ में होना संभव है, जो लगातार और बिना थके लिखता हो अथवा जिसे इतना अधिक लिखना पड़ता हो। यह एक अपरिहार्य लेखन-दोष है, जिसके लिए उस लेखक को कोई ऐसी कैफियत देने की जरूरत नहीं होती, जो पैरों न चल सके। और, उस लेखक के समालोचक को भी--- इस दोष का उल्लेख कर देने के अलावा--- कोई रक्षा-दीवार खड़ी करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। अब आप अपना दिया स्पष्टीकरण देखिए, “साहित्य, संस्कृति और भाषा जैसे विषयों पर ये लेख अलग-अलग समय पर लिखे गए हैं, इसलिए कुछ बिंदुओं की पुनरावृत्ति हुई है; लेकिन यह खलती नहीं, क्योंकि हर लेख में पाठकों के लिए बहुत कुछ नया है और जिन बिंदुओं की पुनरावृत्ति हुई है, वे इतने महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें बार-बार दुहराया ही जाना चाहिए। विपणन (Marketing) के क्षेत्र में ‘Rule of 7’  एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जो यह कहता है कि यदि आप चाहते हैं कि ग्राहक कुछ याद रखे, तो कम से कम सात बार आप उसे ग्राहक के सामने लाएँ।” इसके बाद आप डॉ. राजेंद्रप्रसाद की ‘साहित्य, शिक्षा और संस्कृति’ पुस्तक के प्रकाशन का उदाहरण देते हैं, जो उनके 28-29 वर्ष की अवधि में समय-समय पर दिए गए भाषणों का संग्रह है। डॉ. राजेंद्रप्रसाद ने पुनरावृत्ति (और विरोधाभास) की संभावना को बड़े सहज रूप में स्वीकार किया है, लेकिन उसके लिए कोई सफाई नहीं दी है। मैं जो कहना चाहता हूँ, आशा है, आप उसे समझ रहे हैं।  

प्रो. ऋषभदेव शर्मा द्वारा पत्रकार की भूमिका निभाने के क्रम में किए गए लेखन का मूल्यांकन करते हुए पुन: आपके निष्कर्ष ध्यान खींचते हैं। आपके कुछ निष्कर्ष, जो मुझे खूब भाए, वे हैं--- ‘साहित्यकार होने के कारण पत्रकारीय लेखन में पठनीयता का सौंदर्य राजनीतिक विश्लेषकों से अधिक, सरल भाषा में पाठकों के सामने वस्तुस्थिति रखना, अपने विचार बिना किसी लाग-लपेट के प्रकट करने में विश्वास रखना, घटना के भीतरी-बाहरी वर्तमान प्रभाव के साथ ही उसके भविष्य में होने वाले फलितार्थ का संकेत करना, सत्ता-पक्ष और विपक्ष दोनों पर पैनी नज़र बनाए रखना, संवेदनशील मुद्दों पर सशक्त और संतुलित दृष्टिकोण को प्राथमिकता देना, मतदान के प्रति उदासीनता की प्रवृत्ति की आलोचना के साथ ही उसे मतदाता की ओर से ‘नोटा’ के रूप में भी देखने का सुझाव देने के बहाने सभी विषयों में राजनीतिक-सत्ता और नागरिक के संबंधों को परखने पर बल देना’ आदि। यहाँ आपका वस्तुनिष्ठ एवं संतुलित अभिमत और भी प्रभावित करता है--- “पत्रकारिता के क्षेत्र में, जहाँ पीतपत्रकारिता का बोलबाला है, जहाँ बहुसंख्यक लोग अंधभक्ति या अंधविरोध के खेमे में शामिल हो बिगुल बजा रहे हैं; जहाँ खबरों की प्रामाणिकता, टीआरपी या पाठक तक पहुँच के आधार पर तय की जाती हो; तटस्थ रह पाना इतनी मुश्किलों और चुनौतियों भरा विकल्प है कि ऐसे किसी भी व्यक्ति को आज विस्मय की नज़र से देखा जाता है। इन कठिन परिस्थितियों में प्रो. ऋषभदेव शर्मा (1957) के संपादकीय लेखों को पढ़ना जेठ की दुपहरी में मलय पवन की शीलता के समान है।”    

