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शनिवार, 12 फ़रवरी 2011

जाना एक समर्पित हिंदी-चिंतक का


शख्सियत   

जाना एक समर्पित हिंदी-चिंतक का 

अपने चिंतन और कर्म से निरंतर कई दशकों तक हिंदी-भाषा-विज्ञान के विभिन्न हलकों को समृद्ध करने वाले वरिष्ठ हिंदीसेवी डॉ पोलि विजय राघव रेड्डी इस ८/९ फरवरी की मध्यरात्रि में नश्वर जगत से अक्षर जगत की ओर प्रस्थान कर गए. उनकी भौतिक देह आज हमारे बीच नहीं है, लेकिन उनकी यशःकाया उनकी अनेक मूल्यवान कृतियों के रूप में हमारे साथ है; रहेगी. वे लम्बे समय तक केन्द्रीय हिंदी संस्थान के विभिन्न केंद्रों में प्राध्यापक, रीडर और प्रोफ़ेसर प्रभारी / क्षेत्रीय निदेशक के रूप में कार्यरत रहे तथा   कुछ अवधि के लिए आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी के अध्यक्ष भी ; लेकिन एक शब्द-साधक के रूप में उन्होंने हिंदी की जो अविस्मरणीय सेवा की, वह इन उपलब्धियों की तुलना में कहीं बहुत बड़ी है. यही कारण है कि हमारे बीच से उनका चले जाना हिंदी और अन्य  भारतीय भाषाओँ के मध्य से एक सांस्कृतिक सेतु के लुप्त हो जाने सरीखा है. 

२५ जून १९३८ को कोंड्लोपल्ली  [राजमपेट तहसील, आंध्र प्रदेश] में पोलि वेंकट सुब्बा रेड्डी और कासिरेड्डी  चंगम्मा दम्पति के घर जन्मे पोलि विजय राघव रेड्डी की गिनती उन बहुत ही थोड़े से हिन्दीतरभाषी भाषावैज्ञानिकों में होती है जिन्होंने हिन्दी भाषा के उन पक्षों पर कार्य किया है जिनकी आज के संदर्भ में हिन्दी भाषा और आधुनिक हिन्दी भाषाविज्ञान को बड़ी ज़रूरत है. उन्होंने द्वितीय भाषा के रूप में हिंदी शिक्षण, राजभाषा हिंदी के प्रचलन एवं विस्तार तथा  हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओँ के व्यतिरेकी अध्ययन को अपने व्यापक और सतत लेखन द्वारा एक सुनिश्चित दिशा प्रदान की. स्मरणीय है कि रेड्डी जी मात्र २० वर्ष की आयु में हिंदी पंडित बनने के इरादे से प्रशिक्षण प्राप्त करने आगरा गए, तो ऐसे रमे कि २० साल तक वहीं रह गए. केन्द्रीय हिंदी संस्थान में उन्होंने इस दौर में अनेक उतार-चढ़ाव देखे. इसके बाद और  २० वर्ष उन्होंने हिंदीतरभाषी  क्षेत्रों  में हिन्दी सेवा करते गुज़ारे. ६० की  वय में अवकाश प्राप्त करने के बाद तो वे लेखन में और भी सक्रिय हो गए थे. यह कोई मुहावरा नहीं बल्कि यथार्थ है कि वे अपने अंतिम क्षणों तक हिंदी सेवा में रत थे - इन दिनों वे 'तेलंगाना जनांदोलन' पर हिंदी में एक प्रामाणिक पुस्तक तैयार करने में जुटे थे!

