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रविवार, 6 सितंबर 2009

आलूरि बैरागी चौधरी का कवि कर्म

धुनी जा रही दुर्बल काया .
मलिन चाम में हाड-मांस जिसमें स्वर्गिक सपनों की माया.

नस-नस तांत बनी धुन जाती
रग-रग में हिम-ज्वाल सुलगती
उड़ते उजले मन के फूहे शरद-मेघ की बिखरी छाया.
रोम-रोम में जगती पीड़ा
चपल क्रूर शिशुओं की क्रीडा
कौन निर्दयी जीवन-वन में छुपे व्याध-सा धुनने आया?

पलित पुरातन स्तूप बनेगा
जीवन का नव रूप छनेगा
किसी अविदित अदृश्य दानव ने मेरा नाम-निशान मिटाया.
मैं न रहूँगा तो क्या होगा?
हर्ष-शोक एक सपना होगा
विपुल विश्व ये माटी होगा माटी बन माटी का जाया.
-(धुनी जा रही दुर्बल काया / प्रीत और गीत)


इस छायावादी संस्कार से आरम्भ करके नई कविता तक की यात्रा करने वाले, कई स्थलों पर सुमित्रानंदन पन्त और सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला से तुलनीय कविवर आलूरि बैरागी चौधरी(०५ सितम्बर १९२५ - ०९ सितम्बर १९७८) को ए बी सी के आद्याक्षरों के रूप में भी पहचाना जाता है. तेलुगु भाषी हिन्दी साहित्यकार बैरागी मूलतः आन्ध्र प्रदेश के ऐतानगर(तेनाली तालुक, गुंटूर जिला) के निवासी थे. वे एक मध्य-वर्गीय कृषक परिवार में जन्में थे और उन्हें राष्ट्रीयता तथा हिन्दी प्रेम अपने पिता से विरासत में मिला था. अत्यन्त मेधावी बैरागी की स्कूली शिक्षा कक्षा ३ तक ही हो सकी परन्तु उन्होंने स्वाध्याय द्बारा तेलुगु, हिन्दी और अंग्रेज़ी पर अधिकार ही प्राप्त नहीं किया बल्कि इन तीनों भाषाओं में काव्य-सृजन भी किया. हिन्दी तो उनके लिए मानो मातृभाषा ही बन गई थी क्योंकि चार-पाँच वर्ष तक उन्होंने बिहार में रहकर हिन्दी साहित्य का उच्च अध्ययन किया था. वे १९४२ में 'भारत छोड़ो आन्दोलन' में भी सक्रिय रहे. उन पर गांधी, मार्क्स और रेडीकल ह्यूमेनिज्म के प्रवर्तक एम.एन राय का गहरा प्रभाव पड़ा. कुछ दिन वे हाई स्कूल में हिन्दी अध्यापक रहे उसके बाद चार वर्ष 'चंदामामा' के तेलुगु और हिन्दी संस्करणों के संपादक रहे. वे 'दक्षिण भारत हिन्दी प्रचार सभा, मद्रास' के हिन्दी प्रशिक्षण विद्यालय में आचार्य भी रहे. लेकिन अपनी स्वतंत्र प्रवृत्ति और निर्भीकता के कारण ज्यादा दिन कहीं टिक नहीं सके. एक विशेष प्रकार का फक्कड़पन और अक्खडपन उनके व्यक्तित्व और कृतित्व में देखा जा सकता है. वे आजीवन अविवाहित रहे, कोई घर नहीं बसाया - धन-संपत्ति का उन्हें कभी मोह नहीं रहा. १९५१ में उनका हिन्दी काव्य-संग्रह 'पलायन' प्रकशित हुआ था जिसकी तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं में काफ़ी चर्चा हुई थी.


उनके निधन के पश्चात प्रकाशित उनके तेलुगु कविता संग्रह 'आगम गीति' को साहित्य अकादमी द्बारा पुरस्कृत किया गया परन्तु लम्बी अवधि तक उनकी हिन्दी कविताएँ अप्रकाशित पड़ी रहीं . कहा जाता है कि प्रकाशन के लिए अयोग्य समझकर बैरागी जी ने अपनी कविताओं के दो संकलनों को स्वयं नष्ट कर दिया था.१९८९ में उनकी ६५ कविताओं का संकलन ''फूटा दर्पण'' आन्ध्र प्रदेश हिन्दी अकादमी द्बारा प्रकाशित किया गया था. उनकी शेष कविताओं को अब तीन काव्य संग्रहों के रूप में प्रकाशन का सौभाग्य मिला है, ये संग्रह हैं - 'संशय की संध्या', 'प्रीत और गीत' तथा 'वसुधा का सुहाग'.



