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बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

श्रद्धांजलि : विजयराघव रेड्डी नहीं रहे

डॉ. विजयराघव रेड्डी इज नो मोर।’ प्रो.एन. गोपि का फोन था। अविश्वास नहीं किया जा सकता था। श्रीनिवासपुरम (रामांतपुर, हैदराबाद) में एक ही गली में आमने सामने हैं दोनों के घर। पर मन न माना। डॉ.रामनिवास साहू का फोन मिलाया। केंद्रीय हिंदी संस्थान परिवार के नाते। उन्होंने दुखी सी आवाज में कन्‍फर्म किया। मंगलवार, 8 फरवरी, 2011 को रात के बारह बजे डॉ.विजयराघव रेड्डी ने अंतिम सांस ली। कुछ समय पूर्व बीमार जरूर थे, पर इन दिनों तो ठीक ही थे। अस्थमा और प्रोस्टेट की व्यथा काफी अरसे से थी। पर अचानक ऐसा हो जाएगा - लगता न था। सोचा डॉ.शकुंतला रेड्डी जी को फोन करूँ। पर कर न सका। ऐसे मौकों पर मैं बड़ा असहाय सा हो जाता हूँ - असहज सा भी। दूर पास के दोस्तों को फोन कर करके जैसे स्वयं को हल्का करने की कोशिश करता रहा। 

अभी कुछ ही दिन पहले तो हमने उन्हें उच्च शिक्षा और शोध संस्थान में बुलाया था। वे हर वर्ष हमारे व्यतिरेकी भाषाविज्ञान के विद्यार्थियों को संबोधित करने आया करते थे। मैं खुद उस कक्षा में बैठा। लगभग दो घंटे तक वे पढ़ाते रहे थे। बोर्ड पर कभी कोई तालिका बनाते, कभी कोई आरेख खींचते। बीच बीच में छात्रॊं से तेलुगु में भी बतियाते। मैंने हिंदी और तेलुगु के व्यतिरेक संबंधी कई जिज्ञासाएँ रखीं। उन्होंने उदाहरण देकर सबका समाधान किया। वे बहुत जोर से नहीं बोलते थे, पर उनकी क्लास सुनकर यह लगा कि प्रभावी अध्यापन के लिए गलेबाजी की अपेक्षा विषय की गहरी समझ चाहिए होती है। और वह उनके पास थी। आज जब डॉ.विजयराघव रेड्डी की लहीम शहीम पर सुदृढ़ काया पंचतत्व में विलीन हो गई है तो पता नहीं उनके छात्रों को कैसा लग रहा होगा। लेकिन मुझे जरूर ऐसा लग रहा है कि भाषाविज्ञान का एक सुलझा हुआ अध्यापक हमारे बीच से चला गया। 

डॉ.विजयराघव रेड्डी का जन्म 25 जून, 1938 को आंध्र प्रदेश की राजम्‌पेट तहसील के कोंड्‍लोपल्ली गाँव में हुआ था। वे सही अर्थों में सेल्फ मेड मैन थे। 1959 में वे केंद्रीय हिंदी संस्थान, आगरा में शैक्षिक सहायक के रूप में नियुक्‍त हुए थे। अपने श्रम और प्रतिभा के बल पर उच्च शिक्षा प्राप्‍त करते हुए आगे चलकर उन्होंने इस संस्थान के विभिन्न केंद्रों में अध्यापन किया और हैदराबाद केंद्र के क्षेत्रीय निदेशक के रूप में यथासमय अवकाश ग्रहण किया। बाद में दो वर्ष उन्होंने आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के अध्यक्ष के रूप में भी भाषा और साहित्य की सेवा की। उनके न रहने का अर्थ यह भी है कि तुलनात्मक साहित्य, भारतीय साहित्य और अनूदित साहित्य के परिप्रेक्ष्य में हिंदी साहित्य का पुनर्पाठ करनेवाला एक गहन अध्येता नहीं रहा। 

