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मंगलवार, 29 अगस्त 2017

'हिंदी हैं हम विश्व मैत्री मंच': उद्घाटन समारोह : अध्यक्षीय



हैदराबाद : 27 अगस्त, 2017 ;
"हिंदी हैं हम विश्व मैत्री मंच" के उद्घाटन समारोह में अध्यक्षीय वक्तव्य : डॉ. ऋषभ देव शर्मा

शुक्रवार, 2 जून 2017

भाषा देश की चेतनाधारा को विकसित करती है




संकल्प, राजभाषा विशेषांक, 2016-17, अंक 18,
मिश्र धातु निगम लिमिटेड 
रक्षा मंत्रालय, कंचनबाग, हैदाराबद - 500008
पृष्ठ 25-29  

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

(पुस्तक) 'कथाकारों की दुनिया' : अनुक्रम

कथाकारों की दुनिया/ ऋषभदेव शर्मा 
I.S.B.N. : 978-81-7965-278-7
प्रथम संस्करण, 2017 
पृष्ठ 392, मूल्य : रु. 800
 तक्षशिला प्रकाशन, 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
दूरभाष : 011-43528469, 23258802
ईमेल : info@taxshilabooks.in, taxshilabooks@gmail.com

अनुक्रम 



दो शब्द 
अभिमत 
आशंसा 
आभार 

                 ∫∫ खंड 1∫∫ : हिंदी उपन्यासकारों की दुनिया 

1. प्रेमचंद की वर्तमानता : 'रंगभूमि' और 'गोदान'
2. प्रेमचंद की दुनिया में स्त्री 
3. जैनेंद्र की दुनिया और मनोविश्लेषण का दबाव 
4. सामंती अवशेषों की औपन्यासिक अभिव्यक्ति
5. आंचलिक उपन्यासों की दुनिया 
6. रामदरश मिश्र की दुनिया में मिथकीय संदर्भ
7. स्त्री-दोस्त पुरुष की संभावना : अनामिका के उपन्यास

           ∫∫ खंड 2 ∫∫ : रचना संदर्भ : हिंदी उपन्यास

1. समाज-समीक्षा और गांधी दर्शन : राम-रहीम
2. प्रगतिशील साहित्य का नमूना : बिल्लेसुर बकरिहा
3. समलैंगिक विमर्श : कुल्लीभाट
4. क्षण सनातन है : नदी के द्वीप
5. भारतमाता ग्रामवासिनी : मैला आँचल
6. आदिवासी समुदाय की व्यथा : कब तक पुकारूँ
7. समकालीन भारतीय जीवन का व्यंग्य चित्र : राग दरबारी
8. भ्रष्ट व्यवस्था की बाढ़ में प्रतिरोध की तलाश : जल टूटता हुआ
9. लोकतंत्र की हत्या का दस्तावेज : महाभोज
10. एक अपरिपक्व महास्वप्न : अपने अपने राम
11. वर्णव्यवस्था और जातिभेद के विरुद्ध : छप्पर
12. महावृत्तांतों के विघटन का यथार्थ : कलिकथा : वाया बाइपास
13. रजऊ से ऋतु तक स्वाधीनता संग्राम : कही ईसुरी फाग
14. मृत्यु के बहाने राग की परीक्षा : अपना पराया
15. विकिरण और विस्थापन से जूझते आदिवासी : मरंग गोडा नीलकंठ हुआ
16. भीरु पुरुषों से चिढ़ती हैं स्त्रियाँ : गणित 
17. सबकी शुभेच्छा : नीम की छाया 
18. युद्ध कथा के बहाने मनुष्यता के प्रश्न : जय! हिंद की सेना

             ∫∫ खंड 3 ∫∫ : हिंदी कहानीकारों की दुनिया 

1. कहानीकारों की दुनिया में गाँव 
2. कहानीकारों की दुनिया में बच्चे 
3. प्रेमचंद की दुनिया में क्रूर यथार्थ 
4. प्रेमचंद की भदेस भनिति : गुल्ली डंडा 
5. हाशिये की दुनिया और शिवप्रसाद सिंह
6. दलित कहानीकारों की दुनिया : अभिव्यक्ति का संदर्भ 
7. दलित कहानीकारों की दुनिया : मानवाधिकार का संदर्भ
8. इक्कीसवीं शताब्दी की कहानी और मनुष्य : वैश्वीकरण का यथार्थ 
9. इक्कीसवीं शताब्दी की कहानी : अंतर्यात्रा 

            ∫∫ खंड 4 ∫∫ : हिंदी लघुकथा साहित्य 

1. लघुकथा की दुनिया में लोकतंत्र : बलराम अग्रवाल
2. लघुकथा की दुनिया में अतिरंजना : सुकेश साहनी 

            ∫∫ खंड 5 ∫∫ : तेलुगु कथासाहित्य

1. सामाजिक विद्रूप और हास्य : बैरिस्टर पार्वतीशम
2. मिथक की परीक्षा : द्रौपदी 
3. सेरोगेट मदर : क्रतु
4. एड्स : इमारत के खंडहर 
5. पाँच लंबी कहानियाँ : खंजर और खंजन
6. तेलंगाना के किसानों की व्यथा : आक्रमण कब का हो चुका
7. तेलुगु समाज का दर्पण : लघुकथाएँ 

           ∫∫ खंड 6 ∫∫ : तमिल कथासाहित्य

1. तमिल कहानी : उद्भव और विकास

(पुस्तक) 'कथाकारों की दुनिया' : आशंसा

कथाकारों की दुनिया/ ऋषभदेव शर्मा 
I.S.B.N. : 978-81-7965-278-7
प्रथम संस्करण, 2017 
पृष्ठ 392, मूल्य : रु. 800
 तक्षशिला प्रकाशन, 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
दूरभाष : 011-43528469, 23258802
ईमेल : info@taxshilabooks.in, taxshilabooks@gmail.com

आशंसा

साहित्य का संसार अपार है - अपार संभावनाओं से भरा हुआ. ये अपार संभावनाएँ साहित्यकार के भीतर निहित होती हैं. इसीलिए लेखक साहित्य-जगत के प्रजापति होते हैं. प्रत्यक्ष जगत का अतिक्रमण करते हुए उनकी नवोन्मेषकारी प्रतिभा अपनी अपनी रुचि का संसार रचा करती है. खास बात यह है कि लेखकों का यह संसार शून्य में नहीं रचा जाता, बल्कि उपलब्ध दुनिया से प्राप्त अनुभवों, अनुभूतियों और संवेदनाओं के साथ लेखक की कल्पना के संयोग से जन्म लेता है. प्रो. ऋषभदेव शर्मा की आलोचना कृति ‘कथाकारों की दुनिया’ के मूल में यही विचार निहित है. 

कवि, समीक्षक और गद्यकार प्रो. ऋषभदेव शर्मा पच्चीस वर्ष से अधिक समय से उच्च स्तरीय भाषा और साहित्य संबंधी अध्यापन एवं शोध निर्देशन से जुड़े हुए हैं. साहित्य की विभिन्न विधाओं के विश्लेषण और मूल्यांकन पर केंद्रित उनके अनेक समीक्षात्मक आलेख एवं शोधपत्र प्रकाशित हैं. काव्य, काव्य समीक्षा, अनुवाद चिंतन और भाषा चिंतन पर उनके मौलिक और संपादित ग्रंथ सुधी पाठकों द्वारा खूब सराहे गए हैं. अब ‘कथाकारों की दुनिया’ के माध्यम से उनका कथा चिंतक रूप समग्रतः सामने आ रहा है. 

‘कथाकारों की दुनिया’ में हिंदी कहानी और उपन्यास साहित्य के विशिष्ट हस्ताक्षरों और उनकी दुनिया का तो विवेचन-विश्लेषण है ही, कुछ प्रमुख तेलुगु कथाकारों की दुनिया की भी एक झाँकी प्रस्तुत की गई है. इसके अलावा तमिल कहानी साहित्य के उद्भव और विकास का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने के बहाने आलोचक ने तमिल कथाकारों की दुनिया की भी एक झलक प्रस्तुत की है. इस तरह इस ग्रंथ में हिंदी, तेलुगु और तमिल के मध्य राष्ट्रभाषा के माध्यम से सेतु-रचना का भी स्तुत्य कार्य किया गया है. 

प्रेमचंद ने अपने कथासाहित्य के माध्यम से आदर्शोन्मुख यथार्थ से प्रेरित अपनी दुनिया रची. उनकी इस दुनिया में गाँव और किसान तो हैं ही, अपने समय को चुनौती देती हुईं स्त्रियाँ भी हैं. प्रेमचंद जहाँ एक ओर जिजीविषा और संघर्ष की दुनिया रचते हैं वहीं दूसरी ओर फक्कड़पने से लेकर अमानुषिकता तक के अलग-अलग लोक भी निर्मित करते हैं. जैनेंद्र अपनी दुनिया मनोविश्लेषण के ताने-बाने से बुनते हैं तो अज्ञेय क्षणों के सहारे निजता के द्वीप उगाते हैं. नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, शिवप्रसाद सिंह और रामदरश मिश्र की दुनिया गाँवों और अंचलों की वह दुनिया है जिसकी यातना अनंत है और जिजीविषा असीम. निराला प्रगतिशीलता से लेकर किन्नर और समलैंगिक विमर्श तक की पहली ईंटें रखते हैं तो रांगेय राघव, श्रीलाल शुक्ल, मन्नू भंडारी और भगवान सिंह क्रमशः आदिवासी विमर्श, सत्ता विमर्श, लोकतंत्र विमर्श और जनवाद की शिलाओं से अपनी अपनी दुनिया बनाते हैं. अनामिका, मैत्रेयी पुष्पा, अलका सरावगी, महुआ माजी और अहिल्या मिश्र जैसी लेखिकाएँ स्त्री विमर्श की भींतों पर अपनी दुनिया खड़ी करती हैं तो ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश कर्दम, श्योराजसिंह बेचैन और मुद्राराक्षस जैसे कथाकार दलितों की अधिकार चेतना और अंबेडकरवाद के सहारे अपनी नई दुनिया का निर्माण करते हैं. बलराम अग्रवाल और सुकेश साहनी अपनी लघुकथाओं में जिस संसार की रचना करते हैं उसके एक सिरे पर लोक और लोकतंत्र है तो दूसरे सिरे पर अतिरंजना और महास्वप्न. अभिप्राय यह है कि अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से हर संवेदनशील कथाकार अपनी रुचि के अनुसार अपनी समानांतर दुनिया का सृजन करता है. प्रस्तुत ग्रंथ में हिंदी के प्रमुख कथाकारों द्वारा रची गई उनकी इसी अपनी दुनिया की प्रामाणिक पड़ताल की गई है. 

बहुत सी कथा कृतियाँ अपनी निजी दुनिया के कारण देश-कालांतरगामी महत्व प्राप्त कर लेती हैं. ’रंगभूमि’, ‘गोदान’, ‘राम-रहीम’, ‘बिल्लेसुर बकरिहा’, ‘कुल्ली भाट’, ‘नदी के द्वीप’, ‘मैला आंचल’, ‘कब तक पुकारूँ’, ‘रागदरबारी’, ‘जल टूटता हुआ’, ‘महाभोज’, ‘अपने-अपने राम’, ‘छप्पर’, ‘कलिकथा : वाया बाईपास’, ‘कही ईसुरी फाग’, ‘अपना पराया’, मरंग गोडा नीलकंठ हुआ’, ‘गणित’, ‘नीम की छाया’, ‘त्रिकाल संध्या’, ‘जय! हिंद की सेना’ जैसे उपन्यास और ‘गुल्लीडंडा’, ‘पूस की रात’, ‘सद्गति’, ‘कफन’, ‘कर्मनाशा की हार’ आदि कहानियाँ कभी उस दुनिया का पता देती हैं जो कथाकार को बनी बनाई मिली है तो कभी उस दुनिया की ओर इशारा करती हैं जिसे कथाकार बनाना चाहता है. आलोचक ने इन दोनों ही दुनियाओं का अच्छे से खुलासा किया है. 

मुझे आशा ही नहीं, बल्कि दृढ़ विश्वास है कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की इस आलोचना कृति को सुधी पाठकों का भरपूर स्नेह और आशीर्वाद मिलेगा. इस ग्रंथ के लिए ‘आशंसा’ लिखना मैं अपना परम सौभाग्य मानती हूँ. 

14 मई, 2016 
                                                                                                               
                                                                                                                 - गुर्रमकोंडा नीरजा 
                                                                                                           उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, 
                                                                                                            दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, 
                                                                                                                  हैदराबाद – 500004. 

