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शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

बरनि न जाइ अनीति!


मित्रो! कुछ भले मानुष इस बात को लेकर बड़ी माथापच्ची करने में लगे रहते हैं कि आखिर तुलसी ने अयोध्या पर किसी आक्रमण और राम जन्मभूमि के स्थान पर किसी प्रकार के ध्वंस और निर्माण का उल्लेख क्यों नहीं किया। इससे जुड़े तरह-तरह के प्रष्न उठाए जाते हैं। हमें उनके विस्तार में नहीं जाना है। हमें तो राम के अवतार के प्रयोजन की सारी चर्चा रामजन्मभूमि की मर्यादा के खंडित होने से ही जुड़ी दिखाई देती है। राजा प्रतापभानु को जिस प्रकार षड्यंत्रपूर्वक नष्ट किया गया, हमें तो उसमें भी मध्यकालीन भारत का इतिहास प्रतिबिंबित दिखाई देता है। राजपूत राजाओं को पराजित करने के लिए जिस प्रकार उनसे ईष्र्या करने वालों ने बाहरी शत्रुओं को आमंत्रित किया, तुलसी बाबा ने उसे इस कथा में नियोजित कर दिया -
तेहिं खल जह¡-तह¡ पत्र पठाए। सजि-सजि सेन भूप सब धाए।।
घेरेिन्हं नगर निसान बजाई। बिबिध भा¡ति नित होइ लराई।।
जूझे सकल सुभट करि करनी। बंधु समेत परेउ नृप धरनी।।
सत्यकेतु कुल कोउ नहिं बा¡चा। बिप्र स्राप किमि होइ असा¡चा।।
रिपु जिति सब नृप नगर बसाई। निजपुर गवने जय जसु पाई।।
जाने क्यों हमें इसमें भारत में गुलाम वंष का शासन स्थापित करके मुहम्मद गौरी के अपनी राजधानी को लौट जाने की घटना की ध्वनि सुनाई देती है!
यही नहीं, जब रावण अपने योद्धाओं को दििग्वजय के लिए संबोधित करता है और शत्रुओं को भूखे, शक्तिहीन तथा क्षीण बनाकर अपने वष में करने की नीति बखानता है तो इसमें भी तुलसी के समय की आतंकपूर्ण युद्धनीति की आहटें सुनाई देती हैं। आप एक अयोध्या की बात करते हैं, यहा¡ तो सर्वत्र हाहाकार सुनाई दे रहा है -
करहिं उपद्रव असुर निकाया। नाना रूप धरहिं करि माया।।
जेहि बिधि होइ धरम निमूZला। सो सब करहिं बेद प्रतिकूला।।
जेहिं-जेहिं देस धेनु द्विज पावहिं। नगर गाउ¡ पुर आगि लगावहिं।।
बरनि न जाइ अनीति, घोर निसाचर जे करहिं।
हिंसा पर अति प्रीति, तिन्ह के पापहिं कवनि मिति।।
और क्या प्रमाण चाहिए देष व्यापी ध्वंस का!

- संपादक

मार्च २००८ अंक


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