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बुधवार, 19 अप्रैल 2017

(संपादकीय) निज इच्छा निर्मित तनु, माया गुन गो पार !

बाबा तुलसी के लिए दशरथ सुत राम और भगवान राम दो नहीं हैं. हो ही नहीं सकते. वे विष्णु का अवतार भर भी नहीं हैं. ब्रह्मा-विष्णु-महेश तो पहले ही साकार और सगुण हैं. हमारे राम ये सब होते हुए रूपातीत और गुणातीत हैं. कुछ भी उनसे परे नहीं है. वे परात्पर ब्रह्म हैं; जगनिवास अखिल लोक विश्राम हैं. जगत की आपाधापी से थका लोक जब राम की ओर उन्मुख होता है, तभी वह विश्राम पाता है – जन्मों के पाप ताप कट जाते हैं. इसीलिए लोक चाहता है कि उसके जीवन में राम का उदय हो; अवतरण हो. यह चाह जब उत्कट हो जाती है – कौसल्या की तरह, तो परात्पर प्रभु राम प्रकट हो जाते हैं.  
राम का प्राकट्य समग्र लोक के लिए है. इस लोक में राक्षस भी शामिल हैं. उनके प्रति राम करुणावान हैं; उनका उद्धार करने का वचन निभाने भी तो आए हैं धराधाम पर. वे कृपालु हैं, दीन जन के बंधु हैं. किसी को उनकी मानव लीला से भ्रम न हो जाए इसलिए बाबा याद दिलाते हैं कि वे माया, गुण और ज्ञान से परे हैं. वे मर्यादाएँ स्थापित करने के लिए आए हैं, लेकिन हैं अपरिमेय. मूल्यांकन का कोई भी लौकिक आधार उन्हें माप नहीं सकता. कौसल्या माँ को बोध है कि जिसे उन्होंने गर्भ में धारण किया, उसके रोम रोम में माया निर्मित जाने कितने ब्रह्मांड समाए हैं. राम का आकार माया, त्रिगुण प्रकृति और इंद्रियों से नहीं, उसी सृजनात्मक स्वेच्छा से निर्मित है जिसके कारण ‘वह’ एक ही निरंतर अनेक प्रकार से अभिव्यक्त होता रहता है. कौसल्या माँ को मातृत्व का परम सुख देने के लिए मेरे प्रभु राम अविगत गति छोड़कर शिशु लीला स्वीकार करते हैं. राम का प्राकट्य मातृत्व की परम पुकार की अनिवार्य स्वीकृति का प्रतीक है! 
18 अप्रैल, 2017                                                                                           - ऋषभ देव शर्मा

रविवार, 16 अप्रैल 2017

ऐसे मन लै जोगी खेलै : गुरु गोरखनाथ


परंपरा कनफटे जोगियों की
पुरानी रोमांटिक प्रणय-गाथाओं से लेकर आधुनिक सनसनीखेज मीडिया-कथाओं तक में एक रोचक रूढि की तरह ध्यान खींचने वाले ‘कनफटे जोगी’ असल में नाथ-पंथ के अनुयायी हठयोगी होते हैं. नाथ-पंथ और ‘हठयोग’ का प्रवर्तक गुरु गोरखनाथ को माना जाता है जो हिंदी के आदिकाल के सर्वाधिक प्रखर कवियों में अग्रणी हैं. गुरु गोरखनाथ के जन्म और मृत्यु की निश्चित तिथियाँ ज्ञात नहीं हैं, लेकिन अलग-अलग इतिहासकारों के हवाले से इतना तो निश्चित रूप से समझा जा सकता है कि वे नौवीं से तेरहवीं शताब्दी के बीच किसी समय विद्यमान थे. प्राच्य विद्या ग्रंथ संग्रहालय, चेन्नई में उपलब्ध ग्रंथ ‘चोलनपूर्व पट्टयम’ तथा कोयम्बत्तूर में प्राप्त शिलालेखों से पता चला है कि कोयंबत्तूर से लगभग 7 किलोमीटर दूरी पर स्थित उडुमलैपेट्टै नामक नगर (जिसका पुराना नाम चंद्रगिरि है) गोरखनाथ का जन्मस्थल है. 

क्या है हठयोग?
गुरु गोरखनाथ ने ‘सहज योग’ के विकारों को पहचान कर अपने ‘हठयोग’ की स्थापना की. इस मार्ग को ‘हठयोग’ के अलावा नाथ-संप्रदाय, नाथ-पंथ, सिद्ध-मत, सिद्ध-धर्म, योग-मार्ग, योग-संप्रदाय, अवधूत-मत और अवधूत-संप्रदाय जैसे नामों से भी जाना जाता है. दरअसल सहज योग में पंच मकार (मांस, मत्स्य, मुद्रा, मदिरा और मैथुन) की स्वीकृति के कारण विकृति आ गई थी. गुरु गोरखनाथ ने इस लोक-विरुद्ध स्थिति को पहचाना और विशेष रूप से नारी-भोग को साधना का अंग बनाने का दृढ़ता से खंडन किया और हठयोग के रूप में ब्रह्मचर्य की प्रतिष्ठा की. यहाँ यह भी जान लें कि गोरखनाथ का योगमार्ग महर्षि पतंजलि के योगमार्ग से भिन्न है क्योंकि पतंजलि के ग्रंथ ‘योगसूत्र’ में नाड़ीशोधन, योगमुद्रा, कुंडलिनी शक्ति का जागरण और शिवशक्ति की समरसता आदि का उल्लेख नहीं मिलता, जिनका हठयोग में सबसे अधिक महत्त्व है. 

गोरखनाथ और उनका पंथ
नाथ संप्रदाय के हिंदी कवियों के रूप में यों तो गोरखनाथ, चौरंगीनाथ, गोपीचंद, चुणकरनाथ, भरथरी और जालंध्रीपाव का उल्लेख किया जाता है लेकिन वस्तु और अभिव्यक्ति की मौलिकता की दृष्टि से इनमें गोरखनाथ ही सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं. गुरु गोरखनाथ या गोरक्षनाथ को मध्यकालीन भारतीय पुनर्जागरण के संदर्भ में उन्हें शंकराचार्य के बाद दूसरा प्रभावशाली व्यक्ति माना जाता है. उनके द्वारा चलाए गए पंथ को ‘गोरखपंथ’ कहा जाता है. हमारी मान्यता तो यह है कि विकृति पर सीधे-सीधे अक्खड़ शब्दों में चोट करने की बहुचर्चित प्रवृत्ति कबीरदास ने गुरु गोरखनाथ से ही विरासत में पाई है. उल्लेखनीय है कि ‘ज्ञानवेट्टीयान’ नामक तमिल ग्रंथ में भी गोरखनाथ को मध्यकालीन भारत का अद्वितीय रहस्यवादी सिद्ध, धर्मगुरु और राष्ट्रनायक बताया गया है. ‘गोरखनाथ’ या ‘गोरक्षनाथ’ उनका दीक्षानाम है. उनका दीक्षापूर्व नाम ‘पशुपति’ माना जाता है.

गुरु गोरखनाथ द्वारा रचित ग्रंथों की संख्या 40 बताई जाती है जिनमें से ‘गोरखबानी’ के संपादक डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल ने 14 को ही प्रामाणिक माना है. ये हैं – (1) सबदी, (2) पद, (3) प्राणसंकली, (4) सिस्यादरसन, (5) नरवैबोध, (6) अभैमात्रा जोग, (7) आतम-बोध, (8) पंद्रह तिथि, (9) सप्तवार, (10) मछींद्र गोरख बोध, (11) रोमावली, (12) ज्ञानतिलक, (13) ज्ञान चौंतीसा, (14) पंचमात्रा. 

गोरखनाथ ने अपने समय में प्रचलित कई सारे संप्रदायों का विलय करके नाथपंथ या गोरखपंथ चलाया, इसलिए उनकी बानियों में उन संप्रदायों के विचारों की छाया भी दिखाई देती है. उनके समय में शैव, शाक्त, बौद्ध, जैन और वैष्णव योगमार्ग प्रचलित थे. इन सबको अपने युग के संदर्भ में नई दिशा देते हुए और वर्णव्यवस्था तथा जातिभेद का खंडन करते हुए गोरखनाथ ने अपनी बानियों में गुरु महिमा, इंद्रिय संयम, प्राण साधना, वैराग्य, मनःसाधना, कुंडलिनी जागरण और शून्य समाधि की विशद चर्चा की. इन सबमें उन्होंने नीति और साधना पर बल दिया तथा हठयोग की प्रतिष्ठा की : “नौ लख पातरि आगे नाचैं, पीछे सहज अखाड़ा./ ऐसे मन लै जोगी खेलै, तब अंतरि बसै भंडारा.” अभिप्राय यह है कि वैष्णव महाप्रसाद और सहजयानी पंचमकार दोनों ही जिसे विचलित न कर सकें, ऐसे मन वाला योगी ही अपने भीतर बसे आनंद के भंडार में विहार करता है.

कहने की ज़रूरत नहीं की गोरखपंथी हठयोग में सांसारिक आकर्षण को हठपूर्वक रोकने के लिए शक्तिरूपा कुंडलिनी को जगाकर शिव के निवास सहस्रार चक्र में ले जाने की साधना की जाती है. कुंडलिनी साधना के नाम पर स्त्री-पुरुष-समागम के बहाने व्यभिचार को बढ़ावा देने वालों की गुरु गोरखनाथ ने कठोर शब्दों में निंदा की तथा ‘हठ’ साधना को ह अर्थात सूर्य और ठ अर्थात चंद्रमा की नाड़ियों के संयोग की साधना के रूप में प्रचारित किया. इस साधना का आधार ब्रह्मचर्य है जो भोग द्वारा समाधि के वाममार्ग का विरोधी है. 

योगमार्ग की प्राचीनता 
वास्तव में, एक साधना पद्धति के रूप में योग मार्ग बहुत पुराना है और एक प्रकार से गुरु गोरखनाथ ने उसका जीर्णोद्धार किया. योग की प्राचीनता के सबसे पुराने प्रमाण सिंधुघाटी सभ्यता के काल में प्राप्त होते हैं. यह सभ्यता आर्य और द्रविड कही जाने वाली दोनों ही सभ्यताओं की विशिष्टताओं से युक्त है. यदि द्रविड-आर्य-संघर्ष की पश्चिमी इतिहासकारों की कपोल कल्पना के स्थान पर आर्य-द्रविड-समन्वय की खोज करनी हो तो यह जानकारी बहुत महत्वपूर्ण हो सकती है कि वर्तमान सामासिक हिंदू धर्म के बहुत से तत्व सिंधु घाटी सभ्यता की देन हैं. सिंधु सभ्यता की मूर्तियों का विवेचन करते हुए डॉ. नंजुंडन ने यह प्रतिपादित किया है कि उस समय योग की प्रतिष्ठा थी तथा योगमुद्रा धारण किए हुए योगियों की मूर्तियों का प्रचलन था. ऐसी योग मुद्राओं में मूर्तियों की प्राप्ति सिद्ध करती है कि उस अतीत काल में शिव-पशुपति योगियों के आराध्य माने जाते थे और उनके उपासक योगी जन समाज में थे. इस दृष्टि से योग-विज्ञान को सिंधु सभ्यता की सर्वाधिक महत्वपूर्ण देन कहा जाना चाहिए. 