(पुस्तक) 'कथाकारों की दुनिया' :अभिमत

कथाकारों की दुनिया/ ऋषभदेव शर्मा 
I.S.B.N. : 978-81-7965-278-7
प्रथम संस्करण, 2017 
पृष्ठ 392, मूल्य : रु. 800
 तक्षशिला प्रकाशन, 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
दूरभाष : 011-43528469, 23258802
ईमेल : info@taxshilabooks.in, taxshilabooks@gmail.com

अभिमत 

कवि,समीक्षक, समालोचक, भाषाविद और साहित्य की अन्यान्य विधाओं के गंभीर अध्येता डॉ. ऋषभदेव शर्मा की अद्यतन कृति ‘कथाकारों की दुनिया’ उनके साहित्य चिंतन की निर्विराम साधना का प्रामाणिक साक्ष्य है. साहित्यान्वेषण की व्याकुलता उनकी सृजन शक्ति का मूल स्रोत है। साहित्य विमर्श के नित नूतन संदर्भों का अनुसंधान ही उनके सतत अध्ययनशील मानस की ऊर्जा है। प्रस्तुत कृति ‘कथाकारों की दुनिया’ लेखक की हिंदी और भारतीय कथा-साहित्य के प्रति एक विशेष शोधपरक दृष्टि को उद्घाटित करती है ।

डॉ. ऋषभदेव शर्मा हिंदी साहित्य जगत में काव्य विमर्श की पुरोगामी और प्रगतिशील दृष्टि के लिए विशेष रूप से समादृत हैं। उनके साहित्य विमर्श की विशेषता उनकी विविधोन्मुखी पाठानुसंधान की प्रवृत्ति में निहित है। हिंदी के साथ साथ इतर भारतीय भाषाओं के साहित्य पाठ को अनुवाद के माध्यम से आत्मसात कर रचना के तल में छिपे वैशिष्ट्य को उद्घाटित करने की नैपुण्यता उन्होंने हासिल की है। गद्य और पद्य दोनों प्रारूपों में रचित लगभग सभी विधाओं के वे विशद अध्येता हैं। उन्होंने प्रत्येक पठित कृति के प्रति सजग विश्लेषक की ख्याति अर्जित की है। साहित्य विमर्श लेखन में उनकी निरंतरता और सातत्य, साहित्य के अध्येताओं को अचंभित कर देती है। हिंदी के साथ तेलुगु और तमिल साहित्य की गद्य विधाओं के प्रति लेखक की आसक्ति गौरतलब है। भारतीय भाषाओं की साहित्य विधाओं के प्रति उनकी सहज संवेदना, भारतीय साहित्य की मूलभूत एकता को रेखांकित करती है। लेखक ने प्रस्तुत ग्रंथ में संकलित अपने आलेखों से इस सत्य की पुष्टि की है कि हिंदी और इतर भारतीय भाषाओं में रचित गद्य और पद्य को अनुवाद के माध्यम से आत्मसात करना कठिन या दुष्कर उद्यम नहीं है। 

प्रस्तुत ग्रंथ में 44 वैचारिक आलेख छह खंडों में संकलित हैं। प्रत्येक खंड का शीर्षक उस खंड के अंतर्गत सँजोए गए आलेखों की विषयवस्तु का परिचायक है। प्रथम खंड मे प्रेमचंद, जैनेंद्र, रेणु, रामदरश मिश्र और अनामिका जैसे हिंदी के मूर्धन्य उपन्यासकारों की रचनाओं के प्रतिपाद्य को विश्लेषित किया गया है। इन आलेखों में लेखक की नवीन आलोचना दृष्टि से पाठक परिचित होता है। ‘प्रेमचंद की वर्तमानता : रंगभूमि और गोदान’ शीर्षक आलेख इन उपन्यासों की प्रासंगिकता को वर्तमान संदर्भ में दर्शाता है। प्रेमचंद की रचना दृष्टि और उनकी दूरदर्शिता का रेखांकन, इस आलेख की विशिष्टता है। उसी प्रकार अनामिका के उपन्यास, समकालीन हिंदी उपन्यास साहित्य में स्त्री-चेतना को भिन्न दृष्टि से व्याख्यायित करते हैं जिसे लेखक ने अपने आलेख में नवीन दृष्टिकोण से विवेचित किया है। 

ग्रंथ के द्वितीय खंड ‘हिंदी उपन्यास : रचना संदर्भ’ के अंतर्गत लेखक ने लीक से हटकर ऐसे उपन्यासों का चयन किया है जो या तो अचर्चित हैं या आलोचकों की दृष्टि से उपेक्षित रहे हैं। चयनित उपन्यासों में रचना के विविध संदर्भों की व्याख्या भिन्न मानदंडों के आधार की गई है जो कि महत्वपूर्ण है। राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह कृत ‘राम-रहीम’ (समाज-समीक्षा और गांधी दर्शन), अज्ञेय कृत ‘नदी के द्वीप ‘ में अस्तित्ववादी दर्शन (क्षण सनातन है), निराला कृत कुल्लीभाट में समलैंगिक विमर्श, रेणु कृत ‘मैला आँचल’ में भारत की ग्रामवासिनी संस्कृति का विश्लेषण, रांगेय राघव कृत ‘कब तक पुकारूँ ‘ में आदिवासी विमर्श, श्रीलाल शुक्ल कृत ‘राग दरबारी’ में चित्रित राजनीतिक व्यंग्य, आपातकाल के संदर्भ में मन्नू भंडारी द्वारा रचित उपन्यास ‘महाभोज’ जिसने राजनीतिक चेतना-प्रधान उपन्यासों का व्याकरण ही बदल दिया, कि पड़ताल – इस खंड के विशिष्ट आलेख है। ऐसे उपन्यासों पर विचार कर, लेखक ने प्रस्तुत ग्रंथ में अध्ययन के नए मानकों को स्थापित किया है और हिंदी कथा-साहित्य के अध्येताओं के लिए चिंतन की नई दिशा प्रदान की है। इसी क्रम में अलका सरावगी कृत ‘कलिकथा : वाया बाइपास’ के कथ्य एवं प्रतिपाद्य के प्रति लेखक की आलोचकीय दृष्टि अनेक नए बिंदुओं को उद्घाटित करती है। 

इधर पिछले दशकों में भारतीय साहित्य में प्रतिरोध की संस्कृति बहुत तेजी से विकसित हुई है। सत्ता, व्यवस्था एवं स्थापित मूल्यों, स्वीकृत मान्यताओं एवं नैतिक मूल्यों के प्रति नई पीढ़ी में प्रतिरोध के स्वर तीव्र हुए हैं। आदिवासी विमर्श, नारी विमर्श, दलित विमर्श और अल्पसंख्यक विमर्श जैसे सैद्धांतिक वाद-प्रतिवाद के अनेक मत-अभिमत साहित्य विमर्श के अहाते में अपनी जगह तलाश रहे हैं। इस कारण प्रस्तुत ग्रंथ के लेखक भी स्थापित मानदंडों के बरक्स नए सिरे से चयनित उपन्यासों का पुनर्पाठ करते हैं। लेखक ने इस खंड में समकालीन परिदृश्य में रचित हिंदी कथा साहित्य के जटिल शिल्प एवं कथ्य पर ध्यान केंद्रित किया है। मैत्रेयी पुष्पा कृत ‘कही ईसुरी फाग’ लोकतत्व और आंचलिक परिवेश में रचित चरित्र प्रधान उपन्यास है जिसके प्रति लेखक विशेष संवेदनशील है। विकिरण और विस्थापन से जूझते आदिवासी समुदायों की विवशता का जो चित्रण महुआ माजी ने अपने उपन्यास  ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ में किया है, इसे लेखक ने अपनी विशेष शैली में विश्लेषित किया है। 

स्तुत ग्रंथ का तीसरा खंड ‘हिंदी कहानीकारों की दुनिया’ शीर्षक से नौ विशिष्ट आलेखों का संग्रह है। हिंदी कहानियों में वर्णित ग्रामीण जीवन, प्रेमचंद युगीन कहानियों का मूल स्वर रहा है जिसे लेखक ने इस खंड के प्रारभिक लेखों में विश्लेषित किया है। समकालीन हिंदी कहानी मुख्यत: दलित विमर्श और स्त्री विमर्श के इर्दगिर्द ही रूपायित होती रही है जिसे लेखक ने चयनित कहानियों के माध्यम से इस खंड में विश्लेषित किया है। दलित कहानीकारों की रचनाओं में मूलत: मानवाधिकारों का प्रश्न निरंतर उठता रहा है, इसकी ओर भी बलपूर्वक लेखक ने ध्यान आकर्षित किया है। हिंदी कहानी का समकालीन परिदृश्य दलित लेखन और दलित विमर्श प्रधान है जिसे लेखक ने प्रस्तुत ग्रंथ में रेखांकित किया है। इसके साथ ही इक्कीसवीं सदी की कहानी का आकलन भी लेखन ने प्रस्तुत किया है जो कि समकालीन हिंदी कहानी के गंभीर अध्येताओं के लिए अकादमिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

ग्रंथ का चौथा खंड दो आलेखों का लघु-खंड है जिसमें लघु कथा साहित्य पर लेखक ने समुचित प्रकाश डाला है। लेखक ने अनुवाद के माध्यम से तेलुगु और तमिल कथा साहित्य का अध्ययन पूरे मनोयोग से किया है जो ग्रंथ के खंड-पाँच और छह में प्रस्तुत उनके समालोचकीय आलेखों से सिद्ध होता है। तेलुगु कथा-साहित्य के प्रति लेखक की विशेष अभिरुचि ने उन्हें न केवल तेलुगु के कतिपय महत्वपूर्ण लेखकों की कृतियों को अनुवाद के माध्यम से समझने का अवसर प्रदान किया बल्कि उन्हें इन कृतियों के माध्यम से तेलुगु समाज और संस्कृति से रूबरू होने का अवसर प्राप्त हुआ। लेखक ने हिंदी में अनूदित तेलुगु कथा-कृतियों की समीक्षा बेबाकी और पूर्वाग्रहरहित होकर की है, जिससे हिंदी पाठक वर्ग के लिए उन कृतियों के प्रति यथार्थपूर्ण दृष्टि विकसित होगी। ‘बैरिस्टर पार्वशीतम’ तेलुगु कथा-साहित्य की हास्य-व्यंग्य प्रधान औपन्यासिक कृति है जिसे लेखक ने भलीभाँति परखकर आलोचना की है। उसी क्रम में तेलुगु की कुछ अन्य अनूदित कृतियों पर भी लेखक ने विचार किया है जैसे, द्रौपदी, क्रतु, एड्स आदि। तेलुगु की कुछ लघु कथाओं को भी लेखक ने अध्ययन का विषय बनाया है जो कि सराहनीय है। लेखक की वैचारिकता में स्थानीय तत्व का समावेश, इतर भाषा साहित्य के प्रति उनकी आस्था और प्रतिबद्धता का सूचक है। इसका साक्ष्य उनके द्वारा तेलंगाना के किसानों की व्यथा को चित्रित करने वाली कहानियों का अध्ययन एवं समीक्षा है। 

किसी भी साहित्य चिंतक के लिए स्थानिकताबोध एक आवश्यक सामाजिक दायित्व होता है जिसके प्रति डॉ. ऋषभदेव शर्मा सदैव जागरूक और प्रतिबद्ध रहे हैं। यह उनके साहित्य चिंतन का प्राण तत्व और अभिन्न अंग रहा है। स्थानीय उदीयमान लेखकों एवं कवियों के प्रति उनमें सदैव सकारात्मक प्रेरणादायक भाव विद्यमान रहे हैं। हिंदी एवं इतर भारतीय भाषा-साहित्य के मध्य अनुवाद सेतु के निर्माण में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। वे प्रादेशिक और प्रांतीय तत्वों से ऊपर उठकर समेकित भारतीय साहित्य के समावेशी स्वरूप को अपनी संपूर्ण भौतिक और मानसिक शक्तियों से सुदृढ़ करने के लिए कृतसंकल्प हैं। दक्षिण में निवास करते हुए, तेलुगु, तमिल, कन्नड तथा मलयालम साहित्य के प्रति लेखक की विशेष आसक्ति रही है जिसे उन्होंने अनुवाद के माध्यम से साधने का प्रयास किया है। इसी प्रयास को लेखक ग्रंथ के अंतिम आलेख ( खंड छह ) ‘तमिल कहानी : उद्भव और विकास’ में सिद्ध करते हैं। स्मरणीय है कि डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने चेन्नई में रहने की अवधि के दौरान दो लघुपत्रिकाओं ‘आदर्श कौमुदी’ और ‘कर्णवती’ के तमिल साहित्य संबंधी विशेषांकों का संपादन किया था। उसी समय उन्हें तमिल कहानी के इतिहास को निकट से जानने-समझने का अवसर मिला। हिंदी पाठकों के लिए तमिल कहानी के प्रारंभ और उसके उत्तरोत्तर विकास क्रम को अति संक्षेप में लेखक ने इस आलेख में प्रस्तुत किया है जो कि किसी भी हिंदी पाठक को तमिल कहानी साहित्य का समुचित परिचय उपलब्ध कराने में सहायक होगा । 

