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शनिवार, 7 नवंबर 2020

'संपादकीयम्' की विस्तृत एवं शोधपूर्ण समीक्षा : प्रो. निर्मला एस. मौर्य

 

संपादकीय टिप्पणियों में सच से वार्तालाप


 

प्रो.निर्मला एस मौर्य

कुलपति

वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय

जौनपुर, उत्तर प्रदेश

 

 

दैनिक समाचारपत्र में संपादकीय पृष्ठ समाचार की अपेक्षा विचार का पृष्ठ होता  है उसमें भी संपादकीय आलेख वाला कालम तो एक प्रकार से अखबार की नाभि ही होता है। इसके अंतर्गत प्रायः दैनंदिन ज्वलंत विषयों पर विश्लेषणात्मक टिप्पणी रहती है। ये टिप्पणियाँ उस अखबार के विचार और सरोकार का भी आईना होती हैं। इसलिए संपादकीय टिप्पणीकार से उम्मीद की जाती है कि वह अपने चारों ओर सजग दृष्टि बनाए रखते हुए अपने  आँख-कान खुले रखे और अपने आसपास होने वाली विभिन्न गतिविधियों पर अपनी बेबाक राय को शब्दबद्ध करता चले। दक्षिण भारत के  एक अग्रणी  दैनिक समाचार पत्र  के लिए डॉ. ऋषभदेव शर्मा द्वारा समय-समय पर लिखे गए संपादकीय इस कसौटी पर खरे तो उतरते ही है; साथ ही इन्हें पढ़कर पत्रकारिता के विद्यार्थी यह भी सीख सकते हैं कि किसी दैनिक के लिए संपादकीय कैसे लिखा जाए। निस्संदेह ये आलेख मात्र शब्दों का खेल नहीं बल्कि आज के समय की पुकार हैं। इन संपादकीयों में एक तीक्ष्णता है, जो पाठकों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित  करती है। समसामयिक संदर्भों में लिखी गई उनकी अनेक टिप्पणियों में से  चुनी गई 61 टिप्पणियाँ उनकी इस क्रम की पहली पुस्तक 'संपादकीयम्' (2019)  में  देखी जा सकती हैं, जो  विषय-वस्तु के रूप में विभिन्न विमर्शों को अपने में समेटे हुए है आठ खंडों में बँटी वैचारिकी स्त्री संदर्भ, लोकतंत्र और राजनीति, जो उपजाता अन्नशहर में दावानल, व्यवस्था का सच, हमारी बेड़ियाँ, अस्तित्व के सवाल और वैश्विक संदर्भ के बहाने पाठक को एक अलग दुनिया में ले जाने में समर्थ है यह दुनिया हम सब की होते हुए भी संपादक की अपनी दुनिया है। तात्कालिक संदर्भ तो बहाना भर हैं, लेखक उनके सहारे अपनी वेदना और संवेदना को मार्मिक अभिव्यक्ति प्रदान करता है। आइए, तनिक संपादक की इस अपनी दुनिया की सैर पर चलें।

 

