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शुक्रवार, 25 सितंबर 2009

जहाँ कुत्तों के लिए भी प्रसूति गृह हैं



पतझड़ भी वहां सुंदर लगता है, नवम्बर के अन्तिम दिनों में जब पेड़ों से पतियाँ झड़ जाती हैं, या बची-खुची दो चार झड़ने को होती हैं, बेबी-केयर के पत्रहीन वृक्ष पर लाल रंग के चेरी जैसे जंगली फल बड़े सुंदर लगते हैं. इन दिनों सूर्य देव दो घंटे के लिए ही प्रकट होते हैं वहां.

यहाँ के निवासियों की सबसे बड़ी विशेषता है कम बोलना. इसी लिए वे अन्तर राष्ट्रीय स्तर पर बहुत सफल व्यापारी नही हो सकते. उनके चुप रहने और समय के पाबन्द होने के बारे में कई किस्से मशहूर हैं.

पर वहां के युवक इतने शिकायती क्यों हैं? मेरे पास पैसा नही हैं. पत्नी प्यार नही करती. रहने की अच्छी जगह नहीं हैं. अजीब लोग हैं, बेरोज़गारी भत्ता मिलता रहे इसलिए जनाब नौकरी नहीं करेंगे. वेतन पर टैक्स जो देना पड़ता हैं. १८ वर्ष तक बाल भत्ता , पढ़ते हैं तो शिक्षण भत्ता, नौकरी नहीं है तो बेरोज़गारी भत्ता, बुढापे में नागरिक भत्ता, काम किया तो पेंशन अलग. यह देश नहीं स्वर्ग है.

हर सभ्यता के अपने-अपने रीति-रिवाज़ होते हैं, उनके भी हैं. वहां के लोग फूलों का बहुत शौक रखते हैं, किसी के घर जाते हैं तो फूल लेकर जाते हैं- चाहे एक हो या गुच्छे हों, या फिर छोटे छोटे गमले, गमलों में पेड़ भी उपहार में देते हैं. फूल यहाँ आनंद का प्रतीक हैं. पर ध्यान रहे - कोई आपको फूल दे तो उन्हें एक ओर न धर दीजियेगा उन्हें तुंरत ही गुलदस्ते में रख देना चाहिए. इसलिए हर आकार प्रकार के विभिन्न गुलदस्ते हर घर में होते हैं. आपसे उम्मीद की जाती है, कोई फूल दे तो आप फूलों को सराहें, उनकी सुन्दरता की प्रशंशा करें. हमारे यहाँ की क्या कहिये , पहले तो फूल मिलते ही मुहँ बिचका देंगे , ऊपर से अब हम प्लास्टिक के फूलों में जीने लगे हैं.हरियाली भी नकली, फूल भी नकली. कहाँ से आएगी ताजगी भला!

भाग्यशाली है हमारा देश कि हमारे पास अपने जातीय महाकाव्य हैं, और धन्य हैं हम कि इतनी बड़ी सम्पदा के प्रति कतई जागरूक नही हैं! पर उन्होंने अपना महाकाव्य बड़ी मेहनत से खोजा है. हर २८ फरबरी को वे 'कालेवाला डे' मनाते हैं. इस दिन एलियास लोनरोट ने अपने महाकाव्य कालेवाला को पूरा किया था.

चारों ओर बर्फ ही बर्फ, पेडों पर जमी बर्फ, नीचे पड़ी बर्फ, ताज़ा बर्फ, जमी हुई बर्फ, झर-झर झरती बर्फ, ओले वाली बर्फ, तूफानी बर्फ, बारिश में पड़ती बर्फ, छत पर पड़ी बर्फ -- हर बर्फ के लिए वहां की भाषा में अलग नाम हैं. शायद हमारे यहाँ कश्मीरी में भी होते होंगे. जैसे दक्षिण में पानी के लिए. और भी शब्दों को देखते चलें, हिन्दी का कड़वा यहाँ कारवास है, कुत्ता कोएरा, छाता साता, मकान कोती, मनुष्य मियेस, मेरा मिनुं, तथा कौन कुक्का. अंग्रेजी का हेल्लो हेइ हो गया है , तो बाय-बाय यहाँ हेई-हेई है. -- हाथ को कंधे तक उठाकर चार उँगलियाँ हिलाते हैं.

'बीच'(समुद्र तट) का पर्याय स्ट्रांड यहाँ रेंटा बन जाता है. और हाँ, बसंत के पहले फूल को केवात एसीकोनें कहते है.

डेरी उद्योग के लिए यह देश दुनिया भर में जाना जाता हैं, खूब खाऊ हैं यहाँ के लोग. कोलेस्ट्रोल तो बढेगा ही. ज्यादातर को है -- मांस जो खाते हैं, वह भी चीज़,मक्खन, क्रीम और आइसक्रीम के साथ. तलने वलने के चक्कर में नहीं पड़ते. मांस मछली को रोस्ट कर लेते हैं, और मक्खनलगा कर खाते हैं.

