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गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

मुनींद्र जी और उनकी हिंदीनिष्‍ठा



स्मृति  लेख

मुनींद्र जी को याद करना मेरे लिए हैदराबाद के हिंदी परिवार के किसी पुरखे को याद करने जैसा है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर हिंदी आंदोलन तक उन्होंने जो भूमिका निभाई, उसके कारण वे राष्‍ट्रीयता और भाषा दोनों ही क्षेत्रों में हमारी पीढ़ी के आदरणीय और मार्गदर्शक बन गए। इन दोनों आंदोलनों ने मुनींद्र जी को उदारता का जो पाठ पढ़ाया उससे उनके व्यक्‍तित्व में एक खास तरह का बड़प्पन आ गया था, जिसके समक्ष सहज ही सम्‍मान से नतमस्तक होने की इच्छा होती थी। इसमें शक नहीं कि किसी व्यक्‍ति की करनी और कथनी में औदात्य तभी आता है जब उसने अपने जीवन को इस तरह तपाया हो कि अंतश्‍चेतना में औदात्य का उजाला जाग उठे। हमारे मन में उदात्तता का संस्कार होगा तो हमारे कर्मों और लेखन में भी उसे प्रभावी अभिव्यक्‍ति मिलेगी। मुनींद्र जी ने भी स्वतंत्रता आंदोलन के जमाने में अपनी किशोर अवस्था में इस औदात्य के संस्कार को तप तपकर अर्जित किया था।

मुनींद्र जी ने ‘कल्पना’ और ‘दक्षिण समाचार’ के माध्यम से, और अपने व्याख्यानों तथा वक्तव्यों के माध्यम से भी, हिंदी भाषा के मानकीकरण और पारिभाषिक शब्दावली की एकरूपता की जोरदार वकालत की। परिनिष्‍ठित भाषा का यह संस्कार उन्होंने ‘आज’ से पाया था। उल्लेखनीय है कि पूर्वी और पश्‍चिमी प्रभाव से मुक्‍त हिंदी अथवा खड़ीबोली को संस्कारित करनेवाले आंदोलन के इतिहास में हिंदी पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्मरणीय है कि हिंदी पत्रकारिता का स्वरूप कभी भी ठेठ हिंदी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। इसलिए भाषा वैविध्य के अप्राकृतिक रूपों को तो काटने छाँटने के प्रयत्‍न हुए, लेकिन समाज स्वीकृत शैलीय भेदों के प्रयोग को हमेशा पत्रकार की भाषाई और सर्जनात्मक शक्‍ति के रूप में देखा गया। मुनींद्र जी भी मानकीकरण और वैविध्य के इस समानांतर चलनेवाले दोहरे मार्ग के सतत यात्री थे। उन्होंने सदा इस बात पर बल दिया कि हिंदी के लिए प्रचार की अपेक्षा प्रयोग की ज्यादा जरूरत है। इसीलिए उन्हें यह बात कतई नापसंद थी कि लोग हिंदी के नाम पर वैसे तो बड़े बड़े जलसे करें लेकिन चिट्ठियों पर पते अंग्रेज़ी में लिखे अथवा विवाह जैसे पारिवारिक और सांस्कृतिक आयोजन के निमंत्रण पत्र अंग्रेज़ी में छपवाएँ। वे चाहते थे कि हम अपने दैनिक जीवन में हर छोटॆ बड़े कार्य में हिंदी लिखने बोलने के आग्रही बनें - प्रचार से आगे प्रयोग का यही अर्थ है। हिंदी के साथ वे प्रांतीय भाषाओं का चोली दामन का साथ मानते थे और उन्हें तब बहुत बुरा लगता था जब कोई व्यक्‍ति हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को परस्पर प्रतिद्वन्द्वी के रूप में पेश करता था। उन्होंने एक स्थान पर लिखा भी है कि "भाषा अभिलेखागार की वस्तु नहीं है वह तो प्रयोग पर जीती और विकसित होती है। प्रयोगच्युत भाषा को सिर्फ परीक्षाओं के द्वारा न तो बचा सकते हैं न बढ़ा सकते हैं।"

हिंदी के प्रति यह आग्रह मुनींद्र जी ने स्वतंत्रता आंदोलन से ही विरासत में पाया था। स्मरणीय है कि महात्मा गांधी की राष्‍ट्रीय चेतना जितनी प्रखर थी उनका भाषा संबंधी दृष्‍टिकोण भी उतना ही प्रबल था। यही बात डॉ.राम मनोहर लोहिया पर भी सटीक उतरती है। मुनींद्र जी इन दोनों विभूतियों से प्रभावित थे। इस कारण उनके व्यक्‍तित्व और लेखन में राष्‍ट्रीयता और स्वभाषा के प्रति गहरा आग्रह दिखाई देता है। उनकी इस भाषा निष्‍ठा को कर्म रूप में परिणत करने में बद्रीविशाल पित्ती और डॉ.आर्येंद्र शर्मा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। पहले के संपर्क ने उन्हें शिष्‍ट, विनम्र, किंतु स्वाभिमानी एवं संघर्षशील पत्रकार का व्यक्‍तित्व विकसित करने में मदद की तो दूसरे ने ‘कल्पना’ के प्रधान संपादक के रूप में भाषा की शुद्धता, शब्दों के उपयुक्‍त चयन और हिंदी भाषा के विन्यास के अनुपालन की ओर प्रवृत्त किया। डॉ.आर्येंद्र शर्मा के निर्देशन में काम करते हुए ही मुनींद्र जी ने पहली बार यह अहसास किया कि लेखक और पाठक के बीच में संपादक की एक विशेष भूमिका होती है।