कहने को तो दुनिया की आधी आबादी स्त्रियों की है, पर क्या उसको वे सब अधिकार मिले हैं, जो पुरुष को मिले। पुराणों में पार्वती को शिव की शक्ति कहा गया तो प्रसाद ने नारी कोनारी! तुम केवल श्रद्धा हो विश्वास रजत- नग पगतल में। पीयूष-स्रोत-सी बहा करो जीवन के सुंदर समतल में ||' कहकर उसका मान बढ़ाया। किंतु इन सबसे अलग हटकर नारी का एक और रूप है जो इन संपादकीय आलेखों में दिखाई देता है। सन 2018 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित नादिया मुराद और डेनिस  मुक्केगे को यह सम्मान विश्व भर में हर तरह  के युद्ध और संघर्ष में हथियार के रूप मेंयौन हिंसाके इस्तेमाल को खत्म करने के प्रयासों के लिए दिया गया। भारत ही नहीं, अपितु यह विश्व की सच्चाई है कि स्त्री कहीं कहीं और किसी किसी रूप में नारकीय यंत्रणा भोगती रही है और भोग रही है। जिस तरह भारत में  हिंदुओं के ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र ये चार वर्ण हैं, इसी तरह हर मुल्क में  जितने भी धर्म हैं, वे अलग-अलग समुदायों में बंटे हुए हैं। इस्लाम धर्म में शिया और सुन्नी समुदाय भी पुन: अनेक समुदायों में बंटे हुए हैं। किसी भी समाज की  वह हर नारी जो अपनी जिजीविषा को कायम रखते हुए आतंक और हिंसा की अग्नि से कुंदन की तरह तपकर बाहर निकलती है, हमेशा एक असाधारण वीरांगना ही होती है। ऐसे बहादुरों के लिए नोबेल पुरस्कार भी छोटे पड़ जाते हैं। मानव तस्करी, सेक्स-स्लेवरी, यौन हिंसा, युद्ध, आतंक, संघर्ष आदि की समस्याओं को उठाता हुआ यह संपादकीय पाठकों के मन में एक बहुत बड़ा प्रश्न छोड़ जाता है और इस्लामिक स्टेट का खौफ़नाक चेहरा सामने लाता है। 'नोबेल शांति पुरस्कार: एक असाधारण वीरांगना को     संपादकीय  खंड 1 : 'स्त्री संदर्भ' का  ऐसा पहला आलेख है, जो पाठकों के मन में इन संपादकीयों को पढ़ने की रुचि जागृत करता है।बोलने वाली औरतें बनाम पुरुष प्रधान समाजएक व्यंग्यपरक संपादकीय है, जिसमें पुरुष प्रधान समाज की सच्चाइयों का रेशा-रेशा खुलकर हमारे सामने जाता है। 2019 मेंमी टूअभियान बड़ी तेजी से चला था, जिसमें समाज के हर वर्ग की महिलाओं के यौन उत्पीड़न की घटनाओं के खुलासों से लोग सच्चाई से रूबरू हो पाए। इस अभियान  से कई बड़े-बड़े लोग भी लपेटे में गए। मीडिया ने भी इसे खूब प्रचारित किया। लेखक तंज कसते हैं- ‘सच तो यह है कि आज भी उन्हें अपने इस बोलने की बड़ी कीमत चुकानी पड़ सकती है। लेकिन फिर भी अब वे साहस (या दुस्साहस?) पूर्वक बोलने लगी हैं और इससे बहुत से चमकीले चेहरों के आवरण उतरने के कारण कुछ कुछ असहजता अवश्य महसूस की जा रही है|’ उन्होंने ऐसी स्त्रियों पर भी तंज कसा है, जो स्त्री देह को सीढ़ी की तरह इस्तेमाल करके अपनी पहचान बनाना चाहती हैं। इस पुरुष प्रधान समाज में आज भी स्त्रियों को खुलकर बोलने की अनुमति नहीं है। जो स्त्रियां खुलकर बोलती हैं उन्हें किसी किसी तरह चुप कराने की कोशिश की जाती है। स्त्रियां जानती हैं कि उन्हें इस स्त्री उत्पीड़न के अभिशाप से मुक्त होना है, इसके लिए प्रयास भी जारी हैं, किंतु आज भी  यह एक गंभीर समस्या  बनी हुई है। इस संपादकीय को पढ़कर मन में एक आशा जगती है कि अब महिलाओं को लोग सहज उपलब्ध सामग्री मानना बंद कर देंगे।

 

