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सोमवार, 10 अगस्त 2009

हिंदी में वैज्ञानिक लेखन की परंपरा




आज 21वीं शताब्दी के पहले दशक में जब हिंदी में वैज्ञानिक विषयों पर पुस्तकों की माँग की जाती है तो प्रायः यह सुनने में आता है कि इसके लिए आधारभूत सामग्री उपलब्ध नहीं है और हिंदी आदि भारतीय भाषाएँ आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को अभिव्यक्त करने की दृष्टि से समर्थ नहीं हैं। हम आरंभ में ही यह स्पष्ट कर देना चाहते हैं कि यह धारणा निराधार, असत्य और भ्रामक है क्योंकि हिंदी सहित सभी भारतीय भाषाओं में सब प्रकार की प्रगतिपरक संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान को सहज और गहन दोनों रूपों में अभिव्यक्त और संप्रेषित करने की संपूर्ण शक्ति विद्यमान है। साहित्य की ही भाँति वैज्ञानिक लेखन की भी इस देश में सुदृढ़ परंपरा रही है और हिंदी सहित सभी आधुनिक भारतीय भाषाओं ने उसे विरासत के रूप में प्राप्त किया है। इस विरासत को आगे विकसित करने के लिए आधुनिक विषयों और अनुसंधानों के अनुरूप हमने अपने भाषाकोश का पर्याप्त विकास किया है तथा विकास की यह प्रक्रिया वैज्ञानिक जगत के विकास के साथ-साथ आज भी निरंतर चल रही है। यदि हम पुरानी परंपरा की चर्चा न भी करें, तब भी इसमें संदेह नहीं कि खड़ीबोली हिंदी में वैज्ञानिक और तकनीकी लेखन की परंपरा लगभग दो सौ साल पुरानी है।

वैज्ञानिक लेखन के लिए विशिष्ट पारिभाषिक शब्दावली की आवश्यकता को हिंदी ने बहुत पहले पहचान लिया था। जैसा कि बाबू श्यामसुंदरदास ने काशी नागरी प्रचारणी सभा के पारिभाषिक शब्दनिर्माण संबंधी कार्यक्रम की प्रासंगिकता के बारे में बताया है, ''जब कभी किसी व्यक्ति से किसी वैज्ञानिक विषय की पुस्तक लिखने या अनुवाद करने के लिए कहा जाता है तो वह इसके लिए तभी तैयार होता है जब सभा उन वैज्ञानिक शब्दों के पर्यायवाची शब्द हिंदी में बनाकर दे दे जिनकी उस पुस्तक या लेख को लिखने में जरूरत पड़ेगी।'' आज भी संभावित लेखक ऐसी ही माँग करते हैं। परंतु वास्तविकता यह है कि आज पहले जैसी स्थिति नहीं है। अब शब्दों को बनाने की उतनी जरूरत नहीं जितनी बनाए जा चुके शब्दों के प्रयोग की। वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग आदि संस्थाओं ने लाखों की संख्या में विभिन्न विज्ञानों के शब्द बना डाले हैं और नित नए विषयों पर शब्दनिर्माण का काम अनेक स्तरों पर चल रहा है। अतः शब्दावली की अनुपलब्धता अब एक बहाना मात्र है। आवश्यकता है कि विभिन्न विषयों के विद्वान और वैज्ञानिक इस देश के आम जन को ध्यान में रखकर राष्ट्रीय भाषाओं में वैज्ञानिक लेखन में प्रवृत्त हों। इसके लिए उन्हें अपने लक्ष्य पाठक समाज को ध्यान में रखकर अलग-अलग प्रकार की शैलियाँ विकसित करनी होंगी, क्योंकि बच्चों के लिए, विद्यार्थियों के लिए, जनसाधारण के लिए और विशेषज्ञों के लिए वैज्ञानिक लेखन की शैली एक जैसी नहीं हो सकती।

यहाँ हम भारत के महान गणितज्ञ भास्कराचार्य द्वितीय (1150 ई.) के ग्रंथ 'सिद्धांत शिरोमणि' के अंतर्गत 'गोलाध्याय' में बताई गई वैज्ञानिक लेखन की विशेषताओं का उल्लेख करना चाहेंगे जो इस प्रकार हैं -

