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सोमवार, 12 अप्रैल 2010

तेलुगु साहित्य का परिवर्तनशील परिदृश्‍य


तेलुगु साहित्य का परिवर्तनशील परिदृश्‍य


निखिलेश्‍वर (1938) तेलुगु साहित्य के दिगंबर कविता (अकविता) आंदोलन के छह प्रवर्तकों में से एक हैं. वे विप्‍लव रचयितल संघम (क्रांतिकारी लेखक संघ) के सक्रिय संस्थापक के रूप में भी जाने जाते हैं तथा मानवाधिकार संस्थाओं से जुडे़ रहे हैं. उनके सात कविता संकलन और पाँच गद्‍य रचनाएँ प्रकाशित हैं. निखिलेश्‍वर ने अन्य भाषाओं से तेलुगु में पाँच पुस्तकों का अनुवाद भी किया है. लंबे समय तक अंग्रेज़ी के अध्यापक रहे. निखिलेश्‍वर का मानना है कि भारतीय भाषाओं के आदान-प्रदान से ही भारतीय साहित्य सुसंपन्न हो सकेगा तथा अंग्रेज़ी द्वारा जो अनुवाद का कार्य चलता रहा, यदि वह हिंदी के माध्यम से फैलता जाए तो, आसानी से हम अपने आपको अधिक पहचान सकेंगे. उन्होंने इसी आशय से समकालीन तेलुगु साहित्य से विभिन्न विधाओं की रचनाओं का समय समय पर हिंदी में अनुवाद किया है. यही नहीं उन्होंने हिंदी की भी अनेक रचनाओं का तेलुगु में अनुवाद किया है. इस प्रकार वे सही अर्थों में अनुवादक के सेतु धर्म का निर्वाह कर रहे हैं.


‘विविधा’ (2009) में निखिलेश्‍वर ने बीसवीं शताब्दी के तेलुगु साहित्य से चुनकर कतिपय प्रतिनिधि कविताओं और कहानियों के साथ एक एक नाटक और साक्षात्कार का अनुवाद हिंदी जगत्‌ के समक्ष प्रस्तुत किया है. इस चयन की उत्कृष्‍टता स्वतः प्रमाणित है क्योंकि अनुवादक ने तेलुगु के श्रेष्‍ठ और सुंदर प्रदेय से हिंदी पाठकों को परिचित कराना चाहा है. यह सारी सामग्री समय समय पर हिंदी की प्रतिष्‍ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित भी हो चुकी है. इस चयन को परिपूर्णता प्रदान करता है स्वयं निखिलेश्‍वर द्वारा लिखित अठारह पृष्‍ठ का प्राक्कथन - "बीसवीं सदी का तेलुगु साहित्य". विगत शती के तेलुगु साहित्य की विकास प्रक्रिया और समृद्धि को समझने के लिए यह प्राक्कथन अत्यंत उपादेय है. इसमें लेखक ने निरंतर आलोचनात्मक दृष्‍टिकोण बनाए रखा है जिस कारण यह चयन तुलनात्मक भारतीय साहित्य के अध्‍येताओं के लिए संग्रह और चिंतन मनन के योग्य बन गया है.


निखिलेश्‍वर का मत है कि तेलुगु साहित्यकार सामाजिक यथार्थ के प्रति अत्यंत सजग रहे हैं तथा पश्‍चिमी साहित्य में जो परिवर्तन 300 वर्षों में हुए, तेलुगु में वे 100 वर्ष में संपन्न हो गए. अभिप्राय यह है कि बीसवीं शती का तेलुगु साहित्य परिदृश्‍य अत्यंत तीव्र गति से परिवर्तित होता दिखाई देता है. समाज सुधारक कंदुकूरी वीरेशलिंगम्‌ ने तेलुगु साहित्यभाषा को सरल बनाने का अभियान चलाया तो कालजयी नाटक ‘कन्याशुल्‍कम्‌’ के रचनाकार गुरजाडा अप्पाराव ने विधिवत व्‍यावहारिक भाषाशैली को साहित्य में प्रतिष्‍ठित किया. दूसरी ओर विश्‍वनाथ सत्यनारायण ने ‘वेयिपडगलु’ (सहस्रफण) जैसे उपन्यास के माध्यम से पुराने समाज का सशक्‍त दस्तावेज पेश किया तो भाव (छाया) वादी कविता ने प्रकृति प्रेम, अमलिन शृंगार और स्वदेशी चिंतन की धार बहायी. महाकवि श्रीरंगम श्रीनिवास राव (श्री श्री) ने ‘महाप्रस्थानम’ द्वारा साम्यवादी विचारधारा और जन आंदोलन से कविता को जोड़ा तो त्रिपुरनेनि ने पौराणिक प्रसंगों को आधुनिक परिप्रेक्ष्य प्रदान किया. इसी प्रकार समालोचना के शिल्प और रसविधान के विश्‍लेषण के आधुनिक प्रतिमान कट्टमंचि रामलिंगा रेड्डी ने स्थापित किए और लगभग तीस वर्ष तक अभ्युदय साहित्य (प्रगतिवाद) तथा साम्यवादी सौंदर्यशास्त्र का बोलबाला रहा. इसके बाद आए विद्रोह को अभिव्यक्‍त करनेवाले दिगंबर कवि और सशस्त्र क्रांति के समर्थक विप्लव [विरसम] कवि. परिवर्तन की तीव्रता को आत्मसात करते हुए तेलुगु साहित्य ने हाशियाकृत समुदायों के स्वर को स्त्री लेखन, दलित लेखन और अल्पसंख्यक मुस्लिम लेखन के माध्यम से बुलंद किया.