योग विज्ञान की यह धारा वेदों में भी उपलब्ध है. ऋग्वेद में वर्णित केशिन मुनि में योगी के लक्षण हैं. कुछ मंत्रद्रष्टा ऋषि अवश्य ही योग के रहस्यों से परिचित रहे होंगे. अथर्ववेद में तो पूर्ण विकसित योग प्रणाली का स्वरूप प्राप्त होता है जिसमें प्राण और अपान वायु को वश में करने के लिए प्राणायाम की महत्ता स्वीकार की गई है. विश्व के धारक और रक्षक के रूप में प्राण को आरण्यकों में सर्वत्र व्याप्त तथा आयु का कारण माना गया है. उपनिषदों में भी योगमार्ग का निरूपण मिलता है. कठोपनिषद और तैत्तिरियोपनिषद में सर्वप्रथम ‘योग’ शब्द का पारिभाषिक अर्थ में प्रयोग हुआ है और यह अर्थ है चित्त को विषयों से हटाकर आत्मा में लीन कर देना. श्वेताश्वतरोपनिषद की प्रतिष्ठा शैव योग के प्रतिपादक प्राचीनतम उपनिषद के रूप में है. इस उपनिषद में ध्यानयोग की विधि और उसके महत्व का उद्घाटन किया गया है तथा आसन, प्राणायाम आदि योग के अन्य अंगों की भी महत्ता स्पष्ट की गई है. मैत्रेय उपनिषद में खेचरी मुद्रा का भी परिचय उपलब्ध है, जबकि इसी के समकालीन अर्थात ईसा के दो शताब्दी इधर या उधर रचित चूलिकोपनिषद में सेश्वरयोग का विवेचन है. 

आठवीं शताब्दी के पूर्व रचित ‘योगोपनिषद’ में प्रतिपादित विषय का गोरखनाथ रचित ‘सिद्ध सिद्धांत पद्धति’ से आश्चर्यजनक साम्य है. ‘ध्यान बिंदु’ और ‘नाद बिंदु’ उपनिषदों तथा ‘मंडल ब्राह्मण’ के अनेक श्लोकों का भी गोरखनाथ की रचनाओं पर काफी असर दिखाई देता है. गोरखनाथ की योग प्रणाली इस परंपरा का ही समय के अनुकूल परिवर्तित और परिवर्द्धित रूप मात्र है. 

गोरखपंथ की मौलिकता 
यहाँ यह बताना जरूरी है कि योग की परंपरा का विस्तार होने के बावजूद गोरख-दर्शन अनुकरण या नक़ल नहीं है. बल्कि गोरखनाथ जिस निर्णय पर पहुँचे वह पूर्णतः उनकी स्वानुभूति पर आधारित है; अतः सर्वथा मौलिक है. गोरख-दर्शन में परमसत्ता को अनेक अवस्थाओं से युक्त अंड-पिंड के रूप में सर्वत्र विद्यमान माना गया है तथा अद्वयवाद को इस योग मार्ग का मूल तत्व सिद्ध किया गया है. इस मत में परम तत्व को ‘परासंवित’ कहा गया है. जो कि सत्, चित और आनंद स्वरूप है. उसके निष्क्रिय, निश्चल व निर्गुण रूप को शिव कहा जाता है तथा सक्रिय, चल व सगुण रूप को शक्ति. ये दोनों अभिन्न हैं. सृष्टि की इच्छा ही शिव की शक्ति है. अतः सृष्टि के निमित्त एवं उपादान कारण शिव हैं. नाथ मत में ब्रह्मांड की तमाम विविधता को मानव शरीर में सूक्ष्म रूप से विद्यमान माना जाता है. इन दोनों की एकता को समरसीकरण कहा गया है. यह समरसीकरण ही जीव का चरम लक्ष्य है. 

चंद्र, सूर्य और अग्नि को गोरखमत में शरीर के अंदर रहने वाली सूक्ष्म शक्ति माना गया है. ‘सिद्धसिद्धांत’ पद्धति’ में नाड़ी संस्थान के ज्ञान को बहुत महत्व दिया गया है तथा मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपूरक, अनाहत, विशुद्धि, तालु, भ्रू, निर्वाण और आकाश नाम के नौ चक्रों के साथ सोलह आधारों, तीन लक्ष्यों और पाँच आकाशों के ज्ञान को सत्य के साक्षात्कार के लिए आवश्यक बताया गया है. इससे दुखों की निवृत्ति तो होती ही है, आनंद की उपलब्धि भी होती है. 

गोरखबानी 

गोरखनाथ की कुछ बानियों को देखने से उनके विचारों को ज्यादा अच्छी तरह समझा जा सकता है. आइए, देखें गोरखबानी के कुछ अंश :

बस्ती न सुन्यं सुन्यं न बस्ती अगम अगोचर ऐसा.
गगन सिषर मंहि बालक बोलै ताका नांव धरहुगे कैसा.
 
[परम तत्व तक किसी की पहुँच नहीं है. वह इन्द्रियों का विषय नहीं है. वह ऐसा है कि न हम यह कह सकते है वह कुछ है और न यह कि वह कुछ नहीं है. वह भाव और अभाव, सत और असत दोनों से परे है. शून्य यानी आकाश में ही ब्रह्म का निवास माना जाता है. वहीं आत्मा को खोजना चाहिए. जैसे बालक पाप और पुण्य से अछूता है उसी प्रकार परमात्मा भी है. ज़रा मरण से दूर काल से परे सतत बाल स्वरूप ही योगियों का साध्य है.]  
वेद न कतेब न षानी बाणी, सब ढंकी तलि आणि.
गगनि सिषर महि सबद प्रकास्या, तहं बुझै अलष बिनाणी. 
[परब्रह्म की सही व्याख्या न वेद कर पाए हैं न किताबी धर्मों की पुस्तकें. ये सब तो उसे ढकने में लगे हैं, इन्होंने सत्य को प्रकट करने के बजाय उसके ऊपर आवरण डाल दिया है. यदि ब्रहम के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान चाहिए तो ऐसा समाधि में प्रकाशित शब्द के अनुभव द्वारा ही संभव है.]  
हसिबा षेलिवा रहिबा रंग. कांम क्रोध न करिबा संग.
हसिबा षेलिबा गा‍इबा गीत. दिढ़ करि राषि आपंन चीत.
 
[हँसना चाहिए, खेलना चाहिए, मस्त रहना चाहिए लेकिन कभी काम-क्रोध का साथ न करना चाहिए. हँसना, खेलना और गीत भी गाना चाहिए किंतु अपने चित को दृढ़ करके रखना चाहिए.]  
हसिबा षेलिवा धरिबा ध्यान. अहनिसि कथिबा ब्रह्म गियांन.
हसै षेलै न करै मन भंग. ते निहचल सदा नाथ के संग.
 
[हँसना, खेलना और ध्यान धरना चाहिए. रात दिन ब्रह्म ज्ञान का कथन करना चाहिए. इस प्रकार संयम पूर्वक हँसते-खेलते हुए जो अपने मन का भंग नहीं करते वे निश्चल होकर ब्रह्म के साथ रमण करते हैं.]  
मरौ वे जोगी मरौ, मरण है मीठा.
तिस मरणीं मरौ, जिस मरणीं गोरष मरि दीठा. 
[हे जोगी मरो, मरना मीठा होता है. किंतु वह मौत मरो जिस मौत से मरकर गोरखनाथ ने परमतत्व के दर्शन किए. यह मरना सामान्य मृत्यु नहीं इसे भौतिक अस्तित्व का अंत नहीं समझना चाहिए, योग मार्ग में तो विश्वास चला आता है कि योगी कभी मरता नहीं, यहाँ मरने का अर्थ है जीवन्मुक्ति.]  
मनवां जोगी काया मढ़ी पंच तत्त ले कथा गढ़ी.
षिमा षडासन ग्यान अधारी सुमति पावड़ी डंड बिचारी. 
[शरीर रूपी मढ़ी में मन रूपी जोगी रहता है. वह क्षमा का खडासन, ज्ञान की अधारी, सद्बुद्धि की खडाऊं, और विचार का डंडा उपयोग में लाता है. शरीर का नहीं मन का योग वास्तविक योग है. बाह्य युक्तियों को छोड़कर सही रूप से मन पर नियंत्रण लाना चाहिए.]  
यहू मन सकती यहू मन सिव, यहू मन पांच तत्त का जीव.
यहू मन ले जै उनमन रहै, तै तिनी लोकी की बातां कहै
[मन शिव है. यही मन शक्ति है. यही मन पंच तत्वों से निर्मित जीव है. माया के संयोग से ही ब्रह्म मन के रूप में अभिव्यक्त होता है और मन से ही शरीर की सृष्टि होती है. इस मन को लेकर उन्मनावस्था में लीन करने से साधक सर्वज्ञ हो जाता है.]

गोरखनाथ की इन बानियों के आलोक में यदि उनके बाद के कबीर जैसे संतों की बानियों को देखें तो स्पष्ट होता है कि गोरखनाथ ने भक्तिकाल के संतों की कविता के भाव पक्ष को तो प्रभावित किया ही, उनकी भाषा और भंगिमा पर भी दूरगामी असर छोड़ा. 

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

मिल जाएँ दो पानियों जैसे : तेलुगु काव्य 'शुकोपनिषद' की भूमिका

मिल जाएँ दो पानियों जैसे


वैयक्तिकता और निजी अस्मिता के चरम विस्फोट के इस दौर में जो सामाजिक संस्था सर्वाधिक विचलित हुई दिखाई देती है, वह है विवाह व्यवस्था. भारतीय समाज की नींव माने जाने वाले परिवार के हिलने से इस समाज-सभ्यता की पूरी संरचना काँपने लग गई है. विदेशी आर्थिक चकाचौंध इस खतरे को और बढ़ा देती है. ऐसे में साहित्य की ज़िम्मेदारी बनती है कि वह लोक को मंगलकारी श्रेयस्कर मार्ग पर चने के लिए प्रेरित और प्रवृत्त करे. इस उदात्त विषय को अभिव्यक्त करने के लिए ऐसे साहित्यकार की आवश्यकता है जो भारतीय परिवार-संस्कृति के उच्च आदर्शों और जीवनमूल्यों से अनुप्रेरित और अनुप्राणित हो. समकालीन तेलुगु साहित्य के अग्रणी हस्ताक्षर डॉ. मसन चेन्नप्पा ऐसे ही उदारमना कवि हैं.  

प्रस्तुत काव्यशुकोपनिषद’ में डॉ. मसन चेन्नप्पा ने आस्ट्रेलिया की अपनी साहित्यिक यात्रा के बहाने, भारतीय साहित्य की शुक-संवाद की काव्यरूढि का सहारा लेकर भारतीय विवाह पद्धति की व्याख्या करके, वहाँ जाकर एक दूसरे से अलग रह रहे पति-पत्नी के मन में परिवार के प्रति निष्ठा की पुनर्स्थापना की संक्षिप्त सी गाथा लिखी है. मूलतः इतिवृत्तात्मक और उपदेशात्मक कथन में रोचकता की सिद्धि के लिए कवि ने यह मनोरंजक फैंटेसी गढ़ी है कि आस्ट्रेलिया में कवि को ऐसा तेलुगुभाषी शुक-शुकी युगल मिल जाता है जो अपने पालक दंपति के एक दूसरे से अलग हो जाने के कारण आश्यहीन हो गया है. संयोगवश वह दंपति कवि से मिलने और उसका व्याख्यान सुनने वालों में शामिल है. बस यह बोध होते ही कवि भारतीय परिवार व्यवस्था और विवाह पद्धति के प्रतीकों की व्याख्या करके उन पति-पत्नी के अहं को पिघलाने में सफलता प्राप्त कर लेता है. वे दोनों पुनः मिल जाते हैं और लोक कथाओं के दंपतियों की सुखमय जीवन व्यतीत करते हैं.

