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बुधवार, 30 नवंबर 2016

तेलुगु ग्राम-जीवन की कहानियाँ

भूमिका 


भारत की विविध भाषाओँ में अनेक रचनाकार विविध विधाओं में साहित्य सृजन करते हुए इस महादेश की साझा सांस्कृतिक विरासत को सहेजते और अगली पीढ़ियों को हस्तांतरित करने का कार्य करते रहते हैं. इनमें से केवल कुछ को भाषा और साहित्य के गढ़ों और मठों का सान्निध्य मिल पाता है और उनके कार्य को व्यापक पहचान मिल जाती है. लेकिन अन्य बहुत सारे रचनाकार प्रकाशन-सरणियों से अपरिचित होने के कारण अपने छोटे से संप्रेषण-क्षेत्रों तक सीमित रहकर सेवा भाव से लिखते और संतुष्ट रहते हैं. सही अर्थ में ऐसे रचनाकार प्रायः लोकाश्रयी होते हैं और लोक के जीवन को लाग-लपेट के बिना अभिव्यक्त करते हैं. तेलुगु से हिंदी में अनूदित इस कथा-संग्रह के लेखक नरसिम्हा राजु और अनुवादक वेत्सा पांडुरंगा राव, दोनों ही, इसी कोटि के रचनाकार हैं. 

कहानीकार नरसिम्हा राजु इस समय 78 वर्ष के हैं. वे लंबे समय तक ओरिएंटल कॉलेज, एलुरु [आंध्र प्रदेश] के प्राचार्य पद पर आसीन रहे. अपने सेवाकाल में तथा सेवामुक्ति के उपरांत उन्होंने तेलुगु में कुछ कहानियों की रचना की. उनमें से छह कहानियों का हिंदी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है. अनुवादक वेत्सा पांडुरंगा राव यों तो 40 वर्ष एलुरु [आंध्र प्रदेश] में ग्रामीण सहकारी बैंक की सेवा में रहे, लेकिन दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के प्रमाणित प्रचारक और उनके एक संगठन ‘हिंदी प्रचार रुचिकर्म प्रमाणित प्रचारक’ के अध्यक्ष के रूप में निरंतर हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में भी लगे रहे. उनकी हिंदी-निष्ठा का इससे सहज अनुमान किया जा सकता है कि आज 79 वर्ष की आयु में भी उन्होंने अनथक श्रम करके यह अनुवाद तैयार किया है ताकि हिंदी के पाठक गढ़ों और मठों से दूर स्थित एक मौन साहित्य-साधक के रचनाकर्म से परिचित हो सकें.

नरसिम्हा राजु की ये तेलुगु कहानियाँ इस अर्थ में विशेष मानी जा सकती हैं कि इनमें प्रस्तुत तेलुगु लोक जीवन लेखक का जिया और भोगा हुआ, अतः पूर्णतः विश्वसनीय और प्रामाणिक, है. इनका रचनाकाल लगभग तीन दशकों तक फैला है और इन्हें इस कालावधि में आंध्र-जीवन में उपस्थित हुए बदलावों के संदर्भ में भी देखा जा सकता है. आंध्र लोक की सुंदरता और सहजता को अभिव्यंजित करने के साथ-साथ लेखक ने उसकी कुरूप होती शक्ल को भी उघाड़कर सामने रखा है. 

इन कहानियों का परिवेश अधिकतर ग्रामीण है. लेखक को गाँवों से प्यार है. उनका मन बार-बार गाँव की ओर जाना चाहता है. जाता भी है; लेकिन सब कुछ बदला-बदला देखकर अपने पूर्व-परिचित, अतीत के अथवा बचपन के गाँव को खोजने लगता है. यही कारण है कि ये कहानियाँ अनेक स्थलों पर पूर्वदीप्ति शैली और गर्भकथा सुनाने की तकनीक को अपनाती दिखाई देती हैं. लोक संस्कृति में ग्रामदेवता की आराधना, लोकगाथाओं, लोककथाओं, लोकगीतों और लोकशैलियों के जो प्रसंग इन कहानियों में गूँथे गए हैं, उनसे हिंदी पाठक तेलुगु लोक के बारे में जानकारी तो प्राप्त करता ही है, उसके मन में इस भाषा-समाज के विश्वासों और अनुष्ठानों के बारे में नई जिज्ञासाएँ भी करवटें बदलती हैं. यह चिता केवल तेलुगु समाज की ही नहीं है बल्कि पूरे देश की है कि मनुष्य और मनुष्य के बीच सहज संबंध टूट रहे हैं और व्यावसायिक तथा औपचारिक रिश्ते भर बचे रह गए हैं. लेखक ने ध्यान दिलाया है कि पारंपरिक समाज में धर्म और जाति की मर्यादाओं के बावजूद जाति-द्वेष नहीं था जबकि वर्तमान परिदृश्य इसके एकदम उलट है. 

इस संग्रह की कहानियों में आपको लेखक की मूल्य-चिंता बार-बार झकझोरेगी. ग्रामीण स्वभाव की निश्छलता, कर्म सिद्धांत में विश्वास, नगण्य व्यक्ति का बलिदान, तथाकथित भद्रजन की स्वार्थपरता और क्रूरता, ग्रामीण पंचायत का न्याय, गम होता हुआ बचपन, शिक्षा और परीक्षा तंत्र की हृदयहीनता, संवेदनशील व्यक्ति की सहृदयता, आंचलिक भूगोल और प्राकृतिक पर्यावरण, बाल मनोविज्ञान, ग्रामाधिकारी की निरंकुशता, बाढ़ की विनाशक विकरालता, निर्धन का स्वाभिमान, पौराणिक प्रसंग, लोभ जनित भष्टाचार और संयोग की संभावना इन कहानियों में कहीं आधिकारिक तो कहीं प्रासंगिक कथासूत्रों के रूप में विद्यमान हैं. 

सभी कहानियाँ रोचक और पठनीय बन पडी हैं. साथ ही, लोक शब्दावली, लोकोक्तियों और मुहावरों का समावेश इस पुस्तक की रोचकता और पठनीयता बढ़ाने में विशेष भूमिका निभाता है. अनुवादक ने नामों के अलावा भी तेलुगु के बहुत से सांस्कृतिक शब्दों को ज्यों का त्यों रखते हुए उनका अर्थ भी साथ में सूचित किया है. जैसे - मदुरु दीवार [ताड़ के पत्तों से बनी छप्परदार ऊँची दीवार, गाजुल मुसलय्या [कंगन बूढा], मुसलम्मा [बुढ़िया], गोल्लसुद्दलु [ग्वालों के लोकगीत], रागाल सत्ति [गानेवाला सत्ति], गुंडिगा [पीतल का बड़ा बरतन]. निश्चय ही, इससे हिंदी पाठक की शब्द-संपदा और समृद्ध होगी, तेलुगु-हिंदी-सेतु और सुदृढ़ होगा तथा हिंदी भारत की सामासिक संस्कृति के अनुरूप नए स्वरूप में ढल सकेगी.

पुस्तक के प्रकाशन के अवसर पर लेखक और अनुवादक को हार्दिक बधाई! 

30 नवंबर, 2016.                                                                                                      ऋषभदेव शर्मा 

[पूर्व आचार्य-अध्यक्ष,
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद]

आवास : 208 -ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स,
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500013.
मोबाइल : 08121435033 / 0807474257

बुधवार, 2 नवंबर 2016

[व्याख्यान] देश और उसकी भाषा


भाषा देश की चेतनाधारा को व्यक्त करती है : ऋषभदेव शर्मा

[मिश्र धातु निगम लिमिटेड में हिंदी दिवस पर मुख्य अतिथि का संबोधन]


http://bit.ly/2cCZLYU

मिश्र धातु निगम लिमिटेड कंचनबाग़ हैदराबाद के हिंदी पक्षोत्सव समारोह 2016 के समापन कार्यक्रम के अध्यक्ष आदरणीय डॉ. दिनेश कुमार लेखी जी (अध्यक्ष एवं प्रबंध निदेशक), श्री पी. वी. राज (निदेशक : वित्त), श्री एस. के. झा साहब (निदेशक : उत्पादन एवं विपणन ), हिंदी सेल की देख-रेख करनेवाले आदरणीय श्री ओम बिहारी श्रीवास्तव जी (कर्नल ), प्रिय भाई डॉ. बी. बालाजी, इस समारोह में समुपस्थित समस्त अधिकारीगण, डी.ए.वी. के छात्रगण और उनके अध्यापक–अध्यापिकाएँ या अभिभावक जो भी यहाँ हों – आप सबको हिंदी दिवस के अवसर पर शुभकामनाएँ समर्पित करता हूँ। 

दुनिया भर में हम हिंदुस्तानी लोग उत्सवधर्मी देश के रूप में जाने जाते हैं। कुछ और करें न करें, मौका-बेमौका हम उत्सव ज़रूर मनाते रहते हैं। कई बार इस बात को लेकर मज़ाक किया जाता है लेकिन इसका संबंध इस देश की मानसिकता से है। इस देश की मानसिकता सकारात्मकता और आनंद से जुड़ी हुई है। हम अपनी ज़िम्मेदारियों को, अपने कर्तव्यों को, आनंद के साथ जोड़कर दायित्व को बोझ न मानकर खेल की तरह लीलाभाव से संपन्न करें! शायद हमारे पर्वोत्सवों के पीछे भी यह बात जुडी हुई है और जब हम हिंदी दिवस मनाते हैं, तब भी बार-बार यह बात रेखांकित करते चलते हैं कि यह केवल उत्सव मनाना नहीं है! यह केवल पर्व नहीं है! यह केवल पुरस्कार लेने-देने व इन्क्रीमेंट वगैरह प्राप्त करने का ही एक अवसर या माध्यम या कारण नहीँ है !बल्कि अपने आपको, इस देश का ज़िम्मेदार नागरिक होने के नाते, इस देश के संविधान द्वारा सौंपे गए एक दायित्व के प्रति समर्पित करने की भावना इस पर्व या उत्सव के साथ जुड़ीं हुई है। इस विषय में, माननीय रक्षामंत्री एवं गृहमंत्री के संदेशों के माध्यम से जो बातें कही गईं, मैं उन्हीं बातों को इस देश के एक साधारण नागरिक की तरह आपके समक्ष फिर से रेखांकित करता हूँ। साधारण नागरिक के तौर पर मैं यह बात इसलिए कह रहा हूँ कि इस सारे-के–सारे भाषा संबंधी आचरण का, या आचार का, प्रभाव जिस पर पड़ता है वह इस देश का ‘कॉमन मैन’ यानी ‘साधारण आदमी’ है। उस आम आदमी की हैसियतसे इस देश के हर दूरस्थ गाँव के हर किसान के प्रतिनिधि के रूप में मैं यहाँ खड़ा होकर आपसे यह बात कह रहा हूँ कि मुझे, इस देश के आम आदमी को, आप अपनी उपलब्धियों की जानकारी कृपया मेरी भाषा में दीजिए। आप बहुत काम कर रहे हैं ! देश के लिए काम कर रहे हैं, विश्व के लिए काम कर रहे हैं, मनुष्यता के लिए काम कर रहे हैं; पर मेरे देश का किसान आत्महत्या कर रहा है! कहीं कुछ दूरी है! जो विकास हो रहा है और जिस व्यक्ति तक यह विकास पहुँचना है – उसके बीच में कहीं दूरी है। यहाँ मैं अमर्त्य सेन की पुस्तक ‘डेवलपमेंट ऐज़ फ्रीडम’ का उल्लेख करना चाहूँगा। अपनी पुस्तक के माध्यम से उन्होंने एक बहुत अच्छी बात उठाई है – वह यह कि स्वतंत्रता सबके लिए समान अर्थ नहीँ रखती। व्यक्ति अपनी ‘कैपेबिलिटी’ के अनुसार स्वतंत्रता का उपभोग कर पाता है। मेरा ‘सामर्थ्य’ यदि कम है तो स्वतंत्रता मेरे लिए कुछ और अर्थ रखती है और मेरा ‘सामर्थ्य’ अगर अधिक है तो स्वतंत्रता मेरे लिए अधिक अर्थ रखती है। अविकसित को ध्यान में रखकर जो विकास की बातें की जाती हैं, वे वास्तव में सामर्थ्य बढ़ाने के लिए की जाती है, ताकि मेरे लिए स्वराज्य या स्वतंत्रता का वही अर्थ हो सके जो उनके लिए है जो सामर्थ्यवान हैं। 

मैं यहाँ महात्मा गांधी का नाम लेना चाहूँगा जो रक्षा मंत्री और गृह मंत्री के संदेशों में भी लिया गया है। आज से 98 वर्ष पूर्व सन 1918 में उन्होंने अपने संदेश में इस देश की राष्ट्रभाषा के रूप में हिंदी को प्रस्तावित किया था। आगामी 2018 में उनके इस संदेश को पूरे 100 साल हो जाएँगे। उससे पहले तक कांग्रेस के सारे कामकाज अंग्रेज़ी में ही होते थे, लेकिन 1918 से वे हिंदी में होने शुरू हो गए। कारण कि गांधी जी चाहते थे कि हमारे आंदोलन की सारी गतिविधियों में पूरा देश भाग ले सके। इसके लिए उन्होंने दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा जैसी संस्था की स्थापना मद्रास में की थी। जब इस देश ने अपना संविधान बनाया और हिंदी संबंधी नीति का निर्धारण किया, तब भी महात्मा गांधी की इसी बात को ध्यान में रखा गया। यह अलग बात है कि किन्हीं दवाबों के तहत ‘राष्ट्रभाषा’ शब्द से बचा गया और ‘राजभाषा’ शब्द आ गया। मैं आज यह कह रहा हूँ – राष्ट्रभाषा और राजभाषा दोनों ही शब्दों की नारेबाज़ी को छोड़िए। मुझे इस राष्ट्र के नागरिक की भाषा दे दीजिए – वह चाहे हिंदी हो, चाहे तमिल – तेलुगु हो, चाहे बांग्ला हो, असमिया या मणिपुरी हो। मुझे मेरे देश की भाषा में- मेरी भाषा में संबोधित कीजिए। यह चुनौती हम सबके सामने है। उनके लिए भी यह चुनौती है जो आम आदमी के लाभार्थ काम कर रहे हैं। आप जानते ही हैं कि मिश्र धातु निगम लिमिटेड जैसी संस्थाएँ मूलतः उत्पादक संगठन हैं जिन्हें बाज़ार में खरा उतरना होता है। इस संदर्भ में मैं याद दिलाना चाहता हूँ कि आनेवाले समय में दुनिया में भाषाओं के सामने जो स्थितियाँ हैं, जो चुनौतियाँ हैं, उनमें ‘बाज़ार’ और ‘कंप्यूटर’ ही दो बड़ी चुनौतियाँ हैं। 

मैं आपसे यह नहीं कहने जा रहा हूँ कि हिंदी पूरी दुनिया में कैसे और कितनी फैली है, स्टेटिस्टिक्स लगाने वाले लोगों के लिए भले ही यह विवाद का विषय हो! ‘मंदारिन बोलने-समझने वाले लोग अधिक हैं कि हिंदी बोलने-समझने वाले लोग’ - विवाद तो इस पर भी होता है। परंतु यह तय है कि पहले और दूसरे स्थान पर यही दोनों भाषाएँ हैं। अंग्रेज़ी आदि भाषाएँ इसके बाद के स्थानों पर आती हैं। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि दो वर्ष पहले मैं यहाँ आया था, पिछले वर्ष नहीं आ सका कारण कि चीनी विद्यार्थियों की कक्षा लेने हेतु मैं ‘महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा‘ गया था। सभी इस बात को जानते हैं कि वहाँ 11 या 12 या शायद इससे अधिक देशों के विद्यार्थी पढ़ने आते हैं। मेरी कक्षा में 15 या 16 चीनी विद्यार्थी थे। मैंने उनसे पूछा,” हमारे यहाँ अनेक भाषाएँ हैं और उनके नाम अलग-अलग हैं; क्या आपके यहाँ एक ही भाषा बोली जाती?” उन्होंने कहा, ”हम जो दो लड़कियाँ बराबर में बैठी हुई हैं अगर हम अपनी-अपनी मातृभाषा में बोलने लगें तो हम एक दूसरे की बात को नहीं समझ सकतीं, बावजूद इसके हम सभी मंदारिन भाषी हैं।” गड़बड़ यही है कि ‘हम सब’ ‘भारतीय भाषी’ नहीं हैं ! माफ़ करेंगे – जब गणित पढ़ते थे तब मास्टर जी ने बताया था कि स्टेटिस्टिक्स इज थ द साइंस ऑफ फ़ूल्स - आँकड़ों का खेल तो बेवकूफ बनाने का खेल है। फिर भी, इसे नकारा नहीं जा सकता कि संख्या-बल की दृष्टि से हमारे पास बहुत बड़ी शक्ति है। इस ग्लोबलाइज़्ड विश्व की उदारीकृत अर्थव्यवस्था में यह शक्ति, यह जनसंख्या एक बहुत बड़े ‘बाज़ार’ का सृजन करती है। इस बाज़ार में केवल हमें हिंदुस्तान की ही चीजें नहीं बेचनी हैं। हिंदुस्तान रूपी बाज़ार में दुनिया को अपनी तमाम चीजें बेचनी हैं। इसलिए आप परवाह करें या न करें, लेकिन विदेशों को इस बात की परवाह होने लगी है कि भारत को एक बाज़ार के रूप में संबोधित करना है तो भारत की भाषा में, और उसकी अपनी हिंदी में, संबोधित करना पड़ेगा। यहाँ मैं प्रसिद्ध मैनेजमेंट गुरु प्रह्लाद के सिद्धांत का उल्लेख करना चाहूँगा। उन्होंने कहा है कि भारत की जनता का जो पिरामिड है उसके उपरी हिस्से में इसकी क्रय शक्ति की दृष्टि से ‘सैचुरेशन आ चुका है, वह संतृप्त है अब; और आज का जो बाज़ार है वह इस पिरामिड के निचले हिस्से में है जिसे संबोधित करने के लिए हिंदी से अधिक कारगर भाषा कोई और नहीं है। इसका कारण भी आँकड़े हैं। इस देश के कम-से-कम 55% लोगों की मातृभाषा किसी-न-किसी रूप में हिंदी है चाहे आप उसे कोई बोली कहें - राजस्थानी कहें, खड़ीबोली कहें, ब्रजभाषा कहें या मैथिली कहें! क्षमा करें संविधान ने अब मैथिली को एक अलग भाषा का नाम दे दिया है और भी ऐसे नाम संविधान की आठवीं अनुसूची में जुड़ सकते हैं, तथापि ये सब हिंदी की भौगोलिक शैलियाँ ही हैं। इसके अलावा शेष क्षेत्रों का भी हिसाब लगाया जाय तो कम-से-कम 90% या उससे अधिक इस देश की जनता हिंदी समझती है। इसलिए हिंदी का विज्ञापन इस देश की जनता के सर्वाधिक प्रतिशत तक पहुँचता है। व्यापार-व्यावसाय एवं उसकी भाषा के लिए विज्ञापन तो केवल एक पक्ष है। पहला पक्ष उत्पादन (प्रोडकशन) का है और दूसरा पक्ष है विपणन (मार्केटिंग) का। इससे संबंधित जितनी भी संप्रेषण गतिविधियाँ हैं; जैसे किसी कारखाने में काम करने वाले कारगर से लेकर उसके प्रबंध-निदेशक तक के बीच का जो संवाद है और फिर इस संगठन या जहाँ भी कोई चीज उत्पादित हो रही है, उसका जनता से जो संवाद है – इस संवाद के लिए आज हमें हिंदी को अपनाने और समर्थ बनाने की ज़रूरत है। अगर हमने इसे समर्थ नहीं बनाया तो यह सारी स्वतंत्रता हमारी भाषा के लिए भी घातक हो सकती है। इसलिए बार-बार हिंदी के प्रयोग पर जोर दिया जा रहा है। हमें अपने उत्पादों से संबंधित साहित्य को भी मूलतः हिंदी में ही तैयार करना चाहिए, न कि मूलतः अंग्रेज़ी में तैयार करके उसका हिंदी अनुवाद करना चाहिए। ऐसा करने से भाषा में एक नकलीपन आ जाता है।