मरने पर सीधे दफ़न नहीं करते यहाँ, पहले शरीर को जला कर भस्म किया जाता हैं, और तब राख को दफ़न किया जाता हैं, दफ़न के लिए ज़मीन अपनी-अपनी खरीदनी पड़ती हैं. कोई मर गया, फोन कर दिया, सरकारी गाड़ी आ गई, लाश ले गई, दूसरे
दिन राख दे गई, लोग राख दफ़न करने के लिए पहले से ज़मीन खरीद कर रखते हैं, नहीं तो सरकार उस व्यक्ति की सम्पति बेच कर यह शुभ काम संपन्न करती है.

यह तो ठीक है कि वहां बात बात में धन्यवाद देने की प्रथा है, गाड़ी से उतरें तो ड्राइवर को धन्यवाद कहिये, ड्राइवर आपको धन्यवाद कहेगा -- कीलोस. पर अगर आपने आदरणीय, कृपया, प्लीज़, आभारी का प्रयोग कर दिया तो वे यह कहने से नहीं चूकेंगे कि आप लोग नम्रता का दिखावा बहुत करते हैं. जैसे उनका प्रदर्शन संस्कृति हैं और हमारी नम्रता प्रदर्शन!

वैलेंटाइन डे की तरह रोचक एक दिन है, हेला तोरसताई. यों तो इस दिन का सम्बन्ध ईसा के पुनर्जीवन से है लेकिन यदि इस दिन किसी लड़की ने किसी लड़के को मिलने का कोई समय दिया है और वह नहीं आया तो उन्हें पूरे साल अकेले रहना पड़ता है -- लो भुगतो!

यहाँ बच्चों के गौड मदर और गौड फादर बनने की धार्मिक परम्परा है. इसका सांस्कृतिक महत्व चाहे जो हो , पर व्यावहारिक पक्ष यह भी है कि असली माता पिता या पुत्र को कुछ हो जाए तो धर्म के माता पिता और पुत्र उनकी ज़िम्मेदारी
संभाल सकते हैं.

यहाँ के बेहद चुप्पे, मद्यप और एकान्तप्रिय लोग कुत्ते बिल्लियों से बहुत प्यार करते हैं. वे जैसे पशु हैं ही नहीं, साथी हैं. छोटे कुत्तों और बड़े कुत्तों के लिए अलग-अलग पार्क हैं वहां, उन्हें सोफे और बिस्तर पर स्थान प्राप्त है, और चुम्बन का अधिकार भी. ये बातें तो अपने यहाँ भी हैं पर वहां की ख़ास बात है कुत्तों के लिए प्रसूति गृह. प्रसूति के दस दिन पहले वहां कुतिया को छोड़ आइये, प्रसव के दस दिन बाद बच्चों समेत ले आइये. सैंकडों किस्म के कुत्ते. बाहर जाएँ तो डॉग केयर सेण्टर में छोड़ जाएँ. जगह जगह कुत्तों के बाल कटवाने के लिए ब्यूटी पार्लर शोभायमान हैं. उनकी श्वान भक्ति के समक्ष हमारी गो भक्ति क्या कहीं टिकती है?

तो ऐसा है फिनलैंड.

पर ऐसा ही है फिनलैंड -- यह ज़रूरी नहीं.

यह फिनलैंड है जैसा अनीता गांगुली ने देखा और अपने यात्रावृत्त में दर्ज किया. जैसा कि शशि मुदिराज कहती हैं, घुमक्कडी और घुमक्कड़ शास्त्र प्रायः पुरूषों का ही क्षेत्र रहा है, लेकिन एक सीधी सादी, कर्मक्षेत्र में अध्यापिका और विदुषी लेकिन स्वभावतः गृहिणी अनीता गांगुली ने न केवल विजिटिंग प्रोफ़ेसर के रूप में अपने प्रवास के दौरान फिनलैंड का कोना-कोना झाँक लिया बल्कि अनेक दूसरे देशों का भी वर्णन किया और अपनी यात्राओं का वृतांत भी लिखा. यह यात्रावृत्त एकदम जीवंत है , अनुभव जनित है, आत्मीय है, और ख़ास बात यह कि इसमें एक भारतीय नारी दृष्टि है. संस्कृति, सहित्य, कला, इतिहास, भूगोल, प्रकृति, व्यक्ति और व्यक्तित्व के बहुविध रूपों का अंकन करने वाली इस कृति के लिए निश्चय ही लेखिका साधुवाद की पात्र हैं.

फिनलैंड जैसा मैंने देखा/ अनीता गांगुली/ मिलिंद प्रकाशन, हैदराबाद/ २००६/ १७५फि रु./ १६० पृष्ठ (सजिल्द)
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