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रविवार, 13 नवंबर 2011

लोकतंत्र और भारतीय भाषाओं में राम साहित्य की प्रासंगिकता


 [साठ्ये महाविद्यालय, मुंबई में 2 /3 /4  दिसंबर,2010  को संपन्न त्रिदिवसीय अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में पढ़ा गया आलेख] 

रामकथा अपने उदात्त जीवन मूल्यों के कारण हजारों वर्षों  से विश्व भर के अनेक भाषा समाजों में व्याप्त ऐसी गाथा है जिसने देशकाल की सीमाओं के पार मनुष्यता का मार्गदर्शन किया है। यह कथा इतनी लचीली है कि लौकिक और शिष्ट साहित्य - दोनों ही में इसके अनेक संस्करण उपलब्ध होते हैं। इसके बावजूद रामकथा का मूलभूत स्वरूप और संदेश एक जैसा है। इसीलिए समय-समय पर राम साहित्य का नई मान्यताओं और नई चुनौतियों के संदर्भ में पुनर्पाठ होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र की दृष्टि से भारतीय भाषाओं के राम साहित्य की प्रासंगिकता खोजने का प्रयास भी इसी पुनर्पाठ प्रक्रिया का एक अंग है।

स्मरणीय है कि भारत की प्रायः सभी प्रमुख भाषाओं के साथ साथ राम साहित्य की एक सुदीर्घ परंपरा भारतीय बोलियों के अलिखित और लिखित साहित्य में भी उपलब्ध होती है। इस पर लोकतंत्र के संदर्भ में विचार करना हो तो सबसे पहले हमें यह देखना होगा कि मुख्य भाषाओं और बोलियों में उपलब्ध राम साहित्य की प्रकृति किस प्रकार की है, उसमें क्या-क्या समानताएँ और भिन्नताएँ है। इस दृष्टि से विचार करने पर पता चलता है कि भाषाओं और बोलियों के राम साहित्य की प्रकृति में कुछ ऐसे अंतर हैं जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता क्योंकि ये अंतर लोकतंत्र की दृष्टि से बड़े महत्व के हैं। राम साहित्य के अध्येताओं का ध्यान इस तथ्य की ओर जाना चाहिए कि मुख्य भारतीय भाषाओं में स्वीकृत रामकथा में अभिजात वर्ग और सामान्य वर्ग - दोनों प्रकार के पात्र चित्रित हैं, परंतु बोलियों में प्रचलित रामायणों में प्रायः सारे के सारे पात्र सामान्य वर्ग के हैं अर्थात वहाँ राम और सीता भी राज परिवार से नहीं, अपितु किसी सामान्य परिवार से आते हैं। यहाँ असम में प्रचलित रामकथा का उल्लेख प्रासंगिक होगा। असम में विभिन्न बोलियों में कुल तीस रामकथाएँ प्रचलित हैं। इनमें एक बोली है करबी। मूलतः करबी एक जनजाति है जो खेती किसानी का काम करती है और पर्वतीय क्षेत्र में निवास करती है। वहाँ की भौगोलिक परिस्थितियाँ इस प्रकार की हैं कि इन लोगों के गाँव और खेतों के बीच बहुत दूरी होती है। खेतीबाड़ी के लिए गाँव से बहुत दूर जाना पड़ता है। पहाड़ी जमीन को ठीक-ठाक करके किसान उसमें फसल उगाता है और फसल कटने तक उसे वहीं रहना पड़ता है। ऐसे ही एक किसान को खेत में काम के दौरान मोर-मोरनी के अंडे मिल जाते हैं जिन्हें वह उठाकर घर पर ले आता है और फिर खेती पर चला जाता है। इन अंडों से सीता का जन्म होता है जो इस किसान के घर में बड़ी होती है, उसकी पत्नी से विभिन्न प्रकार की हस्तकलाएँ सीखती है, बहुत अच्छा मछली भात बनाती है और फिर एक दिन किसान के लिए खेत पर भोजन लेकर जाती है। लंबे समय से घर से दूर खेत पर रह रहा किसान उसे पहचान भी नहीं पाता।  आगे चलकर वह कन्या पशुपालन और खेतीबाड़ी में भी प्रवीणता प्राप्त करती है और उसका विवाह भी एक जनजातीय युवक से होता है। इस तरह करबी रामायण में सीता और राम दोनों ही जनजाति से संबंधित हैं तथा अन्य भी कोई पात्र अभिजात वर्ग का नहीं है। इस दृष्टि से लिखित अलिखित परंपरा से उपलब्ध विभिन्न रामकथाओं को फिर से देखने की जरूरत है क्योंकि यह भारतीय लोक का एक सच है कि रामकथा में सदा से जन समाज से मिलने की प्रकृति विद्यमान रही है। जन से जुड़ाव की यह प्रकृति राम साहित्य को लोकतंत्र के संदर्भ में खासतौर पर प्रासंगिक बनाती है। यहाँ यह कहना भी अप्रासंगिक न होगा कि कृष्णकथा में यह प्रकृति प्राप्त नहीं होती। कृष्ण लोक और जनजाति के बीच में पलने बढ़ने के बावजूद अंततः देवता के रूप में परिणत हो जाते हैं। राम अभिजात से जन की ओर बढ़ते दीखते हैं जबकि कृष्ण जन से अभिजात की ओर। ध्यान रहे कि लोकतंत्र की मूलभूत स्थापना है कि सत्ता को जनता की ओर बढ़ना चाहिए। राम साहित्य के जनाभिमुख होने की व्याख्या यहाँ राजतंत्र के लोक की ओर उन्मुख होने के रूप में जा सकती है और इसी से आधुनिक समय में राम साहित्य की प्रासंगिकता उजागर होती है।

