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शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

नरक ही नरक



नरक ही नरक


बसंत जीत सिंह हरचंद(१९४१) को प्रायः कवि के रूप में पहचाना जाता है. उनके कई कविता संग्रह प्रकाशित हैं - अग्निजा , समय की पतझड़ में, श्वेत निशा, आ गीत काते री, घुट कर मरती पुकार, गीति बांसुरी बजी अरी और चल शब्द बीज बोयें. लेकिन वे समय समय पर कहानियाँ भी लिखते रहे हैं.विशेष रूप से १९६० से १९७० के बीच. इधर उनकी १४ कहानियो का संकलन प्रकाशित हुआ है - 'नरक है'(२००८). संकलित कहानियां हैं - शब्दों से बंधा 'में', अग्नि-प्रसंग, कलह, खंडहर की एक रात, वत्सला, बेशर्म, कीचड का हंस, समर गाथा, अन्तर्द्वन्द्व, भेडिया, अनुदित सूरज, पराये घर में, आतंक से जूझते हुए.



संग्रह की शीर्ष कहानी 'नरक है' में गरीबी और भूख के नरक की हृदय विदारक तस्वीर खींची गई है. माडू मरणान्तक श्रम करने के बावजूद जब एक वक्त की रोटी का जुगाड़ नहीं कर पता तो बीरो किसी शायर की ग़ज़ल के विचार को सार्थक करती हुई रात भर पतीले में आलू के आकार के पत्थर उबालती है और भूख से बिलबिलाते बच्चों को मार-पीट कर शांत करती रहती है. यह एक नरक है. एक नरक वह है जहाँ प्यास से तड फडाता हुआ माडू पोखर पर पेट के बल लेट कर चादर से छान कर पानी पीता है, कृपाण की तरह दराती चलाता है पर मजदूरी नहीं पाता और उधार के कंगनी के चावल की पोटली से भी तब हाथ धो बैठता है जब कीचड को फांदते फांदते पत्थर से ठोकर खा कर घायल हो जाता है. एक नरक और है जो इस सब से भयानक है, और अमानुषिक भी . माडू का बाप मर जाता है. माँ चीत्कार करती रहती है. बेटा घर की इकलौती रजाई को शव पर से खसोट कर ओढ़ कर सो जाता है. रात में चूहे शव की आंखों की पुतलियाँ निकाल कर ले जाते हैं. और भी कई नरक है इस कहानी की वैतरणी में. अमानुष यथार्थ अपनी पूरी वीभत्सता के साथ यहाँ उपस्थित है.



पहली कहानी 'शब्दों से बिंधा मैं' में प्रणय निवेदन की अस्वीकृति से उपजे आत्मा धिक्कार की रोमानी प्रस्तुति ध्यान खींचती है. तो 'अग्नि प्रसंग' एक ऐसी सास की कहानी है जो अपने वैधव्य और सास के अत्याचार का बदला गिन-गिन कर बहू से लेती है. और बेटे का दूसरा विवाह करके दहेज़ पाने के लालच में बहू को आग के हवाले करने में तनिक नहीं हिचकती. बहू अपनी मौत सामने देखकर पहले तो सास को भी लपटों में खींच लेती है लेकिन अगले ही क्षण उसकी दयनीय दशा देखकर पसीज भी जाती है. आग से ही नहीं पुलिस से भी वह सास को बचा लेती है. जले-झुलसे चेहरे वाली सास का हृदय परिवर्तन हो जाता है. काश, सचमुच ऐसा हुआ करता. चोटिल हो कर सास कितनी भयानक हो जाती है. इसे कोई भुक्तभोगी बहू ही बता सकती है.



'कलह' में पति-पत्नी की झड़प क्रोध के विस्फोट में बदल जाती है. और सार्वजनिक रूप से अपमानित पति ऐसी परिस्थिति में मारा जाता है कि समझ नहीं आता यह दुर्घटना है या आत्महत्या या कुछ और.



मृत्यु का साक्षात्कार 'खँडहर में एक रात' में भी है - काफ़ी खौफनाक. खौफ 'वत्सला' में भी है. ऐसा खौफ कि कल्पना में बहुत से गिद्ध,कौवे और सियार शव पर मंडराते दीखने लगते हैं. इस खौफ के बावजूद मानव मन की कोमलता और सदाशयता के प्रति लेखक का विश्वास नहीं डिगता. इसी विश्वास का द्योतक है अनाथ बच्चे को निःसंतान दम्पति द्बारा अपना लेना.



'बेशर्म' स्त्री-पुरूष सम्बन्ध की मनोरंजक कहानी है. पति पत्नी की प्रसव पीड़ा से इतना विचलित हो जाता है कि उससे दूर-दूर रहने लगता है. दूसरी ओर पत्नी इस दूरी से इतनी भयभीत हो जाती है कि अपनी चिंता को दूसरों पर प्रकट होने से बचा नही पाती . पत्नी की उदासीनता के इस उल्लेख के कारण पति उसके निकट तो आता है पर औरत जात के बेशर्म होने के ताने के साथ.



