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शुक्रवार, 30 सितंबर 2011

स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ : प्रासंगिकता, उपादेयता एवं सीमाएँ


- प्रो. दिलीप सिंह 



पिछले कुछ वर्षों से हिंदी क्षेत्र के कई स्वनामधन्य आधुनिक हिंदी के स्वघोषित स्तंभ जगह-जगह स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं की प्रासंगिकता और उपादेयता पर प्रश्न खडे़ करने लगे हैं। ये वे लोग हैं जिन्होंने हिंदीतर प्रदेशों में हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में अपना कोई योगदान कभी नहीं दिया है। भारत के बड़े-बड़े विश्वविद्यालयों के हिंदी विभागों में बैठकर तथा हिंदी की समितियों में घुसपैठ करके ये अपने आप को हिंदी का स्वयंभू समझने लगे हैं। 

मुझे पूरा यकीन है कि इनमें से किसी को भी यह पता न होगा कि पूरे भारत में हिंदी की कितनी स्वैच्छिक संस्थाएँ हैं या इनकी कितनी शाखाएँ देश के कोने-कोने में कहाँ-कहाँ, क्या-क्या काम कर रही हैं। वे यह भी न जानते होंगे कि हिंदी क्षेत्र के कौन-कौन से लोगों ने गांधी जी की प्रेरणा से दक्षिण, पश्चिम और पूर्वोत्तर भारत में जाकर, वहाँ रह-बस कर हिंदी का कितना और कैसा काम किया है। इन्हें लगता है कि हिंदी साहित्य में विमर्शों की आवाजाही, आलोचकीय दृष्टिकोणों तथा साहित्यिक प्रवृत्तियों पर ये जो बहसें करते आ रहे हैं उनकी शाश्वतता के आगे हिंदी भाषा को संपर्क भाषा के रूप में स्थापित करने वाले प्रयत्न अनावश्यक हैं, अप्रासंगिक हैं - इनकी अब न तो कोई उपादेयता रह गई है और न ही ज़रूरत। 

उपयोगिता की चर्चा ; स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं के लिए यूँ तो मुझे निरर्थक लगती है। पर संदेही मनों और हिंदी विरोधी (हिंदी भाषा को सिर्फ हिंदी भाषी क्षेत्र की वस्तु मानना निःसंदेह हिंदी की अखिल भारतीय अस्मिता का विरोध है) मानसिकता वाले दिलों में घर कर गए भ्रमों पर से परदा हटाने के लिए यह चर्चा बामानी भी लगती है। इस अफसोस, खेद और क्षोभ के साथ कि अपने ही देश में हमें स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं की उपादेयता गिनाने की आवश्यकता भला क्यों पड़ रही है। उस देश में जिसकी ‘राष्ट्रभाषा’ हिंदी स्वतंत्रता पूर्व से मान्य और सम्मान्य रही है और जिसके माध्यम से राष्ट्र की भावात्मक और सांस्कृतिक एकता का सपना देखा गया था। और स्वतंत्रता के बाद जिसे राजभाषा की संवैधानिक मान्यता मिली हुई है और ये संस्थाएँ संविधान के अनुच्छेद 351 को अमली जामा पहनाने का काम अपने-अपने स्तर पर जी-जान लगाकर कर रही हैं। 

मैं अपनी सारी आधुनिक वैचारिकता के बावजूद यह मानता हूँ ; चाहे यह कुछ लोगों को निरी भावुकता ही क्यों न लगे कि ये संस्थाएँ हमारी धरोहर हैं, हमारी जातीय एवं राष्ट्रीय अस्मिता की धरोहर। इस बात पर डॉ. धीरेंद्र वर्मा, आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी, डॉ. राम विलास शर्मा और इन संस्थाओं के साथ जुड़े अनेक भाषाविद् और हिंदी चिंतक अत्यंत तार्किक ढंग से मुहर लगा चुके हैं। विश्व हिंदी सम्मेलनों के अवसर पर प्रकाशित स्मारिकाओं में भी इन संस्थाओं की महती भूमिकाओं और ऐतिहासिक महत्व को बार-बार रेखांकित किया जाता रहा है। हिंदी की इन संस्थाओं का अपना प्रेरक इतिहास तो है ही, इनमें या इनके भीतर भारतीय इतिहास के कई स्वर्णिम पृष्ठ भी अंकित हैं। यदि हम इनकी सही परख करें तो यह साफ दिखाई देता है कि इन संस्थाओं ने इतिहास के साथ रहकर या जरूरत पड़ने पर उससे लड़-भिड़ कर भी अपना इतिहास बनाया है। कई बार इन्होंने इतिहास की वक्र दिशा को सीधी राह भी दिखाई है या कहें उसे सीधी राह पर लाई हैं। कहना न होगा कि इतिहास से यह मुठभेड़ ही इन संस्थाओं को राष्ट्रीय/स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा बनाती है। कई विद्वानों ने इस ओर संकेत किया है कि 1857 की लड़ाई में पराजय का मूल कारण यही था कि हमारे पास तब ‘एकता की भाषा’ का अभाव था। संपर्क भाषा के अभाव से भिन्न-भिन्न सूबों के बीच संप्रेषणीयता और संपर्क की कड़ी न जुड़ सकी सो उत्कट उत्साह और उदात्त बलिदानी तेवर के बावजूद हमें ब्रिटिश हुकूमत के सामने हार का मुँह देखना पड़ा। 1857 की इस पराजय के मूल कारण को गांधी जी समझ गए थे। अतः ‘राष्ट्रभाषा आंदोलन’ को उन्होंने अपने रचनात्मक कार्यक्रमों में जगह दी। स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं की स्थापना की। और राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार-प्रसार का काम इन्हें सौंप कर जीवन पर्यंत इनकी निगहबानी और सरपरस्ती करते रहे। गांधी जी की दूरदृष्टि का नतीजा हमारे सामने है। राष्ट्रभाषा हिंदी के माध्यम से एकजुट राष्ट्र के सामने ब्रिटिश साम्राज्य का कभी न डूबने वाला सूर्य (जैसा कि कहा जाता था) अस्ताचल में डूब गया। 

स्वतंत्रता के आंदोलन में खादी और स्वदेशी की तरह ही कौमी ज़बान की आवाज ने भी जन-जन को आंदोलित कर दिया था। स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं के इतिहास में यह सभी कुछ तफ़्सील से दर्ज है। इस तरह की संस्थाओं के लिए यह प्रश्न उठाना कि अब इनकी क्या जरूरत है, आज के प्रबुद्ध वर्ग के दिमागी दिवालियेपन की निशानी ही माना जाएगा। 

राष्ट्रीय एकता, सांस्कृतिक उत्थान और सामाजिक जागरण आज भी राष्ट्रीय स्तर पर ज्वलंत मुद्दे हैं। इनकी सिद्धि में हिंदी भाषा की भूमिका अब और भी प्रबल बन कर उभर रही है। इन बातों को दुहराने की जरूरत नहीं है। बस इतना ही कहना है कि इन तीनेां के लिए जितना प्रयास और संघर्ष ; अनेकानेक प्रकार की कठिनाइयों और अड़चनों के रहते हुए भी; इन संस्थाओं ने किया है - इनकी संभाल की है - इन्हें संभव बनाया है, उसकी कोई और मिसाल नहीं दी जा सकती। किसी संस्थागत ढाँचे का आदर्श स्वरूप उसके राष्ट्रीय, वैश्विक और प्रगतिशील दृष्टिकोण के मद्देनजर ही रचा और परखा जाता है। स्वतत्रंता के पहले यह दृष्टिकोण राष्ट्रीय, भावात्मक एवं सांस्कृतिक एकता को केंद्र में रख कर विकास पा रहा था और आज उसके दृष्टिकोण भारतीय संविधान की उद्देशिका (प्रिएंबल) में निहित ‘राष्ट्र की एकता और अखंडता’ वाले सूत्र से प्रेरणा ग्रहण कर रहे हैं। इन संस्थाओं पर आक्षेप करने वाले चाहे संविधान के भाग 4 क में उल्लिखित नागरिक कर्तव्यों को बिसरा चुके हों पर ये संस्थाएँ इन दस कर्तव्यों में से तीन (ख, ग, च) का पालन इन्हें अपनी सामूहिक जिम्मेदारी मान कर करती चली आ रही हैं - 

(ख) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे ; 

(ग) भारत की प्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण रखे ; 

(च) हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परीक्षण करे। 

कहना यह है कि भारतीय भाषाओं की अस्मिता को राष्ट्रीय अखंडता की रक्षा के लिए, भारत की सामासिक संस्कृति को भाषायी एकता के लिए तथा राष्ट्रीय आंदोलन की गांधीवादी चेतना को भारतीय मूल्यों के प्रसार के लिए अपने भीतर आत्मसात कर लिया है, इन संस्थाओं ने। राष्ट्रीय अखंडता, सामासिक संस्कृति का अनुरक्षण, भाषायी एकता, गांधीवादी चिंतन, भारतीय मूल्य आदि इनके लिए फैशन या नारेबाजी के विषय नहीं है, ये सभी इन संस्थाओं के व्यक्तित्व, इनकी प्रकृति में जज़्ब तत्व हैं। इन संस्थाओं के प्राण-तत्व हैं। यहाँ एक दृष्टांत पर्याप्त होगा कि हिंदी-उर्दू-हिंदुस्तानी के द्वंद्व के, जो बेशक उपनिवेशवादी विकृत मस्तिष्क के षड्यंत्र का नतीजा था, इन संस्थाओं ने ही समाधान ढूँढ़े और निकाले। 