डॉ रेड्डी के भाषावैज्ञानिक लेखन की मूलभूत खासियत  यह है कि उन्होंने लिखते समय हमेशा हिंदी को इतर भाषाभाषियों को सिखाने के उद्देश्य को अपने सामने रखा. १९८६ में प्रकाशित उनकी किताब ''व्यतिरेकी विश्लेषण'' इस दृष्टि से आज भी अपनी तरह की इकलौती किताब है. कुछ लोगों को यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि तेलुगुभाषी इस विद्वान् ने स्कूली स्तर पर दो ही भाषाएँ पढी थीं - अंग्रेज़ी और संस्कृत. तेलुगु इतरविषयों  की माध्यम भाषा भर थी. संस्कृत कहानी और तेलुगु छंद लिखकर उसी जमाने में बालक विजय राघव ने सृजन के क्षेत्र में पहला कदम रखा. आगे चलकर आगरा पहुँचने पर  प्रो. ब्रजेश्वर वर्मा , बाल कृष्ण राव और रामकृष्ण नावडा जैसे गुरुओं ने उनकी रचनाधर्मिता को वह धार दी जिसने देशभर में अपना लोहा मनवाया. उन्होंने मौलिक ,अनूदित और सम्पादित लगभग ५० पुस्तकों के माध्यम से हिन्दी को समृद्ध किया और भारतीय भाषा और साहित्य की अविस्मरणीय  सेवा की.  उनके इस विपुल कार्य और  योगदान को मान्यता प्रदान करते हुए  विभिन्न संस्थाओं और सरकारों ने उन्हें समय-समय पर उपाधियों,पुरस्कारों और सम्मानों से नवाज़ कर हिन्दीजगत की ओर से कृतज्ञता ज्ञापित की.  २००६ में उन्होंने महामहिम राष्ट्रपति के हाथों गंगाशरण सिंह पुरस्कार प्राप्त किया जो उनकी हिन्दी सेवा की सार्वदेशिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है.

प्रो रेड्डी ने विपुल अनुवाद कार्य किया. इसे वे हिंदी साहित्य को भारतीय साहित्य का प्रतिनिधि बनाने का रास्ता मानते थे. उनके द्वारा अनूदित पहली कहानी  १९६२ में धर्मयुग में छपी थी; और उसके बाद उन्होंने  पीछे फिर कर नहीं देखा. वे मानते थे कि भारतीयता की भावना हमारी प्रत्येक भाषा के साहित्य में है. साहित्य  के अनुवाद के माध्यम से एक भाषाभाषी दूसरी भाषा के साहित्य को जान सकेगा, उससे निकटता स्थापित कर सकेगा. भावनात्मक एकता को सुदृढ़ करने के लिए वे सभी मित्रों को भी श्रेष्ठ कृतियों के अनुवाद की प्रेरणा देते थे.  उनका मानना था कि अनुवाद कार्य को भारतीय साहित्य की रूपरेखा को ध्यान में रखते हुए सुनियोजित ढंग से किए जाने की ज़रूरत है. उल्लेखनीय है कि उन्होंने तेलुगु कहानियों का जो योजनाबद्ध ढंग से अनुवाद प्रस्तुत किया है, वह अनूठा है. इसके साथ ही वे लोकसाहित्य के भी प्रबल पक्षधर थे तथा लोकभाषाओं और लोकसाहित्यों के संरक्षण के बारे में हमेशा सोचते रहते थे. यहाँ यह याद करना समीचीन होगा कि डॉ रेड्डी ने पूर्वोत्तर भारत की भाषाओँ , विशेषकर बोडो जनजाति की भाषाओँ, पर जो कार्य किया, वह महत्वपूर्ण तो है ही, हिंदी में अपनी किस्म का पायोनियर कार्य भी है. स्मरण रहे कि वे स्वयं अपनी जिस कृति को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानते थे ,उसका सम्बन्ध भी पूर्वोत्तर से है - 'संस्कृति संगम उत्तर पूर्वांचल'.

अभी डॉ. विजय राघव रेड्डी कई और किताबें दक्षिण भारत में हिंदी का अध्ययन, केंद्रीय हिंदी संस्थान, भारत का भाषिक यथार्थ  तथा उत्तर-पूर्वांचल का भाषा-साहित्य जैसे विषयों पर लिखना चाहते थे. लेकिन काल को यह स्वीकार नहीं था! शायद इन विषयों पर उनके नोट्स उनकी फाइलों में मिल जाएँ. उनकी अर्धांगिनी प्रो. शकुंतला रेड्डी भी प्रतिष्ठित भाषाविद हैं, वे भविष्य में प्रो विजय राघव रेड्डी के इन पुस्तकों के स्वप्न को साकार कर सकती हैं - ईश्वर उन्हें यह शक्ति दे!
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