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शुक्रवार, 14 जून 2013

सौम्य, अनाक्रामक और पुरुषार्थी साहित्यकार विष्णु प्रभाकर

शताब्दी संदर्भ

  • मैं ईश्वर में अखंड विश्वास नहीं रखता. मैं तो समझता हूँ, अध्यात्म भी एक खोज है. जिस तरह विज्ञान भौतिक खोज करता है, अध्यात्म पराभौतिक खोज करता है. दोनों और खोज जारी है. उनके प्रश्न जारी हैं – उत्तर तो किसी को मिला नहीं है. – विष्णु प्रभाकर
  • मेरे साहित्य की प्रेरकशक्ति मनुष्य है. अपनी समस्त महानता और हीनता के साथ, अनेक कारणों से मेरा जीवन मनुष्य के विविध रूपों से एकाकार होता रहा और उसका प्रभाव मेरे चिंतन पर पड़ता रहा. कालांतर में वही भावना मेरे साहित्य की प्रेरकशक्ति बनी. त्रासदी में से ही मेरे साहित्य का जन्म हुआ.   – विष्णु प्रभाकर  
  • आजादी से पहले अधिसंख्य लोग देश-प्रेम के कारण ही आंदोलन में भाग लेते थे, लेकिन पेशेवर नेताओं में देश-प्रेम कहाँ? अब कोई भी ऐसा नेता नहीं, जिसे लोग आदर्श मानते हों. फिर भी सांस्कृतिक दृष्टि से भारत एक है. आज भी दक्षिण भारतीय हिमालय की यात्रा करता है और उत्तर का आदमी कन्याकुमारी – रामेश्वरम की. इन यात्राओं में केवल हिंदी का प्रयोग करके काम चलाया जा सकता है. यानी हिंदी जनता की संपर्क भाषा बन चुकी है, राजनीतिज्ञ चाहे कुछ भी कहते रहें. – विष्णु प्रभाकर 


  • अपनी अमर कृति ‘आवारा मसीहा’ (1974) के माध्यम से कालजयी रचनाकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के ग्रंथावतार को संभव बनाने वाले विष्णु प्रभाकर (21 जून, 1912 – 11 अप्रैल, 2009) को भारतीय वाग्मिता और अस्मिता को व्यंजित करने वाला साहित्यकार माना जाता है. एक शताब्दी पहले उत्तर प्रदेश के जनपद मुजफ्फरनगर के एक छोटे से कस्बे मीरांपुर के जिस संयुक्त परिवार में उनका जन्म हुआ वह अपनी एकजुटता के लिए दूर दूर तक जाना जाता था. यहाँ तक कि पेरिस टीवी वाले जब भारत की नारी पर एक फ़िल्म बना रहे थे तो संयुक्त परिवार किस प्रकार रहता है यह दर्शाने के लिए उन्होंने इस परिवार का फिल्मांकन किया था. 
विष्णु प्रभाकर का बचपन लाड़-प्यार में बीता लेकिन किशोरावस्था में उन्हें शिक्षा-दीक्षा के लिए पंजाब में अपने मामा के पास जाना पड़ा. भावुक और अंतर्मुखी प्रकृति के बालक के मन पर माँ से दूर जाने का गहरा असर हुआ. दूसरी ओर कम आयु में बड़प्पन की जिम्मेदारियाँ भी उठाने के कारण उनकी मानसिकता जटिल और परिपक्व होती गई. कुछ विपरीत परिस्थितियों के कारण एक समय ऐसा भी आया कि वे मनुष्य की छाया से भी डरने लगे. ऐसे में स्वाध्याय और लेखन ने उन्हें संभाला. आर्थिक परेशानी के कारण वे कॉलिज तक न पहुँच पाए और आजीविका के लिए उन्हें चपरासी की नौकरी करनी पड़ी. बाद में प्रभाकर परीक्षा उत्तीर्ण करने पर वे विष्णु दयाल/ विष्णु दत्त से विष्णु प्रभाकर बने. संस्कृत में प्राज्ञ और अंग्रेज़ी में बी.ए. भी किया. इस आरंभिक जीवन संघर्ष ने उन्हें मानव चरित्र की जो पहचान दी उसका उपयोग उन्होंने आगे चलकर अपने कथा साहित्य और नाटकों में अत्यंत सफलतापूर्वक किया. बाद में उन्होंने कुछ समय एकाउंटेंट का काम भी किया लेकिन वह उन्हें रास नहीं आया तथा उन्होंने स्वतंत्र लेखन के सहारे जीवन यापन का निर्णय लिया. 1955 -1957 तक वे आकाशवाणी, दिल्ली के नाटक निर्देशक भी रहे. दरअसल आकाशवाणी से जुड़ने पर ही उनका आर्थिक संकट दूर हो पाया.

विष्णु प्रभाकर के लेखकीय व्यक्तित्व के निर्माण में उनके जीवन संघर्ष और स्वाध्याय के अतिरिक्त महात्मा गांधी के चिंतन का भी बड़ा हाथ रहा. वे एक प्रकार से कांग्रेस के साहित्यिक सदस्य थे. इसी प्रकार आर्य समाज का भी उन पर गहरा असर पड़ा. उन्होंने त्याग, बलिदान, समर्पण, हिंदू-मुस्लिम एकता, कमजोर वर्गों के प्रति सहानुभूति आदि नैतिक मूल्यों को अपने साहित्य में भी व्यक्त किया और जीवन में भी अपनाया. 