इसमें कोई संदेह नहीं और यह आलोचना अथवा शर्मिंदगी का बायस नहीं कि हिंदी संस्थाओं के लक्ष्य और उद्देश्य दोनों ही कहीं-न-कहीं भावनाओं से प्रेरित रहे हैं। यह स्वाभाविक है क्योंकि भाषा, समाज और संस्कृति के प्रश्न स्वतः ही भावना से आ जुड़ते हैं। हिंदी भाषा - यह तो भावनाओं के उद्वेलन के हमेशा केंद्र में रही है। अपनी जोड़ने की मूल प्रकृति के बावजूद यह तोड़ने का साधन भी बनाई जाती रही है। मैंने अभी हिंदी-उर्दू द्वंद्व की बात की। इसी तरह ब्रज बनाम खड़ी बोली हिंदी, भारतीय भाषाएँ बनाम हिंदी और हिंदी बनाम अंग्रेजी का द्वंद्व खड़ा करके और आम जन की भावनाओं को भड़का कर हिंदी भाषा के स्वाभाविक विकास को कितने आघात लगे, लिखने-बताने की आवश्यकता नहीं है। यदि कहना ही चाहें तो हिंदी अस्मिता चोटिल हुई, कई भारतीय भाषाएँ अकारण हिंदी के विरोध में खड़ी दिखाई देने लगीं, देश बँट गया, ‘हिंदी न लादो’ आंदोलन हिंसक तांडव करने लगा। कहना न होगा कि हिंदी की पहचान को कायम रखने का, बँटवारे के दर्द को बाँटने का और हिंदी विरोधी आंदोलनों को क्रमश: हिंदी सौहार्द में बदलने का काम भी इन्हीं हिंदी संस्थाओं ने किया है, और आज भी कर रही हैं। 

इस चर्चा के बाद भी यदि कोई ‘बुद्धि संपन्न’ व्यक्ति इन संस्थाओं की उपयोगिता या प्रासंगिकता पर प्रश्न-चिह्न लगाता है तो उससे यह पूछना पड़ेगा कि ये प्रश्न तो तभी उठ सकते हैं जब कोई व्यक्ति या संस्था जनता या राष्ट्र के लिए अनुपयोगी या अप्रासंगिक सिद्ध हो चुकी हो। फिर प्रतिप्रश्न यह भी उठता है कि किस दृष्टि से उपयोगी-अनुपयोगी। किस नजरिए से प्रासंगिक-अप्रासंगिक। जनहित और राष्ट्रहित जिन संस्थाओं का आदर्श हो तथा भारतीय भाषाओं के बीच आदान-प्रदान की परंपरा को सुरक्षित रखते हुए राष्ट्रीय एकता की स्थापना जिनका लक्ष्य - उनके लिए हर तरह के प्रश्नचिह्न बचकाने और बे-खयाल ज़हन का ही परिणाम माने जाएंगे। वैसे क्या कहा जाय। हम सभी जान-देख-सुन और पढ़ रहे हैं कि तुलसी और प्रेमचंद ही नहीं, कुछ समय से महात्मा गांधी की प्रासंगिकता पर चर्चा करने को भी प्रबुद्धजनों की एक बड़ी जमात लालायित दिखाई देने लगी है। 

हिंदी भले ही अखिल भारतीय भाषा न हो या न मानी जाय। कोई चाहे तो उसे भारत की प्रमुख संपर्क भाषा भी न माने। एक वर्ग विशेष अपने हठ के चलते चाहे अंग्रेजी को भारत की संपर्क भाषा मनवाने पर तुला हो। पर अखिल भारतीय स्तर पर हिंदी भाषा के सर्वाधिक प्रचलन से कोई इनकार नहीं कर सकता। नकारा इस तथ्य को भी नहीं जा सकता कि भारत की प्रमुख भाषा के रूप में ही वैश्विक स्तर पर हिंदी के पठन-पाठन को महत्व दिया जा रहा है। हिंदी के प्रचलन में मीडिया और हिंदी फिल्मों के योगदान का जिक्र तो हम बढ़-चढ़ कर करते हैं पर हिंदी की स्वैच्छिक संस्थाओं का इस संदर्भ में कोई नाम भी नहीं लेता; लेना चाहिए। और स-तर्क लेना चाहिए। इसमें क्या संदेह कि हिंदीतर भाषा भाषी क्षेत्रों में हिंदी को सहेजने तथा इसके प्रचार-प्रसार का कार्य ये संस्थाएँ बरसों से कर रही हैं। विश्व हिंदी सम्मेलनों के आयोजन की पहल करने में भी हिंदी की एक स्वैच्छिक संस्था ‘राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा’ आगे आई। मैं अपनी संस्था की बात करूँ तो देश-विदेश के शोध-छात्र हमसे संपर्क करने आते हें। हमारे पुस्तकालय का उपयोग करते हैं। हमारे पदाधिकारियों - अध्यापकों से बातचीत रिकार्ड करते हैं। कुछ ही माह पहले जर्मनी से एक शोध-छात्रा चेन्नई आई थी। वह गांधी चिंतन पर काम करते हुए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के जरिए हिंदी आंदोलन के राजनैतिक पहलुओं की पड़ताल करना चाहती थी। वह छात्रा जर्मनी से हिंदी सीख कर भारत आई थी। उसके पास सभा से संबंधित ढेरों जानकारियाँ थीं। हमारी प्रकाशित सामग्री देख कर वह हतप्रभ हो गई थी। यहाँ भारत में किसे पड़ी है कि वह हमारी पत्रिकाएँ पढ़े। किसकी रुचि हमारी पत्रिकाओं की पुरानी फाइलों में है। कितने लोगों ने देखी होंगी हमारी रजत जयंती, स्वर्ण जयंती और हीरक जयंती के अवसर पर प्रकाशित स्मारिकाएँ। वास्तव में यही वे लोग हैं जिनके मन में हिंदी की इन संस्थाओं को लेकर गुबार उठते रहते हैं। 
अब मैं बात दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास की करना चाहूँगा क्योंकि तीस वर्षों से मैं इस संस्था के विभिन्न पदों पर सेवा करता आ रहा हूँ। मेरे देखते-देखते दक्षिण भारत में इस संस्था का प्रसार कई गुना बढ़ा है। हिंदी पढ़ने वालों की संख्या में वृद्धि हुई है। यह संख्या लाखों में पहुँच चुकी है। स्त्री-शिक्षा को प्रोत्साहन मिला है। बच्चे-किशोर हिंदी पढ़ने में रुचि दिखा रहे हैं। हिंदी शिक्षण के द्वारा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा ने सर्व-शिक्षा की धारणा को पुष्ट किया है। हिंदी के माध्यम से भारत की छवि प्रतिबिंबित करने में सभा की पाठ्यपुस्तकों ने मानदंड स्थापित किया है। सभा के प्रकाशन भारतीय भाषाओं के आपसी तालमेल और परस्पर अनुवाद की परंपरा को साक्षात करने वाले हैं। 1964 में स्थापित सभा का विश्वविद्यालय विभाग (उच्च शिक्षा और शोध संस्थान) अपनी नवोन्मेषी दृष्टि के कारण सराहना का पात्र बना है। रोजगारपरक (प्रयोजनमूलक) हिंदी के पाठ्यक्रमों को इसने सबसे पहले एम.ए. स्तर पर प्रारंभ किया। शोध कार्य को नई दिशा दी – व्यतिरेकी भाषा अध्ययन, तुलनात्मक साहित्य, अनुवाद: समीक्षा और मूल्यांकन, हिंदी भाषा का समाजभाषिक - शैलीवैज्ञानिक विश्लेषण आदि कुछ ऐसे क्षेत्र हैं जिन पर शोध कार्य करवा कर संस्थान ने दक्षिण भारत में अपनी अलग पहचान बनाई है। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा आधुनिक प्रौद्योगिकी का सही इस्तेमाल करके अपनी कार्य प्रणाली को सक्षम बनाने में भी पीछे नहीं रही है। और सबसे बड़ी बात यह कि इस संस्था ने शिक्षा के भारतीय स्वरूप को सुरक्षित रखा है। और इससे भी बड़ी बात यह कि यहाँ हिंदी शिक्षण ने जाति-धर्म, ऊँच-नीच, स्त्री-पुरुष का भेद मिटा दिया है। सभा के कार्यकर्ताओं में और विद्यार्थियों में भी स्त्रियों की संख्या पुरुषों की तुलना में कहीं अधिक है। गांधी जी राष्ट्रभाषा हिंदी के महत्व की बात करते समय दक्षिण भारत की स्त्रियों से हिंदी सीखने की विषेष अपील किया करते थे। उनका मानना था कि यदि एक महिला हिंदी सीखेगी तो उसका पूरा परिवार हिंदी के निकट आएगा। लगता है गांधी जी की अपील आज भी दक्षिण भारत की महिलाओं को, लड़कियों को कहीं से प्रेरित करती आ रही है। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के महत् कार्य की बात करते समय यह कहना जरूरी लगता है कि इसने उत्तर-दक्षिण के बीच एक मज़बूत सेतु निर्माण का बीड़ा उठा रखा है। यह संस्था दक्षिण भारत में हिंदी प्रचार का जितना और जैसा काम कर रही है वह निश्चित ही कई सरकारी हिंदी संस्थाएँ मिल कर भी नहीं कर सकतीं। 

कमोबेश हिंदी की सभी संस्थाएँ, खासकर हिंदीतर क्षेत्रों में ; इसी तरह राष्ट्रीय हित में काम कर रही हैं - भाषाओं को जोड़ने का, लोगों को जोड़ने का, देश को जोड़ने का। पर आँखों में खून के आँसू आ जाते हैं इनकी आर्थिक विपन्नता देख कर। आर्थिक सहायता के नाम पर सरकार कुछ ठीकरे इनके सामने फेंक देती है। क्या आप विश्वास करेंगे कि जो हिंदी अध्यापक (प्रचारक) गाँव-गाँव में हिंदी शिक्षण की अलख जगाता है उसे एक हजार रुपये माहवार दिए जाते हैं। जो कार्यकर्ता रात-दिन काम करते हैं, उनका वेतन भी कुछ हज़ार से ज़्यादा नहीं है। जिस विश्वविद्यालय विभाग की चर्चा की गई उसके प्राध्यापकों के लिए आठ हजार, रीडर के लिए बारह हजार और प्रोफेसर के लिए सोलह हजार का अनुदान भारत सरकार प्रदान करती है। इस प्रकार की विपन्नता की स्थिति में भी हिंदी भाषा के लिए विस्तीर्ण कार्य दक्षिण भारत में किया जा रहा है। क्यों उपेक्षा की जा रही है, समझ में नहीं आता। आप देखिए कि कुछ ही बरसों पहले पनपी अन्य हिंदी संस्थाओं और हिंदी के अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय को किस तरह सर आंखों पर बैठाए हुए है सरकार। स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं की दयनीय दशा देख कर कभी-कभी यह सोचने के लिए भी मजबूर होना पड़ता है कि हिंदीतर भाषाभाषी प्रांतों में राष्ट्रभाषा हिंदी के प्रचार और विकास करने का बीड़ा उठाने की सज़ा तो इन संस्थाओं को नहीं दी जा रही है! इन संस्थाओं की ओर सभी पीठ फेरे बैठे हैं। चाहे वे हिंदी के पुरोधा हों, चाहे साहित्य-संस्कृति के अलमबरदार या फिर राष्ट्रीय जनप्रतिनिधि। 

