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शनिवार, 19 मार्च 2011

रंगपर्व मंगलमय हो!


रंगपर्व मंगलमय हो!
चौवन बार होली आई-गई है अब तक मेरे आंगन,गली-मुहल्ले में.
रंग - तरह तरह के रंग बहुत अच्छे लगते हैं मुझे.
भींजना बचपन से पसंद है मुझे - मीन लग्न है न.
गुझिया और पकौड़े - दोनों मेरी कमजोरी हैं.
ढोल मुझे सुहावने लगते हैं - दूर ही नहीं नज़दीक के भी. 

पर मैंने कभी होली खुलकर नहीं खेली - बचपन से घरघुस्सू रहा.
आभिजात्य ओढ़कर दूर से देखा किया इस लोकोत्सव को.

पर भीतर से कभी बेरंगा और अनभींजा  भी नहीं रहा.

इक्का-दुक्का ही सही, मेरे पास भी हैं होली की कुछ यादें.
उन्हीं यादों का  वास्ता देकर आज अपने हर दोस्त को आवाज़ लगा रहा हूँ :

आओ गले मिलें! 
आओ नाचें गाएँ!!
आओ मनचीता करें!!!
आओ जीने की खातिर मरें!!!! 

पर सब अपने अपने रंग में डूबे हैं. 
जानते हैं, मैं किनारे खड़ा रहूँगा- तैरना नहीं आता न.

पर डूब तो सकता हूँ.
लो, मैं तुम्हारे रंग के सागर में छलाँग लगा रहा हूँ - डूबने की खातिर.

आइए, हम सब एक साथ होली के रंगों में सराबोर हो जाएँ.
सतरंगी शुभकामनाओं सहित 
ऋषभ आपका    

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