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मंगलवार, 22 दिसंबर 2015

[समीक्षा] आदिवासी और दलित विमर्श : दो शोधपूर्ण कृतियाँ


धरती के असली मालिक वे नहीं हैं जो इसका दोहन और उपभोग करने को सबसे बड़ा पराक्रम मानते हुए स्वयं को अहंकारपूर्वक वीर घोषित करते हैं बल्कि वे आदिवासी हैं जो धरती को अपनी माँ मानते हैं और अपने पूरे जीवन को धरती माता के प्रसाद की तरह ग्रहण करते हैं. तथाकथित आधुनिक सभ्य समाजों और आदिवासी समुदायों के बीच धरती से संबंध मानने का यह अंतर ही दो अलग-अलग जीवन दृष्टियों को जन्म देता है. सभ्यता के उच्च शिखरों का स्पर्श करता हुआ मनुष्य प्रकृति से दूर होता जाता है और इस तरह केवल भूमंडल ही नहीं समग्र पर्यावरण तथा स्वयं मनुष्य के अस्तित्व को खतरे में डालता चला जाता है. दूसरी ओर वे समुदाय हैं जिन्हें हम जनजाति कहते हैं वे अबाध उपभोग की दौड़ लगाने वाली सभ्यता की दृष्टि से भले ही हाशिए पर रह गए हों लेकिन उन्होंने धरती सहित संपूर्ण प्रकृति के साथ अपना रागात्मक संबंध टूटने नहीं दिया है. जल, जंगल और जमीन के साथ बंधे अपने अदृश्य स्नेहसूत्र की रक्षा की खातिर वे आज भी अपनी जान पर खेल जाने को तत्पर रहते हैं. इन निसर्गजीवी सीधे सच्चे आनंदमय प्राणियों को सही अर्थों में संस्कृति के जन्मदाता माना जाना चाहिए इन्होंने ही लोक की सारी सांस्कृतिक संपदा को आज भी सहेज-संभाल कर रखा हुआ है. इनके मौखिक साहित्य में वे तमाम जीवन मूल्य संरक्षित हैं जो सही अर्थ में मनुष्य की आत्मा के उन्नयन के लिए आवश्यक होते हैं. तथाकथित सभ्य समाज इन जनजातियों और आदिवासियों को या तो रहस्य रोमांच की दृष्टि से देखने का आदी रहा है या इनके श्रम और प्रेम का शोषण करने का अभ्यस्त रहा है या फिर इन्हें अपराधी और गुलाम बनाकर इनका नाश करने पर उतारू रहा है. इसमें इतिहास और संस्कृति पर शोध करने वालों का भी कम हाथ नहीं रहा है. कभी कभी तो ऐसा लगता है कि उन्होंने ही सहज मानवों के इन समूहों की बर्बर और जंगली छवि गढ़ने में मुख्य भूमिका निभाई है और इन्हें हाशिए पर पड़ा रहने को विवश किया है. राजनीति का भी इस षड्यंत्र में बराबर का हाथ रहा है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है. आदिवासी विमर्श मानव सभ्यता और संस्कृति के विकास में जबरदस्ती अनुपस्थित दर्ज किए गए आदिवासियों और जनजातीय समूहों की उपस्थिति को रेखांकित करने वाला विमर्श है भले ही इसके लिए आपको अपने अब तक के पढ़े-लिखे इतिहास को सिर के बल खड़ा करना पड़े. 