आफ़रीन है इन संस्थाओं को और इनके कार्यकर्ताओं को जो अपनी धुन में हिंदी के लिए निछावर होने का व्रत साधे हुए हैं। जिन्हें आँधी, पानी की कोई परवाह नहीं। गांधी का नाम इनकी ज़बान पर है और बापू के सपने इनकी आँखों में। ये संस्थाएँ धनधान्य में खेलने की न तो इच्छा रखती हैं और न ही इसके लिए हाथ-पैर पटकती हैं। ये अपनी दाल-रोटी में खुश हैं। इन्हें रंज अपनी उपेक्षा का है। जिन्हें देश भर की भरपूर सराहना मिलनी चाहिए थी वे संस्थाएँ तानों और शिकायतों का सामना कर रही हैं। पिछड़ा मान कर इनकी अवहेलना की जा रही है। निश्चित ही बाहरी चमक-दमक का इन संस्थाओं में अभाव है। यहाँ न तो चमचमाते भवन हैं और न ही पाँच सितारा होटलनुमा अतिथि गृह। गांधी की सादगी इनकी आत्मा में बसी है। ये अपना श्रम जानती हैं। श्रम का मूल्य पहचानती हैं। पकी फसल खाने की इनकी आदत नहीं है। इन्होंने हिंदी की ज़मीन गोड़ी और रोपी है कि फसल आने वाली पीढ़ियों को मिल सके। पर अफ़सोस कि इनके कार्यकर्ताओं के पेट जल रहे हैं। 

जो आधुनिक हैं, ‘हिंदी-सेवा’ कर के संपन्न हैं, देश-विदेश में जिन्होंने हिंदी की दुकानें खोल रखी हैं, उनके लिए ये संस्थाएँ दरिद्र हिंदी प्रचारकों की एक भटकी हुई जमात से अधिक कुछ नहीं। ये जब कभी कृपा कर के हमारी संस्थाओं में आते हैं तो इन्हें गांधी के चित्र से, ‘वर दे’ गाने से, दीप-प्रज्वलन से, स्वागत-सम्मान से वितृष्णा होती है कि आज के उत्तर-आधुनिक युग में भी हिंदी के कार्यक्रमों में आप लोग यह सब क्यों करते हैं। इन हार्दिक शिष्टाचारों को वे हमारा पिछड़ापन मानते हैं। उन्हें नहीं मालूम कि हमारी संस्था में उत्तर-आधुनिक साहित्य विमर्श पर ही नहीं, भाषा और भाषाविज्ञान, अनुवाद चिंतन, दूरस्थ शिक्षा के उन अनेक पहलुओं पर गोष्ठियाँ और कार्यशालाएँ होती रहती हैं जिनका नाम भी शायद उन्होंने न सुना होगा। हिंदी की इन संस्थाओं ने आधुनिकता की अंधेरी गलियों में अनंत भटकन के समानांतर एक प्रकाशमान रास्ते का विकल्प हमें दे रखा है। इस रास्ते पर हमारे साथ बहुत ही थोड़े-से लोग चलने को उद्यत होते हैं। बाकी तो इसे एक दिशाहीन, गंतव्यहीन पगडंडी मान कर अपनी गलियों के अंधेरों में ही मगन हैं। 

स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ हिंदीतर राज्यों में द्वितीय भाषा हिंदी के माध्यम से भारतीय संविधान के अनुच्छेद 351 को पोसने वाली अमृत बूँदें हैं। इनके अपने प्रेस हैं। मासिक हिंदी पत्रिकाएँ हैं। ढेरों प्रकाशन हैं। छोटे-छोटे केंद्रों पर भी हिंदी पुस्तकालय हैं। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास में ‘राष्ट्रीय हिंदी पुस्तकालय’ है जहाँ दक्षिण भारत के विश्वविद्यालयों के हिंदी शोध छात्रों का तांता लगा रहता है। ये संस्थाएँ प्रौढ़ शिक्षा का बड़ा केंद्र हैं। हिंदी परीक्षाओं के लिए उम्र का कोई बंधन नहीं है। हिंदी भाषा के माध्यम से ज्ञान-साहित्य का प्रणयन और प्रसार दक्षिण भारत में देख कर प्रारंभ में मैं भी चकित रह गया था। दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास दक्षिण की भाषाओं के वाङ्मय धरोहर का संपादन-प्रकाशन करने में तथा अनूदित सामग्री प्रकाशित करने में अग्रणी है। कोश-कार्य भी स्तरीय हुए हैं - खासकर त्रिभाषा और बहुभाषा कोष। अनुवाद अध्ययन को हम विशेष महत्व दे रहे हैं, अनुवाद करने वालों को भी। हिंदी व्याकरण लेखन और भाषाविज्ञान पर पुस्तकें तैयार करने की आवश्यकता को हमारी सभा शुरू से पहचानती आ रही है। पूरे दक्षिण भारत में इन व्याकरणों को सम्मान मिला है - इनका खूब उपयोग किया जा रहा है। दक्षिण भारत के हिंदी सेवी मुझ जैसे हिंदी भाषियों से जब यह प्रश्न करते हैं कि आप लोग दक्षिण भारत की भाषाएँ सीख कर उनके वाङ्मय का हिंदी में अनुवाद क्यों नहीं करते? या कि हिंदी व्याकरण की तनिक भी जानकारी हासिल करने का प्रयत्न हिंदी मातृभाषाभाषी क्यों नहीं करते? तो बगलें झांकने के सिवा हम कुछ नहीं कर पाते। ये दोनों प्रश्न हिंदी प्रदेश के सभी हिंदी पुरोधाओं से भी पूछे जाने चाहिए कि उनमें से कितनों ने भारतीय भाषाओं से हिंदी में अथवा हिंदी से किसी भारतीय भाषा में अनुवाद किया है? या दक्षिण भारत में हिंदी से और हिंदी में किए गए अनुवाद कार्य की उन्हें जानकारी भी है? और यह भी कि क्या आप हिंदी के ‘बेसिक ग्रामर’ की समझ रखते हैं? कहना न होगा कि तब हिंदी के अधिकतर झंडाबरदार भी बगलें झांकते नजर आएँगे। 

समय के साथ चलने की ललक हिंदी की स्वैच्छिक संस्थाओं में भरपूर है। ये आगे बढ़ने का प्रयास भी कर रही हैं। एक ओर साधनों की कमी ने इन्हें बाँधे रखा है तो दूसरी ओर हिंदी क्षेत्र की निरंतर उपेक्षा से ये दुखी हैं। मुझे बार-बार यह लगता है कि थोड़े-से प्रयास यदि एकजुट हो कर किए जाएँ तो इनकी उपादेयता और भी बढ़ाई जा सकती है। यह पूरे भारत का दायित्व है, इस देश के प्रत्येक व्यक्ति का कि वह अपनी मातृभाषा और अपनी राष्ट्रभाषा के उत्थान, विस्तार और प्रचलन के लिए डट कर इन संस्थाओं के साथ खड़ा हो। दक्षिण भारत में हिंदी की एकमात्र ‘राष्ट्रीय महत्व की संस्था’ में अपने सुदीर्घ अनुभव के आधार पर मैं यह पूरे विश्वास के साथ कह सकता हूँ कि इन संस्थाओं की उपयोगिता को दोबाला करने का एक ही सूत्र है - नव्यता। आधुनिकता, इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि इस शब्द के आज कई भिन्नार्थ (शेड्स) या कहें अनेक प्रत्याख्यान (इंटरप्रेटेशन) तैयार किए जा चुके हैं। नव्यता कई स्तरों पर और कई तरह की चाहिए होगी। इनमें से कुछ के प्रति दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास प्रयत्नशील भी है पर सुविधाओं की कमी और संस्था के कई लोगों के भीतर जड़ जमा चुका यथास्थितिवाद इन प्रयत्नों की अपेक्षित त्वरा को कच्छप गति में बदल देता है। नव्यता के स्तर हैं: 

(1) भाषा, साहित्य, शिक्षण पद्धतियों, शिक्षण सामग्री आदि को अकादमिक विकास के परिप्रेक्ष्य में नए और ताज़े की ओर ले जाने वाले दृष्टिकोण या एप्रोच की नव्यता ; 

(2) हिंदी के द्वितीय भाषा उपभोक्ता की एक सीमा-सी बाँध दी गई है। इस सीमा को तोड़ते हुए हिंदी भाषा की सामयिक भूमिका को पहचान करते हुए ‘बोलचाल की हिंदी’, ‘व्यावहारिक हिंदी’, ‘मीडिया की हिंदी’ जैसे अल्पकालिक कार्यक्रमों अथवा दक्षिण भारतीय भाषाओं के ‘सम्प्रेषणपरक भाषा’ कार्यक्रमों को अधुनातन भाषा शिक्षण प्रविधियों के अनुसार विकसित करने की नव्यता ; 

(3) नवोन्मेषी तथा सतत विकासशील (आधुनिकीकृत) भाषा के रूप में विज्ञापन, बाजार, फैशन, नए उत्पाद, पाक कला में प्रयुक्त हिंदी प्रयुक्तियों (रजिस्टरों) के विश्लेषण तथा उन्हें पाठ्यक्रमों में स्थान देने की नव्यता ; 

