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रविवार, 30 अगस्त 2009

अबाध सुखचाह से प्रवाहित वैतरणी *



अबाध सुखचाह से प्रवाहित वैतरणी *



साहित्य के प्रयोजनों में 'कांतासम्मित उपदेश' और 'अशिव की क्षति' उसकी शैली और वस्तु का निर्धारण करनेवाले मुख्य कारक रहे हैं। वस्तु लोकमंगल से मंडित हो और शैली अपने प्रवाह में बहा ले जाने में समर्थ हो, तो ये दोनों प्रयोजन सिद्ध माने जा सकते हैं। तेलुगु कथाकार सैयद सलीम ने अपने उपन्यास 'नई इमारत के खंडहर' (2009) में बड़ी सीमा तक इस कठिन पंथ को साधने का यथाशक्ति प्रयास किया है। एड्स के संबंध में जागरूकता उत्पन्न करने के लिए उन्होंने पर्याप्त रोचक कथासूत्र बुना है और यह दर्शाया है कि एड्स से भयावह एड्स की कल्पना है और स्त्री-पुरुष का परस्पर विश्वास वह संजीवनी है जिसमें किसी मरते हुए संबंध और संबंधी को पुनर्जीवित करने की शक्ति निहित है।


सलीम का यह उपन्यास तेलुगु में 'कालुतुन्न पूलतोट' (जलती हुई फुलवारी) नाम से छपकर चर्चित हो चुका है। अनुभवी अनुवादक आर. शांता सुंदरी (1947) ने इसकी लोकप्रियता को देखते हुए दैनिक पत्र 'स्वतंत्र वार्ता' में इसका हिंदी अनुवाद धारावाहिक प्रकाशित कराया था।अब 'जलती हुई फुलवारी' के स्थान पर 'नई इमारत के खंडहर' के रूप में उसी अनुवाद को पुस्तकाकार प्रकाशित किया गया है। आर. शांता सुंदरी तीन दशक से अधिक अवधि से अनुवाद के क्षेत्र में सक्रिय हैं और हिंदी तथा तेलुगु के बीच आवाजाही के लिए 'डॉ. गार्गी गुप्त द्विवागीश' पुरस्कार से सम्मानित भी हैं । उन्होंने दीर्घकाल तक हिंदी क्षेत्र में रहकर हिंदी पर भी मातृभाषावत् अधिकार प्राप्त किया है। यही कारण है कि उनके अनुवाद में सहज संप्रेषणीयता है। 'नई इमारत के खंडहर' की हिंदी स्वाभाविक प्रवाह से युक्त तथा अनेक स्थलों पर काव्यात्मक चित्रांकन से भरपूर है। इससे अनूदित पाठ की पठनीयता कई गुना बढ़ गई है।


विवेच्य उपन्यास उत्तरआधुनिक जीवनशैली से उपजी एड्स रूपी विभीषिका पर आधारित है। इस विभीषिका की शुरुआत होती है भोगवादी जीवन दर्शन की स्वीकृति के साथ - ''जीवन का अर्थ, जीवन की सार्थकता, उसी शब्द (मजे) में है। मजा करना है। एनजॉय करना है। भरसक सुख को चूस लेना है। नहीं मिलता तो लूटकर ही सही अपनाना है।'' मजे की यह खोज ऐसे संबंध चाहती है जिनमें स्त्री और पुरुष का एक-दूसरे के प्रति कोई दायित्व न हो, स्थायित्व न हो; हो बस अबाध शरीर सुख। सुधीरा आत्मीयता की ऊष्मा से परिचित नहीं है इसलिए शरीर की ऊष्मा ही उसके लिए सर्वोपरि है। दूसरी ओर कथानायक ने पत्नी के समर्पण की तृप्ति को जाना है इसलिए विवाहेतर संबंध चोरी का सुख देने के बावजूद उसके भीतर अपराध बोध जगाता है। एड्स का पता चलने पर सुधीरा जहाँ उसे अपनी नियति मानकर स्वीकार कर लेती है ; वहीं नायक अपने अपराध बोधवश बिना परीक्षण के ही स्वयं को एड्सग्रस्त मान बैठता है। यहाँ से शुरू होती है एक वैतरणी यात्रा। नायक अपनी पत्नी से, परिवार से दूर रहने लगता है और पत्नी एड्स विषयक जागरूकता के अभियान में जुट जाती है। दोनों तरह-तरह के यौन रोगों से पीड़ित स्त्री-पुरुषों से मिलते हैं और इस बहाने लेखक समाज की तमाम सडांध को बड़े कलात्मक ढंग से खोलकर पाठक के सामने धर देता है। इस प्रक्रिया में समाज की विभिन्न संस्थाओं के असली चेहरे को भी पाठक देख पाता है। विवाह संस्था के प्रति तरह-तरह की धारणाएँ सामने आती हैं और पता चलता है कि प्रेमहीन विवाह स्त्री को किस प्रकार के यातना शिविर में धकेल देता है । लेखक का स्त्री के प्रति विश्वास और सम्मान का भाव अनेक स्थलों पर दिखाई पड़ता है। कई बार तो लेखक स्त्रीपक्ष की ओर से जिरह करता भी दिखाई देता है। लेकिन 'मुझे आधिपत्य चाहिए' के नाम पर 'आजाद पंछी' बनने वाली स्त्री के पतन को दिखाकर लेखक ने अंध स्त्रीवाद को निरस्त कर दिया है।