एक



संशय की संध्या* (२००७) में आलूरि बैरागी की १९४० से १९५१ तक रचित ४२ कविताएँ सम्मिलित हैं जो उन्हें हिन्दी के दिनकर, बच्चन, अंचल, नवीन और सुमन जैसे छायावादोतार कवियों की पंक्ति में खड़ा करने में समर्थ है. उनके साहित्य के संग्राहक और विशेषज्ञ प्रो. पी. आदेश्वर राव का यह मानना कदापि अतिशयोक्ति नहीं है कि प्रगीत शैली में रचित ये कविताएँ पन्त कृत ' परिवर्तन' और निराला कृत 'राम की शक्तिपूजा' की याद दिलाती हैं. इसमें संदेह नहीं कि ये कविताएँ ठोस वैचारिकता, गहन भावानुभूति और विराट कल्पना से ओत-प्रोत हैं तथा भाव और भाषा एक दूसरे के अनुरूप हैं. इस संग्रह में एक ओर तो वैयक्तिक पीड़ा तथा प्रेमानुभूति की कविताएँ हैं और दूसरी ओर सामजिक विषमताजन्य विद्रोह तथा क्रान्ति की कविताएँ हैं. कवि की पक्षधरता दलित शोषित मानव जाति के साथ है और मनुष्य की निर्मलता तथा विकास में, उसकी सृजनशीलता तथा सफलता में उनकी दृढ़ आस्था है. मानव के साथ ही प्रकृति का सौंदर्य भी उन्हें निरंतर आकर्षित करता है. क्योंकि वे किसी भी महान भारतीय कवि की भांति सौन्दर्योपासक हैं. चिंतन और विचारधारा के स्तर पर वे प्रगतिवादी हैं परन्तु उनके सपनों का संसार 'जरा- मरण- अस्तित्व-समस्या-शोक- हीन विगत -विकार ' है.इसीलिये उनके काव्य में मानव और प्रकृति , व्यक्ति और समाज, यथार्थ और कल्पना, सत्य और स्वप्न तथा विचार एवं अनुभूति का अद्भुत सामंजस्य प्राप्त होता है जो एक मानवतावादी रचनाकार के रूप में उनकी महानता का सूचक है. यहाँ इस संग्रह की दो भिन्न प्रकार की कविताओं के अंश द्रष्टव्य हैं -

(१)
जाग रे जीर्ण शीर्ण कंकाल
हड्डियों के ऐ सूखे जाल
युगों से जल-जलकर म्रियमाण
जाग रावण की चिति की ज्वाल
जाग टुकड़ों पर पलते श्वान
जाग गीदड से कायर नीच
जाग अज्ञान निशा के मलिन
क्रोड़ के बड़े लाड़ले लाल
जाग ओ अपमानों के लक्ष्य
हिंस्र पशुओं के निर्बल भक्ष्य
जाग बेबस के उर की हूक
छोड़ केंचुल ओ विषधर व्याल
जाग बूढ़ी कुलटा की आस
गिरहकट चोर दस्यु बदमाश
जाग रे बेकारों के जोर
जाग बाघिन निरुपाय हताश
(जागृति गान)

(२)
जाने क्यों मुरझा जाता प्यार?
आयु की पोथी में दबे गुलाब की सूखी पंखुडियों सा ,
जरा जीर्ण, पर स्वर्ण मोर-पंख, पद- टूटी गुडियों सा ,
भीषण ग्रीष्मानल में ज्यों उड़ती सुरभित जल की फुहार ,
दग्ध नग्न वसुधा का , छिन्न वन्य कुसुम हार !
सुरधनु का क्षण भर का ज्यों सिंगार!
जाने कैसा झर जाता प्यार?
[जाने क्यों मुरझा जाता प्यार?]

इस कृति के बारे में अभी इतना ही .

