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सोमवार, 19 सितंबर 2011

कालिदास, सच-सच बतलाना! .....


हर महीने तीसरे रविवार कादंबिनी क्लब [हैदराबाद] की बैठक होती ही है - यथासंभव निरपवाद रूप से. हैदराबाद की कुछ साहित्यिक संस्थाएं बैठकों के रिकार्ड के मामले में बड़ी चौकस हैं और हर बार गिनती बताने की यहाँ परंपरा है. शायद आज की बैठक इस संस्था की २२९ वीं [गलत याद रहा हो तो सुधार लूँगा] मासिक बैठक थी. संयोजिका डॉ. अहिल्या मिश्र कई महीने से शताब्दी-हस्ताक्षरों का भी स्मरण करती आ रही हैं. यह बैठक उन्होंने बाबा नागार्जुन के नाम की थी. डॉ. जी. नीरजा ने बढ़िया परचा पढ़ा और बाबा के काव्य और गद्य के उदाहरण देकर उनकी सामाजिक-राजनैतिक चेतना, उनके व्यंग्यबोध और खास तौर से उनकी बतकही के अंदाज़ को उभारा डॉ. सीता मिश्र, प्रो. अमरनाथ मिश्र और डॉ. अहिल्या मिश्र ने अपनी मैथिल जड़ों के कारण बाबा से अपनी समीपता सिद्ध की. भगवानदास जोपट जी ने संक्षिप्त लेकिन गुथा  हुआ वक्तव्य पढ़ा और कहा कि नागार्जुन हमारी पहचान के लिए अपरिहार्य हैं.

मुख्य अतिथि थे केंद्रीय  हिंदी संस्थान के प्रो. हेम राज मीणा. उन्होंने अत्यंत प्रभावी ढंग से यह प्रतिपादित किया कि देश आज भी गरीबी, भ्रष्टाचार और शोषण के दलदल में गहरे धंसा हुआ है और  नागार्जुन इसी दलदल से लड़ने वाले कवि होने के कारण बेहद-बेहद प्रासंगिक रचनाकार हैं. उन्होंने नागार्जुन के कुछ संस्मरण भी सुनाए. 

जैसा कि पहले से तय था अपुन को मुख्य-श्रोता अर्थात अध्यक्ष की भूमिका निभानी पडी. बोलने का अवसर मिला तो अपुन ने भी नजीबाबाद का संस्मरण सुना डाला जब बाबा ने २९-३०-३१ दिसंबर १९८४ के लेखक शिविर के अवसर पर यह मंत्र दिया था कि अगर चाहते हो कि तेवरी वास्तव में जन आन्दोलन का रूप बने तो झोले में अपना संकलन लेकर देश भर में घूमो और लोगों के सामने अपनी बात रखो. हाँ, इस शिविर में ही बाबा के मुँह से वह कविता सुनने का सौभाग्य मिला था जिसमें वे कालिदास से पूछते हैं - सच सच बतलाना अज रोया या तुम रोए थे.  बाकी अपुन ने छूटे जा रहे पक्ष यानी बाबा के सौंदर्यबोध और व्यापक मानवीय बोध की चर्चा करते हुए उनकी कुछ प्रतिनिधि कविताओं का वाचन भी आम राय से कर डाला.

बाद में अपने लक्ष्मी नारायण अग्रवाल जी के संचालन में देर तक  कवि गोष्ठी चली. मैं जब किसी बैठक में जाता हूँ तो प्रायः अंत तक  [बल्कि अंत के बाद की गप्प गोष्ठी तक] रुकता हूँ; लेकिन आज अधबीच ही अपनी तेवरियाँ सुनाकर चला आया क्योंकि हफ्ते भर से ज्यादा से थोड़ी-थोड़ी देर में खोपड़ी में तेज़ घुमेर सी आ रही है. नहीं, चिंता वाली बात कुछ नहीं  - थोडा आराम करना होगा बस; शायद स्पोंडीलाइटिस प्रकुपित है.  

संपत देवी मुरारका जी ने कुछ फोटो भेज दिए; उन्हें यहाँ सँजोने चला तो यह सब लिखा गया.
बस; आज इतना ही.

[द्रष्टव्य - "कादम्बिनी क्लब की मासिक गोष्ठी आयोजित"]
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