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गुरुवार, 17 सितंबर 2009

'स्त्रियों ने भी तो बहुत लड़ाइयाँ लड़ी हैं। अब भी लड़ रही हैं।'

खंजर और खंजन :

तेलुगु की पाँच लंबी कहानियों का अनुवाद




डॉ. विजय राघव रेड्डी विगत चार दशक से अधिक अवधि से तेलुगु से हिंदी में अनुवाद का महत्कार्य कर रहे हैं। रेड्डी जी को हिंदी पर अपनी मातृभाषा तेलुगु जैसा ही अधिकार प्राप्त है क्योंकि उन्होंने उच्च शिक्षा हिंदी क्षेत्र में और हिंदी माध्यम से प्राप्त की तथा चालीस वर्ष तक केंद्रीय हिंदी संस्थान में कार्यरत रहकर हिंदी के मुहावरे को आत्मसात किया है। उनकी हिंदी सेवा के लिए उन्हें अनेकानेक छोटे-बड़े सम्मान और पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं। लेखन और अनुवाद के क्षेत्र में उनकी सक्रियता का यह भी एक प्रमाण है कि अभी कुछ समय पूर्व उनकी चालीसवीं पुस्तक प्रकाशित हुई है। शीर्षक है ‘खंजर और खंजन’ (2007)। इस पुस्तक में उन्होंने तेलुगु की पाँच लंबी कहानियों का अनुवाद प्रस्तुत किया है।
डॉ. रेड्डी ने अब तक कम-से-कम सत्तर कहानियों का अनुवाद किया है जो अनेक पत्रिकाओं और चार कहानी संकलनों के माध्यम से हिंदी पाठकों तक पहुँच चुकी हैं। वे बताते हैं कि यों तो तेलुगु में बीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में पत्र-पत्रिकाओं में ‘ललिता’ और ’अपूर्वोपन्यासमु' जैसी कहानियाँ प्रकाशित होने लगी थीं लेकिन आधुनिक कहानी की दृष्टि से गुरजाडा अप्पाराव की ‘दिद्दुबाटु’ (सुधार, फरवरी 1910) को प्रथम मौलिक कहानी माना जाता है। यह जानकारी भी पर्याप्त रोचक है कि पूर्वोक्त कहानियाँ लेखक के नाम के बिना ही छपी थीं।

अस्तु , अब तक एक शताब्दी की अवधि में तेलुगु में कम-से-कम एक लाख कहानियाँ और सौ से अधिक कहानी संकलन प्रकाशित होने की बात सामने आई है। यह समृद्ध कहानी साहित्य चार हजार कहानीकारों के साहित्यिक योगदान का परिणाम है जिस पर किसी भी भाषा, जाति और राष्ट्र को गर्व होना चाहिए। यह भी उल्लेखनीय है कि इनमें से लगभग एक हजार कहानियाँ चालीस संकलनों तथा अनेक पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से हिंदी में अनूदित होकर आ चुकी हैं तथा व्यापक विचार-विमर्श के साथ-साथ अन्य भाषाओं में अनुवाद के लिए भी काम में आ चुकी है। इससे यह तथ्य परिपुष्ट होता है कि हिंदी भारतीय भाषाओं के बीच परस्पर अनुवाद के लिए माध्यमिक भाषा (फिल्टर लैंगवेज) के रूप में अत्यंत समर्थ तथा संभावनाशील भाषा है।
‘खंजर और खंजन’ में कुल पाँच लंबी कहानियाँ हैं - तुम्मेटि रघोत्तम रेड्डी की ‘घरेलू छोरी’ (पनिपिल्ला, 1994), बंडि नारायण स्वामी की ‘बेटियों का बाप’ (संघ पशुवु, 1995), दादा हयात की ‘दो आने की घुँघनी’ (रेंडणाल गुग्गिळ्लु), अल्लम राजय्या की ‘वे’ (अतडु, 1995) तथा केतु विश्वनाथ रेड्डी की ‘खंजर और खंजन’ (खड्गालु-काटुक पिट्टलु, 1991)|