ए बी सी के दो अन्य सद्य-प्रकाशित काव्य संकलनों की चर्चा आगे. फिलहाल इतना ही कि हिन्दी साहित्य भी हिन्दी भाषा की तरह अखिल भारतीय है .उसे उत्तर भारत के कुछ गिने-चुने शहरों तक सीमित रखना उसकी भारतीय चेतना के साथ अत्याचार के समान है. इसलिए आज हिन्दी साहित्य के इतिहास के वृहत्तर और अखिल भारतीय दृष्टि से पुनर्लेखन की आवश्यकता है . ऐसा करके ही उसे क्षेत्रीयतावादी जड़ता से मुक्त किया जा सकता है. निस्संदेह ऐसे साहित्येतिहास में आलूरि बैरागी चौधरी जैसे दाक्षिणात्य हिन्दी साहित्यकारों के प्रदेय का उचित मूल्यांकन हो सकेगा.

* संशय की संध्या [कविता संकलन]/
आलूरि बैरागी /
मिलिंद प्रकाशन , हैदराबाद - ५०००९५/
२००७/
१०० रुपये /
८८ पृष्ठ /सजिल्द .




दो



आलूरि बैरागी चौधरी ने अपनी तीव्र संवेगात्मक प्रकृति के अनुरूप सटीक अभिव्यक्ति के लिए गीत विधा को सफलतापूर्वक साधा था। उनके एक सौ गीतों के संकलन ''प्रीत और गीत’’* (2007) में उनकी आत्मनिष्ठ तीव्र भावानुभूति के दर्शन किए जा सकते हैं। इसे उन्होंने कल्पना की सृजनात्मक शक्ति द्वारा मार्मिक अभिव्यंजना प्रदान की है। गीत विधा की सहज उद्रेक , नवोन्मेष, सद्यःस्फूर्ति, स्वच्छंदता और आडंबरहीनता जैसी सभी विषेषताएँ ए बी सी के गीतों में सहज उपलब्ध हैं। उनके गीत किसी न किसी तीव्र अनुभूति या भाव पर केंद्रित हैं, जिसका आरंभ प्रायः वे या तो किसी संबोधन के रूप में करते हैं या भावोत्तेजक स्थिति के संकेत से करते हैं अथवा उसके मूल में निहित विचार या स्मृति के कथन से। इसके अनंतर गीत के विभिन्न चरणों में वे इस भाव को क्रमिक रूप से विकसित करते है जो अंत में चरम सीमा पर पहुँचकर किसी स्थिर विचार, मानसिक दृष्टिकोण या संकल्प के रूप में साधारणीकृत हो जाता है। वस्तुतः आलूरि बैरागी चौधरी के गीतों में उपलब्ध यह स्वतःपूर्णता का गुण उन्हें विशेष प्रभविष्णुता प्रदान करता है। भावानुभूति और भाषाभिव्यंजना के इस सुगढ़ मेल के संबंध में प्रो। पी. आदेश्वर राव का यह मत सटीक है कि ‘‘उसमें व्यंजना और संकेत की प्रधानता रहती है। पूर्वापर प्रसंग-निरपेक्षता के कारण सांकेतिकता उसकी प्रमुख विशेषता होती है। वास्तव में गीत का आनंद उसके गाने से ही प्राप्त होता है, उसके द्वारा रस-चर्वण होता है और श्रोताओं में रस-संचार होता है। गीति काव्य की सभी विशेषताएँ बैरागी के गीतों में पूर्ण रूप में पाई जाती हैं।’’


विषय वैविध्य की दृष्टि से बैरागी का गीत संसार अत्यंत विशद और व्यापक है। मानव जीवन के सुख-दुःख, राग-द्वेष, आशा-निराशा और उत्कर्ष तथा पराभव सभी को इन गीतों में देखा जा सकता है। कवि की अभिलाषा है कि उसे सूरदास जैसी दिव्यदृष्टि मिल जाए ताकि वह अनंत सत्य का साक्षात्कार कर सके। उसका विश्वास है कि भौतिक चक्षुओं से न तो सुषमा का द्वार खुल सकता है, न ज्योतिष्पथ का पार मिल सकता है। इतना ही नहीं, कवि ऐसी ज्वाला की कामना करता है जो भले ही जीवन को जलाकर राख कर दे लेकिन सब कुछ को इस तरह मिटाए कि केवल प्यार बचे। तभी यह संभव होगा कि जो उड़ान अभी अर्थहीन प्रतीत होती है वह ज्योतित-नीड़ तक पहुँचकर सार्थकता प्राप्त करेगी। सूर के अंधत्व और पंछी की उड़ान के रूपक को कवि ने सुषमा, ज्योति और ज्वाला जैसी प्रकाशवाची संकल्पनाओं के सहारे रोमांचकारी परिपूर्णता प्रदान की है -

