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शुक्रवार, 25 फ़रवरी 2011

'धरती का विलाप':पर्यावरण विमर्श



भूमिका
डॉ. पी. विजय लक्ष्मी पंडित तेलुगु की प्रतिष्ठित समकालीन कवयित्री हैं. उन्हें अपने सामाजिक सरोकारों के लिए ख़ास तौर पर जाना जाता है. 'धरती का विलाप' उनकी चर्चित लंबी कविता है. जो मनुष्य को पृथ्वी की ओर से संबोधन के रूप में लिखी गई है. इस कविता की उपलब्धि आधुनिक मनुष्य को उसके द्वारा प्रकृति के अविवेकपूर्ण दोहन के दुष्परिणामों के सम्बन्ध में चेतावनी देने में निहित है. इसके लिए कवयित्री ने पौराणिक ढंग की फैंटेसी की रचना की है. भारतीय यह मानते हैं कि जब पृथ्वी राक्षसों के अत्याचारों से त्रस्त हो जाती है तो वह गाय अथवा स्त्री का रूप धारण करके भगवान् विष्णु के समक्ष प्रार्थना करती है और तब भगवान् विष्णु अवतार धारण करके भू भार का हरण करते हैं. डॉ. विजय लक्ष्मी पंडित ने भी पृथ्वी का मानवीकरण किया है परन्तु उनकी पृथ्वी किसी भगवान् के समक्ष नहीं बल्कि अपनी संतान अर्थात मनुष्य के समक्ष उपस्थित होती है और उसके हाथों हुई अपनी दुर्दशा का बखान करती है. सही भी है यदि मनुष्य पृथ्वी और उसके परिवेश के साथ मनमाना आचरण करने से बाज़ नहीं आया तो वह दिन दूर नहीं जब मानव अस्तित्व को संभव बनाने वाले सभी तत्व इस हद तक विकृत हो जायेंगे कि प्रलय को घटित होने से नहीं रोका जा सकेगा. परन्तु इस कविता की ख़ास बात यह है कि पौराणिक फैंटेसी रचते हुए भी कवयित्री ने अवतार और प्रलय जैसे रूपकों का प्रयोग नहीं किया बल्कि पृथ्वी की पीड़ा को सीधे सीधे वैज्ञानिक तथ्यों की सहायता से उजागर करने का प्रयास किया है. इससे कविता थोड़ी सपाट ज़रूर हो गई है लेकिन उसका विचार पक्ष सदृढ़ भी हुआ है.

कवयित्री ने यह दर्शाया है कि रसवंती, गंधवती और रत्नगर्भा पृथ्वी अब इतनी जीर्ण शीर्ण और जर्जर हो गई है कि उसका शरीर कोटर के समान प्रतीत होता है. ऐसा उसके पुत्र मनुष्य की प्रकृति पर अधिकार पाने की अबाध आकांक्षा के कारण हुआ है जिसने नैसर्गिक सहअस्तित्व की उपेक्षा करके प्रकृति के सभी तत्वों का अंधाधुंध शोषण किया है. पृथ्वी मनुष्य को याद दिलाती है कि उसने तथाकथित प्रगति चक्र को तीव्रता से दौडाने के निमित्त प्रकृति चक्र को खंडित करते हुए वनस्पति और जीवधारियों का नाश करके पूरे वातावरण को विष वायु से भर डाला है. धरती के पर्यावरण के गरम होते जाने को कवयित्री ने मनुष्य द्वारा प्रकृतिमाता, पृथ्वीमाता,वृक्षमाता और नदीमाता के प्रति अवज्ञा का परिणाम माना है. उन्होंने लाभ और लोभ के लिए प्रकृति-चक्र का अतिक्रमण करने वाली मनुष्य जाति को कसाई की संज्ञा दी है. जिसके कुकृत्यों के कारण अन्नपूर्णा दरिद्र हो गयी है, तालाबों का जल वाष्प बन गया है, आकाश गर्म हवाओं से भर उठा है तथा पृथ्वी की साड़ी जैसी ओज़ोन पर्त में छेद हो गए हैं. इसके अलावा कवयित्री ने विस्तार से प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया,भूकंप,ज्वालामुखी तथा ध्वनि प्रदूषण के परिणामों से जुड़े वैज्ञानिक तथ्य भी प्रस्तुत किये हैं और यह भी दर्शाया है कि अणुशक्ति के विस्फोट से उत्पन्न विकिरण किस प्रकार पर्यावरण को हानि पहुंचाता है.