डॉक्टर हों या मीडियाकर्मी, सभी कहीं-न-कहीं एड्स के संबंध में उतने ही अज्ञानी हैं जितने स्त्री-पुरुष संबंध की मार्मिकता के बारे में। चाहे किसी भी आर्थिक वर्ग की बात करें, किसी भी व्यवसाय को ले लें, लोग अंधेरे में पड़े हैं और घृणा तथा भय के कारण अपनी तथा औरों की यातनाओं को और भी बढ़ा रहे हैं। जो लोग जानकार हैं, उन्हें आगे आकर इस स्थिति का निराकरण करना होगा अन्यथा धीरे-धीरे सारा समाज सड़-गल कर जीते-जागते नरक में बदल जाएगा। यह कृति इस नरक के प्रति पाठक को सावधान करती है, यही इसकी सबसे बड़ी सार्थकता है।


इस उपन्यास की एक उपलब्धि यह भी मानी जाएगी कि काव्यात्मक बिंबों के साथ बड़े कौशल से लेखक ने मनोविज्ञान और चिकित्साविज्ञान की पारिभाषिक शब्दावली और प्रयोजनमूलक अभिव्यक्तियों को इस तरह पिरोया है कि सामाजिकता और वैज्ञानिकता एक साथ गलबाहीं डालकर चलती दिखाई देती हैं।


यह कृति सामाजिक दृष्टि से अत्यंत उपयोगी है। अतः इसका विभिन्न भाषाओं में अनुवाद तो अपेक्षित है ही, इसके अल्पमोली संस्करण की भी बड़ी आवश्यकता है जिसका व्यापक प्रचार-प्रसार एड्स जागरूकता आंदोलन के तहत किया जा सकता है। साथ ही, मानवाधिकार का पक्ष भी इस कृति में जिस प्रबल रूप में उभरा है वह भी जन शिक्षण के लिए बड़े काम का है।


अंततः हमारे कथानायक के अन्तर्द्वन्द्व के चरमोत्कर्ष का क्षण पाठकों के विमर्श हेतु प्रस्तुत है -


''पर क्या मैं अपने बारे में इतना बेधड़क होकर बता सकूँगा ..... इस समाज में मेरा मान-सम्मान है .... बीवी बच्चे हैं। लोग जान जाएँगे तो इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी! क्या मेरे बच्चे सिर उठाकर चल सकेंगे? मेरी बेटी की शादी होगी? मान चला जाए तो फिर जिंदा रहकर क्या करना है? मैं अपने कमरे में गया। माधुरी उस तरफ मुँह करके लेटी थी। ऐसे लग रहा था जैसे भगवान ने इसे स्त्रीत्व, स्निग्धता, कोमलता, मातृत्व, प्यार, अनुराग जैस गुणों के मेल से बनाया हो! मैं चाहता था कि मरने से पहले माधुरी को सच बता दूँ ... बता दूँ कि मैं तुम्हें बहुत चाहता हूँ .... मुझसे भूल हो गई है .... मैं खुद को सजा देनेवाला हूँ ! पर क्या यह सब बताने से वह मुझे मरने देगी ? पर इस अधमरी जिंदगी से तो मौत ही बेहतर होगी। सम्मान के साथ मरना .... दुर्घटना में मर जाऊँगा तो सहानुभूति भी खूब मिलेगी। पर एड्स से मरूँगा तो ...... बाप रे ..,,.. नहीं .....।''





* नई इमारत के खंडहर (तेलुगु उपन्यास),
मूल : सैयद सलीम,
अनुवाद : आर. शांता सुंदरी ,
२००९,
मेधा बुक्स, नवीन शाहदरा, दिल्ली - ११० ०३२,
250 रुपए,
सजिल्द,
पृष्ठ १८८.


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