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शनिवार, 19 सितंबर 2009

वैदिक संस्कृति बनाम जनजातीय संस्कृति






डॉ मोहन लाल निगम (1933) हैदराबाद के सालारजंग संग्रहालय के निदेशक रहे हैं । इतिहास और पुरातत्व के साथ-साथ भक्ति और अध्यात्म में भी उनकी रुचि है। इस अनुभव और रुचि के सर्जनात्मक प्रतिफलन के रूप में उनका उपन्यास `गोपाल रथ` (2007) सामने आया है।

`गोपाल रथ´ वृष्णिवंशीय कृष्ण के नर से नारायण बनने का सफरनामा है। इतिहास और कल्पना का समन्वय करने की छूट लेने के लिए लेखक ने पंडित हजारी प्रसाद द्विवेदी के `बाणभट्ट की आत्मकथा´ की तरह का गल्प बुनने का प्रयास किया है।जिस प्रकार वहाँ आस्ट्रियाई महिला से आत्मकथा की पांडुलिपि मिलने की बात कही गई है, उसी प्रकार यहाँ धर्मसेन को वज्रनाभ नाम के हजारों वर्ष की आयु वाले सिदधपुरुष से `गोपाल रथ´ की पांडुलिपि प्राप्त हुई है। लेकिन जैसी विश्वसनीयता केथराइन दीदी की कहानी में है उसकी तुलना में वज्रनाभ बिलकुल अविश्वसनीय से लगते हैं क्योंकि उनका कालजयी होना चमत्कारी कथा भर है। कृष्ण के समय से लेकर वल्लभाचार्य तक के समय को एक सूत्र में समेटने के लिए ऐसे चमत्कारी मेरुदंड की आवश्यकता थी भी।

बारह अध्यायों में पूरा उपन्यास संयोजित है। ये अध्याय इतिहास के अलग-अलग कालखंडों से संबंधित हैं इसलिए उपन्यास कहने के बावजूद यह कृति अलग-अलग कहानियों का वैसा ही संकलन प्रतीत होती है जैसा कि पंचतंत्र या कथासरित्सागर की कहानियाँ । वैसे यह भारतीय परंपरागत किस्सागोई का अच्छा इस्तेमाल है जिसके लिए लेखकीय सूझ की प्रशंसा की जानी चाहिए। इन कोलाज की तरह समेटे गए कथाखंडों के शीर्षकों से इनकी वर्ण्यवस्तु का अनुमान किया जा सकता है - आभीर कुल, यवनराज दिमित, वसुमित्र, मथुरा, विदिशा, नागनिका, महाराज हाल, मदुराई, संत नम्मालवर, मामल्लापुरम्, भागवद्धर्म। पूरी रचना में बड़ी शिद्दत से ब्राह्मण धर्म और आभीरमत के द्वंद्व को उकेरा गया है और बार-बार ध्यान दिलाया गया है कि ब्राह्मणों ने आभीरों को हठपूर्वक व्रात्य या धर्म-च्युत ठहराया था क्योंकि वे वैदिक धर्म से संबंधित कर्मकांड को नहीं मानते थे और उनकी जीवन शैली भी आर्यों से भिन्न थी। यह बात अलग-अलग शब्दों में इस कृति में इतनी बार कही गई है कि भयभीत करती है कि कहीं इससे समाज में कोई नई विघटनकारी प्रक्रिया न चालू हो जाए। लेकिन लेखक का प्रतिपाद्य विघटन नहीं समन्वय है। अब कोई क्या करे कि समन्वय को सिद्ध करने के लिए पहले विघटन को उभारना सबसे आसान तकनीक है। अन्यथा लेखक ने तो इसी तत्व को उभारना चाहा है कि कृष्ण को परब्रह्म का अवतार मानने वाली धर्मशाखा में कृष्ण का सारा का सारा बालचरित आभीर संस्कृति से आया है। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी दर्शाया है कि वासुदेव कृष्ण और गोपाल कृष्ण संबंधी ऊपर से विरोधी प्रतीत होने वाली मान्यताओं का समन्वय दक्षिण में गठित हुआ और राधा को अपनी लीलाएँ पिन्नई से प्राप्त हुईं । यह सारा उपचार वासुदेव और गोपाल के चक्रपाणि और वंशीधर रूपों को परस्पर विरोधी मानने के कारण करना पड़ा है। बीच की खोई हुई कड़ी की तलाश करते हुए लेखक ने प्रतिपादित किया है कि सुदूर दक्षिण के राज्यों में वैष्णव धर्म की स्थापना तथा उसके प्रचार एवं प्रसार का श्रेय वहाँ के आलवार संतों को जाता है जिन्होंने अपनी तमिल भाषा में रचित पदावलियों में भगवान विष्णु (वासुदेव कृष्ण) के स्वरूप और उनकी लीलाओं का अत्यंत मर्मस्पर्शी वर्णन किया है। यह सब धर्मचर्चा इतिहास और दर्शन के अध्येताओं को रुचिकर लग सकती है।

प्रासंगिकता की दृष्टि से यह पुस्तक वर्ण व्यवस्था पर पुनर्विचार के लिए प्रेरित करती है। इसमें संदेह नहीं कि किसी समय अत्यंत उपयोगी रह चुकी वर्ण व्यवस्था ने देश का बड़ा अहित भी किया है। एकाधिक प्रसंगों में यह बात उभरकर आती है कि भारत का जनमानस आज भी ब्राह्मण वर्ग द्वारा चलाई गई वर्ण व्यवस्था की रूढ़ियों में जकड़ा हुआ है। हो सकता है कि पुरातन काल में वर्ण व्यवस्था भारतीय समाज के लिए उपयोगी रही हो परंतु अब वह उसी समाज के लिए घातक सिद्ध हो चुकी है। यह बात भी रेखांकित की गई है कि इतिहास में वर्ण व्यवस्था का विरोध करने वालों में प्राय: दलित वर्ण के लोग ही थे जो आर्थिक एवं सामाजिक दृष्टि से पिछड़े हुए और असहाय थे। इस पद्धति से सोचा जाए तो आश्चर्य नहीं होगा यदि गोपाल कृष्ण भी गौतम बुद्ध की तरह आनेवाले समय में भारत भर के महापुरुष न रहकर दलितों के नए मसीहा बना दिए जाएँ!