पिछली बार आदरणीय डॉ. लेखी का व्याख्यान मैंने सुना। उनकी भाषा संबंधी अनुभवजनित धारणाओं एवं खुले विचारों से मैं बहुत प्रभावित हूँ। इसलिए बहुत संकोच के साथ मैं ये सारी बातें कह रहा हूँ। डॉ. बी. बालाजी ने मुझे इस कैंपस में लगाए गए उन 10-12 बोर्डों के बारे में बताया जिन पर संदेशात्मक स्लोगन्स लिखे गए हैं। ये स्लोगन्स कितने पारदर्शी (ट्रांस्परेंट) हैं! असली चीज़ यही है। भाषा को स्वीकार्य बनाने के लिए हम प्रायः ‘सरलता’ की माँग करते हैं। यह गलत है। भाषा ‘सरल’ और ‘कठिन’ नहीँ होती। भाषा ‘परिचित’ और ‘अपरिचित’ होती है। जब तक हम किसी भाषा से परिचित नहीं होते, तब तक वह हमें कठिन लगती है। जैसे ही हमारा परिचय बढ़ता है, आत्मीयता भी बढ़ जाती है। जब चार बार आप किसी शब्द को सुनेंगे, छह बार उसे लिखेंगे तो धीरे-धीरे उसकी आदत पड़ जाएगी। हिंदी का हाजमा तो बहुत ही बढ़िया है, बिल्कुल भारतीय संस्कृति की तरह – अनेक प्रवाह आकर इसमें समा गए, न जाने कितनी धाराएँ आकर इस धारा में मिल गईं और एक हो गईं! कोई ज़बरदस्ती अपने आपको अलग बनाए रखे तो अलग बात है; नहीं तो यह देश सारी संस्कृतियों को समा लेने वाला देश है। ऐसी ही हमारी भाषा हिंदी है। चाहे जो शब्द ले आइए – थोड़ सा कहीं से उसको रद्दा लगाकर, कहीं से रगड़कर, कहीं ज्यों-का-त्यों लेकर – कहीं हम उसे अंगीकार कर लेते हैं, कहीं स्वीकार कर लेते हैं, कहीं ज्यों-का-त्यों उसका अनुवाद कर लेते हैं, कहीं थोड़ा सा अदल-बदल लेते हैं – अनुकूल कर लेते हैं! बहुत सारी अंतरराष्ट्रीय शब्दावली हमने ज्यों-की-त्यों ग्रहण की है। हिंदी कठिन नहीं है; जो लोग प्रयोग नहीं करते उन्हें वह अपरिचित लगती है। इस अपरिचय से बाहर निकलने का एक ही रास्ता है कि परिचय बढ़ाया जाय। यदि मैं 25 साल से एक अपार्टमेंट में रहता हूँ और मैंने अपने पड़ोसी से परिचय नहीं किया तो इसका अर्थ यह नहीं है कि वह और मैं जन्मजात शत्रु होंगे। अचानक किसी एक दिन किसी एक कारण से हम दोनों की बात होती है और हम बड़े अच्छे दोस्त बन जाते हैं। अन्यथा हम बस एक –दूसरे के बारे में अनुमान ही लगाते रहते। मेरे कहने का अर्थ है कि भाषा का प्रयोग करते रहना चाहिए। 

गृहमंत्री का जो संदेश यहाँ प्रस्तुत किया गया, उसमें अंत में उन्होंने दो सुझाव दिए हैं – एक तो यह कि किसी बदलाव को स्वीकार्य बनाने में अधिकारीगण महत्वपूर्ण होते हैं। अधिकारी किसी भी संगठन का रोल मॉडल होता है। अन्य कामकाज के साथ ही वार्तालाप से टिप्पणी लिखने तक जब अधिकारी हिंदी का प्रयोग करेंगे तब सबकी वह हीन भावना टूटेगी जिसके तहत यह माना जाता है कि अंग्रेज़ी लिखने-बोलने से ही आप बौद्धिक होते हैं, इंटेलेक्चुअल होते हैं। यह धारणा टूट रही है। इसे टूटना ही चाहिए। इसे तोड़िए। अगर यह नहीं टूटती है तो जबरदस्ती तोड़िए, अधिक-से-अधिक साधारण और भारतीय बनकर दिखाइए। ऐसे अवसर पर जब तथाकथित सभ्यता यह सिखाती हो कि हिंदी बोलना असभ्यता है, जमकर अक्खड़ भाषा हिंदी बोलिए। हिंदी, तमिल, तेलुगु, मलयालम या अन्य भारतीय भाषा बोलना अशिष्टता या असभ्यता नहीं है। अंग्रेज भले ही हमारे देश की भाषा को वर्नाक्यूलर अर्थात गँवारू भाषा कहते रहे हों; लेकिन आज समय आ गया है कि दुनिया को हम बताएँ कि दुनिया के समस्त ज्ञान - चाहे वह आधुनिक ज्ञान-विज्ञान हो या प्राचीन ज्ञान-विज्ञान, को हमारी भाषा में व्यक्त करने का सामर्थ्य हमारी भाषा के भीतर है। आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को आधुनिक ढंग से व्यक्त करना भी जरूरी है। इसके लिए कुछ आवश्यक बातें मैं उदाहरण सहित कहना चाहूँगा। बहुधा जब हम सिस्टम खरीदते हैं या सॉफ्टवेयर लेते हैं तब हम इस बात पर ध्यान नहीँ देते कि इसमें हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के लिए सुविधाएँ उपलब्ध हैं या नहीं जबकि उपभोक्ता होने के नाते हमें ध्यान देना चाहिए। हमें माइक्रोसॉफ्ट से कहना चाहिए कि अभी तक भी आपने माइक्रोसॉफ्ट के पब्लिकेशन वाले सॉफ्टवेयर में भारतीय भाषाओं के लिए यूनिकोड का समर्थन नहीं दिया है । हम ऑफिस में यूनिकोड में काम कर रहे हैं परंतु जब हमें अपनी पत्रिका छपवानी होती है तब हमारा सारा काम बेकार हो जाता है। फिर किसी चाणक्य या शिवा या कृतिदेव फॉन्ट में टाइप कराना होता है! यूनिकोड में काम करने का क्या फायदा हुआ? यदि इस देश के तमाम उपभोक्ता हाथ उठाकर कह दें कि कल से हम आपके सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल नहीं करेंगे अगर आप हमें पब्लिकेशन में हिंदी समर्थन नहीं देते तो ऐसे में माइक्रोसॉफ्ट और गूगल एवं अन्य सब भी हिंदी समर्थन अवश्य प्रदान करेंगे। केवल यही नहीं ऐसी बहुत सारी सेवाएँ हैं। सबसे पहले हमें स्वयं अपनी भाषा हिंदी और भारतीय भाषाओं के प्रति जागरूक होना पड़ेगा। मशीन पर काम करना सीखने की दृष्टि से छोटी कक्षा से ही कंप्यूटर पर काम करना सिखाया जाता है। कक्षा 2-3-4 का बच्चा कंप्यूटर पर सब काम कर रहा है लेकिन जरा सोचिए, “क्या यही काम वह हिंदी या अपनी भाषा में कर सकता है?” जब आप उसे अंग्रेज़ी में पक्का करके 20 साल बाद किसी ऑफिस में लाएँगे और कहेंगे कि बेटा, इस कंप्यूटर पर हिंदी में काम करो। यह सोचने की ज़रूरत है कि, वह ऐसा क्यों करेगा और कैसे करेगा? कंप्यूटर प्रशिक्षण के कार्यक्रमों में हिंदी और भारतीय भाषाओं की उपस्थिति अनिवार्यतः होनी चाहिए। मैं बार-बार हिंदी के साथ भारतीय भाषा शब्द पर जोर दे रहा हूँ क्योंकि हिंदी अकेले कुछ नहीं कर सकती। हिंदी और भारतीय भाषाएँ मिलकर ही वास्तव में हिंदी बनती है। इस देश की ‘भारत-भारती’ बनती है । 

हिंदी और भारतीय भाषाओं को बाजार की भाषा बनाना और इन्हें कंप्यूटर की सर्वसमर्थ भाषा के रूप में स्थापित करना आने वाले समय की हमारी चुनौतियाँ हैं जिन्हें हमें पार करना ही है। मनोरंजन के क्षेत्र की, प्रकाशन के क्षेत्र की, मीडिया के क्षेत्र की चुनौतियों को हमने पार कर लिया है। मीडिया में सब जगह हिंदी छाई हुई है। मनोरंजन में फिल्म इंडस्ट्री इतनी व्यापक है जहाँ सब जगह हिंदी छाई हुई है। लेकिन जो फिल्म इंडस्ट्री के देवी-देवता कहे जाते हैं, आइकॉन्स कहे जाते हैं, हम उनका कॉलर कब पकड़ेंगे कि तुम भी हिंदी बोलना सीखो। स्क्रीन पर हिंदी बोल लेते हो लेकिन जब कोई तुमसे बात करने आता है तब अंग्रेज़ बन जाते हो! ये बातें एक्टिविज़्म की हो सकती हैं। आपको लग सकता है कि इन बातों से क्या लेना-देना है! हमें इन सबसे लेना-देना है। भाषा संबंधी शोध करने वाले लोगों का कहना है कि दुनिया की 6000 भाषाओं में से आधी से ज्यादा भाषाएँ गायब होने के कगार पर हैं। हालाँकि हिंदी और तेलुगु को कोई ऐसा खतरा नहीं है लेकिन हमें चेत जाना चाहिए। बाजार की तलवार दोधारी है। इस बाज़ार का लाभ उठाकर हम हिंदी को विश्वव्यापी बना सकते हैं। अगर हम जागरूक नहीं हुए तो हमारी हिंदी के ऊपर अंग्रेज़ी या कोई अन्य भाषा जो पहले ही लदी हुई है, और भी ऐसे ही लद जाएगी। इस स्थिति में हम टूटी-फूटी विदेशी भाषा सीखकर अपने बाज़ार को चलाने की कोशिश करते रहेंगे और हास्यास्पद बनते रहेंगे। बाज़ार, शिक्षा, न्याय और प्रशासन में हिंदी आएगी, तभी सच्चे अर्थ में हमारी राष्ट्र भाषा बनने पर उसकी विश्व भाषा की दावेदारी ईमानदार दावेदारी होगी। 

मित्रो, बहुत सारी बातें कही जा सकती हैं लेकिन मैं समझता हूँ कि रक्षामंत्री और गृहमंत्री के संदेशों में मुख्य बातें कही जा चुकीं हैं। आप सबको विश्राम देने के लिए बीच में मैं थोड़ी देर के लिए यहाँ आकर खड़ा हो गया। ‘मिधानी राजभाषा शील्ड’ आरंभ करने के लिए मैं आप सबको शुभकामनाएँ देता हूँ। मैं विशेष रूप से प्रबंध निदेशक महोदय को और आप सबको बधाई देता हूँ कि आपकी यह सोच उदाहरण बने। हैदराबाद के ही सभी सरकारी कार्यालयों एवं उपक्रमों में इसका समावेश करने से हम और विद्यार्थियों एवं लोगों को साथ जोड़ सकेंगे। एक द्वीप, एक आइलैंड, बनकर नहीं रह जाएँगे। बड़ी अच्छी बात है कि लगभग 150 अधिकारियों, कार्यकर्ताओं एवं अनेक विद्यार्थियों ने इन प्रतियोगिताओं में भाग लिया। शायद 24-25 विद्यार्थियों को पुरस्कृत भी किया जा रहा है। यह आँकड़ा बहुत ही प्रसन्न करने वाला आँकड़ा है।

अंत में, मैं उन बच्चों की विशेष प्रशंसा करना चाहता हूँ जिन्होंने यहाँ सरस्वती-वंदना प्रस्तुत की। मैं उनके अध्यापकों की भी विशेष प्रशंसा करता हूँ। उन्होंने वाणी की वंदना की। वाणी भाषा है। सरस्वती और कुछ नहीं, यह भाषा है। यही भाषा विभिन्न रूपों में प्रकट होती है। इस देश में यह माना जाता है कि सृष्टि नाद से उत्पन्न हुई है। सबसे पहले आकाश था। आकाश में नाद था। यह नाद ही, यह वाणी ही पहला तत्व है। बाकी जितने तत्व हैं वह उसके बाद उत्पन्न हुए हैं । जब हम कहते हैं ,‘ हे हिंदी तू हंस है , हे वाणी तू हंसवाहिनी और जगद्व्यापिनी है।’ तो हमारे इस कथन में हमारी एक कामना व्यंजित होती है! हंस विद्वान लोगों को कहा जाता है। यहाँ हमारी कामना है कि विद्वत्ता के ऊपर एक ज्ञान-आधारित समाज का निर्माण करते हुए भारत की भाषा जगद्व्यापिनी हो। हमारी कामना है कि हम ‘ग्लोबल’ बनें। जब हम कहते हैं – ‘हे माँ, तू हमें उजाला दे’, ‘हे माँ, तू हमें प्रेम दे’, ‘हे माँ, तू करुणामयी है’, ‘हे माँ, तू हमारा कल्याण कर’ तो इस प्रार्थना के माध्यम से इस देश की संस्कृति व्यक्त होती है। इस देश का सांस्कृतिक मूल्य व्यक्त होता है। भाषा केवल विचारों के आदान-प्रदान का, केवल बाजार चलाने का या केवल कंप्यूटर चलाने का ही माध्यम नहीं है। भाषा देश की पूरी-की-पूरी चेतना-धारा को व्यक्त करने और जोड़ने का माध्यम है। 1918 के व्याख्यान में महात्मा गाँधी ने कहा था कि इस देश के सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, प्रशासनिक इत्यादि कार्यों के साथ, यदि कोई एक भाषा ऐसी हो सकती है, जो पूरे देश की सांस्कृतिक विरासत को व्यक्त कर सके, तो वह हिंदी ही हो सकती है । यह बात 1918 में भी सच थी और 2018 में भी सच रहेगी। आपने मुझे यहाँ आने का यह अवसर प्रदान किया इसके लिए बहुत-बहुत-बहुत कृतज्ञ हूँ। नमस्कार। 

(लिप्यंकन : डॉ. चंदन कुमारी, पटना)

शनिवार, 22 अक्तूबर 2016

प्रेमचंद की वर्तमानता : ‘रंगभूमि’ और ‘गोदान’

'इंदु संचेतना' 
(चीन से निकलने वाली साहित्य की पहली अंतरराष्ट्रीय पत्रिका)
'विशिष्ट  प्रतिभा विशेषांक' (अक्तूबर-दिसंबर 2016) 
वर्ष 2, अंक 5 



प्रेमचंद की वर्तमानता : ‘रंगभूमि’ और ‘गोदान’