अनुवादक ने इनके संबंध में दो विशेष जानकारियाँ दी हैं। एक तो यह कि इनमें से दो कहानियाँ तेलंगाना इलाके के और तीन रायलसीमा इलाके के बहुचर्चित कहानीकारों की कहानियाँ हैं। हम नहीं जानते कि उन्होंने यह इलाकाई वर्गीकरण किस आवश्यकता की पूर्ति के लिए किया है परंतु साहित्य का इस प्रकार भौगोलिक सीमांकन कोई बहुत अच्छी प्रवृत्ति प्रतीत नहीं होता। हाँ, यदि इस वर्गीकरण के आधार पर इन कहानीकारों की क्षेत्रगत और भाषागत प्रवृत्तियों का कोई तुलनात्मक स्वरूप उभरकर सामने आ सकता तो संभवतः इसका कुछ औचित्य समझ में आ सकता था। अस्तु, दूसरी और अत्यंत महत्वपूर्ण सूचना है कि इनमें से ‘घरेलू छोरी’ एक ऐसी कहानी है जिस पर वर्षों चर्चा-परिचर्चाएँ होती रहीं और पत्र-पत्रिकाओं में समीक्षाएँ छपती रहीं जिनका संकलन 132 पृष्ठ की पुस्तक ‘एवरी पनिपिल्ला’ (किसकी नौकरानी) के रूप में प्रकाशित हो चुका है। इससे इस कहानी के महत्व और तेलुगु भाषाई पाठक और समीक्षक वर्ग की जागरूकता का पता चलता है जो निश्चय ही अन्य भाषाओं के लिए भी अनुकरणीय है।

'घरेलू छोरी' तेलुगु सामंती वातावरण और लोक जीवन के संघर्ष को उभारकर सामने लाने वाली कहानी है। इसमें स्थान-स्थान पर व्यवस्था पर व्यंग्य भी निहित है। आदिवासियों और गिरिजनों के अधिकारों की दृष्टि से भी यह एक महत्वपूर्ण कहानी है जो इतिहास का भी पुनर्पाठ करती है तथा नक्सल समस्या को सहानुभूतिपूर्वक विवेचित करती है। सामाजिक विषमता और सामाजिक न्याय से जुडे़ तमाम प्रश्न इस कहानी में व्यंजित हुए हैं, साथ ही स्त्री विषयक प्रश्न भी।

‘बेटियों का बाप’ स्त्री विमर्श की दृष्टि से विशेष पठनीय कहानी है और तेलुगु समाज में आधुनिक युग में स्त्री की दशा पर टिप्पणी करती है। निश्चय ही लड़की पैदा होते ही माँ-बाप के घबराने की स्थिति समाज की ही देन है और इसके लिए मरने पर चिता को आग देने, खानदान की वृद्धि और पुन्नाम नामक नरक से रक्षा करने के लिए लड़के का होने जरूरी मानने जैसे पुराणपंथी विश्वास जिम्मेदार हैं जो आर्थिक और नैतिक बोझ ढोते हुए लड़की के पिता को असमय बूढ़ा कर देते हैं ।
‘दो आने की घुँघनी’ का परिवेश पारिवारिक है। इस कहानी को वृद्धावस्था के मनोविज्ञान की दृष्टि से पढ़ा जाना आवश्यक है।


‘वे’ में भी एक स्त्री है जिसकी कारुणिक दशा का अनुमान इस कथन से हो सकता है -
‘पति के दोनों पैर कोयले की खान में कट जाने से कमाई का सहारा खत्म हो जाने से छोटे-बच्चों को और पति को पालने के लिए खरीद-फ़रोख्त से अनजान उसने इतने सालों से सब्जी के व्यापार में जो गठरी बाँध रखी थी, उसके फैल जाने जैसी पीड़ा ने अपने अंदर के प्राणी को झकझोरा तो बुढ़िया अवाक होकर रो पड़ी। उसके रोने पर किसी का ध्यान नहीं गया।’
यह कहानी शहरी आपाधापी को भली प्रकार उभारती है। संग्रह की शीर्ष कहानी
‘खंजर और खंजन'के रचनाकार केतु विश्वनाथ रेड्डी अकालपीड़ित रायलसीमा इलाके के जनजीवन की गुटबाजी की राजनीति और इसके कारण होने वाले दुष्परिणामों के सफल चितेरे के रूप में प्रसिद्ध हैं । यह कहानी शिक्षा और शोध के क्षेत्र में शोषण और तानाशाही को सामने लाने में सफल है। इतिहास की सामंती व्याख्या करने की प्रवृत्ति पर इसमें गहरी चोट की गई है।