आयोग गठित किए जाते हैं लोगों की समस्याओं के समाधान के लिए, किंतु हमेशा से समाज में हर पुरुष स्वयं को आयोग ही समझता रहा है।जबकि हर पुरुष स्वयं आयोग हैमें पुरुष की इसी सोच पर व्यंग्य की स्थिति देखने को मिलती है। संसद में बैठा हुआ सांसद यदि राष्ट्रीय महिला आयोग की तर्ज पर राष्ट्रीय पुरुष आयोग की मांग करता है, तो इससे ज्यादा हास्यास्पद स्थिति और क्या बनेगी? तभी तो लेखक कहते हैं- ‘पत्नी पीड़ित पति संघ की तर्ज पर ऐसे किसी आयोग के गठन की जरूरत महिलाओं द्वारा प्रताड़ना की तुलना में कानून के दुरुपयोग के कारण अधिक महसूस की जा सकती है। अन्यथा किसे नहीं मालूम कि हमारा समाज आज भी घोर पुरुषवादी समाज है तथा अपने वर्चस्व के  दर्प में फूला हुआ हर पुरुष स्वयं  एक-एक आयोग हैजब ऐसी फिजूल समस्याओं के लिए आंदोलन की तैयारी की जाती है, तो इसमें कोई संदेह नहीं कि ऐसे आंदोलन महिला सशक्तीकरण के अभियान को कमजोर करते हैं और कहीं कहीं स्त्री-द्वेषी मानसिकता से प्रेरित दिखाई देते हैं। भारतीय समाज की स्त्रियां प्रतिपल डर-डर कर जीती हैं, इससे हममें से कोई भी इनकार नहीं कर सकता। लेखक का मानना है कि हमारी यह लड़ाई उस मानसिकता के खिलाफ होनी चाहिए जो स्त्री को ढंग से जीने की आजादी नहीं देती और उसकी हर छोटी से छोटी गतिविधि पर रोक लगाने की कोशिश करती है। कभी-कभी स्त्रियां भी कम नहीं होतीं और वे पुरुषों को प्रताड़ित करती हैं, इसमें भी कोई दो राय नहीं, किंतु दोनों ही के पास न्यायालय की शरण में जाने के विकल्प मौजूद हैं। हमारे समाज को ध्यान में रखते हुए, जहां एक  ओर स्त्रियां सहज ही न्यायालय तक नहीं पहुंच पातीं और किसी अन्य का सहारा लेती हैं, वहीं पुरुष बड़े आराम से न्यायालय तक पहुंच जाता है। इसीलिए उसे राष्ट्रीय पुरुष आयोग की कोई आवश्यकता नहीं है और इस बात पर अधिक राजनीति करने की भी आवश्यकता नहीं है। विवाहेतर संबंध केवल भारत की नहीं अपितु पूरे विश्व की एक समस्या है।विवाहेतर संबंध: निजता बनाम नैतिकता’  में बड़ी बेबाकी से  यह प्रश्न उठाया गया है कि क्या संवैधानिक पीठ द्वारा भारतीय दंड संहिता की धारा- 497 को असंवैधानिक मानते हुए रद्द किया जाना उचित है? क्या ऐसा कदम उठाने से समाज में व्यभिचार और विषमताएँ नहीं  फैलेंगीनिजता और नैतिकता में चुनाव करना हो, तो निजता का अधिकार अधिक न्यायसंगत लगता हैजबकि नैतिकता और उसका नियमन कानून का कम तथा सामाजिक संस्कारों का विषय अधिक प्रतीत होता है। जब किसी समाज में स्त्री को पुरुष की संपत्ति माना जाता है, तब ऐसे में विरोध के स्वर उठने स्वाभाविक हैं। कहने को तो पति और पत्नी का दर्जा बराबर होता है, किंतु इस कानून में स्त्री की इच्छा का कोई सम्मान नहीं किया गया स्थिति तब और भी  हास्यास्पद हो जाती है, जब कोई पत्नी पति की अनुमति से परपुरुष से संबंध बना सकती है और यदि ऐसा संबंध पति की इच्छा के बिना बनाया जाता है, तो