विष्णु प्रभाकर ने विभिन्न विधाओं में प्रभूत लेखन किया. उन्होंने हिंदी साहित्य को कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, निबंध, एकांकी, यात्रावृत्तांत आदि प्रमुख विधाओं में शताधिक कृतियाँ रचकर संपन्न बनाया. ‘आवारा मसीहा’ पर उन्हें पाब्लो नेरुदा सम्मान और सोवियत भूमि नेहरु पुरस्कार से नवाज़ा गया तो ‘सत्ता के आर-पार’ पर भारतीय ज्ञानपीठ का मूर्तिदेवी पुरस्कार और हिंदी अकादमी, दिल्ली का शलाका सम्मान भी उन्हें प्रदान किया गया. अपनी तरह के अभिनव स्त्रीविमर्शात्मक उपन्यास ‘अर्द्धनारीश्वर’ पर विष्णु प्रभाकर को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ. अभिप्राय यह है कि वे आकाशवाणी, दूरदर्शन, पत्र-पत्रिकाओं और प्रकाशन संबंधी मीडिया के विविध क्षेत्रों में लोकप्रिय हिंदी के ऐसे पूर्णकालिक मसिजीवी रचनाकर थे जिन्होंने स्वयं को साहित्यिक जगत की तमाम तरह की गुटबंदियों से अलग रखा और निरंतर भारतीयता को ध्यान में रखकर साहित्य सृजन किया.

भारतीय समाज की गहरी पहचान के कारण विष्णु प्रभाकर ने यह महसूस किया कि स्त्री को आधुनिक सामाजिक जीवन में समुचित सम्मान प्राप्त नहीं है. इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में स्त्री समस्या को पूरी शिद्दत से उठाया. ‘तट के बंधन’ (1955) में उन्होंने मध्यवर्गीय नारी की समस्याओं का चित्रण किया तो ‘कोई तो’ (1980) और ‘अर्द्धनारीश्वर’ (1992) में स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता और स्त्री मुक्ति के भारतीय स्वरूप पर विचार किया. उनके कथा साहित्य में स्त्री अपने सम्मान के लिए लड़ती नज़र आती है. वे मानते हैं कि पुरुष प्रधान समाज ने नारी की अवमानना की कभी चिंता नहीं की और सदा ही पुरुष के पापों का दंड स्त्री को भोगना पड़ता है. ऐसे में उन्होंने स्त्री-पुरुष के मुक्त आसंग के प्रतिदर्श के रूप में शिव-पार्वती के युगल स्वरूप अर्द्धनारीश्वर की प्रस्तावना की है. 

जीवन मूल्यों के निरंतर ह्रास से विष्णु प्रभाकर बहुत चिंतित दिखाई देते हैं. उन्होंने अपने साहित्य में मानवीय मूल्यों और राष्ट्रीय मूल्यों को व्यापक स्थान दिया. उनके अनुसार जब तक राष्ट्रीय मूल्यों का विकास नहीं होगा तब तक पृथकतावादी ताकतों को पराजित नहीं किया जा सकता. राष्ट्रीय मूल्यों के अभाव के कारण ही सांप्रदायिकता, जातीयता और क्षेत्रीयता को हवा मिलती है. वे मानते हैं कि इन समस्याओं से मुक्ति के लिए छात्रों को बचपन से ही देशभक्ति का पाठ पढ़ाना चाहिए. इसीलिए उन्होंने स्वामी दयानंद सरस्वती, बंकिमचंद्र, सरदार पटेल, शरतचंद्र, काका कालेलकर, शंकराचार्य, रवींद्रनाथ ठाकुर, बाजीप्रभु देशपांडे, भगत सिंह, गुरुनानक, कमाल पाशा, अहिल्या बाई, गोपबंधु दास, गिजु भाई, हारूँ-अल-रशीद और हजरत उमर जैसे महापुरुषों की बालोपयोगी जीवनियाँ भी लिखीं. 

‘आवारा मसीहा’ विष्णु प्रभाकर की साहित्य साधना का सुमेरु है. इसमें उन्होंने शरत की प्रामाणिक जीवनी एक सच्चे समर्पित शोधकर्ता की तरह खोजकर साहित्य की दुनिया के सामने रखी. यह जानना रोचक होगा कि इस रत्न के लिए उन्होंने चौदह बरसों तक साहित्य और समाज की ख़ाक छानी. ‘धर्मयुग’ के हवाले से यह कहना उचित होगा कि विष्णु प्रभाकर ने न केवल शरत के उपन्यासों, कहानियों, नाटकों, निबन्धों और भाषणों के सागर में डुबकियाँ लगाईं, बल्कि उनके जो संबंधी और मित्र मिल सके उनके साथ भेंटवार्ता की तथा उनके पास उपलब्ध शरत के निजी पत्रों का भी अध्ययन किया. इसके लिए उन्होंने बंगाल, बिहार और बर्मा के उन सभी स्थानों की यात्रा भी की जहाँ शरत रहे अथवा गए थे. इस साधना का ही यह परिणाम हुआ कि हिंदी को ‘आवारा मसीहा’ जैसा गौरवग्रंथ मिल सका.

इसमें संदेह नहीं कि विष्णु प्रभाकर ने अपने सृजनकर्म द्वारा संस्कृति, समाज, इतिहास और सभ्यता पर स्थायी प्रभाव छोड़ा है. वे भारतीय साहित्य के एक कालजयी हस्ताक्षर हैं. अत्यंत सौम्य, चारु और अनाक्रामक अतः दुर्लभ व्यक्तित्व के स्वामी विष्णु प्रभाकर का जीवन पुरुषार्थ और स्वावलंबन का उदाहरण है और उनका साहित्य भारत की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक परंपरा का प्रतिबिंब. 
[भास्वर भारत / अप्रैल 2013 / पृष्ठ 37]
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