डॉ. इसपाक अली (1963) ने हिंदी में आदिवासी साहित्य(2014) शीर्षक अपने शोधपूर्ण ग्रंथ के माध्यम से एक तरफ तो यह दर्शाया है कि हिंदी के साहित्यकार हाशियाकृत आदिवासी समाजों के प्रति असंवेदनशील नहीं रहे तथा दूसरी ओर यह प्रतिपादित किया है कि मौखिक साहित्य या लोक साहित्य के रूप में प्रस्फुटित होने वाली आदिवासी जन की सहज अभिव्यक्तियाँ अब लिखित साहित्य के रूप में भी प्रकट होकर आ रही हैं, पाठक जगत को विस्मित कर रही हैं और आदिवासी अस्मिता का नया चेहरा निर्मित कर रही हैं. सहज भाषा-बानी में ढली हुई आदिवासी अभिव्यक्तियाँ आदिवासी समाजों की रीति-नीति और मूल्यबोध की प्रामाणिक जानकारी देने में समर्थ हैं. स्वयं जिए हुए जीवन की यह प्रामाणिकता आदिवासी साहित्य को परम विश्वसनीयता तो प्रदान करती ही है, उसकी पीड़ा और यातना का प्रभावी पाठ भी रचती है. यह पाठ उस साहित्य के पाठ के पुनर्पाठ का भी निकष बनता है जिसकी रचना आदिवासी रचनाकारों से पहले के हमारे संवेदनशील साहित्यकार करते रहे हैं. अभिप्राय यह है कि आदिवासी विमर्श किसी भी प्रकार उन साहित्यकारों को खारिज नहीं करता जिन्होंने स्वयं आदिवासी समूह का सदस्य न होते हुए भी आदिवासी समाज और जनजातियों के जीवन यथार्थ को साहित्य का विषय बनाया. कहना ही होगा कि ये दोनों गोलार्ध मिलकर ही आदिवासी विमर्श के पूरे मंडल का निर्माण करते हैं. 

‘हिंदी में आदिवासी साहित्य’ में विद्वान लेखक ने अत्यंत परिश्रमपूर्वक भारतीय आदिवासी समुदायों के जीवन की विशेषताओं को सामने रखते हुए उनकी समस्याओं की ओर ध्यान आकृष्ट किया है. यह ग्रंथ इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति के विकास में आदिवासी साहित्य के विविध संदर्भों को खोजकर यहाँ विवेचित किया गया है. लेखक ने आदिवासी और दलित साहित्यों के अंतर को भी तर्कपूर्वक समझाया है और आदिवासी साहित्य के नवोन्मेष के संदर्भ में उसके मूल्यों और सरोकारों को सोदाहरण स्थापित किया है. 

संभवतः यह ग्रंथ विस्तार से आदिवासी जीवन केंद्रित हिंदी उपन्यासों और कहानियों का विवेचन-विश्लेषण करने वाला अपनी प्रकृति का पहला ग्रंथ है जिसमें आज तक प्रकाशित कृतियों की खोजखबर शामिल है. इसमें संदेह नहीं कि आदिवासी विमर्श का यह खजाना डॉ. इसपाक अली ने गहरे पानी पैठकर खोजा है. आदिवासी जीवन केंद्रित हिंदी कविताओं विषयक सामग्री इस दृष्टि से सर्वाधिक महत्वपूर्ण बन पड़ी है. इसीलिए निस्संदेह यह ग्रंथ हिंदी साहित्य के विमर्शकारों, अध्येताओं, शोधकर्ताओं, अध्यापकों और पाठकों, सभी के लिए बहुआयामी उपयोगिता वाला ग्रंथ सिद्ध होगा. 