प्रवीण जी, ‘लिए लुकाठी हाथ’ में समय-समय पर लिखे गए आपके जितने समालोचना-लेख संकलित हैं, वे सभी निजी अध्ययन-निष्कर्षों, गहरी आत्मीयता, मूल्यांकन की गंभीर इच्छा और समालोचना के लिए अनिवार्य सत्यनिष्ठा का प्रतिफल हैं। जब आप कहते हैं कि “मुझे याद है, जब मैंने प्रो. शर्मा को जानना शुरू ही किया था, तब लगता था कि इनकी कविताओं की चर्चा होनी चाहिए। कई मंचों से बाद में यह हुआ भी। लगा कि इनकी कविताओं पर आलेख लिखे जाने चाहिए और वह भी हुआ। इनके समग्र साहित्य को पढ़ कर लगा कि इनके बारे में लोगों को और जानना चाहिए और एक विस्तृत किताब आनी चाहिए”, तो पता चल जाता है कि यह पुस्तक एक ऐसी नागरिक-ज़िम्मेदारी के निर्वाह के लिए सामने आ रही है, जो आज के साहित्य की लेखक-पाठक दुनिया में विलुप्त होने के कगार पर है। ऊपर से, जिस लेखक के साहित्य पर यह पुस्तक केंद्रित है, वह ऐसा है, जिसका व्यक्तित्व सभी के भीतर वैचारिक ऊर्जा जगाता आया है। आप भी अनुभव करते हैं कि “कम ही लोग ऐसे होते हैं, जिनके साथ बात करते हुए आप हर बार कुछ नया सोचने पर विवश होते हैं, हर बार आप कुछ नया सीखते हैं, हर बार आप कुछ नया करने की प्रेरणा पाते हैं और प्रो. ऋषभदेव शर्मा ऐसे ही व्यक्ति हैं।” 

ऐसी अगाध आत्मीयता के जल से भीगी हुई टटकी आलोचना हिंदी के पाठकों को एक अलग तरह का पठन-सुख देगी, यह सोच कर अच्छा लग रहा है। अपने ढंग के इस अभिनव कार्य के लिए आपको शुभकामनाएँ।  

सस्नेह--- 

देवराज 

पूर्व अधिष्ठाता : मानविकी संकाय 

मणिपुर विश्वविद्यालय, 

इम्फाल (मणिपुर)

मंगलवार, 13 फ़रवरी 2024

इंदुकांत आंगिरस की प्रेम कविताएँ "सहयात्री"

 


भूमिका

कभी न मुरझाने वाले वसंत का मदनोत्सव


बहुभाषाविद् तथा बहुमुखी सर्जनात्मक प्रतिभा के धनी साहित्यकार इंदुकांत आंगिरस की इस कृति “सहयात्री” के बहाने मुझे उनकी अनंत प्रेमयात्रा का साक्षी बनने का सौभाग्य मिला। यह अनंत प्रेमयात्रा अस्तित्व और सृजन की निरंतरता की यात्रा है। यहाँ तूलिका और लेखनी एक साथ यात्रा पर निकलती हैं और प्रेम का एक ऐसा निजी संसार रचती हैं, जिसमें समस्त जड़-चेतन सृष्टि समा जाती है। विश्व कला के साथ भारतीय कविता की इस चामत्कारिक जुगलबंदी के लिए कवि और चित्रकार दोनों अभिनंदनीय हैं। 


कलाकार और कवि दोनों ही मूलतः चित्रकार हैं। कलाकार ने रेखाचित्र रचे हैं और कवि ने शब्दचित्र आँके हैं। रेखाओं ने शब्दों को मूर्तित किया है और शब्दों ने रेखाओं को अमूर्त वाणी देकर चिर जीवन का वरदान दिया है। कहना न होगा कि कवि आंगिरस की ये कविताएँ आत्मा पर अंकित भित्तिचित्रों की प्रतिध्वनियाँ हैं। चित्रांकन और शब्दांकन का यह रिश्ता यों तो बहुत पुराना है। लेकिन कवि की नित्य नवोन्मेषकारी लेखनी ने चित्रों को कुछ इस तरह शब्दों में ढाला है कि प्रेम की प्रत्येक सूक्ष्मातिसूक्ष्म मनोदशा इन कविताओं में अत्यंत समर्थ उपमाओं, अप्रस्तुतों, रूपकों, प्रतीकों, बिंबों और पुराकथाओं के सहारे साक्षात साकार हो उठती है। अत्यंत कोमल शब्दों पर झेला गया चित्रकला का यह सौंदर्य इन कविताओं को अप्रतिम और अद्भुत आह्लाद का हेतु बनाता है। चित्रों का कविता में यह अनुवाद पाठक की स्मृति में अंकित होने की योग्यता रखता है। 


‘सहयात्री’ प्रेम की गहन अनुभूतियों का चित्रात्मक आख्यान है। एक ऐसा आख्यान जो सूर्य की पहली किरण बनकर आत्मा पर दस्तक देता है। यह दस्तक आत्मा के कभी न मुरझाने वाले वसंत की पहली आहट बन जाती है। वही वसंत जिसे प्रेमीजन प्रेमाग्नि में जलकर प्राप्त किया करते हैं। रंगों और गंधों का एक उल्लास पर्व। प्रेम पंथ पर एक-दूसरे का साथ सूर्य की ऐसी सुनहरी किरणों की तरह है जिनसे प्रेमी आत्माएँ जगमगा उठती हैं और मरुभूमि में भी प्रेम के वासंती फूल महमहाने लगते है। दो प्रेमियों की आत्म-गंध एक-दूसरे में गहरे रच-बस कर गंधस्नात पुष्पों की मुस्कान में बदल जाती है। साँसें भी फूलों की मानिंद खिल उठती हैं और आत्मा की पलकों पर प्रेम-पुष्पों का दीपक झिलमिलाने लगता है। 