हिंदी, तेलुगु और तमिल कथा साहित्य के प्रति लेखक की अभिरुचि प्रस्तुत ग्रंथ से स्वत: सिद्ध होती है । प्रस्तुत ग्रंथ इस सत्य को प्रमाणित करता है कि डॉ. ऋषभदेव शर्मा बहुमुखी प्रतिभासंपन्न और मेधावी साहित्य एवं भाषा चिंतक हैं। भारतीय भाषाओं और साहित्य की भीतरी परतों को अनावृत्त कर उन्हें साहित्य के अध्येताओं को उपलब्ध कराने की उनकी ललक प्रशंसनीय है। वे एक प्रखर शब्द-चिंतक और रचनाकर्मी हैं जिन्होंने भाषा और प्रांत की सीमाओं को भेदकर भारतीय साहित्य को संपूर्णता के साथ आत्मसात किया है। 

‘कथाकारों की दुनिया’ ग्रंथ साहित्य के शोधकर्ताओं के लिए अकादमिक महत्व का तो है ही, साथ ही हिंदी कथा साहित्य के अध्येताओं के लिए यह हिंदी कथा-साहित्य के अनछुए पहलुओं की ओर गैर-पारंपरिक विचारदृष्टि विकसित करने में सहायक सिद्ध होगा। आधुनिक साहित्य विधाओं में उपन्यास, साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है जिसका समाजशास्त्रीय महत्व निर्विवाद है। इस दृष्टि से प्रस्तुत ग्रंथ की प्रयोजनीयता अक्षुण्ण है। भारतीय कथा साहित्य के समालोचनात्मक ग्रंथों की परंपरा को प्रस्तुत ग्रंथ निश्चित रूप से समृद्ध करेगा। डॉ. ऋषभदेव शर्मा ‘कथाकारों की दुनिया’ ग्रंथ की रचना के लिए बधाई एवं अभिनंदन के पात्र हैं । उन्हें मैं उनके इस नूतन प्रयास और प्रस्तुति के लिए शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ। 

                                                                                                                
26 मई, 2016                                                                                
                                                                                                               - डॉ. एम. वेंकटेश्वर 
                                                                                                           पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष 
                                                                                                    हिंदी एवं भारत अध्ययन विभाग, 
                                                                                               अंग्रेजी एवं अंग्रेजी भाषा विश्वविद्यालय, 
                                                                                                                    हैदराबाद । 

(पुस्तक) 'कथाकारों की दुनिया' : दो शब्द

कथाकारों की दुनिया/ ऋषभदेव शर्मा 
I.S.B.N. : 978-81-7965-278-7
प्रथम संस्करण, 2017 
पृष्ठ 392, मूल्य : रु. 800
 तक्षशिला प्रकाशन, 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
दूरभाष : 011-43528469, 23258802
ईमेल : info@taxshilabooks.in, taxshilabooks@gmail.com

दो शब्द

‘कथाकारों की दुनिया’ के लेखक की मान्यता है कि एक दुनिया कथाकार को मिलती है, जिस पर उसका कोई वश नहीं होता और एक दुनिया वह रचता है, जिस पर उसका शासन चलता है. उसे मिली हुई दुनिया दरअसल उस पर थोप दी गई होती है और उसे उसका एक टुकड़ा बना दिया गया होता है. जो दुनिया वह खुद निर्मित करता है, उसके नदी-नालों, खेत-जंगलों, बस्तियों-शहरों, उनमें रहने वाले लोगों के बारे में सारे निर्णय उसी के होते हैं. क़ानून व्यवस्था, लड़ाई-झगड़े, शांति-अशांति, अपराध-आंदोलन, न्याय-नियम, परिवार-समाज, दोस्ती-दुश्मनी, नैतिकता-अनैतिकता, रिश्ते-नाते, संवाद-संवादहीनता, भाषा के उचित-अनुचित प्रयोग आदि जो कुछ भी ज़रूरी है, उसे लेखक अपनी दुनिया के लिए अपने ढंग से तय करता है.

अगर इस अवधारणा को पूरा का पूरा सही मान लिया जाए, तो यह भी मानना होगा कि सामान्य लोगों की दुनिया और लेखक की दुनिया के बीच ढेर सारे अंतर्विरोध होंगे. भौगोलिक दशाओं और द्वंद्वात्मक स्थितियों से लेकर नागरिकों के व्यवहार तक में इन अंतर्विरोधों का वास होगा. तब सवाल है कि आलोचक किसी लेखक की कृति में कौन सी दुनिया की खोज करता है वह उसमें साधारण लोगों की दुनिया खोजता है या फिर रचना में लेखक की ही दुनिया की तलाश करता है अगर उसकी जिद है कि वह किसी रचना में साधारण दुनिया खोजता है, तो कोई लेखक उसके लिए अपने दरवाजे बंद कर सकता है ऐसे व्यवहार के औचित्य के लिए लेखक के पास यह दावा हो सकता है कि उसने जो दुनिया रची है, वह अपनी अवधारणा और उसमें रच-बस सकने वाले अपने नागरिकों के आधार पर टिकी है इसे लेखक की दुनिया के एक तार्किक आधार के रूप में ग्रहण भी किया जा सकता है इस आधार पर लेखक एक आलोचक के लिए यह चुनौती खड़ी कर सकता है कि वह किसी रचना में उस दुनिया की तलाश करे, जिसकी वास्तव में रचना की गई है. 

यहाँ एक संकट यह है कि लेखक स्वयं उस दुनिया का निवासी नहीं है, जो उसने रची हैं. वह उस दुनिया का सामान्य (या विशिष्ट) नागरिक है, जो वस्तुत: साधारण लोगों की दुनिया है. इससे भी आगे उसने जो दुनिया रची है, वह साधारण दुनिया के परिप्रेक्ष्य में ही रची है. यह अवश्य है कि यह परिप्रेक्ष्य सामान्य न होकर बहुत जटिल है, क्योंकि इसके मूल में साधारण दुनिया की सचाई सामने लाने या उस दुनिया को प्रभावित करने या बदल डालने के दावे होते हैं. यहाँ आलोचक के सामने और भी बड़ी चुनौती आ खड़ी होती है. क्योंकि उसे अपने आलोचना कर्म के हथियारों से उस दुनिया का दरवाजा भी खोलना होता है, जिसकी चाबी सिर्फ लेखक के पास है (कारण यह कि अपनी दुनिया की रचना प्रक्रिया केवल लेखक को ही पता होती है, आलोचक को नहीं) और लेखक की दुनिया का मूल्यांकन साधारण दुनिया के परिप्रेक्ष्य में भी करना होता है. यहाँ संकट यह है कि इस परिप्रेक्ष्य का दावा लेखक ने किया था, आलोचक ने नहीं, इसलिए उसकी सही-सही समझ केवल लेखक को ही हो सकती है, आलोचक अपने उपकरणों के सहारे लेखक की समझ के निकट पहुँचने की कोशिश भर कर सकता है.

यह परिस्थिति आलोचना-कर्म को अत्यधिक जटिल और संश्लिष्ट बनाती है तथा आलोचक को विश्लेषक के साथ रचनाकार की भूमिका में ला खड़ा करती है. प्रो. ऋषभदेव शर्मा अपनी इस नवीनतम कृति में दोनों ही रूपों में नज़र आते हैं. मेरी शुभकामनाएँ!
11 मई, 2016                                                                                                    

                                                                         - देवराज
                                                                 पूर्व अधिष्ठाता,
                                      अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ,
               महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,
                           गांधी हिल्स, वर्धा – 422005 (महारष्ट्र).

(पुस्तक) 'कथाकारों की दुनिया' : डॉ. ऋषभदेव शर्मा

कथाकारों की दुनिया/ ऋषभदेव शर्मा 
I.S.B.N. : 978-81-7965-278-7
प्रथम संस्करण, 2017 
पृष्ठ 392, मूल्य : रु. 800
 तक्षशिला प्रकाशन, 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
दूरभाष : 011-43528469, 23258802
ईमेल : info@taxshilabooks.in, taxshilabooks@gmail.com


पुस्तक के बारे में 

‘कथाकारों की दुनिया’ के लेखक की मान्यता है कि एक दुनिया कथाकार को मिलती है, जिस पर उसका कोई वश नहीं होता और एक दुनिया वह रचता है, जिस पर उसका शासन चलता है. उसे मिली हुई दुनिया दरअसल उस पर थोप दी गई होती है और उसे उसका एक टुकड़ा बना दिया गया होता है. जो दुनिया वह खुद निर्मित करता है, उसके नदी-नालों, खेत-जंगलों, बस्तियों-शहरों, उनमें रहने वाले लोगों के बारे में सारे निर्णय उसी के होते हैं. क़ानून व्यवस्था, लड़ाई-झगड़े, शांति-अशांति, अपराध-आंदोलन, न्याय-नियम, परिवार-समाज, दोस्ती-दुश्मनी, नैतिकता-अनैतिकता, रिश्ते-नाते, संवाद-संवादहीनता, भाषा के उचित-अनुचित प्रयोग आदि जो कुछ भी ज़रूरी है, उसे लेखक अपनी दुनिया के लिए अपने ढंग से तय करता है. 

इस आधार पर लेखक एक आलोचक के लिए यह चुनौती खड़ी कर सकता है कि वह किसी रचना में उस दुनिया की तलाश करे, जिसकी वास्तव में रचना की गई है. यह परिस्थिति आलोचना-कर्म को अत्यधिक जटिल और संश्लिष्ट बनाती है तथा आलोचक को विश्लेषक के साथ रचनाकार की भूमिका में ला खड़ा करती है. प्रो. ऋषभदेव शर्मा अपनी इस आलोचना-कृति में दोनों ही रूपों में नज़र आते हैं. 

प्रेमचंद ने अपने कथासाहित्य के माध्यम से आदर्शोन्मुख यथार्थ से प्रेरित अपनी दुनिया रची. उनकी इस दुनिया में गाँव और किसान तो हैं ही, अपने समय को चुनौती देती हुईं स्त्रियाँ भी हैं. प्रेमचंद जहाँ एक ओर जिजीविषा और संघर्ष की दुनिया रचते हैं वहीं दूसरी ओर फक्कड़पने से लेकर अमानुषिकता तक के अलग-अलग लोक भी निर्मित करते हैं. जैनेंद्र अपनी दुनिया मनोविश्लेषण के ताने-बाने से बुनते हैं तो अज्ञेय क्षणों के सहारे निजता के द्वीप उगाते हैं. नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, शिवप्रसाद सिंह और रामदरश मिश्र की दुनिया गाँवों और अंचलों की वह दुनिया है जिसकी यातना अनंत है और जिजीविषा असीम. निराला प्रगतिशीलता से लेकर किन्नर और समलैंगिक विमर्श तक की पहली ईंटें रखते हैं तो रांगेय राघव, श्रीलाल शुक्ल, मन्नू भंडारी और भगवान सिंह क्रमशः आदिवासी विमर्श, सत्ता विमर्श, लोकतंत्र विमर्श और जनवाद की शिलाओं से अपनी अपनी दुनिया बनाते हैं. अनामिका, मैत्रेयी पुष्पा, अलका सरावगी, महुआ माजी और अहिल्या मिश्र जैसी लेखिकाएँ स्त्री विमर्श की भींतों पर अपनी दुनिया खड़ी करती हैं तो ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश कर्दम, श्योराजसिंह बेचैन और मुद्राराक्षस जैसे कथाकार दलितों की अधिकार चेतना और अंबेडकरवाद के सहारे अपनी नई दुनिया का निर्माण करते हैं. बलराम अग्रवाल और सुकेश साहनी अपनी लघुकथाओं में जिस संसार की रचना करते हैं उसके एक सिरे पर लोक और लोकतंत्र है तो दूसरे सिरे पर अतिरंजना और महास्वप्न. अभिप्राय यह है कि अपनी कथा-रचना के माध्यम से हर संवेदनशील कथाकार अपनी रुचि के अनुसार अपनी समानांतर दुनिया का सृजन करता है. 

प्रस्तुत ग्रंथ में हिंदी के प्रमुख कथाकारों द्वारा रची गई उनकी इसी अपनी दुनिया की प्रामाणिक पड़ताल की गई है और यह दर्शाया गया है कि बहुत सी कथा कृतियाँ अपनी निजी दुनिया के कारण देश-कालांतरगामी महत्व प्राप्त कर लेती हैं. यह ग्रंथ कभी उस दुनिया का पता देता है जो कथाकार को बनी बनाई मिली है तो कभी उस दुनिया की ओर इशारा करता है जिसे कथाकार बनाना चाहता है. 

‘कथाकारों की दुनिया’ में हिंदी के अलावा कुछ प्रमुख तेलुगु कथाकारों की दुनिया की भी एक झाँकी प्रस्तुत है. साथ ही, तमिल कहानी साहित्य के उद्भव और विकास का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने के बहाने तमिल कथाकारों की दुनिया की भी एक झलक उपस्थित है. इस तरह इस ग्रंथ में हिंदी, तेलुगु और तमिल के मध्य राष्ट्रभाषा के माध्यम से सेतु-रचना का भी स्तुत्य कार्य किया गया है. 


लेखक के बारे में 

डॉ. ऋषभ देव शर्मा 

जन्म : 04 जुलाई 1957, ग्राम गंगधाड़ी, जिला मुजफ्फर नगर, उत्तर प्रदेश. 

शिक्षा : एमए (हिंदी), पीएचडी (उन्नीस सौ सत्तर के पश्चात की हिंदी कविता का अनुशीलन). 

