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सोमवार, 10 मई 2010

कवि अगर रसोइया भी हो!

इधर कुछ दिन से व्यस्तता के साथ कुछ तनाव सा था. वैसे भी अप्रैल-मई में संस्थान के कार्याधिक्य के कारण तनिक ज्यादा दबाव तो सिर पर रहता ही है. लेकिन गत दिनों एक संगोष्ठी के अवसर पर जबसे दोस्तों ने आँख में अंगुली दे-देकर दिखाया कि डॉ. गोपाल शर्मा के लीबिया जाने, डॉ.कविता वाचक्नवी के लंदन जाने और चंद्र मौलेश्वर प्रसाद के अस्वस्थ होने के बाद से ऋषभ की ऊर्जा एक चौथाई ही रह गई है, तबसे चारयारी की यादें भीतर भीतर आरी चला रही थीं. ऊपर से कुछ पारिवारिक दायित्वों को संपन्न करने में अपनी सीमाएँ तात्कालिक रूप से व्यथित कर रही थीं.

कि ऐसे ग्रीष्म में एक शाम की मुलाकात में गुरुदयाल अग्रवाल जी ने काव्यपाठ और आलू के पराँठों का अपना न्यौता दोहरा दिया. रविवार - ९.५.२०१० की शाम , लू के तमाचे झेलते डॉ.बी. बालाजी और मैं उनके यहाँ जा धमके. उन दोनों की जुगलबंदी जमी - यानी दोनों ने ५-५,७-७ कविताएँ तो पेल ही दी होंगी. मैं वक्तज़रूरत के लिए तेवरीसंग्रह लेकर गया था . पर ज़रूरत ही नहीं पड़ी. दोनों कविगण इतने भले निकले कि मेरे एक बार इनकार करने पर ही मान गए. चौकड़ी के सदस्यों की तरह न जिद की, न गुस्सा दिखाया, न आदेश दिया; अपनी अपनी में मगन रहे.

दूसरा सत्र पेटपूजन का था. श्रीमती गुरुदयाल सवा महीने से बेटी के पास गई हुई हैं इसलिए ही अपनी पाककला के जौहर दिखलाने को श्रीयुत गुरुदयाल जी मचल रहे थे. मगर मान गए जनाब , गुरुदयाल जी लाजवाब हैं! उन्होंने हमें लाजवाब कर दिया. अब इसे आप क्या कहिएगा कि उन्होंने मेरे इस प्रस्ताव पर मेरी क्लास ले ली कि सारे पराँठे एक साथ बनाकर रख लिए जाएँ ; और तीनों साथ बैठकर खाएँ. नहीं; उन्होंने बात नहीं मानी और एक-एक पराँठा सेंककर थाली में गरमागरम परोसा. मैंने नोटिस किया कि अतिरिक्त घी को सोखने के लिए वे रसोई से टेबल तक पराँठे को कागज़ में लपेटते हुए लाते थे. ७५ वर्षीय अपने गुरुदयाल जी आज भी इतने ऊर्जावान हैं और मैं ५२-५३ में ही टें बोल रहा हूँ. कवि अगर रसोइया भी हो तो असली रस-परिपाक को समझेगा. जाने क्या क्या सोचता रहा .

९ मई थी; यानी मदर्स डे. मुझे लगा, ये गुरुदयाल जी कितनी अच्छी माँ हैं. उन्होंने एक एक सब्जी के बारे में अलग अलग पूछा. मैंने भी सबका खूब जायका लिया और पूछा कि इस मौसम में बथुवे का रायता कैसे संभव किया गया. पता चला कि सर्दी के दिनों में दिल्ली से वे ढेरों बथुवा मँगा कर सुखाते हैं और साल भर खाते हैं. भई वाह; धन्य हैं गुरुदयाल जी आप; और धन्य है आपका बथुवा प्रेम! यह मदर्स डे याद रहेगा.
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