‘‘मुझे सूर की आँख चाहिए।
फूट गई जब आँख काँच की
खोली मन की आँख साँच की
हो उड़ान जिसकी अनंत उस मन-पंछी की पाँख चाहिए।

यंत्र-नयन , इनसे क्या होगा
कैसे सुषमा-द्वार खुलेगा ?
ज्योतिष्पथ का पार मिलेगा
जिस ज्वाला के शलभ-नयन में उसकी तिल भर राख चाहिए।

वह ज्वाला जिसका खुमार हो
जिसमें जीवन क्षार-क्षार हो
मिटे सभी जो बचे प्यार हो
अर्थ-हीन मेरी उड़ान को नीड ज्योति की शाख चाहिए।’’



बैरागी के इन गीतों में मानव और प्रकृति स्वतंत्र रूप में भी और परस्पर संबद्ध रूप में भी अनेक प्रकार से चित्रित हैं। कवि ने मानव के प्रकृतीकरण और प्रकृति के मानवीकरण दोनों ही में अचूक सफलता पाई है। प्रकृति उनके काव्य में आलंबन और उद्दीपन बनकर भी आई है तथा उसकी कोमलता और क्रूरता दोनों ही को कवि ने सुन्दरता और उदात्तता का आधार बनाकर चित्रित किया है। इन गीतों में कहीं काजल सा छाया हुआ अंधकार है, जिसमें उर के पागल खद्योत प्रकाश के क्षीण स्रोत बनकर भटक रहे हैं परंतु यह कज्जल-तम इतना सघन है कि उनकी सारी जलन भी निष्फल और असार सिद्ध हो रही है, तो अन्यत्र इस कालरात्रि पर विजय पाने का आश्वासन भी मुखर है। कवि को प्रतीक्षा है उस क्षण की जब किसी अपरिचित ज्योतिपथ में रश्मियों के रथ में इंद्रधनुष प्रकट होगा तथा जीवन के अभियान की सफलता के रूप में किरणें विजयहार पहनाएंगी -

‘‘क्या जाने किस ज्योतिष्पथ में
सुरचाप विलोल रश्मि -रथ में
जीवन अभियान सफल होगा पाकर किरणों का विजय-हार।’’



प्रेम की स्थितियाँ भी कुछ गीतों में मर्मस्पर्शी बन पड़ी हैं । कवियों की एक प्रिय स्थिति यह है कि रात बीत रही है और प्रेमीयुगल को न चाहते हुए भी एक दूसरे से अलग होना पड़ रहा है। ऐसी स्थिति में आलूरि बैरागी को प्रभात की प्रथम मधु किरण भी कृपाण सरीखी प्रतीत होती है तो इसमें कोई अस्वाभाविकता नहीं दीखती -

‘‘वह प्रभात की प्रथम मधु-किरण
रक्त-राग-रंजित कृपाण बन
मेरा मरण संदेश लिखेगी
कर देगी विक्षुब्ध हृदय तव।’’


मिलन और विछोह की एक अन्य स्थिति यह भी है कि कोई अचानक मिल जाता है - क्षण भर के लिए। और बिछुड जाता है। पर यह क्षणिक मिलन, क्षणिक दर्शन, क्षणिक चितवन, सदा के लिए अविस्मरणीय अनुभव बन जाता है, संपदा बन जाता है, जीवन का संबल बन जाता है। यह अनुभव तब एक भिन्न प्रकार की कसक से भर उठता है जब बिछोह का कारण वर्ग-वैषम्य हो। कवि को याद है कि

‘‘जीवन पथ के किसी मोड पर तू क्षण भर के लिए मिली थी।
तेरे जीवन का राज-यान
था लक्ष्य-हीन मेरा प्रयाण
क्षण भर तो सामने हुए थे, चितवन भर के लिए मिली थी।’’


और फिर सारा जीवन किसी की प्रतीक्षा में बीत जाता है। लेकिन राजयान से जाने वाले कभी वापस लौटते थोड़े ही हैं -

‘‘किसकी राह देखता पगले!
इधर नहीं कोई आएगा
खबर नहीं कोई लाएगा
संध्या की लज्जित लाली में
किसकी चाह देखता पगले!’’


