समर्थक

रविवार, 12 फ़रवरी 2017

(पुस्तक) 'कथाकारों की दुनिया' : आशंसा

कथाकारों की दुनिया/ ऋषभदेव शर्मा 
I.S.B.N. : 978-81-7965-278-7
प्रथम संस्करण, 2017 
पृष्ठ 392, मूल्य : रु. 800
 तक्षशिला प्रकाशन, 98 ए, हिंदी पार्क, दरियागंज, नई दिल्ली - 110002
दूरभाष : 011-43528469, 23258802
ईमेल : info@taxshilabooks.in, taxshilabooks@gmail.com

आशंसा

साहित्य का संसार अपार है - अपार संभावनाओं से भरा हुआ. ये अपार संभावनाएँ साहित्यकार के भीतर निहित होती हैं. इसीलिए लेखक साहित्य-जगत के प्रजापति होते हैं. प्रत्यक्ष जगत का अतिक्रमण करते हुए उनकी नवोन्मेषकारी प्रतिभा अपनी अपनी रुचि का संसार रचा करती है. खास बात यह है कि लेखकों का यह संसार शून्य में नहीं रचा जाता, बल्कि उपलब्ध दुनिया से प्राप्त अनुभवों, अनुभूतियों और संवेदनाओं के साथ लेखक की कल्पना के संयोग से जन्म लेता है. प्रो. ऋषभदेव शर्मा की आलोचना कृति ‘कथाकारों की दुनिया’ के मूल में यही विचार निहित है. 

कवि, समीक्षक और गद्यकार प्रो. ऋषभदेव शर्मा पच्चीस वर्ष से अधिक समय से उच्च स्तरीय भाषा और साहित्य संबंधी अध्यापन एवं शोध निर्देशन से जुड़े हुए हैं. साहित्य की विभिन्न विधाओं के विश्लेषण और मूल्यांकन पर केंद्रित उनके अनेक समीक्षात्मक आलेख एवं शोधपत्र प्रकाशित हैं. काव्य, काव्य समीक्षा, अनुवाद चिंतन और भाषा चिंतन पर उनके मौलिक और संपादित ग्रंथ सुधी पाठकों द्वारा खूब सराहे गए हैं. अब ‘कथाकारों की दुनिया’ के माध्यम से उनका कथा चिंतक रूप समग्रतः सामने आ रहा है. 

‘कथाकारों की दुनिया’ में हिंदी कहानी और उपन्यास साहित्य के विशिष्ट हस्ताक्षरों और उनकी दुनिया का तो विवेचन-विश्लेषण है ही, कुछ प्रमुख तेलुगु कथाकारों की दुनिया की भी एक झाँकी प्रस्तुत की गई है. इसके अलावा तमिल कहानी साहित्य के उद्भव और विकास का लेखा-जोखा प्रस्तुत करने के बहाने आलोचक ने तमिल कथाकारों की दुनिया की भी एक झलक प्रस्तुत की है. इस तरह इस ग्रंथ में हिंदी, तेलुगु और तमिल के मध्य राष्ट्रभाषा के माध्यम से सेतु-रचना का भी स्तुत्य कार्य किया गया है. 