इसमें संदेह नहीं कि ‘खंजर और खंजन’ में संकलित कहानियाँ वस्तु और शिल्प की दृष्टि से विशिष्ट कहानियाँ हैं तथा इनमें तेलुगु संस्कृति और लोकजीवन की प्रामाणिक छवियाँ इस भाषा समाज के सदस्यों की दैनंदिन समस्याओं के साथ अंकित हैं । इसमें भी संदेह नहीं कि लोक और संस्कृति से जुड़े साहित्यिक पाठ का अनुवाद करना टेढी खीर है । इसके लिए अनुवादक ने पाद टिप्पणियों का सटीक उपयोग किया है जैसे
‘पंबाल’ (गाँवों में कथा सुनानेवाली जाति विशेष ), ‘नारिगाडु’ (गाडु अनादरसूचक है जिसका प्रयोग छोटी जाति के लोगों के लिए किया जाता है), ‘अन्नलु’ (नक्सलियों के लिए तेलुगु में प्रयुक्त शब्द), ‘अक्का’ (तेलुगु में दीदी को अक्का कहते है), ‘अडपापा’ (घर की दासी जिसके शरीर पर भी मालिक को अधिकार रहता है/राजस्थानी शब्द 'गोली' का समानार्थक शब्द), ‘हल्दी का टुकडा’ (गले में हल्दी के टुकडे को पहनना शादीशुदा होने की पहचान है)।


निश्चय ही ये कहानियाँ भारतीय साहित्य को समृद्ध करती हैं और इन्हें हिंदी में उपलब्ध कराने के लिए सिद्धहस्त अनुवादक डॉ. विजयराघव रेड्डी साधुवाद के पात्र हैं।

अंततः संग्रह की सर्वाधिक चर्चित और विवादास्पद कहानी ''घरेलू छोरी''(पनिपिल्ला) का एक अंश पाठकों के आत्मविमर्श हेतु उद्धृत है -
‘‘सैकड़ों वर्षों के मानव के इतिहास में पुरुषों के समान अधिकार पाने के लिए स्त्रियों ने लड़ाइयाँ लड़ी हैं। राजाओं के द्वारा लड़ी गई लड़ाइयाँ और राज्यों के बँटवारे के बारे में जो इतिहास बताता है, उसी की हमें जानकारी है। वे सब पुरुषों की वीरगाथाओं से संबंधित इतिहास हैं। स्त्रियों ने भी तो बहुत लड़ाइयाँ लड़ी हैं। अब भी लड़ रही हैं। यह सब तो मौखिक रूप में विद्यमान इतिहास है। ग्राम की देवियाँ जो हैं ऐसी लड़ाइयों के प्रमाण प्रस्तुत करती हैं। ‘ईदम्मा’, ‘अंकम्मा’, ‘एल्लम्मा’, ‘पोचम्मा’ और ‘मैसम्मा’ आदि मंदिर व गोपुरों के बिना, अपनी बगल में अपने पतियों की मूर्तियों के बिना ही, हाथों में अस्त्र धारण किए हुए ग्राम-देवियों के रूप में कई पीढ़ियों से लाखों स्त्रियों के द्वारा पूजी जा रही हैं। पुरुष देवता तो टीलों पर बड़े-बड़े गोपुरों से युक्त मंदिरों में विराजमान हैं। इन पुरुष देवताओं की नित्य पूजा-अर्चना की जाती है। यह विवक्षा कब से शुरू हुई?’’
* खंजर और खंजन (तेलुगु की पाँच लंबी कहानियों का अनुवाद)/ अनुवादक : डॉ.. विजयराघव रेड्डी/ जयभारती प्रकाशन, इलाहाबाद/ प्रथम संस्करण : 2007/ 125 रुपये/ पृष्ठ 136 सजिल्द।

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