कार्य : 1983-1990 : जम्मू और कश्मीर राज्य में गुप्तचर अधिकारी (इंटेलीजेंस ब्यूरो, भारत सरकार). 1990-2015 : उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के विभिन्न केंद्रों में अध्यापन एवं शोध निर्देशन. 4 जुलाई, 2015 को उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के हैदराबाद केंद्र के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष पद से अवकाशप्राप्त. 

संप्रति : स्वतंत्र लेखन. 

प्रकाशन : काव्य संग्रह – तेवरी (1982), तरकश (1996), ताकि सनद रहे (2002), देहरी (स्त्रीपक्षीय कविताएँ, 2011), प्रेम बना रहे (2012) [तेलुगु काव्यानुवाद : प्रेमा इला सागिपोनी (2013), प्रिये चारुशीले (2013)], सूँ साँ माणस गंध (2013), धूप ने कविता लिखी है (2014). 

आलोचना - तेवरी चर्चा (1987), हिंदी कविता : आठवाँ नवाँ दशक (1994), साहित्येतर हिंदी अनुवाद विमर्श (2000), कविता का समकाल (2011), तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ (2013), तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय (2015), हिंदी भाषा के बढ़ते कदम (2015), कविता के पक्ष में (2016), कथाकारों की दुनिया (2016). 

संपादन : पदचिह्न बोलते हैं (1982) , शिखर-शिखर (डॉ.जवाहर सिंह अभिनंदन ग्रंथ, 1994), कच्ची मिट्टी – 2 (1994), माता कुसुमकुमारी हिंदीतरभाषी हिंदी साधक सम्मान : अतीत एवं संभावनाएँ (1996), अभिनंदन : जनकवि दुलीचंद शशि, हैं सरहदें बुला रहीं (2000), भारतीय भाषा पत्रकारिता (2000), अनुवाद : नई पीठिका, नए संदर्भ (2003), हिंदी कृषक (काजाजी अभिनंदन ग्रंथ, 2005), पुष्पक – 3 (2003), पुष्पक – 4 (2004), स्त्री सशक्तीकरण के विविध आयाम (2004), प्रेमचंद की भाषाई चेतना (2006), अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य (1999, 2009), भाषा की भीतरी परतें : भाषाचिंतक प्रो.दिलीप सिंह अभिनंदन ग्रंथ (2012), मेरी आवाज (2014), उत्तरआधुनिकता : साहित्य और मीडिया (2015) , संकल्पना (2016), वृद्धावस्था विमर्श (2016), ‘अंधेरे में’ का पुनर्पाठ (2016). 

मूलतः कवि. 1981 में तेवरी काव्यांदोलन (आक्रोश की कविता) का प्रवर्तन. हिंदी के प्रचार-प्रसार-अध्ययन-अध्यापन हेतु पूर्णत: समर्पित. अनेक शोधपरक समीक्षाएँ एवं शोधपत्र प्रकाशित. डीलिट, पीएचडी और एमफिल के 142 शोधकार्यों का निर्देशन. सौ से अधिक पुस्तकों के लिए भूमिका लेखन. 

सम्मान : 

वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक ट्रस्ट, हैदराबाद द्वारा ‘हिंदी साहित्य सम्मान’ (2015), तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी, चेन्नई द्वारा ‘जीवनोपलब्धि सम्मान’ (2015), प्रतिभा प्रकाशन, हैदराबाद द्वारा ‘सुगुणा स्मारक सम्मान’ (2015), कमला गोइन्का फाउण्डेशन, बैंगलोर द्वारा ‘रमादेवी गोइन्का हिंदी साहित्य सम्मान’(2013), जनजागृति सेवा सद्भावना पुरस्कार, हैदराबाद (2011), शिक्षा शिरोमणि पुरस्कार, हैदराबाद (2006), रामेश्वर शुक्ल अंचल सम्मान, जबलपुर (2002). 

विशेष : ऋषभदेव शर्मा का कविकर्म (2015 : डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह द्वारा समग्र काव्य का विमर्श मूलक मूल्यांकन) 

संपर्क : 208 ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद – 500013 (तेलंगाना). फोन : 08121435033, 040-42102132 

ईमेल : rishabhadeosharma@yahoo.com, rishabhadsharma@gmail.com


आभार

मुझे लगता है कि यदि कोई लेखक निश्चिंत और निर्द्वंद्व होकर कुछ लिख पाता है तो ऐसा तभी संभव है जब उसे परिवार और परिवेश का समर्थन प्राप्त हो. मैं बचपन से आज तक जो भी लिख पाया हूँ, घर से मिले प्रोत्साहन की उसमें बड़ी भूमिका रही है. ‘कथाकारों की दुनिया’ कभी न रची जाती, अगर मेरे जैसे व्यावहारिक बुद्धि से हीन और प्रमादी व्यक्ति को घर-परिवार का संबल न मिला होता. मेरे दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा से सेवानिवृत्त होने पर श्रीमती जी (डॉ.. पूर्णिमा शर्मा), बिटिया (लिपि भारद्वाज) और बेटे (कुमार लव) ने आदेश के स्वर में कहा था - अब आप लिखने में लग जाइए. यह पुस्तक उनके आदेश का पालन करते हुए लिखी गई है. ‘आभार’ में क्या कहूँ?... 

इस पुस्तक के लिए संदर्भ सामग्री जुटाने से लेकर प्रेस कॉपी तैयार करने तक की जिम्मेदारी सौभाग्यवती डॉ.. जी. नीरजा ने स्वेच्छा से अपने सिर पर ले ली और दिन-रात एक कर दिया. उन्हें और उनके पतिदेव तथा सुपुत्री को अनंत आशीर्वाद! 

पुस्तक को प्रकाशन के मुहाने तक पहुँचाने में डॉ. पोलवरपु जयलक्ष्मी तथा डॉ. सिरिपुरपु तुलसी देवी के आग्रह की भी बड़ी भूमिका रही है. मैं उनके प्रति भी आभारी हूँ. 

‘दो शब्द’ और ‘अभिमत’ लिख देकर मुझे भाग्यवान बनाने के लिए प्रो. देवराज जी और प्रो. एम. वेंकटेश्वर जी को विनम्र प्रणाम! 

... और पुस्तक को निर्धारित समय के भीतर सुरुचिपूर्वक प्रकाशित करने के लिए प्रिय भाई कमल बिष्ट और तक्षशिला प्रकाशन का विशेष आभार. 


- ऋषभदेव शर्मा

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

विश्वशांति और हिंदी


ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:, 
पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। 
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:, 
सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ 
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥


भारतीय मनीषा ने ऋग्वेद के समय से ही यह समझ लिया था कि मनुष्य के निरापद अस्तित्व के लिए संपूर्ण ब्रह्मांड का सहयोग अपेक्षित होता है. यही कारण है कि उसने पृथ्वी और आकाश सहित संपूर्ण ब्रह्मांड की शांति की कामना की थी. दैहिक, दैविक और भौतिक स्वास्थ्य के लिए संपूर्ण जगत का शांति को प्राप्त होना आवश्यक है. भारतीयों ने मोक्ष की कल्पना शांति और आनंद के लोक के रूप में की और समस्त जड़-चेतन सृष्टि के लिए शांति की कामना की तो इसके पीछे निश्चय ही यह धारणा रही होगी कि शांति किसी एकाकी व्यक्ति अथवा एकाकी समुदाय का विषय नहीं है. अर्थात शांति को अकेले प्राप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि सबकी शांति में ही अपनी शांति है. यदि जगत का परिवेश, जगत का जीवन, जगत का मानस अशांति, विक्षोभ और परस्पर संघर्ष से परिपूर्ण हो, तो व्यक्ति की शांति कैसे संभव है? इसलिए शांति की भारतीय संकल्पना अपने मूल में ही विश्वशांति की संकल्पना है. 

भारतीय ऋषियों ने हमें संपूर्ण विश्व को एक नीड़ समझने का अथवा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का जो उदात्त दर्शन दिया था, कहना न होगा कि उसी के कारण भारतीय लोक की प्रकृति समभाव और सह-अस्तित्व की रही तथा भारतीय सभ्यता और संस्कृति ने अपना विकास और विस्तार करने के लिए कभी किसी अन्य सभ्यता या संस्कृति पर आक्रमण नहीं किया. उसने तो ‘परस्पर अविरोध’ को धर्म का लक्षण माना तथा सत्य, प्रेम और अहिंसा जैसे वैश्विक मूल्यों को सभ्यता के उषाकाल से ही अपने चित्त और व्यवहार में अपनाया. इसके विपरीत आधुनिक कहे जाने वाले पश्चिमी समाज ने अधिक से अधिक अभी कुछ पचास वर्ष पहले ही खुद को ‘पृथ्वी ग्रह के नागरिक’ के रूप में देखना शुरू किया है – दो विश्वयुद्धों और परमाणु बमों की विभीषिका देखने के बाद. अन्यथा इसके पहले राष्ट्रीय नागरिकताएँ सर्वोपरि थीं और राष्ट्रीय समुदाय की रक्षा करना ही सबसे बड़ा मूल्य था. यही कारण है कि बहुत से इतिहासवेत्ता यह कहते नहीं अघाते कि भारत में तो राष्ट्रीय चेतना थी ही नहीं, वह तो भला हो पश्चिमी देशों का कि वे खुदाई फौजदार बनकर हमारे यहाँ राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाने आ गए! वस्तुतः भारतीय और पश्चिमी दृष्टिकोण में यही मूलभूत अंतर है – भारत विश्वनागरिकता और विश्वमानवता के गुणसूत्र लेकर निर्मित हुआ राष्ट्र है जबकि पश्चिमी राष्ट्रवाद अधिकारलिप्सा से उत्पन्न प्रभुता की हदबंदी से संबंधित विचारधारा है. यह संकीर्ण राष्ट्रवाद असुरक्षा की भावना से ग्रस्त रहता है, मनुष्यों को मनुष्यों से भयभीत रखता है और युद्धों का प्रणयन करता है. संकीर्ण राष्ट्रवाद ही आज के समय में विश्वव्यापी आतंकवाद और अशांति का हेतु है. राष्ट्रीयता की सकारात्मक संकल्पना में एक-दूसरे की स्वतंत्रता, संप्रभुता और राष्ट्रीयता का अतिक्रमण करने की प्रवृत्ति के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए. यदि धर्मों की परस्पर अविरोधी अवधारणा का विस्तार किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि कोई भी शांतिप्रिय राष्ट्र किसी दूसरे राष्ट्र का विरोधी नहीं हो सकता. अर्थात अलग-अलग राष्ट्रों के राष्ट्रहित परस्पर अविरोधी होने चाहिए. यदि ऐसा हो तो शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की संकल्पना साकार हो सकती है. 

जब से आधुनिक दुनिया ने इस अविरोधी राष्ट्रीयता को समझना शुरू किया है तब से भिन्न-भिन्न देशों के बीच परस्पर सहयोग की प्रवृत्ति में वृद्धि हुई है. और यह प्रवृत्ति अब भी विकसित हो रही है. परस्पर भयमुक्त वातावरण में व्यापार, व्यवसाय, लेन-देन से लेकर तकनीक और ज्ञान तक की साझेदारी तभी तो संभव है जब विभिन्न देश परस्पर लोकतांत्रिक मूल्यों के सम्मान के सिद्धांत से जुड़े हुए हों. अभिप्राय यह है कि विश्वशांति के लिए विश्व के विभिन्न देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की आवश्यकता है. तानाशाही व्यवस्था चाहे वह प्रत्यक्ष रूप में हो अथवा प्रच्छन्न, दूसरों के अधिकारों को हड़पने की प्रवृत्ति को जन्म देती है. इसलिए तानाशाही व्यवस्था कभी भी विश्वशांति की पोषक नहीं हो सकती. इसके विपरीत लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ इस सिद्धांत पर टिकी होती हैं कि उन्हें किसी अन्य का अधिकार नहीं हड़पना है. अतः यदि उनके बीच यह पारस्परिक विश्वास कायम हो जाए कि विश्व समुदाय के हम सब सदस्य देश एक-दूसरे के हितों को नुकसान नहीं पहुँचाएँगे और छोटे-बड़े का भेद किए बिना सबकी संप्रभुता को समान सम्मान देंगे तो विश्वशांति स्वतः ही स्थापित हो जाएगी. इससे विश्व समुदाय में विभिन्न देशों की परस्पर निर्भरता भी पुष्ट होगी. 