1. वैज्ञानिक साहित्य की भाषा अधिक कठिन नहीं होनी चाहिए।
2. उसमें अनावश्यक विवरण नहीं होने चाहिए।
3. उसमें मूल सिद्धांतों की सही-सही और सटीक व्याख्या की जानी चाहिए।
4. उसमें भाषागत स्पष्टता और गरिमा का निर्वाह किया जाना चाहिए।
5. उसमें विषय को पर्याप्त उदाहरणों द्वारा पुष्ट किया जाना चाहिए।

आज भी हम हिंदी में मौलिक वैज्ञानिक लेखन से ऐसी ही अपेक्षाएँ रखते हैं और चाहते हैं कि वह अनुवादाश्रित जटिलता और दुरूहता से अपने आपको बचाए रखे। तभी उसमें बोधगम्यता और सम्प्रेषणीयता जैसे गुण आ सकेंगे।

संभवतः इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए जब पहले पहल खड़ीबोली में वैज्ञानिक विषयों पर पाठ्य पुस्तकें तैयार करने की चुनौती सामने आई होगी तब अंग्रेज़ी से आए वैज्ञानिक शब्दों के हिंदी पर्याय तैयार करना लाजमी प्रतीत हुआ होगा। इस आवश्यकता की पूर्ति हेतु खड़ीबोली में वैज्ञानिक शब्द संग्रह और पुस्तक रचना का काम साथ साथ शुरू हुआ। तकनीकी विषयों पर लिखनेवालों के लिए ऐसे शब्द संग्रह का प्रणयन लल्लूलाल जी ने किया। हम प्रायः खड़ीबोली गद्य के चार आरंभिक उन्नायकों में एक के रूप में उन्हें याद करते हैं, लेकिन उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण 1810 ई. में प्रकाशित उनके द्वारा संग्रहीत 3500 शब्दों की वह सूची है जिसमें हिंदी की वैज्ञानिक शब्दावली को फ़ारसी और अंग्रेज़ी प्रतिरूपों के साथ प्रस्तुत किया गया है।

शब्द संग्रह के अनंतर पुस्तक लेखन का काम शुरू हुआ और 1847 में स्कूल बुक्स सोसाइटी, आगरा ने 'रसायन प्रकाश प्रश्नोत्तर' का प्रकाशन किया। विभिन्न वैज्ञानिक विषयों की पुस्तकें हिंदी में तैयार करने का बहुत बड़ा काम कायस्थ राजकीय पाठशाला के गणित अध्यापक पं. लक्ष्मीशंकर मिश्र ने किया। उनके संबंध में भारतेंदु हरिश्चंद्र ने 'कवि वचन सुधा' (23 अगस्त 1873) में यह जानकारी दी है कि उन्होंने हिंदी भाषा में '' सरल त्रिकोणमिति '' उस समय तक प्रस्तुत कर दी थी और हिंदी भाषा में गणित विद्या की पूरी श्रेणी बनाने के काम में जुट गए थे। वस्तुतः पं. लक्ष्मीशंकर मिश्र ने गणित, स्थिति विद्या, गति विद्या, वायुमंडल विज्ञान, प्राकृतिक भूगोल और पदार्थ विज्ञान जैसे विषयों पर पुस्तकें लिखकर हिंदी के आरंभिक वैज्ञानिक लेखन को सुदृढ़ आधार प्रदान किया। आगे चलकर महामहोपाध्याय पं. सुधाकर द्विवेदी ने 'चलन कलन' तथा विशंभरनाथ शर्मा ने 'रसायन संग्रह' (1896, बड़ा बाज़ार, कलकत्ता) की रचना की। ये सभी उदाहरण इस बात की पुष्टि करते हैं कि तकनीकी विषयों की अभिव्यक्ति में हिंदी आरंभ से समर्थ और सचेष्ट रही है।