वसंत की यह लीला फूलों में तो नाच ही रही है, लेकिन इस अभिव्यक्ति के मूल में कुछ ऐसा है जो अव्यक्त है, परोक्ष है। चित्रकार और कवि दोनों को ही पुहुप- बास से भी पतले उस तत्व की तलाश है। वे महसूस करते हैं कि प्रेम के अनंत वृक्ष ने अब अपनी जड़ें फैला ली हैं। इन जड़ों में प्रकृति और पुरुष का रक्त किसी उन्मुक्त झरने की तरह बह रहा है। प्रेमी हों या योगी सब इसी झरने में तो भींजना चाहते हैं। तभी तो जिंदगी की सरगम फूटती है और सदियों की चौखट पर चाँदनी के फूल मुस्कराने लगते हैं। कवि को चिंता है कि मुग्ध विरहिणी कहीं चंचल हवा की छद्म सादगी से भ्रमित न हो जाए और उसके साथ वासंती खुशबू वाले प्रेमपत्र न भेज दे। हवाएँ गोपनीय को सार्वजनिक बनाने में माहिर होती हैं न! और प्रेमीजन निजता में डूबे रहना चाहते हैं - ‘निपजी में साझी घणा, बाँटे नहीं कबीर’!


प्रेमी और प्रेमास्पद की यह सहयात्रा नित्य नए क्षितिजों का संधान करती है। प्रेम की इस अनंत यात्रा पर प्रेमपात्र का साथ उस नाव की तरह है जो साँसों की लहरों पर तिरकर उस पार उतरती है। दोनों को लगता है कि वे बेल की तरह एक-दूसरे की आत्मा के फूल पर लिपटते जा रहे हैं। उनका यह सामीप्य और सायुज्य चिर मिलन के अद्वैत की भूमिका है। उन्हें विश्वास है कि उनकी प्रेमाग्नि की तपन से बर्फ के पहाड़ पिघल जाएँगे और प्रेम की पावन नदी बह निकलेगी। यही नहीं, उनके प्रेमराग की धुन सुनकर आकाश गूँगा हो जाएगा और धरती बहरी बन जाएगी। यही तो है प्रेम की समाधि में गूँजने वाला दिव्य अनाहत नाद, जो तब सुन पड़ता है जब राधा और माधव एक हो जाते हैं। इसीलिए कवि इंदुकांत आंगिरस की राधा चाहती है कि सदा सदा के लिए माधव की हो जाए, अपनी पलकें बंद करे और उन्हीं में खो जाए। 


इस अवस्था में दो आत्माएँ एक होकर सौ रंगों वाला हरदिल अजीज़ अनूठा इंद्रधनुष सिरजती हैं। आसमान में इंद्रधनुष उगता है, तो धरती पर महुए का एक फूल मोतियों की तरह खिलता है। मुहब्बत के इस महमहाते महुए को जन्म और मृत्यु के घेरे भी आत्मा की धरती पर खिलने से नहीं रोक सकते। प्रेम के स्पर्श में एक ऐसी अलौकिकता है कि उसे पाकर प्रेमीजन सुगंधित फूलों की मानिंद खिल उठते हैं और वसंत के पंखों पर सवार होकर खुद भी पारस-हवा बन जाते हैं। आने को ऐसे विपरीत अवसर भी आते हैं जब ज़माने की आँधियाँ प्रेम-वृक्ष को झिंझोड़ डालती हैं, लेकिन प्रेमीजन पराजित नहीं होते और उनके प्रेम की किश्तियाँ प्रेम-झील में बेख़ौफ़ तिरती रहती हैं। उन्हें दृढ़ विश्वास है कि दो आत्माओं के मिलन का प्रेमफूल वसंत की दहलीज़ पर अनंत काल तक इसी तरह खिलता रहेगा। इस विश्वास का कारण यह अनुभूति है कि हमारे अनंत प्रेम की अग्नि लपटों की रोशनी अब अखिल ब्रह्मांड में फैल रही है और सूरज रोज़ इसी रोशनी से उगता है। इसी रोशनी से तो विनाशकारी महायुद्धों के बीच सृजन के शंखनाद से प्रेमऋचाएँ तरंगित होती हैं। पिंड से ब्रह्मांड तक की यह अनंत यात्रा  नित्य प्रकाशमयी और अमृतमयी है।


‘सहयात्री’ की ये चित्र-कविताएँ एक विशेष पैटर्न में रची गई हैं। हर कविता की अंतिम पंक्तियाँ उसमें व्यंजित चित्र को विशेष ‘उभार’ देती हैं, जैसे-


आओ प्रिय!