(4) पाठ्यक्रमों में सामयिक, आधुनिक और वैश्विक संदर्भों को स्थान देने की नव्यता ; 

(5) प्रवेश प्रक्रिया, परीक्षा प्रणाली तथा मूल्यांकन आदि को वेब-साइट के माध्यम से पारदर्शी बनाने की नव्यता ; 
(6) सभी स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं के बीच परस्पर विचार-विमर्श की अनिवार्यता है। ‘अखिल भारतीय हिंदी संस्था संघ’ के होते हुए भी इन संस्थाओं के बीच अकादमिक अथवा कार्यक्रम केंद्रित सामूहिक बहस, आदान-प्रदान और सहयोग का नितांत अभाव है। नतीजतन हिंदी भाषा के वैश्विक प्रसार एवं विश्व में चल रहे हिंदी कार्यक्रमों को इन संस्थाओं द्वारा मिल सकने वाली अपेक्षित मदद/सहयोग के लिए उपयोगी योजना नहीं बन पा रही है। और इस तरह ‘विश्व में हिंदी’ का ढाँचा, उसकी आवश्यकताओं तथा भारतीय परिवेश में इनकी प्रासंगिकता को नया रूप-संदर्भ दे पाने का लक्ष्य पूरा नहीं हो पा रहा है। 

(7) हिंदी भाषा और साहित्य को लेकर नवीन दृष्टि से पुस्तकें तैयार करना भी इन संस्थाओं का दायित्व है जिसका निर्वाह उन्होंने अपनी स्थापना के साथ ही करना प्रारंभ कर दिया था। कहना न होगा कि इन प्रकाशनों ने हिंदी संबंधी तत्कालीन ज़रूरतों की पूर्ति ही नहीं की, मापदंड भी रचे। पर पिछले कुछ दशकों से यह काम थोड़ा शिथिल पड़ा है। आज यदि ये संस्थाएँ निम्नलिखित दिशा में अपनी रचनाधर्मिता प्रदर्शित कर सकें तो निश्चित ही वे हिंदी भाषा और साहित्य के लिए गंभीर काम कर सकेंगी क्योंकि अनावश्यक बहसों और विमर्शों ने इन गंभीर दायित्वों से हिंदी जगत को छिटका रखा है - 

(क) व्यावहारिक/संप्रेषणपरक हिंदी व्याकरण लेखन (पत्र-पत्रिकाओं, मीडिया और समाजी हिंदी डाटा पर आधारित) 

(ख) वार्तालाप केंद्रित हिंदी का ‘डिस्कोर्स ग्रामर’ लेखन (साहित्यिक कथा-पाठों पर आधारित) 

(ग) ‘हिंदी साहित्य का समेकित इतिहास’ लेखन (जिसमें हिंदीतर क्षेत्रों में मौलिक हिंदी लेखन तथा अनूदित साहित्य का विशेष बल देते हुए समावेश हो) 

(घ) हिंदी की स्वैच्छिक संस्थाओं का इतिहास लेखन (मात्र स्थापना, कार्य एवं प्रकाशन आदि का विवरण या आंकड़ा ही नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक परिवर्तन, स्वतंत्रता आंदोलन और साहित्यिक धाराओं के बदलाव में इनकी भूमिका का रेखांकन) 

(च) हिंदी भाषा विकास को केंद्रीयता प्रदान करते हुए हिंदी का साहित्येतिहास लेखन 

(छ) हिंदी वैयाकरणों के योगदान पर लेखन (जिसमें भिन्न भारतीय भाषाभाषियों तथा विदेशी वैयाकरणों के योगदान पर भी विश्लेषणात्मक टिप्पणी हो) 

(ज) हिंदी भाषाविज्ञान की परंपरा के बहाने हिंदी भाषा की संरचना पर किए गए विवेचनों पर तुलनात्मक लेखन। 

निश्चित ही स्वैच्छिक हिंदी संस्थाएँ इस ऐतिहासिक महत्व के लेखन को संभव बना सकती हैं। इन संस्थाओं के प्रबुद्ध हिंदी सेवी तथा भारत-भर के हिंदीतर क्षेत्रों में कार्य करने वाले ‘रिसोर्स पर्सन्स’ के सहयोग से ये काम योजनाबद्ध और समयबद्ध ढंग से करके हिंदी भाषा के अद्यतन स्वरूप और पुरोधाओं के योगदान को हिंदी जगत के समक्ष रखा जा सकता है और पिछड़ा, पुराना-धुराना, रूढ़िवादी होने का जो आरोप तथाकथित प्रबुद्धजन हमारी संस्थाओं पर लगाते रहते हैं, उन्हें मुँहतोड़ जवाब देकर आगे के इतिहास में इन संस्थाओं का नाम स्वर्णिम अक्षरों में दर्ज कराया जा सकता है। संदेही मानसिकता वालों को यह लग सकता है कि स्वैच्छिक हिंदी संस्थाओं के बस का नहीं है कि वे इन कामों को अंजाम दे सकें। पर हम जैसे लोग जो दक्षिण भारत में गांधी जी द्वारा स्थापित हिंदी संस्था में काम कर रहे हैं, इनकी क्षमता को पहचानते हैं। पिछले तीन-चार दशकों में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास ने जिन दिशाओं की ओर बढ़ने का साहस दिखाया है और असंभव-से लगने वाले काम कर दिखाए हैं, वह उनकी क्षमता, दक्षता, लगन और उत्साह का स्वतः प्रमाण है। 

हिंदी की स्वैच्छिक संस्थाओं की सीमाएँ और कमियाँ भी हैं। एक तो इन्हें सामान्य नियम मानकर अनदेखा भी किया जा सकता है। पर यह प्रवृत्ति ठीक नहीं कि ‘ऐसा तो सभी संस्थाओं या संगठनों में होता है’ कहकर अपना दामन बचा लिया जाय। यदि बड़े-बड़े दायित्वों को हमें अंजाम देना है तो अपनी इन कमियों पर भी हमें आलोचनात्मक और कड़ी दृष्टि रखनी होगी. इन्हें दूर करने के हरसंभव और त्वरित उपाय भी करने होंगे। इस बात को स्वीकारने में कोई संशय नहीं है कि ये संस्थाएँ अपनी-अपनी तरह से हिंदी के प्रचार-प्रसार में लगी हुई हैं पर इनकी गति अपेक्षाकृत धीमी है। हम जो कुछ कर रहे हैं उसे प्रचार माध्यमों से लोगों तक पहुँचाने के प्रति भी हम अधिकतर उदासीन ही दिखाई देते हैं। 

हम जगाने-चेताने वाली भाषा की प्रतिनिधि संस्थाएँ हैं, पर हममें ऊर्जा की कमी है। हमने ढर्रे पर चलने को और लीक न तोड़ने की प्रवृत्ति को अपनी आदत में शुमार कर लिया है। हम नए बनना चाहते हैं, पर हिचकते हुए। ‘हम हिंदी जैसी दरिद्र भाषा की बेचारी संस्थाएँ हैं’ - यह हीन ग्रंथि हमारे कार्यकर्ताओं को भी ग्रसे हुए है। हिंदी को ‘मातृभाषा-अन्य भाषा’ के घेरे से बाहर खींच कर उसे ‘भारतीय भाषा’ कहने, मानने और बनाने की आवाज उठाने में हम संकोच करने लगे हैं। हमारी रगों में हिंदी है लेकिन हमारी आत्मा हिंदी में नहीं है। हिंदी या मातृभाषाओं को पीछे ढकेलने वाले रथों के चक्र को पीछे ढकेलने की जगह हम बस हाथ उठा-उठा कर चिल्ला रहे हैं कि देखो-देखो वे रथ को चढ़ाए आ रहे हैं - चाहे वह अंग्रेजी भाषा के वर्चस्व का रथ हो, चाहे हिंदी-विरोध का, चाहे प्रशासनिक स्तर पर भारतीय भाषाओं की अवहेलना का या चाहे भारतीय भाषाओं की अस्मिता को येन केन प्रकारेण झुठलाने और चुनौती देने का। लगता है कि हमारी जुझारू वृत्ति चुकती-सी जा रही है। इसकी जगह आपसी टकराव की प्रवृत्ति में इजाफा हो रहा है। हिंदी संस्थाएँ एक दूसरे से अलग-थलग रह कर ‘अपनी ढपली अपना राग’ की कहावत को चरितार्थ करने लगी हैं। हम एक जुट हो कर साथ-साथ क्यों नहीं चल सकते? इस अलगाव की वजह से न जाने कितनी कमियाँ आ सिमटी हैं हमारे भीतर. इन सबसे छूटे बिना निस्तार नहीं। हम मिल कर प्रोजेक्ट करें जो भी हमने किया है, या कर रहे हैं तो सही मायनों में अखिल भारतीय स्तर पर हिंदी के गौरव और उसे मिलने वाले सम्मान का स्वतः ही प्रोजेक्शन होगा। फिर कोई भी हमारी ‘पहचान’ को चैलेंज करने का साहस नहीं कर सकेगा। 

हमने बरसों-बरस हिंदीतर भाषी ज़मीन पर हिंदी का पौधा रोपा है। अपनी दीवानगी का खाद-पानी दे कर हमारे पूर्वजों ने इसे सींचा है। क्या इस लहलहा रहे पौधे को हम यों ही सेंत में मुर्झाने देंगे। कदापि नहीं। सीमाएँ कोई ऐसी विकट नहीं हैं जिनसे पार न पाया जा सके। हम इनसे टकराने की शपथ ले लें तो ये कहाँ टिक पाएँगी। संकटों का सामना करने और डट कर संघर्ष करने का इतिहास गवाह है कि ये संस्थाएँ जनता की संपत्ति हैं, धरोहर हैं। उनके प्रेम ने, गांधी और हिंदी में उनके विश्वास ने हिंदी भाषा को ‘हिंदी क्षेत्र’ की सीमा से बाहर निकाल कर सुदूर क्षेत्रों के गाँव-गाँव तक पहुँचा दिया है। हिंदीतर भाषाभाषी आमजन जब हमारे साथ हैं, इन संस्थाओं में उनका विश्वास है, हज़ारो-लाखों की संख्या में जो हिंदी सीखने, हिंदी का काम करने के लिए हमसे जुड़ने को आतुर हैं तब चिंता किस बात की है। 

