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रविवार, 22 मई 2011

डॉ.शिखामणि की "घुंघरू वाली छड़ी"

 भूमिका 
डॉ.शिखामणि समकालीन तेलुगु कविता के एक सुपरिचित हस्ताक्षर हैं. ''घुंघरू वाली छड़ी''  में उनकी 51 प्रतिनिधि कविताओं का हिंदी अनुवाद प्रस्तुत किया जा रहा है. ये कविताएँ अपनी भाव संपदा, वैचारिकता, कल्पनाप्रवणता और भाषाभंगिमा में बड़ी सीमा तक विशिष्ट हैं. यह विशिष्टता संभव हुई है सामान्य लोकानुभवों की प्रभावी अभिव्यक्ति के सहारे. 

इन कविताओं को पढ़ते हुए आपको लगेगा कि शिखामणि अमूर्त जगत में विहार करने वाली कविता नहीं रचते, बल्कि मूर्त जगत की वास्तविकताओं को और दैनिक जीवन की घटनाओं को भाषा की पोशाक पहनाकर कविता के व्यक्तित्व का सृजन करते हैं. शिखामणि के इस कवि व्यक्तित्व के निर्माण में कथात्मकता का बड़ा योगदान है. इसीलिए उनकी कविताएँ किसी किस्से की तरह आपसे बतियाने लग सकती हैं. कविता में किस्सागोई की यह कला उसे तनाव और विस्तार  एक साथ प्रदान करती है. ख़ास तौर से तनाव को साधने के लिए कवि ने कई स्थलों पर मनोरम फैन्टेसी रची है तो दूसरे कई स्थलों पर मिथकीय प्रसंगों का सहारा लिया है. मिथ और फैन्टेसी से बुनी हुई कविताएँ जादुई यथार्थ का  भी बोध कराती हैं - लेकिन शब्दों की इस जादूगरी का उपयोग शिखामणि किसी स्वप्नलोक की रचना के लिए नहीं करते बल्कि उसके माध्यम से भी समकालीन सामाजिक-आर्थिक विसंगतियों की कठोर सच्चाइयों का ही बोध कराते हैं.

`घुँघरू वाली छड़ी  ' की कविताओं को पढ़कर आप इन्वाल्व हुए बिना नहीं रह सकते. कवि कथन में एक ऐसी अनिवार शक्ति है जो आपको अपने साथ बाँध ले जाएगी. इन कविताओं में दुःख-संताप झेलते हुए वंचितों-पीड़ितों-दलितों की वेदना करुणा का आधार बनती है तो असंतोष और आक्रोश को भी जगाती है. मनुष्य और मनुष्य के बीच भेदभाव बरतने वाली हर व्यवस्था को कवि शिखामणि नकारने का साहस रखते हैं; और इसीलिए उनके स्वर में अनेक अवसरों पर व्यंग्य की धवनि सुनी जा सकती है.उन्होंने समाज के हर प्रकार के दोगलेपन पर से पर्दा उठाया है - चाहे वह स्त्री संबंधी कथनी-करनी का भेद हो या स्वतंत्र तेलंगाना राज्य की मांग से जुडा दोहरा आचरण. वे यहीं नहीं रुकते बल्कि सामाजिक न्याय को संभव कर दिखाने वाली क्रांति के लिए भी आह्वान करते हैं. ऐसा लगता है कि उनका कविधर्म उन्हें लगातार कचोटता है हर प्रकार की शोषक व्यवस्था को उखाड़ फेंकने के लिए. और वे ऊर्ध्वबाहू होकर कविता की युगीन भूमिका की घोषणा करते हैं - "अब अक्षर जन्म लेंगे/ शिव के हाथ की डमरू-ध्वनि से नहीं/ वीरबाहू के चरमराते चप्पलों से ही./ अब वर्णमाला/ सवर्ण के हाथ की रुद्राक्ष-माला नहीं/ दलित मुहल्ले के आगे की अलगनी पर/ सूखते माँस-मछली हैं/ अब मनु के शरीर का जनेऊ/ मेरी इस काली जाति  के चप्पलों का कशीदा है."[चरमराते चप्पलों की भाषा].  

शिखामणि के कवि व्यक्तित्व में सकारात्मकता की सर्वत्र उपस्थिति उन्हें उन अनेक रचनाकारों से अलग कर देती है जो उत्तरआधुनिकता की झोंक में सर्वनकारवाद के ध्वजवाहक बने हुए हैं. इस सकारात्मक दृष्टिकोण का ही यह परिणाम है कि शिखामणि की कविता को स्त्री या दलित या अल्पसंख्यक जैसे हाशियाकृत किसी विमर्श की हदबंदी  स्वीकार नहीं है. वे न तो मनुष्य को तोड़कर देखने के पक्ष में हैं न ही कविता को. संपूर्ण मनुष्य के बिना संपूर्ण कविता भला कैसे संभव है! मनुष्यता की पीड़ा उनकी कविता की पीड़ा है और मनुष्यता का सौंदर्य ही कविता का सौदर्य - ''मुँह अँधेरे ही गलियों में / फूल की टोकरी सहित/ घूमते समय वह/ कार्तिक मास  के सरोवर में/ छोड़े केले के दोने में/ जलती ढिबरी सा लगता है.''[फूल वाला बालक]. 