राम साहित्य की प्रकृति संबंधी चर्चा को आगे बढ़ाते हुए हम यह देख सकते हैं कि रामकथा में भारतीय सामाजिक ढाँचे को बनाए रखने की कोशिश निहित है। वह ढाँचा पारिवारिक संबंधों के रूप में हो सकता है और सामाजिक नैतिक मूल्यों के रूप में भी। इसीलिए राम साहित्य को मर्यादा के संदर्भ में व्याख्यायित किया जाता है। लोकतंत्र की दृष्टि से इसकी यह व्याख्या की जा सकती है कि राम साहित्य में सामाजिक संरचना और मूल्यों की रक्षा के लिए अन्याय का प्रतिकार दर्शाया गया है। राम का पूरा जीवन अन्याय के प्रतिकार को समर्पित है परंतु वे इस कार्य में सफल होने के लिए अयोध्या के राजमहल से बाहर निकलते हैं तथा ऋषि मुनियों से लेकर निषाद और वानरों तक उन सब वर्गों से जुड़ते हैं जो रावण जैसी अलोकतांत्रित शक्ति के आतंक तले दलित मर्दित थे तथा अलग अलग होने के कारण उसका प्रतिकार नहीं कर पाते थे; निर्वासित जीवन और अज्ञातवास भोगने के लिए मजबूर थे। भारतीय भाषाओं का राम साहित्य यह दर्शाता है कि अभिजात वर्ग या राजतंत्र अकेले अपने भरोसे किसी भी अन्याय का सफलतापूर्वक प्रतिकार नहीं कर सकता। इसके लिए उसे व्यापक जनशक्ति अथवा लोक के पास जाना पड़ता है। राम लोकाभिराम ही नहीं लोकाभिमुख भी हैं। उनका जीवन व चरित्र यह सिद्ध करता है कि जनता की व्यापक भागीदारी के बल पर ही सामाजिक मूल्यों की रक्षा की जा सकती है। जब राम शास्त्रमर्यादा के लिए लोकसमर्थन से शस्त्र उठाते हैं तो वे सच्चे समन्वयकारी प्रतीत होते हैं। इसके लिए जन उन्हें नई नैतिकता की स्थापना करने की स्वीकृति भी देता है। आततायी का अंत करने के लिए यदि छल भी अपनाना पडे़ तो लोक के हित में ऐसा करना उचित है। जंगल जंगल पर्वत पर्वत सुग्रीव अपनी प्रजा के साथ मारा मारा फिर रहा है। बालि का सामना करने का साहस किसी में भी नहीं। राम उसे छल से मारते हैं लेकिन इससे राम का अपयश नहीं होता बल्कि यही स्थापित होता है कि अन्यायी को मारने के लिए शास्त्र के रास्ते से भी हटा जा सकता है। लेकिन यह तभी तक संभव है जब तक राम को जनशक्ति का समर्थन प्राप्त है। इसके विपरीत जब राम अभिजात वर्ग के यंत्र बनकर शंबूक वध जैसे कृत्य में संलग्न होते हैं तो उनका यह कार्य अपयश का ही कारण बनता है। यही कारण है कि भवभूति जैसे कवियों ने अग्निपरीक्षा, सीता निर्वासन और शंबूक वध के प्रसंगों में राम को बड़ा बेबस दिखाया है - आत्मग्लानि में गलता हुआ एक विवश राजा। अभिप्राय यह है कि राम साहित्य जनशक्ति की अनिवारता का प्रतिपादन करने वाला साहित्य है और उसे जनविरोध नितांत भी स्वीकार नहीं है। यही कारण है कि तुलसी ने छाया सीता की कल्पना की और सीता निर्वासन तथा शंबूक वध जैसे प्रसंगों को छोड़ दिया। उन्हें जनविरोधी प्रसंगों को राम के चरित्र में शामिल करना अलोकतांत्रिक लगा होगा। यहीं यह भी कहते चलें कि राम साहित्य की चिरतंनता का एक आधार यह भी है कि वह मूल्यों को जड़ नहीं मानता। उसके माध्यम से हर युग में मूल्य व्यवस्था को पुनर्पारिभाषित करना संभव है जो किसी इतिवृत्त के लोकतांत्रिक होने का एक सुदृढ़ आधार हो सकता है। उल्लेखनीय है कि राम जब अन्याय का प्रतिकार करने के लिए छल का सहारा लेते हैं तो विभिन्न भारतीय भाषाओं के रामायणकार अपने अपने ढंग से उनका बचाव करते हैं। तुलसी ने जिस प्रकार पहले नीति की बात करके बाद में पूरे प्रसंग का पर्यवसान भक्ति और मुक्ति में किया है, उसी प्रकार मणिपुरिया रामायण में भी बालि वध प्रसंग की व्याख्या सामाजिक मर्यादा और नैतिकता के संदर्भ में की गई है। अभिप्राय यह है कि भारतीय मूल्यों की रक्षा की मूल प्रवृत्ति विविध भारतीय भाषाओं के राम साहित्य में समान रूप से सुरक्षित है जो लोकतंत्र के बड़े काम की चीज है।