हाँ, अब वह भी कह देना चाहिए जिसकी वजह से मेरा मन उद्वेलित हुआ। मैं जानता हूँ कि मेरी लेखन-शैली इतनी आक्रामक पहले कभी नहीं हुई है। पर मजबूर हूँ। बहरों को सुनाने के लिए तेज़ आवाज़ में बोलना पड़ा। संयम फिर भी बरता गया है। कुछ ही माह पहले हिंदी के एक स्वनामधन्य मठाधीश दक्षिण भारत की किसी हिंदी संस्था में अपने ‘पधारने’ का किस्सा सुनाते हुए मुँह बिचका कर कह रहे थे - ‘कैसी हैं ये संस्थाएँ। न ढंग की बिल्डिंग, न कैंपस। छोटे-छोटे कमरे, स्कूली बरामदे, हुँह।’ फिर मुझसे पूछा ‘क्या आपके यहाँ का भी यही हाल है?’ मेरे जवाब की परवाह किए बिना अपनी ही रौ में कटाक्ष-भाव से शातिर मुस्कान बिखेरते हुए बोले - ‘चलते समय उस संस्था के अध्यक्ष ने मुझसे पूछा कि आपको कैसा लगा तो मैंने कह दिया कि मुझे तो यही लगा कि ऐसी हिंदी संस्थाओं को आग लगा देनी चाहिए। आज हिंदी कहाँ की कहाँ पहुँच गई है फिर जरूरत क्या है इस प्रचार-फ्रचार की।’ मैंने अब अपनी बात कही संक्षेप में, वही सब जो इस लेख में लिखा है। पर वे तो ठाने हुए थे और हिंदी का भाग्यविधाता होने के अहं में चूर थे। अपनी इस खामखयाली से भी वे पूरी तरह मुतमइन थे कि आज नहीं तो कल ये संस्थाएँ अपनी मौत आप मरेंगी। इन्हें तो खत्म होना ही है। बकने दीजिए उन्हें जो ठीक से हमें जानते भी नहीं। ऐसे अनजानों के प्रलाप पर हम कान भी क्यों धरें। इनकी ओर उपेक्षा भरी नज़रों से देखते हुए गालिब की तरह यही कहेंगे और हमें मिटता देखने की इनकी तमन्ना पर हम भी कटाक्ष करेंगे कि - 

सुना था परखचे गालिब के कल उड़ेंगे मगर
देखने हम भी गए थे प ’ तमाशा न हुआ।

[लेखक प्रतिष्ठित हिंदी भाषा-विज्ञानी, शिक्षाविद् एवं दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास के कुलसचिव हैं........और भाषाविज्ञान/ समाज-भाषाविज्ञान के मेरे गुरु भी.... Posted  to "हिन्दी भारत" By - (डॉ.) कविता वाचक्नवी]

द्रष्टव्य - 

सोमवार, 26 सितंबर 2011

सूर्योदय और सूर्यास्त की फोटोग्राफी : टिप्स व टेक्नीक्स

फोटो कार्यशाला : 11  : लिपि भारद्वाज 

स्वतंत्र वार्त्ता : 26 सितम्बर 2011                                              अनुवाद : सीएमपी अंकल 
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गुरुवार, 22 सितंबर 2011

सहज फोटोग्राफी : सरे-राह चलते-चलते

फोटो कार्यशाला : 10  : लिपि भारद्वाज 

स्वतंत्र वार्त्ता : 19  सितम्बर 2011                                              अनुवाद : सीएमपी अंकल 
!!पढने के लिए कृपया चित्र पर क्लिक करें!! 

सोमवार, 19 सितंबर 2011

कालिदास, सच-सच बतलाना! .....


हर महीने तीसरे रविवार कादंबिनी क्लब [हैदराबाद] की बैठक होती ही है - यथासंभव निरपवाद रूप से. हैदराबाद की कुछ साहित्यिक संस्थाएं बैठकों के रिकार्ड के मामले में बड़ी चौकस हैं और हर बार गिनती बताने की यहाँ परंपरा है. शायद आज की बैठक इस संस्था की २२९ वीं [गलत याद रहा हो तो सुधार लूँगा] मासिक बैठक थी. संयोजिका डॉ. अहिल्या मिश्र कई महीने से शताब्दी-हस्ताक्षरों का भी स्मरण करती आ रही हैं. यह बैठक उन्होंने बाबा नागार्जुन के नाम की थी. डॉ. जी. नीरजा ने बढ़िया परचा पढ़ा और बाबा के काव्य और गद्य के उदाहरण देकर उनकी सामाजिक-राजनैतिक चेतना, उनके व्यंग्यबोध और खास तौर से उनकी बतकही के अंदाज़ को उभारा डॉ. सीता मिश्र, प्रो. अमरनाथ मिश्र और डॉ. अहिल्या मिश्र ने अपनी मैथिल जड़ों के कारण बाबा से अपनी समीपता सिद्ध की. भगवानदास जोपट जी ने संक्षिप्त लेकिन गुथा  हुआ वक्तव्य पढ़ा और कहा कि नागार्जुन हमारी पहचान के लिए अपरिहार्य हैं.

मुख्य अतिथि थे केंद्रीय  हिंदी संस्थान के प्रो. हेम राज मीणा. उन्होंने अत्यंत प्रभावी ढंग से यह प्रतिपादित किया कि देश आज भी गरीबी, भ्रष्टाचार और शोषण के दलदल में गहरे धंसा हुआ है और  नागार्जुन इसी दलदल से लड़ने वाले कवि होने के कारण बेहद-बेहद प्रासंगिक रचनाकार हैं. उन्होंने नागार्जुन के कुछ संस्मरण भी सुनाए. 

जैसा कि पहले से तय था अपुन को मुख्य-श्रोता अर्थात अध्यक्ष की भूमिका निभानी पडी. बोलने का अवसर मिला तो अपुन ने भी नजीबाबाद का संस्मरण सुना डाला जब बाबा ने २९-३०-३१ दिसंबर १९८४ के लेखक शिविर के अवसर पर यह मंत्र दिया था कि अगर चाहते हो कि तेवरी वास्तव में जन आन्दोलन का रूप बने तो झोले में अपना संकलन लेकर देश भर में घूमो और लोगों के सामने अपनी बात रखो. हाँ, इस शिविर में ही बाबा के मुँह से वह कविता सुनने का सौभाग्य मिला था जिसमें वे कालिदास से पूछते हैं - सच सच बतलाना अज रोया या तुम रोए थे.  बाकी अपुन ने छूटे जा रहे पक्ष यानी बाबा के सौंदर्यबोध और व्यापक मानवीय बोध की चर्चा करते हुए उनकी कुछ प्रतिनिधि कविताओं का वाचन भी आम राय से कर डाला.

बाद में अपने लक्ष्मी नारायण अग्रवाल जी के संचालन में देर तक  कवि गोष्ठी चली. मैं जब किसी बैठक में जाता हूँ तो प्रायः अंत तक  [बल्कि अंत के बाद की गप्प गोष्ठी तक] रुकता हूँ; लेकिन आज अधबीच ही अपनी तेवरियाँ सुनाकर चला आया क्योंकि हफ्ते भर से ज्यादा से थोड़ी-थोड़ी देर में खोपड़ी में तेज़ घुमेर सी आ रही है. नहीं, चिंता वाली बात कुछ नहीं  - थोडा आराम करना होगा बस; शायद स्पोंडीलाइटिस प्रकुपित है.  

संपत देवी मुरारका जी ने कुछ फोटो भेज दिए; उन्हें यहाँ सँजोने चला तो यह सब लिखा गया.
बस; आज इतना ही.

[द्रष्टव्य - "कादम्बिनी क्लब की मासिक गोष्ठी आयोजित"]

गुरुवार, 15 सितंबर 2011

हिंदी भाषा के बढ़ते कदम

स्वतंत्र वार्त्ता - 14/15.9.2011 - पृष्ठ ८

पढ़ने के लिए कृपया चित्र पर क्लिक करें.


नामपल्ली हिंदी प्रचार सभा में हिंदी दिवस

स्वतंत्र वार्त्ता ....14 .9 .2011 .....पृष्ठ 3  

दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में हिंदी दिवस

स्वतंत्र वार्त्ता : 15 .9 .2011 : पृष्ठ 16  
वीडियो रिकार्डिंग 

हिंदी-दिवस जनभाषा की गौरव-प्रतिष्ठा का दिन है - डॉ. राधेश्याम शुक्ल


दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में
हिंदी दिवस पर विशेष व्याख्यान संपन्न 


हैदराबाद, १४ सितंबर २०११.

आज यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के अंतर्गत उच्च शिक्षा और शोध संस्थान , बी एड प्रशिक्षण महाविद्यालय तथा हिंदी प्रचारक प्रशिक्षण महाविद्यालय ने संयुक्त रूप से हिंदी समारोह  मनाया जिसके अंतर्गत स्वतंत्र वार्ता के संपादक एवं भाषा चिंतक डॉ. राधेश्याम शुक्ल का विशेष व्याख्यान आयोजित  किया गया.

अपने संबोधन में डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने विस्तार से भारत के भाषा परिदृश्य की व्याख्या करते हुए यह स्पष्ट किया कि हिंदी कोई क्षेत्रीय या साम्प्रदायिक भाषा नहीं है बल्कि ऐतिहासिक दृष्टि से ''हिंदी'' शब्द सभी भारतीय भाषाओँ  का द्योतक  है. उन्होंने  भाषा और संस्कृति के अटूट सम्बन्ध की चर्चा करते हुए यह प्रतिपादित किया कि भारत की संस्कृति संगम-संस्कृति है तथा हिंदी उस को अभिव्यक्त करने वाली संगम-भाषा है.

डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने जोर देकर कहा कि हिंदी-दिवस इस कारण अत्यंत गौरवशाली राष्ट्रीय पर्व है कि इस दिन दुनिया भर में पहली बार किसी जनभाषा को राष्ट्र की  राजभाषा का संवैधानिक दर्ज़ा मिला.उन्होंने हिंदी के व्यापक प्रचार-प्रसार के लिए दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की सेवाओं को अतुलनीय मानते हुए इसके समर्पित हिंदी कार्यकर्ताओं की सराहना की.

समारोह की अध्यक्षता उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के अध्यक्ष प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने की. संपर्क अधिकारी एस के हलेमनी, सचिव डॉ. पी ए राधाकृष्णन , बी एड कालिज की प्राचार्य डॉ. सीता नायुडू तथा प्रचारक प्राचार्य डॉ उमा रानी ने भी छात्रों और शोधार्थियों को संबोधित किया.

आरम्भ में सरस्वती-दीप प्रज्वलित किया गया और छात्राध्यापिकाओं ने मंगलाचरण किया.ए जी श्रीराम , डॉ. साहिरा बानू बोरगल एवं अन्य प्राध्यापकों ने अतिथियों का स्वागत किया.डॉ. बलविंदर कौर ने भारत के गृह मंत्री पी. चिदंबरम के संदेशका वाचन किया.

इस अवसर पर दूरस्थ शिक्षा निदेशालय के सहायक निदेशक डॉ.पेरीशेट्टी श्रीनिवास राव को आंध्र प्रदेश हिंदी अकादमी का युवा हिंदी लेखक  पुरस्कार प्राप्त होने के उपलक्ष्य में सम्मानित भी किया गया. 

समारोह का संचालन डॉ. जी. नीरजा ने तथा संयोजन डॉ. मृत्युंजय  सिंह ने किया.  राष्ट्रगान के साथ समारोह संपन्न हुआ. 


बुधवार, 14 सितंबर 2011

हिंदी भाषा : विकास के विविध आयाम

आपको मालूम ही है कि हिंदीशब्द के कई अर्थ प्रचलित रहे हैं. इसका सबसे सही और व्यापक अर्थ है भारतीय.  जो कुछ भी भारतीय था एक ज़माने में अभारतीयों द्वारा उसे हिंदी कहा जाता था और इसी का एक पहलू यह कि यह शब्द सभी भारतीय भाषाओं का द्योतक था. कालान्तर में यह उस क्षेत्र की उपभाषाओं और १७ बोलियों का सामूहिक नाम बन गया जिसे आज हिंदीभाषी या क्षेत्र कहते हैं. साहित्य में आज भी यही अर्थ व्यवहृत है; लेकिन राजभाषा के रूप में स्वीकृत होने पर इसका अर्थ केवल कौरवी या खड़ी बोली के परिनिष्ठित रूप तक सिमट गया. आज जब भारतवर्ष धर्म, क्षेत्र, भाषा, जाति और नस्ल के नाम पर टुकड़े-टुकड़े होने की  ओर अग्रसर है; यह याद रखना ज़रूरी है कि मूलतः हिंदी शब्द  धर्म, भाषा, जाति और नस्ल से परे समग्र भारतीयता का वाचक है.

यदि साहित्य के इतिहास में मान्यता प्राप्त अर्थ की बात करें तो कहा जा सकता है हिंदी भाषा ने अपनी हजार साल से ज्यादा की यात्रा में अभी तक अनेक पड़ाव पार किए हैंउतार-चढाव देखे हैं. उसकी इस विकास यात्रा की एक बड़ी विशेषता यह रही है कि वह सदा जन की ओर प्रवाहित होती रही है. चाहे बोलियों और भाषाओँ के बीच संपर्क की बात हो, या व्यापार-वाणिज्य और ज्ञान-विज्ञान से लेकर धर्म-अध्यात्म और राष्ट्रीयता की चेतना के अखिल भारतीय प्रसार की बात हो अथवा दक्षिण एशिया के लोगों के आपसी वार्तालाप की बात हो या फिर विश्व भर में फैले भारतवंशियों की भारतीय पहचान की बात हो – हिंदी इन सारी भूमिकाओं को बखूबी निभाती आई है, निभा रही है क्योंकि उसमें जन से जुड़ने की अद्भुत शक्ति विद्यमान है जो उसके लचीलेपन के रूप में सामने आती है.

अपनी जनशक्ति के कारण ही इस भाषा ने लंबी चर्चा के बाद स्वतंत्र भारत-संघ  की राजभाषा का स्थान प्राप्त किया.इसमें संदेह नहीं कि भारतीय संविधान द्वारा प्रस्तुत भाषा-नीति ‘संघीय, लोकतांत्रिक, संतुलित, समावेशी और भाषा-निरपेक्ष’ है जिसमें सभी भारतीय भाषाओं के विकास की संभावनाओं का पूरा ख़याल रखा गया है. १४ सितम्बर १९४९ को भाषा सम्बन्धी प्रावधानों को संविधान सभा ने स्वीकृत किया था और यह तय किया गया था कि १५ वर्ष के भीतर हिंदी को व्यवहारतः उसका संवैधानिक अधिकार दिलाने के लिए आवश्यक प्रयास किए जाएंगे. लेकिन ऐसा हुआ नहीं; इसलिए हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए  राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा ने  सन् १९५३ से संपूर्ण भारत में १४ सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाना शुरू किया. आगे चलकर केंद्र सरकार ने इसे सरकारी कार्यालयों के लिए एक अनिवार्य आयोजन का रूप दे दिया. संविधान लागू होने के १५ वर्ष पूरे होने को आते ही कुछ प्रान्तों में भाषाई राजनीति का ऐसा उबाल आया कि हिंदी के साथ अंग्रेजी को सह-राजभाषा बना दिया गया और हिंदी का विरोध करने वाले राज्यों की सहमति की अनिवार्यता के कारण हिंदी के व्यावहारिक रूप में भारत संघ की राजभाषा बनने की संभावनाओं पर पानी फिर गया. इसलिए हिंदी दिवस के बहाने भाषा-चेतना जगाना आज केवल सरकारी कार्यालयों का कर्मकांड भर नहीं, एक राष्ट्रीय आवश्यकता है. 

14 सितंबर को जब-जब हम हिंदी दिवस मनाएँ तो भारत के संविधान के अनुच्छेद-343 से अनुच्छेद-351 तथा अनुसूची-8  के प्रावधानों का तो खयाल रखें ही, यह भी खयाल रखें कि राजभाषा की यह सारी व्यवस्था भारत की जातीय अस्मिता और सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण बनाए रखने तथा विकसित करने के उद्देश्य से की गई है। इसे केवल सरकारी कामकाज की भाषा तक सीमित रखना उचित नहीं होगा। बल्कि सच तो यह है कि अनुच्छेद-351 के निर्देश के अनुरूप हिंदी का सामासिक स्वरूप राजभाषा की अपेक्षा व्यापक जनसंपर्क, शिक्षा , साहित्य, मीडिया, वाणिज्य, व्यवसाय, ज्ञान  विज्ञान और तकनीकी की   भाषा के रूप में उसके व्यापक व्यवहार द्वारा ही संभव है. विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से यह माँग उठनी चाहिए कि हिंदी का जो संवैधानिक अधिकार लंबे अरसे से लंबिंत या स्थगित पड़ा है, उसे तुरंत बहाल किया जाए। ज़रूरी हो तो इसके लिए न्यायालय की भी शरण में जाया जा सकता है. यदि हिंदी को यह स्थान मिल जाएगा तो  सभी भारतीय भाषाओं को इससे बल मिलेगा तथा परस्पर अनुवाद द्वारा उनके माध्यम से हिंदी भी बल प्राप्त करेगी। मौलिक लेखन के साथ-साथ व्यापक स्तर पर अनुवाद को अपना कर हिंदी को  भूमंडलीय ज्ञान की खिड़की बनाया जा सकता है, अत: इस दिशा में भी  ईमानदारी से प्रयास करने की जरूरत है। तभी हिंदी का वह सामासिक और वैश्विक स्वरूप उभर सकेगा जो भारत ही नहीं, दुनिया भर के किसी भी भाषाभाषी को बरबस अपनी ओर खींच लेगा.

बहुभाषिकता की दृष्टि से भारत संभवतः विश्व भर में सर्वाधिक विविधताओं और विचित्रताओं वाला देश है। हजारों मातृभाषाएँ यहाँ हजारों साल से बोली जाती हैं। भिन्न भाषा भाषियों के बीच परस्पर संवाद के लिए अलग-अलग संदर्भों में कई भाषाएँ संपर्क भाषा का काम करती हैं. भारत की जिस धार्मिक और सांस्कृतिक एकता की प्रायः चर्चा की जाती है उसका आधार संभवतः ऐसी संपर्क भाषा रही होगी जिसके माध्यम से देश भर में पर्यटन, तीर्थाटन और व्यापार-व्यवसाय करने वाले परस्पर विचार-विनिमय करते रहे होंगे. प्राचीन भारत में यह भूमिका संस्कृत ने निभाई  और आधुनिक भारत में यह काम हिंदी कर रही है.यह भी देखा जा सकता है कि जब-जब भारत में कोई  धार्मिक , सामाजिक, राजनैतिक आंदोलन खड़ा हुआ या किसी  लोकनायक ने संपूर्ण देश को एक साथ संबोधित करना चाहा, तब-तब उन आंदोलनों -और लोकनायकों ने उस काल की संपर्क भाषा को अपनाया। यही आवश्यकता  19वीं-20वीं शताब्दी में स्वतंत्रता आंदोलन के नायकों ने अनुभव की और निर्विवाद रूप से हिंदी को व्यापक जनसंपर्क के लिए सर्वाधिक समर्थ भाषा के रूप में पाया और स्वीकार किया। महात्मा गाँधी और उनके समकालीनों ने इसीलिए हिंदी को राष्ट्रभाषा के रूप में प्रतिष्ठा प्रदान की। राजभाषा के रूप में भी हिंदी की प्रतिष्ठा का यही आधार रहा. इसलिए यह आवश्यक है कि हम हिंदी के प्रयोक्ता आपने दैनंदिन व्यवहार से लेकर औपचारिक अवसरों तक पर सर्वत्र हिंदी के व्यवहार को व्यापकतर बनाएँ ताकि उसकी सर्वग्राह्यता बढ़ती रह सके.