भारतीय साहित्य के संदर्भ में तेलुगु की क्रांतिकारी कविता का अपना महत्व है. निखिलेश्‍वर याद दिलाते हैं कि जन संघर्ष से जुडी़ क्रांतिकारी कविता का सिलसिला ऐतिहासिक तेलंगाना किसान सशस्त्र आंदोलन से लेकर सातवें दशक के नक्‍सलवादी और श्रीकाकुलम आदिवासी आंदोलनों के साथ जुड़कर नए प्रतिमानों को कायम करता रहा. उन्होंने आगे बताया है कि जहाँ 'चेतनावर्तनम्‌' ने पुनरुथान की प्रवृत्ति अपनाई वहीं कवि सेना मेनिफेस्टो के साथ प्रकट हुए गुंटूर शेषेंद्र शर्मा ने चमत्कार और क्रांतिकारी आभास की कृत्रिम शैली को स्थापित किया, जबकि सी.नारायण रेड्डी नियोक्लासिकल धारा लेकर आए.


कविता की ही भाँति कहानी और उपन्यास के क्षेत्र में भी ऊपर वर्णित सारी प्रवृत्तियाँ जोरदार ढ़ंग से अभिव्यक्‍त हुईं. ‘मालापल्ली’ (चमारों का गाँव) उन्नव लक्ष्मीनारायण का ऐसा उपन्यास रहा जिसे उसी प्रकार मील का पत्थर माना जाता है जिस प्रकार हिंदी में प्रेमचंद और बंगला में शरत के उपन्यासों को. मनोवैज्ञानिक शिल्प के उपन्यासों में अल्पजीवी (रा वि शास्त्री), ‘असमर्थ की जीवन यात्रा’ (गोपीचंद), ‘अंतिम शेष’ (बुच्चिबाबु), ‘अंपशय्या’ (नवीन) तथा ‘हिमज्वाला’ (चंडीदास) उल्लेखनीय माने गए. परंतु सामाजिक उद्‍देश्‍यपरक उपन्यासों में विशेष रूप से चर्चित हैं - डॉ.केशव रेड्डी रचित ‘अतडु अडविनि जयिंचाडु’ (उसने जंगल को जीता), रामुडुन्नाडु-राज्यमुंडादी (राम है और राज्य भी है), बीनादेवी रचित ‘हैंग मी क्विक’ (मुझे तुरंत फाँसी दो) और अल्लम्‌ राजय्या रचित ‘कमला’ (उपन्यासिका). इन उपन्यासों की खास बात यह है कि इनमें तेलुगु भाषा की आंचलिक बोलियों का प्रयोग किया गया है. केशव रेड्डी रायलसीमा के चित्तूर जिले की बोली का इस्तेमाल करते हैं, बीनादेवी ने तटीय आंध्र की बोली का साहित्य में व्यवहार किया है तो अल्लम्‌ राजय्या ने तेलंगाना की बोली का. राजय्या की उपन्यासिका ‘कमला’ तेलंगाना के सामाजिक और राजनैतिक परिवर्तनों को लेखबद्ध करती है. इसमें दर्शाया गया है कि किस तरह एक बुद्धू सा नौकर किष्‍टय्या सारे रीति रिवाज तोड़कर दमित दलित से क्रांतिकारी में बदल जाता है. तेलंगाना प्रांत के जीवन और भाषा को इस उपन्यास में पढ़ा जा सकता है.


