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बुधवार, 12 जून 2013

अरुंधति रॉय का ‘आहत देश’ : प्रचार का विलक्षण गद्य



अरुंधति रॉय का ‘आहत देश’ 

अरुंधति रॉय (1961) मानवाधिकार कार्यकर्ता के रूप में सुपरिचित बागी लेखिका है. उनका लेखन बड़ी सीमा तक व्यवस्था विरोधी ही नहीं प्रचारात्मक भी है. यही कारण है कि  ‘आहत देश’(2012)  को पढ़ते समय बराबर ऐसा लगता है कि लेखकीय पक्षधरता अपनी सीमाएँ लाँघकर राजनैतिक पक्षधरता अथवा ‘प्रोपेगंडा’ में तब्दील हो गई है. इसमें संदेह नहीं कि अरुंधति रॉय की तर्कप्रणाली विलक्षण है. और उनके गद्य में सम्मोहन है जिसे नीलाभ ने बखूबी हिंदी में उतारने (अनुवाद) में कोई चूक नहीं की है. अत्यंत सक्षम और सफल अनुवाद. 

इसमें संदेह नहीं कि भूमंडलीकरण (भूमंडीकरण) और असंतुलित विकास की झोंक में भारत की संघ और राज्य सरकारों ने पूंजीपतियों, औद्योगिक घरानों और आपराधिक शक्तियों के साथ  हाथ मिलाकर प्रकृति और पर्यावरण का जिस तरह दोहन किया है और आदिवासी जनजातियों को उजाड़कर मुख्यधारा में शामिल करने के नाम पर अव्यवस्था का जो तांडव चलाया हुआ है वह किसी भी प्रकार प्रशंसनीय और स्वीकार्य नहीं है. विस्थापित हो चुके या होने जा रहे आदिवासियों का अपना घर यानी जल, जंगल और जमीन जब उनके हाथ से जा रहा हो तो उनका आवाज उठाना न्यायसंगत है. और किसी भी संवेदनशील कलमकार को उनके पक्ष में खडा होना ही चाहिए. इस दृष्टि से यदि अरुंधति रॉय वंचितों-शोषितों के साथ खड़ी दिखाई दें तो अनौचित्य नहीं. 

लेकिन समस्या यह है कि राजनैतिक प्रतिबद्धता के चलते यदि कोई साहित्यकार जन प्रतिबद्धता और पार्टी प्रतिबद्धता को एक करके देखे तथा देश की व्यवस्था के लिए खतरा बन चुकी शक्तियों के साथ सहानुभूति ही न रखे बल्कि उनके साथ एकजुट दिखे तो कहना होगा कि राष्ट्रीय संदर्भ में उस साहित्यकार की प्राथमिकता का चयन अनौचित्यपूर्ण है. यही कारण है कि ऐसा साहित्य साहित्य कम और हिंसा की राजनीति करने वालों का प्रचार अधिक लगता है. ‘आहत देश’ (Broken Republic : Three Essays) का किस्सा भी यही है.

इस पुस्तक में तीन लंबे निबंध हैं जो मूलतः एक अंग्रेज़ी पत्रिका के लिए लिखे गए थे. पहले निबंध में लेखिका ने चिदंबरम जी की खबर ली है. और ‘ऑपरेशन ग्रीन हंट’ के नाम पर माओवादी कहकर आदिवासियों के सफाये के सरकारी षड्यंत्र का पर्दाफाश किया है. अभिप्राय यह है कि लेखिका यह प्रतिपादित करती हैं कि सरकार विधिवत आदिवासी माओवादी लोगों के खिलाफ सुनियोजित युद्ध चला रही है अतः उन्हें भी आत्मरक्षा के लिए युद्ध का अधिकार है. लेकिन वे आदिवासियों की आड़ में आतंकवादी संगठनों की जनविरोधी और राष्ट्रविरोधी गतिविधियों के बारे में कुछ नहीं कहतीं, न ही यह बतातीं कि इन संगठनों के तार कहाँ कहाँ से जुड़े हैं. एक अन्य (तीसरे) निबंध में चेरुकूरि राजकुमार उर्फ कॉमरेड आजाद की आदिलाबाद के जंगलों में आंध्रप्रदेश राज्य पुलिस द्वारा ह्त्या से जुड़े तथ्यों का विवेचन किया गया है. 

परंतु इस पुस्तक का सबसे रोचक और रोमांचक हिस्सा/ किस्सा इसका मध्य भाग है. इस निबंध का शीर्षक है ‘भूमकाल–कॉमरेडों के साथ’, जिसमें भारत की आतंरिक सुरक्षा के लिए अकेला सबसे बड़ा खतरा माने जाने वाले माओवादी संगठन के लेखिका के दौरे का संस्मरण और रिपोर्ताज की शैली में सचित्र वर्णन है. माओवादियों के असुविधापूर्ण और कष्टों भरे जीवन को देखकर लेखिका ने उनकी जिजीविषा को पहचाना है. और माना है कि ये लोग अपने सपनों के साथ जीते हैं, जबकि बाकी दुनिया अपने दुस्वप्नों के साथ जीती है.

राजनीति अपनी जगह और जल-जंगल-ज़मीन-जीवन की चिंता अपनी जगह. यानी  अरुंधति रॉय को न तो पूरा स्वीकार किया जा सकता है और न पूरा खारिज. उनकी चिंताएँ उत्तरआधुनिक जगत की वे चिंताएँ हैं जो धरती के अस्तित्व से जुड़ी हैं. उनकी व्याख्याएँ उनकी अपनी है जिनसे सहमत होना जरूरी नहीं. 

*आहत देश, 
अरुंधति रॉय, 
अनुवाद – नीलाभ, 
2012, 
राजकमल प्रकाशन, नई दिल्ली, 
पृष्ठ – 183, 
मूल्य – रु. 400/-
'भास्वर भारत'/ जून 2013/ पृष्ठ 52-53
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