स्मरणीय है कि बहुभाषिक समाज में किसी भाषा का संप्रेषण घनत्व सर्वत्र एक जैसा नहीं होता बल्कि एक भाषा क्षेत्र से दूसरे भाषा क्षेत्र के संपर्क में आने के क्षितिजों पर वह काफी बदलता है। फिर भी भारतीय भाषाओं के दो मुख्य परिवारों [इस विषय पर पुनर्विचार अपेक्षित है कि भाषाओँ का आर्य-द्रविड के रूप में नस्ली बंटवारा कितना यथार्थ है और किता मिथ्या!] के जो अनेक रूप उत्तर और दक्षिण में प्रचलित हैं, भाषा संपर्क की प्रक्रिया में उनके बीच काफी लेन-देन होता रहा है। इतना ही नहीं, दोनों वर्गों में संस्कृत से आए अर्थात समस्रोतीय शब्दों का प्रतिशत बहुत बड़ा है समस्रोतीय शब्दों का यह प्राचुर्य यह स्थापित करने के लिए पर्याप्त हो सकता है कि  मूलतः आर्य और द्रविड भाषाएँ सजातीय हैं। इस सजातीयता का एक प्रमाण इन सारी भाषाओं में वर्णमाला की लगभग समरूपता में निहित है। तमिल जैसी सबसे छोटी वर्णमाला में भी हिंदी की भाँति ही स्वर और व्यंजन समान क्रम में हैं तथा व्यंजनों को , , , , वर्गों के क्रम में रखा गया है – भले ही चार-चार ध्वनियों के लिए एक लिपि-चिह्न हो. आधारभूत शब्दावली और वर्णक्रम की यह समानता राष्ट्रभाषा और राष्ट्रलिपि का सुदृढ़ आधार है – सबकी अपनी भाषाओं और लिपियों के समानांतर! राष्ट्रीयता की भावना से प्रेरित  भारतीय जनता व्यापक संपर्क की इन प्रणालियों [संपर्क भाषा और संपर्क लिपि] को सहजतापूर्वक स्वीकार कर सकती है.

आज इक्कीसवीं शताब्दी की भूमंडलीकृत दुनिया में यह तथ्य बहुत महत्वपूर्ण हो गया है कि भारत दुनियाभर के उत्पाद निर्माताओं के लिए एक बड़ा ख़रीदार और उपभोक्ता बाज़ार है। बेशक, हमारे पास भी अपने काफ़ी उत्पाद हैं और हम भी उन्हें बदले में दुनियाभर के बाज़ार में उतार रहे हैं क्योंकि बाज़ार केवल ख़रीदने की ही नहीं, बेचने की भी जगह होता है। इस क्रय-विक्रय की अंतर्राष्ट्रीय वेला में संचार माध्यमों का केन्द्रीय महत्व है क्योंकि वे ही उपभोक्ता के मन में किसी उत्पाद को खरीदने की ललक पैदा करते हैं. यही कारण है कि आज बाज़ार से लेकर विचार तक भूमंडलीकृत मंडी की भाषा का प्रसार हो रहा है तथा मातृबोलियाँ सिकुड़ और मर रही हैं। आज के इस भाषा संकट को इस रूप में भी देखा जा रहा है कि भारतीय भाषाओं के समक्ष उच्चरित रूप भर बनकर रह जाने का ख़तरा उपस्थित है क्योंकि संप्रेषण का सबसे महत्वपूर्ण उत्तरआधुनिक माध्यम टी.वी अपने  विज्ञापनों से लेकर करोड़पति बनाने वाले अतिशय लोकप्रिय कार्यक्रमों तक में हिंदी में बोलता भर है, लिखता अंग्रेज़ी में ही है। इसके बावजूद यह सच है कि इसी माध्यम के सहारे हिंदी अखिल भारतीय ही नहीं बल्कि वैश्विक विस्तार के नए आयाम छू रही है। विज्ञापनों की भाषा और प्रोमोशन वीडियो की भाषा के रूप में सामने आनेवाली हिंदी शुद्धतावादियों को भले ही पच रही हो, युवा वर्ग ने उसे देश भर में अपने सक्रिय भाषाकोश में शामिल कर लिया है। इसे हिंदी के संदर्भ में संचार माध्यम की बड़ी देन कहा जा सकता है। अपनी समावेशी प्रवृत्ति के कारण हिंदी इस तरह अपनी स्वीकार्यता का विस्तार करती दिखाई दे रही है. यहाँ यह ध्यान रखने की बात है कि भाषा-मिश्रण भाषा-विकास का एक चरण भर है, इससे आतंकित होना उचित नहीं. बल्कि हमें खुश होना चाहिए कि हमारी भाषा में नए-नए वैविध्य संभव हो पा  रहे हैं. ध्यान दें तो पता चलेगा कि जहां  एक तरफसाहित्य-लेखन की भाषा आज भी संस्कृतनिष्ठ बनी हुई है वहीं  दूसरी तरफ़ संचार माध्यम की भाषा ने जनभाषा का रूप धारण करके व्यापक जन स्वीकृति प्राप्त की है। समाचार विश्लेषण  तक में कोडमिश्रित हिंदी का प्रयोग इसका प्रमुख उदाहरण है। इसी प्रकार पौराणिक, ऐतिहासिक, राजनैतिक, पारिवारिक, जासूसी, वैज्ञानिक और हास्यप्रधान अनेक प्रकार के धारावाहिकों का प्रदर्शन विभिन्न चैनलों पर जिस हिंदी में किया जा रहा है वह एकरूपी और एकरस नहीं है बल्कि विषय के अनुरूप उसमें अनेक प्रकार के व्यावहारिक भाषा रूपों या कोडों का मिश्रण उसे सहज जनस्वीकृत स्वरूप प्रदान कर रहा है। एक वाक्य में कहा जा सकता है कि संचार माध्यमों के कारण हिंदी भाषा बड़ी तेज़ी से तत्समता से सरलीकरण की ओर जा रही है। इससे उसे अखिल भारतीय ही नहीं, वैश्विक स्वीकृति प्राप्त हो रही है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय तक हिंदी दुनिया में तीसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा थी परंतु आज स्थिति यह है कि वह दूसरी सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा बन गई है तथा यदि हिंदी जानने-समझने वाले हिंदीतरभाषी देशी-विदेशी हिंदी-भाषा-प्रयोक्ताओं को भी जोड़ लिया जाए तो हिदी विश्व की प्रथम सर्वाधिक व्यवहृत  भाषा सिद्ध होगी। हिंदी के इस वैश्विक विस्तार का बड़ा श्रेय भूमंडलीकरण और संचार माध्यमों के विस्तार को जाता है। यह कहना ग़लत होगा कि संचार माध्यमों ने हिंदी के जिस विविधतापूर्ण सर्वसमर्थ नए रूप का विकास किया है, उसने भाषासमृद्ध समाज के साथ –साथ भाषा-वंचित समाज के सदस्यों को भी वैश्विक संदर्भों से जोड़ने का काम किया है। यह नई हिंदी कुछ प्रतिशत अभिजात वर्ग के दिमाग़ी शगल की भाषा नहीं बल्कि अनेकानेक बोलियों में व्यक्त होने वाले ग्रामीण भारत की नई संपर्क भाषा है। इस भारत तक पहुँचने के लिए बड़ी से बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भी हिंदी और भारतीय भाषाओं का सहारा लेना पड़ रहा है।