मुनींद्र जी के मन में एक संपादक या पत्रकार की भूमिका की धारणा एकदम साफ थी। वे चाहते थे कि स्वतंत्र भारत के निर्माण और उसके छवि गठन में पत्रकारिता अहम सर्जनात्मक भूमिका निभाए। परंतु आजादी के बाद जिस तरह से पत्रकारिता के मान मूल्यों का पतन हुआ उससे वे बड़े दुःखी थे। यह तथ्य उन्हें बहुत चुभता था कि जिस तरह राजनीति में हमने सेवा के बदले उपभोग को प्राथमिकता दी, उसी तरह पत्रकारिता क्षेत्र में जन शिक्षण के बदले मनोरंजन को महत्व दिया। उन्हें इस बात पर बड़ा खेद था कि "स्वतंत्र देश के नागरिकों का क्या दायित्व बनता है, यह बताने के बजाय हमने यह देखा कि हमारे नागरिकों की क्या पसंद है, और क्या पढ़ना पसंद करेंगे, इस दृष्‍टि से पत्र - पत्रिकाओं की सामग्री का संयोजन होने लगा। जिस तरह स्वतंत्रता सेनानियों का ध्यान सेवा और त्याग से हट कर सत्ता के उपयोग की ओर चला गया, उसी तरह पत्रकारों का ध्यान पाठकों के मनोरंजन की ओर चला गया। पत्रकारिता अब व्यवसाय और उद्‍योग बन गई।" 

जैसा कि मैंने पहले भी कहा मुनींद्र जी की पीढ़ी के लोगों के लिए राष्‍ट्रीयता और स्वभाषा एक ही सिक्के के दो पहलू भर थे - स्वदेशी का सिक्का। उनकी स्वदेशी भावना को संपूर्ण पृथ्वी को कुटुंब मानने की उदारता प्रिय थी। लेकिन अपने जीवन के अंतिम समय में जब उन्होंने इस भावना पर संपूर्ण विश्‍व को बाजार मानने की धारणा को हावी होते देखा तो वे विचलित हो उठे। उन्हें लगता था कि भारत को वैश्‍वीकरण के नारे ने अपने आकर्षण में फांस लिया है। उनका यह विचार आज भी अत्यंत प्रासंगिक है कि "अब ‘स्वदेशी’ जैसी कोई विचारधारा नहीं रह गई है। लेकिन हम लोग जो स्वतंत्रतापूर्व की पीढ़ी के हैं, उन्हें वैश्‍वीकरण का नारा एक छलावा लगता है, अंतरराष्‍ट्रीय आर्थिक शोषण का एक औज़ार लगता है। हमारी लगभग सभी राजनैतिक पार्टियाँ वैश्‍वीकरण के मोहजाल में फँस गई हैं। हम मानते हैं कि प्रत्येक देश को अपने प्राकृतिक संसाधनों और श्रम-शक्‍ति के आधार पर अपने आर्थिक ढ़ाँचे का निर्माण करना चाहिए। दूसरे देशों के साथ विनिमय अथवा लेनदेन के आधार पर संबंध बनाने चाहिए। यह जितना भारत के लिए लाभदायी है, उतना ही अमेरिका के लिए भी। अन्यथा हम अंतरराष्‍ट्रीय शोषण के शिकार हो जाएँगे।"

कहना न होगा कि मुनींद्र जी की यह राष्‍ट्रनिष्ठा उनकी हिंदीनिष्‍ठा को भी अधिक प्रशस्त और उन्मुक्त बनाती है। उनकी हिंदीनिष्‍ठा किसी एक भाषिक समाज का सपना नहीं देखती। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि मुनींद्र जी की हिंदीनिष्‍ठा सही अर्थ में राष्‍ट्रीय निष्‍ठा है जिसमें बहुभाषी भारतीय समाज की समस्त भाषाओं का परस्पर सह अस्तित्व वांछनीय है। वे चाहते थे कि हिंदी भारत की सामासिकता को व्यक्‍त करनेवाली भाषा बने। इस मामले में वे शुद्धतावाद के पक्के विरोधी थे। वे मेल जोल की एक ऐसी भाषा की कल्पना करते थे जिसका विकास एक ऐसे दफ़्तर में हो जहाँ देश की सभी भाषाओं के लोग अपने अपने ढ़ंग से हिंदी में काम करते हैं। उनका खयाल था कि ऐसे दफ्तर में जो हिंदी बनेगी वही देश की साझा भाषा बनेगी, हिंदी बनेगी। हाँ, इतना जरूर है कि लिपि और वर्तनी की शुद्धता और मानकता का खयाल तो रखना ही होगा, नहीं तो अराजकता फैल जाएगी।

अंत में एक और बात याद आती है कि मुनींद्र जी सदा इस बात पर जोर देते थे कि हिंदीभाषियों को हिंदी के अतिरिक्‍त कम से कम एक अन्य भारतीय भाषा अवश्‍य सीखनी चाहिए और उसमें इतनी महारत हासिल करनी चाहिए कि उस भाषा के साहित्य को मूल रूप में पढ़ सकें, आत्मसात कर सकें और हिंदी की प्रकृति के अनुसार हिंदी में अनुवाद कर सकें। मुनींद्र जी का यह सपना अभी अधूरा है, लेकिन इसमें आनेवाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनने की अपार शक्‍ति विद्‍यमान है। 

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