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रविवार, 27 फ़रवरी 2011

डॉ.डी.विजय भास्कर के पाँच तेलुगु नाटक

भूमिका

डॉ. डी. विजय भास्कर (27 मई, 1959) तेलुगु के प्रतिष्ठित नाटककार हैं। उन्होंने 25 से अधिक मौलिक नाटकों की रचना की है, कई नाटकों का अनुवाद किया है। उनके अपने नाटकों का अनेक भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद और मंचन हो चुका है। उनके नाटकों को अखिल भारतीय स्तर पर सफलता और ख्यति प्राप्त है। यदि यह कहा जाए कि डॉ. डी. विजय भास्कर नाटक में जीते हैं तो अत्युक्ति न होगी। नाट्य साहित्य के प्रति गहरी अनुरक्ति के कारण उन्होंने नाट्य की भारतीय और पाश्चात्य परंपराओं का गहन अध्ययन किया है। आर. शांता सुंदरी ने उनके पाँच चयित नाटकों का मनोयोगपूर्वक हिंदी अनुवाद किया है। उनका यह कार्य हिंदी और तेलुगु भाषासमाजों के मध्य साहित्यसेतु को सुदृढ़ करनेवाला तो है ही, भारतीय साहित्य की अवधारणा को भी पुष्ट करनेवाला है।

डॉ. डी.विजय भास्कर के नाटक उनकी गहन जीवनासक्ति के सूचक हैं। इन नाटकों में नाटककार ने जनसामान्य के हर्ष और विषाद को सघन संवेदनशीलता के साथ समाविष्ट किया है। वस्तुविन्यास, शीलनिरूपण और फलश्रुति के साथ साथ तकनीक की दृष्टि से भी नाटककार विजय भास्कर की नाट्यकृतियों को तेलुगु नाटक के इतिहास में नए उन्मेष का प्रतीक माना जाता है। इसके मूल में नाटक विधा के प्रति नाटककार के एकनिष्ठ समर्पण की विद्यमानता दिखाई देती है। नाट्यशास्त्र और रंगमंच की बारीकियों से परिचित विजय भास्कर पढ़े जाने के लिए नहीं, खेले जाने के लिए नाटक लिखते हैं। एक सफल संप्रेषक के रूप में वे सदा अपने प्रेक्षक को ध्यान में रखते हैं। नाटक के लिए नाटक नहीं, प्रेक्षक के लिए नाटक लिखनेवाले इस नाटककार ने मुख्यतः समकालीन समाज की समस्याओं और विडंबनाओं पर अपना ध्यान केंद्रित किया है तथा समस्या चित्रण से आगे जाकर बहुत सहज भाव से समाधान प्रस्तुत करने का भी साहस किया है। 

अपनी उर्वर कल्पना शक्ति के बल पर डॉ. विजय भास्कर यथार्थ और स्वप्न का प्रायः इतना सुंदर जादुई घोल तैयार करते हैं कि दर्शक कुछ समय के लिए एक आभासी दुनिया में तैरने लगता है और जब वह वापस अपनी दुनिया में लौटता है तो नाट्य जगत के इस यथार्थ से कुछ न कुछ ऊर्जा और प्रेरणा लेकर ही लौटता है। ‘गांधी जयंती’ इस दृष्टि से अत्यंत सफल फैंटेसी नाटक है। इसमें आरंभ से अंत तक अविश्वसनीयता और नाटकीयता के बावजूद इतनी यथार्थपरकता है कि दर्शक को पूरी की पूरी फैंटेसी विश्वसनीय लगने लगती है - चाहे वह यमलोक हो या मर्त्य लोक। ‘मिनिस्टर’ में भी मृत्यु का साक्षात दिखाई देना, तीन महीने की अतिरिक्त अवधि प्रदान करना और अंततः हृदय परिवर्तन के बाद दीर्घायु देना भले ही किसी महास्वप्न जैसा हो लेकिन इस महास्वप्न में राजनीति का जो यथार्थ दिखाई देता है, रक्त संबंधों के प्रति जो मोहभंग घटित होता है और मानवीय संबंधों की जिस गहराई का बोध होता है, वह सब हमारे चारों ओर का ठोस सच है। ऐसा ठोस सच जिसे भारतीय लोकतंत्र में साधारण नागरिक क्षण क्षण झेल रहा है।