लेखक ने कृष्ण लीला के संबंध में परंपरा से चली आ रही शंकाओं का भी कई स्थालों पर जवाब देने का प्रयास किया है और यह स्थापित किया है कि कृष्ण और गोपियों का प्रेम विशुद्ध प्रेम है। यह प्रेम आध्यामिक प्रेम की सर्वोच्य अवस्था है। दूसरे शब्दों में गोपियों का कृष्ण के प्रति समर्पण प्रेम की पराकाष्ठा है। गोपियाँ कृष्ण के प्रति स्वयं को पूर्णतया समर्पित कर चुकी हैं। इसके अतिरिक्त उनका कोई अस्तित्व नहीं है। वे अपना व्यावहारिक धर्म, अपनी सामाजिक मर्यादाएँ , अपना कुल-परिवार सभी कुछ त्याग कर कृष्ण का सान्निध्य प्राप्त करना चाहती हैं। स्वयं को कृष्ण में विलीन कर देना चाहती हैं। वे अपने प्रेमास्पद को पाने में सांसारिक बंधनों को, लोक-लाज को आड़े नहीं आने देना चाहतीं। गोपियों को इस क्षणभंगुर जीवन की चिंता नहीं है। कृष्ण के विरह में उनका पार्थिव शरीर जर्जर हो रहा है। मिलन की कोई संभावना नहीं है।

लेखक की स्त्री संबंधी मान्यताएँ भी कई स्थलों पर व्यक्त हुई हैं । मातरी माता और योगिराज के प्रसंग में यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या पुरुष एवं नारी के संबंधों के बीच पाप के अतिरिक्त और कुछ हो ही नहीं हो सकता अथवा क्या एक नारी के जीवन में आत्मगौरव अथवा आत्मसम्मान जैसी कोई चीज नहीं होती। इस संदर्भ में लेखक की मान्यता है कि वास्तव में यह तो पुरुष के मन की हीनता है या फिर कहिए कि उसमें आत्मविश्वास की कमी है, जिसके कारण वह नारी को केवल भोग की वस्तु समझता है और उससे दूर भागता है। पुरुषों ने नारी को `पाप की खान´ कहकर अपनी हीन मानसिकता का ही परिचय दिया है। महारानी नागनिका संबंधी खंड में भी नारी के प्रति लेखकीय दृष्टिकोण भली प्रकार व्यक्त हुआ है | यहाँ लेखक ने कहा है कि वास्तव में पुरुषप्रधान समाज ने नारी को सौंदर्य की प्रतिमूर्ति , सौम्या एवं गृहलक्ष्मी बनाकर उसे पंगु बना दिया है। इतना ही नहीं , आजीवन अपने नियंत्रण में रखकर और सुरक्षा का आश्वासन देकर उसे अबला बना दिया है तथा पालन पोषण का भी दिलासा देकर उसके आर्थिक अधिकार का हनन किया है। बातें तो ठीक हैं। पर जिस प्रकार आभीरों की संस्कृति के विरोध में ब्राह्मण धर्म को खलनायक की तरह प्रस्तुत किया गया है, उसी प्रकार यहाँ भी ब्राह्मणधर्म और उसके शास्त्र ही स्त्री के शोषण के लिए जिम्मेदार ठहराए गए हैं। बड़ी कुशलता से लेखक ने यहाँ भी अंत में सर्वधर्मसमभाव की समन्वयवादी नीति का प्रतिपादन किया है।

कुलमिलाकर इतिहास, पुरातत्व, धर्म, समाज, राजनीति, आस्था आदि अनेक विषयों से जुड़े मुद्दों पर लेखक ने 'गोपाल रथ' की यात्रा में अपने मत व्यक्त किए हैं और यह दर्शाया है कि व्यास ने श्रीमद्भागवत की रचना करके उसमें प्रेमोपासना को विशेष स्थान देकर कृष्ण को नर से नारायण बना दिया। इतिहास के अनेक परस्पर पृथक प्रतीत होने वाले कालखंडों को जोड़कर बनाया गया यह `गोपाल रथ´ वैदिक संस्कृति और जनजातीय संस्कृति के संघर्ष को उभारता है, भद्रलोक के सामान्य लोक के प्रति दोहरे व्यवहार की तरफ उँगली उठाता है और अंतत: उत्तर और दक्षिण का समन्वय करते हुए अपनी यात्रा पूरी करता है।

अंत में , प्रेम और आसक्ति विषयक एक उद्धरण के साथ हम अपनी बात पूरी करना चाहेंगे -
``प्रेम और आसक्ति दोनों पृथक भाव हैं, प्रेम के दो रूप हैं, लौकिक तथा अलौकिक। आसक्ति एवं कामुकता लौकिक प्रेम की उपज हैं जबकि अलौकिक प्रेम में वासना के लिए कोई स्थान नहीं है।´´

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