19 वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में विभिन्न स्तरों पर आधुनिकीकरण की प्रक्रिया के दौरान यह महसूस किया गया कि समाज में नवजागरण तभी संभव है जब भाग्यवादी अंधविश्वासों के स्थान पर तर्क और वैज्ञानिकता पर आधारित सोच का विकास किया जाय। समाज के मानस को वैज्ञानिक संस्कार देने के लिए, साइंटिफिक टेंपरामेंट विकसित करने के लिए, भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक लेखन को और अधिक मजबूत किए जाने की जरूरत थी (और आज भी है।)। इस दृष्टि से साइंटिफिक सोसाइटी अलीगढ़, वाद विवाद क्लब बनारस, काशी नागरी प्रचारणी सभा वाराणसी, गुरुकुल कांगडी और विज्ञान परिषद इलाहाबाद जैसी संस्थाओं ने आंदोलनात्मक ढंग से काम किया और हिंदी के वैज्ञानिक लेखन को विस्तार दिया। इस प्रक्रिया में जहाँ एक ओर अंग्रेज़ी तथा दूसरी यूरोपीय भाषाओं से वैज्ञानिक साहित्य का उर्दू, हिंदी और फ़ारसी में अनुवाद किया गया वहीं शब्दावली निर्माण, पत्र-पत्रिकाओं में वैज्ञानिक लेखन और मौलिक ग्रंथों के प्रणयन को भी प्रोत्साहित किया गया। खास बात यह है कि रेलवे, कपास, औषधि, कृषि आदि तमाम विषयों पर इस दौर में लिखित निबंध और पुस्तकें सरल, सहज तथा बोधगम्य भाषा में रचित हैं। हिंदी में वैज्ञानिक शिक्षा देने के आंदोलन को संगोष्ठी और व्याख्यान मालाओं की सहायता से जनजनव्यापी बनाने का प्रयास किया गया। 8 वर्ष के परिश्रम से काशी नागरी प्रचारणी सभा ने 1898 में पारिभाषिक शब्दावली प्रस्तुत की। हिंदी में पारिभाषिक शब्द निर्माण के इस सर्वप्रथम सर्वाधिक सुनियोजित, संस्थागत प्रयास में गुजराती, मराठी और बंगला में हुए इसी प्रकार के कार्यों का समुचित उपयोग किया गया। सभा का यह कार्य देश में सभी प्रचलित भाषाओं में वैज्ञानिक शब्दावली और साहित्य के निर्माण की शृंखलाबद्ध प्रक्रिया का सूत्रपात करनेवाला सिद्ध हुआ।


हिंदी के वैज्ञानिक लेखन को इस बात से बड़ा बल मिला कि गुरुकुल कांगडी (1900) ने विज्ञान सहित सभी विषयों की शिक्षा के लिए हिंदी को माध्यम बनाया और तदनुरूप 17 पुस्तकों का प्रणयन भी किया। यहाँ यह जानना रोचक होगा कि भारतेंदु और द्विवेदी युगीन लेखकों और संपादकों ने हिंदी में पर्याप्त वैज्ञानिक लेखन भी किया। पं. बालकृष्ण भट्ट, पं. महावीर प्रसाद द्विवेदी, पं. चंद्रधर शर्मा 'गुलेरी' और पं. रामचंद्र शुक्ल जैसे साहित्यकारों ने वैज्ञानिक विषयों पर भी अत्यंत सहज ढंग से लिखा और इस क्रम में अनेकानेक वैज्ञानिक शब्दावली और अभिव्यक्तियों का निर्माण किया।


इलाहाबाद में 1913 में स्थापित विज्ञान परिषद ने 1914 में 'विज्ञान पत्रिका' आरंभ की और वैज्ञानिक लेखन के लिए नए आयाम खोले। हिंदी भाषासमाज के लिए यह गर्व का विषय है कि 'विज्ञान पत्रिका' तब से अब तक निरंतर प्रकाशित होती आ रही है। हमारा प्रस्ताव है कि वर्ष 2013-2014 को अखिल भारतीय स्तर पर 'विज्ञान पत्रिका' के 'शताब्दी वर्ष' के रूप में मनाया जाय और वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली को लोकप्रिय बनाने का चरणबद्ध आंदोलन चलाया जाए।