इस प्रकार, इस सुखांत कथा-काव्य में यह प्रतिपादित किया गया है कि भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार विवाह अथवा स्त्री-पुरुष संबंध कोई बंधन, समझौता या अनुबंध नहीं है, बल्कि एक ऐसा संस्कार है जिसके माध्यम से स्त्री और पुरुष आदिम दैहिक आवेगों का उदात्तीकरण  करके मानसिक, आत्मिक, सामाजिक और नैतिक धरातलों पर परस्पर समर्पण द्वारा समरसता की प्राप्ति हेतु इस प्रकार एक दूसरे से मिलते हैं जिस प्रकार भिन्न दिशाओं से आने वाली जलधाराएँ एक दूसरे में विलीन हो जाती हैं. पारस्परिक सम्मान और परिवार के प्रति साझा दायित्व उन्हें सदा जोड़कर रखता है. अहं और वर्चस्व इस व्यवस्था के ऐसे शत्रु हैं जो किसी भी हँसते-खेलते परिवार को तिनका-तिनका बिखरा सकते हैं. अतः पति-पत्नी को सत्ता के संघर्ष जैसी स्थिति से बचकर बराबरी, साझेदारी और जिम्मेदारी के बलपर विवाह और परिवार की रक्षा करनी होती है. कहना न होगा कि इस औदात्य की कमी होते जाने के कारण ही आज परिवार विखंडित और विघटित हो रहे हैं. यह कृति  पाठकों को परिवार से जुड़े उदार मूल्यों को अपनाने और अपने मानस को संस्कारित करने की सत्प्रेरणा दे सकेगी, ऐसी आशा की जानी चाहिए.

तेलुगु के इस संक्षिप्त कथा-काव्य को हिंदी जगत के सम्मुख प्रस्तुत करने का स्तुत्य कार्य वरिष्ठ हिंदी-तेलुगु-हिंदी काव्यानुवादक डॉ. एम. रंगय्या ने अत्यंत निष्ठापूर्वक किया है. यह कृति मूल कवि और अनुवादक दोनों के लिए यशस्कारी हो, इसी शुभेच्छा के साथ ...
-         ऋषभदेव शर्मा
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गुरुवार, 23 मार्च 2017

(भूमिका) चुप रहूँ ... या बोल दूँ : प्रवीण प्रणव


चुप रहूँ ... या बोल दूँ / प्रवीण प्रणव/ गीता प्रकाशन, हैदराबाद/ 2017/ 149 रुपए/ पेपरबैक : 136  पृष्ठ 

भूमिका 

आपने कहा है तो मान जाता हूँ 
चलिए हामी में सर हिलाता हूँ 

दरिया मिलता है यूँ तो समंदर से 
मैं अश्कों को पानी में मिलाता हूँ ...

ज़रा मुश्किल तो है पर बच्चों को 
सूखी रोटी ख़्वाबों संग खिलाता हूँ 

बहुत खुश हैं सब कारखाने गिन के 
खेत ये सरसों के थे, मैं गिनाता हूँ

प्रवीण प्रणव अपनी इस नई काव्यकृति ‘चुप रहूँ.. या बोल दूँ’ के माध्यम से हमारे समय की बहुत सी चिंताओं के साथ-साथ व्यक्ति-मन की गहराइयों की खोज-खबर लेकर आ रहे हैं. इस कृति में मुख्य रूप से उन्होंने अपनी ग़ज़लों को शामिल किया है. साथ ही कुछ गीत और नज़्में भी हैं. हालाँकि वे इन विधाओं के परंपरागत अनुशासन का पूरी तरह पालन करने का कोई दावा नहीं करते, फिर भी इसमें शक की गुंजाइश नहीं है कि विभिन्न कव्यविधाओं के शिल्प पर उनकी अच्छी पकड़ है, और अगर कहीं वे कुछ तोड़-फोड़ करते दिखाई देते हैं तो उसका कारण अनुशासनहीनता नहीं बल्कि कथ्य को शिल्प से अधिक महत्त्व देने की ज़िद है. 

प्रवीण प्रणव के कथ्य का बड़ा हिस्सा उस द्वंद्व ने घेर रखा है जो बड़ी सीमा तक आज के भारतीय युवा मानस का द्वंद्व है – चुप रहूँ या बोल दूँ! हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जब बहुत बार ऐसी इच्छा होती है कि सब कुछ बोल दिया जाए, चीख कर बोल दिया जाए, खुलेआम बोल दिया जाए; लेकिन उसी क्षण यह भी बोध होता है कि बोलने का कोई अर्थ नहीं रह गया है क्योंकि उसका कोई प्रभाव होने वाला नहीं. यह द्वंद्व वैयक्तिक संदर्भ में भी उतना ही सच है जितना सामाजिक संदर्भों में. प्रवीण प्रणव का यह द्वंद्व शायद हर रचनाकार का द्वंद्व हुआ करता है. कभी किसी महाकवि को यह शिकायत होती है कि मैं बाँहें फैला-फैला कर लोगों को आगाह किए जा रहा हूँ और लोग हैं कि सुनते ही नहीं. किसी अन्य कवि को यह विश्वास व्यक्त करना पड़ता है कि अनंत काल और असीम पृथ्वी पर कभी तो कहीं तो कोई मेरा समानधर्मा होगा और मेरी बात समझेगा. किसी और कवि को लगता है कि कविता का प्रभाव होने में पूरा जीवन निकल सकता है तो किसी अन्य को यह संतोष रहता है मैंने तो अपना संदेश दे दिया चाहे वह जहाँ तक पहुँचे. अभिप्राय यह है कि प्रवीण प्रणव अपने रचनाकर्म की सार्थकता और कृतार्थता तलाश रहे हैं. यह तलाश ही किसी रचनाकार को सक्रिय रचनाधर्मी बनाती है और वह निजता के कोनों-अंतरों में झाँककर; और जगत की विसंगतियों को उभारकर भी; ‘आज’ से बेहतर एक ‘कल’ की रचना करना चाहता है. कहना न होगा कि प्रवीण आज के अंधेरों से जूझकर कल के लिए किरणें खोज लाने की कोशिश करने वाले कवि हैं. 

जूझ और खोज की मनोवृति के कारण कवि प्रवीण प्रणव में एक ख़ास तरह की प्रश्नाकुलता दीखती है. वे जब यह पूछते हैं कि मैं खामोशी ओढ़े रहूँ या सारे रहस्यों पर से परदे उठा दूँ, तो लोकतंत्र का नाटक कर रही तानाशाही व्यवस्थाओं के बीच अभिव्यक्ति के संकट को बहुत सहज ढंग से व्यक्त कर देते हैं. यह न समझा जाए कि कवि किसी असमंजस में है या उसे कर्तव्य-अकर्तव्य की पहचान नहीं. दरअसल उसके प्रश्न लाक्षणिक रूप में उत्तर भी हैं. कवि जब प्रश्न करता है कि बच्चों को राजा-रानी की कपोलकल्पनाएँ दूँ अथवा यह बताऊँ कि भविष्य किस कदर धुंधला है, तो हमें समझ जाना चाहिए कि वह कल्पना के ऊपर यथार्थ को तरजीह देने वाला कवि है. जनता सीधे जवाब माँगती है और राजनीति गोलमोल जवाबों को प्राथमिकता देती है, इस द्वंद्व से हमें कवि का व्यंग्य समझ लेना चाहिए कि वह जनता का पक्षकार है, सत्ता का चाटुकार नहीं. दहशत और मासूमियत के बीच वह शिशुसुलभ सरलता को संभव बनाने वाला रचनाकार बनना चाहता है – नन्हें बच्चे हैं सिहरे हुए, बेचैनी हवाओं में है घुली हुई / काश कहीं से मासूमियत लाके, फिजाओं में मैं घोल दूँ. यह कवि की इच्छा भी है, संकल्प भी और कृतार्थता भी. इस कविता संग्रह की प्रथम रचना में अभिव्यक्त यह शिव-संकल्प वस्तुतः संपूर्ण कृति में परिव्याप्त है – पाठक इसे स्वयं महसूस करेंगे. 

कवि प्रवीण प्रणव राजनैतिक दुरभिसंधियों में घिरे जन-गण-मन की पीड़ा को अनेक प्रश्नों, उद्बोधनों, प्रतीकों और बिंबों के माध्यम से रूपायित करते हैं. यद्यपि वे स्वयं सौंदर्य के चितेरे हैं, फिर भी उन्हें विश्वास है कि केवल सौंदर्य को देखना सचाई को आधा देखना है, पूरी सचाई को देखे बिना उस विद्रूपता का अंकन नहीं किया जा सकता जो किसी भी कलाकार के समक्ष चुनौती खड़ी किया करती है. यही कारण है कि कवि प्रवीण प्रणव बार-बार अँधेरे और मौत के इलाके में भी अपने पाठक को ले जाते है. इस इलाके में भूख, बेकारी और विनाश का ऐसा तांडव है कि साल भर की मेहनत के बावजूद कपास उगाने वाला किसान फाँसी की रस्सी तक के लिए तरस जाता है – अब मुट्ठी भर फसल हाथ में लिए सोचता है/ तन ढकने को कपड़ा तो बन न सकेगा इससे/ इतने में तो फाँसी की रस्सी भी न बनेगी/ एक और साल जीना पड़ेगा अब ठीक से मरने के लिए. 

‘ग़मे दौराँ’ तक ही महदूद नहीं है प्रवीण प्रणव की कविता की दुनिया. ‘ग़मे जानाँ’ को भी उन्होंने शिद्दत्त से, और बखूबी, बयान किया है. मीलों चले थे साथ हम, अब तन्हाइयों का सफ़र है ये/ दर्द से रिश्ता तेरा-मेरा एक सरीखा लगता है/ वो मुझसे दूर रहता तो शायद बावफ़ा रहता/ शब भर तेरी आँखों में सहर दिखता रहा मुझको/ गाँव के घर ने मुझे बड़ी हसरतों से पाला था/ हमसफ़र है कि नहीं खुलके बता तो दे/ कभी सोचा न था कि इश्क में ये दिन भी आएगा/ खामोश रह जाने की सज़ा ही पाई है तूने चकोर/ चाँद ने किया है वादा लौट के फिर आने का/ हँसता हूँ कि आइना टूटा हुआ न लगे/ कुछ तो राबता रख मुझसे, मोहब्बत न सही कुछ और सही / मैं पढ़ लूँ आखिरी कलाम फिर तुम चले जाना – जैसी अभिव्यक्तियाँ कवि की गहन निजी अनुभूतियों का पता देती हैं. 

‘चुप रहूँ.. या बोल दूँ’ के प्रकाशन पर मैं कवि प्रवीण प्रणव को हार्दिक बधाई देता हूँ और शुभकामना करता हूँ कि यह कृति उन्हें शुभ्र यश का भागी बनाए!


28.2.2017.                                                                                                          - ऋषभदेव शर्मा

मंगलवार, 21 मार्च 2017

प्रयास 2016 : हिंदी भाषा एवं शिक्षण : बीज भाषण






न्यू होराइजन कॉलेज, बेंगलूरु (कर्नाटक) में 29 जनवरी, 2016 को ''हिंदी भाषा एवं शिक्षण'' विषय पर एकदिवसीय संगोष्ठी हुई थी. 

मुझे उसमें बीज भाषण करने का अवसर मिला था. 

हिंदी विभाग की अध्यक्ष और संगोष्ठी संयोजक डॉ. नीलिमा दुबे के संपादकत्व में उस संगोष्ठी के सभी भाषण और शोधपत्र ''प्रयास 2016'' (आईएसबीएन - 9788191074840) के रूप में प्रकाशित हुए हैं. 

उन्होंने एक घंटे के मेरे बीज भाषण का सार-संक्षेप भी इसमें सम्मिलित किया है जो यहाँ साभार सहेजा जा रहा है.