प्रेमचंद (1880-1936) भारत के उन अमर साहित्यकारों में अग्रणी हैं जिनकी प्रासंगिकता कभी कम नहीं होती तथा जो अपने समय का अतिक्रमण करके सब समयों में वर्तमान बने रहते हैं. वस्तुतः शाश्वतता की जड़ें समकालीनता में ही होती हैं. प्रेमचंद अपने समकाल से गहरे जुड़े थे इसलिए वे आज भी हमें समकालीन प्रतीत होते हैं. आज के समय में प्रेमचंद की वर्तमानता से पहले हमें उनके अपने समय और उसमें उनकी वर्तमानता को समझना होगा. यदि हम उनकी दो प्रमुख औपन्यासिक कृतियों ‘रंगभूमि’ (1925) और ‘गोदान’ (1936) के संदर्भ में उनके समय और तत्कालीन प्रवृत्तियों का अवलोकन करें तो सबसे पहली बात यह सामने आती है कि प्रेमचंद का समय हिंदी साहित्य और भारतीय समाज दोनों ही के हवाले से यथार्थवाद का समय नहीं था. वह युग आदर्शवाद और रोमांटिसिज़्म का युग था. तमाम राजनैतिक और साहित्यिक हलचलें उस समय आदर्शवाद से अनुप्राणित थीं और ‘रामराज्य’ का सपना सबकी आँखों में तैर रहा था. ‘प्रेमचंद अपने युग के साथ थे और अपने युग की उथलपुथल को उन्होंने अपनी रचनाओं में चित्रित किया है.’ (रामविलास शर्मा : प्रेमचंद और उनका युग). दरअसल वह धर्म और संस्कृति के पुनः आविष्कार का समय था और प्रेमचंद ने भी तदनुरूप अपनी रचनाधर्मिता का निर्वाह किया. उन्होंने धर्म को एक सामाजिक रूप दिया और तटस्थ रहकर, सामाजिक परिस्थितियों में उलझे हुए मनुष्य के धार्मिक विचारों को बनते-बिगडते दिखाया. (वही). उन्होंने अपनी कथाकृतियों में सामाजिक संघर्ष का चित्रण करते समय आदर्श से अनुप्राणित यथार्थ के चित्रण की प्रविधि अपनाई. ‘उन्होंने परिस्थितियों को घटा-बढ़ाकर नहीं चित्रित किया. अपने युग की निर्धनता, दासता और पीड़ितों की आर्त वेदना को जैसा उन्होंने अनुभव किया था वैसा दूसरे ने नहीं. प्रेमचंद की कृतियों का हमारे लिए यह संदेश है कि हम जनता में जाकर रहें और काम करें; अपनी रचनाओं में जनता जनता कम चिल्लाएँ.’ (वही). यहाँ प्रेमचंद की तत्कालीन लोकप्रियता और आज के समय में प्रासंगिकता दोनों के मूल कारण को डॉ. रामविलास शर्मा ने एकदम सही पकड़ा है. प्रेमचंद न तो यथार्थ को आदर्श के सम्मुख छोटा करते हैं और न ही विकृति की हद तक बड़ा बनाते हैं. इसीलिए उनके यहाँ यदि निर्धनता, दासता और पीड़ा की पुकार है तो संघर्ष, जिजीविषा, स्वाभिमान और मानवीय मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता भी है जो उनके लेखन को भारत की ज़मीन से जोड़ती है. यह ज़मीन से जुड़ने का गुण ही उन्हें सदा वर्तमान बने रहने की ताकत देता है. डॉ. रामविलास शर्मा ने इसी को उनकी रचनाधर्मिता से प्राप्त होने वाला संदेश माना है – ‘जनता में जाकर रहें और काम करें.’ इस स्तर पर प्रेमचंद मध्यवर्ग के अनेक निष्क्रिय बुद्धिजीवियों से एकदम अलग दिखाई देते हैं – जन से प्रतिबद्ध. यह प्रतिबद्धता उन्हें अपने स्तर पर सक्रिय आंदोलनकारी बनाती है. एक ऐसा लेखक जिसकी किताब अपने आंदोलनी तेवर के कारण जब्त की जाती है और जिसे अंततः सरकारी नौकरी छोड़नी पड़ती है. अपनी भाषा और अपनी नाम तक बदलना पड़ता है. जनता के साथ एकमेक होने के कारण ही उनकी रचनाओं में नारेबाजी नहीं बल्कि गहरी लोकानुभूति मिलती है. 

प्रेमचंद के युग की तुलना में अगर हम आज (2016) के युग को देखना चाहें तो कहना होगा कि यह युग पानी भरने के लिए धूप में सूखे होंठों प्रतीक्षा करती खड़ी ग्रामबालाओं के मरने और क़र्ज में डूबे किसानों के आत्महत्या करने का युग है. हमारे युग का यह यथार्थ ही प्रेमचंद की अद्यतन वर्तमानता का आधारभूत कारण है. जबतक भारतीय किसान की भूख और प्यास कायम है, तब तक प्रेमचंद के साहित्य की वर्तमानता कायम रहेगी. दरअसल, प्रेमचंद का समय भारतीय किसानों के लिए भारी परीक्षा का समय था. 1920 के आसपास भारत में अनेक स्थानों पर किसान आंदोलन फूट रहे थे. एक सजग रचनाकार के नाते प्रेमचंद इनसे भली प्रकार परिचित थे. प्रेमचंद ने भारतीय समाज की संरचना को भी उसकी विसंगतियों के साथ गहरे विश्लेषित किया था, समझा था. इसमें संदेह नहीं कि भारतीय समाज तब भी और आज भी धर्मों, वर्णों और जातियों में बंटा समाज था और है. लेकिन प्रेमचंद इस ऊपरी संरचना को भेदकर भारतीय समाज की भीतरी आर्थिक संरचना को देख पा रहे थे. उन्हें मालूम था कि यह समाज हिंदू और मुसलमान में बँटा हुआ है. उन्हें यह भी मालूम था कि यह समाज अगड़ों और पिछडों में बँटा हुआ है. वे यह भी जानते थे कि इस समाज में पुरुष और स्त्री के अधिकारों में बहुत अंतर है. लेकिन अपनी रचनाओं में उन्होंने इन विरुद्धों को संघर्षरत नहीं दिखाया. उन्हें उस असली विरोधी द्वंद्व की पहचान थी जो इस देश की निर्धनता, दासता और पीड़ा का मूल कारण है. वह परस्पर विरोधी द्वंद्व है - प्रभुतासंपन्न वर्ग बनाम दीन हीन जनता का द्वंद्व. इनमें से प्रभुतासंपन्न वर्ग में जमींदार, महाजन और अंग्रेजी राज के हाकिम तथा उनके पिछलग्गू शामिल हैं. यही कारण है कि प्रेमचंद धर्म, वर्ण, जाति, भाषा या क्षेत्र के आधार पर संगठित होने या आंदोलन चलाने की बात कहीं भी नहीं करते; बल्कि बार-बार इस प्रभु वर्ग के शोषक चरित्र को बेनकाब करके दीन हीन शोषित जनता को जागरूक और सक्रिय बनाने का प्रयास करते हैं. आज जब भारतीय समाज और राजनीति में एक बार फिर धर्म, वर्ण, जाति, भाषा और क्षेत्र के भेद और इन भेदों के आधार पर संगठित होकर सत्ता प्राप्त करने के प्रयास इस देश को खंडित करने की सीमा तक सक्रिय दिखाई दे रहे हैं, प्रेमचंद की वर्गदृष्टि और राष्ट्रीय चेतना उनके साहित्य की प्रासंगिकता को रेखांकित कर रही है. इसमें संदेह नहीं कि ‘ऊँच नीच के भेदभाव के प्रति प्रेमचंद से अधिक सचेत और कोई हिंदी लखक नहीं था. पर उनके कथासाहित्य में वर्ग संघर्ष है, जमींदारों, महाजनों, अंग्रेजी राज के हाकिमों के विरुद्ध संघर्ष है; अगड़ी-पिछड़ी जातियों के बीच संघर्ष नहीं है. कहीं भी यह संकेत नहीं है कि बिरादरी के आधार पर सब लोग एक हो जाएँ तो उनका उद्धार हो जाएगा.’ (रामविलास शर्मा, 1994). 

यह तो हुई भारतीय राजनैतिक और सामाजिक परिदृश्य की बात. अब यदि तब के और अब के अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य का तुलनात्मक अवलोकन करें तो सबसे पहले यह सत्य दिखाई देगा कि पहले दो महाशक्तियाँ थीं परंतु अब एक ही रह गई है. यह महाशक्ति मीडिया और बाजार से खाद-पानी पाकर निरंतर दैत्याकार होती जा रही है. पूँजी और मुनाफ़े पर आधारित इस महाशक्ति के पास दुनिया को पलक झपकते नष्ट कर सकने में समर्थ आणविक अस्त्र-शस्त्रों का जखीरा है लेकिन नैतिक शक्ति का अभाव है. जैसा कि डॉ. रामविलास शर्मा ने लक्षित किया है, ‘जनतंत्र का ढोल पीटने वाला अमेरिकी पूँजीवाद दुनिया पर अपनी डिक्टेटरशिप कायम कर रहा है. इस डिक्टेटरशिप को खत्म करने का मूलमंत्र है – स्वदेशी. भारत जितना ही आत्मनिर्भर बनेगा, उतना ही वह अपनी एकता और स्वाधीनता की रक्षा करने में समर्थ होगा, उतना ही साम्राज्यवादी दासता से विश्वजनता की मुक्ति में सहायक होगा. आगे आने वाले दिनों में हमारे महान लेखक प्रेमचंद का साहित्य संघर्ष में प्रेरणा देगा, विजय में हमारी आस्था को दृढ़ करेगा. हमारे साहित्य की और हमारे राष्ट्रीय जीवन की सचाई एक दिन अवश्य सारे अंधकार को चीरकर दुनिया में अपनी ज्योति का उजाला फैला देगी.’ (वही). 

प्रेमचंद की कालजयी वर्तमानता राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य की उनकी समझ और तदनुरूप साहित्यिक प्रयास से तो सिद्ध होती ही है; उनकी साहित्य दृष्टि से भी प्रमाणित होती है. उनकी साहित्य दृष्टि उनकी विश्व दृष्टि का आधार है. वे साहित्य को मनोरंजन और विलासिता का उपकरण बनाने के सख्त खिलाफ थे. वे मानते थे कि साहित्य उस उद्योग का नाम है जो आदमी ने आपस के भेद मिटाने और उस मौलिक एकता को व्यक्त करने के लिए किया है, जो इस जाहिरी भेद की तह में, पृथ्वी के उदर में व्याकुल ज्वाला की भांति छिपी हुई है. यहाँ आपस के भेद मिटाने और मौलिक एकता को व्यक्त करने जैसे प्रयोजनों के साथ साहित्य को जोड़कर प्रेमचंद ने रस, साधारणीकरण और लोकमंगल जैसी अवधारणाओं को नितांत मौलिक अर्थबोध से संपन्न किया है. पृथ्वी के उदर में छिपी व्याकुल ज्वाला, प्रेमचंद की इस मौलिक साहित्य दृष्टि में, वह स्थायी भाव है जो संपूर्ण मनुष्यता को मानवीय करुणा के धरातल पर जोड़ता है. उन्होंने बलपूर्वक यह रेखांकित किया कि ‘सत्य’ और ‘असत्य’ का संघर्ष बराबर चला आता है और जब तक साहित्य की सृष्टि होती रहेगी, यह संघर्ष साहित्य का मुख्य आधार बना रहेगा. वास्तव में, साहित्य की सामाजिक उपयोगिता और इस विश्व दृष्टि से ही होकर उसकी शाश्वतता का रास्ता जाता है. इसके लिए आवश्यक है कि लेखक को अपने समय में विद्यमान ‘सत्य’ और ‘असत्य’ की सही पहचान हो और इनके संघर्ष में वह सत्य के पक्ष में डटकर खड़ा हो. प्रेमचंद को इन शक्तियों और इनके संघर्ष की पहचान तो थी ही, ‘सत्य’ के प्रति उनकी वचनबद्धता भी स्पष्ट थी. यही कारण है कि आदर्शवादी युग में वे यथार्थवादी दृष्टिकोण अपना रहे थे. आदर्श और यथार्थ का संघर्ष कथाकार प्रेमचंद का भी संघर्ष है. इस संघर्ष में उन्होंने सामंजस्य का मार्ग चुना और आर्थिक शोषण का उसकी पूरी भयावहता के साथ यथार्थ चित्रण किया. वे यही नहीं रुके बल्कि इस यथार्थ का विश्लेषण करते हुए समाज समीक्षा के दायित्व को भी संपन्न किया. साथ ही अपनी आदर्शवादी भावना के अनुरूप जहाँ संभव हुआ, वहाँ समाधान भी सुझाया. 

प्रेमचंद को उस समय में आज की बाज़ारवादी सभ्यता की आहटें सुनाई देने लगी थीं. इस नई सभ्यता को उन्होंने ‘महाजनी सभ्यता’ कहते हुए आलोचना का निशाना बनाया. उनकी यह समझ आज भी अत्यंत सटीक है कि ‘नई सभ्यता में पैसे का स्थान सर्वोपरि है. साम्राज्यवाद के आवश्यक गुण मजबूत कलेजा और बलवान भुजाएँ नहीं हैं. उसके लिए बुद्धि का धन संचय के लिए उपयोग तथा मौन आज्ञा पालन आवश्यक है. इस सभ्यता ने समाज को दो अंगों में बाँट दिया है : जिनमें एक हड़पने वाला है, दूसरा हड़पा जाने वाला है.’ (महाजनी सभ्यता). वे मानते थे कि अंग्रेजी राज द्वारा कायम की गई नई शिक्षा स्वार्थ की भित्ति पर खड़ी हुई है और उसके द्वारा प्रवर्तित आधुनिक व्यापार और नई औद्योगिकता मनुष्य को क्रमशः दैत्य बना रही है. आर्थिक परिदृश्य की उनकी यह समझ 1925 में प्रकाशित ‘रंगभूमि’ में स्पष्ट देखी जा सकती है. स्मरण रहे कि यह उनके सरकारी नौकरी छोड़ने (1921) के बाद का उपन्यास है. अतः इसमें ब्रिटिश रीति-नीति की आलोचना अधिक मुखर होकर अभिव्यक्त हुई है. प्रेमचंद सूरदास के माध्यम से उन प्रयासों का विरोध करते हैं जो गाँव को आधुनिक व्यापार और नए उद्योग धंधे का केंद्र बनाकर ग्रामीण सभ्यता को उलटना चाहते हैं. उनका स्पष्ट मत है कि गाँव में कारखाना लगने से किसान और जमींदार दोनों ही निकम्मे हो जाएँगे. किसान भूमिहीन होकर मजदूर बनेगा और ‘मरजाद’ से पतित होगा जबकि ज़मींदार उद्योग के हिस्से (शेयर) खरीदकर क्रमशः भयंकर शोषक शक्ति के रूप में तब्दील हो जाएगा. सूरदास और जॉन सेवक आमने सामने खड़े हुए दो पात्र ही नहीं है, बल्कि परस्पर विरोधी दो सभ्यताएँ हैं. सूरदास भारतीय ग्राम सभ्यता का प्रतीक है तो जॉन सेवक पश्चिमी महाजनी सभ्यता का. सूरदास अपनी पैतृक परंपरा से प्रेम करता है. अपनी ज़मीन को अपने बाप-दादों के नाम से जोड़कर देखता है और उसे अपनी यादगार बनाना चाहता है. इस वैयक्तिक लगाव के बावजूद वह अपनी ज़मीन का विचार करते समय सामाजिक लाभ का विचार पहले करता है. वह चाहता है कि वहाँ गाँव भर के बच्चे खेलें और गाँव भर के पशुओं के लिए चरागाह बने. वह व्यक्तिगत लाभ-हानि से ऊपर उठकर चाहता है कि उसकी ज़मीन ‘अनाचार का ठिकाना’ न बने. दूसरी ओर जॉन सेवक जाति उद्धार, रोजगार सृजन, यात्रियों के लिए मकान, दूध-मलाई और उपलों की बिक्री, पान की बिक्री और मदरसे की स्थापना ही नहीं, राष्ट्रीयता की ऊँची-ऊँची बातें करता है. लेकिन उसका आचरण झूठ और पाखंड से परिपूर्ण है. यदि ‘सत्य’ और ‘असत्य’ के संघर्ष में लेखकीय पक्षधरता वाली प्रेमचंद की कसौटी पर इन दोनों पात्रों को घिसकर देखें तो सूरदास के रूप में सत्य और न्याय के साथ प्रेमचंद खड़े हुए दिखाई देते हैं. आज नैतिकता और अनैतिकता के धुंधलके वाले मूल्यमूढ़ उत्तर आधुनिक समय में ऐसी साफ़ सुथरी प्रतिबद्धता प्रेमचंद को प्रासंगिक बनाती है. 

यह जो महाजनी सभ्यता है न; इसने एक नया मूल्य गढ़ा है – प्रोफेशनलिज्म या व्यावसायिकता का मूल्य. महाजनी या बाजारवादी सभ्यता में व्यवसाय या लाभ सर्वोपरि मूल्य है. हम आज देख रहे हैं कि बाजार के समक्ष सब प्रकार की नैतिकताएँ और सारे संबंध बौने हो गए हैं क्योंकि बाज़ार का तो नियम यही है कि ‘बाप बड़ा न भैया, सबसे बड़ा रुपैया.’ महँगाई बढ़ती है तो बढ़ा करे, लोग मरते हैं तो मरा करें, प्रोफेशनलिज्म इन विषयों पर द्रवित होना नहीं सिखाती. यही कारण है कि जॉन सेवक कुंवर भरत सिंह से कहता है, ‘व्यवसायी लोग इन गोरखधंधों में नहीं पड़ते; उनका लक्ष्य केवल वर्तमान परिस्थितियों पर रहता है.’ (रंगभूमि). वह सूरदास को भी समझाता है, बल्कि धमकाता है, ‘अब व्यापार का राज्य है, और जो इस राज्य को स्वीकार न करे, उसके लिए तारों को निशाना मारने वाली तोपें हैं.’ (वही). अभिप्राय यह है कि व्यावसायिकता का आगमन प्रकारांतर से मर्यादा और मूल्यों के ह्रास का प्रतीक बन गया है. सूरदास मज़दूरों के आचरण के माध्यम से यह लक्षित करता है कि “वे सारी बस्ती में फैले हुए हैं और रोज ऊधम मचाते रहते हैं. हमारे मुहल्ले में किसी ने औरतों को नहीं छेड़ा था, न कभी इतनी चोरियाँ हुई, न कभी इतने धड़ल्ले से जुआ हुआ, न शराबियों का हुल्लड़ रहा. जब तक मजूर लोग यहाँ काम पर नहीं आ जाते, औरतें घरों से पानी भरने नहीं निकलतीं. रात को इतना हुल्लड़ होता है कि नींद नहीं आती.” इसी प्रकार मकान खाली कराने के संदर्भ में नाकाफी मुआवजा दिए जाने पर सिपाही का कथन भी द्रष्टव्य है, “मानो दिन दहाड़े डाका पड़ रहा हो.” अभिप्राय यह है कि महाजनी सभ्यता के आगमन से गाँव का पारंपरिक तंत्र टूट गया है, आपसी संबंधों की कड़ियाँ तडक गई हैं और लाभ, लोभ तथा मुनाफे के लिए लगभाग लूटपाट और डाके जैसी स्थिति उत्पन्न हो गई है. यह स्थिति आगे चलकर इतनी विकट हो जाती है कि गोली चालन की नौबत आ जाती है जिसमें बारह लोग मारे जाते हैं. 