यहाँ मैं पूर्वोत्तर भारत के एक वर्तमान रामायणविद का उल्लेख करना चाहूँगा। ये हैं मिस्टर लमारे। लमारेजी यों तो ईसाई हैं परंतु रामसाहित्य के समर्पित अध्येता हैं। उनके लिए रामायण कोई धर्मग्रंथ नहीं है बल्कि समग्र भारत को एक करनेवाला ऐसा तत्व है जिसकी उपेक्षा उन्हें कष्ट देती है। वे मेघालय में हैं और खासी जनजाति पर काम कर रहे हैं। उनके पास खासी रामायण की हस्तलिखित प्रति सुरक्षित है। इस रामायण में विस्तार से विभिन्न खासी परंपराओं का उल्लेख मिलता है। स्मरणीय है कि खासी रामायण के राम का राजतंत्र से कोई संबंध नहीं है। वे जनजातीय पृष्ठभूमि से आते हैं और उनकी प्रकृति पूरी तरह जनजातीय है। खासी जनजाति के तमाम युवकों की तरह उनके राम भी शिकारप्रिय हैं, खेती करते हैं, फल फूल उगाते हैं - पूरी तरह सामान्य जन हैं ; और अपनी इस सामान्यता के सहारे ही वे सभ्यता के विकास में सहयोग करते हैं। प्रायः लोग इस तथ्य पर विस्मय जताते हैं कि पूर्वोत्तर भारत के अन्य सब राज्यों में उग्रवाद के फलने फूलने के बावजूद मेघालय में उग्रवाद नहीं बढ़ सका। इसके कारणों का विवेचन करें तो पता चलेगा कि मेघालय में उग्रवाद के आसार दिखाई देते ही खासी जनजाति के बुद्धिजीवियों ने संगठित रूप में उसका खुलकर विरोध किया। इसमें राम साहित्य की जनाभिमुखता की भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता जिसके कारण वे स्वयं को मुख्यभूमि से सम्बद्ध मानते हैं। मिस्टर लमारे जैसे बुद्धिजीवियों को इस बात से मानसिक कष्ट है कि मुख्यभूमि भारत की ओर से राम साहित्य जैसे जनाभिमुख अभियान पूर्वोत्तर की जनता को सांस्कृतिक स्तर पर अपने साथ जोड़ने के लिए क्यों नहीं चलाए जा रहे हैं। वे बताते हैं कि अपनी चीन यात्रा के दौरान उन्हें यह देखकर आश्चर्य हुआ कि वहाँ हर शहर में तिब्बत के स्थानों और धर्मगुरुओं के नाम पर बड़े बड़े होटल हैं, बल्कि कहें कि ऐसे होटलों की पूरी शृंखला चीन भर में है तथा एक स्थान से अन्य किसी भी स्थान के लिए बुकिंग आदि की सुविधा इन होटलों में प्राप्त है। इसका परिणाम यह होता है कि कोई तिब्बती यात्री चीन के किसी शहर में अपने आपको वैसा अलग थलग महसूस नहीं करता जैसा पूर्वोत्तर भारत का यात्री मुख्यभूमि  भारत में महसूस करता है। लमारे चाहते हैं कि चीन ने तिब्बत को अपनाने की यह जो रणनीति अपनाई है, भारत को इससे सबक लेना चाहिए। वे चाहते हैं कि मुख्य भारत मेघालय आदि को इसी प्रकार अपनाए। राम मेघालय के जनजातीय समाज के लिए कोई हिंदू देवता नहीं हैं, बल्कि उनके अपने हैं। भले ही खासी लोग ईसाई हो गए हों लेकिन राम और रामायण को उन्होंने नहीं छोड़ा है। रामकथा की इस लोक व्याप्ति का उपयोग लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए किया जा सकता है। जनजातियों की रामकथा के प्रसंग उनके मानस में अंत्योदय की भावना के रूप में साकार होते दिखाई देते हैं जिन्हें सर्वस्वीकृति के साथ केंद्र से जोड़े जाने की जरूरत है।