निखिलेश्‍वर ने तेलुगु साहित्य की दलित धारा के शीर्ष पर गुर्रम्‌ जाषुवा को स्थापित किया है जिन्होंने मेघदूत की भाँति उल्लू के माध्यम से संदेश भिजवाया है. उनके काव्य ‘गब्बिलम्‌’ (चमगादड) में निहित यह संदेश किसी यक्षिणी का प्रेमसंदेश नहीं है बल्कि दलितों की दुर्गति का शोकसंदेश है जो संदेशकाव्य में अपनी तरह का इकलौता प्रयोग है. तेलुगु के दलित साहित्यकार विगत इतिहास के साहित्य में निहित तथाकथित ब्राह्‍मणवाद को उखाड़कर दलित जातियों की मौलिक संस्कृति को आधार बनाने के लिए संकल्‍पित हैं. उनका यह संकल्प सभी विधाओं में प्रकट हो रहा है. स्त्री लेखन और अल्पसंख्यक मुस्लिम लेखन ने भी बीसवीं शती के तेलुगु साहित्य में अपनी अलग पहचान कायम की हैं. स्त्री लेखन जहाँ पुरुष घमंड को छेदने में कामयाब रहा है वहीं मुस्लिम लेखन ने मुस्लिम समाज के भीतरी अंतर्विरोध और शेष समाज के साथ अपने संबंधों का खुलासा किया है. अन्य विधाओं की तुलना में निखिलेश्‍वर को तेलुगु की आलोचना विधा कमजोर प्रतीत होती है.


निखिलेश्‍वर ने एक बेहद जरूरी सवाल उठाया है कि उत्तर आधुनिक कहे जानेवाले पिछले तीस वर्षों के साहित्यिक आंदोलनों में राष्‍ट्रीयता की अभिव्यक्‍ति किस हद तक है ? उन्हें लगता है कि विभिन्न भारतीय भाषाओं में उभरे इन विद्रोही आंदोलनों से जुडे़ साहित्यकार राष्‍ट्रीयता के प्रश्‍न को प्रायः नगण्य मानकर चलते हैं और मानवता को अपने अक्षरों द्वारा खोजना चाहते हैं. यदि ऐसा है तो यह सचमुच चिंता का विषय है क्योंकि राष्‍ट्र की उपेक्षा करके जिस मानवता का हित साधन ऐसा साहित्य करना चाहता है उसके राष्‍ट्रीय और सांस्कृतिक मूल्य क्या होंगे , यह स्पष्‍ट नहीं है. क्या ढेर सारे उछलते हुए मेंढ़कों को एक टोकरी में भर देने भर से भारतीयता सिद्ध हो जाती है ? लेकिन फिलहाल यहाँ यह प्रश्‍न उपस्थित नहीं है. उपस्थित है तेलुगु की विभिन्न विधाओं का प्रतिनिधि चयन ‘विविधा’ जिसमें 24 कविताएँ, 4 कहानियाँ, 1 नाटक और 1 साक्षात्कार शामिल हैं.


अंततः जिंबो की एक कविता ‘हमारी नहर’ पाठकों के आत्म विमर्श हेतु प्रस्तुत है जो यह दर्शाती है कि कैसे एक हँसता गाता गाँव अपनी अस्मिता की तलाश में रणक्षेत्र बनने के लिए बाध्य हो जाता है -

"हमारी नहर -

अध्यापक की बेंत की मार से /
आँख से टपक कर गालों पर फिसल कर, /
सूखने वाले आँसुओं की धार जैसी, /
बंजर बने खेत जैसे /
गन्ने की मशीन के पास पडे़ निचोडे़ गए कचरे /
बेजान सूखे साँप जैसी /
आज हमारी नहर है. /
पता नहीं कैसी अजीब बात है /
इस पुल के बनने के पहले /
हमारी नहर सोलहवें साल जवानी जैसी /
तेज़ बह जाती थी /
हमारे बतकम्मा फूलों को सिर पर सँवारे निकलती थी /
तैरने के लिए अ आ ई सिखाती थी /
हमारी गंदी नालियों को फिल्टर करती बह जाती थी /
अब हमारी नहर की साँस में गूंगापन /
हमारी नहर की चाल में लंगडा़पन /
पोखर की चारपाई के आधार पर /
लटके बूढे़पन की भाँति /
रह गई है हमारी नहर."
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* विविधा (समकालीन तेलुगु साहित्य की विभिन्न विधाओं का विशिष्‍ट संकलन) /

चयन एवं अनुवाद निखिलेश्‍वर / 2009 /

क्षितिज प्रकाशन,
वी - 8, नवीन शाहदरा, दिल्ली - 110 032 /
पृष्‍ठ - 144 /
मूल्य - रु.220 /-

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