'कीचड का हंस' के बाबा अद्भुत नाथ किसी संस्मरण के चरित नायक प्रतीत होते हैं. पागलों जैसा व्यवहार करने वाला यह बाबा कुत्तों और कीडों में भी उसी आत्मा के दर्शन करता है जो स्वयं उसमे व्याप रही है.. 'समर गाथा' भी संस्मरण ही है . लेखक के पिता का संस्मरण जो द्वितीय विश्वयुद्ध में सिग्नल कोर में फोजी अफसर थे और पुत्र जन्म के समय मोर्चे पर थे . फौजी सिपाहियों की अद्वितीय वीरता और मानवीयता प्रणम्य है. उनके लिए सच ही मृत्यु वस्त्र बदलने से अधिक कुछ नहीं!



बसंत सिंह जी की कई कहानियो में सवर्ण और दलित के सामजिक संबंधों का यथार्थ चित्रण हुआ है. लेखक का वर्ण विहीन और जाति हीन समाज का स्वप्न 'अंतर्द्वंद्व ' कहानी में साकार होता दिखाई देता है. जब तेजेश्वर सूर्या की जाति से अधिक महत्व उसके प्रेम को देता है.दूसरी ओर 'भेड़िया' शिक्षा तंत्र में अध्यापको के शोषण को व्यक्त करने वाली यथार्थ परक कहानी है. जिसमें एक स्वाभिमानी अध्यापक आजीवन अन्याय के विरुद्ध लड़ने और लड़ते लड़ते ही मर जाने का संकल्प ले कर नौकरी छोड़ देता है. उसके मुखमंडल की गरिमा लेखक की पक्षधरता को बिम्बित करती है.



'पराये घर में' सारा विमर्श इस बात के इर्द-गिर्द है कि "जो औरत के दुखों से आँख नहीं मिला पाते वे मर्द नहीं हैं. और जो मर्जी हों. सिर्फ़ औरत के जिस्म पर अधिकार ज़माना ही मर्द होना नहीं है. औरत सिर्फ़ जिस्म नहीं है. वह जिस्म से आगे मन है. और उस से भी आगे आत्मा है. उसके पूरेपन पर अधिकार ज़माना ही मर्द होना है...और जो औरतें पुरूष को सिर्फ़ जिस्म समझती हैं...वे भी ग़लत हैं."



'आतंक से जूझते हुए' पंजाब के आतंकवादी दौर की कहानी है. जो आतंक की फसल काटने वाली ताकतों का पर्दाफाश करती है. आतंक का सामना करने के लिए जिस हौसले की आवश्यकता है उसकी अनुपस्थिति लेखक की मुख्य चिंता है और हमारे सारे समाज की भी. पर ऐसे में जब शत्रुजीत जैसा कोई सच्चा मर्द सामने आ जाता है तो मुर्दों में भी जान पड़ जाती है.



अब रही एक कहानी 'अनुदित सूरज' जो एक ऐसे कवि की कहानी है जो गुमनामी के अंधेरे में खो गया है. कवि का नाम है सूरज. इस कहानी के सम्बन्ध में पुस्तक का यह प्रचारक वक्तव्य एकदम सही है कि, ''यह एक ऐसे अभिशप्त कवि की वेदनामयी कथा है जिसकी कविताएँ समाज के हाथों तक कभी नहीं पहुंचती. यह एक दुखद कथा है. लेखक श्री बसंत जीत स्वयं कवि हैं. इसलिए इस कहानी में उन्होंने सरस ग़ज़लों और गीतों को बड़ी कुशलता से पिरोया है. इनका सृजनात्मक संयोजन इतने सुंदर, सरल और रोचक ढंग से किया गया है कि ये कथानक का अटूट हिस्सा बन गए हैं. इनके कारण यह कहानी एक दीर्घ शोक कविता सी लगती है. कविता अनुरागी सहृदय पाठकों का इसकी और आकृष्ट होना स्वाभाविक होगा. "



अंत में यह कहना आवश्यक है कि 'नरक है' की कहानियों में जहाँ-जहाँ गाँव के सन्दर्भ आए हैं वे इतने जीवंत, स्वतः पूर्ण और वास्तविक हैं कि उनसे स्वतंत्र भारत के गाँव की दशा का यथार्थ रूप अपनी विसंगतियों के साथ उभर कर सामने आ जाता है. साथ ही तमाम तरह की विसंगतियों और अंतर्विरोधों के बावजूद मनुष्यता के प्रति लेखक का अडिग विश्वास सर्वत्र पाठक को अन्धकार से प्रकाश की ओर जाने के लिए प्रेरित करता रहता है.



'नरक है'/
ठा. बसंतजीतसिंह हरचंद/
नेशनल पब्लिशिंग हाउस, २/३५, अंसारी रोड, दरियागंज, नई दिल्ली - ११०००२/
२००८/
रु. २००/
पृष्ठ - १४८(सजिल्द) |
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