मीडिया की भाषा और साहित्य की भाषा की तुलना करने से पहले यह जानना जरूरी है कि हमारा  भाषा-प्रयोग  इस बात पर निर्भर करता है कि हम किसे संबोधित कर रहें हैं| जब तक साहित्य और इलेक्ट्रानिक माडिया का लक्ष्य पाठक/श्रोता/दर्शक अलग-अलग रहेगा तब तक उनकी भाषा   भी  अलग अलग रहेगी| साहित्य की अपेक्षा टीवी, सिनेमा और इन्टरनेट के लेखक के सामने अपेक्षाकृत अधिक बड़ा और वैविध्यपूर्ण प्रयोक्ता समाज होता है जिसके लिए इन माध्यमों को तदनुरूप भाषा रूपों का गठन करना पड़ता है| जब मीडिया ऐसा करता है तो शुद्धतावादियों को यह लगने लगता है कि उनकी भाषा को बिगाड़ा जा रहा है| यहाँ यह विचारणीय है  कि किस माध्यम का लक्ष्य प्रयोक्ता  या उपभोक्ता  कौन है| जैसे जैसे यह उपभोक्ता समाज बढता जाता है इसके संस्तर भी  बढते जाते हैं अशिक्षित से लेकर उच्च शिक्षित तक और एक्बोलिभाशी से लेकर बहुभाषाभाषी  तक.| इसीलिए तरह तरह के भाषा वैविध्य सामने आते हैं| इसके अलावा विषय और विधा के अनुरूप भी  मीडिया की भाषा में वैविध्य स्वाभाविक है जैसे मनोरंजनप्रधान  कार्यक्रमों की भाषा ठीक वैसी नहीं हो सकती  जैसी  ज्ञान और सूचना प्रधान कार्यक्रमों की होगीयह कहना कि मीडिया भाषा को खराब कर रहा है कतई गलत है क्योंकि जिसे आप खराब भाषा कह रहे हैं वह भी  किसी वर्ग विशेष को लक्षित करके ही इस्तेमाल की जा रही है तथा उस वर्ग के बीच सम्प्रेषण को संभव बना रही है| दरअसल इलेक्ट्रानिक मीडिया साहित्य की तुलना में बहुत बड़ा मास मीडिया है, वह अपेक्षाकृत अधिक व्यापक जन माध्यम है जिसकी पहुँच उस लोक तक भी है जहां साहित्य के तथाकथित सूर्य की किरणें कभी नहीं पहुँच पातीं| दरअसल  भाषा की भ्रष्टता का मसला अपने अपने चयन  का मसला है| कोई शुद्ध भाषा को चुनता है तो कोई भदेस को| हाँ, इस तथ्य को चिंतनीय माना जाना चाहिए कि कोई अखबार या चैनल षड्यंत्रपूर्वक आपकी भाषा को विदेशी शब्दों से अस्वाभाविक रूप से भर दे| यदि इस तरह अप्राकृतिक भाषा का प्रयोग किया  जाएगा तो धीरे धीरे इसके पाठकों और दर्शकों की संख्या घटती जाएगी| आप जानते हैं कि कोई भी  कार्यक्रम या चैनल अपनी टीआरपी घटाना नहीं चाहता - फिर भला वह ऐसी भाषा का प्रयोग क्यों करने लगा जो उसके लक्ष्य दर्शक को अटपटी और अस्वीकार्य लगे| शुद्ध या तथाकथित साहित्यिक भाषा से परहेज का कारण भी यही है कि उससे इलेक्ट्रानिक मीडिया के बाजार पर कुप्रभाव पड़ता है| बेशक फ़िल्म और टीवी का प्रथम उद्देश्य  बाजार है जबकि साहित्य का प्रथम उद्देश्य आत्माभिव्यक्ति है| इसलिए भी दोनों की भाषा में अंतर दिखाई देना स्वाभाविक है| इसे दो वर्गों की लड़ाई के रूप में देखना बुद्धिमत्ता  नहीं बल्कि राजनैतिक चालबाजी है| इसलिए नकली संघर्ष या संकट की दुहाई देने के बजाय यह इस बात पर विचार करना उपयोगी होगा कि साहित्य और मीडिया किस प्रकार एक दूसरे के सहयोगी हो  सकते हैं| सहयोगी हो भी रहें हैं| जैसे कि तमाम तरह की साहित्यिक कृतियाँ अब इन्टरनेट के माध्यम से उन तमाम लोगों को भी उपलब्ध हो रही हैं जिन्हें वे कल तक उपलोब्ध नहीं थीं| अमेज़न के माध्यम से दुनिया भर में इन्टरनेट के जरिये सबसे अधिक किताबें बिक रही हैं तो यह मीडिया और साहित्य की दुश्मनी का नहीं, दोस्ती का प्रतीक हैं|  दरअसल आप जो भी  लिखते हैं, मीडिया का  हर रूप उसके लिए माध्यम बनता है|  इन्टरनेट ने आपके लेखन को बरसोंबरस डायरी  में कैद रहने से मुक्त कर दिया है और  प्रकाशकों के शोषण से बचने का भी रास्ता निकाला है|  मैं तो कहूँगा  कि साहित्य सृजन और उसके प्रकाशन को अधिक जनतांत्रिक बनाने में इन्टरनेट बड़े काम की चीज़  है| लिखिए, प्रकाशित कीजिए, दुनिया के किसी भी  कोने में बैठे हुए अपने पाठक अथवा विशेषज्ञ  की  राय जानिए, अपने लेखन में संशोधन और परिवर्धन कीजिए, उसे मांजिए, निखारिए . यह सब पहले इतना सहज नहीं था.| मीडिया को साहित्य और भाषा का शत्रु बताने वाले विद्वान् ज़रा ' टेलीग्राफ' में प्रकाशित इस समाचार पर गौर फरमाएँ कि इन्टरनेट के कारण कविता लेखन में भारी उछाल आया हैइस पोएट्री बूम का श्रेय इस तथ्य को जाता है कि इन्टरनेट लेखकों के लिए नए पाठक वर्ग के दरवाज़े खोलता है .ऑनलाइन सक्रिय अनेक ब्लॉग और चर्चा मंच इसके साक्षी हैं|यह भी भाषा-विस्तार का एक पहलू है और इसकी उपेक्षा नहीं की जा सकती क्योंकि यदि आपकी भाषा को कल जीवित रहना है तो उसे आज पूरी तरह कम्प्युटर-साध्य बनना पड़ेगा. कहने की ज़रूरत नहीं कि हिंदी इस यात्रा में निरंतर प्रगति कर रही है.

हिंदी के इस रूप विस्तार के मूल में यह तथ्य निहित है कि गतिशीलता हिंदी का बुनियादी चरित्र है और हिंदी अपनी लचीली प्रकृति के कारण स्वयं को सामाजिक आवश्यकताओं के लिए आसानी से बदल लेती है। इसी कारण हिंदी के अनेक ऐसे क्षेत्रीय रूप विकसित हो गए हैं जिन पर उन क्षेत्रों की भाषा का प्रभाव साफ़-साफ़ दिखाई देता है। ऐसे अवसरों पर हिंदी व्याकरण और संरचना के प्रति अतिरिक्त सचेत नहीं रहती बल्कि पूरी सदिच्छा और उदारता के साथ इस प्रभाव को आत्मसात कर लेती है  . यह प्रवृत्ति हिंदी के निरंतर विकास का आधार है और जब तक यह प्रवृत्ति है तब तक हिंदी का विकास रुक नहीं सकता। बाज़ारीकरण की अन्य कितने भी कारणों से निंदा की जा सकती हो लेकिन यह मानना होगा कि उसने हिंदी के लिए अनुकूल चुनौती प्रस्तुत की। बाज़ारीकरण ने आर्थिक उदारीकरण, सूचनाक्रांति तथा जीवनशैली के वैश्वीकरण की जो स्थितियाँ भारत की जनता के सामने रखी, इसमें संदेह नहीं कि उनमें पड़कर हिंदी भाषा के अभिव्यक्ति कौशल का विकास ही हुआ। अभिव्यक्ति कौशल के विकास का अर्थ भाषा का विकास ही है।

यहाँ यह भी जोड़ा जा सकता है कि बाज़ारीकरण के साथ विकसित होती हुई हिंदी की अभिव्यक्ति क्षमता भारतीयता के साथ जुड़ी हुई है। यदि इसका माध्यम अंग्रेज़ी हुई होती तो अंग्रेज़ियत का प्रचार होता। लेकिन आज प्रचार माध्यमों की भाषा हिंदी होने के कारण वे भारतीय परिवार और सामाजिक संरचना की उपेक्षा नहीं कर सकते। इसका अभिप्राय है कि हिंदी का यह नया रूप बाज़ार सापेक्ष होते हुए भी संस्कृति निरपेक्ष नहीं है। विज्ञापनों से लेकर धारावाहिकों तक के विश्लेषण द्वारा यह सिद्ध किया जा सकता है कि संचार माध्यमों की हिंदी अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ियत की छाया से मुक्त है और अपनी जड़ों से जुड़ी हुई है। अनुवाद को इसकी सीमा माना जा सकता है। फिर भी, कहा जा सकता है कि हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं ने बाज़ारवाद के खिलाफ़ उसी के एक अस्त्र बाज़ार के सहारे बड़ी फतह हासिल कर ली है। अंग्रेज़ी भले ही विश्व भाषा हो, भारत में वह डेढ़-दो प्रतिशत की ही भाषा है। इसीलिए भारत के बाज़ार की भाषाएँ भारतीय भाषाएँ ही हो सकती हैं, अंग्रेज़ी नहीं। और उन सबमें हिंदी की सार्वदेशिकता पहले ही सिद्ध हो चुकी है।

मीडिया की चर्चा के साथ ही यह बात भी विचारणीय है कि वर्तमान वैश्विक परिदृश्य में अनुवाद का महत्व पहले की अपेक्षा कहीं अधिक है. साहित्य के अनुवाद के माध्यम से हम  केवल किसी अन्य भाषा के लेखन से ही परिचित नहीं होते बल्कि उस भाषा समाज की सामजिक-सांस्कृतिक परंपराओं  और विशेषताओं से भी परिचित होते हैं.   अनुवादक किसी भाषा में रचित साहित्य के अर्थ और रूप भर को नहीं बल्कि उसमें निहित मूल्यों और सरोकारों को भी दूसरी भाषा में प्रकट करने का भी दायित्व निभाता है..ऐसा करने के लिए अनुवादक का द्विभाषिक के साथ ही द्वि-सांस्कृतिक होना अपरिहार्य शर्त है. इसलिए हिंदी भाषा के बहु-सांस्कृतिक और सामासिक स्वरुप के गठन में विभिन्न देशी-विदेशी भाषाओं से किये जाने वाले अनुवादों की भी सुनिश्चित भूमिका है जो स्वागतयोग्य है.

मेरी मान्यता है कि राजभाषा क्रियान्वयन का क्षेत्र केवल सरकारी दफ्तरों तक सीमित नहीं है बल्कि शिक्षा , साहित्य और मीडिया से लेकर न्यायपालिका और संसद तक सब कुछ इसके दायरे में आता है. इसमें शक नहीं कि इस दिशा में अभी देश केवल कुछ ही कदम चल पाया है तथा लंबा रास्ता सामने है. लिकिन इतना तो संतोष किया ही जा सकता है कि जनभाषा के साथ ही राजभाषा हिंदी के प्रति भी लोगों में जागरूकता आई है और जैसा कि २०११ के हिंदी-दिवस के आपने संदेश में गृहमंत्री ने बताया है, आज हमारे कर्मचारी राजभाषा कार्यान्वयन के प्रति पूर्णतजागरूक हैं और उन्हें  अपना अधिकाधिक कार्य हिंदी में करने वार्षिक कार्यक्रम के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए प्रेरित और प्रोत्साहित किया जाता है.। यही नहीं बल्कि  कार्यान्वयन के क्षेत्र में प्राप् संतोषजनक स्थिति से प्रेरित होकर सरकार  इस दिशा में प्रयत्नशील है कि कर्मचारियों के मन में हिंदी की ओर एक प्रतिबद्धता का वातावरण पैदा किया जाए ।