कवयित्री ने 'धरती का विलाप' के माध्यम से यह समझाने का प्रयास किया है कि पृथ्वी का इतिहास ही मनुष्य का इतिहास है. अतः पृथ्वी और उसके पर्यावरण को प्रदूषित करके मनुष्य स्वयं अपने विनाश को आमंत्रित कर रहा है. यहाँ यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि पर्यावरण प्रदूषण से उत्पन्न होने वाले इन सारे खतरों के बारे में सूचना देते रहना या सावधान करते रहना भर ही क्या कविता का प्रयोजन है. कविता का प्रयोजन यदि इतना ही है तो यह काम तो मौसम विभाग करता ही रहता है. इसलिए मौसम की भविष्यवाणी करने और चेतावनी देने से आगे बढ़कर कवयित्री ने मनुष्य जाति के समक्ष उपस्थित संभावित प्रलय से बचने का मार्ग भी सुझाया है. यह मार्ग है प्रकृति के प्रति संवेदनशील होने का मार्ग. दरअसल भौतिक उपलब्धियों की अंधी दौड़ में मनुष्य ने प्रकृति के सौंदर्य को देखना ही बंद कर दिया है. पृथ्वी आज उससे इतना भर चाहती है कि वह खुली आँखों से और खुले मन से सृष्टि के सौंदर्य का आस्वादन करे, उसके साथ आत्मीयता का अनुभव करे, अस्तित्वगत रिश्ते को महसूस करे और चेतना के स्तर पर संपूर्ण सृष्टि की पारस्परिकता की अनुभूति उपलब्ध करे. बहते हुए झरने, खिलते हुए फूल, उड़ती हुई तितलियाँ, गुनगुनाते हुए भंवरे और सूर्य की परिक्रमा करती हुई धरती के सौंदर्य का संवेदनशीलता के साथ साक्षात्कार करके मनुष्य मिट्टी की अनंत उर्वरता और प्रकृति की विविध शक्तियों के रहस्य को समझ सकता है. यह समझ उसके भीतर इस बोध को जगाएगी कि केवल धर्म ही अपनी रक्षा करने वाले की रक्षा नहीं करता, पृथ्वी और प्रकृति भी अपने रक्षक की रक्षा करती हैं. यदि मनुष्य पृथ्वी और उसके पर्यावरण की रक्षा करेगा तो पृथ्वी भी उसकी रक्षा करेगी. इसलिए प्रकृति में जो वनस्पतियों और जीवधारियों की विविधता है उसके मूल में निहित अस्तित्व की परस्पर निर्भरता के रहस्य को समझकर इस विविधता की रक्षा करना ही आज के मनुष्य का धर्म है. अन्यथा केवल वन और वन्यप्राणी ही नष्ट नहीं होंगे, प्रकृति का संतुलन बिगड़ जाने से मनुष्य भी नष्ट हो जाएगा . 

कवयित्री डॉ.विजय लक्ष्मी पंडित स्वयं वनस्पति विज्ञान की गंभीर अध्येता रही हैं. वे धरती और मनुष्य के बिगड़े हुए सम्बन्ध के प्रति चिंतित अवश्य हैं लेकिन निराश नहीं है. धरती के सपने के रूप में कवयित्री का अपना सपना इस प्रकार अभिव्यक्त हुआ है - 
"सपने देख रही हूँ मैं
कि मेरे वत्स सभी
संग्रामों से रहित जगत में
हाथों में हाथ डाले
खेलते-कूदते
दौड़ पड़ती नदियों से
हरे भरे जंगलों से
शोभायमान गाँवों से
गगनचुम्बी सगर्व
ऊंचे उठे नगरों से.
सबके दिल सदा
प्रेम, भ्रातृत्व, समरसता से भरे रहें
इस धरा की गोद में सभी
प्रसन्न मन से
शान्ति-गीत का आलाप करें.
ऐसे सुदिन कब आएँगे ?
- कहते कहते
भूमाता का कंठ
दुःख से गद्गद हो गया."
डॉ.पी विजयलक्ष्मी पंडित की यह कविता इस प्रकार पर्यावरण विमर्श की प्रतिनिधि समसामयिक तेलुगु कविता के रूप में सामने आती है. डॉ. एम. रंगय्या ने इसका अनुवाद भी अत्यंत मनोयोगपूर्वक किया है तथा मूल रचना के सन्देश को अविकृत रूप में हिंदी पाठक तक पहुंचाने में सफलता प्राप्त की है. आशा है हिंदी काव्य जगत में पर्यावरण संरक्षण पर केन्द्रित इस प्रयोजनपरक कविता को यथेष्ट सम्मान प्राप्त होगा.

शुभकामनाओं सहित. 
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