लेकिन, विश्वशांति की यह संपूर्ण व्यवस्था आज एक आदर्श अवधारणा मात्र है. जैसा कि यूनेस्को की ‘इंटरनेशनल लिंगुवापैक्स कमेटी’ के अध्यक्ष फेलिक्स मार्टी ने ध्यान दिलाया है, पिछली शताब्दी में विश्व ने जो वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति की है उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा युद्ध उद्योग (वार इंडस्ट्री) को समर्पित है. यह बात दीगर है कि युद्धोन्माद की खेती करने वाली शक्तियों के फलने-फूलने के बावजूद विश्व के अधिकतर राष्ट्र लोकतंत्र और शांति की राह पर अग्रसर हैं. राष्ट्र-राज्य (नेशन स्टेट) की संकल्पना अब पुरानी पड़ती जा रही है क्योंकि अलग-अलग दिशाओं में विश्व के अनेक राष्ट्र अपने-अपने समूह बनाकर वैश्विक अर्थ व्यवस्था, वाणिज्य-व्यापार, कूटनीति और सभ्यता व संस्कृति की नई परिभाषाएँ गढ़ रहे हैं. राष्ट्र-राज्य की सीमाओं के परे अंतरराष्ट्रीय सहयोग के उदाहरण के रूप में संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न प्रयासों का उल्लेख किया जा सकता है. जैसे, पर्यावरण और विकास सम्मलेन (1992), मानवाधिकार सम्मेलन (1993), जनसंख्या और विकास सम्मलेन (1994), स्त्री विषयक सम्मलेन (1995), आवास विषयक सम्मेलन (1996), जैवविविधता सम्मलेन (2012). इन सब प्रयासों से यह तथ्य उभकर सामने आया है कि आज का विश्वनागरिक अराजकता और हिंसा में नहीं तर्क और एकजुटता में विश्वास रखता है. और शांति की संस्कृति लोकतंत्र से गहरे जुड़ी हुई है. इस लोकतंत्र का विस्तार मनुष्यों के राज्य ही नहीं ईश्वर के राज्य तक करना होगा, तभी विश्वशांति स्थापित हो सकेगी. अर्थात प्रकृति और मनुष्य के संबंधों को आज पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता है, बढ़ती हुई पर्यावरण चेतना इसी दिशा में संकेत करती है. पश्चिमी संस्कृति और भारतीय संस्कृति में जिस मूलभूत अंतर की बात आरंभ में की गई थी उसी का विस्तार करते हुए यह कहा जा सकता है कि ये दोनों संस्कृतियाँ क्रमशः भोग और त्याग की संस्कृतियाँ हैं. यही कारण है कि पश्चिम ने प्रकृति को संसाधन माना और मनुष्य को उसका स्वामी. इसके विपरीत भारत ने प्रकृति को माँ माना और मनुष्य को उसकी संतान. अतः पश्चिमी संस्कृति ने दोहन और शोषण को अपनाया तथा प्रकृति को कंगाल बना दिया. इस प्रकार एक तरफ युद्धों तथा दूसरी तरफ प्रकृति के साथ खिलवाड़ ने मनुष्य जीवन में शांति-दारिद्रय अथवा अशांति के बाहुल्य को जन्म दिया. 

प्रगति के रथ को तो पीछे ले जाना संभव नहीं है – उचित भी नहीं. लेकिन मनुष्य-मनुष्य तथा मनुष्य-प्रकृति के संबंधों को सुधारना बेहद जरूरी है. अन्यथा भूमंडल तेजी से ध्वंस की दिशा में बढ़ता चला जाएगा. हमें आज ऐसे दर्शन की आवश्यकता है जो मानव प्रजातियों और प्रकृति के बीच सकारात्मक संबंध की स्थापना कर सके. सभ्यताओं के संघर्ष की बात करने वाले पश्चिमी जगत को विनम्रता का पाठ सीखना होगा और उन सभ्यताओं का सम्मान करना सीखना होगा जिन्होंने प्रकृति के साथ अपने प्रेमपूर्ण संबंध को आज भी खोया नहीं है. इसलिए विश्वशांति की दिशा में अंतरराष्ट्रीय राजनैतिक संस्थाएँ बनाते जाने से कुछ नहीं होगा, जरूरत है भूमंडल के भविष्य को सुरक्षित करने वाले नैतिक मूल्यों पर ईमानदारी से सहमत होने और उन्हें अपनाने की. यदि ऐसा नहीं किया गया तो अंधराष्ट्रवादी शक्तियों और हथियार उत्पादक देशों की मिलीभगत से दुनिया भर में आतंकवाद और युद्धोन्माद फैलता ही रहेगा. इन युद्धोन्मादी शक्तियों को यूनेस्को के इस विचार से सहमत होना ही होगा कि विश्व की समस्त संस्कृतियाँ और भाषाएँ समान रूप से समर्थ और कल्याणकारी हैं. किसी भी देश की संस्कृति और भाषा तुच्छ नहीं है – चाहे वह देश कितना ही छोटा क्यों न हो. 

लोगों, समुदायों, बौद्धिकताओं, नैतिकताओं और सौंदर्यदृष्टियों की विविधता में ही विश्व की सुंदरता है. विविधता है तो सौंदर्य है. हमारी तमाम भाषाएँ इस विविधता को अपने-अपने ढंग से अभिव्यक्त करती हैं. शब्दबद्ध करती हैं. इन विविधताओं की स्वीकृति और समझ से ही सहिष्णुता का विकास होता है. सहिष्णुता एक-दूसरे को ‘बर्दाश्त’ करने का नाम नहीं है बल्कि एक-दूसरे के ‘साथ होना-जीना’ सहिष्णुता का आधार है. और यही विश्वशांति का मूलमंत्र भी है. 1995 में यूनेस्को ने सहिष्णुता के घोषणापत्र (डिक्लेरेशन ऑफ टोलरेंस) की प्रथम पंक्ति में यह स्वीकार किया है कि हमारी दुनिया में विद्यमान सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करने, उसे स्वीकार करने और उसकी प्रशंसा करने की प्रवृत्ति में ही सहिष्णुता निहित है. (टॉलरेंस कांसिस्ट्स इन रेस्पेक्टिंग, एक्सेप्टिंग एंड एप्प्रिशिएटिंग द रिच डाईवर्सिटी ऑफ कल्चर्स इन अवर वर्ल्ड.). इस प्रवृत्ति का सीधा संबंध विविध संस्कृतियों के परस्पर संवाद से है और संवाद निर्भर है भाषा पर. अतः विविध भाषाओँ की भिन्नता के बावजूद उनके साथ जुड़े हुए सामाजिक-सांस्कृतिक समान तत्वों की पहचान करना आवश्यक है ताकि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में यह चरितार्थ किया जा सके कि नर लोक से किन्नर लोक तक एक ही रागात्मक हृदय व्याप्त है. 

भाषा वैविध्य इस जगत के अन्य तमाम वैविध्यों की तरह ही एक अपरिहार्य यथार्थ है. इसलिए यह कामना करना कि पूरी दुनिया में केवल एक ही भाषा रहे अप्राकृतिक, अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक होगा. लेकिन इस आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता कि वैश्वीकरण (ग्लोबलाइजेशन) और स्थानिक अस्मिताओं के उभार (एफरमेशन ऑफ कम्यूनिटी आइडेंटिटीज) जैसी परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाली प्रक्रियाओं के इस दौर में बाजार, तकनीक, ज्ञान-विज्ञान, राजनैतिक व कूटनैतिक रिश्तों तथा बेहतर सांस्कृतिक समझ और समन्वय के लिए विविध भाषा-भाषी मानव समुदायों के बीच परस्पर संवाद कायम हो सके. यहीं विश्वभाषा की अवधारणा सामने आती है.

“विश्व के दृश्य फलक पर हम अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश, पुर्तगाली आदि भाषाओं को भी विश्वभाषा के रूप में व्यवहृत पाते हैं. पर विश्वभाषा बनने की इनकी प्रक्रिया विश्वभाषा हिंदी से भिन्न है. ये भाषाएँ साम्राज्यवाद की उस नींव के आधार पर फैलीं जो प्रभुता और शक्ति की रक्तरंजित प्रवृत्ति से सींची गई थीं. इसके विपरीत विश्वभाषा हिंदी का आधार रहा है उसके प्रति श्रमजीवियों की श्रद्धा और आत्मीयता. और जैसा कि मारीशस के हिंदी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष श्री जयनारायण राम का कहना है – हिंदी उपनिषद, रामायण, गीता की बेटी बनकर आई. यह उनके धर्म एवं संस्कृति का अंग बनकर अभी भी जीवित है.” (डॉ. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव (1996), भाषाई अस्मिता और हिंदी, नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन, पृ. सं. 57). विश्वभाषा के रूप में अपनी इसी विशेषता के कारण हिंदी विश्वशांति में एक बड़ी भूमिका निभा सकती है. 

दरअसल, विश्वयुद्ध को लगातार टालते जाने की विभिन्न देशों की बुद्धिमत्ता के बावजूद विश्वशांति के लिए सबसे बड़ा ख़तरा तरह-तरह के अंतरराष्ट्रीय संघर्षों या टकरावों से बना हुआ है. इन टकरावों का कारण संघर्ष में जुटे राष्ट्रों के अपने राष्ट्रीय हितों के टकराव में तो निहित है ही, एक-दूसरे की स्थितियों को समझ न पाने के कारण भी है. यह नासमझी कई बार एक-दूसरे के बारे में कम परिचय से पैदा होती है तो कई बार गलत परिचय से. परस्पर अपरिचय, अल्पपरिचय अथवा मिथ्यापरिचय से मिथ्याधारणाएँ उत्पन्न होती हैं. मिथ्याधारणाएँ परस्पर अविश्वास को जन्म देती हैं. परस्पर अविश्वास से भय उपजता है और भय से असुरक्षा भाव. इस शृंखला की परिणति आक्रामकता को जन्म देती है. आक्रामकता युद्ध में बदल जाती है. अतः परस्पर परिचय के अभाव आदि की समस्या को हल किए बिना युद्धों को टालना और विश्वशांति कायम करना संभव हो ही नहीं सकता. ऐसे अवसर पर भाषा की भूमिका सामने आती है. भाषा के द्वारा ही विभिन्न राष्ट्रों के बीच आपसी समझदारी बढ़ाई जा सकती है, गलत सूचनाओं और मिथ्याधारणाओं को निर्मूल किया जा सकता है और एक-दूसरे की इच्छाओं, आकांक्षाओं तथा सीमाओं का सही परिचय विकसित किया जा सकता है. विश्व में सबसे अधिक जनसंख्या द्वारा समझी जाने वाली पहली या दूसरी भाषा के रूप में हिंदी विश्व समुदाय के विभिन्न राष्ट्रों के बीच आपसी समझ पैदा करने वाला संवाद कायम करने और उसे विकसित करने का काम कर सकती है. विश्वभाषा के रूप में यह हिंदी की बड़ी उपलब्धि होगी कि वह एक-दूसरे से डरे हुए देशों के बीच आपसी समझ पैदा करके विश्वशांति की राह को सुगम बना दे. 

विश्वशांति के मार्ग में आर्थिक और राजनैतिक साम्राज्यवादी ताकतों की स्वार्थी रणनीति बड़ी बाधा उत्पन्न करती है. आर्थिक क्षेत्र में अपना प्रभुत्व कायम करने और राजनैतिक दृष्टि से अन्य राष्ट्रों को अपना पिछलग्गू बनाए रखने के दोहरे उद्देश्य की पूर्ति के लिए साम्राज्यवादी ताकतें युद्धों और कूटनैतिक संघर्षों को जन्म देती हैं. अपने स्वार्थ के लिए लोकतंत्र की दुहाई देकर ये ताकतें अन्य राष्ट्रों की संप्रभुता तक पर डाका डालने में नहीं हिचकतीं. इस प्रकार इनके साम्राज्यवादी स्वार्थ विश्वशांति के लिए ख़तरा बने रहते हैं. हमारा विचार है कि इस समस्या को हल करने में भी भाषाएँ कारगर औजार की तरह कम कर सकती हैं. विश्वभाषा के अपने दावे के साथ हिंदी व्यापक विश्व-बाजार की भाषा बनकर उन देशों के पारस्परिक व्यापारिक, राजनैतिक और कूटनैतिक संबंधों की भाषा बन सकती है जिन पर साम्राज्यवादी ताकतों ने अपना शिकंजा कस रखा है. इस प्रकार उन राष्ट्रों के परस्पर सहयोग और लोकतांत्रिक सह-अस्तित्व द्वारा हिंदी उनकी आवाज को विश्वमंच पर उठाकर विश्वशांति के रास्ते की बाधाओं से उन्हें बचा सकती है. 

इस तथ्य से यद्यपि इनकार नहीं किया जा सकता कि लंबे समय तक उपनिवेश रह चुके देश भारत की भाषा होने के कारण विश्वपटल पर हिंदी को वैश्विक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होने के लिए अभी बहुत संघर्ष करना पड़ सकता है तथापि यह भी सच है कि संयुक्त राष्ट्र में विविध अवसरों पर हमारे राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री या अन्य प्रतिनिधियों द्वारा हिंदी का प्रयोग किए जाने से हिंदी का मान बढ़ा है, उसकी प्रतिष्ठा में सुनिश्चित वृद्धि हुई है. यद्यपि भारत का संविधान हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित नहीं करता परंतु भारत का इतिहास इसे जन-मन में भारत-भारती के रूप में प्रतिष्ठित कर चुका है. ऐसी स्थिति में भारत के प्रतिनिधियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अंतरराष्ट्रीय संवाद के अवसरों पर हिंदी का व्यवहार करें ताकि दुनिया से यह भ्रम मिट सके कि भाषाओं का म्यूजियम होने के बावजूद भारत एक राष्ट्रभाषा विहीन गूँगा राष्ट्र है. संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की जगह बनने का अर्थ है भारत का कूटनैतिक प्रभाव बढ़ना और साथ ही दुनिया की दूसरी ताकतों के साथ रिश्तों में बदलाव आना. इसका लाभ उठाते हुए हिंदी विश्व समुदाय को सीधे-सीधे संबोधित करके विश्वशांति के भारतीय दर्शन की ओर आकर्षित कर सकती है. 

