समर्थक

बुधवार, 26 अगस्त 2009

एक डायन की सच्ची कहानी




क डायन की सच्ची कहानी






आप चाहें तो इसे कहानी मान सकते हैं। लेकिन यह कहानी नहीं है. एक दम ज्वलंत घटना है, शर्मनाक समाचार है. लेकिन हम इसे फिलहाल कहानी की तरह ही सुनाते हैं.


बात है इकीसवी सदी की, सन २००८ के अक्टूबर महीने का पहला इतवार था। राजस्थान नाम का एक ऐतिहासिक भूखंड भारत भूमि पर हुआ करता था, वहां एक जिला था सिरोही, और उस जिले में था एक गाँव खरा नाम का.


हाँ तो इस गाँव खरा में रहती थी घरासिया नाम की एक जन-जाति, अब यह तो आपको मालूम ही हैं कि महान भारतीय लोकतंत्र में उस ज़माने में भी ऐसी जनजातियों की अपनी पंचायतें हुआ करती थीं, सो इस गाँव की भी पंचायत थी। और पंचायत पर कब्ज़ा था पुरुषों का- जो अपने आपको भाग्यविधाता से कम नहीं समझते।


तो हुआ यूँ कि इस गाँव में एक महीने के भीतर घरासिया लोगों के घरों में दो मौतें हो गयीं, अब मौत हुई, तो उसके कारण की तलाश शुरू हुई। ज़रूर इसके पीछे किसी डायन का हाथ होगा. खोज शुरू हुई उस डायन की और बत्तीस साल की गुजरिया पर डायन होने की तोहमत मढ़ दी गई. मीसा और पोटा से ज्यादा खतरनाक हुआ करती है पुरूष वर्चस्व प्रधान पंचायत की चार्जशीट. आरोपी के ख़िलाफ़ कोई सबूत पेश नहीं किए जाते, बस आरोप लगाया जाता है और चुनौती दी जाती है कि हिम्मत है तो ख़ुद को पाक-साफ़ साबित करके दिखाओ, लाचार गुजरिया कैसे स्वयं को निर्दोष सिद्ध करती, या तो सर झुककर अपराध को स्वीकार कर लेती- जैसा उसने नहीं किया. या फिर परीक्षा देती. परीक्षा भारतीय स्त्रियाँ युगों से देती आई हैं - पुरुषों की शर्त पर. गुजरिया को भी परीक्षा से गुजरना पड़ा.


वह इतवार गुजरिया के लिए काला इतवार था। एक पात्र में गरमागरम तेल भरा गया. इस उबलते तेल में चाँदी का सिक्का डाला गया. गुजरिया को नंगे हाथों से यह सिक्का निकालना था. अगर वह भली औरत होगी तो उसके हाथ जलेंगे नहीं. और अगर हाथ जल गए तो साबित हो जाएगा कि वह सचमुच डायन है. गुजरिया गुजरिया थी, कोई सीता माता नहीं कि उसके हाथ न जलते. वैसे कहा तो यह भी जाता है कि अग्निपरीक्षा छाया-सीता ने दी थी, असली सीता तो पहले से अग्निदेव के घर में सुरक्षित थीं. लीला में ऐसा होता है.पर गुजरिया पर जो गुज़री वह लीला नहीं थी. क्रूर सच्चाई थी.

आप समझ ही गए होंगे कि अग्नि परीक्षा में गुजरिया अनुतीर्ण हो गई॥ बस फिर क्या था घोषणा हो गई -- यह चुडैल है, डायन है, पिशाचिनी है, मारो इसे !!!

हर ओर से गुजरिया पर प्रहार किए गए। गरम लोहे की सलाखों से उसकी देह दागी गई. मारे सरियों के उसका सिर फूट गया. इस बहाने जाने किस किस ने उससे क्या क्या बदले चुका लिए !

डायन से अपेक्षा की जाती है कि वह त्रस्त परिवार को कष्टों से मुक्त कर दे। गुजरिया भला कैसे किसी को कष्टों से मुक्त कर पाती. इसलिए उसे मार पीट कर उसके घर के दरवाज़े पर फ़ेंक दिया गया.पति और घर के सभी सदस्य इतने आतंकित कि उसे घर के भीतर नहीं ला सके. अंततः बेहोशी की हालत में उसे अस्पताल ले जाया गया.

तो यह थी सन २००८ के उत्तरआधुनिक भारत की एक बर्बर दास्तान।
क्या इस कहानी का मोरल यही माना जाए कि भारत में आज भी अंध-विश्वास, अवैज्ञानिकता, अशिक्षा मूर्खता के साथ साथ स्त्री के प्रति सर्वथा अमानुषिक दृष्टिकोण विद्यमान है, और सारे सामजिक , राजनैतिक और बौद्धिक नेतृत्व ने इस सचाई की ओर से आँख मूंद रक्खी है? स्त्रियाँ यहाँ पहले भी डायन थी और आज भी डायन हैं!

इस वीभत्सता में भी सुख और संतोष का अनुभव करने वाला समाज क्या भीतर सड़-गल नहीं चुका है?


5 टिप्‍पणियां:

Manish ने कहा…

उफ़ ! वह द्रृश्य कैसा रहा होगा...??

cmpershad ने कहा…

"परीक्षा भारतीय स्त्रियाँ युगों से देती आई हैं - पुरुषों की शर्त पर. "
सो तो है। पर हमारा सरकारी तंत्र क्या कर रहा है। मात्र स्वतंत्रता और आधुनिकता की दुहाई दे रहा है!!!!!!