यहाँ सूरदास के सत्याग्रह पर भी चर्चा की जा सकती है. इस सत्याग्रह के कारण ही सूरदास कई बार महात्मा गांधी की झलक देता प्रतीत होता है. एक प्रकार से सूरदास और जॉन सेवक का संग्राम व्यापक स्तर पर महात्मा गांधी के नेतृत्व में अंग्रेजों के खिलाफ़ चल रहे स्वतंत्रता संग्राम का प्रतीक बन जाता है. सूरदास के सत्याग्रह रूपी संग्राम को छिड़े हुए दो महीने हो गए, समस्या प्रतिदिन भीषण होती जाती थी, क्योंकि बाजार और सत्ता की शक्तियाँ अपने स्वार्थपूर्ण और दमनकारी हथकंडों से बाज नहीं आ रही थीं. बहुतों की पकड़-धकड़ हुई, बहुतों को शारीरिक कष्ट दिया गया, जाने कितनों को अपमानित किया गया, महाजनी सभ्यता अमानुषिक कृत्य पर उतारू थी. “सारे नगर में, गली-गली में, घर-घर यही चर्चा होती रहती थी. सहस्रों नगरवासी रोज वहाँ पहुँच जाते थे, केवल तमाशा देखने नहीं बल्कि एक बार उस पर्णकुटी और उसके चक्षुहीन निवासी का दर्शन करने के लिए और अवसर पड़ने पर अपने से जो कुछ हो सके कर दिखाने के लिए.” (रंगभूमि). सत्याग्रह का संबंध संयम और धैर्य से है. सत्याग्रह में सत्याग्रही के ही संयम और धर्य की परीक्षा नहीं होती, जनता के भी संयम और धैर्य की परीक्षा होती है. जिस प्रकार महात्मा गांधी के आंदोलनों में व्यापक भारतीय जन गण ने अपने संयम और धैर्य का विस्मयकारी प्रदर्शन किया, सूरदास के सत्याग्रह के अवसर पर भी कुछ-कुछ वही नज़ारा देखने को मिला. “जनता का संयम और धैर्य अब अंतिम बिंदु तक पहुँच गया है. कोई नहीं कह सकता कि कब क्या हो जाए. साधारण जनता इतनी स्थिरचित्त और दृढ़व्रत हो सकती है इसका आज विनय को अनुभव हुआ.” यहाँ जनता और उसके साधारणत्व पर प्रेमचंद का विशेष बल है जो इसलिए विशिष्ट बन गई है कि स्थिरचित्त और दृढ़व्रत है. चित्त की स्थिरता और व्रत की दृढ़ता भारतीय काव्यशास्त्रीय परंपरा में नायकत्व की कसौटी है. इसका अर्थ यह है कि सूरदास के माध्यम से साधारण जनता को नायकत्व प्राप्त हुआ. साधारण जनता को नायकत्व प्रदान करने की प्रेमचंद की यह सूझ आज भी महत्वपूर्ण है क्योंकि आज भी पैसे और ताकत की राजनीति करने वालों के लिए यह समझना आवश्यक है कि लोकतंत्र में जनता संप्रभु होती है और उसमें अपने समय को दिशा देने वाले नायकत्व की सारी संभावनाएँ निहित होती हैं. प्रसंगवश क्लार्क के प्रति सोफी का यह कथन भी विचारणीय है कि “अन्यायपूर्ण शासन, शासन नहीं युद्ध है.” इस अन्यायपूर्ण शासन के विरुद्ध युद्ध का प्रतीक है सूरदास. तत्कालीन भारतीय राजनीति में स्वतंत्रता संग्राम के नेतागण इसके प्रतीक थे और आज भी बाजार, उपभोक्तावाद, आतंकवाद आदि के विरुद्ध मनुष्य के पक्ष में, मनुष्य के अधिकारों के पक्ष में, युद्ध का प्रतीक है यह भारतीय विश्वास कि पशुबल चाहे कितना भी प्रबल हो आत्मबल उसकी तुलना में श्रेष्ठ होता है. यह ठीक है कि अंततः सूरदास धराशायी हो जाता है लेकिन यह आत्मबल की पराजय नहीं है. इसीलिए तो जनता से विनय ज़ोर देकर यह कहता है, “सत्य की विजय पर आनंद और उत्सव मनाने का अवसर है.” हम फिर याद करें कि प्रेमचंद के लिए साहित्य की कसौटी सत्य और असत्य के संघर्ष में सत्य की पक्षधरता है. जिस महाजनी सभ्यता और व्यावसायिक दृष्टिकोण से आज का पूरा समाज ग्रसित है उसके प्रतिनिधि के रूप में जॉन सेवक का यह कथन बाजार की भीतरी सच्चाई को अनावृत करता है कि “व्यवसाय कुछ नहीं है अगर नर हत्या नहीं है. आदि से अंत तक मनुष्यों को पशु समझना और उनसे पशुवत व्यवहार करना इसका मूल सिद्धांत है. जो यह नहीं कर सकता वह सफल व्यवसायी नहीं हो सकता.” यहाँ यह भी ध्यान में रहे कि तत्कालीन सत्ता अर्थात अंग्रेज भारत में व्यवसाय के लिए ही आए थे और जब उन्हें लगने लगा कि भारत में अब और बने रहना घाटे का सौदा है तो वे इस देश के टुकड़े करके बड़ी सफाई से वापस लौट गए. उनकी शासन नीति का आधार शोषण था. महात्मा गांधी हों या प्रेमचंद हों, दोनों ही ग्राम सभ्यता पर केंद्रित ऐसे स्वराज्य की कामना करते थे जिसमें सत्ता और जनता के बीच सहृदयता का संबंध हो. लेकिन अंग्रेज अधिकारी इसका उलटा सोचते हैं. उदाहरण के लिए सोफी से क्लार्क कहता है, “हम यहाँ शासन करने के लिए आते हैं. अपने मनोभावों और व्यक्तिगत विचारों का पालन करने के लिए नहीं. जहाज से उतरते ही हम अपने व्यक्तित्व को मिटा देते हैं. हमारा न्याय, हमारी सहृदयता, हमारी सदिच्छा सबका एक ही अभीष्ट है. हमारा प्रथम और अंतिम उद्देश्य शासन करना है.” ऐसे शासन से किसी प्रकार के लोक कल्याणकारी कार्य की आशा नहीं की जा सकती. यही कारण है कि सूरदास इस पूरी व्यवस्था के खिलाफ खड़ा होता है और अपने अंतिम क्षण में यह भी कह जाता है कि हम भारतीय अपने संघर्षों में इसलिए हारते हैं कि हम अलग-अलग होकर लड़ते हैं. हम धर्मों, जातियों, वर्णों, क्षेत्रों., भाषाओं जैसे भेदभावों में बंटे हुए हैं और इसलिए एकजुट होकर नहीं लड़ते हैं, जबकि अंग्रेज एक होकर लड़ते हैं. सूरदास चेतावनी देता है कि आज हम अनाड़ी हैं लेकिन तुम्हारी इस नीति को पहचान गए हैं और एक दिन वह आएगा जब हम एकजुट होकर लड़ेंगे और तुम्हें तुम्हारे ही खेल में हराकर दिखाएँगे. और तमाम बातों को छोड़ भी दें तो इसमें संदेह नहीं कि सूरदास के इस कथन में आज भी हमारे लिए अनिवार्य संदेश निहित है. विकास के पथ पर बढ़ते हुए आज के भारत को दुनिया की अनेक शक्तियाँ दबाना और रोकना चाहती हैं. ऐसे में यदि इस देश को विभिन्न क्षेत्रों में विकास के उच्च शिखरों पर पहुँचना है तो हर चुनौती का एक होकर एकजुट होकर, मुकाबला करना सीखना पड़ेगा. निस्संदेह यह समझ ‘रंगभूमि’ की प्रासंगिकता और वर्तमानता का बहुत बड़ा आधार है. 

प्रेमचंद “उन सारी बातों के विरुद्ध थे जो मनुष्य-मनुष्य के बीच, स्त्री-पुरुष के बीच, अमीर-गरीब के बीच, ज़मींदार और किसान के बीच, यहाँ तक कि भगवान और आदमी के बीच भी फाँक पैदा करती हैं.” (डॉ. गोपाल राय). इसके अलावा जैसा कि प्रेमचंद के अत्यंत निकट रहे और कथा जगत में उनके वारिस जैनेंद्र ने एक साक्षात्कार में बताया है, प्रेमचंद ‘धन के दुश्मन’ थे. वे आज़ादी की समस्या को भी आर्थिक शोषण और दमन सु जुड़ी समस्या के रूप में देखते थे. भारत के गाँवों के अर्थशास्त्र को उन्होंने भली प्रकार समझा था और वे जान गए थे कि सरकार, महाजन और जमींदार तीनों मिलकर एक ऐसे गठबंधन की रचना करते हैं जिसका एकमात्र उद्देश्य शोषण को बरकरार रखना है. किसानों की निर्धनता, उनकी दयनीय जीवन दशा और अमानवीय परिस्थितियाँ इस गठबंधन के दबाव के कारण निरंतर विकट से विकटतर होती जाती थीं. भूमिकर और वसूली तंत्र के सहारे यह गठबंधन किसानों को जन्म जन्म तक गुलाम बनाए रखने का षड्यंत्र चला रहा था. प्रेमचंद ने अपनी रचनाओं में इस षड्यंत्र का बेख़ौफ़ खुलासा करते हुए तत्कालीन शिक्षा, अदालत और पुलिस जैसी सरकारी संस्थाओं की जो आलोचना की है उसके लिए आत्मबल और निष्ठा से जुड़ा साहस चाहिए. लेखन कर्म से जुड़े तमाम लोगों के लिए प्रेमचंद अपने इस आत्मबल और साहस के कारण आज भी चुनौती हैं. तंत्र की आलोचना के साथ साथ वे भारतीयों की गुलाम मानसिकता की भी आलोचना करने से गुरेज नहीं करते. उन्हें हिंदुस्तानियों की अंग्रेजियत अत्यंत विडंबनापूर्ण लगती है. ‘रंगभूमि’ में राजपूताने के राजा विशाल सिंह के राज्य के बहाने प्रेमचंद ने भारतीयों की गुलाम मानसिकता पर करारी टिप्पणी की है. विनय ने देखा कि उस राज्य के शहरों में सड़कें, पाठशालाएँ, चिकित्सालय सबके नाम अंग्रेजी में थे. “ऐसा जान पड़ता था कोई भारतीय नगर नहीं, अंग्रेजों का शिविर है. ××× इतना नैतिक पतन, इतनी कायरता! यों राज्य करने से डूब मरना अच्छा है.” आजादी के बाद भी भारतीयों की इस गुलाम मानसिकता में कोई खास बदलाव आया है, कहा नहीं जा सकता. आज फिर किसी प्रेमचंद की आवश्यकता है जो सीना तानकर हिंदुस्तानी अवाम और नेतागण की आँख में आँख डालकर कह सके – ‘इतना नैतिक पतन, इतनी कायरता, यों राज्य करने से डूब मरना अच्छा है.’ 

अब कुछ बातें ‘गोदान’ के हवाले से. जिस प्रकार की नई सभ्यता का विकास पिछले साठ या सत्तर वर्षों में हमने किया है उसका लब्बोलुआब यह है कि आज जीवन के हर क्षेत्र में मूल्यों, आदर्शों, सिद्धांतों अथवा नैतिकताओं का अकाल सा पड़ गया है. इसका कारण है कि प्रेमचंद का सर्वथा साधनहीन और विपन्न पात्र भी जिस ‘मरजाद’ की चिंता करता है, आज का सुविधाओं और संसाधनों से संपन्न समाज उसकी तनिक भी परवाह नहीं करता. चंद्र प्रकाश खन्ना जो एक शुगर मिल का मालिक है, उस ज़माने में कम से कम इतना तो मनुष्य था कि उसे यह अहसास था कि व्यावसायिक लाभ के लिए उसने बार बार सिद्धांतों की हत्या की है. इसके विपरीत आज स्थिति यह है कि हम सीना ठोककर यह पूछने लगे हैं कि सिद्धांत किस चिड़िया का नाम है. जल्दी से जल्दी, अधिक से अधिक धन बटोरने की स्पर्धा में न्याय, सिद्धांत, सत्य जैसे मूल्य कहीं नहीं ठहर रहे हैं. करोड़ों करोड़ का घोटाला करके भी लोग इस महाजनी सभ्यता में सुर्खुरू घूमते दिखाई देते हैं. प्रेमचंद को मालूम है कि ये जो लोग लखपति, करोड़पति और अरबपति बनते हैं, उनकी सच्चाई क्या है. खन्ना के शब्दों में, “आप नहीं जानते मिस्टर मेहता, मैंने अपने सिद्धांतों की कितनी हत्या की है. कितनी रिश्वतें दी है, कितनी रिश्वतें ली है. किसानों की ऊख तौलने के लिए कैसे आदमी रखे, कैसे नकली बाँट रखे.” (गोदान). आज हालात इससे बदतर है और विडंबना यह है कि चोर ही शाह बने बैठे हैं. अपराध, पूँजी और राजनीति के बीच एक ऐसी दुरभिसंधि है जिसमें आम आदमी निरंतर पिस रहा है. ‘गोदान’ में प्रेमचंद ने इस दुरभिसंधि को पहचान लिया था. तभी तो उन्होंने यह दर्शाया कि चंद्र प्रकाश खन्ना मजदूरों के नेता भी है और धनपतियों के रक्षक भी. यह हमारी आज की राजनीति का भी चरित्र है. नेता आप मज़दूरों और किसानों के हैं, लेकिन हित-चिंता आपको व्यापारियों, व्यवसायियों, उद्योगपतियों और पूँजीपतियों की है क्योंकि चुनाव उन्हीं के पैसे लड़े जाते हैं. जिस प्रकार यह संभव नहीं है कि मज़दूरों के नेता बने हुए खन्ना शक्कर मिल के अपने हिस्सेदारों के हित का विचार न करें, उसी प्रकार यह संभव नहीं है कि दीन हीन विपन्न जनता के नेता बने हुए लोग अपने दलों के संरक्षक धनपतियों के हितों का विचार न करें. ऐसा प्रतीत होता है कि प्रेमचंद ने पिछली शताब्दी के आरंभिक दशकों में ही इस शताब्दी के आर्थिक, राजनैतिक विद्रूप के दर्शन कर लिए थे. यह हिस्सेदारी आज भी कई तरह से चालू है. और इसीलिए मेहता के रूप में प्रेमचंद का यह तर्क भी वर्तमान संदर्भ में भी पूरी तरह प्रासंगिक है कि “क्या आप का विचार है कि मजूरों को इतनी मजूरी दी जाती है कि उसमें (मंदी के बहाने से) चौथाई कम कर देने से मजूरों को कष्ट न होगा? आपके मजूर बिलों में रहते हैं – गंदे बदबूदार बिलों में – जहाँ आप एक मिनट भी रह जाए तो आपको कै हो जाए. कपड़े वे जो पहनते हैं उनसे आप अपने जूते भी न पोंछेंगे. खाना जो वे खाते हैं, आपका कुत्ता भी न खाएगा. आप उनकी रोटियाँ छीनकर अपने हिस्सेदारों का पेट भरना चाहते हैं.” (गोदान).

आज भी विभिन्न सरकारें क्या यही नहीं कर रही हैं? उस पर तुर्रा यह कि कथनी और करनी का अंतर बेशर्मी की हद तक बढ़ गया है. राय साहब के चरित्र के दोगलेपन में प्रेमचंद ने इसका पूर्वाभास प्रस्तुत किया है. राय साहब जब मेहता के समक्ष पूँजीवाद की आलोचना करते हुए यह कहते हैं कि “किसी को भी दूसरों के श्रम पर मोटे होने का अधिकार नहीं है. उपजीवी होना घोर लज्जा की बात है.” (गोदान); तो इस पर मेहता की बेबाक टिप्पणी आज भी इस देश के अनेक नेताओं के संदर्भ में सटीक प्रतीत होती है, “आपकी ज़बान में जितनी बुद्धि है, काश उसकी आधी भी मस्तिष्क में होती.” (गोदान). 

