समर्थक

रविवार, 22 मई 2011

तेलुगु काव्य ‘अक्षर मेरा अस्तित्व’ की भूमिका


अ...

‘अक्षर मेरा अस्तित्व की रचनाकार डॉ.सी.भवानी देवी प्रमुख समकालीन तेलुगु कवयित्री हैं। उन्होंने समय और समाज के प्रति जागरूक शब्दकर्मी के रूप में अपनी पहचान बनाई हैं। विषय वैविध्य से लेकर शिल्प वैचित्र्य तक पर उनकी गहरी पकड़ ने उन्हें बड़ा रचनाकार बनाया है। 

मनुष्य के रूप में एक स्त्री के अस्तित्व की चिंता डॉ.भवानी के रचनाधर्म की पहली चिंता है। भारत की आम स्त्री उनकी कविता में अपनी तमाम पीड़ा और जिजीविषा के साथ उपस्थित है। इस स्त्री को तरह तरह के भेदभाव और अपमान का शिकार होना पड़ता है, फिर भी यह तलवार की धार पर चलती जाती है, मुस्कुराहटों के झड़ने पर भी अक्षर बनकर उठती है और प्रवाह के विपरीत तैरने का जीवट दिखाती है। माँ इसके लिए दोहरी संवेदनाओं का आधार है - जूझने के संस्कार का भी और आत्मसमर्पण करके पहचान खो देने के संस्कार का भी। इस द्वन्द्वात्मक संबंध में कवयित्री स्वतंत्र अस्तित्व के पक्ष को चुनती है - "पर माँ! / अब मैं अक्षर बन उठ रही हूँ / यह प्रवाह मुझे अच्छा नहीं लगता /  इसलिए मैं विपरीत दिशा में तैर रही हूँ / तुम्हारी पीढ़ी हैरान रह जाए / इस अंदाज से / अपनी पीढ़ी में सिर उठा रही हूँ / अब आगे / अक्षर ही मेरा अस्तित्व होगा!" 

डॉ.भवानी देवी की स्त्री अतीत को एक पूजाघर मानती है जिसमें थोड़ी देर ठहरना तो ठीक है पर हमेशा के लिए बसना नहीं। यह स्त्री निरंतर उछलते जल प्रपात की तरह यात्रा में है - इस बोध के साथ कि ‘जीवन तो लहर नहीं / कि दोबारा पीछे की ओर बह जाए।’ इस स्त्री को यह भी बोध है कि अस्मिता की बात करने पर, अक्षर अस्तित्व की चर्चा करने पर पुरुष समाज उसके स्त्रीत्व तक को कटघरे में खड़ा कर देगा, लेकिन वह पिंजड़ों को गले लगाने के पागलपन को दुहराने के लिए तैयार नहीं है। घर गृहस्थी में जब घरवाली के हिस्से में सिर्फ टूटा फूटा प्यार और उपचार के नाम पर उपहास ही आता है तो वह इस बेगार से छुटकारे के लिए आवाज लगाती ही है - 
"तरंग बनूँ तट को पार करूँ...
पतंग बनूँ आकाश के  अंतिम छोर तक उडूँ...
हिम बनूँ जी भर बहने लगूँ...
पेड़ की जड़ बनूँ कोपलों को सीने से लगा लूँ...
प्रातः बनूँ आराम से बाग़ में घूमूँ फिरूँ...
मानवी बनूँ
प्यूपा को तोड़कर 
तितली बनकर हवा के संग-संग उड़ जाऊँ...।"

इसके अलावा कवयित्री भूमंडलीकरण के नाम पर उभर रही एकजैसेपन से ग्रस्त संवेदनहीन ठंडी दुनिया को देखकर मनुष्‍यता के भविष्य के बारे में बेहद चिंतित हैं। घर हो या बाहर, आज का मनुष्य सर्वत्र एक ऊष्म आत्मीय स्पर्श के लिए तरस रहा है। संबंधशून्यता और असंपृक्ति की यह  बीमारी शहरों से चलकर अब गाँवों तक पहुँच गई है जिस पिशाच ने सारे शहरों को निगला है वह अब हमारे गाँवों पर भी टूट पड़ा है। अब खेतो में फसल नहीं नोटों की गड्डियाँ उगाई जाने लगी हैं। परिवार टूट रहे हैं; बाजार फैल रहे हैं। बाजार के इस दैत्य ने घर की बोली को चबा लिया है और पराई भाषा अपनों को पराया करके भारत को अमेरिका की ओर उन्मुख कर रही है। लेकिन इसी समय का सच यह भी है कि बाजार के साम्राज्य  के बरक्स छोटी छोटी स्थानीय संवेदनाएँ अंधेरे के विस्तार के समक्ष दिये की तरह सिर तानकर खड़ी हैं। वर्तमान समय में कविता की सबसे बड़ी प्रासंगिकता स्थानीयता की इस संवेदना को बनाए रखने में ही निहित है - "आज गाँव है / एक उजड़ा मंदिर / फिर भी मेरे पैर उसी ओर खींच ले जाते हैं मुझे / भले ही मंदिर उजड़ गया हो / वहाँ एक छोटा-दीया जलाने की इच्छा है।"

कवयित्री धरती पर फैलते रेगिस्तान और दिलों में फैलती अमानुषता के प्रति बेहद चिंतित हैं। वे जानती हैं कि सृजन के लिए कोमलता चाहिए होती है, द्रवणशीलता की दरकार होती है। शिशिर वन जैसे सूखे दिलों में आग के तूफान उठते रहेंगे तो भला हरियाली के अंकुर कहाँ से फूटेंगे? अगर यही हाल रहा तो ‘पिघलने वाले मनुष्य का नामोनिशान भी नहीं रहेगा!’ अगर ऐसा हुआ तो दुनिया को बेहतर बनाने के सपने अकारथ  हो जाएँगे: लेकिन मनुष्यविद्ध कविता के रहते यह संभव नहीं.   