लोकतंत्र की दृष्टि से यह तथ्य भी ध्यान खींचता है कि भारत में, और भारत के बाहर भी, रचित राम साहित्य के सभी रूपों में समान रूप से यह प्रकृति पाई जाती है कि इसमें समाज के सभी वर्ग स्वतंत्र अभिव्यक्ति प्राप्त करते हैं। किसी पर किसी प्रकार का बंधन नहीं, किसी में कोई कुंठा नहीं। राम का अपनी यात्रा के दौरान विभिन्न वर्गों से साबका पड़ता है - सहयोगी भी, विरोधी भी। ऐसे पात्र अपने व्यवहार और भाषा में, अपने आचरण और अभिव्यक्ति में, अपने वर्गीय चरित्र को नहीं छिपाते बल्कि निषाद, शूर्पणखा, शबरी, सुग्रीव, समुद्र, विभीषण और रावण भी - सबका व्यवहार और भाषा अपने अपने वर्ग के अनुरूप हैं। अपने वर्गीय चरित्र की निष्कपट अभिव्यक्ति इन्हें जनमानस के निकट लाने में सहायक बनती है। ये सभी प्रकारांतर से जीवन के परम उद्देश्य तक पहुँचने के अलग अलग मार्गों के प्रतीक हैं - प्रेम का मार्ग, ज्ञान का मार्ग, भक्ति का मार्ग, विरक्ति का मार्ग और द्वेष का मार्ग। यहाँ दशरथ और रावण दोनों ही अपने-अपने मार्ग से सद्गति प्राप्त करते हैं। सभी भाषाओं के कवियों ने इन मार्गों का सम्मान किया है। साधना के क्षेत्र में साधक के अपने व्यक्तित्व और परिवेश के अनुरूप अलग अलग पद्धति की स्वीकृति को राम साहित्य की लोकतांत्रिकता के रूप में भी देखा जा सकता है - अर्थात सब वर्गों की समानता, सब मतों की समानता। स्मरणीय है कि समानता लोकतंत्र के तीन आधारों में प्रमुखता के साथ शामिल है - स्वतंत्रता, समानता, बंधुता।

लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सर्वाधिक महत्व है क्योंकि उसी से अन्य सारी स्वतंत्रताएँ विकसित होती हैं। राम साहित्य अभिव्यक्ति की इस स्वतंत्रता का भी प्रतीक है। रामकथा के माध्यम से आत्माभिव्यक्ति करते समय कवि और कलाकार किसी प्रकार की धार्मिक रूढ़ियों की परवाह करते नहीं दिखाई देते। इंडोनेशिया और कोरिया जैसे देशों में धर्म की भिन्नता के बावजूद राम साहित्य की रचना और प्रस्तुति इसका प्रबल प्रमाण है। इस्लाम में मुखौटों या मूर्त साधनों का प्रयोग धर्मविरुद्ध समझा जाता है परंतु इंडोनेशिया में रामकथा की प्रस्तुतियों में इनका व्यापक प्रयोग धार्मिक रूढ़िवाद पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को तरजीह देने का सूचक है। आज के समय में जब सत्ता द्वारा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को अलग अलग तरह के बहाने बनाकर स्थगित करने के षड्यंत्र  करना आम बात है, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की चुनौती बन गई है। अपने विरोधियों को केवल इसलिए मार डालना या मरवा देना कि उनकी विचारधारा आपकी विचारधारा से मेल नहीं खाती, सर्वथा अलोकतांत्रिक है। ऐसी परिस्थितियों में राम साहित्य हमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का सम्मान सिखाता है।

इस बात की ओर भी ध्यान दिया जाना चाहिए कि राम कथा में आरंभ से आज तक जो अनेक रूपांतरण कथा संयोजन से लेकर चरित्रांकन तक के क्षेत्र में हुए हैं, वे भी इसमें निहित व्यक्ति स्वातंत्र्य की प्रकृति के सूचक हैं. चाहे स्वयंभू कृत 'पउमचरिउ' की सीता के विद्रोही तेवर की बात करें अथवा नरेश मेहता कृत 'संशय की एक रात' के राम के अंतर्द्वंद्व की; चाहे भगवान सिंह कृत 'अपने अपने राम' में निहित जनवादी संदर्भों को देखें अथवा प्रतिभा सक्सेना कृत 'उत्तरकथा' में रावण के औदात्य को - राम साहित्य के ये तमाम रूपांतरण युगीन और सामाजिक संदर्भों से जुड़े प्रतीत होते हैं. इन परिवर्तनों में स्त्रीपक्षीय परिप्रेक्ष्य भी अत्यंत मुखर है.यहाँ एक पल ठहरकर डॉ. अंबेडकर की इस स्थापना पर पुनर्विचार करना समीचीन होगा कि उन्हें व्यक्ति स्वातंत्र्य की दृष्टि से इस्लाम, ईसाईयत और बौद्धमत ने आकृष्ट किया - खास तौर पर बौद्धमत ने. कहना न होगा कि राम साहित्य इस दृष्टि से और भी लोकतांत्रिक प्रकृति का साहित्य है. वह युगीन परिस्थिति के अनुसार नए रूपाकार में आसानी से ढल जाता है. अगर सांप्रदायिक संकीर्णताओं से हटकर विचार करें तो भारतीय भाषाओँ का राम साहित्य व्यक्ति स्वातंत्र्य का प्रबल पोषक दिखाई देगा. रचनाकारों और उनके समय के अंतर्विरोधों के बावजूद राम साहित्य अपनी लोकतांत्रिक प्रकृति के कारण प्रत्येक युग में युगीन प्रश्नों से जूझकर अपनी प्रासंगिकता सिद्ध करता रहा है.