प्रेमकिश्ती के सब पालों को खोल दें

अनबूझी दिशा में प्रेमकिश्ती को छोड़ दें


दरिया की लहरों पर प्रेमदीपक जला दें

चाँदनी के फूलों से प्रेममंदिर सजा लें


हम एक-दूसरे की बाँहों में क़ैद हो जाएँ

इक-दूजे में खो जाएँ और ग़ैब हो जाएँ


इस प्रेमनदी में डूबकर हो जाएँ पार

युगों युगों तक कायम रहे अपना प्यार


इस तन्हा पंछी की पीड़ा में हम भी रोएँ

अपने अपने ग़मों के दाग़ प्रेमजल से धोएँ


चाँदनी की चादर ओढ़ सदा के लिए सो जाएँ

एक-दूसरे को ओढ़ लें, एक-दूसरे में खो जाएँ


प्रेम की इस अद्भुत रोशनी में हम मिलकर नहाएँ

और अपने महामिलन की कथा हम सबको सुनाएँ


प्रेमदीपक को अपने लहू से जलाते चलें

इस दुनिया के हर अँधेरे को मिटाते चलें


हम मिलकर शंखनाद करें,  प्रेमबिगुल बजाएँ

इस धरती से नफ़रत का नामोनिशान मिटाएँ


इन काव्यपंक्तियों से यह भी स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि प्रेम की एकाग्रता और निजता के पल भी अंततः लोककल्याण के निमित्त समर्पित और संकल्पित होकर विश्वात्मा में लीन हो जाते हैं। यही तो प्रेममार्ग के सहयात्रियों की मुक्ति है! 


सर्जनात्मकता के इस मनोरम और रमणीय, दर्शनीय और पठनीय अभियान के प्रकाशन के अवसर पर कवि और कलाकार दोनों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ!


  • ऋषभदेव शर्मा


वसंत पंचमी 

14 फ़रवरी, 2024

सोमवार, 25 सितंबर 2023

डॉ. त्रिवेणी झा की कृति 'विविधा' की भूमिका

 


भूमिका


डॉ. त्रिवेणी झा की कृति 'विविधा' से गुजरना जीवन के विविध अनुभवों और अनुभूतियों की कहीं सँकरी तो कहीं चौड़ी पगडंडियों से होकर गुजरने जैसा है। यहाँ संकलित रचनाएँ उनके देखे, भोगे और झेले जीवन की सहज निष्पत्तियाँ हैं। कहानियाँ हो या कविताएँ अथवा व्यंग्य, सबमें लेखक एक परिपक्व मनुष्य की तरह मौजूद है। समय की आँच में पक कर निकलीं इन रचनाओं में एक खास तरह की निजी खनक है। इस खनक में जहाँ कई बार लेखक का अध्यापकीय संस्कार ध्वनित होता है, वहीं बहुत बार चुहल और चुटकी का अंदाज़ भी ठुनकता सा सुन पड़ता है। खड़ी बोली के अलावा मैथिली की रचनाएँ भी हैं, जो कवि की गहरी लोकानुरक्ति का सबूत देती हैं।


तीनों ही विधाओं की रचनाओं में जीवन मूल्यों की रक्षा अथवा पुनर्स्थापना के प्रति रचनाकार का आग्रह खास तौर पर ध्यान खींचता है। इसी आग्रह के सहारे वे समसामयिक परिवेश को घेरने वाले वास्तविक सवालों और समस्याओं से टकराते हैं। एक और बात यह भी कि वे सामाजिक प्रयोजन को आगे रखते हुए भी मनोरंजन और आनंद की सिद्धि की उपेक्षा नहीं करते। सौंदर्य की सृष्टि का सुख तो खैर अपनी जगह है ही। 


पुस्तक के पहले खंड में छोटी छोटी कुछ कहानियाँ अथवा लघु कथाएँ हैं, जिनमें व्यक्ति मन और समाज मन अपनी अपनी ठसक के साथ विद्यमान हैं। घर-परिवार से लेकर सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक परिवेश तक देश-दुनिया की खबर देती-लेती ये कहानियाँ कभी चोट करती हैं, कभी उपदेश देती हैं, कभी मुस्काने को विवश करती हैं, तो कभी रुलाती भी हैं। बौद्धिक आतंकवाद, वृद्धावस्था, पीढी अंतराल, विश्वमारी कोरोना की त्रासदी, वात्सल्य, दायित्व, गृहस्थ जीवन की ऊँच-नीच, संपत्ति, उत्तराधिकार, बेटे-बेटी, रिश्ते-नाते, पर्व-त्योहार, जीवनी शक्ति और मृत्यु बोध को कथ्य बना कर डॉ. त्रिवेणी झा ने अपनी लघु कथाओं की दुनिया का रुपहला संजाल रचा है। यह रचाव इतना सहज है कि पाठक को लेखक की दुनिया अपनी दुनिया लगने लगती है। 