कवि शिखामणि की संवेदना का संसार जितना व्यापक है उनकी लोकासक्ति भी उतनी ही सघन है. यही कारण है कि वे केवल परिवार और समाज के साथ ही रिश्ते नहीं बनाते, संपूर्ण जड़-जंगम जगत के साथ तादात्म्य स्थापित करते हैं. मनुष्य और प्रकृति के बीच बिंब-प्रतिबिंब भाव इसी की निष्पत्ति है तथा इसी से लोक के ऐसे जीवंत चित्र संभव हो सके हैं जो आज दुर्लभ होते जा रहे  हैं. नवनिर्मित नारियल से बनी चटाई पर निर्वस्त्र सोने का सुख, कटे  घाव पर कुनकुना पानी डालने की सी राहत, द्वार खटखटाने के समान चोंच मारता हुआ कठफ़ोडुआ,   छाल की आँखें फाड देखने लगता वृक्ष, पल्लवित होता हुआ काठ का पैर, कहीं किसी अज्ञात वन में कोयल के कूकने पर पल्लवित होते द्वार एवं खिडकियाँ, किसी सागर की किसी लहर को किसी किरण के चूमने पर मुस्कुराता हुआ घड़े का नमक, मातृहीन बालक की पुकार पर माँ की समाधि पर पल्लवित होता हुआ तुलसी का बिरवा, कान्हा की बाँसुरी बनने के लिए समस्त वनराजि  की बाँस  में बदल जाने  की आतुरता, कूकने को तैयार पक्षी की कूक का कंठ में ही छटपटाकर रह जाना, बातों का भाले में बदलना, शरीर का धनुष में ढलना, खून की बूँद गिरने से ज्वालामुखी का फट पड़ना, जंगल में पक्षियों की आवाज में अपना गला मिलाकर पागलों की तरह पुकारती हुई माँ, मृगछाल ओढ़े शेर और हंस के पंखों को चिपकाए गिद्ध का मंद स्वर में शान्ति पाठ करना, आधी रात जंगल में बंदूकों का चुपचाप चल पड़ना, स्त्रियों की आँखों में इस देश की सारी नदियों का बहना, कुलियों के उदर में जंगल की सारी आग का दहना, लाल चोंच वाले तोते का मारा जाना और जंगल का विकसित होना, डकार के रूप में कविता का प्रकट होना, पतिव्रताओं के वेश में वेश्याओं को देखना, वेश्या की भूमिका में गृहिणियों को देखना, उँगलियों के चिमटे से अंगारे सरकाना, वर्णचाप का ध्वंस करता हुआ दलित कवि - जैसी अनेक सृजनात्मक अभिव्यक्तियाँ कवि शिखामणि की इन कविताओं में बिखरी पडी हैं जो उनकी रचनाधर्मिता और प्रतिबद्धता का सही सही पता देती हैं. 

साथ ही अनेक सूक्तियाँ भी इन कविताओं में भरी पड़ी हैं जिन्हें कवि के अनुभव का नवनीत कहा जा सकता है. जैसे - कुछ सीढियाँ केवल उतरने के लिए होती हैं चढ़ने  के लिए नहीं. सरल नहीं है उठना. / जिसके भीतर अग्निकुंड हो, बाहरी आग उसका बाल बांका नहीं कर सकती. यहाँ इस संग्रह की शीर्ष कविता 'घुँघरू वाली छड़ी' का भी एक अंश द्रष्टव्य है - "एक अनाथ बालक की तरह/ भीड़-भाड़ वाले/ चौराहे पर मुझे छोड़ दीजिए/ मुझे आदर न करने वालों के अभाव में/ व्यथित नहीं हूँगा./ अंधे के हाथ की/ घुँघरू वाली छड़ी बनकर/ उसे रास्ते के पार करा दूँगा." 

डॉ.शिखामणि की इन तेलुगु कविताओं को हिंदी जगत के समक्ष प्रस्तुत करने का श्रेय वरिष्ठ अनुवादक डॉ.एम.रंगैया को जाता है. वे तेलुगु साहित्य के मर्मज्ञ विद्वान हैं तथा हिंदी लेखक, अनुवादक और अध्यापक के रूप में उन्होंने लंबा अनुभव अर्जित किया है. यह अनुवाद उनकी प्रतिष्ठा में चार चाँद लगाएगा, इसमें संदेह नहीं. मैं समझता हूँ कि तेलुगु सहित सभी भारतीय भाषाओं के श्रेष्ठ समकालीन लेखन को अनुवाद के माध्यम से हिंदी में उपलब्ध कराना बेहद जरूरी और राष्ट्रीय महत्व का कार्य है. इस  कृति को भी इसी भावना के साथ ग्रहण किया जाना चाहिए. 

कवि डॉ.शिखामणि और अनुवादक डॉ.एम.रंगैया इस मर्मस्पर्शी कविता संग्रह के प्रकाशन के लिए अभिनंदनीय हैं. 

शुभकामनाओं सहित 

- ऋषभ देव शर्मा 
22 मई, 2011  

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