मंगलवार, 14 मार्च 2017

सैर `कथाकारों की दुनिया' की

- डॉ. सुपर्णा मुखर्जी, हैदराबाद
`कथाकारों की दुनिया' [2017] डॉ. ऋषभदेव शर्मा [1957] की ओर से पाठकों को दिया गया एक और नायाब उपहार है. संपूर्ण पुस्तक 6 खंडों में विभक्त है. पहले दो खंडों में लेखक ने जहाँ हिंदी उपन्यासों और उपन्यासकारों की दुनिया की सैर कराई है, वहीं तीसरे और चौथे में वे अपने पाठक को कहानीकारों और लघुकथाकारों की दुनिया के कोनों-अंतरों से रूबरू कराते हैं. पाँचवाँ खंड तेलुगु तथा छठा खंड तमिल के कथाकारों की भोगी और सिरजी दुनिया से हमारा परिचय कराते हैं जो इस पुस्तक की प्रासंगिकता का विशिष्ट आयाम है. इस प्रकार, पहले 4 खंडों में हिंदी कथा साहित्य का तो परिशीलन-अनुशीलन किया ही गया है लेकिन अंतिम 2 खंडों में तेलुगु और तमिल कथाजगत का भी परिभ्रमण किया गया है. यही वह खास बात है जो इस पुस्तक को औरों की तुलना में खास बनाती है. हिंदी पाठक को तमिल के कहानी साहित्य के उद्भव और विकास के बारे में पढ़कर भारतीय साहित्य की मूलभूत चिंताओं का जैसा बोध इस पुस्तक का अंतिम आलेख द्वारा होता है, उससे हमारी साहित्यिक-आत्मा का विस्तार होता है. ऐसे प्रयास अन्य भारतीय भाषाओँ के साहित्येतिहास के संदर्भ में होने आवश्यक हैं.

प्रेमचंद का नाम किसने नहीं सुना है. प्रेमचंद का नाम लेते ही किसान जीवन की त्रासदी आँखों के सामने घूम जाती है, दरिद्र किसान की बेचारी पत्नी और अर्द्धनग्न बच्चों का चेहरा याद आता है. तो क्या केवल इसलिए प्रेमचंद का नाम अमर है? क्या इतना ही काफी है प्रेमचंद को प्रासंगिक मानने के लिये? निश्चय ही उत्तर है -`नहीं'. किसान जीवन के अलावा भी प्रेमचंद के पास कहने के लिये बहुत कुछ था. उन्होंने कहा भी है. लेखक हमें प्रेमचंद की दुनिया में विद्यमान स्त्री से मिलवाता है. प्रेमचंद की दुनिया में "नारी की सहिष्णुता का गुणगान किया गया है xxx जहाँ कहीं वे परंपरागत भारतीय नारी की पृथ्वीवादी इमेज से बाहर निकले हैं, वहाँ उन्होंने स्त्री द्वारा नीच पति की खुशामद न करने की दृढता भी प्रकट की है xxx प्रेमचंद की नारी दृष्टि को यदि एकसूत्र में बाँधना हो तो कहा जा सकता है कि प्रेमचंद की दुनिया में स्त्री न तो दासी है और न देवी, वियोगिनी है न प्रतियोगिनी; वह सबसे पहले सहचरी और माँ है."(शर्मा, ऋषभदेव. (2017). कथाकारों की दुनिया. भारत, नई दिल्ली : तक्षशिला प्रकाशन. पृ. 42).

`विवाह' संस्था भारतीय संस्कृति और सभ्यता के अंतर्गत महत्वपूर्ण स्थान रखती है. बदलते परिवेश तथा प्राचीन परिवेश में भी `विवाह' को लेकर अनेक समस्याओं जैसे दहेज प्रथा, अनमेल विवाह, बहुविवाह, विवाह विच्छेद आदि को देखा जा सकता है. लेकिन इन सब समस्याओं के बाद भी प्रेमचंद "विवाह को एक ऐसा समझौता और समर्पण मानते थे जिसके संपन्न हो जाने के बाद उससे मुक्त होना अनैतिक है." (वही. पृ. 40). लेखक के अनुसार ,"विवाह को वे (प्रेमचंद) समझौता अवश्य मानते हैं, परंतु यह भी कहते हैं कि पुरुष पर अवलंबित होने के कारण स्त्री को पराधीनता का दंश भोगना पड़ता है. `मंगलसूत्र' में संपत्ति पर कानूनी अधिकार न होने के कारण स्त्री की दुर्दशा का चित्रण किया गया है. इस उपन्यास की पुष्पा मुखर और प्रखर है. वह संपत्ति संबंधी गलत परंपरा पर चोट करते हुए कहती है-"अगर मैं तुम्हारी आश्रिता हूँ, तो तुम भी मेरे आश्रित हो. मैं तुम्हारे घर में जितना काम करती हूँ, उतना ही काम दूसरों के घर में करूँ तो अपना निर्वाह कर सकती हूँ या नहीं? बोलो. तब मैं जो कुछ कमाऊँगी वह मेरा होगा. यहाँ मैं चाहे प्राण भी दे दूँ पर मेरा किसी चीज़ पर अधिकार नहीं. तुम जब चाहो मुझे घर से निकाल सकते हो." (वही. पृ. 41).

"`कथाकारों की दुनिया' के लेखक की मान्यता है कि एक दुनिया कथाकार को मिलती है, जिस पर उसका कोई वश नहीं होता और एक दुनिया वह रचता है, जिस पर उसका शासन चलता है."(देवराज, दो शब्द. शर्मा, ऋषभदेव. (2017). कथाकारों की दुनिया. भारत, नई दिल्ली : तक्षशिला प्रकाशन. पृ.V). इसके अनुरूप कथाकारों के निजी परिवेश के साथ-साथ लेखक ने कथाकारों के द्वारा रचित दुनिया के कोने-कोने को खंगाला है. उदाहरण के लिए, यह पुस्तक हमें पात्रों के मनोविश्लेषण के बहाने जैनेंद्र जैसे कथाकार की दुनिया से भी भली भाँति परिचित कराती है.

विवाह जब भारतीय समाज का इतना महत्वपूर्ण अंग है फिर उसे लेकर इतनी समस्यओं को क्यों देखा जाता है? इस प्रश्न का उत्तर तेलुगु उपन्यासकार कानेटि कृष्णमूर्ति `मीनन' के तेलुगु उपन्यास `क्रतु' में मिलेगा. "इस उपन्यास में यह तथ्य भी उभरकर सामने आता है कि विज्ञान की दुनिया पर भावनाओं की दुनिया की नैतिकता लागू नहीं होती. परंतु जब स्त्री-पुरुष संबंधों से लेकर शिशु जन्म तक में विज्ञान का हस्तक्षेप होता है तो वैयक्तिक जीवन से लेकर सामाजिक मर्यादाओं तक की चूलें हिल जाती हैं."(शर्मा, ऋषभदेव. (2017). कथाकारों की दुनिया. भारत, नई दिल्ली : तक्षशिला प्रकाशन पृ.363). साथ ही, इस महत्वपूर्ण जानकारी को हिंदी जगत तक पहुँचाने का श्रेय डॉ. ऋषभदेव शर्मा और उनकी पुस्तक ‘कथाकारों की दुनिया’ को जाता है कि "आत्मप्रचार से दूर रहकर निरंतर साहित्य सेवा में रत रहे कथाकार मीनन के इस पर्याप्त चर्चित तेलुगु उपन्यास का हिंदी में जी.परमेश्वर ने अत्यंत मनोयोगपूर्वक अनुवाद किया है." (वही. पृ. 364).

`काम' भावना मनुष्य की आदिम भावना है. यह मनुष्य की व्यक्तिगत आवश्यकता होने के साथ-साथ संसार के विकास चक्र को बढाने के लिए सामाजिक आवश्यकता भी है. लेकिन यही भावना अनैतिक रूप धारण कर ले तो एड्स किसी भी व्यक्ति के जीवन को `इमारत के खंडहर' का रूप प्रदान कर सकता है. तेलुगु कथाकार सैयद सलीम के उपन्यास `नई इमारत के खंडहर' के विवेचन के रूप में लेखक ने हिंदी पाठकों की दुनिया को एक उत्कृष्ट उपहार प्रदान किया है.

जीवन कब किस मोड़ पर घूमे यह तो किसी को नहीं पता. ऐसे में बदलते समय के परिदृश्य में मनुष्य की कुछ अतृप्त आकांक्षाएँ-वासनाएँ क्या हमेशा ही नाजायज और टुच्ची कहला सकती है. ‘कथाकारों की दुनिया’ कहती है - `नहीं'. स्त्री-पुरुष दोस्त हो सकते हैं, विवाहेतर संबंध भी पवित्र हो सकता है. असल में परिस्थितियों की जाँच-पड़ताल करना आवश्यक है और उससे भी अधिक आवश्यक है किसी भी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता का हनन न करना. अनामिका के उपन्यासों में यह बात पाई जाती है. "लेखिका ने विवाहेतर संबंधों को सदा हेय और घृणित मानने की पुरुषवादी मानसिकता का भी प्रत्याख्यान किया है."(वही. पृ. 96). ‘अवांतर कथा’ की नायिका वसुंधरा के वैयक्तिक मतामत को इस संदर्भ में देखा जा सकता है-"आसक्ति हमेशा टुच्ची हो, जरूरी तो नहीं. उदात्त और परिष्कृत, गंभीर और व्यापक प्रेम इतना नायाब तो नहीं. फिर लोगों को विश्वास करते इतनी देर क्यों लग जाती है कि स्त्री और पुरुष का संबंध विवाह के पार भी शुभ और सच्चा हो सकता है."(वही. पृ. 96).

`कथाकारों की दुनिया' ने बहुत स्पष्ट रूप में इस सच्चाई को सबके सामने रखा है कि "इक्कीसवीं सदी की स्त्री अपने अधिकारों और अपनी अस्मिता की चाह को सुदृढ बनाने के लिये तत्पर है. समान शैक्षिक अवसर और समान आर्थिक स्वावंबन के अपने अधिकार के लिए वह समाज, घर और परिवार से टकराने में पीछे नहीं हट रही है." (वही. पृ.93). लेकिन ‘’इसका अर्थ यही नहीं कि उसे पुरुषविहीन दुनिया चाहिए. नहीं, उसे ऐसी शोषणविहीन, सुंदर और समन्वित दुनिया चाहिए जिसमें स्त्री-पु रुष का भेदभाव न हो."(वही. पृ. 93).

आज के `कथाकारों की दुनिया' में हर एक विषय को लेकर विमर्श की एक परंपरा निकल पड़ी है. यह विमर्श प्रायः नारेबाज़ी, आरोप-प्रत्यारोप को लेकर ही शुरू होता है. लेकिन डॉ. शर्मा ने अपनी पुस्तक में कहीं भी नारेबाजी करनेवालों या विमर्श के नाम पर ख्याली पुलाव बनानेवालों को स्थान नहीं दिया है. उन्होंने लीक से हटकर बिना फतवेबाजी के निराला की रचना `कुल्लीभाट' को समलैंगिक विमर्श के संदर्भ में स्थापित किया है. "सोलह साल की अवस्था में निराला गौने के बाद पत्नी को लिवा लाने ससुराल गए तो डलमऊ स्टेशन पर उतरते ही इक्का-मालिक कुल्ली से उनकी मुलाकात हुई और सास की नसीहत के बावजूद दोनों में शीघ्र घनिष्ठता हो गई. कुल्ली यौन विकृति का शिकार था. उसने एकांत में निराला के प्रति अपने आकर्षण को व्यक्त भी किया."(वही. पृ. 115). डॉ. शर्मा बताते हैं कि सन् 1939 में रचित लघु उपन्यास ‘कुल्लीभाट’ आत्मकथा और संस्मरण के रंग में रँगा हुआ है. उनके अनुसार `कुल्लीभाट' हिंदी में किन्नर विमर्श अथवा समलैंगिक विमर्श की आहट बहुत शांत तरीके से सुनानेवाला उपन्यास है.