यही बात दूसरे खंड पर भी लागू होती है। इस खंड में प्रस्तुत हास्य-व्यंग्य के प्रसंग दैनिक जीवन से लिए गए हैं और लेखक की विनोद वृत्ति का परिचय देते हैं। इनमें कहीं किस्से जैसा प्रवाह है, तो कहीं चुटकुले जैसा खिलंदड़ापन। शब्द क्रीड़ा भी बहुत बार बाँध लेती है। 'मसक पुराण', 'दाँत की करामात', 'चमचे नए पुराने' और 'बतरस' सरीखी रचनाएँ यह प्रमाणित करने के लिए भी काफी हैं कि कई दशकों की अध्यापकी और प्रिंसिपलगीरी के बावजूद लेखक के भीतर का नटखट बालक आज भी ऊर्जस्वित है। 


इसके अलावा, तीसरा अर्थात कविता खंड रचनाकार की विचारशीलता के साथ साथ उनकी भावप्रवणता का परिचायक है। कवि का आग्रह है कि सभ्य समाज में कलम की मर्यादा का सम्मान होना चाहिए। वे प्राकृतिक सौंदर्य और मानवीय सौंदर्य को एक साथ जोड़कर नैतिकता का पाठ भी बखूबी पढ़ाते हैं। कहना न होगा कि अँधेरी रात में 'जागते रहो' का संदेश बहुअर्थीय है। दुःख के अँधेरे को जिजीविषा के दीप जलाकर काटने की बात वे जिस ढंग से कहते हैं, वह बहुत सहज है। आपदाओं को अवसर में बदलने की प्रेरणा भी इन कविताओं में निहित है। नागर जीवन की अपसंस्कृति के बरक्स ग्राम जीवन की लोक संस्कृति का माहात्म्य भी कई स्थलों पर देखने को मिलता है - विशेषतः मैथिली कविताओं में। 


अंततः इस कृति के प्रकाशन के अवसर पर मैं डॉ. त्रिवेणी झा को, दादी-पोती के स्नेहिल रिश्ते को रूपायित करती और जीवन राग से भरी उनकी कविता 'सूखी डाली में कोंपल' के इस अंश के साथ, शुभकामनाएँ और बधाइयाँ देता हूँ कि: 


  • दादी का सुमधुर स्वर

हवा में तैरने लगा है-

'मेरी रानी बड़ी सयानी

पी ले पी ले थोड़ा पानी'

यही समर्पण सूखे तन-मन को

हरिया गया, फिर तरी दे गया।

आज उस सूखी डाली में

स्पंदन हुआ, 

उस सिहरन से डाली में 

फिर कोंपल आने लगे।

मन पंछी चहचहाने लगे।


आशा है, इस सृजन की हरियाई डाल को सुधी पाठकों का भरपूर प्यार मिलेगा। 


  • ऋषभदेव शर्मा

हिंदी परामर्शी,

दूरस्थ शिक्षा निदेशालय, मौलाना आज़ाद राष्ट्रीय उर्दू विश्वविद्यालय, हैदराबाद।

31 जुलाई, 2023



शुक्रवार, 22 सितंबर 2023

भूमिका : मैं मंज़िल का पथिक अकेला

सुरेश जैन के कविता संकलन 

"मैं मंज़िल का पथिक अकेला" की 

भूमिका

(एक जादूगर जिसने उगाया सूर्य का पौधा)

             

 "लगता है 

 सूर्य एक दिन धरती पर उतर कर 

 अपना पौधा उगाएगा 

 फिर धीरे-धीरे एक दिन 

 यह पौधा पेड़ बन जाएगा 

 और उस पेड़ पर उग आएँगे

 अनेक सूर्य 

 जिनसे प्रकाशमय हो उठेगा 

 सारा ब्रह्मांड"

 