डॉ.विजयराघव रेड्डी का कार्यक्षेत्र लगभग पूरा भारत रहा। आगरा तो केंद्र था ही, हैदराबाद में लंबे समय तक रहकर उन्होंने भाषा शिक्षण-प्रशिक्षण के साथ साथ भारतीय भाषाओं के सौहार्द का वातावरण भी अपने सुचिंतित  व्याख्यानों, अनुवादों और शोध पत्रों द्वारा बनाया। पूरे भारत में उनके मित्र और प्रशंसक हैं - मद्रास में प्रो.दिलीप सिंह हों या असम में चित्र महंत अथवा इम्‍फाल में देवराज, सभी उनके यूँ अचानक चले जाने की खबर से धक्‌ से रह गए। किसी को संतोष था तो यही कि चलो अभी तीन दिन पहले फोन पर उनसे बात तो हो गई थी। जबकि किसी को मलाल था कि काफी अरसे से उनके खत का जवाब नहीं दिया गया था। दरअसल रेड्डी जी भाषाविद होकर भी रूखे सूखे विद्वान नहीं थे। वे सहृदय दोस्त थे। मौका मिलते ही कोई किस्सा - कहानी या चुटकुला सुना बैठते थे। खुलकर हँसते थे और कभी कभी तो ताली देने के लिए हथेली भी बढ़ा देते थे। मैं उन्हें हर प्रकार से वरिष्‍ठ जानकर संकोच और दूरी बरतता था पर वे हमेशा अपनी बाँह से मेरी पीठ घेर कर मुझे खींचकर छाती से लगा लेते थे। आज सोचता हूँ तो पाता हूँ कि सदा सबके मुँह पर खरी बात कह देने वाले और कभी कभी कठोर भी प्रतीत होनेवाले पोलि विजयराघव रेड्डी भीतर से बहुत आर्द्र थे। तभी तो उनके स्पर्श में इतनी ऊष्‍मा थी। निश्‍चय ही देश भर में फैले उनके दोस्तों को लग रहा होगा कि एक अंतरंग मित्र चला गया, यारों का यार चला गया।

डॉ.विजयराघव रेड्डी को कुछ वर्षों से हम लोग लौहपुरुष कहने लगे थे - जब से पूर्वोत्तर में एक खतरनाक सड़क हादसे को झेलकर वे फिर से पहले की तरह अपने सारस्वत कार्य क्षेत्र में आ डटे थे। ऐसी अदम्य जिजीविषा सबमें नहीं होती। इसी जिजीविषा के बल पर उन्होंने पूर्वोत्तर भारत को अपनी साहित्यिक आत्मा का हिस्सा बना लिया था। अगर मैं कहूँ कि पूर्वोत्तर भारत के हिंदी जगत की उनके न रहने से अपूरणीय क्षति हुई है, तो यह शत प्रतिशत सच होगा। उन्होंने वहाँ की भाषाओं और बोलियों के संबंध में जो जानकारियाँ संग्रहीत करके हिंदी जगत के सामने प्रस्तुत कीं, उन्हें कभी भुलाया नहीं जा सकता। खास तौर से बोडो जनजाति से संबंधित ऐसी जानकारियाँ इस भाषावैज्ञानिक ने खोजबीन कर प्रस्तुत कीं  जो इससे पहले हिंदी में नितांत अनुपलब्ध थीं। दरअसल उनके निधन से हमने हिंदी का एक ऐसा व्यावहारिक भाषाचिंतक खो दिया है जिसे भाषाविज्ञान की बारीकियों के साथ साथ इस देश की जमीनी सच्चाई की बारीकियाँ भी मालूम थीं।

पोलि विजयराघव रेड्डी नहीं रहे अर्थात एक भाषाचिंतक, एक अनुवादक, एक अध्यापक, एक अनुसंधाता और एक लेखक नहीं रहा। नहीं, इतना ही नहीं, वे नहीं रहे तो एक संस्कृति सेतु नहीं रहा, वे नहीं रहे तो एक स्वागतातुर मित्र नहीं रहा, वे नहीं रहे तो एक निश्‍छल हँसी नहीं रही।

जाओ, डॉ.पोलि विजयराघव रेड्डी, आप अपनी महायात्रा पर जाओ। आपके महाप्रयाण के अवसर पर हिंदी जगत आपकी सेवाओं का स्मरण करते हुए आपको अश्रुपूर्ण विदाई दे रहा है। ओम्‌ शम्।।

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