हिंदी में वैज्ञानिक लेखन की संभावनाओं को अनंत आकाश उपलब्ध कराने की दृष्टि से डॉ. रघुवीर के कार्य को कभी नहीं भुलाया जा सकता। उन्होंने 1943-46 के दौरान लाहौर से हिंदी, तमिल, बंगला और कन्नड - इन चार लिपियों में तकनीकी शब्दकोश प्रकाशित किया। बाद में 1950 में उनकी कंसोलिडेटड डिक्शनरी प्रकाशित हुई। लोकेशचंद्र के साथ प्रस्तुत किए गए उनके बृहद कार्य 'ए कम्प्रहेंसिव इंग्लिश हिंदी डिक्शनरी ऑफ़ गवर्नमेंटल एंड एजूकेशन वड्र्स एंड फ्रेजिस' (1955, भारत सरकार) से तो सब परिचित हैं ही। डॉ. रघुवीर ने संस्कृत की धातु, उपसर्ग और प्रत्यय पर आधारित शब्द निर्माण प्रक्रिया द्वारा लाखों वैज्ञानिक शब्द बनाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया। आगे वैज्ञानिक और तकनीकी शब्दावली आयोग ने देश भर के वैज्ञानिकों, भाषाविदों और संसाधकों की सहायता से इसे सर्वथा नई चुनौतियों के अनुरूप नया स्वरूप प्रदान किया।

इसमें संदेह नहीं कि आज वैज्ञानिक शब्दावली और अभिव्यक्तियों की दृष्टि से हिंदी अत्यंत समृद्ध है। इतने पर भी आज वैज्ञानिक विषयों पर हिंदी में लेखन बहुत ही कम और अपर्याप्त है। इसका कारण भाषा की अशक्तता कदापि नहीं है बल्कि वैज्ञानिकों का इस दिशा में रुझान न होना ही हमारी दरिद्रता का कारण बना हुआ है। जैसा कि कहा जाता है, भारत ऐसा देश है जो संपन्न होते हुए भी दरिद्र है। वैज्ञानिक लेखन के क्षेत्र में भी यही बात सच है। इसका निराकरण तभी संभव है जब एक तो, शिक्षा के माध्यम के रूप में भारतीय भाषाओं को अपनाया जाय तथा दूसरे, वैज्ञानिकों को हिंदी में बोलने और लिखने के लिए प्रेरित किया जाए। यहाँ पारिभाषिक शब्दावली की दुरूहता की बात उठाई जा सकती है, परंतु सच यही है कि भारतीय व्यक्ति के लिए भारतीय भाषाओं की शब्दावली अंग्रेज़ी की अपेक्षा अधिक पारदर्शी और बोधगम्य है। उसे समझने के लिए विज्ञान के विद्यार्थियों तथा वैज्ञानिकों को अनुप्रयुक्त संस्कृत का छोटा सा लगभग 30 घंटे का प्रशिक्षण दिया जा सकता है ताकि वे इन शब्दों के निर्माण में प्रयुक्त धातु, उपसर्ग और प्रत्यय को पहचान सकें। यदि ऐसा किया जा सके तो निश्चय ही हिंदी के माध्यम से वैज्ञानिक चेतना भारत के जनगण तक पहुँच सकती है क्योंकि यह ऐतिहासिक तथ्य है कि विज्ञान तभी लोकप्रिय हुआ है जब उसने लोकभाषा को अपनाया|इटली में गेलीलियो ने पहले लैटिन में लिखा लेकिन उन्हें प्रचार-प्रसार इतालवी में लिखने (1632) पर ही मिला। न्यूटन ने भी 1637 में 'प्रिंसिपिया' की रचना लैटिन में की परंतु उन्हें लोकव्याप्ति 1704 के अंग्रेज़ी लेखन से मिली जिसका बाद में लैटिन में भी अनुवाद हुआ। इतना ही नहीं डार्विन ने भी अपने सिद्धांत अंग्रेज़ी में प्रस्तुत किए और कालांतर में यूरोप में लैटिन में वैज्ञानिक लेखन बंद हो गया। विज्ञान के इस माध्यम परिवर्तन में यदि यूरोप के वैज्ञानिकों की भूमिका इतनी महत्वपूर्ण रही, तो क्यों नहीं भारत के वैज्ञानिक भी भारत की जनता की खातिर भारतीय भाषाओं में वैज्ञानिक लेखन को समृद्ध बना सकते ?
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