प्रेमचंद की समझ में यह बात भली भाँति आ गई थी कि पूँजीवाद उस समय (पिछली शताब्दी के चौथे दशक) तक जिस अवस्था में पहुँच चुका था, उससे आगे मूल्यों का बड़ा संकट पैदा होने वाला था. पूँजीवादी व्यवस्था बुरी चीज है लेकिन बाज़ारवादी सभ्यता उससे भी बुरी चीज है – ऐसा प्रेमचंद को लगता था; और सही ही लगता था. उसका कारण है; और इस कारण को उन्होंने होरी के मुँह से कहलवाया है. होरी की समझ में यह बात आ गई है कि “ज़मींदार तो एक ही है मगर महाजन तीन-तीन हैं. सहुआइन अलग, मंगरू अलग और दातादीन पंडित अलग.” (गोदान). आगे के समय में ज़मींदारी प्रथा तो समाप्त हो गई, लेकिन महाजनी सभ्यता बाज़ारवाद के रूप में इतनी अधिक फैल गई कि बीसवीं शताब्दी के अंतिम दशकों में और इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभ में पूरे देश में इस महाजनी सभ्यता से ग्रसित और त्रस्त किसानों की आत्महत्या की घटनाएँ आम हो गईं. दुलारी सहुआइन और मंगरू साह का जो चित्र प्रेमचंद ने प्रस्तुत किया है वह किसी सुरसा या किसी यमदूत जैसा है. दुलारी सहुआइन के दर्शन कीजिए, “पाँव में मोटे-मोटे चाँदी के कड़े पहने, कानों में सोने का झूमक, आँखों में काजल लगाए, बूढ़े यौवन को रँगे रँगाए.” (गोदान). शायद यही वह पूँजीवाद है जिसकी कोख से उत्तर आधुनिक उपभोक्तावाद जन्मता है. अब ज़रा मंगरू साह रूपी यमदूत का भी अवलोकन कर लें - “काला रंग, तोंद कमर के नीचे लटकती हुई, दो बड़े-बड़े दाँत सामने जैसे काट खाने को निकले हुए. गठिया का मरज हो गया था. खाँसी भी आती थी.” (गोदान). प्रेमचंद ने उसे ‘कुकर्म का साक्षात अवतार’ कहा है. स्पष्ट है कि ये महाजनी सभ्यता के दूत प्रेमचंद के समय से आज तक भारतीय किसान की छाती पर चढ़े हुए हैं, लगातार उसका गला दबा रहे हैं. ऐसी स्थिति में यदि गिरधर पगार मिलने पर इकन्नी की ताड़ी पीकर मिल के फाटक पर आसन जमा लेता है तो यह पूरे परिदृश्य को और अधिक कारुणिक बनाने वाली सच्चाई है – “गिरधर ने पेट दिखाकर कहा – साँझ हो गई जो पानी की बूँद भी कंठ तले गई हो तो गोमांस बराबर. एक इकन्नी मुँह में दबा ली थी. उसकी ताड़ी पी ली. सोचा साल भर पसीना गारा है, तो एक दिन ताड़ी भी पी लूँ. मगर सच कहता हूँ नसा नहीं है. एक आने में क्या नसा होगा. हाँ, झूम रहा हूँ जिससे लोग समझें कि खूब पिए हुए हूँ. बड़ा अच्छा हुआ काका (झिंगुरी सिंह), बेबाकी हो गई. बीस लिए थे, उसके एक सौ साठ भरे हैं, कुछ हद है?” (गोदान). हद न ‘गोदान’ के समय थी और न ‘कफ़न’ के समय. आज भी नहीं है. 

जिस प्रकार गिरधर का ताड़ी पीना जहाँ ‘कफ़न’ के घीसू और माधव के ताड़ी पीने की याद दिलाता है और दरिद्रता के अमानुषिक यथार्थ पर से पर्दा उठाता है, इसी प्रकार धनिया का होरी के प्रति कथन ‘पूस की रात’ की याद दिलाता है. किस तरह किसान अपनी माँ समान धरती को खोकर महाजनी सभ्यता के शिकार होकर मज़दूर बनाने को विवश हैं! देखें – “अब और कौन आमदनी है जिससे गोई आवेगी? हल में क्या मुझे जोतोगे, या आप जुतोगे? पूस की यह ठंड; और किसी की देह पर लत्ता नहीं. ले जाओ सबको नदी में डुबो दो. कब तक पुआल में घुसकर रात काटेंगे. और पुआल में घुस भी लें तो पुआल खाकर रहा न जाएगा. तुम्हारी इच्छा हो घास ही खाओ, हमसे तो खाई न जायगी.” (गोदान). आक्रोश, करुणा, रुदन, विडंबना, व्यंग्य – क्या नहीं है धनिया के इस कथन में; और कौन कह सकता है कि यह कथन आज प्रासंगिक नहीं रह गया है? अस्तु. 

‘गोदान’ का अंतिम अंश देखते चलें – “ऐसी लू लगी होरी को कि उसके प्राण ही ले लिए.” (गोदान). प्रेमचंद की इसी तेवर की कहानी ‘सद्गति’ यहाँ याद आती है. और साथ ही आँखों के सामने घूम जाता है सन 2016 के अप्रैल माह के तपते भारत का यह नंगा सच कि आज भी भीषण धूप और लुओं के बीच पानी के लिए तरसते हुए किसान, मज़दूर और उनके बच्चे तड़प तड़प कर मर जाते हैं. उस समय में दातादीन पंडित महाजनी सभ्यता का एजेंट बना होरी की मृत्यु का गोदान स्वीकार कर रहा था तो एक तरफ आज के नेतागण पानी के लिए मरती साधारण जनता की मौत पर राजनीति करते हैं तथा दूसरी तरफ मीडिया अपनी टीआरपी का खेल खेलता है. ये सब भी दातादीन की तरह ही बाज़ार संस्कृति के एजेंट हैं – “पति के ठंडे हाथ में रखकर सामने खड़े दातादीन से बोली - महाराज, घर में न गाय है, न बछिया, न पैसा. यही पैसे हैं, यही इनका गोदान है. – और पछाड़ खाकर गिर पड़ी.” (गोदान). 

प्रेमचंद के दोनों चर्चित उपन्यासों ‘रंगभूमि’ और ‘गोदान’ को देखने से यह बात स्पष्ट होती है कि प्रेमचंद यह भली प्रकार समझते थे कि असंगठित किसान शोषित बने रहने के लिए अभिशप्त है क्योंकि वह शोषक शक्तियों का प्रतिरोध करने में असमर्थ रहता है. प्रेमचंद ने अपने ढंग से उन शक्तियों का विरोध और प्रतिरोध करने का साहस दिखाया. जैसा कि डॉ. गोपाल राय मानते हैं, देसी राजाओं, ताल्लुकेदारों, महाजनों, पूँजीपतियों, सरकारी अमलों, अंग्रेज भक्त बुद्धिजीवियों, अंग्रेजी शिक्षा पद्धति, अंग्रेजी न्यायपालिका आदि का विरोध अंततः औपनिवेशिक शासन का ही विरोध था. इसमें संदेह नहीं कि उस समय यह औपनिवेशिक शासन ही समस्त प्रकार के शोषण में लिप्त था. इसके प्रतिवाद के रूप में जहाँ ‘रंगभूमि’ में सूरदास, सोफिया और विनय जैसे पात्र सामने आते हैं वहीं ‘गोदान’ में एक ओर तो होरी और धनिया अपने अपने पारंपरिक विश्वासों के साथ इस शोषक व्यवस्था के समक्ष खड़े होने का प्रयास करते हैं तथा दूसरी ओर लेखक गोबर और झुनिया, मातादीन और सिलिया तथा मेहता और मालती के माध्यम से सामाजिक, सांस्कृतिक और वैचारिक परिवर्तन का मार्ग भी सुझाता है. एक भारतीय साहित्यकार के रूप में प्रेमचंद की भारतीय जनता, भारतीय किसान और वस्तुतः भारत की मुक्ति के प्रति प्रतिबद्धता अंतर्धारा के रूप में उनके साहित्य में प्रवाहित दिखाई देती है. वे इस बात से चिंतित और दुखी है कि किसानी सभ्यता मर रही है और महाजनी सभ्यता उभर रही है. उनकी चिंता और वेदना का कारण यह है कि इस सभ्यता संघर्ष में सत्य, न्याय, मर्यादा आदि मूल्य मिट रहे हैं और असत्य, अन्याय तथा अमर्यादित आचरण को गौरवान्वित किया जा रहा है. यह संकट प्रेमचंद के समय का ही संकट नहीं था बल्कि हमारे समय का भी संकट है और यही वह केंद्रबिंदु है जो प्रेमचंद को आज भी प्रासंगिक और वर्तमान बनाए हुए है.

बुधवार, 14 सितंबर 2016

बदलती चुनौतियाँ और हिंदी की आवश्यकता

दैनिक भास्कर, नागपुर : 14 सितंबर, 20 16 : पृष्ठ 15 

सितंबर माह आते ही हिंदी पर्व की गहमागहमी शुरू हो जाती है। हिंदी पढ़ने-पढ़ाने की वकालत करने वालों से लोग लगभग बेशर्मी के साथ, नहीं तो शरारत के साथ, ये प्रश्न पूछने लगते हैं कि आज की बदलती दुनिया में आम आदमी हिंदी क्यों पढ़े? पढ़े तो कैसे पढ़े? और हिंदी आगे बढ़े तो कैसे बढ़े? ये ऐसे शाश्वत प्रश्न हैं जो कम से कम सौ साल से तो इसी तरह पूछे जा रहे हैं। लेकिन इनके उत्तर सदा एक से नहीं रहते। दुनिया बदलती है तो हमारे चारों ओर का वातावरण बदलता है, चुनौतियाँ बदलती हैं और परिणामस्वरूप उनका सामना करने की तकनीकें भी बदलती हैं। इसमें संदेह नहीं कि इन चुनौतियों के कई उत्तर भी गढ़े-गढ़ाए और शाश्वत हैं। जैसे कि, हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा है इसलिए सीखनी ही चाहिए अथवा कि हिंदी भारत संघ की राजभाषा है इसलिए उसका व्यवहार हमारा संवैधानिक कर्तव्य है। लेकिन इस सच्चाई से भी मुँह नहीं मोड़ा जा सकता कि हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में कोई संविधानदत्त स्वीकृति और शक्ति प्राप्त नहीं हैं तथा राजभाषा के रूप में भी अंग्रेजी उसे नीचे गिराकर छाती पर चढ़ी बैठी है। अस्तु... 

इस तथ्य को नकारा नहीं जा सकता कि तमाम परिवर्तन और विकास के बावजूद वर्तमान समय में भी शिक्षा की दृष्टि से भारत की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। अब भी हमारे देश की बहुत बड़ी जनसंख्या अशिक्षित या अल्पशिक्षित है। यह अशिक्षित या अल्पशिक्षित जन मुख्य रूप से शहरों से दूर, ग्रामीण क्षेत्रों में निवास करता है तथा प्रायः खेतीबाड़ी, छोटा-मोटा कारोबार, मजदूरी या कुटीर उद्योग से अपनी आजीविका कमाता है। इन लोगों और इनके व्यवसायों की अपनी समस्याएँ हैं। प्रायः ये लोग उन्नति के अधुनातन साधनों से या तो परिचित नहीं है या उन तक इनकी पहुँच नहीं है। परिवर्तन और विकास की धारा में यह व्यापक जन समूह तभी शामिल हो सकता है, जब इसे खेतीबाड़ी की नई पद्धतियों की जानकारी हो, नई फसलों और नए बीजों की विशेषताओं और उपलब्धता का अता-पता हो, अपनी फसल के विक्रय के लिए बाजार और उससे जुड़ी ऊँच-नीच का ज्ञान हो, अपने उत्पादों का दाम तय करने के अधिकार का अहसास हो, सरकारी योजनाओं और स्वयंसेवी संगठनों से प्राप्त हो सकने वाली सहयाता विषयक पूरे तंत्र की समझ हो। कृषि, मजदूरी, रोजगार, लघु कुटीर और मध्यम उद्योग धंधों से संबंधित सभी पक्षों का ज्ञान और आवश्यक प्रशिक्षण जब तक इस अनपढ़ अथवा कम पढ़े लिखे साधारण जन तक नहीं पहुँचेगा, तब तक विकास को इस देश की जमीनी सच्चाई नहीं बनाया जा सकता। इसमें कोई दो राय नहीं कि ये समस्त सूचनाएँ और प्रशिक्षण साधारण जन को उसकी अपनी अपनी भाषा में ही दिए जाने चाहिए। कम-से-कम अंग्रेजी भाषा में तो ऐसा करना इस देश में न तो संभव है और न ही उचित। 

लगभग सौ वर्ष पहले 1918 में जब महात्मा गांधी ने हिंदी को भारतीय स्वाधीनता संग्राम की राष्ट्रभाषा के रूप में प्रस्तावित और स्वीकृत किया था, तब का भी और अब का भी यही सच है कि जिस व्यापक जन गण को हमें संबोधित करना है या जिस तक तमाम तरह की प्रगति की सूचनाओं को ले जाना है या जिसे विकास की धारा में जोड़ने के लिए प्रशिक्षित किया जाना है, उसकी अधिकांश संख्या किसी न किसी बोली के रूप में हिंदी का व्यवहार करती है या अपनी मातृभाषा के साथ-साथ हिंदी का भी कार्यसाधक ज्ञान रखती है। अतः इस तमाम जनसंख्या को स्वतंत्रता के बाद के भारत की उन्नति में भागीदार बनाने के लिए हिंदी पढ़ना-पढ़ाना जरूरी है। अभिप्राय यह है कि हिंदी पढ़कर यह साधारण जन विभिन्न सूचनाओं को प्राप्त कर सकेगा, समझ सकेगा और उनका अपने तथा देश के लिए उपयोग कर सकेगा। साथ ही, अपने अधिकारों को भी वाणी प्रदान कर सकेगा जो किसी भी लोकतंत्र के लिए बुनियादी जरूरत है। 

दैनिक हिंदी मिलाप, 14 सितंबर '16 : पृष्ठ 9 
अब आप कहेंगे कि, देश के जिन हलकों में हिंदी का संप्रेषण घनत्व अपेक्षाकृत कम है, वहाँ क्या किया जाए? तो इस बारे में मेरा स्पष्ट मत है कि ये समस्त सूचनाएँ और प्रशिक्षण उन्हें उनकी अपनी भाषा में ही मिलने चाहिए। लेकिन प्रशिक्षकों को अंग्रेजी की तुलना में हिंदी के माध्यम से इस ज्ञान को अर्जित करना अधिक वांछनीय है। अर्थात केरल के किसी मछुआरे तक कोई सूचना मलयालम या उसकी बोली में ही पहुँचनी चाहिए, लेकिन इस सूचना की स्रोत भाषा इक्कीसवीं शताब्दी के भारत में अंग्रेजी नहीं, बल्कि हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाएँ ही होनी चाहिए। मेरा दृढ़ मत है कि भारत के सामाजिक, आर्थिक और तकनीकी विकास और तत्संबंधी ज्ञान को जनसाधारण तक पहुँचाने का काम अंग्रेजी नहीं कर सकती, क्योंकि आज भी ज्ञान के साहित्य को ग्रहण करने योग्य अंग्रेजी जाने वालों की संख्या बेहद-बेहद कम है। अतः हिंदी और भारतीय भाषाओं का वह कभी भी विकल्प नहीं बन सकती। 

हिंदी पढ़ने-पढ़ाने की जरूरत का गहरा रिश्ता इस बात से भी है कि भारत की संस्कृति, धर्म और इतिहास की परंपराएँ अत्यंत प्रामाणिकता के साथ इस भाषा में सुरक्षित और उपलब्ध हैं। दरअसल, अपनी सांस्कृतिक जड़ों तक पहुँचने का माध्यम या साधन किसी राष्ट्र के लिए उसकी अपनी भाषा को ही होना चाहिए। आज इस सच्चाई को नकारा नहीं जा सकता कि हिंदी भारत की पहचान बन चुकी है। अन्य भाषाभाषी भी भारतीय नागरिक के रूप में अपनी पहचान हिंदी के माध्यम से रेखांकित करना गौरव का विषय समझते हैं। विभिन्न भारतीय भाषाओं के बीच हिंदी ऐसी माध्यमिक भाषा के रूप में स्थापित हो चुकी है जिसमें आने पर किसी भी अन्य भारतीय भाषा का ज्ञान अथवा साहित्य अधिक व्यापक जनसमूह तक पहुँचने की संभावनाओं से सम्वृद्ध हो उठता है। यही कारण है कि आज तमिल और तेलुगु से लेकर असमी और मणिपुरी तक के लेखक यह कामना करते हैं कि उनकी कृतियों का अनुवाद हिंदी में उपलब्ध हो। आवश्यकता इस बात की है कि भारत की संपूर्ण सांस्कृतिक पहचान को ग्रहण करने के लिए तमिलनाडु से मणिपुर तक के सारे साहित्य और ज्ञान-विज्ञान को हिंदी में उपलब्ध कराया जाए। यहाँ मैं अपने अनुभव से यह भी जोड़ना चाहूँगा कि इस दिशा में बहुत सारा काम हो चुका है। यह संभव है कि भारत के बारे में हिंदी में उपलब्ध सूचनाएँ और विश्लेषण मात्रा की दृष्टि से अंग्रेजी में उपलब्ध जानकारी की तुलना में कम हो, लेकिन प्रामाणिकता की दृष्टि से वह अधिक सटीक और अधुनातन है। यदि आप अरुणाचल प्रदेश की जनजातियों और उनकी सांस्कृतिक परंपराओं के बारे में जानना चाहें तो पाएँगे कि अंग्रेजी में उपलब्ध अधिकतर सामग्री अब पुरानी हो चुकी है और उसकी दृष्टि भी उपनिवेशवादी है। इसकी तुलना में हिंदी में अधिक प्रामाणिक, निष्पक्ष और अद्यतन सूचनाएँ उपलब्ध हैं। यही बात अन्य क्षेत्रों और समुदायों के बारे में भी सच हो सकती है। इसलिए यदि इस विशाल राष्ट्र की बहुविध परंपराओं की तह तक पहुँचना है, तो वह भी हिंदी और भारतीय भाषाओं के माध्यम से ही संभव है। 

अब रहा सवाल यह कि, हिंदी बढ़ेगी कैसे? तो इसके जवाब में मेरा कहना है कि बदली हुई परिस्थितियों के परिप्रेक्ष्य में हिंदी को ‘राष्ट्रभाषा’ और ‘राजभाषा’ जैसी नारेबाजी से दूर रखकर, ‘भाषा’ के रूप में प्रचारित-प्रसारित किए जाने की जरूरत है – जिसे मनुष्य सूचनाओं के आदान-प्रदान, जिज्ञासाओं की शांति, आत्मा की अभिव्यक्ति और संप्रेषण की सिद्धि के निमित्त सीखा करते हैं। भावुकता और बाध्यता दोनों ही अतियाँ हैं। भाषा मनुष्य की सहज आवश्यकता के रूप में सीखी जाती है। हम इस सहज आवश्यकता का अनुभव करें-कराएँ, तो हिंदी भी सहजता से पढ़ी-पढ़ाई, सीखी-सिखाई जा सकती है। विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों से लेकर स्वैच्छिक हिंदी प्रचार संस्थाओं तक को चाहिए कि वे अपने घिसेपिटे रवैये को बदलें और हिंदी को अधुनातन ज्ञान की व्यावहारिक भाषा के रूप में प्रचारित-प्रसारित करें। इसके लिए उन्हें अन्य भारतीय भाषाओं को साथ लेकर चलना पड़ेगा। भारत जैसे बहुभाषी समाज में यह बहुत जरूरी है कि हिंदी और अन्य सभी भारतीय भाषाएँ साथ-साथ एक-दूसरे को समृद्ध  करते हुए अपनी संपन्नता बढ़ाएँ। 