ये तो केवल कुछ विशेष झलकियाँ हैं. लेकिन यह स्पष्ट करने के लिए पर्याप्त हैं कि "कथाकारों की दुनिया' ग्रंथ साहित्य के शोधकर्ताओं के लिए अकादमिक महत्व का तो है ही, साथ ही अध्येताओं के लिये यह हिंदी कथा-साहित्य के अनछुए पहलुओं की ओर गैर-पारंपरिक विचारदृष्टि विकसित करने में सहायक सिद्ध होगा." (वेंकटेश्वर, एम.. अभिमत. शर्मा, ऋषभदेव. (2017). कथाकारों की दुनिया. भारत, नई दिल्ली : तक्षशिला प्रकाशन. पृ.VII).

392 पृष्ठोंवाली डॉ. शर्मा की इस पुस्तक `कथाकारों की दुनिया' में तमिल कहानी के उद्भव और विकासयात्रा की जानकारी भी प्रदान की गई है तथा तेलुगु की कथाकृतियों की भी विवेचना की गई है,. यह इस पुस्तक की अपनी एक निजी विशेषता है जिससे इसकी उपादेयता और संग्रहणीयता बढ़ गई है. 

पुस्तक का नाम : कथाकारों की दुनिया
लेखक : ऋषभदेव शर्मा 
प्रथम संस्करण : 2017
मूल्य : रु.800/-
पृष्ठ : 392 (सजिल्द)
प्रकाशक : तक्षशिला प्रकाशन, 
दरियागंज, नई दिल्ली – 110002.



रविवार, 12 फ़रवरी 2017

(पुस्तक) 'कथाकारों की दुनिया' : अनुक्रम

कथाकारों की दुनिया/ ऋषभदेव शर्मा 
I.S.B.N. : 978-81-7965-278-7
प्रथम संस्करण, 2017 
पृष्ठ 392, मूल्य : रु. 800
 तक्षशिला प्रकाशन, 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
दूरभाष : 011-43528469, 23258802
ईमेल : info@taxshilabooks.in, taxshilabooks@gmail.com

अनुक्रम 



दो शब्द 
अभिमत 
आशंसा 
आभार 

                 ∫∫ खंड 1∫∫ : हिंदी उपन्यासकारों की दुनिया 

1. प्रेमचंद की वर्तमानता : 'रंगभूमि' और 'गोदान'
2. प्रेमचंद की दुनिया में स्त्री 
3. जैनेंद्र की दुनिया और मनोविश्लेषण का दबाव 
4. सामंती अवशेषों की औपन्यासिक अभिव्यक्ति
5. आंचलिक उपन्यासों की दुनिया 
6. रामदरश मिश्र की दुनिया में मिथकीय संदर्भ
7. स्त्री-दोस्त पुरुष की संभावना : अनामिका के उपन्यास

           ∫∫ खंड 2 ∫∫ : रचना संदर्भ : हिंदी उपन्यास

1. समाज-समीक्षा और गांधी दर्शन : राम-रहीम
2. प्रगतिशील साहित्य का नमूना : बिल्लेसुर बकरिहा
3. समलैंगिक विमर्श : कुल्लीभाट
4. क्षण सनातन है : नदी के द्वीप
5. भारतमाता ग्रामवासिनी : मैला आँचल
6. आदिवासी समुदाय की व्यथा : कब तक पुकारूँ
7. समकालीन भारतीय जीवन का व्यंग्य चित्र : राग दरबारी
8. भ्रष्ट व्यवस्था की बाढ़ में प्रतिरोध की तलाश : जल टूटता हुआ
9. लोकतंत्र की हत्या का दस्तावेज : महाभोज
10. एक अपरिपक्व महास्वप्न : अपने अपने राम
11. वर्णव्यवस्था और जातिभेद के विरुद्ध : छप्पर
12. महावृत्तांतों के विघटन का यथार्थ : कलिकथा : वाया बाइपास
13. रजऊ से ऋतु तक स्वाधीनता संग्राम : कही ईसुरी फाग
14. मृत्यु के बहाने राग की परीक्षा : अपना पराया
15. विकिरण और विस्थापन से जूझते आदिवासी : मरंग गोडा नीलकंठ हुआ
16. भीरु पुरुषों से चिढ़ती हैं स्त्रियाँ : गणित 
17. सबकी शुभेच्छा : नीम की छाया 
18. युद्ध कथा के बहाने मनुष्यता के प्रश्न : जय! हिंद की सेना

             ∫∫ खंड 3 ∫∫ : हिंदी कहानीकारों की दुनिया 

1. कहानीकारों की दुनिया में गाँव 
2. कहानीकारों की दुनिया में बच्चे 
3. प्रेमचंद की दुनिया में क्रूर यथार्थ 
4. प्रेमचंद की भदेस भनिति : गुल्ली डंडा 
5. हाशिये की दुनिया और शिवप्रसाद सिंह
6. दलित कहानीकारों की दुनिया : अभिव्यक्ति का संदर्भ 
7. दलित कहानीकारों की दुनिया : मानवाधिकार का संदर्भ
8. इक्कीसवीं शताब्दी की कहानी और मनुष्य : वैश्वीकरण का यथार्थ 
9. इक्कीसवीं शताब्दी की कहानी : अंतर्यात्रा 

            ∫∫ खंड 4 ∫∫ : हिंदी लघुकथा साहित्य 

1. लघुकथा की दुनिया में लोकतंत्र : बलराम अग्रवाल
2. लघुकथा की दुनिया में अतिरंजना : सुकेश साहनी 

            ∫∫ खंड 5 ∫∫ : तेलुगु कथासाहित्य

1. सामाजिक विद्रूप और हास्य : बैरिस्टर पार्वतीशम
2. मिथक की परीक्षा : द्रौपदी 
3. सेरोगेट मदर : क्रतु
4. एड्स : इमारत के खंडहर 
5. पाँच लंबी कहानियाँ : खंजर और खंजन
6. तेलंगाना के किसानों की व्यथा : आक्रमण कब का हो चुका
7. तेलुगु समाज का दर्पण : लघुकथाएँ 

           ∫∫ खंड 6 ∫∫ : तमिल कथासाहित्य

1. तमिल कहानी : उद्भव और विकास

(पुस्तक) 'कथाकारों की दुनिया' : आशंसा

कथाकारों की दुनिया/ ऋषभदेव शर्मा 
I.S.B.N. : 978-81-7965-278-7
प्रथम संस्करण, 2017 
पृष्ठ 392, मूल्य : रु. 800
 तक्षशिला प्रकाशन, 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
दूरभाष : 011-43528469, 23258802
ईमेल : info@taxshilabooks.in, taxshilabooks@gmail.com

आशंसा

साहित्य का संसार अपार है - अपार संभावनाओं से भरा हुआ. ये अपार संभावनाएँ साहित्यकार के भीतर निहित होती हैं. इसीलिए लेखक साहित्य-जगत के प्रजापति होते हैं. प्रत्यक्ष जगत का अतिक्रमण करते हुए उनकी नवोन्मेषकारी प्रतिभा अपनी अपनी रुचि का संसार रचा करती है. खास बात यह है कि लेखकों का यह संसार शून्य में नहीं रचा जाता, बल्कि उपलब्ध दुनिया से प्राप्त अनुभवों, अनुभूतियों और संवेदनाओं के साथ लेखक की कल्पना के संयोग से जन्म लेता है. प्रो. ऋषभदेव शर्मा की आलोचना कृति ‘कथाकारों की दुनिया’ के मूल में यही विचार निहित है. 

कवि, समीक्षक और गद्यकार प्रो. ऋषभदेव शर्मा पच्चीस वर्ष से अधिक समय से उच्च स्तरीय भाषा और साहित्य संबंधी अध्यापन एवं शोध निर्देशन से जुड़े हुए हैं. साहित्य की विभिन्न विधाओं के विश्लेषण और मूल्यांकन पर केंद्रित उनके अनेक समीक्षात्मक आलेख एवं शोधपत्र प्रकाशित हैं. काव्य, काव्य समीक्षा, अनुवाद चिंतन और भाषा चिंतन पर उनके मौलिक और संपादित ग्रंथ सुधी पाठकों द्वारा खूब सराहे गए हैं. अब ‘कथाकारों की दुनिया’ के माध्यम से उनका कथा चिंतक रूप समग्रतः सामने आ रहा है. 

‘कथाकारों की दुनिया’ में हिंदी कहानी और उपन्यास साहित्य के विशिष्ट हस्ताक्षरों और उनकी दुनिया का तो विवेचन-विश्लेषण है ही, कुछ प्रमुख तेलुगु कथाकारों की दुनिया की भी एक झाँकी प्रस्तुत की गई है. इसके अलावा तमिल कहानी साहित्य के उद्भव और विकास का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने के बहाने आलोचक ने तमिल कथाकारों की दुनिया की भी एक झलक प्रस्तुत की है. इस तरह इस ग्रंथ में हिंदी, तेलुगु और तमिल के मध्य राष्ट्रभाषा के माध्यम से सेतु-रचना का भी स्तुत्य कार्य किया गया है. 

प्रेमचंद ने अपने कथासाहित्य के माध्यम से आदर्शोन्मुख यथार्थ से प्रेरित अपनी दुनिया रची. उनकी इस दुनिया में गाँव और किसान तो हैं ही, अपने समय को चुनौती देती हुईं स्त्रियाँ भी हैं. प्रेमचंद जहाँ एक ओर जिजीविषा और संघर्ष की दुनिया रचते हैं वहीं दूसरी ओर फक्कड़पने से लेकर अमानुषिकता तक के अलग-अलग लोक भी निर्मित करते हैं. जैनेंद्र अपनी दुनिया मनोविश्लेषण के ताने-बाने से बुनते हैं तो अज्ञेय क्षणों के सहारे निजता के द्वीप उगाते हैं. नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, शिवप्रसाद सिंह और रामदरश मिश्र की दुनिया गाँवों और अंचलों की वह दुनिया है जिसकी यातना अनंत है और जिजीविषा असीम. निराला प्रगतिशीलता से लेकर किन्नर और समलैंगिक विमर्श तक की पहली ईंटें रखते हैं तो रांगेय राघव, श्रीलाल शुक्ल, मन्नू भंडारी और भगवान सिंह क्रमशः आदिवासी विमर्श, सत्ता विमर्श, लोकतंत्र विमर्श और जनवाद की शिलाओं से अपनी अपनी दुनिया बनाते हैं. अनामिका, मैत्रेयी पुष्पा, अलका सरावगी, महुआ माजी और अहिल्या मिश्र जैसी लेखिकाएँ स्त्री विमर्श की भींतों पर अपनी दुनिया खड़ी करती हैं तो ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश कर्दम, श्योराजसिंह बेचैन और मुद्राराक्षस जैसे कथाकार दलितों की अधिकार चेतना और अंबेडकरवाद के सहारे अपनी नई दुनिया का निर्माण करते हैं. बलराम अग्रवाल और सुकेश साहनी अपनी लघुकथाओं में जिस संसार की रचना करते हैं उसके एक सिरे पर लोक और लोकतंत्र है तो दूसरे सिरे पर अतिरंजना और महास्वप्न. अभिप्राय यह है कि अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से हर संवेदनशील कथाकार अपनी रुचि के अनुसार अपनी समानांतर दुनिया का सृजन करता है. प्रस्तुत ग्रंथ में हिंदी के प्रमुख कथाकारों द्वारा रची गई उनकी इसी अपनी दुनिया की प्रामाणिक पड़ताल की गई है. 

