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शनिवार, 7 मई 2011

शिरसि मा लिख मा लिख मा लिख


मई दिवस. एक मई. मजदूर दिवस.

इस बरस 'कादंबिनी क्लब' की कृपा से मई दिवस काव्य दिवस बन गया. कई साल हो गए थे - क्लब की वार्षिक भ्रमण गोष्ठी को टलते. सो, ज्योतिनारायण दम्पति के संयोजन में उस रिवाज को इस इतवार के रोज फिर से प्रवर्तित कर दिया गया. ड्यूक्स फ़ार्म हाउस में बीसेक कविनुमा जन एकत्र हुए. सुंदर भोजन किया. स्वादिष्ट कविताएँ सुनीं-सुनाईं. मज़ा आया - डॉ. गोपाल शर्मा, लक्ष्मी नारायण अग्रवाल और गुरुदयाल जी भी थे न!

अध्यक्षता करनी पडी. कविता सुनाने खड़ा हुआ तो डॉ. अहिल्या मिश्र जी अड़ गईं - आज आप केवल श्रृंगारिक रचनाएँ सुनाएँगे. उन्होंने खुद भी जाने कब की लिखी प्रेम कविताएँ सुनाईं. इतनी वरिष्ठ महिला रचनाकार के आदेश को मैं भला कैसे टालता? वैसे टालता भी क्यों? पर मन ही मन इस बात पर कुढ़ा  हुआ भी था कि तीन महाशय भरपेट लंच के बाद पूरी गोष्ठी में ठीक मेरे सामने सो रहे थे. सो मैंने अपनी बात उस प्रसिद्ध सुभाषित से शुरू की  जिसमें कहा गया है कि - हे  विधाता, कर्मफल के नाम पर और चाहे जितने ताप-शाप दे देना पर मेरे भाग्य में ऐसा अवसर कभी न लिखना कि मुझे किसी अरसिक श्रोता को कविता सुनानी पड़े-

इतर  तापशतानि यदृच्छया विलिखतानि सहे चतुरानन l
अरसिकेषु कवित्वनिवेदनं शिरसि मा लिख मा लिख मा लिख ll 

सोने वालों ने गर्दन हिलाई तो सुनाने वाले ने सोचा कि बात बन गई. बस फिर क्या था - कवीनाम्कवि किम्कविशिरोमणि  ऋषभदेव शर्मा ने अपने वृषभोपम स्वर में अपनी किशोरावस्था के तमाम हवाई प्रेमगीत और दोहे सुना डाले. लेकिन असली धन्यता का बोध अगले दिन अखबारों में अपना यह कथित वक्तव्य पढ़कर हुआ कि अपुन ने कवियों को यह सलाह दी कि वे रसिकता के साथ कविता पेश किया करें! ब्रह्मा जी उस दिन कहीं मुझसे टकरा गए होते तो जाने क्या कर बैठता. अब तो बस इतना ही कि जब कोई कवि अरसिक सोताओं  में फंसे तो समझना चाहिए कि पाप उदय हुए हैं.

फिर भी मज़ा खूब आया. मैंने और गोपाल शर्मा जी ने बच्चों के झूले में खड़े होकर फोटो खिंचवाई - जो अब तक शर्मा जी ने मुझे अग्रेषित नहीं की है (शायद छपाना न चाहते हों). ...हमारा साथ केवल अनुषा (ज्योतिनारायण जी की धेवती) ने दिया.  हम तीन बालकों के अलावा बाकी सब बुड्ढ़े जो थे!!!!(फोटो गवाह है).  
  
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