यह भी जरूरी है कि हिंदीतर क्षेत्रों में अब तक हिंदी में जो कुछ काम हुआ है, उसका मूल्यांकन किया जाए और उसकी सार्थकता, प्रामाणिकता तथा आवश्यकता की पहचान करते हुए उसे अखिल भारतीय स्तर पर प्रतिष्ठा प्रदान की जाए। आज जो खुली अर्थ व्यवस्था और भूमंडलीकृत बाजार हमें उपलब्ध है वह एक दोधारी तलवार की तरह है, जिसके द्वारा हम अपनी भाषाओं का विस्तार भी कर सकते हैं और, अगर जागरूक न रहें तो, अपनी भाषाओं को उपेक्षित होते और मरते भी देख सकते हैं। 

अंत में एक बात और। हिंदी की ‘पठनीयता’ और ‘पाठक संख्या’ दोनों को बढ़ाने की जरूरत है। यह अत्यंत चिंताजनक दृश्य है कि हिंदी विभागों से जुड़े हुए हमारे विद्वान प्रायः अपनी साहित्य की दुनिया के कुएँ के ही मेंढक बने रहते हैं। उन्हें साहित्येतर विषय भी पढ़ने चाहिए और पंडित महावीर प्रसाद द्विवेदी की भाँति विज्ञान, राजनीति, कला, अर्थशास्त्र अर्थात समस्त ज्ञान क्षेत्रों का अध्ययन करते हुए अपने आपको अद्यतन रखना चाहिए और सरल, सहज, सुबोध हिंदी में इस तमाम ज्ञान को साधारण पाठक के लिए सुलभ बनाना चाहिए। पठनीयता बढ़ेगी तो पाठक स्वयं ही बढ़ेंगे। 

- ऋषभदेव शर्मा

शुक्रवार, 9 सितंबर 2016

विश्वशांति और हिंदी


ॐ द्यौ: शान्तिरन्तरिक्षँ शान्ति:, 
पृथिवी शान्तिराप: शान्तिरोषधय: शान्ति:। 
वनस्पतय: शान्तिर्विश्वे देवा: शान्तिर्ब्रह्म शान्ति:, 
सर्वँ शान्ति:, शान्तिरेव शान्ति:, सा मा शान्तिरेधि॥ 
ॐ शान्ति: शान्ति: शान्ति:॥


भारतीय मनीषा ने ऋग्वेद के समय से ही यह समझ लिया था कि मनुष्य के निरापद अस्तित्व के लिए संपूर्ण ब्रह्मांड का सहयोग अपेक्षित होता है. यही कारण है कि उसने पृथ्वी और आकाश सहित संपूर्ण ब्रह्मांड की शांति की कामना की थी. दैहिक, दैविक और भौतिक स्वास्थ्य के लिए संपूर्ण जगत का शांति को प्राप्त होना आवश्यक है. भारतीयों ने मोक्ष की कल्पना शांति और आनंद के लोक के रूप में की और समस्त जड़-चेतन सृष्टि के लिए शांति की कामना की तो इसके पीछे निश्चय ही यह धारणा रही होगी कि शांति किसी एकाकी व्यक्ति अथवा एकाकी समुदाय का विषय नहीं है. अर्थात शांति को अकेले प्राप्त नहीं किया जा सकता, बल्कि सबकी शांति में ही अपनी शांति है. यदि जगत का परिवेश, जगत का जीवन, जगत का मानस अशांति, विक्षोभ और परस्पर संघर्ष से परिपूर्ण हो, तो व्यक्ति की शांति कैसे संभव है? इसलिए शांति की भारतीय संकल्पना अपने मूल में ही विश्वशांति की संकल्पना है. 

भारतीय ऋषियों ने हमें संपूर्ण विश्व को एक नीड़ समझने का अथवा ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ का जो उदात्त दर्शन दिया था, कहना न होगा कि उसी के कारण भारतीय लोक की प्रकृति समभाव और सह-अस्तित्व की रही तथा भारतीय सभ्यता और संस्कृति ने अपना विकास और विस्तार करने के लिए कभी किसी अन्य सभ्यता या संस्कृति पर आक्रमण नहीं किया. उसने तो ‘परस्पर अविरोध’ को धर्म का लक्षण माना तथा सत्य, प्रेम और अहिंसा जैसे वैश्विक मूल्यों को सभ्यता के उषाकाल से ही अपने चित्त और व्यवहार में अपनाया. इसके विपरीत आधुनिक कहे जाने वाले पश्चिमी समाज ने अधिक से अधिक अभी कुछ पचास वर्ष पहले ही खुद को ‘पृथ्वी ग्रह के नागरिक’ के रूप में देखना शुरू किया है – दो विश्वयुद्धों और परमाणु बमों की विभीषिका देखने के बाद. अन्यथा इसके पहले राष्ट्रीय नागरिकताएँ सर्वोपरि थीं और राष्ट्रीय समुदाय की रक्षा करना ही सबसे बड़ा मूल्य था. यही कारण है कि बहुत से इतिहासवेत्ता यह कहते नहीं अघाते कि भारत में तो राष्ट्रीय चेतना थी ही नहीं, वह तो भला हो पश्चिमी देशों का कि वे खुदाई फौजदार बनकर हमारे यहाँ राष्ट्रीयता का पाठ पढ़ाने आ गए! वस्तुतः भारतीय और पश्चिमी दृष्टिकोण में यही मूलभूत अंतर है – भारत विश्वनागरिकता और विश्वमानवता के गुणसूत्र लेकर निर्मित हुआ राष्ट्र है जबकि पश्चिमी राष्ट्रवाद अधिकारलिप्सा से उत्पन्न प्रभुता की हदबंदी से संबंधित विचारधारा है. यह संकीर्ण राष्ट्रवाद असुरक्षा की भावना से ग्रस्त रहता है, मनुष्यों को मनुष्यों से भयभीत रखता है और युद्धों का प्रणयन करता है. संकीर्ण राष्ट्रवाद ही आज के समय में विश्वव्यापी आतंकवाद और अशांति का हेतु है. राष्ट्रीयता की सकारात्मक संकल्पना में एक-दूसरे की स्वतंत्रता, संप्रभुता और राष्ट्रीयता का अतिक्रमण करने की प्रवृत्ति के लिए कोई स्थान नहीं होना चाहिए. यदि धर्मों की परस्पर अविरोधी अवधारणा का विस्तार किया जाए तो यह कहा जा सकता है कि कोई भी शांतिप्रिय राष्ट्र किसी दूसरे राष्ट्र का विरोधी नहीं हो सकता. अर्थात अलग-अलग राष्ट्रों के राष्ट्रहित परस्पर अविरोधी होने चाहिए. यदि ऐसा हो तो शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व की संकल्पना साकार हो सकती है. 

जब से आधुनिक दुनिया ने इस अविरोधी राष्ट्रीयता को समझना शुरू किया है तब से भिन्न-भिन्न देशों के बीच परस्पर सहयोग की प्रवृत्ति में वृद्धि हुई है. और यह प्रवृत्ति अब भी विकसित हो रही है. परस्पर भयमुक्त वातावरण में व्यापार, व्यवसाय, लेन-देन से लेकर तकनीक और ज्ञान तक की साझेदारी तभी तो संभव है जब विभिन्न देश परस्पर लोकतांत्रिक मूल्यों के सम्मान के सिद्धांत से जुड़े हुए हों. अभिप्राय यह है कि विश्वशांति के लिए विश्व के विभिन्न देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की आवश्यकता है. तानाशाही व्यवस्था चाहे वह प्रत्यक्ष रूप में हो अथवा प्रच्छन्न, दूसरों के अधिकारों को हड़पने की प्रवृत्ति को जन्म देती है. इसलिए तानाशाही व्यवस्था कभी भी विश्वशांति की पोषक नहीं हो सकती. इसके विपरीत लोकतांत्रिक व्यवस्थाएँ इस सिद्धांत पर टिकी होती हैं कि उन्हें किसी अन्य का अधिकार नहीं हड़पना है. अतः यदि उनके बीच यह पारस्परिक विश्वास कायम हो जाए कि विश्व समुदाय के हम सब सदस्य देश एक-दूसरे के हितों को नुकसान नहीं पहुँचाएँगे और छोटे-बड़े का भेद किए बिना सबकी संप्रभुता को समान सम्मान देंगे तो विश्वशांति स्वतः ही स्थापित हो जाएगी. इससे विश्व समुदाय में विभिन्न देशों की परस्पर निर्भरता भी पुष्ट होगी. 

लेकिन, विश्वशांति की यह संपूर्ण व्यवस्था आज एक आदर्श अवधारणा मात्र है. जैसा कि यूनेस्को की ‘इंटरनेशनल लिंगुवापैक्स कमेटी’ के अध्यक्ष फेलिक्स मार्टी ने ध्यान दिलाया है, पिछली शताब्दी में विश्व ने जो वैज्ञानिक और तकनीकी प्रगति की है उसका एक बहुत बड़ा हिस्सा युद्ध उद्योग (वार इंडस्ट्री) को समर्पित है. यह बात दीगर है कि युद्धोन्माद की खेती करने वाली शक्तियों के फलने-फूलने के बावजूद विश्व के अधिकतर राष्ट्र लोकतंत्र और शांति की राह पर अग्रसर हैं. राष्ट्र-राज्य (नेशन स्टेट) की संकल्पना अब पुरानी पड़ती जा रही है क्योंकि अलग-अलग दिशाओं में विश्व के अनेक राष्ट्र अपने-अपने समूह बनाकर वैश्विक अर्थ व्यवस्था, वाणिज्य-व्यापार, कूटनीति और सभ्यता व संस्कृति की नई परिभाषाएँ गढ़ रहे हैं. राष्ट्र-राज्य की सीमाओं के परे अंतरराष्ट्रीय सहयोग के उदाहरण के रूप में संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न प्रयासों का उल्लेख किया जा सकता है. जैसे, पर्यावरण और विकास सम्मलेन (1992), मानवाधिकार सम्मेलन (1993), जनसंख्या और विकास सम्मलेन (1994), स्त्री विषयक सम्मलेन (1995), आवास विषयक सम्मेलन (1996), जैवविविधता सम्मलेन (2012). इन सब प्रयासों से यह तथ्य उभकर सामने आया है कि आज का विश्वनागरिक अराजकता और हिंसा में नहीं तर्क और एकजुटता में विश्वास रखता है. और शांति की संस्कृति लोकतंत्र से गहरे जुड़ी हुई है. इस लोकतंत्र का विस्तार मनुष्यों के राज्य ही नहीं ईश्वर के राज्य तक करना होगा, तभी विश्वशांति स्थापित हो सकेगी. अर्थात प्रकृति और मनुष्य के संबंधों को आज पुनः परिभाषित करने की आवश्यकता है, बढ़ती हुई पर्यावरण चेतना इसी दिशा में संकेत करती है. पश्चिमी संस्कृति और भारतीय संस्कृति में जिस मूलभूत अंतर की बात आरंभ में की गई थी उसी का विस्तार करते हुए यह कहा जा सकता है कि ये दोनों संस्कृतियाँ क्रमशः भोग और त्याग की संस्कृतियाँ हैं. यही कारण है कि पश्चिम ने प्रकृति को संसाधन माना और मनुष्य को उसका स्वामी. इसके विपरीत भारत ने प्रकृति को माँ माना और मनुष्य को उसकी संतान. अतः पश्चिमी संस्कृति ने दोहन और शोषण को अपनाया तथा प्रकृति को कंगाल बना दिया. इस प्रकार एक तरफ युद्धों तथा दूसरी तरफ प्रकृति के साथ खिलवाड़ ने मनुष्य जीवन में शांति-दारिद्रय अथवा अशांति के बाहुल्य को जन्म दिया. 

प्रगति के रथ को तो पीछे ले जाना संभव नहीं है – उचित भी नहीं. लेकिन मनुष्य-मनुष्य तथा मनुष्य-प्रकृति के संबंधों को सुधारना बेहद जरूरी है. अन्यथा भूमंडल तेजी से ध्वंस की दिशा में बढ़ता चला जाएगा. हमें आज ऐसे दर्शन की आवश्यकता है जो मानव प्रजातियों और प्रकृति के बीच सकारात्मक संबंध की स्थापना कर सके. सभ्यताओं के संघर्ष की बात करने वाले पश्चिमी जगत को विनम्रता का पाठ सीखना होगा और उन सभ्यताओं का सम्मान करना सीखना होगा जिन्होंने प्रकृति के साथ अपने प्रेमपूर्ण संबंध को आज भी खोया नहीं है. इसलिए विश्वशांति की दिशा में अंतरराष्ट्रीय राजनैतिक संस्थाएँ बनाते जाने से कुछ नहीं होगा, जरूरत है भूमंडल के भविष्य को सुरक्षित करने वाले नैतिक मूल्यों पर ईमानदारी से सहमत होने और उन्हें अपनाने की. यदि ऐसा नहीं किया गया तो अंधराष्ट्रवादी शक्तियों और हथियार उत्पादक देशों की मिलीभगत से दुनिया भर में आतंकवाद और युद्धोन्माद फैलता ही रहेगा. इन युद्धोन्मादी शक्तियों को यूनेस्को के इस विचार से सहमत होना ही होगा कि विश्व की समस्त संस्कृतियाँ और भाषाएँ समान रूप से समर्थ और कल्याणकारी हैं. किसी भी देश की संस्कृति और भाषा तुच्छ नहीं है – चाहे वह देश कितना ही छोटा क्यों न हो. 

लोगों, समुदायों, बौद्धिकताओं, नैतिकताओं और सौंदर्यदृष्टियों की विविधता में ही विश्व की सुंदरता है. विविधता है तो सौंदर्य है. हमारी तमाम भाषाएँ इस विविधता को अपने-अपने ढंग से अभिव्यक्त करती हैं. शब्दबद्ध करती हैं. इन विविधताओं की स्वीकृति और समझ से ही सहिष्णुता का विकास होता है. सहिष्णुता एक-दूसरे को ‘बर्दाश्त’ करने का नाम नहीं है बल्कि एक-दूसरे के ‘साथ होना-जीना’ सहिष्णुता का आधार है. और यही विश्वशांति का मूलमंत्र भी है. 1995 में यूनेस्को ने सहिष्णुता के घोषणापत्र (डिक्लेरेशन ऑफ टोलरेंस) की प्रथम पंक्ति में यह स्वीकार किया है कि हमारी दुनिया में विद्यमान सांस्कृतिक विविधता का सम्मान करने, उसे स्वीकार करने और उसकी प्रशंसा करने की प्रवृत्ति में ही सहिष्णुता निहित है. (टॉलरेंस कांसिस्ट्स इन रेस्पेक्टिंग, एक्सेप्टिंग एंड एप्प्रिशिएटिंग द रिच डाईवर्सिटी ऑफ कल्चर्स इन अवर वर्ल्ड.). इस प्रवृत्ति का सीधा संबंध विविध संस्कृतियों के परस्पर संवाद से है और संवाद निर्भर है भाषा पर. अतः विविध भाषाओँ की भिन्नता के बावजूद उनके साथ जुड़े हुए सामाजिक-सांस्कृतिक समान तत्वों की पहचान करना आवश्यक है ताकि आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी के शब्दों में यह चरितार्थ किया जा सके कि नर लोक से किन्नर लोक तक एक ही रागात्मक हृदय व्याप्त है. 

भाषा वैविध्य इस जगत के अन्य तमाम वैविध्यों की तरह ही एक अपरिहार्य यथार्थ है. इसलिए यह कामना करना कि पूरी दुनिया में केवल एक ही भाषा रहे अप्राकृतिक, अवैज्ञानिक और अव्यावहारिक होगा. लेकिन इस आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता कि वैश्वीकरण (ग्लोबलाइजेशन) और स्थानिक अस्मिताओं के उभार (एफरमेशन ऑफ कम्यूनिटी आइडेंटिटीज) जैसी परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाली प्रक्रियाओं के इस दौर में बाजार, तकनीक, ज्ञान-विज्ञान, राजनैतिक व कूटनैतिक रिश्तों तथा बेहतर सांस्कृतिक समझ और समन्वय के लिए विविध भाषा-भाषी मानव समुदायों के बीच परस्पर संवाद कायम हो सके. यहीं विश्वभाषा की अवधारणा सामने आती है.

“विश्व के दृश्य फलक पर हम अंग्रेजी, फ्रेंच, स्पेनिश, पुर्तगाली आदि भाषाओं को भी विश्वभाषा के रूप में व्यवहृत पाते हैं. पर विश्वभाषा बनने की इनकी प्रक्रिया विश्वभाषा हिंदी से भिन्न है. ये भाषाएँ साम्राज्यवाद की उस नींव के आधार पर फैलीं जो प्रभुता और शक्ति की रक्तरंजित प्रवृत्ति से सींची गई थीं. इसके विपरीत विश्वभाषा हिंदी का आधार रहा है उसके प्रति श्रमजीवियों की श्रद्धा और आत्मीयता. और जैसा कि मारीशस के हिंदी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष श्री जयनारायण राम का कहना है – हिंदी उपनिषद, रामायण, गीता की बेटी बनकर आई. यह उनके धर्म एवं संस्कृति का अंग बनकर अभी भी जीवित है.” (डॉ. रवींद्रनाथ श्रीवास्तव (1996), भाषाई अस्मिता और हिंदी, नई दिल्ली : वाणी प्रकाशन, पृ. सं. 57). विश्वभाषा के रूप में अपनी इसी विशेषता के कारण हिंदी विश्वशांति में एक बड़ी भूमिका निभा सकती है. 