बहुत सी कथा कृतियाँ अपनी निजी दुनिया के कारण देश-कालांतरगामी महत्व प्राप्त कर लेती हैं. ’रंगभूमि’, ‘गोदान’, ‘राम-रहीम’, ‘बिल्लेसुर बकरिहा’, ‘कुल्ली भाट’, ‘नदी के द्वीप’, ‘मैला आंचल’, ‘कब तक पुकारूँ’, ‘रागदरबारी’, ‘जल टूटता हुआ’, ‘महाभोज’, ‘अपने-अपने राम’, ‘छप्पर’, ‘कलिकथा : वाया बाईपास’, ‘कही ईसुरी फाग’, ‘अपना पराया’, मरंग गोडा नीलकंठ हुआ’, ‘गणित’, ‘नीम की छाया’, ‘त्रिकाल संध्या’, ‘जय! हिंद की सेना’ जैसे उपन्यास और ‘गुल्लीडंडा’, ‘पूस की रात’, ‘सद्गति’, ‘कफन’, ‘कर्मनाशा की हार’ आदि कहानियाँ कभी उस दुनिया का पता देती हैं जो कथाकार को बनी बनाई मिली है तो कभी उस दुनिया की ओर इशारा करती हैं जिसे कथाकार बनाना चाहता है. आलोचक ने इन दोनों ही दुनियाओं का अच्छे से खुलासा किया है. 

मुझे आशा ही नहीं, बल्कि दृढ़ विश्वास है कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की इस आलोचना कृति को सुधी पाठकों का भरपूर स्नेह और आशीर्वाद मिलेगा. इस ग्रंथ के लिए ‘आशंसा’ लिखना मैं अपना परम सौभाग्य मानती हूँ. 

14 मई, 2016 
                                                                                                               
                                                                                                                 - गुर्रमकोंडा नीरजा 
                                                                                                           उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, 
                                                                                                            दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, 
                                                                                                                  हैदराबाद – 500004. 

(पुस्तक) 'कथाकारों की दुनिया' :अभिमत

कथाकारों की दुनिया/ ऋषभदेव शर्मा 
I.S.B.N. : 978-81-7965-278-7
प्रथम संस्करण, 2017 
पृष्ठ 392, मूल्य : रु. 800
 तक्षशिला प्रकाशन, 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
दूरभाष : 011-43528469, 23258802
ईमेल : info@taxshilabooks.in, taxshilabooks@gmail.com

अभिमत 

कवि,समीक्षक, समालोचक, भाषाविद और साहित्य की अन्यान्य विधाओं के गंभीर अध्येता डॉ. ऋषभदेव शर्मा की अद्यतन कृति ‘कथाकारों की दुनिया’ उनके साहित्य चिंतन की निर्विराम साधना का प्रामाणिक साक्ष्य है. साहित्यान्वेषण की व्याकुलता उनकी सृजन शक्ति का मूल स्रोत है। साहित्य विमर्श के नित नूतन संदर्भों का अनुसंधान ही उनके सतत अध्ययनशील मानस की ऊर्जा है। प्रस्तुत कृति ‘कथाकारों की दुनिया’ लेखक की हिंदी और भारतीय कथा-साहित्य के प्रति एक विशेष शोधपरक दृष्टि को उद्घाटित करती है ।

डॉ. ऋषभदेव शर्मा हिंदी साहित्य जगत में काव्य विमर्श की पुरोगामी और प्रगतिशील दृष्टि के लिए विशेष रूप से समादृत हैं। उनके साहित्य विमर्श की विशेषता उनकी विविधोन्मुखी पाठानुसंधान की प्रवृत्ति में निहित है। हिंदी के साथ साथ इतर भारतीय भाषाओं के साहित्य पाठ को अनुवाद के माध्यम से आत्मसात कर रचना के तल में छिपे वैशिष्ट्य को उद्घाटित करने की नैपुण्यता उन्होंने हासिल की है। गद्य और पद्य दोनों प्रारूपों में रचित लगभग सभी विधाओं के वे विशद अध्येता हैं। उन्होंने प्रत्येक पठित कृति के प्रति सजग विश्लेषक की ख्याति अर्जित की है। साहित्य विमर्श लेखन में उनकी निरंतरता और सातत्य, साहित्य के अध्येताओं को अचंभित कर देती है। हिंदी के साथ तेलुगु और तमिल साहित्य की गद्य विधाओं के प्रति लेखक की आसक्ति गौरतलब है। भारतीय भाषाओं की साहित्य विधाओं के प्रति उनकी सहज संवेदना, भारतीय साहित्य की मूलभूत एकता को रेखांकित करती है। लेखक ने प्रस्तुत ग्रंथ में संकलित अपने आलेखों से इस सत्य की पुष्टि की है कि हिंदी और इतर भारतीय भाषाओं में रचित गद्य और पद्य को अनुवाद के माध्यम से आत्मसात करना कठिन या दुष्कर उद्यम नहीं है। 

प्रस्तुत ग्रंथ में 44 वैचारिक आलेख छह खंडों में संकलित हैं। प्रत्येक खंड का शीर्षक उस खंड के अंतर्गत सँजोए गए आलेखों की विषयवस्तु का परिचायक है। प्रथम खंड मे प्रेमचंद, जैनेंद्र, रेणु, रामदरश मिश्र और अनामिका जैसे हिंदी के मूर्धन्य उपन्यासकारों की रचनाओं के प्रतिपाद्य को विश्लेषित किया गया है। इन आलेखों में लेखक की नवीन आलोचना दृष्टि से पाठक परिचित होता है। ‘प्रेमचंद की वर्तमानता : रंगभूमि और गोदान’ शीर्षक आलेख इन उपन्यासों की प्रासंगिकता को वर्तमान संदर्भ में दर्शाता है। प्रेमचंद की रचना दृष्टि और उनकी दूरदर्शिता का रेखांकन, इस आलेख की विशिष्टता है। उसी प्रकार अनामिका के उपन्यास, समकालीन हिंदी उपन्यास साहित्य में स्त्री-चेतना को भिन्न दृष्टि से व्याख्यायित करते हैं जिसे लेखक ने अपने आलेख में नवीन दृष्टिकोण से विवेचित किया है। 

ग्रंथ के द्वितीय खंड ‘हिंदी उपन्यास : रचना संदर्भ’ के अंतर्गत लेखक ने लीक से हटकर ऐसे उपन्यासों का चयन किया है जो या तो अचर्चित हैं या आलोचकों की दृष्टि से उपेक्षित रहे हैं। चयनित उपन्यासों में रचना के विविध संदर्भों की व्याख्या भिन्न मानदंडों के आधार की गई है जो कि महत्वपूर्ण है। राजा राधिका रमण प्रसाद सिंह कृत ‘राम-रहीम’ (समाज-समीक्षा और गांधी दर्शन), अज्ञेय कृत ‘नदी के द्वीप ‘ में अस्तित्ववादी दर्शन (क्षण सनातन है), निराला कृत कुल्लीभाट में समलैंगिक विमर्श, रेणु कृत ‘मैला आँचल’ में भारत की ग्रामवासिनी संस्कृति का विश्लेषण, रांगेय राघव कृत ‘कब तक पुकारूँ ‘ में आदिवासी विमर्श, श्रीलाल शुक्ल कृत ‘राग दरबारी’ में चित्रित राजनीतिक व्यंग्य, आपातकाल के संदर्भ में मन्नू भंडारी द्वारा रचित उपन्यास ‘महाभोज’ जिसने राजनीतिक चेतना-प्रधान उपन्यासों का व्याकरण ही बदल दिया, कि पड़ताल – इस खंड के विशिष्ट आलेख है। ऐसे उपन्यासों पर विचार कर, लेखक ने प्रस्तुत ग्रंथ में अध्ययन के नए मानकों को स्थापित किया है और हिंदी कथा-साहित्य के अध्येताओं के लिए चिंतन की नई दिशा प्रदान की है। इसी क्रम में अलका सरावगी कृत ‘कलिकथा : वाया बाइपास’ के कथ्य एवं प्रतिपाद्य के प्रति लेखक की आलोचकीय दृष्टि अनेक नए बिंदुओं को उद्घाटित करती है। 

इधर पिछले दशकों में भारतीय साहित्य में प्रतिरोध की संस्कृति बहुत तेजी से विकसित हुई है। सत्ता, व्यवस्था एवं स्थापित मूल्यों, स्वीकृत मान्यताओं एवं नैतिक मूल्यों के प्रति नई पीढ़ी में प्रतिरोध के स्वर तीव्र हुए हैं। आदिवासी विमर्श, नारी विमर्श, दलित विमर्श और अल्पसंख्यक विमर्श जैसे सैद्धांतिक वाद-प्रतिवाद के अनेक मत-अभिमत साहित्य विमर्श के अहाते में अपनी जगह तलाश रहे हैं। इस कारण प्रस्तुत ग्रंथ के लेखक भी स्थापित मानदंडों के बरक्स नए सिरे से चयनित उपन्यासों का पुनर्पाठ करते हैं। लेखक ने इस खंड में समकालीन परिदृश्य में रचित हिंदी कथा साहित्य के जटिल शिल्प एवं कथ्य पर ध्यान केंद्रित किया है। मैत्रेयी पुष्पा कृत ‘कही ईसुरी फाग’ लोकतत्व और आंचलिक परिवेश में रचित चरित्र प्रधान उपन्यास है जिसके प्रति लेखक विशेष संवेदनशील है। विकिरण और विस्थापन से जूझते आदिवासी समुदायों की विवशता का जो चित्रण महुआ माजी ने अपने उपन्यास  ‘मरंग गोड़ा नीलकंठ हुआ’ में किया है, इसे लेखक ने अपनी विशेष शैली में विश्लेषित किया है। 

स्तुत ग्रंथ का तीसरा खंड ‘हिंदी कहानीकारों की दुनिया’ शीर्षक से नौ विशिष्ट आलेखों का संग्रह है। हिंदी कहानियों में वर्णित ग्रामीण जीवन, प्रेमचंद युगीन कहानियों का मूल स्वर रहा है जिसे लेखक ने इस खंड के प्रारभिक लेखों में विश्लेषित किया है। समकालीन हिंदी कहानी मुख्यत: दलित विमर्श और स्त्री विमर्श के इर्दगिर्द ही रूपायित होती रही है जिसे लेखक ने चयनित कहानियों के माध्यम से इस खंड में विश्लेषित किया है। दलित कहानीकारों की रचनाओं में मूलत: मानवाधिकारों का प्रश्न निरंतर उठता रहा है, इसकी ओर भी बलपूर्वक लेखक ने ध्यान आकर्षित किया है। हिंदी कहानी का समकालीन परिदृश्य दलित लेखन और दलित विमर्श प्रधान है जिसे लेखक ने प्रस्तुत ग्रंथ में रेखांकित किया है। इसके साथ ही इक्कीसवीं सदी की कहानी का आकलन भी लेखन ने प्रस्तुत किया है जो कि समकालीन हिंदी कहानी के गंभीर अध्येताओं के लिए अकादमिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है।

