समर्थक

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

||एतेहु पर करिहहिं जे असंका||

श्रावण शुक्ल पक्ष 7, संवत् 2064 तुलसी जयंती अंक 20 अगस्त, 2007

510 वीं तुलसी जयंती की शुभकामनाएँ

तुलसी जयंती अंक के माध्यम से 'रामायण संदर्शन' एक बार फिर नए संकल्प के साथ आपके सामने आ रहा है। कुछ विषम परिस्थितियों के कारण काफी समय तक इसका प्रकाशन स्थगित रहा, इसके लिए हम क्षमाप्रार्थी हैं।

इस अंक के माध्यम से एक बार फिर तुलसी की सार्वकालिक प्रासंगिकता को रेखांकित करने का प्रयास किया जा रहा है। डॉ. आलोक पांडेय और चंद्रमौलेश्वर प्रसाद के आलेख इसी दृष्टिकोण से सम्मिलित किए गए हैं। यद्यपि तुलसी जैसे लोकनायक रचनाकार की प्रासंगिकता पर प्रश्न उठाना हमारी दृष्टि में बेहद बचकानापन है, तथापि इस पर चर्चा करना बार-बार इसलिए जरूरी लगता है कि यह बचकानापन आए दिन हमारे बुजुर्ग और प्रगतिशील समझे जाने वाले बुद्धिजीवी करते ही रहते हैं। दरअसल इस तरह वे अपने आपको प्रासंगिक बनाने की कोशिश करते हैं, वरना उन बेचारों के सामने अपने स्वयं के अप्रासंगिक होने का खतरा खड़ा हो जाता है। राम और तुलसी या भारतीयता और भारत पर सवाल दागकर वे बेचारे अपनी अस्तित्व-रक्षा कर लेते हैं।

हमारे विचार से तुलसी का जीवन और कृतित्व दोनों ही देशकाल से परे उनकी प्रासंगिकता के सबसे बड़े आधार हैं। उनका जीवन आज भी हमें संघर्ष की सतत प्रेरणा देने वाला शक्तिपुंज है। जब हम यह देखते हैं कि सामान्य से भी निम्नकोटि की सामाजिक-आर्थिक अवस्थाओं में रहने वाला एक असहाय बालक किस तरह गोस्वामी, महात्मा और लोकनायक बना - तो हमें अपने लिए एक ऐसा रोल मॉडल मिल जाता है जो नितांत हमारा अपना है। हमें तो लगता है कि तुलसी की जीवन गाथा का विभिन्न संचार माध्यमों द्वारा जन-जन में व्यापक प्रचार-प्रसार किया जाना चाहिए। इससे नई पीढ़ी में संघर्षशीलता और जीवनमूल्यों के प्रति निष्ठा की जड़ें मजबूत करने में सहायता मिलेगी।

इसी प्रकार तुलसी का कृतित्व तो अपनी प्रासंगिकता में अद्वितीय और कालजयी है ही। यह तुलसीदास की ही विशेषता है कि वे स्वांत: सुखाय रघुनाथ गाथा को सुरसरि सम सब कहँ हित के साथ एकमेक कर देते हैं। यह याद दिलाने की आवश्यकता नहीं है (क्योंकि हम सबको यह सदा याद रहता ही है) कि राम को मर्यादा पुरुषोत्तम के रूप में तुलसी ने ही प्रतिष्ठित किया। तुलसी ने राम के ब्रह्म रूप को भी माना और अवतार रूप को भी। लेकिन इन रूपों की भक्ति करते हुए भी सर्वाधिक महत्व राम के पुरुष रूप को दिया। राम का यह पुरुष रूप पौरुष का चरमोत्कर्ष है। मध्यकाल में भारतीय समाज और संस्कृति की रक्षा के लिए इसी पौरुष की आवश्यकता थी। राम के इस पौरुष में लोक रक्षण और लोक रंजन का अद्भुत समन्वय है जो लोक मंगल का साक्षात बिंब है। तुलसी राम के इसी रूप के समक्ष झुकते हैं - कहा कहौं छवि आज की भले बने हो नाथ /तुलसी मस्तक तब नवै धनुष बाण लो हाथ।

यही कारण है कि चरित लेखन और प्रशंसात्मक उक्तियों से लेकर शोध और समीक्षा तक तुलसी विश्वभर में सबसे अधिक चर्चित हिंदी साहित्यकार हैं। उनकी पाँच जीवनियाँ प्राप्त होती हैं। अनेक उक्तियों में उन्हें आनंद का चलता-फिरता वृक्ष, साहित्याकाश का सूरज-चाँद, देवता, नाग और मनुष्य आदि सभी जातियों की माताओं का वांछित पुत्र तथा पाषाण हृदयों में प्रेम उत्पन्न करने वाला महाकवि कहा गया है। उन्होंने कविता को सार्थकता प्रदान की - बन राम रसायन की रसिका, रसना रसिकों की हुई सफला/अवगाहन मानस में करके, जनमानस का मल सारा टला/बनी पावन भाव की भूमि भली, हुआ भावुक भावुकता का भला/कविता करके तुलसी न लसे, कविता लसी पा तुलसी की कला। (हरिऔध)।