इसके बावजूद कवि की जिजीविषा अदम्य है। वह महाकाल से भिडने और यम से ताल ठोंक कर लड़ने को तत्पर है। तलवार की धार पर भी दौड़ना पड़े तो परवाह नहीं। दोनों पंख घायल हों पर उड़ना पड़े तो परवाह नहीं। जाना-पहचाना सब त्याग कर स्वयं से भी बिछुड़ना पड़े तो परवाह नहीं। परवाह है तो बस इस बात की कि आकाश को छूना है और इससे पहले पीछे नहीं मुड़ना है। देह भले हारी हुई और लाचार हो। नियति और विधि भले ही विपरीत हो। सारी परिस्थितियाँ शत्रुता पर उतारूँ हों। तब भी हड्डियों में लोहे की आवाजों के साथ चरम द्वंद्व छिड़ जाए तो पीछे नहीं हटना है। तभी यह संभव होगा कि काल के वक्ष पर ज्वाल के शूल से मनुष्य अपनी मुद्रा अंकित कर सके -

‘‘ज्वलित गलित दारुण मारण-भय
क्षार-क्षार सब मृण्मय संशय
शेष स्वीय सत्ता का विस्मय
काल-वक्ष पर ज्वाल-शूल से चिर मुद्रा निज गढ़ना मीत !’’

इस कृति के बारे में फिलहाल इतना ही .
ए बी सी की तीसरी काव्य कृति ‘वसुधा का सुहाग’ पर चर्चा आगे .

*प्रीत और गीत (गीत संकलन)/
आलूरि बैरागी/
मिलिंद प्रकाशन, हैदराबाद/
2007/
125 रुपये/
पृष्ठ 100/सजिल्द।


तीन






`वसुधा का सुहाग’ (2007) में प्रयोगवादी और नई कविता शैली में लिखित आलूरि बैरागी की 45 कविताएँ सम्मिलित हैं. जिनका रचनाकाल 1945 से 1966 तक फैला हुआ है। संग्रह की शीर्ष कविता ‘वसुधा का सुहाग’ अपने बिंब विधान के कारण खासतौर पर आकर्षित करती है। सूर्य और पृथ्वी के प्रणय को कवि ने अत्यंत सघन बिंबों में इस प्रकार रूपायित किया है -

‘गहरे कुहरे की चादर से सालस सूर्य
अंगडाई-सी लेकर उठ बैठा
सेंक रहा अपने को अपना ही ताप ज्यों लगता मीठा।
तुहिन-कण के मोतियों की झालर हटा
झाँक रही ज्यों वसुधा
काल की विनील अवधि चीर खिलती
किसी प्रिय-वदन-स्मृति की व्यथा!
आँसुओं के गुलाब-जल में नहायी मुस्कान!’


साथ ही कवि ने यह भी प्रश्न उठाया है कि इतने दिन तक मैं कहाँ रहा या इतने दिन तक मैं क्यों नहीं जिया। आज जब इस प्रातःकालीन वेला में जीवन की सार्थकता और ऊर्जस्विता का बोध हुआ है तो यह अलसाया सूर्य एक भारतीय कवि को अफ्रीका के आदिम राग से जोड़ता हुआ प्रतीत होता है -

‘रुधिर-परमाणुओं के गर्भ-गेह में
अनंत शक्ति-पूजा
सुरंगों में बजते सहस्र मृदंग
प्रबल चुंबक के तरंग।
मेरी नस नस में
अफ्रीका के आदिम पादपों के वेदना-रस का राग,
नीग्रो-सूरज का रुधिर यह वसुधा का सुहाग!’