ग्रंथ का चौथा खंड दो आलेखों का लघु-खंड है जिसमें लघु कथा साहित्य पर लेखक ने समुचित प्रकाश डाला है। लेखक ने अनुवाद के माध्यम से तेलुगु और तमिल कथा साहित्य का अध्ययन पूरे मनोयोग से किया है जो ग्रंथ के खंड-पाँच और छह में प्रस्तुत उनके समालोचकीय आलेखों से सिद्ध होता है। तेलुगु कथा-साहित्य के प्रति लेखक की विशेष अभिरुचि ने उन्हें न केवल तेलुगु के कतिपय महत्वपूर्ण लेखकों की कृतियों को अनुवाद के माध्यम से समझने का अवसर प्रदान किया बल्कि उन्हें इन कृतियों के माध्यम से तेलुगु समाज और संस्कृति से रूबरू होने का अवसर प्राप्त हुआ। लेखक ने हिंदी में अनूदित तेलुगु कथा-कृतियों की समीक्षा बेबाकी और पूर्वाग्रहरहित होकर की है, जिससे हिंदी पाठक वर्ग के लिए उन कृतियों के प्रति यथार्थपूर्ण दृष्टि विकसित होगी। ‘बैरिस्टर पार्वशीतम’ तेलुगु कथा-साहित्य की हास्य-व्यंग्य प्रधान औपन्यासिक कृति है जिसे लेखक ने भलीभाँति परखकर आलोचना की है। उसी क्रम में तेलुगु की कुछ अन्य अनूदित कृतियों पर भी लेखक ने विचार किया है जैसे, द्रौपदी, क्रतु, एड्स आदि। तेलुगु की कुछ लघु कथाओं को भी लेखक ने अध्ययन का विषय बनाया है जो कि सराहनीय है। लेखक की वैचारिकता में स्थानीय तत्व का समावेश, इतर भाषा साहित्य के प्रति उनकी आस्था और प्रतिबद्धता का सूचक है। इसका साक्ष्य उनके द्वारा तेलंगाना के किसानों की व्यथा को चित्रित करने वाली कहानियों का अध्ययन एवं समीक्षा है। 

किसी भी साहित्य चिंतक के लिए स्थानिकताबोध एक आवश्यक सामाजिक दायित्व होता है जिसके प्रति डॉ. ऋषभदेव शर्मा सदैव जागरूक और प्रतिबद्ध रहे हैं। यह उनके साहित्य चिंतन का प्राण तत्व और अभिन्न अंग रहा है। स्थानीय उदीयमान लेखकों एवं कवियों के प्रति उनमें सदैव सकारात्मक प्रेरणादायक भाव विद्यमान रहे हैं। हिंदी एवं इतर भारतीय भाषा-साहित्य के मध्य अनुवाद सेतु के निर्माण में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण है। वे प्रादेशिक और प्रांतीय तत्वों से ऊपर उठकर समेकित भारतीय साहित्य के समावेशी स्वरूप को अपनी संपूर्ण भौतिक और मानसिक शक्तियों से सुदृढ़ करने के लिए कृतसंकल्प हैं। दक्षिण में निवास करते हुए, तेलुगु, तमिल, कन्नड तथा मलयालम साहित्य के प्रति लेखक की विशेष आसक्ति रही है जिसे उन्होंने अनुवाद के माध्यम से साधने का प्रयास किया है। इसी प्रयास को लेखक ग्रंथ के अंतिम आलेख ( खंड छह ) ‘तमिल कहानी : उद्भव और विकास’ में सिद्ध करते हैं। स्मरणीय है कि डॉ. ऋषभदेव शर्मा ने चेन्नई में रहने की अवधि के दौरान दो लघुपत्रिकाओं ‘आदर्श कौमुदी’ और ‘कर्णवती’ के तमिल साहित्य संबंधी विशेषांकों का संपादन किया था। उसी समय उन्हें तमिल कहानी के इतिहास को निकट से जानने-समझने का अवसर मिला। हिंदी पाठकों के लिए तमिल कहानी के प्रारंभ और उसके उत्तरोत्तर विकास क्रम को अति संक्षेप में लेखक ने इस आलेख में प्रस्तुत किया है जो कि किसी भी हिंदी पाठक को तमिल कहानी साहित्य का समुचित परिचय उपलब्ध कराने में सहायक होगा । 

हिंदी, तेलुगु और तमिल कथा साहित्य के प्रति लेखक की अभिरुचि प्रस्तुत ग्रंथ से स्वत: सिद्ध होती है । प्रस्तुत ग्रंथ इस सत्य को प्रमाणित करता है कि डॉ. ऋषभदेव शर्मा बहुमुखी प्रतिभासंपन्न और मेधावी साहित्य एवं भाषा चिंतक हैं। भारतीय भाषाओं और साहित्य की भीतरी परतों को अनावृत्त कर उन्हें साहित्य के अध्येताओं को उपलब्ध कराने की उनकी ललक प्रशंसनीय है। वे एक प्रखर शब्द-चिंतक और रचनाकर्मी हैं जिन्होंने भाषा और प्रांत की सीमाओं को भेदकर भारतीय साहित्य को संपूर्णता के साथ आत्मसात किया है। 

‘कथाकारों की दुनिया’ ग्रंथ साहित्य के शोधकर्ताओं के लिए अकादमिक महत्व का तो है ही, साथ ही हिंदी कथा साहित्य के अध्येताओं के लिए यह हिंदी कथा-साहित्य के अनछुए पहलुओं की ओर गैर-पारंपरिक विचारदृष्टि विकसित करने में सहायक सिद्ध होगा। आधुनिक साहित्य विधाओं में उपन्यास, साहित्य की सर्वाधिक लोकप्रिय विधा है जिसका समाजशास्त्रीय महत्व निर्विवाद है। इस दृष्टि से प्रस्तुत ग्रंथ की प्रयोजनीयता अक्षुण्ण है। भारतीय कथा साहित्य के समालोचनात्मक ग्रंथों की परंपरा को प्रस्तुत ग्रंथ निश्चित रूप से समृद्ध करेगा। डॉ. ऋषभदेव शर्मा ‘कथाकारों की दुनिया’ ग्रंथ की रचना के लिए बधाई एवं अभिनंदन के पात्र हैं । उन्हें मैं उनके इस नूतन प्रयास और प्रस्तुति के लिए शुभकामनाएँ प्रेषित करता हूँ। 

                                                                                                                
26 मई, 2016                                                                                
                                                                                                               - डॉ. एम. वेंकटेश्वर 
                                                                                                           पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष 
                                                                                                    हिंदी एवं भारत अध्ययन विभाग, 
                                                                                               अंग्रेजी एवं अंग्रेजी भाषा विश्वविद्यालय, 
                                                                                                                    हैदराबाद । 

(पुस्तक) 'कथाकारों की दुनिया' : दो शब्द

कथाकारों की दुनिया/ ऋषभदेव शर्मा 
I.S.B.N. : 978-81-7965-278-7
प्रथम संस्करण, 2017 
पृष्ठ 392, मूल्य : रु. 800
 तक्षशिला प्रकाशन, 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
दूरभाष : 011-43528469, 23258802
ईमेल : info@taxshilabooks.in, taxshilabooks@gmail.com

दो शब्द

‘कथाकारों की दुनिया’ के लेखक की मान्यता है कि एक दुनिया कथाकार को मिलती है, जिस पर उसका कोई वश नहीं होता और एक दुनिया वह रचता है, जिस पर उसका शासन चलता है. उसे मिली हुई दुनिया दरअसल उस पर थोप दी गई होती है और उसे उसका एक टुकड़ा बना दिया गया होता है. जो दुनिया वह खुद निर्मित करता है, उसके नदी-नालों, खेत-जंगलों, बस्तियों-शहरों, उनमें रहने वाले लोगों के बारे में सारे निर्णय उसी के होते हैं. क़ानून व्यवस्था, लड़ाई-झगड़े, शांति-अशांति, अपराध-आंदोलन, न्याय-नियम, परिवार-समाज, दोस्ती-दुश्मनी, नैतिकता-अनैतिकता, रिश्ते-नाते, संवाद-संवादहीनता, भाषा के उचित-अनुचित प्रयोग आदि जो कुछ भी ज़रूरी है, उसे लेखक अपनी दुनिया के लिए अपने ढंग से तय करता है.

अगर इस अवधारणा को पूरा का पूरा सही मान लिया जाए, तो यह भी मानना होगा कि सामान्य लोगों की दुनिया और लेखक की दुनिया के बीच ढेर सारे अंतर्विरोध होंगे. भौगोलिक दशाओं और द्वंद्वात्मक स्थितियों से लेकर नागरिकों के व्यवहार तक में इन अंतर्विरोधों का वास होगा. तब सवाल है कि आलोचक किसी लेखक की कृति में कौन सी दुनिया की खोज करता है वह उसमें साधारण लोगों की दुनिया खोजता है या फिर रचना में लेखक की ही दुनिया की तलाश करता है अगर उसकी जिद है कि वह किसी रचना में साधारण दुनिया खोजता है, तो कोई लेखक उसके लिए अपने दरवाजे बंद कर सकता है ऐसे व्यवहार के औचित्य के लिए लेखक के पास यह दावा हो सकता है कि उसने जो दुनिया रची है, वह अपनी अवधारणा और उसमें रच-बस सकने वाले अपने नागरिकों के आधार पर टिकी है इसे लेखक की दुनिया के एक तार्किक आधार के रूप में ग्रहण भी किया जा सकता है इस आधार पर लेखक एक आलोचक के लिए यह चुनौती खड़ी कर सकता है कि वह किसी रचना में उस दुनिया की तलाश करे, जिसकी वास्तव में रचना की गई है. 

यहाँ एक संकट यह है कि लेखक स्वयं उस दुनिया का निवासी नहीं है, जो उसने रची हैं. वह उस दुनिया का सामान्य (या विशिष्ट) नागरिक है, जो वस्तुत: साधारण लोगों की दुनिया है. इससे भी आगे उसने जो दुनिया रची है, वह साधारण दुनिया के परिप्रेक्ष्य में ही रची है. यह अवश्य है कि यह परिप्रेक्ष्य सामान्य न होकर बहुत जटिल है, क्योंकि इसके मूल में साधारण दुनिया की सचाई सामने लाने या उस दुनिया को प्रभावित करने या बदल डालने के दावे होते हैं. यहाँ आलोचक के सामने और भी बड़ी चुनौती आ खड़ी होती है. क्योंकि उसे अपने आलोचना कर्म के हथियारों से उस दुनिया का दरवाजा भी खोलना होता है, जिसकी चाबी सिर्फ लेखक के पास है (कारण यह कि अपनी दुनिया की रचना प्रक्रिया केवल लेखक को ही पता होती है, आलोचक को नहीं) और लेखक की दुनिया का मूल्यांकन साधारण दुनिया के परिप्रेक्ष्य में भी करना होता है. यहाँ संकट यह है कि इस परिप्रेक्ष्य का दावा लेखक ने किया था, आलोचक ने नहीं, इसलिए उसकी सही-सही समझ केवल लेखक को ही हो सकती है, आलोचक अपने उपकरणों के सहारे लेखक की समझ के निकट पहुँचने की कोशिश भर कर सकता है.

यह परिस्थिति आलोचना-कर्म को अत्यधिक जटिल और संश्लिष्ट बनाती है तथा आलोचक को विश्लेषक के साथ रचनाकार की भूमिका में ला खड़ा करती है. प्रो. ऋषभदेव शर्मा अपनी इस नवीनतम कृति में दोनों ही रूपों में नज़र आते हैं. मेरी शुभकामनाएँ!
11 मई, 2016                                                                                                    

                                                                         - देवराज
                                                                 पूर्व अधिष्ठाता,
                                      अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ,
               महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय,
                           गांधी हिल्स, वर्धा – 422005 (महारष्ट्र).

(पुस्तक) 'कथाकारों की दुनिया' : डॉ. ऋषभदेव शर्मा

कथाकारों की दुनिया/ ऋषभदेव शर्मा 
I.S.B.N. : 978-81-7965-278-7
प्रथम संस्करण, 2017 
पृष्ठ 392, मूल्य : रु. 800
 तक्षशिला प्रकाशन, 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
दूरभाष : 011-43528469, 23258802
ईमेल : info@taxshilabooks.in, taxshilabooks@gmail.com


पुस्तक के बारे में 

‘कथाकारों की दुनिया’ के लेखक की मान्यता है कि एक दुनिया कथाकार को मिलती है, जिस पर उसका कोई वश नहीं होता और एक दुनिया वह रचता है, जिस पर उसका शासन चलता है. उसे मिली हुई दुनिया दरअसल उस पर थोप दी गई होती है और उसे उसका एक टुकड़ा बना दिया गया होता है. जो दुनिया वह खुद निर्मित करता है, उसके नदी-नालों, खेत-जंगलों, बस्तियों-शहरों, उनमें रहने वाले लोगों के बारे में सारे निर्णय उसी के होते हैं. क़ानून व्यवस्था, लड़ाई-झगड़े, शांति-अशांति, अपराध-आंदोलन, न्याय-नियम, परिवार-समाज, दोस्ती-दुश्मनी, नैतिकता-अनैतिकता, रिश्ते-नाते, संवाद-संवादहीनता, भाषा के उचित-अनुचित प्रयोग आदि जो कुछ भी ज़रूरी है, उसे लेखक अपनी दुनिया के लिए अपने ढंग से तय करता है. 