प्रेमचंद ने अपने कथासाहित्य के माध्यम से आदर्शोन्मुख यथार्थ से प्रेरित अपनी दुनिया रची. उनकी इस दुनिया में गाँव और किसान तो हैं ही, अपने समय को चुनौती देती हुईं स्त्रियाँ भी हैं. प्रेमचंद जहाँ एक ओर जिजीविषा और संघर्ष की दुनिया रचते हैं वहीं दूसरी ओर फक्कड़पने से लेकर अमानुषिकता तक के अलग-अलग लोक भी निर्मित करते हैं. जैनेंद्र अपनी दुनिया मनोविश्लेषण के ताने-बाने से बुनते हैं तो अज्ञेय क्षणों के सहारे निजता के द्वीप उगाते हैं. नागार्जुन, फणीश्वरनाथ रेणु, शिवप्रसाद सिंह और रामदरश मिश्र की दुनिया गाँवों और अंचलों की वह दुनिया है जिसकी यातना अनंत है और जिजीविषा असीम. निराला प्रगतिशीलता से लेकर किन्नर और समलैंगिक विमर्श तक की पहली ईंटें रखते हैं तो रांगेय राघव, श्रीलाल शुक्ल, मन्नू भंडारी और भगवान सिंह क्रमशः आदिवासी विमर्श, सत्ता विमर्श, लोकतंत्र विमर्श और जनवाद की शिलाओं से अपनी अपनी दुनिया बनाते हैं. अनामिका, मैत्रेयी पुष्पा, अलका सरावगी, महुआ माजी और अहिल्या मिश्र जैसी लेखिकाएँ स्त्री विमर्श की भींतों पर अपनी दुनिया खड़ी करती हैं तो ओमप्रकाश वाल्मीकि, मोहनदास नैमिशराय, जयप्रकाश कर्दम, श्योराजसिंह बेचैन और मुद्राराक्षस जैसे कथाकार दलितों की अधिकार चेतना और अंबेडकरवाद के सहारे अपनी नई दुनिया का निर्माण करते हैं. बलराम अग्रवाल और सुकेश साहनी अपनी लघुकथाओं में जिस संसार की रचना करते हैं उसके एक सिरे पर लोक और लोकतंत्र है तो दूसरे सिरे पर अतिरंजना और महास्वप्न. अभिप्राय यह है कि अपनी कहानियों और उपन्यासों के माध्यम से हर संवेदनशील कथाकार अपनी रुचि के अनुसार अपनी समानांतर दुनिया का सृजन करता है. प्रस्तुत ग्रंथ में हिंदी के प्रमुख कथाकारों द्वारा रची गई उनकी इसी अपनी दुनिया की प्रामाणिक पड़ताल की गई है. 

बहुत सी कथा कृतियाँ अपनी निजी दुनिया के कारण देश-कालांतरगामी महत्व प्राप्त कर लेती हैं. ’रंगभूमि’, ‘गोदान’, ‘राम-रहीम’, ‘बिल्लेसुर बकरिहा’, ‘कुल्ली भाट’, ‘नदी के द्वीप’, ‘मैला आंचल’, ‘कब तक पुकारूँ’, ‘रागदरबारी’, ‘जल टूटता हुआ’, ‘महाभोज’, ‘अपने-अपने राम’, ‘छप्पर’, ‘कलिकथा : वाया बाईपास’, ‘कही ईसुरी फाग’, ‘अपना पराया’, मरंग गोडा नीलकंठ हुआ’, ‘गणित’, ‘नीम की छाया’, ‘त्रिकाल संध्या’, ‘जय! हिंद की सेना’ जैसे उपन्यास और ‘गुल्लीडंडा’, ‘पूस की रात’, ‘सद्गति’, ‘कफन’, ‘कर्मनाशा की हार’ आदि कहानियाँ कभी उस दुनिया का पता देती हैं जो कथाकार को बनी बनाई मिली है तो कभी उस दुनिया की ओर इशारा करती हैं जिसे कथाकार बनाना चाहता है. आलोचक ने इन दोनों ही दुनियाओं का अच्छे से खुलासा किया है. 

मुझे आशा ही नहीं, बल्कि दृढ़ विश्वास है कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की इस आलोचना कृति को सुधी पाठकों का भरपूर स्नेह और आशीर्वाद मिलेगा. इस ग्रंथ के लिए ‘आशंसा’ लिखना मैं अपना परम सौभाग्य मानती हूँ. 

14 मई, 2016 
                                                                                                               
                                                                                                                 - गुर्रमकोंडा नीरजा 
                                                                                                           उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, 
                                                                                                            दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, 
                                                                                                                  हैदराबाद – 500004. 
एक टिप्पणी भेजें