विश्वशांति का रास्ता बहुत बड़ा रास्ता है. जैसा कि पहले कहा गया है, मानव सभ्यता के विकास में विभिन्न राष्ट्रों और उनकी संस्कृतियों ने जो प्रयास किए हैं वे चाहे ज्ञान-विज्ञान और तकनीक से संबंधित हों, चाहे सौंदर्यदृष्टि और मूल्यबोध के विकास से जुड़े हों, चाहे भौतिक उपलब्धियों के हेतु हों अथवा आध्यात्मिक अनुभूतियों के आधार हों; सबके बीच परस्पर समझ और आदान-प्रदान आवश्यक है. यह कार्य संप्रेषण के बिना संपन्न नहीं हो सकता. संप्रेषण से यहाँ हमारा अभिप्राय वार्तालाप से आगे बढ़कर शिक्षा, इतिहास और संस्कृति की अपनी-अपनी जानकारी का आदान-प्रदान करने से है. जो एक का है, इस आदान-प्रदान के द्वारा ही वह सबका हो सकता है, साझा हो सकता है. विश्वशांति के लिए समझदारी से अगला चरण है साझेदारी. इसी से संप्रेषण पूरा होगा. इस क्षेत्र में हिंदी की महती भूमिका संभावित है. हिंदी की शिक्षा जहाँ हिंदीभाषी अपनी मातृभाषा के रूप में ग्रहण करते हैं, अन्य भारतीय भाषाभाषी देश में अबाध संचरण और व्यवसाय की दृष्टि से ग्रहण करते हैं वहीं प्रायः यह देखा गया है कि विदेशी छात्र हिंदी की शिक्षा भारत की परंपराओं, धर्म, संस्कृति, इतिहास और राजनीति के मर्म को आत्मसात करने के लिए ग्रहण करते हैं. विदेशी छात्रों को भारतीय परंपरा और भारतीय सोच की शिक्षा देने के लिए हिंदी सर्वोत्तम विकल्प है. इस उद्देश्य से अनेक विदेशी छात्र हर वर्ष भारत आते हैं और अनेक हिंदी अध्यापक दुनिया के अलग-अलग देशों में जाते हैं. हिंदी के ऐसे छात्र और अध्यापक एक-दूसरे के इतिहास और संस्कृति में रुचि दर्शाते हैं और विश्व की प्राचीनतम संस्कृति के रूप में भारत का परिचय लेते-देते हैं. भारत विषयक जिज्ञासा ही ऐसे शैक्षणिक कार्यक्रमों का केंद्रबिंदु है. हिंदी से रोजगार पाना ऐसे जिज्ञासुओं का मुख्य उद्देश्य नहीं होता. इस प्रकार की शैक्षणिक योजनाओं में हमें दुनिया के अधिक से अधिक देशों को शामिल करना होगा. भारत के इतिहास और दर्शन को अगर विश्व के अधिकाधिक देशों के छात्र पढ़ेंगे तो उनकी भारत के संबंध में तो समझ बढ़ेगी ही, पारस्परिक समझ भी बढ़ेगी. और इसमें कोई दो राय नहीं कि पारस्परिक समझ बढ़ने से ही हम विश्वशांति की ओर बढ़ते हैं. परस्पर समझ हमें विविधताओं के बावजूद परस्पर समीप लाएगी और इस समझ पर आधारित परस्पर समीपता से जो संबंध बनेंगे वे विश्वशांति की नींव को सुदृढ़ कर सकते हैं. अभिप्राय यह है कि हिंदी जैसी व्यापक परिप्रेक्ष्य वाली भाषा के माध्यम से विश्वशांति की पुष्टि कोई वायवीय कल्पना नहीं है, बल्कि ठोस संभावना है. इस संभावना का आधार यूनेस्को की भाषिक नीति के अंतर्गत स्वीकृत यह मान्यता है कि भाषा शिक्षक वस्तुतः शांति के प्रशिक्षक होते हैं. यदि हमें युद्ध की संस्कृति के स्थान पर शांति की संस्कृति को लाना है तो सबसे पहले विभिन्न राष्ट्रों और भाषाओं के नागरिकों की मानसिकता में परिवर्तन लाना होगा ताकि वे यह कह सकें कि ‘मैं उन लोगों को समझ सकता हूँ जो मेरे जैसे नहीं हैं.’ दूसरे स्तर पर अभिवृत्ति में बदलाव लाना होगा ताकि वे कह सकें कि ‘मैं उन लोगों का भी मित्र और सहचर हो सकता हूँ जो मुझसे भिन्न मानव समुदाय से आते हैं.’ यह कार्य भाषा अध्यापक के माध्यम से ही संभव है. यदि यह कार्य न किया जाए तो भाषा मनुष्यों को बाँटने और तोड़ने का अत्यंत घातक हथियार बन जाती है जिसका आधार हठवाद और अज्ञान है. सब प्रकार के भाषिक हठवाद और अज्ञान से मुक्त करके हिंदी अपने छात्र को विश्वनागरिक बनने का संस्कार दे सकती है. 

यह बात भी ध्यान रखने जैसी है कि विश्वशांति ऐसी कोई वस्तु नहीं है कि सारे देश दौड़ लगाकर उस तक पहुँच जाएँ. विश्व में शांति तो तब होगी जब विश्व के अलग-अलग तमाम क्षेत्रों में शांति होगी. अर्थात क्षेत्रीय शांति ही विश्वशांति का पुख्ता आधार है. हिंदी को विश्वशांति का वाहक बनने से पहले क्षेत्रीय शांति के वाहक के रूप में अपनी योग्यता सिद्ध करनी है. अर्थात आज आवश्यकता इस बात की है कि पहले तो संपूर्ण भारत में क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों और निहित स्वार्थों की राजनीति को ध्वस्त करते हुए हिंदी एकात्मता, सह-अस्तित्व, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो; इसके बाद दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों के बीच सहयोग और शांति की स्थापना करे. यदि ऐसा हो पाता है तो इसी मॉडल का विस्तार आगे हो सकता है – पहले एशिया की शांति और फिर विश्वशांति की ओर. 

हिंदी की एक साहित्यिक भूमिका भी है. इसके सहारे भी हम विश्वशांति की ओर बढ़ सकते हैं. हिंदी में वासियों और प्रवासियों द्वारा बड़ी मात्रा में साहित्य सृजन हो रहा है. इसके अलावा बड़ी बात यह है कि हिंदी में पूरी दुनिया से साहित्य अनुवाद के माध्यम से आ रहा है जो हिंदी के पाठक की विश्व और वैश्विक साहित्य की समझ का विस्तार करता है. लेकिन अभी हिंदी से दुनिया के अन्य देशों और उनकी भाषाओं में कम चीजें जा रही हैं. अन्य देशों में हिंदी के पाठक और अनुवादक अपेक्षाकृत कम हैं. यदि यह आवाजाही बढ़ाई जा सके और प्राचीन तथा आधुनिक भारतीय साहित्य को अन्य देशों और उनकी भाषाओं में पहुँचाया जा सके तो इसका दूरगामी प्रभाव यह होगा कि भारतीय साहित्य में निहित सत्य, प्रेम, अहिंसा, करुणा और शांति जैसे मूल्यों के प्रति उन देशों में जिज्ञासा और समझ बढ़ेगी. साथ ही इन उदात्त मानवीय मूल्यों की ग्रहणशीलता भी बढ़ेगी. इस तरह हिंदी का यह साहित्य अपने मौलिक और अनूदित दोनों ही रूपों में विश्व बिरादरी को जोड़ने की भूमिका अदा कर सकता है. कहना न होगा कि इसी माध्यम से बुद्ध, महावीर और गांधी जैसे शांतिदूतों का संदेश पहले भी दुनिया में गया है, आज भी जा रहा है और भविष्य में भी जाता रहेगा. 

अंत में, एक और छोटी-सी बात जो बहुत बड़ी भी हो सकती है यह है कि यदि हिंदी के माध्यम से विश्व की विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, उपलब्धियों और साहित्यिक कृतियों का तुलनात्मक अध्ययन करने की दिशा में कुछ ठोस प्रयास किए जाएँ तो यह भाषा विश्व के विभिन्न मानव समुदायों और उनकी विश्वदृष्टि को समझने का सुदृढ़ बौद्धिक आधार प्रदान कर सकती है. यह समझ ही विश्वमानव को विश्वशांति की ओर ले जाएगी. 

- ऋषभदेव शर्मा 

शनिवार, 13 फ़रवरी 2016

[पुस्तक समीक्षा : डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा] ‘कविता के पक्ष में’ प्रबल दावेदारी

कविता के पक्ष में 
ऋषभदेव शर्मा और पूर्णिमा शर्मा
आईएसबीएन - 9788179652596 
2016
तक्षशिला प्रकाशन,
98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, 
नई दिल्ली - 110002 
376 पृष्ठ, सजिल्द
750 रुपए
साहित्य को जीवन के लिए समर्पित और मनुष्यता के लिए प्रतिबद्ध सचेतन सामाजिक क्रियाकलाप मानने वाले विद्वानों की मान्यता रही है कि साहित्य जनचेतना को जगाने का सबसे प्रबल माध्यम है और कविता उसकी सबसे अधिक व्यंजनापूर्ण तथा कलात्मक अभिव्यक्ति है. भाषा की सृजनात्मकता का चरम उत्कर्ष कविता में दिखाई देता है. अनुभव और भाषा के अद्वैत से अर्थ और शब्द का वह सह-संबंध विकसित होता है जिसे रमणीय, मार्मिक तथा रसात्मक कहा गया है. हिंदी कविता ने हजार वर्षों से अधिक के अपने इतिहास में अनुभव और भाषा के इस अद्वैत के अनेक पक्षों का साक्षात्कार किया है. यही कारण है कि साहित्य का इतिहास लिखने वाले और विभिन्न रचनाओं व रचनाकारों की समीक्षा लिखने वाले विद्वानों की रुचि का पहला और चुनौतीपूर्ण क्षेत्र कविता का क्षेत्र रहा है. 

उन्नीसवीं शताब्दी में जब आधुनिकता का दौर अपने उफान पर था, यह कहा गया कि विज्ञान और तर्क के केंद्रीय हो जाने के कारण अब ईश्वर और धर्म अप्रासंगिक हो गए हैं क्योंकि ये दोनों आस्था और अंधविश्वास पर टिके हुए हैं. यही कारण है कि आगे चलकर ईश्वर की मृत्यु भी घोषित कर दी गई. इसी के साथ यथार्थवादियों ने यह भी कहना शुरू किया कि आदर्श और भावुकता पर टिकी होने के कारण कविता भी अप्रासंगिक हो गई है. चलते-चलते बात यहाँ तक पहुँची कि उत्तर-आधुनिक विमर्शों के उदय के ठीक पहले इतिहास और वृत्तांत से लेकर उपन्यास और कविता तक की मृत्यु घोषित कर दी गई. अपनी-अपनी अस्मिता के लिए संघर्ष करने और अपनी-अपनी सत्ता स्थापित करने की होड़ में संस्कृति, इतिहास, सभ्यता, साहित्य – सबका विखंडन कुछ इस तरह किया जाने लगा मानो सब ओर मनमानी व्याख्याओं से उपजी अराजकता फैली हुई हो. ऐसे समय में हिंदी कविता की यात्रा के बहाने कविता के पक्ष में बात करना इसलिए महत्वपूर्ण प्रतीत होता है कि आधुनिकता और उत्तर-आधुनिकता ने मिलकर जिस पारंपरिक मूल्य व्यवस्था को ध्वस्त किया है उससे उत्पन्न शून्य को भरने के लिए ये दोनों ही कोई समग्र मूल्य व्यवस्था नहीं दे सकीं. आधुनिकता ने ‘व्यक्ति’ और उत्तर-आधुनिकता ने ‘तृष्णा’ के सहारे इस शून्य को भरना चाहा परंतु न तो व्यक्ति कोई मूल्य है और न तृष्णा ही कोई मूल्य है जिसके सहारे पृथ्वीग्रह पर पाई जाने वाली ‘मनुष्य’ नामक प्रजाति की रक्षा की जा सके. मनुष्यता की सुरक्षा चट्टान के रूप में इसीलिए कल भी कविता खड़ी थी और आज भी कविता खड़ी है. 