उत्तर आधुनिक कलादृष्टि किसी भी कृति को पाठ के रूप में स्वीकार करती है और यह मानती है कि उसके एकाधिक उपपाठ या अंतर्पाठ हो सकते हैं। यह दृष्टि यह भी मानती है कि कृति का एक स्थगित पाठ भी होता है। ‘बादलों के चित्र’ ऐसा ही प्रयोगशील नाटक है। नाटककार एक सूत्रधार और नट-नटी के माध्यम से मंच पर मूकाभिनय प्रस्तुत करता है और अलग अलग दर्शक उसकी अलग अलग व्याख्याएँ उपपाठों की तरह प्रस्तुत करते हैं। स्त्री विमर्श पर केंद्रित यह नाटक दहेज की समस्या, संपत्ति में स्त्री के अधिकार की समस्या और संतति तथा नियोग से संबंधित समस्या को अत्यंत मार्मिक ढंग से प्रस्तुत करता है। हर स्थिति में औरत को सताया और जलाया जाता है; और एक प्रेक्षक चीख उठता है - इस तरह औरतों को सताकर जला डालने के नाटक मत खेलो। इसे नाटक की सफलता मानते हुए सूत्रधार प्रसन्न होता है लेकिन नाटककार अब तक के एक स्थगित पाठ को यहाँ प्रस्तुत करता है - स्त्री के सशक्तीकरण का पाठ; पुरुष वर्चस्व ने आज तक जिसे अनुपस्थित रखा। यहाँ नाटककार मिथक का सहारा लेता है। औरत छटपटाकर काली का सा भयंकर रूप धारण कर लेती है और आगे जो कुछ होता है वह इस सूक्ति के माध्यम से फलागम को प्राप्त करता है - स्त्री जब तक बकरे की तरह सब कुछ सहती रहेगी, यह अत्याचार बंद नहीं होगा इसीलिए अपनी समस्या को सुलझाने के लिए, अपने अस्तित्व की रक्षा करने के लिए स्त्री को साँप की तरह फुफकारना पड़ेगा, बाघ की तरह पंजा मारना पड़ेगा, जरूरत पड़ने पर काली का रूप लेना पड़ेगा।

अपने अभिप्राय को संप्रेषित करने के लिए नाटककार डी.विजय भास्कर कई तरह की संप्रेषण युक्तियों का सफल प्रयोग करते हैं। फैंटेसी, सूक्तिगठन और मिथक के अलावा उनकी सबसे प्रिय संप्रेषणयुक्ति प्रतीकवत्ता, ध्वन्यात्मकता, व्यंजनाशक्ति अथवा व्यंग्य के मारक प्रयोग में निहित है। मुहावरों, लोकोक्तियों और सूक्तियों की तर्ज पर नाटककार ने ऐसी अनेक व्यंग्योक्तियाँ गढ़ी हैं जिनका कटाक्ष त्रासद हँसी के रूप में प्रतिफलित होता हुआ दर्शक की चेतना को झकझोर डालता है। सभी नाटकों में किसी एक स्थल पर भाषण की प्रोक्ति का भी प्रयोग किया गया है, लेकिन उसके लिए ऐसे स्थल का चयन किया गया है कि घटनाओं के तनाव से उत्पन्न वातावरण में ये भाषण तनिक भी बोझिल प्रतीत नहीं होते और नाटककार सहजता से अपने अभिप्रेत को प्रेक्षक के मस्तिष्क में बोने में सफल हो जाता है। अन्य नाटकों की तरह ‘कुर्सी’ में भी इन सभी युक्तियों का अत्यंत सटीक निर्वाह हुआ है। दलित विमर्श पर केंद्रित इस नाटक में सामाजिक न्याय और मानव अधिकार हनन की भीषण स्थितियों का अंकन दिल दहला देने वाला है। वर्चस्व की इस लड़ाई में कुर्सी का प्रयोग प्रतीक की तरह किया गया है - नाटक के अंत में भीमैया का भाषण दलित आंदोलन की सही दिशा निर्धारित करता है। इस नाटक के अंत में पात्र परिचय की शैली भी ध्यान खींचती है। जनतंत्र के मंदिर में दलितों के अधिकारों का राज्याभिषेक लेखक की लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता का द्योतक है।

बोधकथा और फैंटेसी का अत्यंत रोचक इस्तेमाल इस संग्रह के अंतिम नाटक ‘जिंदगी का खेल’ में द्रष्टव्य है। बात शुरू तो होती है गधे, कुत्ते और बंदर के अपनी अपनी उम्र के बीस बीस साल मनुष्य को देने से; लेकिन आगे जब इसके परिणामों का खुलासा होता है तो नाटक वृद्धावस्था पर एक अत्यंत गंभीर विमर्श में बदल जाता है। हमारे समय की अत्यंत ज्वलंत समस्या है वृद्धों का पुनर्वास। भविष्य में इसके और जटिल होते जाने की संभावनाएँ हैं। लेखक ने इसका समाधान प्रकृति, समाज और व्यक्ति के सामंजस्य में खोजने का प्रयास किया है जो उच्च जीवन मूल्यों के प्रति उनकी आस्था का प्रतीक है। मनुष्य के भीतर निहित देवत्व की संभावनाओं में नाटककार का विश्वास अन्य नाटकों में भी बार बार व्यंजित हुआ है जो उन्हें विपरीत परिस्थितियों में भी पराजित न होने वाली सदाशयता और जिजीविषा का चितेरा बनाने के लिए पर्याप्त है।

अनुवादक आर. शांता सुंदरी ने यथासंभव लक्ष्य भाषा की प्रकृति के अनुरूप भाषांतरण में सफलता प्राप्त की है। इस हेतु वे विशेष साधुवाद की अधिकारी हैं। इसमें संदेह नहीं है कि डॉ. डी. विजय भास्कर की नाट्य कृतियों के इस अनुवाद से भारतीय साहित्य संपन्नतर हुआ है।

शुभकामनाओं सहित।

22 फरवरी, 2011 

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