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बुधवार, 16 सितंबर 2009

स्त्री : कहानी-दर-कहानी




स्त्री: कहानी-दर-कहानी




यह युग स्त्री की अपनी अभिव्यक्ति का युग है। लंबे समय तक पुरुष लेखकों ने यह भी जिम्मेदारी अपने ऊपर ही ले रखी थी। आवष्यकता है दोनों की नारी परिकल्पना का तुलनात्मक अध्ययन करने की। देखा जाना चाहिए कि एक जैसे स्त्री विषयक और अन्य मसलों पर पुरुष और स्त्री रचनाकारों की दृष्टि और अभिव्यक्ति किस प्रकार समान और भिन्न है। इसके लिए विविध विधाओं में प्रस्तुत नारी परिकल्पना को समझना भी आवष्यक है - इस आवष्यकता के सर्वथा अनुरूप है डा. संगीता व्यास की शोधपरक कृति ‘नवें दषक की हिंदी कहानियों में नारी परिकल्पना’ (2005)।



पुस्तक में लेखिका ने जोर देकर भारतीय समाज में स्त्री और पुरुष के लिए निर्धारित आचार संहिताओं के अंतर की ओर ध्यान दिलाया है और यह माना है कि स्त्री जीवन की दयनीयता के पीछे पुरुष समाज की भयग्रस्त मानसिकता निहित है। अपनी आंतरिक शक्ति के बल पर स्त्री पुरुष को पीछे न छोड़ दे, इसी भय से पुरुष प्रधान समाज ने उसे अषिक्षित रखा तथा सुरक्षा प्रदान करने के नाम पर उसे स्वतंत्रता से वंचित किया। परिणामस्वरूप स्त्री की अपनी पहचान नदारद हो गई और उसे पुरुष के नाम से पहचाना जाने लगा। आज के समय में जब स्त्री षिक्षित भी है और आर्थिक रूप से पुरुष पर निर्भर रहने को विवष भी नहीं है, उसने अपनी स्वतंत्र पहचान के बारे में सोचना शुरू कर दिया है तथा कहानीकारों ने इस स्थिति को भली प्रकार चित्रित भी किया है। (क्यों रे
मा, क्या औरत हमेषा आदमी के ही नाम से जानी जाएगी? - साल की पहली रात/मेहरुन्निसा परवेज़)। इस चित्रण के आधार पर ही लेखिका ने यह प्रतिपादित किया है कि जहाँ भारतीय संस्कृति में नारी इतनी महत्वपूर्ण रही है कि ईष्वर की कल्पना भी अर्धनारीष्वर के रूप में की गई है, वहीं मध्यकाल में वह भयावह शोषण का पात्र रही। वे यह भी मानती है कि आज की नारी अपने अधिकारों का प्रयोग जान चुकी है और हर क्षेत्र में महत्व अर्जित कर रही है लेकिन दुर्भाग्यवष आज भी वह शोषण का षिकार है।



कल और आज के इस द्वंद्व का समकालीन कहानी में विचारोत्तेजक प्रतिफलन हुआ है। 20वीं शताब्दी के नवें दषक की कहानी में संक्रमणकालीन चेतना का स्वर सबसे तीव्र है। इसके पात्र निम्न मध्य वर्ग तथा सर्वहारा वर्ग के ऐसे सषक्त और विद्रोही पात्र है जो प्रेमचंद के पात्रों की तरह न तो घुट-घुटकर मरते है और न ही सामाजिक अत्याचारों तथा विषमताओं के विरुद्ध झंडा खड़ा करते है। लेखिका ने यह लक्षित किया है कि इस युग का कथापात्र लेखक का गवाह नहीं बल्कि स्वयं अपना गवाह है।