हम यह भी याद दिलाना चाहत हैं कि तुलसी ने केवल विद्वानों, भक्तों और आलोचकों को ही लेखन के लिए प्रेरित नहीं किया है, बल्कि सृजनात्मक साहित्यकारों को भी उनकी जीवनी ने नवीन उद्भावनाओं के लिए आधार प्रदान किया है। तुलसी के नाम, उनके जीवन के विविध प्रसंगों तथा उनकी उक्तियों का प्रयोग सृजनात्मक साहित्य में मिथक की तरह किया जाता है। फिलहाल तो हम केवल ऐसी कुछ कृतियों की चर्चा करना चाहते हैं जिनमें सीधे-सीधे तुलसी को कथ्य बनाया गया है।
आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इतिहास और समीक्षा के अतिरिक्त चिंतामणि के अपने सृजनात्मक निबंधों में तुलसी और मानस पर खासतौर से चर्चा की है। 'तुलसी का भक्ति मार्ग' और 'मानस की धर्म भूमि' इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। शुक्ल जी ने तुलसी में प्रेम और दैन्य का अद्भुत समन्वय दिखाया है। वे बताते हैं कि तुलसी के प्रेम में जहाँ शील, शक्ति और सौंदर्य की लोक कल्याणकारी त्रिवेणी प्रवाहित हो रही है, वहीं उनके व्यक्तित्व और कृतित्व में दैन्य का ऐसा समावेश है कि यह देखकर आश्चर्य होता है कि कोई व्यक्ति इतना उदार और उदात्त कैसे हो सकता है कि अपने दोषों, पापों और त्रुटियों को अत्यंत अधिक परिमाण में केवल देखे और दिखाए ही नहीं, खोलकर वर्णन करे। ऐसी उच्च मनोभूमि की प्राप्ति सरल कार्य नहीं है। यहाँ उल्लेखनीय है कि ऐतिहासिक खोज की धुन में इस तरह के वर्णनों को आत्मवृत्त समझ बैठना ठीक न होगा। शुक्ल जी यह भी बताते हैं कि तुलसी के राम पूर्ण धर्म स्वरूप है और मानस की धर्मभूमि विश्वधर्म है। जब कहीं भी इस विश्वधर्म से गृहधर्म, कुलधर्म, समाज धर्म या लोक धर्म टकराता है तो तुलसी विश्वधर्म का ही चयन करते हैं। यह वह सबसे बड़ा मूल्य है जिस अकेले को अपना कर ही हम आज के विश्व को बाज़ार संस्कृति से मुक्त करके विश्वधर्म की संस्कृति की ओर उन्मुख कर सकते हैं। प्रासंगिकता का सवाल उठाने वालों को अगर इतना भी न दीखे तो उन्हें उजाले के उल्लू ही माना जाना चाहिए।

इस संदर्भ में हमें तीन विशेष साहित्यिक कृतियों की याद आ रही है - सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' की दीर्घ प्रबंधात्मक कविता 'तुलसीदास', रांगेय राघव का लगभग सवा सौ पृष्ठ का जीवनीपरक उपन्यास 'रत्ना की बात' तथा अमृतलाल नागर द्वारा रचित लगभग चार सौ पृष्ठ का उपन्यास 'मानस का हंस' जिसे तुलसी का ग्रंथावतार भी कहा जाता है। 'मानस का हंस' के अंश हम समय-समय पर 'रामायण संदर्शन' में प्रकाशित करते रहे हैं। रामकथा के सुप्रसिद्ध नाट्य रूपांतर 'राधेश्याम रामायण' को भी धारावाहिक रूप से प्रकाशित किया जा रहा है। यह क्रम आगे भी चलता रहेगा। इस अंक में निराला कृत 'तुलसीदास' के कुछ अंश विशेष रूप से सम्मिलित किए जा रहे हैं।

आशा है, इस सबसे तुलसी और मानस पर शंका करने वालों का कुछ-न-कुछ समाधान अवश्य होगा।

वैसे तुलसी बाबा के अपने शब्दों में -
एतेहु पर करिहहिं जे असंका। मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका॥ (बालकांड, मानस)।

- संपादक
20 अगस्त, 2007
एक टिप्पणी भेजें