AlbelaKhatri.com ने कहा…

लाहनत है ऐसी व्यवस्था पर............................

ऋषभ उवाच ने कहा…

होमनिधि शर्मा जी ने ईमेल से यह टिप्पणी भेजी है -


''पंडित जी, पता नहीं इस घटना के पढ़ते ही हरियाणा, पंजाब और उत्‍तर प्रदेश की तीन घटनाएं दिमाग में कौंधी जिसमें हाल ही की एक ही गोत्र के होकर विवाह करने पर पंचायत के फैसले से पूरे परिवार को पत्‍थरे मारकर गॉंव, समाज से बाहर किया गया. एक और घटना में किसी स्‍त्री को किसी पुरुष के साथ संबंध के मामले में गॉंव में नग्‍न घूमाकर जाने क्‍या-क्‍या किया गया. कहने का आशय यह है कि हम अब भी पढ़े-लिखे, सभ्‍य आदि...... अपने-अपने मतलब को पूरा करने और चीजों को अपने ढंग से मोड़ने के लिए है. मौका पड़ते ही अपना आदि- मानव जाग जाता है. किसी को समझाने जाओ तो पहले पत्‍थर खाओ. जूतम-पैजम करो. कुछ समझ में नहीं आता इस देश में कितने देश हैं और इनमें कौन प्राचीन, पुरातन व आधुनिक? पैसे और ताकत वाला एक से अधिक स्‍ित्रयों से संबंध रखे, नैतिक-अनैतिक काम करे, सामाजिक-असामाजिक चाल-चलन को अपनी मर्जी से चलाए. वह साहब और आधुनिक कहलाए. और बाकी सब, डायन, पिशाच आदि.... यह तो सूचित घटना है. न जाने कितनी असूचित रह गई होंगी?

इस वीभत्सता में भी सुख और संतोष का अनुभव करने वाला समाज क्या भीतर सड़-गल नहीं चुका है? ..... जी हॉं यह सड़ा-गला है...

चौराहे, गली-कूचों में मिट्टी के पुतलों पर हार पहनाने या मोम के पुतले बना लेने से क्‍या कोई आदमी जिंदा हो जाता है? क्‍या फोटो पर हार पहनाकर किसी भगवान या ईश्‍वर को फोटो से बाहर निकाला सकता है? शायद बरसों से सभ्‍यता-संस्‍कृति नुमा फोटो पर हार पहना-पहनाकर अपनी प्राचीन समाज-व्‍यवस्‍था को व्‍यावहारिक रूप देने का प्रयास किया जा रहा है जो हमारे सामने है.

विचार तो बहुत आ रहे हैं. संक्षेप में आपके हमारे दुख-दर्द एक समान तो फिर क्‍या दोहराना.

हो.''

ऋषभ उवाच ने कहा…

प्रो.एम.वेंकटेश्वर जी ने ईमेल से यह टिप्पणी भेजी है -


आदरणीय ऋषभदेव जी,
आपके द्वारा प्रेषित कहानी या सच्ची घटना - जो भी हो, मार्मिक तो है ही
साथ ही बहुत ही अमनवीय भी .लेकिन ऐसी घटनाएं तो आये दिन हमारे तथाकथित
सभ्य समाज में घटित हो ही रही है . यह घटना तो राजस्थान के सुदूर किसी
गंव में घटित हुई जहां कि गांव की पंचायत ने उस स्त्री को डायन घोषित
किया और उसे अमानुष नारकीय यातना से त्रस्त किया . ऐसी वारदाते हमारे देश
में बहुत होती हैं लेकिन कुछ ही प्रकाश में आती है. निष्कर्ष यही है कि
आज भी हमारे देश में शिक्षित और अशिक्षित के भेद के बिना सभी वर्गों के
लोगों में अन्धविश्वास और अतिरंजित चमत्कारों में अटूट विश्वास खुलकर
दिखाई देता है .
जिस देश के मन्दिरों की गणेश की शिला प्रतिमाएं क्षीर पान करतीं हों, जहा
का सागर का जल एकाएक मीठा हो जाता हो, जहां संभ्रान्त घरों में साई बाबा
की प्रतिमा से विभूति का चूर्ण बरसने लगता हो, जहां स्त्रियों ही नहीं
बल्कि पुरुषों के सपनों में भी देवी या काली माई प्रकट होकर भक्तों को
सम्पन्नता प्राप्त करने के गुर सिखाती हों. बडे बडे शहरों के सम्पन्न
घरों में बहुओं को पीहर से मोटी रकमें न ला पाने के अपराध में पति समेत
घर सभी सदस्य आत्महत्या करने की स्थितियां पैदा करते हों - उस समाज को
क्या
कहिएगा ? ( हाल ही की घटना - हैदराबाद के -मनोहरलाल अग्रवाल की बहू की
आत्महत्या की घटना ) . हमारे देश में स्त्री का अस्तित्व हर पल दांव पर
ही लगा रहता है . स्त्री हर रूप में, हर परिस्थिति में अमानुषी व्यवहार
की
शिकार ही रही है . जिस देश में आज भी सूर्य और चन्द्रमा को राहु ग्रसता
हो, उस देश में यही तो सब होगा और होता रहेगा .


एम वेंकटेश्वर