‘कविराज’ सुरेश जैन का कविकर्म अपने खास अंदाज में सूर्य के इसी पौधे को पालने-पोसने की साधना है। कविता सूर्य का पौधा ही तो है, जिस पर आशा और आनंद के फूल और फल लगते हैं। कविगण अपनी-अपनी रुचि के फूल-फल इस पौधे से लेकर सहृदय आस्वादकों को बाँटने भर का काम करते हैं। कवि तो बस मध्यस्थ है, वितरक है - आनंद का। कविताएँ रची नहीं जाती, उतरती हैं- सूर्य की किरणों के रथ पर बैठकर कवि के मानस में। कवि उन्हें अपने शब्दों से सजाकर जनता को सौंप देता है। सुरेश जैन ने सूर्य के पौधे पर लगे कविता रूपी फूलों-फलों को हास-परिहास, कटाक्ष और व्यंग्य से सजा-सँवार कर अपनी निजी धज प्रदान की। लेकिन वे हास्य-व्यंग्य तक ही सीमित रहे हों, ऐसा नहीं है। उन्होंने समय-समय पर ओज का बाना भी पहना। प्रेम और शृंगार के बिना तो कविता हो ही नहीं सकती, क्योंकि कविता अंततः जीवन है। और जीवन की कल्पना भला प्रेम और शृंगार के बिना पूरी होती है क्या! अर्थात सुरेश जैन संक्षेप में समस्त जीवन के कवि हैं। 

सुरेश जैन एक सदा प्रसन्न रहने वाले हँसमुख, मृदुभाषी, मिलनसार और जीवंत सामाजिक जीव थे। यकीन नहीं होता कि वे अब हमारे बीच नहीं हैं। लेकिन इस सच को नकारा नहीं जा सकता कि पिछले कुछ वर्षों में हैदराबाद की हमारी हिंदी साहित्यिक बिरादरी के मेरे कई अतिप्रिय कविमित्र असमय विदा कहकर इस लोक की यात्रा को अधूरी छोड़ जाने किस परम लोक की यात्रा पर अचानक अकेले-अकले निकल गए। सुरेश जैन भी इसी तरह चले गए; कहते-कहते कि मैं मंज़िल को चला अकेला। वह मंज़िल ही ऐसी है - सबको साथ लेकर चलने वाले भी उसकी ओर तो अकेले ही जाते हैं। और अकेला कर जाते हैं सहसा राह में छूट गए संगी-साथियों और सहयात्रियों को। उनकी स्मृतियाँ ही रह जाती हैं, बाद में साथ निभाने को। ‘कविराज’ की ये स्मृतियाँ उनकी रचनाओं के रूप में यत्र-तत्र कागजों पर अंकित हैं। यह संकलनउन्हें ही समेटने-सहेजने का विनम्र प्रयास है।

इस संकलन की कविताएँ सुरेश जैन के कवि-मन की संवेदनशीलता का सच्चा पता हैं। एक हास्य-व्यंग्य रचने वाले सफल कवि के रूप में वे अपने समसामयिक समाज, परिवेश और घटनाचक्र से असंतुष्ट और क्षुब्ध थे। इस असंतोष और क्षोभ को व्यक्त करने के लिए ही उन्होंने अपनी कविता के सहारे सामाजिक, धार्मिक, आर्थिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक परिवेश की विडंबनाओं और विसंगतियों को इस तरह अभिव्यक्त किया कि कहीं हास्य, कहीं रुदन और कहीं कारुणिक व्यंग्य के अलग-अलग रंग पाठक-श्रोता की चेतना को अनुरंजित करते चलते हैं। वे आधुनिक मनुष्य के दोगले आचरण पर बार-बार चोट करते हैं, सामाजिक-धार्मिक पाखंड पर से हँसते-हँसते पर्दा उठाते हैं और मौका मिलते ही राजनीति के विद्रूप को नंगा करने में भी नहीं चूकते। सहज विनोद और हास-परिहास के प्रसंग भी उन्हें अति प्रिय हैं। इनके सहारे वे पाठकों को गुदगुदाते हैं। प्रस्तुत संकलन उनकी कविताओं के इन सभी रंगों से आपको परिचित कराएगा और आप उनके काव्यात्मक सम्मोहन में बंधे बिना न रह सकेंगे; यह मेरा दावा है। 

अंततः स्वयं सुरेश जैन ‘कविराज’ के अपने शब्दों में बस इतना कि - 

"मेरे हाथों में जादू है जी 

मैं कुछ भी बना सकता हूँ!"


शुभकामनाओं सहित 

#ऋषभदेव_शर्मा 


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मैं मंज़िल का पथिक अकेला (सुरेश जैन की प्रतिनिधि कविताओं का संकलन)/  संपादक- प्रवीण प्रणव/ 2023/ प्रकाशक- कादंबिनी क्लब, हैदराबाद/ पृष्ठ 126/ ₹150.