कविवर आलूरि बैरागी चौधरी के बिंब विधान के वैशिष्ट्य को इस संग्रह की अधिसंख्य कविताएँ प्रमाणित करती हैं। महात्मा गाँधी को समर्पित ‘राजघाट’ में वे हिंसा-प्रतिहिंसा के भीषण दृश्य को बिंबित करते हुए अकरुण नर के उर की वेदी पर तांडव करते अकाल-महाकाल को देखते हैं और गीध काग सियारों का भैरव रव उन्हें इस तांडव के अवसर पर ताल देता प्रतीत होता है। महात्मा के पवित्र रक्त को पीने वाली कर्कश वसुधा पर हिंसा-प्रतिहिंसा के पिशाचगण आज खून की होली खेल रहे हैं और विगत पाप, विकृत शाप, ज्वाला-जिह्वा पसार लहलही नई पौध को लील रहे हैं। ऐसे में कवि यह व्यवस्था देता है कि मानवी विवेक के मरण से नीच अन्य मरण नहीं तथा पिशाचों के वसंत पर्व हेतु नरपशु की बलि से श्रेष्ठ अन्य उपकरण नहीं। इससे कवि के सात्विक क्रोध और हताशा का अनुमान लगाया जा सकता है। वह अमृत मंत्रों से गाँधी का आवाहन करता है और कोटि कोटि करुण नयन भारत जनगण के साथ एकाकार होकर उस अमृतात्मा के अवतार की प्रतीक्षा करता है।


बैरागी को हर तरह के पाखंड से बड़ी चिढ़ है - चाहे उसका संबंध राजनीति से हो, समाज से या धर्म से। ‘योग समाधि’ में उनके व्यंग्य का निशाना तथाकथित पाखंडी जन हैं जिन्हें वे आँखें मूंदे पागुर करते लेटे हुए भैंसे के रूप में देखते हैं। यह भैंसा ‘अज्ञेय’ की कविता के ‘धैर्यधन’ गदहे की याद दिलाता है। गदहा रात में खड़ा है तो भैंसा दिन में सोया है। वह मूत्र सिंचित मृत्तिका के वृत्त में अनासक्त रहता है तो यह -

‘चारों ओर प्रगल्भ विश्व-कोलाहल,
जगा जीवन का हालाहल,
पर भैंसा योग-समाधि-लग्न तद्गत तल्लीन,
आँखें मूँदे कर रहा ध्यान निज में विलीन।’



स्त्री जाति के प्रति आलूरि बैरागी की संवेदनशीलता कई स्थलों पर व्यक्त हुई है। ‘वेश्या के प्रति’ कविता में वे अभागिन वेश्या को ऐसी मीराँ के रूप में देखते हैं जिसे अपना गिरिधर नागर नहीं मिलता। उनके लिए वह प्रेम की ऐसी साधिका है जो जोगिन होते हुए भी नागिन समझी जाती है। वह ईश्वर की ऐसी प्राणप्रिया है जिसे स्वयं उसके पति ने कौडी के मोल सट्टा-बाजार में खड़ा कर बेच दिया है। यही कारण है कि कवि जब-जब प्रेयसी पर गीत लिखना चाहता है तो विश्वप्रेयसी उर्वशी बनकर वेश्या उनकी आँखों के आगे आ जाती है और प्रणय गीतों में अनल और गरल घोल जाती है। ऐसे में स्वाभाविक है प्रेम के प्रति कवि का यह आक्रोश कि -

‘मैं कहता हूँ ; सभी जूठ है,
प्यार छार है, फूल धूल है।
एक ढोंग है, एक स्वांग है।’



निस्संदेह जगत इस स्त्री से घृणा कर सकता है लेकिन ऐसा करना कवि के लिए संभव नहीं है। वह तो पुरुष जाति की कृतघ्नता के लिए जगन्माता के समक्ष क्षमाप्रार्थी है -

‘आओ देवी!
अकरुण सकल मनुष्य-जाति का प्रतिनिधि बनकर,
तेरे धूसर पद-तल में मैं होता नत-सिर!
क्षमा करो माते!
हम सब तो तेरे बच्चे हैं!
क्षमा करो जननी!
क्षमा करो भगिनी!
क्षमा करो सजनी!
तुम न करोगी हमें क्षमा तो कौन करेगा?
शोक और लज्जा की ज्वाला में
तिल तिल जल कौन मरेगा?
है कोई जो सूली ऊपर सेज करेगा?’

