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शनिवार, 27 अगस्त 2011

समाजभाषिक अनुसंधान पर डॉ.कविता वाचक्नवी का व्याख्यान



'साहित्य के समाजभाषिक अध्ययन की शोध प्रविधि' पर व्याख्यान संपन्न.

हैदराबाद, २६.०८.२०११ 

उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में आज यहाँ `विश्वंभरा' संस्था  की महासचिव डॉ.कविता वाचक्नवी ने `साहित्य के समाजभाषिक अध्ययन की शोध प्रविधि' विषय पर विशेष व्याख्यान दिया. लंदन  से संक्षिप्त यात्रा पर हैदराबाद आई हुईं  कवयित्री डॉ.वाचक्नवी ने एम.फिल. के शोधार्थियों को संबोधित  करते हुए अपने व्याख्यान में समाज-भाषाविज्ञान और साहित्यिक अनुसंधान को जोड़ने पर बल दिया. उन्होंने  कहा कि समाजभाषिक अनुसंधान  के द्वारा किसी भी साहित्यिक कृति के मर्म तक पहुँचा जा सकता है और उसके पाठ में निहित सामाजिक, सांस्कृतिक, लोकतात्विक तथा वैचारिक पक्षों का खुलासा किया जा सकता है. उन्होंने  रंग-शब्दावली के माध्यम से निराला के काव्य के पाठ-विश्लेषण के उदाहरण द्वारा इस प्रकार के शोध की प्रविधि की व्याख्या की. 

आरंभ में डॉ.जी.नीरजा ने अतिथि वक्ता का परिचय दिया. अध्यक्षीय उदबोधन  में प्रो.ऋषभदेव शर्मा ने साहित्य के समाजभाषिक अध्ययन की संभावनाओं  पर प्रकाश डाला. चर्चा सत्र में मुख्य वक्ता ने शोधार्थियों की जिज्ञासाओं का भी समाधान किया. संयोजन  डॉ.मृत्युंजय सिंह ने किया तथा अंत में डॉ.गोरखनाथ तिवारी ने  धन्यवाद प्रकट किया. 

चित्र परिचय 
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान में `साहित्य के समाजभाषिक अध्ययन की शोध प्रविधि' विषय पर व्याख्यान के अवसर पर मुख्य अतिथि डॉ.कविता वाचक्नवी, अध्यक्ष डॉ.ऋषभदेव शर्मा, प्राध्यापक गण डॉ.गोरखनाथ तिवारी, डॉ.बलविंदर कौर, डॉ. जी. नीरजा, डॉ. मृत्युंजय सिंह  एवं अन्य .
स्वतंत्र वार्त्ता /27 अगस्त 2011 /पृष्ठ-3

5 टिप्‍पणियां:

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

एक सार्थक प्रयास हिन्दी को शोध में प्रस्थापित करने के लिये।

चंद्रमौलेश्वर प्रसाद ने कहा…

काश! हम भी आने की स्थिति में होते :(

NSHAH ने कहा…

कविताजी का गहन अध्यन उनके विचारों को सुगमता से प्रस्तुत करता है

डॉ.कविता वाचक्नवी Dr.Kavita Vachaknavee ने कहा…

रोचक,वभावुक व आत्मीय अनुभव था।

आपका व PG & Research Institute, DBHPS के सभी अध्यापकों व छात्रों का अतिशय धन्यवाद।

akbar ने कहा…

नमस्ते सर, आप की रचनाएँ पढ़ने का अवसर अब इंटरनेट पर भी पढ़ने का मुझे प्राप्त होगा मैंने कभी नहीं सोचा था। 
सधन्यवाद!