भूमिका : मुक्ता की परख



प्रवीण प्रणव एवं अवधेश कुमार सिन्हा की समीक्षा कृति "मुक्ता की परख" की 

                 भूमिका


चर्चित एवं प्रतिष्ठित साहित्यकार डॉ. अहिल्या मिश्र ( Ahilya Mishra:1948) के अमृतोत्सव की मांगलिक वेला में प्रस्तुत कृति 'मुक्ता की परख' (2023; हैदराबाद: गीता प्रकाशन) में उनके सिरजे साहित्य-मुक्ताओं की परख अवधेश कुमार सिन्हा और प्रवीण प्रणव जैसे दो गुणी और पारखी जौहरियों ने बहुत सूक्ष्मता से और गहराई से की है। इस परख के दौरान सहज भाव से इन मुक्ताओं की सिरजनहार के जीवन और व्यक्तित्व की भी बेलाग पड़ताल हुई है क्योंकि 'मौक्तिकम् न गजे-गजे'! कहना न होगा कि मुक्ताओं की रचना के मूल में निहित रचनाकार के वैशिष्ट्य और औदात्य को रेखांकित करने के कारण इस कृति का महत्व और भी बढ़ गया है। इससे यह एक ऐसी स्वतःपूर्ण आलोचना की पुस्तक बन गई है जो डॉ. अहिल्या मिश्र के संपूर्ण व्यक्तित्व और समग्र कृतित्व की झाँकी भी देती है और उसका मूल्यांकन भी करती है। ऐसा संभव हो सका है क्योंकि दोनों ही पारखी जौहरी अहिल्या जी और उनके रचनाकर्म दोनों को निकटता और गहराई से जानते हैं। यह निकटता और गहराई इस पुस्तक की प्रामाणिकता का ठोस आधार है। 


पहले जौहरी अवधेश कुमार सिन्हा की पारखी नज़र सबसे पहले उस परिस्थिति और परिवेश को ताड़ती हैं, जिसके प्रभावों ने इन आबदार मोतियों को सुडौलता और दीप्ति बख्शी है। वे यह खास तौर पर लक्षित करते हैं कि अहिल्या मिश्र के रूप में बिहार की मिट्टी में उपजा  प्रतिभा का पौधा विकास की संभावनाओं की उठती आयु में हैदराबाद की जलवायु में रोपित होकर कैसे सारे वातावरण को अपनी गौरव-गंध से आप्यायित कर देता है। उन्होंने याद दिलाया है कि अपनी यात्रा के रास्ते में कई मील के पत्थर गाड़ने वाली, दक्षिण भारत में सबसे बुलंद आवाज़ में हिंदी का परचम लहराने वाली, अपने साहित्य के जरिये विचार क्रांति लाने वाली तथा समाज सेवा द्वारा मानवता, विशेषकर नारियों के उत्थान के लिए समर्पित लेखिका डॉ. अहिल्या मिश्र के मन-प्राण में बिहार की मिट्टी की सोंधी खुशबू बसी हुई है। अवधेश जी मानते हैं कि अहिल्या जी  बिहारवासियों की क्षमताओं से भी भली-भाँति परिचित हैं और बिहार की वर्तमान दशा-दिशा से उनका व्यथित होना स्वाभाविक है। यह व्यथा उनकी रचनाओं में कहाँ और कैसे प्रतिफलित हुई है, इसका पता यह पुस्तक भली-भाँति देती है। आलोचक ने लक्षित किया है कि लेखिका ने अपनी आत्मकथा में बिहार के 1969 के दशक की परंपराओं, रूढ़ियों और मान्यताओं के साथ ही महिलाओं के प्रति समाज के नज़रिये का दस्तावेज़ीकरण किया है। किशोरावस्था की अपरिपक्व उम्र में लड़कियों का उनकी इच्छा के विरुद्ध विवाह, ससुराल में नव-विवाहिताओं की व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं पर थोपे जाने वाले निषेधात्मक प्रतिबंध, लड़कियों-महिलाओं में शिक्षा का अभाव व उनके ज़्यादा पढ़ने की मनाही जैसी विद्रूपताओं के सजीव चित्रण के लिए उन्होंने अहिल्या जी की औपन्यासिक आत्मकथा को खास माना है। इसके अलावा अहिल्या जी के निबंध उन्हें इसलिए पठनीय लगते हैं कि इनमें भारत की गौरवशाली संस्कृति एवं साहित्य पर नव-धनाढ्यों, सरकारी तंत्र, पूँजीपतियों द्वारा पोषित व संचालित मीडिया व संचार माध्यमों, व्यावसायिक फिल्म उद्योग के कब्जे तथा बढ़ते बाजारवाद व उपभोक्तावाद से उपज रही अपसंस्कृति एवं जन-संस्कृति के हो रहे ह्रास के प्रति लेखकीय चिंता ही प्रकट नहीं हुई है, बल्कि इन परिस्थितियों का विश्लेषण करते हुए अपनी संस्कृति व साहित्य को बचाये रखने के लिए कई सुझाव भी दिए गए हैं ।