शोक और लज्जा की इस ज्वाला का जिस दिन समाज अनुभव कर लेगा वह दिन निश्चय ही नए युग का प्रस्थान बिंदु होगा।


जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है आलूरि बैरागी चौधरी विषय और शैली दोनों की विविधता के धनी रचनाकार हैं। ‘वसुधा का सुहाग’ संग्रह की कविताएँ भी इसे प्रमाणित करती हैं। इस संग्रह की कई कविताओं में कवि ने फैंटेसी का अत्यंत सफल प्रयोग किया है। प्रसिद्ध कविता ‘पलायन’ इसका उत्तम उदाहरण है। यह कविता दो सूक्तियों से आरंभ होती है -

- जिंदगी की भूख ऐसी है कि वह अपने आपको खा जाती है,

-प्यास ऐसी है कि वह मोमबत्ती सी अपने आपको पी जाती है।


आगे चलकर कविता संपूर्ण शून्य की ओर प्रस्थान करती है जहाँ कोई कैदी करवट बदलकर नींद में गुनगुना रहा है - क्या प्रभात नहीं आया? और सब तरफ एक डायन का खर्राटा गूँज रहा है। अंधेरा गहराता जाता है। प्रेमीजन भाग जाना चाहते हैं पर भागकर जाएँ कहाँ? सब जेल में बंद कैदी हैं - कैसे भागें, कैसे जागें। फिर भी यह इच्छा तो है ही कि इस अमानुषिक अंधेरे से दूर किसी बेहतर दुनिया में चला जाए -

‘चलो, चलें!
भूखे भेड़िये-से टूट पड़ने वाले कल से
गोंद-से, कालिख-से चिपकने वाले कल से
बागों से, लोगों से,
रोशनी से, सनसनी से,
चेहरे! ये सब चेहरे!
चलती पुतलियों के भाव-हीन चेहरों से
चलो कहीं दूर चलें!
चलो, कुछ न कुछ करें!
चलो! चलो! चलो! चलो! चलें!’


‘स्वर्गवासी की स्मृति में’ जहाँ एक ओर भारतीय लोकतंत्र के विधाता मंत्रियों पर व्यंग्य है, वहीं परिवर्तनशील समय और मृत्यु का बोध भी इस कविता में ध्वनित होता है। मृत्यु की ध्वनि-प्रतिध्वनियाँ अनेक स्थलों पर इन कविताओं में हैं। जैसे,

फिर से लगेगी जीवन की फेरी
सोने में न हो देरी
सो जा, ओ पगले,
तू सो जा अब (स्वर्गवासी की स्मृति में)।
प्यारे मित्र! अब कविता नहीं रही!
दिन दिन की उदय-कांति में नवता नहीं रही!
मत पूछो तुम कारण। (कविता नहीं रही)।


यहाँ इस तथ्य की ओर भी संकेत करना आवश्यक है कि कवि मृत्यु से पराभूत नहीं है। जब वर्षा होती है तो राख में से भी नया जीवन फूट पड़ता है। जीवन की इस शाश्वत विजय के प्रति कवि की पूर्ण आश्वस्ति उसे आत्मा की अमरता में विश्वास करने वाली भारतीय चिंताधारा का प्रतिनिधि बना देती है -


‘बरखा रुकी
मानों बरस बरस थकी!
भीजे हर पात पर
किरण खिलखिला उठी!
गंजे सर भीतों पर, रुखे ठूँठों पर
धूप तिलमिला उठी!
विषन्न विश्व के छायाछिन्न वदन पर
सहसा मुसकान झिलमिला उठी!
अंदर बाहर बस, एक-सी प्रशांति
झीनी भीनी कांति!
हाँ, मैं इस क्षण
नहीं जानता कि क्या है मरण।’



कवि की इस अदम्य जिजीविषा को प्रणाम करते हुए हम यह आशा कर सकते है कि हिंदी जगत इस बिसराए हुए महान कवि आलूरि बैरागी चौधरी (५.९.१९२५ - ९.९.१९७८) की रचना शक्ति को पहचानेगा और साहित्य के इतिहास में उचित स्थान पर उस पहचान को अंकित करेगा।



’वसुधा का सुहाग/
आलूरि बैरागी/
मिलिंद प्रकाशन, हैदराबाद/
2007/
125 रुपये/
120 पृष्ठ सजिल्द
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