ऋषभदेव शर्मा और पूर्णिमा शर्मा की समीक्षा-कृति ‘कविता के पक्ष में’ (2016) का प्रस्थान बिंदु यही है कि अनेक उतार चढ़ावों से भरी होने के बावजूद कविता हर काल में मानवता की सुरक्षा चट्टान बनकर जीवन मूल्यों की रक्षा करती रही है. लेखक-द्वय ने कविता के लोकतांत्रिक दायित्व के रूप में जिन प्रयोजनों को बार-बार रेखांकित किया है वे हैं – युग जीवन को अपने में समेटना, समय के सत्य को पकड़ना, मनुष्य को बिना किसी लागलपेट के संबोधित करना, प्रकाश और उष्णता की संघर्षशील संस्कृति की स्थापना करना और प्रत्येक व्यक्ति के भीतर दायित्व बोध का विकास करके क्रांति की भूमिका तैयार करना. यह पुस्तक इस तथ्य को भलीप्रकार स्थापित करती है कि तमाम तरह की मृत्यु-घोषणाओं के बावजूद आज भी कविता मनुष्यता की मातृभाषा है और उसके सौंदर्यबोध को परिष्कृत तथा मनोवृत्तियों को उदात्त बनाने का सामर्थ्य रखती हैं. 

दस खंडों में विभाजित इस समीक्षा-कृति का केंद्रीय विचार यह है कि हिंदी कविता ने कभी अपने चरम लक्ष्य अर्थात मनुष्य को दृष्टि से ओझल नहीं होने दिया, उसकी कालजयी प्रासंगिकता के पक्ष में यही सबसे बड़ा तर्क है. यह स्थापना अत्यंत रोचक प्रतीत होती है कि समूचे मध्यकाल ही नहीं आधुनिक काल के उदय तक की प्रवृत्तियों के सूत्र हिंदी कविता के आदिकाल में निहित हैं. नाथ-सिद्ध साहित्य को इस कृति में कबीर का पूर्वज माना गया है, तो विद्यापति को परमप्रेमरूपा भक्ति के और काम भाव तथा शरीर सौंदर्य को उत्सव बनाने वाले शृंगार काव्य के मूलबिंदु के रूप में देखा गया है. चंदबरदाई इतिहास और लोक को जोड़ने के कारण जहाँ एक ओर चरित कवियों और प्रेमाख्यानकारों के पूर्वज प्रतीत होते हैं, वहीं वे हिंदी शृंगार काव्य के भी आदिकवि दीखते हैं. अमीर खुसरो तो खड़ीबोली के पहले कवि हैं ही. इस तरह आदिकाल की कविता से जो अलग-अलग धाराएँ बहीं, वे आधुनिक कला तक भी सूखती नहीं हैं. अर्थात हिंदी कविता का जो विशाल वटवृक्ष आज हमारे सामने है उसका मूल आदिकाल रूपी स्वस्थ बीज में से फूटा है. इससे यह भी स्पष्ट होता है कि अध्ययन की सुविधा के लिए भले ही हम कविता की यात्रा को कालखंडों में बाँट लेते हों, तथापि वह ऐसा निरंतर और सतत प्रवाह है जिसमें विभिन्न युगों, प्रवृत्तियों, वादों, आंदोलनों और विमर्शों के आरोह-अवरोह, मोड़, लहरें और वर्तुल आते-जाते रहते हैं. ‘गगन मंडल में ऊँधा कूवा’ इस सतत प्रवाह के मूल स्रोत का प्रतीक है. 

‘सुरसरि सम सब कहँ हित कोई’ शीर्षक खंड में कबीर, नानक, जायसी, सूरदास, तुलसीदास, मीराँ और रहीम के काव्य में निहित मानवीय मूल्यों और साधारणता को रेखांकित किया गया है. कबीर की कविता में पाए जाने वाली आक्रामक मुद्रा की व्याख्या करते हुए कहा गया है, “कबीर की राह अक्खड़पने की वह राह है जो मीठे जल की बावड़ी तक जाती है. उसमें मखमल की मसृणता नहीं है, टाट का खुरदरापन है; और यह खुरदरा टाट ही अपने कठोर रेशों की रगड़ से समाज की गंदगी को साफ करता है.” (कविता के पक्ष में, पृ. 51). भदेसता और तद्भवता की अपरिहार्यता स्वीकार करते हुए लेखकद्वय ने आगे कहा है, “यदि कल का कबीर जुलाहा था जिसने ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ को सुरक्षित रखने का मर्म जाना था तो आने वाले कल का कबीर सफाई कर्मचारी भी हो सकता है जो बद से बदतर होती जा रही आज की दुनिया को जीने योग्य – खूबसूरत और बेहतर – बना सके.” (वही, पृ. 51-52). कहना न होगा कि इस बिंदु पर कबीर बानी सहज ही आज के दलित विमर्श से जुड़ जाती है. इस खंड का नानक विषयक निबंध (खुरासान खसमाना कीआ हिंदुस्तान डराइआ) विशेष रूप से द्रष्टव्य है. इसमें उल्लेख किया गया है कि संत कवि नानक ने तत्कालीन राजनैतिक उथल-पुथल और अराजकता का स्पष्ट वर्णन किया है जबकि कबीर से लेकर तुलसी तक भक्ति काल के प्रायः अन्य सभी प्रमुख कवि ऐसे अवसरों पर संकेत से काम लेते हैं. इसी प्रकार सूरदास विषयक निबंध गंवई संस्कार की व्याख्या के कारण ध्यान खींचते हैं. 

‘ज्यों नावक के तीर’ शीर्षक तीसरे खंड में बिहारी और गुरु गोबिंद सिंह के काव्य पर चर्चा है. बिहारी तो भारतीय नागर सौंदर्यबोध और शृंगारिक काव्यभाषा के प्रतिनिधि रचनाकार हैं ही, गुरु गोबिंद सिंह योद्धा कवि हैं. “वे शक्ति के उपासक हैं और युद्ध के प्रेमी. धर्मयुद्ध की चाह के अतिरिक्त कोई वासना उन्हें छूती भी नहीं है. धर्मयुद्ध चाहे मनुष्य के भीतर लड़ा जाए धर्मक्षेत्र में, या बाहर लड़ा जाए कुरुक्षेत्र में, शांति और न्याय के लिए लड़ा जाता है. जब शांति के सारे प्रयास विफल हो रहे हों और आतंक के शिकार देश को बार-बार संयम का पाठ पढ़ाया जा रहा हो, तब गुरु गोबिंद सिंह सचमुच प्रासंगिक लगते हैं.” (वही, पृ.108). 

इस प्रकार 375 पृष्ठों की पुस्तक ‘कविता के पक्ष में’ के 112 पृष्ठ आदिकाल, भक्तिकाल और रीतिकाल को समर्पित है. इनके दुगने से अधिक पृष्ठ आधुनिक कविता के नाम किए गए. इसका अभिप्राय यह है कि यह पुस्तक आधुनिक कविता की प्रासंगिकता को रेखांकित करने पर विशेष बल देती है. पुस्तक की समीक्षा-दृष्टि और इतिहास चेतना को आगे के खंडों के शीर्षकों से ही समझा जा सकता है. भारतेंदु, मैथिलीशरण गुप्त और बालकृष्ण शर्मा नवीन को समर्पित चौथे खंड का शीर्षक है ‘हम कौन थे, क्या हो गए’ जो इन कवियों की राष्ट्रीय चेतना की ओर संकेत करता है. पुस्तक के पाँचवे खंड में छायावादी और उत्तर छायावादी काव्य की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक चेतना और मानवतावादी विश्वदृष्टि को दृष्टिपथ में रखा गया है. इसका शीर्षक ‘बीती विभावरी जाग री’ गांधी युग की व्यापक जनजागृति का द्योतक है. प्रगतिवादी कवियों में दिनकर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन और शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ के काव्य की मीमांसा करने वाले खंड छह का शीर्षक ‘कलम देश की बड़ी शक्ति है’ स्पष्ट ही अपनी विषय वस्तु के अनुरूप है. परिवर्तित युगबोध, नए मनुष्य की केंद्रीयता तथा सहज भाषा को नई व्यंजनाओं से अभिमंडित करने की चाह वाले नवकाव्य की मीमांसा ‘भेद खोलेगी बात ही’ शीर्षक सातवें खंड में की गई है. यहाँ शमशेर, अज्ञेय, मुक्तिबोध, सर्वेश्वर, रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह पर चर्चा की गई. इस खंड का शमशेर विषयक निबंध ‘लेकिन बहुत सादा साँवलापन’ इस दृष्टि से अत्यंत विशिष्ट है कि इसमें रंग शब्दों की विवेचना के माध्यम से विवेच्य कवि का सर्वथा मौलिक पुनर्पाठ प्रस्तुत किया गया है. छठे खंड में नागार्जुन (मेरी भी आभा है इसमें) और केदारनाथ अग्रवाल (काश मैं भी फूलता मेरे भाई अनार) की विवेचना भी इसी दृष्टि से की गई है. अतः यह कहा जा सकता है कि रंग शब्दावली के व्यवहार विषयक समाजभाषिक कसौटी का इन निबंधों में नई आलोचना दृष्टि के रूप में सफल प्रस्ताव और निदर्शन किया गया है. 

पुस्तक के आठवें खंड ‘भाषा में आदमी होने की तमीज’ में राजकमल चौधरी, धूमिल, श्रीकांत वर्मा और दुष्यंत कुमार के बहाने काव्य-वस्तु और काव्यभाषा के बदलाव की विवेचना की गई है. पिछली शताब्दी के अंतिम दशकों में बड़ी ललक से कविता के जनता की ओर बढ़ने और जनपक्षीय तेवर अख्तियार करने की प्रवृत्ति को इस पुस्तक के ‘आप से क्या कुछ छिपाएँ’ शीर्षक खंड-नौ में उभारा गया है. राजेश जोशी, देवराज और अरुण कमल अपने अपने ढंग से इस प्रवृत्ति का प्रतिनिधित्व करते हैं. दसवें खंड का संबंध विमर्शों से है जो हाशियाकृत समुदायों की अभिव्यक्ति को समर्पित है. साहित्य के बड़े केंद्रों से दूर कस्बाई जन-कविता के धारदार तेवर को जगदीश सुधाकर, स्त्री कविता की संयत मुखरता को अनामिका, दलित कविता की असहमत मुद्रा को ओमप्रकाश वाल्मीकि और जनजातीय अभिव्यक्ति के स्त्री पक्ष को निर्मला पुतुल के माध्यम से विवेचित करने वाले इस खंड का शीर्षक ‘हम भी मुँह में जबान रखते हैं’ पर्याप्त व्यंजनापूर्ण है. 

इस पुस्तक की समस्त सामग्री पारदर्शी और पठनीय है. इसकी सुबोधता का एक आधार तो यह है कि यह सामग्री मूलतः समय-समय पर कविता केंद्रित विभिन्न पत्रिकाओं के लिए लिखी गई होने के कारण पाठकोन्मुख है. दूसरा कारण है लेखकद्वय की साफसुथरी इतिहास-दृष्टि और समीक्षा-दृष्टि जिसका फोकस सदा पाठ पर रहता है – किसी सिद्धांत, विचारधारा या वाद विशेष पर नहीं. यही कारण है कि इस पुस्तक में विभिन्न कवियों और उनकी कविता संबंधी निष्पत्तियाँ कृति आधारित हैं. उदाहरणार्थ –

© गोरखनाथ : उनके द्वारा प्रवर्तित योगमार्ग ने भक्ति आंदोलन का मार्ग प्रशस्त किया. (वही, पृ.15). 

© अमीर खुसरो : अपने गीतों में अमीर खुसरो ने लौकिक अनुभवों और आध्यात्मिक अनुभवों को इस तरह पिरोया है कि वे आज भी लोक के कंठहार बने हुए हैं. (वही, पृ. 26).

© विद्यापति : भक्ति और शृंगार का समन्वय करने वाले इन पदों में वस्तुतः कवि ने इन दोनों के बीच की विभाजक रेखा को मिटा दिया है. (वही, पृ. 29)

© जायसी : जायसी की अलौकिक प्रेम-पीर ही उनके काव्य के कथानक की लौकिक प्रेम-पीर में अभिव्यक्त हो उठी है क्योंकि सूफी मत के मानने वाले जायसी संस्कार के कण-कण में अपने प्रेममय प्रभु की सत्ता का अनुभव करते हैं. (वही, पृ. 64).

© सूरदास : राजनीति मनुष्य को लंपट बना देती है. ‘भ्रमरगीत’ का भंवरा इस नगरीय लंपटता का भी प्रतीक है. (वही, पृ. 67).

© तुलसी : तुलसी का सारा जीवन राम के प्रति अनन्य प्रेम द्वारा जीवन और जगत के सब पाप, ताप और कलुष के परिमार्जन की गाथा है. (वही, पृ. 78).

© मीराँ : वस्तुतः मीराँ पूर्ण समर्पण भाव, अकुंठ प्रेम, रूढ़ीभंजन और विद्रोही चेतना के प्रतीक के रूप में भारतीय जन-मन में बसी एक लोकगायिका हैं. (वही, पृ. 99).

