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रविवार, 7 अक्तूबर 2018

हिंदी साहित्य का भक्तिकाल : सांस्कृतिक-दार्शनिक परिस्थिति


भक्तिकाल : पृष्ठभूमि : सांस्कृतिक परिस्थिति 

सांस्कृतिक दृष्टि से भक्तिकालीन वातावरण में हिंदू और मुस्लिम संस्कृतियों का आमना-सामना, विरोध और समन्वय घटित हुआ। मध्यकालीन हिंदू संस्कृति में लोक और शास्त्र सम्मत अलग-अलग जीवनधाराएँ विद्यमान थीं, जिनके द्वारा साहिष्णुतामूलक धार्मिक भावना का विकास हुआ। उपनिषद और वेदांत की व्याख्याओं ने अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, केवलाद्वैतवाद, द्वैताद्वैतवाद और शुद्धाद्वैतवाद जैसे मतों को विकसित किया जिनमें ईश्वर को निरपेक्ष मानकर उसकी भक्ति का प्रतिपादन किया गया है। 

भक्तिकाल को विरासत में मध्यकालीन बोध से ग्रस्त एक ऐसी संस्कृति मिली थी जिसमें मानवीय पक्ष को पुनः प्रतिष्ठित करने के लिए परिवर्तन की आवश्यकता थी। आचार्य परशुराम चतुर्वेदी के अनुसार, “इस काल में धर्म साधना की बाढ़ सी आ गई और गुह्य साधनाओं के अंतर्गत कृच्छ्र साधनाएँ भी प्रवेश पा गईं। धर्माचार और ज्ञान-चर्चा की आड़ में पाखंड को प्रश्रय मिलने लगा और समाज में एक प्रकार की अराजकता फैल गई। बाह्याडंबर तथा कर्मकांडीय बाह्य विधान के प्रति व्यंग्य किए जाने लगे।“ 

भक्तिकाल : पृष्ठभूमि : दार्शनिक परिस्थिति : भक्ति आंदोलन 

मध्यकालीन भक्ति आंदोलन भारतीय इतिहास की अन्यतम घटना है जिसने पूरे भारतीय जनमानस को कई शताब्दियों तक प्रभावित किया। इसकी दार्शनिक पृष्ठभूमि के रूप में भारतीय चिंताधारा की पूरी परंपरा विद्यमान है। 8वीं शताब्दी में वेदमत और लोकमत का जो समन्वय हो रहा था उसके कारण संपूर्ण धार्मिक आंदोलन लोकाभिमुख हुआ। एक ओर विहार संस्कृति में पल्लवित बौद्धधर्म का क्रमशः पतन हुआ तथा दूसरी ओर शंकराचार्य ने ज्ञानप्रधान आध्यात्मिक और औपनिषदिक परंपरा का पुनरुत्थान किया। ब्रह्म के साक्षात्कार के इस ज्ञानप्रधान मार्ग के अतिरिक्त आलवार भक्तों द्वारा समर्पणप्रधान भक्ति मार्ग का प्रचार किया गया। दक्षिण के कई आचार्यों ने गीता, उपनिषद और ब्रह्मसूत्र के आधार पर भक्ति के सिद्धांत की स्थापना की। आलवार भक्तों की रचनाओं को 9 वीं शताब्दी के अंत में पुंडरीकाक्ष, पुलकनाथ, लक्ष्मीनाथ और यामुनाचार्य ने आलवार भक्तों की वाणी का प्रचार प्रसार किया। 

उपनिषद, ब्रह्मसूत्र और गीता पर शंकराचार्य के भाष्य के आधार पर प्रतिष्ठित अद्वैतवाद ज्ञानमार्ग का मुख्य सिद्धांत बना। ब्रह्मसूत्र की अलग-अलग व्याख्याओं ने भक्ति मार्ग की अलग-अलग धाराओं को जन्म दिया। रामानुजाचार्य ने ब्रह्मसूत्र का भाष्य करते हुए विशिष्टाद्वैतवाद का प्रतिपादन किया। उन्होंने जीव और जगत को स्वतंत्र होते हुए भी ईश्वर के अधीन माना और दास्य भाव की भक्ति का प्रचार किया। इन्हीं की शिष्य परंपरा में रामानंद हुए। इन्होंने जातिपांति से निरपेक्ष भक्ति का मार्ग सबके लिए खोल दिया तथा राम (ब्रह्म) के निर्गुण और सगुण दोनों रूपों को स्वीकार किया। 

रामानुजाचार्य के अतिरिक्त मध्वाचार्य ने द्वैतवाद और माधुर्यभाव की उपासना का प्रतिपादन किया, जबकि निंबार्काचार्य ने द्वैताद्वैत या भेदाभेदवाद का प्रतिपादन किया। निंबार्काचार्य के मत से जीव, जगत और ब्रह्म एक दूसरे से अलग होते हुए भी तात्विक रूप से अभिन्न हैं, जीव और जगत का अस्तित्व ईश्वर की इच्छा के अधीन है, तथा जीव और ईश्वर का संबंध अंश और अंशी का है। उनके अनुसार कृष्ण परात्पर ब्रह्म हैं। उन्होंने राधा की उपासना पर विशेष बल दिया। राधावल्लभ संप्रदाय और हरिदासी (सखी) संप्रदाय इसी से प्रेरित हैं। 

भक्तिकाल की दार्शनिक पृष्ठभूमि में विष्णु स्वामी के रुद्र संप्रदाय में हुए वल्लभाचार्य के शुद्धाद्वैतवाद का महत्वपूर्ण स्थान है। इसे ब्रह्मवाद भी कहते हैं। वल्लभाचार्य ने शंकराचार्य के मायावाद का खंडन करते हुए ब्रह्म की सर्वव्यापकता स्वीकार की और पुष्टिमार्गीय भक्ति का विकास किया। इसमें भगवत्-अनुग्रह को महत्व प्रदान किया गया तथा श्रीमद् भागवत की नवधाभक्ति (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, पादसेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, सख्य और आत्मनिवेदन) में माधुर्य भाव को जोड़कर दशधा भक्ति का प्रचार किया। 

इन सबके साथ-साथ भक्तिकाल की दार्शनिक पृष्ठभूमि के निर्माण में इस्लाम के एकेश्वरवाद और सूफियों के ‘अनलहक’ का भी प्रभाव द्रष्टव्य है। इस प्रकार हिंदी के संत काव्य, प्रेमाख्यानक काव्य, रामभक्ति काव्य और कृष्णभक्ति काव्य पर अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, द्वैताद्वैतवाद, शुद्धाद्वैतवाद तथा एक सीमा तक इस्लाम का प्रभाव पड़ा।
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