इस आधार पर लेखक एक आलोचक के लिए यह चुनौती खड़ी कर सकता है कि वह किसी रचना में उस दुनिया की तलाश करे, जिसकी वास्तव में रचना की गई है. यह परिस्थिति आलोचना-कर्म को अत्यधिक जटिल और संश्लिष्ट बनाती है तथा आलोचक को विश्लेषक के साथ रचनाकार की भूमिका में ला खड़ा करती है. प्रो. ऋषभदेव शर्मा अपनी इस आलोचना-कृति में दोनों ही रूपों में नज़र आते हैं. 

प्रेमचंद ने अपने कथासाहित्य के माध्यम से आदर्शोन्मुख यथार्थ से प्रेरित अपनी दुनिया रची. उनकी इस दुनिया में गाँव और किसान तो हैं ही, अपने समय को चुनौती देती हुईं स्त्रियाँ भी हैं. प्रेमचंद जहाँ एक ओर जिजीविषा और संघर्ष की दुनिया रचते हैं वहीं दूसरी ओर फक्कड़पने से लेकर अमानुषिकता तक के अलग-अलग लोक भी निर्मित करते हैं. जैनेंद्र अपनी दुनिया मनोविश्लेषण के ताने-बाने से बुनते हैं तो अज्ञेय क्षणों के सहारे निजता के द्वीप उगाते हैं. नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, शिवप्रसाद सिंह और रामदरश मिश्र की दुनिया गाँवों और अंचलों की वह दुनिया है जिसकी यातना अनंत है और जिजीविषा असीम. निराला प्रगतिशीलता से लेकर किन्नर और समलैंगिक विमर्श तक की पहली ईंटें रखते हैं तो रांगेय राघव, श्रीलाल शुक्ल, मन्नू भंडारी और भगवान सिंह क्रमशः आदिवासी विमर्श, सत्ता विमर्श, लोकतंत्र विमर्श और जनवाद की शिलाओं से अपनी अपनी दुनिया बनाते हैं. अनामिका, मैत्रेयी पुष्पा, अलका सरावगी, महुआ माजी और अहिल्या मिश्र जैसी लेखिकाएँ स्त्री विमर्श की भींतों पर अपनी दुनिया खड़ी करती हैं तो ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश कर्दम, श्योराजसिंह बेचैन और मुद्राराक्षस जैसे कथाकार दलितों की अधिकार चेतना और अंबेडकरवाद के सहारे अपनी नई दुनिया का निर्माण करते हैं. बलराम अग्रवाल और सुकेश साहनी अपनी लघुकथाओं में जिस संसार की रचना करते हैं उसके एक सिरे पर लोक और लोकतंत्र है तो दूसरे सिरे पर अतिरंजना और महास्वप्न. अभिप्राय यह है कि अपनी कथा-रचना के माध्यम से हर संवेदनशील कथाकार अपनी रुचि के अनुसार अपनी समानांतर दुनिया का सृजन करता है. 

प्रस्तुत ग्रंथ में हिंदी के प्रमुख कथाकारों द्वारा रची गई उनकी इसी अपनी दुनिया की प्रामाणिक पड़ताल की गई है और यह दर्शाया गया है कि बहुत सी कथा कृतियाँ अपनी निजी दुनिया के कारण देश-कालांतरगामी महत्व प्राप्त कर लेती हैं. यह ग्रंथ कभी उस दुनिया का पता देता है जो कथाकार को बनी बनाई मिली है तो कभी उस दुनिया की ओर इशारा करता है जिसे कथाकार बनाना चाहता है. 

‘कथाकारों की दुनिया’ में हिंदी के अलावा कुछ प्रमुख तेलुगु कथाकारों की दुनिया की भी एक झाँकी प्रस्तुत है. साथ ही, तमिल कहानी साहित्य के उद्भव और विकास का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने के बहाने तमिल कथाकारों की दुनिया की भी एक झलक उपस्थित है. इस तरह इस ग्रंथ में हिंदी, तेलुगु और तमिल के मध्य राष्ट्रभाषा के माध्यम से सेतु-रचना का भी स्तुत्य कार्य किया गया है. 


लेखक के बारे में 

डॉ. ऋषभ देव शर्मा 

जन्म : 04 जुलाई 1957, ग्राम गंगधाड़ी, जिला मुजफ्फर नगर, उत्तर प्रदेश. 

शिक्षा : एमए (हिंदी), पीएचडी (उन्नीस सौ सत्तर के पश्चात की हिंदी कविता का अनुशीलन). 

कार्य : 1983-1990 : जम्मू और कश्मीर राज्य में गुप्तचर अधिकारी (इंटेलीजेंस ब्यूरो, भारत सरकार). 1990-2015 : उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के विभिन्न केंद्रों में अध्यापन एवं शोध निर्देशन. 4 जुलाई, 2015 को उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के हैदराबाद केंद्र के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष पद से अवकाशप्राप्त. 

संप्रति : स्वतंत्र लेखन. 

प्रकाशन : काव्य संग्रह – तेवरी (1982), तरकश (1996), ताकि सनद रहे (2002), देहरी (स्त्रीपक्षीय कविताएँ, 2011), प्रेम बना रहे (2012) [तेलुगु काव्यानुवाद : प्रेमा इला सागिपोनी (2013), प्रिये चारुशीले (2013)], सूँ साँ माणस गंध (2013), धूप ने कविता लिखी है (2014). 

आलोचना - तेवरी चर्चा (1987), हिंदी कविता : आठवाँ नवाँ दशक (1994), साहित्येतर हिंदी अनुवाद विमर्श (2000), कविता का समकाल (2011), तेलुगु साहित्य का हिंदी पाठ (2013), तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय (2015), हिंदी भाषा के बढ़ते कदम (2015), कविता के पक्ष में (2016), कथाकारों की दुनिया (2016). 

संपादन : पदचिह्न बोलते हैं (1982) , शिखर-शिखर (डॉ.जवाहर सिंह अभिनंदन ग्रंथ, 1994), कच्ची मिट्टी – 2 (1994), माता कुसुमकुमारी हिंदीतरभाषी हिंदी साधक सम्मान : अतीत एवं संभावनाएँ (1996), अभिनंदन : जनकवि दुलीचंद शशि, हैं सरहदें बुला रहीं (2000), भारतीय भाषा पत्रकारिता (2000), अनुवाद : नई पीठिका, नए संदर्भ (2003), हिंदी कृषक (काजाजी अभिनंदन ग्रंथ, 2005), पुष्पक – 3 (2003), पुष्पक – 4 (2004), स्त्री सशक्तीकरण के विविध आयाम (2004), प्रेमचंद की भाषाई चेतना (2006), अनुवाद का सामयिक परिप्रेक्ष्य (1999, 2009), भाषा की भीतरी परतें : भाषाचिंतक प्रो.दिलीप सिंह अभिनंदन ग्रंथ (2012), मेरी आवाज (2014), उत्तरआधुनिकता : साहित्य और मीडिया (2015) , संकल्पना (2016), वृद्धावस्था विमर्श (2016), ‘अंधेरे में’ का पुनर्पाठ (2016). 

मूलतः कवि. 1981 में तेवरी काव्यांदोलन (आक्रोश की कविता) का प्रवर्तन. हिंदी के प्रचार-प्रसार-अध्ययन-अध्यापन हेतु पूर्णत: समर्पित. अनेक शोधपरक समीक्षाएँ एवं शोधपत्र प्रकाशित. डीलिट, पीएचडी और एमफिल के 142 शोधकार्यों का निर्देशन. सौ से अधिक पुस्तकों के लिए भूमिका लेखन. 

सम्मान : 

वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक ट्रस्ट, हैदराबाद द्वारा ‘हिंदी साहित्य सम्मान’ (2015), तमिलनाडु हिंदी साहित्य अकादमी, चेन्नई द्वारा ‘जीवनोपलब्धि सम्मान’ (2015), प्रतिभा प्रकाशन, हैदराबाद द्वारा ‘सुगुणा स्मारक सम्मान’ (2015), कमला गोइन्का फाउण्डेशन, बैंगलोर द्वारा ‘रमादेवी गोइन्का हिंदी साहित्य सम्मान’(2013), जनजागृति सेवा सद्भावना पुरस्कार, हैदराबाद (2011), शिक्षा शिरोमणि पुरस्कार, हैदराबाद (2006), रामेश्वर शुक्ल अंचल सम्मान, जबलपुर (2002). 

विशेष : ऋषभदेव शर्मा का कविकर्म (2015 : डॉ. विजेंद्र प्रताप सिंह द्वारा समग्र काव्य का विमर्श मूलक मूल्यांकन) 

संपर्क : 208 ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद – 500013 (तेलंगाना). फोन : 08121435033, 040-42102132 

ईमेल : rishabhadeosharma@yahoo.com, rishabhadsharma@gmail.com


आभार

मुझे लगता है कि यदि कोई लेखक निश्चिंत और निर्द्वंद्व होकर कुछ लिख पाता है तो ऐसा तभी संभव है जब उसे परिवार और परिवेश का समर्थन प्राप्त हो. मैं बचपन से आज तक जो भी लिख पाया हूँ, घर से मिले प्रोत्साहन की उसमें बड़ी भूमिका रही है. ‘कथाकारों की दुनिया’ कभी न रची जाती, अगर मेरे जैसे व्यावहारिक बुद्धि से हीन और प्रमादी व्यक्ति को घर-परिवार का संबल न मिला होता. मेरे दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा से सेवानिवृत्त होने पर श्रीमती जी (डॉ.. पूर्णिमा शर्मा), बिटिया (लिपि भारद्वाज) और बेटे (कुमार लव) ने आदेश के स्वर में कहा था - अब आप लिखने में लग जाइए. यह पुस्तक उनके आदेश का पालन करते हुए लिखी गई है. ‘आभार’ में क्या कहूँ?... 

इस पुस्तक के लिए संदर्भ सामग्री जुटाने से लेकर प्रेस कॉपी तैयार करने तक की जिम्मेदारी सौभाग्यवती डॉ.. जी. नीरजा ने स्वेच्छा से अपने सिर पर ले ली और दिन-रात एक कर दिया. उन्हें और उनके पतिदेव तथा सुपुत्री को अनंत आशीर्वाद! 

पुस्तक को प्रकाशन के मुहाने तक पहुँचाने में डॉ. पोलवरपु जयलक्ष्मी तथा डॉ. सिरिपुरपु तुलसी देवी के आग्रह की भी बड़ी भूमिका रही है. मैं उनके प्रति भी आभारी हूँ. 

‘दो शब्द’ और ‘अभिमत’ लिख देकर मुझे भाग्यवान बनाने के लिए प्रो. देवराज जी और प्रो. एम. वेंकटेश्वर जी को विनम्र प्रणाम! 

... और पुस्तक को निर्धारित समय के भीतर सुरुचिपूर्वक प्रकाशित करने के लिए प्रिय भाई कमल बिष्ट और तक्षशिला प्रकाशन का विशेष आभार. 


- ऋषभदेव शर्मा