© रहीम : काव्य-भाषा के स्तर पर भी कवि (रहीम) ने भारतीय संस्कृति की सामासिकता को साधने का प्रयास किया. उन्होंने विभिन्न क्षेत्रों की भाषाओं से चयन करके अपने पदों में ऐसी काव्य-भाषा का गठन किया है जिसमें भारतीय लोक अपने इंद्रधनुषी रंग में रंगा दिखाई देता है. (वही, पृ. 102). 

© भारतेंदु हरिश्चंद्र : इस (भारतेंदु) मंडल ने हिंदी साहित्य को अनेक रूढ़ियों से मुक्त किया और अभिव्यंजना के नए तरीके ईजाद किए. इनमें एक प्रमुख तरीका है : हास्य-व्यंग्य के सहारे राष्ट्रीय रोष और वेदना को व्यक्त करना. (वही, पृ. 119).

© जयशंकर प्रसाद : प्रसाद जी ने ‘कामायनी’ के प्रथम सर्ग में यह जताया है कि देव संस्कृति अपने अंतर्विरोधों के कारण नष्ट हो गई और मनुष्य संस्कृति अपनी भीतरी ताकत के दम पर उसके बाद खड़ी हुई. दरअसल यह पुराने भारत की राख में से नए भारत के जी उठने का प्रतीकात्मक आख्यान है. (वही, पृ. 136). 

© निराला : निराला की महाप्राणता का स्रोत वसंत की अनंतता के प्रति उनके परम-विश्वास में निहित है. (वही, पृ. 162). 

© महादेवी : महादेवी वर्मा का संपूर्ण साहित्य भारतीय सांस्कृतिक चेतना से अनुप्राणित है. उनके गीतों में भारत के जातीय साहित्य की परंपराओं की ध्वनियाँ सुनी जा सकती हैं. (वही, पृ. 184).

© बच्चन : सच ही भीतरी बेचैनी की ज्वाला मदिरा की ज्वाला से बड़ी है. बच्चन ने इस आग को ही आनंद बना दिया. (वही, पृ. 210).

© नागार्जुन : रंग-प्रयोग की दृष्टि से नागार्जुन की कविताओं का अध्ययन करते समय सबसे अधिक ध्यान खींचने वाला तथ्य यह है कि नागार्जुन ने काले और सफेद रंग के शाश्वत विरोध को पुनः-पुनः चित्रित किया है. अंधकार और प्रकाश का यह द्वंद्व असत् और सत् का द्वंद्व है, अन्याय और न्याय का द्वंद्व है, मृत्यु और जीवन का द्वंद्व है. (वही, पृ. 227).

© अज्ञेय : वाल्मीकि और बुद्ध के इस प्रदेय को अज्ञेय ‘आत्मदान’ के रूप में आधुनिक कविता में पुनराविष्कृत करते हैं. (वही, पृ. 276).

© मुक्तिबोध : ‘अंधेरे में’ फैंटसी पर आधारित, लंबी कविता है. यह आधुनिक राग के मनुष्य, विशेषकर मध्यवर्गीय व्यक्ति के इच्छा, ज्ञान और क्रिया के सामाजिक और राजनैतिक अंतर्द्वंद्व की गाथा है. (वही, पृ. 280). 

© रघुवीर सहाय : सत्ता का यह वधिक चरित्र रघुवीर सहाय की कविता में बार-बार उभरकर आता है. (वही, पृ. 294).

© डॉ. केदारनाथ सिंह : स्वतंत्रता के पक्षधर कवि केदारनाथ सिंह को प्रतिबंध स्वीकार नहीं. वे मनुष्य की ही स्वतंत्रता की बात नहीं करते बल्कि प्रकृति की हर चीज की स्वतंत्रता की बात करते हैं. (वही, पृ. 304).

© धूमिल : हमारी दृढ़ मान्यता है कि धूमिल ‘शब्द’ के प्रयोक्ता भर नहीं थे बल्कि शब्दार्थ के मर्म को पहचानने वाले ऐसे काव्यशास्त्री थे जिन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से बीसवीं सदी के अंतिम दशक और उत्तरवर्ती कविता का काव्यशास्त्र रचा. (वही, पृ. 321).

© देवराज : पृथ्वीग्रह और मनुष्य जाति के भविष्य के प्रति चिंतित कवि प्रतिरोध और जूझ का सक्रिय पाठ निर्मित करता है और सुखद संसार के स्वप्न देखता है. (वही, पृ. 340). 

© जगदीश सुधाकर : जगदीश सुधाकर जनता के कवि इसलिए हैं कि वे जनता की बात कहते हैं और बिना लागलपेट के कहते हैं. उनकी पीड़ा वास्तव में भारतीय जन गण की पीड़ा है. (वही, पृ. 354).

© निर्मला पुतुल : आदिवासी जीवन के चित्रण को पूर्ण प्रामाणिकता प्रदान करते हुए निर्मला पुतुल ने आदिवासी स्त्रियों की दशा और मानसिकता को भी अपनी कविता में पूरा स्थान दिया है. उनकी कविताओं में संताली सभ्यता और संस्कार की गंध सर्वत्र व्याप्त है. उनमें इस बात का निर्भीकतापूर्वक खुलासा किया गया है कि किस प्रकार सत्ता का चाबुक पददलित पर, खासकर औरतों पर, प्रहार करता है और उनके भीतर इन प्रहारों से मुक्ति पाने की तड़प तथा बेचैनी जाग उठती है. (वही, पृ. 372).

अंततः, आदिकाल से लेकर आज तक की हिंदी कविता के ऊर्जा-बिंदुओं की साफ़-साफ़ पहचान कराने में समर्थ कृति ‘कविता के पक्ष में’ पर केंद्रित इस समस्त विचार-विमर्श से यह स्पष्ट होता है कि हिंदी कविता के हजार वर्षों से अधिक के इतिहास में ऐसा कभी नहीं हुआ कि उसकी प्राणधारा सूख गई हो तथा यह कि काव्यप्रवाह की इस जीवंतता का स्रोत कविता की लोकानुरक्ति और जीवनासक्ति में निहित है. 

- डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा 
सह-संपादक ‘स्रवंति'
प्राध्यापक, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा
खैरताबाद, हैदराबाद – 500 004
ईमेल – neerajagkonda@gmail.com












[पुस्तक समीक्षा : डॉ. अर्पणा दीप्ति] 'कविता के पक्ष में' बहस और गवाही

हिन्दी कविता का इतिहास कम से कम एक हजार वर्ष या उससे कुछ अधिक पुराना है| वर्त्तमान समय में यह प्रश्न बार-बार उठाया जाता है कि विज्ञान और प्रौद्योगिकी के तेज चाल वाले जमाने में कविता के लिए कहाँ जगह बची है? जीवन इतना अधिक गद्यमय हो गया है कि स्वयं कविता में भी गद्य भर गया है| ऐसी स्थिति में कविता रचने, पढ़ने और पढ़ाने की क्या जरूरत है? इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए डा.ऋषभदेव शर्मा और डा.पूर्णिमा शर्मा की सद्यःप्रकाशित पुस्तक ‘कविता के पक्ष में’ (2016) को पढ़ा जाए तो निराश नहीं होना पड़ेगा | यह प्रश्न इस समीक्षा पुस्तक के केंद्र में है कि 'कविता की आवश्यकता किसी समाज को क्यों होती है?' अथवा 'कविता का धर्म और प्रयोजन क्या है?' लेखकद्वय ने हिन्दी की सहस्रवर्षी काव्ययात्रा का अनुशीलन करके यह बताया है कि कविता का चरम प्रयोजन मनुष्य और मनुष्यता की रक्षा करना है | वे कविता को मनुष्यता की सुरक्षा चट्टान मानते हैं| ‘कविता के पक्ष में’ शीर्षक विवेच्य पुस्तक का केन्द्रीय विचार हिन्दी कविता के इसी जीवनकेन्द्रित, जन-पक्षधर और मूल्यनिष्ठ स्वरूप की पहचान कराना प्रतीत होता है |

376 पृष्ठों वाले इस ग्रन्थ की सामग्री को दस खंडों में ऐतिहासिक क्रम में प्रस्तुत किया गया है| 

पहले खंड ‘गगन मंडल में ऊँधा कुआँ’ में आदिकाल के चार कवियों गोरखनाथ,चंदरबरदाई, अमीर खुसरो और विद्यापति के हवाले से यह दर्शाया गया है कि हिन्दी कविता का आरम्भ सामाजिक-राजनैतिक चेतना और लौकिक व पारलौकिक प्रेम की अभिव्यक्ति की प्रबलता से हुआ|

‘सुरसरि सम सब कहँ हित होई’ शीर्षक दूसरे खंड में भक्तिकाल के प्रमुख कवियों की चर्चा है जिनमें कबीर, नानक, जायसी, सूरदास, तुलसीदास, मीरा और रहीम शामिल हैं| यहाँ यह दर्शाया गया है कि हिन्दी कवियों का भक्ति काव्य एक समाज-सापेक्ष आन्दोलन खड़ा करता है और खंडित होते हुए समाज की रक्षा के लिए धर्म और अध्यात्म का प्रयोग करता है|

तीसरा खंड ‘ज्यों नावक के तीर’ बहुत छोटा सा है| इसमें रीतिकाल के शीर्षस्थ कवि  बिहारी के साथ संत-सिपाही कवि गुरु गोविन्द सिंह शामिल हैं| गुरु गोविन्द सिंह के ‘चंडी चरित्र’ की चर्चा इस खंड को वास्तव में विशिष्ट बनाती है|

चौथे खंड ‘हम कौन थे क्या हो गए हैं’ मैं भारतेंदु, मैथिलीशरण गुप्त और बालकृष्ण शर्मा नवीन शामिल है| अर्थात भारतेंदु युग और दुवेदी युग की कविता के साथ राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधाराकी विवेचना, नवजागरण और स्वाधीनता आन्दोलन के परिप्रेक्ष्य में की गई है|

पुस्तक का पाँचवाँ खंड है ‘बीती विभावरी जाग री’| यहाँ चार प्रमुख छायावादी साहित्यकारों के साथ-साथ उत्तरछायावाद काल के बच्चन जी उपस्थित हैं| इन कवियों की सांस्कृतिक चेतना और मानवतावादी विश्वदृष्टि इस खंड में उभरती है|

‘कलम देश की बड़ी शक्ति है’ शीर्षक छठे खंड में दिनकर, नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, त्रिलोचन और शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जैसे प्रगतिवादी कवियों की युगीन चेतना पर प्रकाश डाला गया है|

नई कविता पर केन्द्रित सांतवे खंड का शीर्षक है ‘भेद खोलेगी बात ही’| इस खंड में शमशेर, अज्ञेय, मुक्तिबोध, सर्वेश्वरदयाल सक्सेना, रघुवीर सहाय और केदारनाथ सिंह के कविकर्म की विस्तृत विवेचना करते हुए इसमें आधुनिक बोध और नए मनुष्य की परिकल्पना को उजागर किया गया है|

आठवां खंड राजकमल चौधरी, धूमिल श्रीकांत वर्मा और दुष्यंत कुमार पर केन्द्रित है| ‘भाषा में आदमी होने की तमीज’ शीर्षक यह खंड समकालीन कविता के विद्रोही राजनैतिक प्रस्थान की पड़ताल करता है|

‘आपसे क्या कुछ छिपाएँ’ शीर्षक नौंवें खंड में राजेश जोशी, देवराज और अरुण कमल जैसे पिछली शताब्दी के अंतिम दो दशकों में उभरे तीन कवियों की कविता की मीमांसा की गई है जिन्होंने समकालीन चेतना को जन-पक्ष में अभिव्यक्त किया है|

पुस्तक का अंतिम (दसवाँ) खंड है ‘हम भी मुँह में ज़बान रखते है’| इस खंड में हिन्दी की विमर्शीय कविता के चार नए लोकतांत्रिक केन्द्रों से सम्बन्धित विवेचन शामिल है| जगदीश सुधाकर जहाँ कस्बाई जनविमर्श का प्रतिनिधित्व करते हैं, वहीं अनामिका स्त्रीविमर्श, ओमप्रकाश वाल्मीकि दलितविमर्श और निर्मला पुत्तुल आदिवासी विमर्श के प्रतिनिधि रचनाकार हैं|

इस प्रकार विवेच्य ग्रन्थ में हिन्दी के गुरु गोरखनाथ से लेकर निर्मला पूतुल तक की कविता के साक्ष्य के सहारे ‘कविता के पक्ष में’ एक जीवंत बहस को साकार रूप दिया गया है| हिन्दी कविता के अध्येताओं के लिए यह ग्रन्थ अत्यंत उपयोगी सिद्ध होगा|
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‘कविता के पक्ष में’ / ऋषभदेव शर्मा और पूर्णिमा शर्मा / तक्षशिला प्रकाशन, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली–110002 / प्रथम संस्करण–2016 / 750 रुपए / 376 पृष्ठ (सजिल्द)
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समीक्षक : डॉ. अर्पणा दीप्ति
वासवी स्क्वायर,  बी- 506,स्ट्रीट नं. 82, वेंकटेश्वर एन्क्लेव के पास,
वेनल गड्डा, सुचित्रा जंक्शन, हैदराबाद – 110 064 (तेलंगाना)