अवधेश कुमार सिन्हा ने अहिल्या मिश्र की रचना-प्रक्रिया और भाषा-शैली को भी अलग-अलग कोणों से परखा है। उनका निष्कर्ष है कि अहिल्या मिश्र अपनी कहानियों, कविताओं, निबंधों आदि के माध्यम से कहीं-कहीं तो सीधे और कहीं-कहीं संकेतों, प्रतीकों, बिंबों, ध्वनियों एवं अंतर्लयों के प्रभाव से अपने कथ्य को इस प्रकार प्रकट करती हैं कि पाठकों के लिए पहेली न होकर सहज अनुभूति का विषय हो जाता है। वे बताते हैं कि अपने लेखन में अहिल्या जी ने जहाँ एक ओर समाज की रूढ़ियों, अंधविश्वासों और पाखंडों आदि पर प्रहार किया है, वहीं दूसरी ओर वे आधुनिकता के नाम पर बढ़ती यांत्रिकता, कुंठा, हताशा, प्रतिस्पर्द्धा, नग्नता और अश्लीलता को कहीं भी स्वीकार नहीं करती हैं। 


दूसरे जौहरी प्रवीण प्रणव की निगाह में यह अधिक महत्वपूर्ण है कि जिन मुक्ताफलों की परख वे कर रहे हैं, वे परंपरा के लिहाज़ से किस कोटि के हैं। इसके लिए वे एक तरफ तो अहिल्या जी की रचनाओं को विभिन्न साहित्यिक विधाओं की ऐतिहासिक सरणि में रखकर देखते हैं तथा दूसरी तरफ इन्हें कालजयी एवं प्रतिष्ठित साहित्यकारों की प्रसिद्ध पंक्तियों के निकष पर कसकर देखते हैं। कहा जाता है कि कष्ट-कंटकों में पलने वाले सुमनों की सुगंध प्रायः दिगंतव्यापी होती है। इसी के अनुरूप प्रवीण प्रणव ने यह लक्षित किया है कि डॉ. अहिल्या मिश्र ने अपनी ओर फेंके गए पत्थरों से ही अपने लिए सफलता की सीढ़ियाँ बनाई हैं और एक बेहतरीन कवयित्री के रूप में अपनी पहचान स्थापित करते हुए न केवल राष्ट्रीय बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वयं को स्थापित किया है तथा अपनी कविताओं की सरल लेकिन प्रभावी विषयवस्तु से साहित्यप्रेमियों का ध्यान आकृष्ट किया है। वे मानते हैं कि सफलता के बाद भी अहिल्या जी अपने संघर्ष की स्वीकारोक्ति से परहेज़ नहीं करतीं और इस तरह नई पीढ़ी को यह मंत्र दे पाती हैं कि  सृजन के दर्द को सहे बिना सफलता के द्वार को छूना दुष्कर है। आलोचक ने यह भी रेखांकित किया है कि अहिल्या मिश्र को व्यक्तिगत जीवन में अनेक खट्टे-मीठे अनुभवों से गुज़रना पड़ा, कई आत्मीय रिश्तों और रिश्तेदारों ने ठेस पहुँचाई तो कई लोग ऐसे भी मिले जो अपने न होते हुए भी अपनों से बढ़कर निकले। कहना न होगा कि इन विविधवर्णी जीवनानुभवों ने ही अहिल्या जी के लेखन को गहरी विश्वसनीयता की चमक बख्शी है। 


नाटकों, कहानियों, निबंधों, संस्मरणों और कविताओं में, कमोबेश सभी विधाओं में, प्रवीण प्रणव को अहिल्या मिश्र का यह दु:ख व्याप्त दिखाई  देता है कि आज के समय में मानवता खून के रिश्तों की ऐसी छावनी बन गई है जिसमें अलगाव ने जगह-जगह पड़ाव डाल रखे हैं। उन्होंने बताया है कि अहिल्या जी इसीलिए बार-बार यह ध्यान दिलाती हैं कि संस्कारों का चेहरा बिगाड़ना आसान है और साथ ही सवाल भी उठाती हैं कि क्या संस्कारों का पुनर्गठन भी इतना ही सहज है। रिश्तों, संस्कारों और मूल्यों के प्रति विशेष आग्रह के कारण अहिल्या जी की रचनाएँ अनेक स्थलों पर शिक्षाप्रद और उपदेशात्मक मुद्रा भी ग्रहण कर लेती हैं। इसे पहचानने के साथ-साथ प्रवीण प्रणव ने उनकी रचनाओं में लोकजीवन की व्याप्ति और भावप्रवणता को रचनाकार की विशेष उपलब्धि माना है। दरअसल ये ही वे गुण हैं जो अहिल्या जी के लेखन को देशकाल की सीमाओं के परे उत्तरजीविता की शक्ति प्रदान करते हैं। 


कुल मिलाकर, ‘मुक्ता की परख’ विद्वान लेखक-द्वय की ओर से डॉ. अहिल्या मिश्र को उनके जन्मदिन पर सर्वथा योग्य अनमोल उपहार है। 


शुभकामनाओं सहित,

#ऋषभदेव_शर्मा

6 अगस्त, 2023