मेरी दृष्टि में राम साहित्य लोकतांत्रिक व्यवस्था के जनता, समाज और राज्य जैसे मानकों की मर्यादा रक्षा का साहित्य है। कभी कभी इस साहित्य को शोषक व्यवस्था के संरक्षक के रूप में भी देखने दिखाने की कोशिश की जाती है जो वास्तव में खंडदृष्टि का परिणाम है। जैसा कि रवींद्रनाथ टैगोर ने अपने साहित्य में अनेक स्थलों पर प्रतिपादित किया है (उदाहरणार्थ गोराको देखा जा सकता है), भारत के मनीषियों ने वर्ण, पुरुषार्थ और आश्रम पर आधारित जो समाज व्यवस्था बनाई थी, वह केवल भारत के लिए नहीं थी बल्कि विश्व मानवता के समक्ष प्रस्तुत इस यक्ष प्रश्न का उत्तर थी कि मनुष्य, समाज बनाकर कैसे रहे। विभिन्न सभ्यताओं ने इस प्रश्न का उत्तर देने का प्रयास किया - व्यवस्थाएँ बनाईं पर वे या तो लागू नहीं हो सकीं या अधूरी लागू हुईं। यूनान और यूरोप के कुछ भागों में सामाजिक प्रश्नों की अपेक्षा आर्थिक प्रश्नों के महत्वपूर्ण बन जाने के कारण और कुछ में धार्मिक प्रश्नों के हावी हो जाने के कारण वे व्यवस्थाएँ पिछड़ गईं, मारामारी में तब्दील हो गईं। भारत ने भी समाज व्यवस्था का अपना मॉडल बनाया और लागू किया। उसकी दीर्घ उत्तरजीविता का श्रेय इस तथ्य को जाता है कि उसमें समाज ही महत्वपूर्ण बना रहा, सामाजिक मूल्यों पर आर्थिक और राजनैतिक मूल्य हावी नहीं हो सके। रामकथा की स्वीकृति प्रकारांतर से विश्व मानवता के लिए इस समाज व्यवस्था को प्रस्तावित करती है जो लोकतंत्र युग में इस साहित्य की प्रासंगिकता का एक सुदृढ़ आधार है। यहाँ यह याद रखना जरूरी है कि रामायण काल तक जाति का उदय नहीं हुआ था, जाति की अवधारणा महाभारतकालीन है। वर्ण और आश्रम को समाज व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत करने वाला राम साहित्य यह भी प्रस्तावित करता है कि हर प्रकार की व्यवस्था असफल हो सकती है यदि उसे पुरुषार्थ व्यवस्था से न जोड़ा जाए। विभिन्न भारतीय भाषाओं का राम साहित्य यह दर्शाता है कि समाज व्यवस्था के लिए सभी वर्गों-वर्णों का ज्ञान और शिक्षा से जुड़ना जरूरी है तथा विवेक,ज्ञान और प्रयोगधर्मिता ही लोकसंग्रह, लोकमंगल और लोकरक्षण का आधार बन सकते हैं। इसके लिए जरूरी है कि रामसाहित्य को पूर्वग्रहमुक्त होकर देखा जाए। पुनर्पाठ की इस प्रविधि में यह स्थापना हमारी सहायता कर सकती है कि इकाइयाँ महत्वपूर्ण नहीं होतीं, उनके अंतर्संबंध महत्वपूर्ण होते हैं। राम साहित्य समाज की विभिन्न इकाइयों के सामंजस्यपूर्ण संबंध का समर्थन करता है जो सामाजिक न्याय और बंधुता के लोकतांत्रिक सिद्धांतों के अनुरूप है। राम विभिन्न आदिवासियों, वनवासियों या जनजाति समाजों को गले लगाते हैं अर्थात सामाजिक व्यवस्था की परिधि पर स्थित वर्गों को केंद्र में लाते हैं और उनकी सहायता से अन्याय और अत्याचार के सबसे बड़े गढ़ को तोड़ने में सफलता प्राप्त करते हैं। यह तथ्य आधुनिक लोकतंत्र के बड़े काम का है कि युद्ध के बाद सभी वर्गों के प्रतिनिधियों को उनके क्षेत्रों में स्वायत्तता प्रदान की जाती है। राजनैतिक परिवर्तन करने के लिए विभिन्न वर्गों का उपयोग करनेवाले राजनैतिक दल जनशक्ति को बाद में उपेक्षित छोड़ देते हैं जिससे वह अंततः राज्यविरोधी शक्ति के रूप में परिणत हो जाती है। जनसमर्थन  और जनशक्ति का सम्मान न करने वाली व्यवस्थाएँ जनप्रवाह में बह जाने के लिए अभिशप्त हुआ करती हैं। ऐसी स्थिति में संगठित होकर जनशक्ति ऐसे व्याध का रूप ले लेती है जो सत्ता के तलुवों को तीर से बींध कर उसके पुनःउदय की संभावनाओं तक को नेस्तनाबूद  कर डालता है। राम साहित्य में इस जनशक्ति की स्वीकृति लोकतंत्र के संदर्भ में उसकी प्रासंगिकता को ही सिद्ध करती है।


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