इसके साथ ही उन्होंने यह भी माना है कि इस युग की कहानी में प्रणय की जो प्रवृत्ति परिलक्षित होती है, वह अनुभूतिजन्य है। पहले की कहानियों में रागात्मक ऊर्जा का अभाव था, क्योंकि वह आत्मरति, अवसाद एवं कंुठा को कंेद्र बनाकर रची गई थी, परंतु इनमें न तो पहले-सा वह छिछलापन और दिखावा है और न ही अनुभूति की अपरिपक्वता। इसमें चित्रित प्रणय संबंध भौतिक एवं यांत्रिक सभ्यता से त्रस्त मानव-मन के प्रणय संबंध हैं, जो क्षण-क्षण नए रूपों को प्राप्त करते हैं और अनुभूति की गहराई से संपृक्त होकर पाठक को गहरे छू लेते हैं। लेखिका का मत है कि समकालीन महिला कथाकारों ने जहाँ कहीं पे्रम के उथलेपन, तीसरे की तलाष तथा यौन विकृतियों का निरूपण करने की चेष्टा की है, वहाँ भारतीय सामाजिक जीवन की व्यावहारिक यथार्थता प्रायः लुप्त होती प्रतीत होती है। इसमें दो राय नहीं कि लेखिका की यह स्थापना विवाद का विषय हो सकती है क्योंकि भारतीय सामाजिक जीवन के व्यावहारिक यथार्थ के समकालीन विदू्रप पक्ष से आँख नहीं फेरी जा सकती। इस विदू्रप पक्ष से लेखिका भी भली-भांति परिचित हैं इसीलिए तो उन्होंने अनुसंधाता से आगे बढ़कर उपदेषक बनते हुए यह परामर्ष दिया है कि ‘कर्तव्य-बोध से प्राप्त इन समस्याओं का हल नारी का आत्मसंयम ही है। यह संयम ही उसके जीवन क्षेत्र में उन्नति का मार्ग प्रषस्त करेगा। वह अपने परिवेष के अनुरूप परिवर्तित दृष्टिकोण से ही, विवेकपूर्ण व्यवहार से ही पति, परिवार और बाॅस के त्रिकोण को संतुष्ट रखने की रामबाण औषधि होगी।’ पर संतुष्ट तो सबको करना ही है ‘क्योंकि नारी पति के घर में ठीक है, पर उसके बाद तो बदनामी ही बदनामी है। उसे पुरुष का नाम, घर, छत, रोटी आवष्यक है। जहाँ उसे पुरुष का नाम नहीं मिलता, उसका कोई अस्तित्व नहीं रहता।’ अन्यत्र लेखिका ने याद दिलाया है कि भारतीय नारी धर्म के नाम पर हर तरह की यातना सह लेती है तथा उसमें सभी गुण होते हुए भी उसे जीने की कला नहीं आती। कहानीकारों ने भारतीय नारी की इस विड़ंबना को भी चित्रित किया है। साथ ही ग्रामीण अंचलों की स्त्री की निरीहता को भी उभारा है।



समकालीन कहानी ने पति-पत्नी के संबंधों में परिवर्तन की भी पड़ताल की है और दर्षाया है कि स्त्री की आर्थिक आत्मनिर्भरता ने पति के स्वामित्व के परंपरागत मूल्य को खंडित कर दिया है (खोज/मंजुल भगत, कितना बड़ा झूठ/उषा प्रियंवदा, मान और हठ/उषा प्रियंवदा, मन/सिद्धे
, ग्रोथ/षिप्रभा शास्त्री)। लेखिका का यह कथन ध्यातव्य है कि आज विवाहित स्त्रियों को दोहरे उत्पीडन का षिकार होना पड़ता है क्योंकि उनसे पति नौकरी तो करवाना चाहते हैं, जिससे घर की अर्थव्यवस्था ठीक रहें पर उनके पति घर के बाहर के आचरण पर संदेह भी करते हैं। इससे ऐसी महिलाओं का दांपत्य जीवन बड़ा कठिन हो जाता है।



लेखिका ने विवेच्य काल की कहानी को मानवीय संघर्ष की प्रखरता की कहानी माना है जो आज के निरुपाय संघर्षरत मनुष्य की संवेदना को व्यक्त करती है, संबंधों की विसंगति, जटिलता और तनाव को दर्षाती है तथा आक्रो
और आक्रामकता की प्रवृत्ति से युक्त है। इन कहानियों में नारी के दो स्वरूपों की परिकल्पना की गई है। एक वह जिसमें नारी सफलता की ऊँची उड़ान तो भरती है लेकिन अपनी जमीन से जुड़ी रहती है तथा दूसरा वह जिसमें सफलता की उड़ान भरते-भरते नारी अपनी जमीन को छोड़ देती है, उसे बहुत कुछ प्राप्त तो होता है पर उससे ज्यादा खोना पड़ता है। कुल मिलाकर डा. संगीता व्यास की यह शोध कृति समकालीन कहानी की स्त्री विषयक अवधारणा को समझने में बड़ी हद तक सहयोगी है।



नवें दक की हिंदी कहानियों में नारी परिकल्पना/

डा. संगीता व्यास/

मिलिंद प्रकान, हैदराबाद/

2005/

250 रु. /

पृष्ठ 204 सजिल्द


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