ऐसा करने वाले को पांच साल की सजा तक का प्रावधान है। इस पूरे संपादकीय में शब्दों और भाषा की  बेबाकी विषय के प्राण तत्व बनकर उभरे हैं। दक्षिण भारत के केरल में  भगवान अय्यप्पा स्वामी का मंदिर  सबरीमलै शबरी के नाम पर है। यह मंदिर 18 पहाड़ियों के बीच में बसा है। इस मंदिर में महिलाओं का आना वर्जित है, जिसके पीछे यह मान्यता है कि श्री अय्यप्पा ब्रह्मचारी थे, इसलिए यहां 10 से 50 साल तक की लड़कियों और महिलाओं को प्रवेश नहीं दिया जाता। इस मंदिर में ऐसी छोटी बच्चियां सकती हैं जिनको मासिक धर्म शुरू हुआ हो, या ऐसी बूढ़ी औरतें जो मासिक धर्म से मुक्त हो चुकी हों।परंपरा के नाम पर भेदभाव कब तकतथासमानता और पूजा-पद्धति के अधिकारों का टकरावइन संपादकीयों में  इसी बात  को बहस का मुद्दा बनाया गया है। लेखक कहते हैं- ‘परंपरा का अर्थ यदि एक पैर जमीन पर जमा कर दूसरे पैर को अगले कदम के रूप में ऊपर उठाने से लगाया जाता है, तो इस  देश की  प्रगतिशीलता और बहुलता का रहस्य समझ में आता है। लेकिन जब परंपरा का अर्थ जड़-रूढ़ियों के पालन तक सिमट जाता है, तो इस देश की लंबी गुलामी के कारणों पर से पर्दा उठता है’  समय के साथ प्रथाओं का बदलना जरूरी होता है अन्यथा वे ताल  के ठहरे पानी की तरह सड़ांध से भर उठती हैं। वे यह भी मानते हैं कि प्रथा या पुरातनता के नाम पर किसी अनुचित नियम को बनाए रखना भारत का स्वभाव नहीं है  उन्होंने लक्षित किया है कि जब  मंदिर में प्रतिबंधित आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश को अनुमति देने से जुड़े मामले पर सर्वोच्च न्यायालय का फैसला आया, तब उस पर राजनीति जमकर की गई। ईश्वर का अपना एक लोक है जिसमें किसी के साथ भेदभाव नहीं होता, जिस दिन तथाकथित समाज के ठेकेदार और स्वयं को ईश्वर का बड़ा भक्त कहने वाले लोग इस बात को समझ लेंगे, उस दिन किसी भी भक्त के अधिकारों का हनन नहीं होगा। ईश्वर के लिए बालक, स्त्री, पुरुष, ऊंच-नीच जैसी स्थितियां कोई मायने नहीं रखतीं। उन्हें तो बस अपने भक्तों से प्रेम होता है।

 

वैसे तो सदैव ही विश्व के पटल पर महिलाओं की स्थिति शोचनीय रही है किंतु भारत जैसे देश में स्त्रियों की स्थिति और भी दयनीय तथा कारुणिक है।सुपौल से बॉलीवुड तक पीड़ित बेटियां’  औरबेटियों के सामने शर्मिंदा एक महादेशमें  जहां एक ओर बिहार के सुपौल जिले के कस्तूरबा गांधी बालिका आवासीय विद्यालय की छात्राओं की निर्मम पिटाई की शर्मनाक घटना का उल्लेख हुआ है, वहीं दुख इस बात का भी होता है कि पिटाई करने वालों में 3 महिलाएं भी शामिल होती हैं। एक ओर यह समाज बेटियों को बचाने-पढ़ाने का नारा लगाता है, तो दूसरी ओर उन्हीं बेटियों पर हर तरह से मानसिक और शारीरिक अत्याचार  करने से भी बाज नहीं आता। इस प्रकार के मानसिक और शारीरिक अत्याचार केवल गाँवों या  कस्बों तक ही सीमित नहीं हैं, बल्कि बॉलीवुड तक में भी इस अत्याचार को महसूस <