दरअसल, विश्वयुद्ध को लगातार टालते जाने की विभिन्न देशों की बुद्धिमत्ता के बावजूद विश्वशांति के लिए सबसे बड़ा ख़तरा तरह-तरह के अंतरराष्ट्रीय संघर्षों या टकरावों से बना हुआ है. इन टकरावों का कारण संघर्ष में जुटे राष्ट्रों के अपने राष्ट्रीय हितों के टकराव में तो निहित है ही, एक-दूसरे की स्थितियों को समझ न पाने के कारण भी है. यह नासमझी कई बार एक-दूसरे के बारे में कम परिचय से पैदा होती है तो कई बार गलत परिचय से. परस्पर अपरिचय, अल्पपरिचय अथवा मिथ्यापरिचय से मिथ्याधारणाएँ उत्पन्न होती हैं. मिथ्याधारणाएँ परस्पर अविश्वास को जन्म देती हैं. परस्पर अविश्वास से भय उपजता है और भय से असुरक्षा भाव. इस शृंखला की परिणति आक्रामकता को जन्म देती है. आक्रामकता युद्ध में बदल जाती है. अतः परस्पर परिचय के अभाव आदि की समस्या को हल किए बिना युद्धों को टालना और विश्वशांति कायम करना संभव हो ही नहीं सकता. ऐसे अवसर पर भाषा की भूमिका सामने आती है. भाषा के द्वारा ही विभिन्न राष्ट्रों के बीच आपसी समझदारी बढ़ाई जा सकती है, गलत सूचनाओं और मिथ्याधारणाओं को निर्मूल किया जा सकता है और एक-दूसरे की इच्छाओं, आकांक्षाओं तथा सीमाओं का सही परिचय विकसित किया जा सकता है. विश्व में सबसे अधिक जनसंख्या द्वारा समझी जाने वाली पहली या दूसरी भाषा के रूप में हिंदी विश्व समुदाय के विभिन्न राष्ट्रों के बीच आपसी समझ पैदा करने वाला संवाद कायम करने और उसे विकसित करने का काम कर सकती है. विश्वभाषा के रूप में यह हिंदी की बड़ी उपलब्धि होगी कि वह एक-दूसरे से डरे हुए देशों के बीच आपसी समझ पैदा करके विश्वशांति की राह को सुगम बना दे. 

विश्वशांति के मार्ग में आर्थिक और राजनैतिक साम्राज्यवादी ताकतों की स्वार्थी रणनीति बड़ी बाधा उत्पन्न करती है. आर्थिक क्षेत्र में अपना प्रभुत्व कायम करने और राजनैतिक दृष्टि से अन्य राष्ट्रों को अपना पिछलग्गू बनाए रखने के दोहरे उद्देश्य की पूर्ति के लिए साम्राज्यवादी ताकतें युद्धों और कूटनैतिक संघर्षों को जन्म देती हैं. अपने स्वार्थ के लिए लोकतंत्र की दुहाई देकर ये ताकतें अन्य राष्ट्रों की संप्रभुता तक पर डाका डालने में नहीं हिचकतीं. इस प्रकार इनके साम्राज्यवादी स्वार्थ विश्वशांति के लिए ख़तरा बने रहते हैं. हमारा विचार है कि इस समस्या को हल करने में भी भाषाएँ कारगर औजार की तरह कम कर सकती हैं. विश्वभाषा के अपने दावे के साथ हिंदी व्यापक विश्व-बाजार की भाषा बनकर उन देशों के पारस्परिक व्यापारिक, राजनैतिक और कूटनैतिक संबंधों की भाषा बन सकती है जिन पर साम्राज्यवादी ताकतों ने अपना शिकंजा कस रखा है. इस प्रकार उन राष्ट्रों के परस्पर सहयोग और लोकतांत्रिक सह-अस्तित्व द्वारा हिंदी उनकी आवाज को विश्वमंच पर उठाकर विश्वशांति के रास्ते की बाधाओं से उन्हें बचा सकती है. 

इस तथ्य से यद्यपि इनकार नहीं किया जा सकता कि लंबे समय तक उपनिवेश रह चुके देश भारत की भाषा होने के कारण विश्वपटल पर हिंदी को वैश्विक भाषा के रूप में प्रतिष्ठित होने के लिए अभी बहुत संघर्ष करना पड़ सकता है तथापि यह भी सच है कि संयुक्त राष्ट्र में विविध अवसरों पर हमारे राष्ट्राध्यक्ष, प्रधानमंत्री या अन्य प्रतिनिधियों द्वारा हिंदी का प्रयोग किए जाने से हिंदी का मान बढ़ा है, उसकी प्रतिष्ठा में सुनिश्चित वृद्धि हुई है. यद्यपि भारत का संविधान हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित नहीं करता परंतु भारत का इतिहास इसे जन-मन में भारत-भारती के रूप में प्रतिष्ठित कर चुका है. ऐसी स्थिति में भारत के प्रतिनिधियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे अंतरराष्ट्रीय संवाद के अवसरों पर हिंदी का व्यवहार करें ताकि दुनिया से यह भ्रम मिट सके कि भाषाओं का म्यूजियम होने के बावजूद भारत एक राष्ट्रभाषा विहीन गूँगा राष्ट्र है. संयुक्त राष्ट्र में हिंदी की जगह बनने का अर्थ है भारत का कूटनैतिक प्रभाव बढ़ना और साथ ही दुनिया की दूसरी ताकतों के साथ रिश्तों में बदलाव आना. इसका लाभ उठाते हुए हिंदी विश्व समुदाय को सीधे-सीधे संबोधित करके विश्वशांति के भारतीय दर्शन की ओर आकर्षित कर सकती है. 

विश्वशांति का रास्ता बहुत बड़ा रास्ता है. जैसा कि पहले कहा गया है, मानव सभ्यता के विकास में विभिन्न राष्ट्रों और उनकी संस्कृतियों ने जो प्रयास किए हैं वे चाहे ज्ञान-विज्ञान और तकनीक से संबंधित हों, चाहे सौंदर्यदृष्टि और मूल्यबोध के विकास से जुड़े हों, चाहे भौतिक उपलब्धियों के हेतु हों अथवा आध्यात्मिक अनुभूतियों के आधार हों; सबके बीच परस्पर समझ और आदान-प्रदान आवश्यक है. यह कार्य संप्रेषण के बिना संपन्न नहीं हो सकता. संप्रेषण से यहाँ हमारा अभिप्राय वार्तालाप से आगे बढ़कर शिक्षा, इतिहास और संस्कृति की अपनी-अपनी जानकारी का आदान-प्रदान करने से है. जो एक का है, इस आदान-प्रदान के द्वारा ही वह सबका हो सकता है, साझा हो सकता है. विश्वशांति के लिए समझदारी से अगला चरण है साझेदारी. इसी से संप्रेषण पूरा होगा. इस क्षेत्र में हिंदी की महती भूमिका संभावित है. हिंदी की शिक्षा जहाँ हिंदीभाषी अपनी मातृभाषा के रूप में ग्रहण करते हैं, अन्य भारतीय भाषाभाषी देश में अबाध संचरण और व्यवसाय की दृष्टि से ग्रहण करते हैं वहीं प्रायः यह देखा गया है कि विदेशी छात्र हिंदी की शिक्षा भारत की परंपराओं, धर्म, संस्कृति, इतिहास और राजनीति के मर्म को आत्मसात करने के लिए ग्रहण करते हैं. विदेशी छात्रों को भारतीय परंपरा और भारतीय सोच की शिक्षा देने के लिए हिंदी सर्वोत्तम विकल्प है. इस उद्देश्य से अनेक विदेशी छात्र हर वर्ष भारत आते हैं और अनेक हिंदी अध्यापक दुनिया के अलग-अलग देशों में जाते हैं. हिंदी के ऐसे छात्र और अध्यापक एक-दूसरे के इतिहास और संस्कृति में रुचि दर्शाते हैं और विश्व की प्राचीनतम संस्कृति के रूप में भारत का परिचय लेते-देते हैं. भारत विषयक जिज्ञासा ही ऐसे शैक्षणिक कार्यक्रमों का केंद्रबिंदु है. हिंदी से रोजगार पाना ऐसे जिज्ञासुओं का मुख्य उद्देश्य नहीं होता. इस प्रकार की शैक्षणिक योजनाओं में हमें दुनिया के अधिक से अधिक देशों को शामिल करना होगा. भारत के इतिहास और दर्शन को अगर विश्व के अधिकाधिक देशों के छात्र पढ़ेंगे तो उनकी भारत के संबंध में तो समझ बढ़ेगी ही, पारस्परिक समझ भी बढ़ेगी. और इसमें कोई दो राय नहीं कि पारस्परिक समझ बढ़ने से ही हम विश्वशांति की ओर बढ़ते हैं. परस्पर समझ हमें विविधताओं के बावजूद परस्पर समीप लाएगी और इस समझ पर आधारित परस्पर समीपता से जो संबंध बनेंगे वे विश्वशांति की नींव को सुदृढ़ कर सकते हैं. अभिप्राय यह है कि हिंदी जैसी व्यापक परिप्रेक्ष्य वाली भाषा के माध्यम से विश्वशांति की पुष्टि कोई वायवीय कल्पना नहीं है, बल्कि ठोस संभावना है. इस संभावना का आधार यूनेस्को की भाषिक नीति के अंतर्गत स्वीकृत यह मान्यता है कि भाषा शिक्षक वस्तुतः शांति के प्रशिक्षक होते हैं. यदि हमें युद्ध की संस्कृति के स्थान पर शांति की संस्कृति को लाना है तो सबसे पहले विभिन्न राष्ट्रों और भाषाओं के नागरिकों की मानसिकता में परिवर्तन लाना होगा ताकि वे यह कह सकें कि ‘मैं उन लोगों को समझ सकता हूँ जो मेरे जैसे नहीं हैं.’ दूसरे स्तर पर अभिवृत्ति में बदलाव लाना होगा ताकि वे कह सकें कि ‘मैं उन लोगों का भी मित्र और सहचर हो सकता हूँ जो मुझसे भिन्न मानव समुदाय से आते हैं.’ यह कार्य भाषा अध्यापक के माध्यम से ही संभव है. यदि यह कार्य न किया जाए तो भाषा मनुष्यों को बाँटने और तोड़ने का अत्यंत घातक हथियार बन जाती है जिसका आधार हठवाद और अज्ञान है. सब प्रकार के भाषिक हठवाद और अज्ञान से मुक्त करके हिंदी अपने छात्र को विश्वनागरिक बनने का संस्कार दे सकती है. 

यह बात भी ध्यान रखने जैसी है कि विश्वशांति ऐसी कोई वस्तु नहीं है कि सारे देश दौड़ लगाकर उस तक पहुँच जाएँ. विश्व में शांति तो तब होगी जब विश्व के अलग-अलग तमाम क्षेत्रों में शांति होगी. अर्थात क्षेत्रीय शांति ही विश्वशांति का पुख्ता आधार है. हिंदी को विश्वशांति का वाहक बनने से पहले क्षेत्रीय शांति के वाहक के रूप में अपनी योग्यता सिद्ध करनी है. अर्थात आज आवश्यकता इस बात की है कि पहले तो संपूर्ण भारत में क्षेत्रीय पूर्वाग्रहों और निहित स्वार्थों की राजनीति को ध्वस्त करते हुए हिंदी एकात्मता, सह-अस्तित्व, सामाजिक न्याय और लोकतंत्र की भाषा के रूप में प्रतिष्ठित हो; इसके बाद दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों के बीच सहयोग और शांति की स्थापना करे. यदि ऐसा हो पाता है तो इसी मॉडल का विस्तार आगे हो सकता है – पहले एशिया की शांति और फिर विश्वशांति की ओर. 

हिंदी की एक साहित्यिक भूमिका भी है. इसके सहारे भी हम विश्वशांति की ओर बढ़ सकते हैं. हिंदी में वासियों और प्रवासियों द्वारा बड़ी मात्रा में साहित्य सृजन हो रहा है. इसके अलावा बड़ी बात यह है कि हिंदी में पूरी दुनिया से साहित्य अनुवाद के माध्यम से आ रहा है जो हिंदी के पाठक की विश्व और वैश्विक साहित्य की समझ का विस्तार करता है. लेकिन अभी हिंदी से दुनिया के अन्य देशों और उनकी भाषाओं में कम चीजें जा रही हैं. अन्य देशों में हिंदी के पाठक और अनुवादक अपेक्षाकृत कम हैं. यदि यह आवाजाही बढ़ाई जा सके और प्राचीन तथा आधुनिक भारतीय साहित्य को अन्य देशों और उनकी भाषाओं में पहुँचाया जा सके तो इसका दूरगामी प्रभाव यह होगा कि भारतीय साहित्य में निहित सत्य, प्रेम, अहिंसा, करुणा और शांति जैसे मूल्यों के प्रति उन देशों में जिज्ञासा और समझ बढ़ेगी. साथ ही इन उदात्त मानवीय मूल्यों की ग्रहणशीलता भी बढ़ेगी. इस तरह हिंदी का यह साहित्य अपने मौलिक और अनूदित दोनों ही रूपों में विश्व बिरादरी को जोड़ने की भूमिका अदा कर सकता है. कहना न होगा कि इसी माध्यम से बुद्ध, महावीर और गांधी जैसे शांतिदूतों का संदेश पहले भी दुनिया में गया है, आज भी जा रहा है और भविष्य में भी जाता रहेगा. 

अंत में, एक और छोटी-सी बात जो बहुत बड़ी भी हो सकती है यह है कि यदि हिंदी के माध्यम से विश्व की विभिन्न भाषाओं, संस्कृतियों, उपलब्धियों और साहित्यिक कृतियों का तुलनात्मक अध्ययन करने की दिशा में कुछ ठोस प्रयास किए जाएँ तो यह भाषा विश्व के विभिन्न मानव समुदायों और उनकी विश्वदृष्टि को समझने का सुदृढ़ बौद्धिक आधार प्रदान कर सकती है. यह समझ ही विश्वमानव को विश्वशांति की ओर ले जाएगी. 

- ऋषभदेव शर्मा 

बुधवार, 6 जुलाई 2016

भूमिका : मलयालम कवि सेबास्टियन की कविताएँ

अदृश्य तंबुओं की खोज में (सेबास्टियन की चुनिंदा कविताएँ)

भूमिका

अग्रणी समकालीन मलयालम कवि सेबास्टियन व्यापक सरोकारों और गहरे सौंदर्यबोध के कवि हैं. उनकी कविताओं से गुजरने पर मलयालम कविता का उत्तरआधुनिक चेहरा सहज ही उभरकर सामने आ जाता है. वस्तु विन्यास से लेकर अभिव्यंजना शिल्प तक एक खास तरह की विरलता उन्हें दूसरों से अलग व्यक्तित्व प्रदान करती है. 

एक ऐसे समय में जब आदमी के हाथ से आदमीयत छूटी जा रही है और जीवन मूल्य मुट्ठी में बंद रेत की तरह रिसते जा रहे हैं, सेबास्टियन आम आदमी की ‘सफरिंग’ का पाठ रचते हैं. एक ऐसे समय में जब सब ओर से हमला करता हुआ बाजार भावनाओं के संसार को निगलने में व्यस्त है, सेबास्टियन की कविताएँ राहत देती हैं क्योंकि वे खाँटी संवेदनाओं को शब्दबद्ध करती हैं. आज जब हम एक ऐसे ठंडे संसार में जीने को विवश हैं जिसमें बड़ी से बड़ी दुर्घटनाएँ भी सनसनीखेज समाचार से अधिक महत्व नहीं रखतीं – जिनका श्रोता समाज न तो विचलित होता है, न बौखलाता है, न गुस्साता है; ऐसे वक्त में सेबास्टियन का कवि-मन छोटी-छोटी चीजों से द्रवित हो जाता है, साधारण दीखने वाली घटनाओं से विचलित हो उठता है और दैनिक जीवन की जड़ताओं से असंतुष्ट होकर, असहमत होकर, कभी व्यंग्य करता है तो कभी अपनी समानांतर दुनिया खड़ी करता है – फैंटसी की दुनिया. इस कवि के लिए काव्य सृजन कुएँ की तह में डुबकी लगाकर अभिव्यक्ति की तलाश करने जैसा है – ‘आकाश में/ एक कुंआ प्रकट हुआ/ धरती से इसका पानी/ नीला नजर आया/ बाल्टी और रस्सी के/ नीचे उतरने पर/ गरारी ने आवाज की/ आश्चर्य की बात है/ मैंने रस्सी को पकड़/ जल्दबाजी में खींचा/ कुएँ की तह में पड़ी/ कविता बाहर निकली...’ 

यदि यह कहा जाए कि सेबास्टियन का काव्य संसार दैनिक सामान्य जीवन से उठाए गए बिंबों का संसार है, तो अनुचित न होगा. वे एक ऐसे काव्यशिल्पी हैं जिन्हें ‘परिचित’ चीजों के नए संयोजन द्वारा ‘अद्भुत’ की सृष्टि करने में महारत हासिल है. इस कविता संग्रह की शीर्षक पंक्ति ‘अदृश्य तंबुओं की खोज में’ जिस कविता से ली गई है वह भी इस तथ्य को प्रमाणित करती है. ‘भूख’ शीर्षक यह कविता सीधे-सीधे भूख को संबोधित है – ‘भूख!/ तेरा घर व पता/ मुझे नहीं मालूम.’ और इस न-मालूम होने का कारण है आख्याता की वह संपन्नता जिसके कारण वह दिन में तीन-तीन बार खाकर अघा चुका है. ऐसा व्यक्ति भूख और उसकी यातना से भला कैसे परिचित हो सकता है! लेकिन सूखे और अभाव के दिनों में जब उसका साक्षात्कार मृत्यु की ओर अग्रसर उन गरीबों से होता है जो किन्हीं अदृश्य तंबुओं की खोज में निकले हुए हैं तो उसके स्मृतिकोश से गरीबी और भूख के वे अनुभव सहसा बाहर आकर साधारणीकृत होते हैं जिन्हें भोगते हुए कभी साधनहीनता के बीच उसके दादा की मृत्यु हुई थी. इस प्रकार यह कविता ध्वनित करती है कि संपन्नता शाश्वत नहीं है, उसके पीछे भी विपन्नता का इतिहास है. यदि यह इतिहास याद रहे तो भूख से परिचय बना रह सकता है. इस प्रकार अपरिचय से आरंभ हुई कविता परिचय के साथ समाप्त होती है. लकड़ी के ढेर में दीमक-खाया दिवंगत दादा का चित्र इस परिचय का माध्यम बनता है – ‘वहाँ मैंने अनजाने में/ तेरा घर व पता/ पा लिया.’