डॉ.सी.भवानी देवी की काव्यभाषा अपनी बिंबधर्मिता और विशिष्‍ट सादृश्‍यविधान के कारण मुझे खास तौर पर आकर्षित करती है। आवाजों के बीच जमने वाले शून्य  की तरह हाथ मिलाने में, सारे दृश्‍य़ बर्फ के टुकड़ों की तरह टूटते गिरते रहते हैं, मन को घेरने वाली धुंध जैसे मौन को छोड़कर, मौन हजारों लाखों शब्दों को बर्फ की तरह घनीभूत कर देता है, एक एक पन्ने में से उठतीं चमेली के फूलों की ज्वालाएँ, युद्ध के बड़े बड़े दाँतों के बीच फँसकर कटनेवाले बचपन, रीढ़ की हड्डी बनता हुआ तकिया, नाभिनाल के कटते ही पगहे से बाँध दी गई लड़की, बिना साए का इंसान, दोनों हाथ ऊपर उठाकर बुलाती स्त्री, पीछे रस्सी से बँधे हाथों वाली स्त्री, पिंजरे में बँधी पंछी की तरह नरक भोगती स्त्री, मकबरे  को तोड़कर निकलने वाली पुकार जैसी तलवार से बुरके को सिर से पाँव तक काटती हुई स्त्री, चिकने पहाड़ पर चढ़ती, फिसलती और फिर फिर चढ़ती हुई स्त्री, चारों ओर समुद्र ही समुद्र होते हुए प्यास बुझाने को एक बूँद पानी के लिए तरसना, दोस्त के इंतजार में आँखें बिछाए बैठा घोंसला, मेरा बचपन किताबों में मोर पंख सा छिपा हुआ है, उस घर की ईंट ईंट पर मेरे नन्हे हाथों की छापें अब भी गीली दिखती हैं - ये सारे शब्दचित्र कवयित्री की गहन संवेदनशीलता और सटीक अभिव्यक्‍ति क्षमता के जीवंत साक्ष्य हैं।

चाहे सुनामी हो या तसलीमा नसरीन पर हमला, कुंभकोणम के स्कूल में अग्निकांड में बच्चों की मृत्यु हो या 25 अगस्त 2007 को लुंबिनी पार्क और गोकुल चाट भंडार में आतंकवादी बम विस्फोट की घटनाएँ - हर छोटी बड़ी चीज़  कवयित्री डॉ.सी.भवानी देवी के मन मस्तिष्क के तारों को झनझना देती है। धर्म, भाषा, जाति, राजनीति और न जाने कितनी तरह के आतंकवाद और युद्धों को झेलती हुई  मनुष्यता का आक्रोश भवानी देवी के शब्दों में ढल कर  श्‍लोकत्व प्राप्त करता है - 
"हे धर्म...
अब तुझे ख़त्म करके ही
हम जीवन पाएँगे!
तुझे सिंहासन पर चढ़ाते रहेंगे जब तक
तब तक 
मैं आँसुओं से भरी घटा ही बनी रहूँगी
तेरे पैरों तले कबूतरी-सी कुचलती रहूँगी!"

श्रीमती आर.शांता सुंदरी ने डॉ.सी.भवानी देवी की इन कविताओं को अत्यंत सहज और प्रवाहपूर्ण अनूदित पाठ के रूप में प्रस्तुत किया है। ‘अक्षर मेरा अस्तित्व’ में संकलित यह अनुवाद हिंदी भाषा की प्रकृति और हिंदी कविता के मुहावरे में इस तरह ढला हुआ है कि अनुवाद जैसा लगता ही नहीं। वस्तुतः आर.शांता सुंदरी के पास स्रोत भाषा तेलुगु और लक्ष्य भाषा हिंदी दोनों ही के साहित्य और समाज का इतना आत्मीय अनुभव है कि अनुवाद उनके लिए अनुसृजन बन जाता है। इस कृति के माध्यम से उन्होंने तेलुगु की एक प्रमुख कवयित्री की प्रतिनिधि रचनाओं से हिंदी जगत का परिचय कराकर सही अर्थों में भारतीय साहित्य की अवधारणा को समृद्ध किया है। 

हिंदी जगत में ‘अक्षर मेरा अस्तित्व’ को स्नेह और सम्मान मिलेगा, ऐसा मेरा दृढ़ विश्‍वास है।

- ऋषभदेव शर्मा
21 मई, 2011




एक टिप्पणी भेजें