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गुरुवार, 5 मई 2011

मौसम का मिजाज़ और अपने चंद्रमौलेश्वर जी

बुधवार की बात है. यानी चार मई की. एन सी ई आर टी (दिल्ली) से डॉ. नरेश कोहली का फोन था. बोले - आज 'जनसत्ता' में आपका नाम देखा. मैं भौंचक. ऐसा क्या कारनामा कर दिया मैंने? शायद प्रताप सिंह ने कुछ लिखा हो - वे उसी अखबार में हैं. पर नहीं, कारनामा न मेरा था न प्रताप का. अपने चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी का था. तभी कोलकाता से डॉ. देवराज ने चलघंटी  की कोयल कुहका दी - अभी मेरे सामने जनसत्ता है. है क्या उसमें ,यह तो बताइये - मेरे पूछने पर उन्होंने तफसील में बताया कि मौसम के मिजाज़ पर च मौ प्र ने अपने ब्लॉग पर जो पोस्ट मेरे नामोल्लेख के साथ डाली थी, जनसत्ता ने समांतर में छाप दी है; और उन्हें हैदराबाद में होने का भ्रम हो रहा है! ओह, तो यह बात है! मैंने राहत की साँस ली. बाद में नेट पर वह पेज मिल गया . कटिंग पेशे-खिदमत है -



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