इसी प्रकार - घिसी हुई चप्पल सीता हुआ मोची, शवपेटिका में लिटाई जाती हुई माँ को पहली बार जूता पहनाते हुए रिश्तेदार, केरल का नीली नसों वाला मानचित्र देखता हुआ बेटा, हथेली में खेती करने वाला किसान, खेत में गूँजती हुई सारस और मेंढक की आवाजें, रेल यात्रा में तीव्र गति से परिवर्तित होता हुआ बाहर का परिदृश्य, सूने घर की दीवार पर टंगा किसान का फटा हुआ चित्र, चट्टान पर बैठ पानी पीता एक छोटा मेंढक, चारों ओर से पानी की दीवारों के बंदीगृह में कैद व्यक्ति, वेश बदलकर साँप बनता हुआ प्रेमी, एक दूसरे को ढूँढ़ते हुए घर और गृहस्वामी, रास्ते में पाँव रखते ही बनते हुए गड्ढे और हर गड्ढे से बाहर निकलती काली बिल्ली, बाण की नोक से सिली जाती हुई फटी धरती, सीमेंट की बेंच पर बैठे हुए स्त्री और पुरुष, जाल में फँसी नदी को सुखाता मछुआरा, धूप में लाल झंडे सी बहती नदी, खिड़की के काँच पर दस्तक देता बारिश का मौसम, प्रतीक्षा में क्रमशः पेड़ में तब्दील होता हुआ व्यक्ति, रात भर गीले मैले कपड़े से थोडा-थोडा कर अंधेरे को पोंछता हुआ मनुष्य, सात भागों में फैली हुई इंद्रधनुष की स्याही, गले में अटका शब्द का काँटा और उससे घायल होता हुआ गला – ये सेबास्टियन की इन कविताओं में निर्मित कुछ बिंब हैं. इन्हें एक नजर देख लेने भर से कवि के विस्तृत अनुभव जगत और उतने ही विराट कल्पना संसार के वैभव का सहज ही अनुमान किया जा सकता है. 

यहाँ यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि सेबास्टियन की कविताओं में यथार्थ का पर्याप्त आग्रह दिखाई देता है. इस आग्रह के कारण ही उनकी प्रेम कविताएँ भी पर्याप्त ठोस प्रतीत होती हैं. कुछ स्थलों पर रहस्य और अध्यात्म के संस्पर्श के साथ सेबास्टियन की प्रेम कविताएँ यथार्थमूलक फैंटेसी के रूप में मूर्त होती हैं. कवि जब प्रेमिका की दिगंबर देह का शब्दचित्र बनाने को उद्यत होता है तो चिड़िया, हवा, मेघ, नारियल का पेड़ और बारिश मिलकर अंगडाई ले रहे स्वयं उसके शरीर पर प्रेमिका के शरीर के सौंदर्य और गंध को लिख डालते हैं. (शरीर पर लेखन). कवि को विश्वास है कि नदी की खामोशी, लहरों के रुदन और धूप की प्रतीक्षा में सुबह की बेला में प्रेम जागेगा. (निर्मलता). यह ठीक है कि प्यार के दिनों की किताबें दीमक ने चाट ली हैं, फिर भी कभी न कभी तो दीमक ‘मैं’ नामक पुस्तक को पढ़ेगी. (आठ प्रेम कविताएँ). यह प्रेम कविता को एक ऐसी पारदर्शी कमीज बना देता है जिसके पार से सच्चाई झलकती है – ‘कविता भी एक कमीज है/ पारदर्शी/ हर कोई इसे पहन नहीं सकता/ कुलीन पहनेंगे तो/ इनकी नग्नता दिखायी देगी.’ (आठ प्रेम कविताएँ). 

सेबास्टियन की कविता में केरल केवल समुद्र, मछली और बारिश के ही रूप में नहीं आया है बल्कि आज के आदमी की इस विवशता के रूप में भी आया है कि – ‘सागर की रेलगाड़ी गुजर रही है/ मेरे पास काँटा नहीं है/ इसलिए मैंने खुद को उसमें लटका कर/ खिड़की से बाहर फेंका जोर से...’ (मत्स्यन). ‘ग्लोबल’ के दबाव में लुप्त होते ‘लोकल’ के प्रति कवि विशेष रूप से चिंतित हैं – ‘सब कुछ हटा दिया/ लेकिन चिमनियाँ बाकी हैं/ *** / हर दिन तीन बार काली चिमनियों में घुसकर/ दीवारों पर जीभ से चाटकर/ सारे गुणों का अनुभव करें/ कोई भी राज्य पेटेंट के लिए न आए/ स्थानीय लोग व रिश्तेदार इसमें शामिल न हो.’ (चिकित्सार्थ). अभिप्राय यह है कि बाजारीकरण के इस दौर में केरल की अपनी स्थानीय रंगत लुप्त होने के कगार पर है. प्रकृति और संस्कृति दोनों पर ही मंडराते हुए खतरे से आगाह करता हुआ कवि कहता है – ‘आंगन में/ कोई नहीं है/ फूलों के पेड़ नहीं है/ न कुंआ है/ न भरा हुआ/ पानी का घड़ा/ न/ नन्हों का पदचिह्न/ न लोरी/ दृष्टि के उस पार/ कुछ भी नहीं है/ आंगन में साफ़ जमीन है/ जिसमें से सब कुछ/ अलग कर दिया गया...’ (आंगन). 

कवि सेबास्टियन की इन समर्थ और सुंदर कविताओं से हिंदी जगत को परिचित कराने का श्रेय इनके अनुवादक डॉ. संतोष अलेक्स को जाता है. डॉ. संतोष अलेक्स की मातृभाषा मलयालम है और उन्हें हिंदी, अंग्रेजी और तेलुगु पर भी इतना अधिकार प्राप्त है कि वे निरंतर इन सब भाषाओं में मौलिक सृजन और अनुवादकर्म करते आ रहे हैं. मैं उनके द्वारा अनूदित इन मलयालम कविताओं के प्रकाशन पर उन्हें और मूल कवि सेबास्टियन को हार्दिक बधाई देता हूँ. 

4 जुलाई, 2016                                                                                                         - ऋषभदेव शर्मा

बुधवार, 15 जून 2016

संपादकीय : 'वृद्धावस्था विमर्श' (चंद्रमौलेश्वर प्रसाद) : नहि नहि रक्षति डुकृञ करणे

नहि नहि रक्षति डुकृञ करणे

अस्तित्ववादी दार्शनिक सिमोन द बुआ (9 जनवरी, 1908 -14 अप्रैल, 1986) को स्त्री-विमर्शकार के रूप में विशेष ख्याति प्राप्त है। उन्होंने उपन्यास, निबंध, जीवनी, आत्मकथा और व्यक्तिचित्र आदि विधाओं में दार्शनिक, राजनैतिक और सामाजिक विमर्शमूलक प्रभूत लेखन किया। 1949 में प्रकाशित ‘द सेकंड सेक्स’ (स्त्री : उपेक्षिता) ने उन्हें वैश्विक स्त्री मुक्ति आंदोलन का पुरोधा बना दिया। इस कृति के प्रभामंडल ने उनके शेष कृतित्व को मानो अंतर्धान कर रखा है। अन्यथा 1970 में प्रकाशित उनकी शोधपूर्ण कृति ‘ला विएलेस्से’ (फ्रेंच) भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। ‘ला विएलेस्से’ का अंग्रेजी अनुवाद ‘ओल्ड एज’ 1977 में आया। यह कृति वस्तुतः सिमोन की भविष्योन्मुखी विश्वदृष्टि का प्रमाण है और ‘वृद्धावस्था विमर्श’ की गीता है। इसके प्रकाशित होते ही दार्शनिक और सामाजिक हलकों में ‘वृद्धावस्था’ पर सर्वथा नई दृष्टि से बहस छिड़ गई। यह भी कहा जाता है कि सिमोन द बुआ के लेखन में आयु और लिंग विषयक विमर्श परस्पर संबंधित हैं। अथवा ‘सेकंड सेक्स’ और ‘ओल्ड एज’ ऊपर से भिन्न प्रतीत होते हुए भी मूलतः सिमोन के अस्तित्ववादी चिंतन के दो परस्पर गुंथे हुए आयाम हैं जिनका संबंध क्रमशः ‘स्त्री’ और ‘वृद्ध’ को परिवार और समाज की प्राथमिक नागरिकता से वंचित रखने के षड्यंत्र के प्रत्याख्यान से है जबकि ये दोनों ही समाज के अस्तित्व की धुरी हैं। इन दोनों कृतियों के माध्यम से सिमोन ने क्रमशः स्त्री और वृद्ध से जुड़े मिथों की शल्य परीक्षा की है क्योंकि इन मिथों के कारण ही आज भी बड़ी सीमा तक स्त्री और वृद्ध सामाजिक पराएपन के शिकार हैं।
सिमोन ने विश्व भर के विभिन्न समाजों में वृद्धावस्था से संबंधित रूढ़ियों और वृद्धों की दशा तथा उनके प्रति व्यवहार का अलग-अलग दृष्टियों से अध्ययन किया। उन्होंने यह भी देखा कि इन ‘वरिष्ठ नागरिकों’ की शारीरिक और मानसिक क्षमताओं तथा इच्छाओँ, आकांक्षाओं और सपनों की दशा और दिशा क्या होती है। दरअसल वरिष्ठ नागरिकों अथवा वृद्धों के संबंध में समाज का चरित्र व्यापक स्तर पर दोगलेपन का शिकार रहा है। एक ओर तो नित्य उनका आशीर्वाद लेने की बात की जाती है तथा दूसरी ओर उन्हें बोझ समझा जाता है। समाज, साहित्य और संस्कृति में सदा उपस्थित रहने के बावजूद वृद्धों की अवस्थिति केंद्र की अपेक्षा परिधि पर ही अधिक रही है। बुढ़ापा आने का अर्थ ही है व्यक्ति का केंद्र से उखड़कर परिधि की ओर जाने के लिए विवश होना। केंद्र से अपदस्थ होते ही व्यक्ति समाज की उपेक्षा का पात्र बन जाता है और यदि उसका सही ‘पुनर्वास’ न हो तो उसे अपना अस्तित्व ही अभिशाप लगने लगता है। इस प्रकार परिधि पर धकेले गए एक समुदाय के रूप में वृद्ध समुदाय दुनिया का बहुत बड़ा उपेक्षित जन समुदाय है जिसकी जनसंख्या में 20वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में तीव्रता से वृद्धि हुई है और 21वीं शताब्दी में और भी वृद्धि सुनिश्चित है क्योंकि इधर जन्म दर और मृत्यु दर दोनों ही घट रही हैं तथा चिकित्सा विज्ञान ने आदमी की औसत आयु बढ़ा दी है। वृद्धावस्था विमर्श इस उपेक्षित समुदाय की दृष्टि से - अथवा वृद्धावस्था को केंद्र में रखते हुए – समाज, साहित्य और संस्कृति की नई व्याख्या करने वाला विमर्श है। वृद्ध होने पर वानप्रस्थ और संन्यास की व्यवस्था की पुनर्व्याख्या की आज बड़ी जरूरत है ताकि वरिष्ठ नागरिकों के समुदाय को अपना अस्तित्व अनुपयोगी और अभिशाप प्रतीत न हो। वृद्धावस्था विमर्श वस्तुतः सामाजिक संबंधों को इन बदली हुई परिस्थितियों में नए ढंग से समझने की जरूरत पर बल देता है। शारीरिक अशक्यता, मानसिक समस्याएँ, परनिर्भरता, मूल्य परिवर्तन, आर्थिक संकोच, जीवनसाथी की मृत्यु, निराश्रित होने की आशंका, भविष्य की अनिश्चितता, संबंधों की निरर्थकता का बोध, राग-विराग का द्वंद्व, पराएपन और अलगाव की स्थिति, बचपन और युवावस्था की यादों से जुड़ा अतीत प्रेम, काम और क्रोध जैसी वृत्तियों का उदात्तीकरण न कर पाने से जुड़ी समस्याएँ और आध्यात्मिक विभ्रम जैसे अनेक पक्ष वृद्धावस्था विमर्श के विचारणीय बिंदु हैं।
दरअसल सिमोन द बुआ की अंतश्चेतना में कहीं-न-कहीं वृद्धावस्था और मृत्यु से जुड़े हुए प्रश्न बराबर उपस्थित थे। यही कारण है कि वे अपने सृजन और चिंतन दोनों में अस्तित्व की नश्वरता पर विचार करती दिखाई देती हैं। 1946 में आए अपने उपन्यास ‘ऑल मेन आर मोर्टल’ में उन्होंने फोस्का नामक अपने कथानायक की अमर होने की इच्छा के माध्यम से मनुष्य की नश्वरता और मरणशीलता की अनिवार्यता पर अस्तित्ववादी नजरिए से विचार किया। इसके बाद 1964 में ‘ए वेरी ईजी डेथ’ में उन्होंने मरने की प्रक्रिया का खुलासा तो जोर देकर किया ही, अपनी माँ की मृत्यु का भी चित्रण किया। ‘ओल्ड एज’ (1970) में तो यह विषय उठाया ही गया है – वृद्धावस्था मृत्यु की तैयारी का समय है! यही नहीं 1981 में अपने संस्मरण लिखते हुए भी उन्होंने ज्याँ पाल सार्त्र के अंतिम दस वर्षों का जो यथार्थ अंकन किया है उसमें उनकी बीमारी, दैहिक क्षरण और वृद्धावस्था का वर्णन शामिल है। अभिप्राय यह है कि सिमोन ने वृद्धावस्था पर केवल सैद्धांतिक चिंतन नहीं किया बल्कि अनुभूति के गहन धरातल पर उन्होंने उसे लंबे समय तक जिया भी। किसी को भले ही अविश्वसनीय और विस्मयकारी लगे मगर यह सच है कि मात्र 36 वर्ष की आयु में युवती सिमोन द बुआ ने अपने आपको वृद्ध होते महसूसना शुरू कर दिया था। इतना ही नहीं इस संवेनशील विदुषी ने 13 वर्ष की आयु से ही यह महसूस करना शुरू कर दिया था कि ‘समय गुजर रहा है’। काल की सापेक्षता में आयु का गुजरना महसूस करने के कारण ही वे अस्तित्व विषयक दर्शन की ओर मुड़ीं। बुढ़ापा शारीरिक है या मानसिक अथवा दोनों – मनोदैहिक? यह प्रश्न अपनी जगह है। लेकिन यह सच है कि मृत्यु और बुढ़ापे का साक्षात्कार मनुष्य को किसी भी आयु में नचिकेता, विदेह और तथागत बनाने के लिए पर्याप्त है। उसी ने सिमोन को सिमोन बनाया।
हमारे यहाँ यों तो वृद्धावस्था से जुड़े प्रश्नों पर विचार की पुरानी परंपरा रही है लेकिन इस अवस्था से जुड़ी समस्या का जो रूप आज हमारे सामने है वह पहले कभी ऐसा न था। भारत में जरा-चिकित्सा (जेरियाट्रिक्स) के अध्ययन का इतिहास अभी आरंभिक अवस्था में है। अध्येता वार्धक्य और आयु संबंधी समस्याओं के पहलुओं को आधुनिक, उत्तरआधुनिक, स्त्रीवादी, राजनैतिक और आर्थिक दृष्टियों से समझने-समझाने की कोशिश कर रहे हैं। आज हमारी चिंता का विषय विशाल वृद्ध जन समुदाय के जीवन को सुखमय बनाने से संबंधित है – चाहे वे पुरुष हों या स्त्री। यही कारण है कि वृद्धावस्था से जुड़े सेवामुक्ति से लेकर वृद्धाश्रम तक के, अथवा देह से लेकर आयु तक के क्षीण होने के, मुद्दे चिंतन और सृजन के विविध मंचों पर छाए हुए हैं। यदि यह कहा जाए कि आज का मनुष्य बुढ़ापे और मौत से कुछ ज्यादा ही आतंकित है तो भी शायद गलत न होगा।
सिमोन द बुआ कृत ‘ओल्ड एज’ को पहली बार देखने-पढ़ने का मौक़ा मुझे 2010 में मिला और मैं दीवानों की तरह अपने सब दोस्तों से इस किताब का जिक्र करने लगा। मेरे अभिभावकतुल्य वरिष्ठ मित्र श्री चंद्रमौलेश्वर प्रसाद (7 अप्रैल, 1942 - 13 सितंबर, 2012) ने मेरी यह दीवानगी देखी तो ‘ओल्ड एज’ उठा ले गए। उन दिनों वे ब्लॉग लेखन की दुनिया में बहुत सक्रिय थे। मुझसे चर्चा करने के बाद उन्होंने अपने ब्लॉग ‘कलम’ (cmpershad.blogspot.in) पर उस पुस्तक का सार-संक्षेप लिखना आरंभ किया। इस सार-संक्षेप की पहली किस्त 18 अगस्त, 2010 को तथा अंतिम (दसवीं) किस्त 30 दिसंबर, 2010 को प्रकाशित हुई। ‘कलम’ ब्लॉग के पाठकों ने इसे बहुत पसंद किया; सराहा। अभी हम लोग इसे पुस्तकाकार प्रकाशित करने की योजना बना ही रहे थे कि काल ने अकाल ही चंद्रमौलेश्वर जी को हमसे छीन लिया!
इस पुस्तक को कई वर्ष पूर्व प्रकाशित हो जाना था, पर यह अब आ पा रही है। इसके लिए मेरा प्रमाद ही उत्तरदायी है। अब भी यदि श्री अमन कुमार त्यागी (परिलेख प्रकाशन) और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा ने न जगाया होता, तो मैं तो सोता ही रहता।
सिमोन की तो हम नहीं जानते, लेकिन चंद्रमौलेश्वर प्रसाद आत्मा की अमरता में विश्वास रखते थे। यह पुस्तक – उनकी अपनी पुस्तक – श्रद्धांजलि के रूप में उन्हें समर्पित है।
1 जनवरी, 2016                                                           
                                              -  ऋषभदेव शर्मा