इसी क्रम में डॉ. इसपाक अली का एक और ग्रंथ प्रकाशित हुआ है – ‘दलित आत्मकथाएँ और उपन्यास : शोषण और संघर्ष’ (2015). काफी समय तक यह भ्रम बना रहा कि आदिवासी विमर्श और दलित विमर्श अलग नहीं है. लेकिन जैसा कि हमने अभी कहा है, डॉ. इसपाक अली इन दोनों की पृथकता के तर्क से सहमत है. दरअसल आदिवासी समूह आधुनिकता, औद्योगीकरण और प्रौद्योगिकी के कंधों पर चढ़कर आई सभ्यता की दौड़ में पीछे रह गए समूह अवश्य है परंतु इस अर्थ में वे दलित समूहों से एकदम भिन्न है कि भारतीय संदर्भ में दलित हमारे समाज के उस दबे कुचले अंश का नाम है जो वर्णव्यवस्था और जातिप्रथा की रूढ़ियों के कारण दमन, शोषण और तिरस्कार ही नहीं झेलता आया है बल्कि अस्पृश्य मानी जाने वाली जाति विशेष में जन्म लेने के कारण सहज मानवाधिकारों से भी वंचित रहा है. डॉ. इसपाक अली ने दलित विमर्श के अवलोकन बिंदु से हिंदी के दलित लेखकों की आत्मकथाओं और औपन्यासिक कृतियों का गहन विशलेषण किया है तथा उनके शोषण और संघर्ष की प्रामाणिक पहचान की है. उन्होंने यह सब पहचान पड़ताल इस साहित्य मं अभिव्यंजित ‘दालित्य’ के आधार पर की है क्योंकि यही वह मूल्य है जो दलित साहित्य को अब तक के ललित साहित्य के सौंदर्यशास्त्र की परिधि के बाहर स्वतंत्र पहचान देता है. दलितों ने शताब्दियों तक जो अमानवीय जीवन जिया और यंत्रणाएँ झेली, उनके बावजूद यदि 20वीं–21वीं शताब्दी में वे शिक्षा, सम्मान और सत्ता प्राप्त कर रहे हैं तथा अपनी पीड़ा और क्रोध को सीधी चोट करने वाली अभिव्यक्ति प्रदान कर रहे हैं, तो इसे लंबे समय तक हाशिए पर रहने को विवश किए गए दलित समुदाय की बड़ी उपलब्धि माना जाना चाहिए.
इसमें संदेह नहीं कि आदिवासी विमर्श और दलित विमर्श ने साहित्य को नया लोकतांत्रिक विस्तार प्रदान किया है. साहित्य में अपना अपना स्पेस ढूँढ़ती हुई आदिवासियों और दलितों की आवाजों का सही समय पर सही नोटिस लेने के लिए डॉ. इसपाक अली साधुवाद के पात्र हैं.     
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Ø  हिंदी में आदिवासी साहित्य/ डॉ. इसपाक अली/ साहित्य संस्थान, ई-10/660, उत्तरांचल कॉलोनी (निकट संगम सिनेमा), लोनी बॉर्डर, गाजियाबाद/ 2014/ पुष्ठ 272/ मूल्य – रु. 154
Ø  दलित आत्मकथाएँ और उपन्यास : शोषण तथा संघर्ष/ डॉ. इसपाक अली/ साहित्य संस्थान, ई-10/660, उत्तरांचल कॉलोनी (निकट संगम सिनेमा), लोनी बॉर्डर, गाजियाबाद/ 2015/ पृष्ठ – 240/ मूल्य – रु. 600   
-    ऋषभदेव शर्मा
      

शुक्रवार, 20 जून 2014

खिलना ‘जंगल जुही’ का आक्षितिज अभ्रभेदी शिलाओं के कुंज में

पुस्तक चर्चा : ऋषभ देव शर्मा

खिलना ‘जंगल जुही’ का
आक्षितिज अभ्रभेदी शिलाओं के कुंज में

हैदराबाद. आप यहाँ आएँ, रहें, घूमे-फिरें, लौट जाएँ. और कुछ याद रहे न रहे भीतर बाहर सर्वत्र फैला चट्टानों का म्युज़ियम जरूर याद रहेगा. कई बार तो ऐसा लगता है कि तमाम प्राणिजगत इन प्रस्तर शिलाओं की गोद में खेल रहा है यहाँ. कवि-कथाकार-चिंतक रमेशचंद्र शाह इसीलिए इस शहर को अलविदा कहते वक्त बस इतना ही कह पाते हैं – ‘अलविदा आक्षितिज अभ्रभेदी शिलाओं के पुंज हैदराबाद!’
                                                            
रमेशचंद्र शाह (1937) के दर्शन दो दशक पूर्व भोपाल में आदरणीय कैलाशचंद्र पंत की कृपा से हुए थे. गांधी पर उनके व्याख्यान ने प्रभावित ही नहीं आतंकित भी किया था. पिछले दिनों (2012) में उनके दर्शन का फिर से सौभाग्य मिला – वे केंद्रीय हैदराबाद विश्वविद्यालय में एस. राधाकृष्णन पीठ के बहाने कुछ महीनों के लिए यहाँ आए थे. विद्वानों और बड़े लेखकों से मुझे बचपन से ही डर लगता रहा है – कस्बाई मानसिकता से आज भी ग्रस्त हूँ न! सो, जब प्रो. एम. वेंकटेश्वर और डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने गेस्ट हाउस में उनसे मिलने जाने का कार्यक्रम बनाया तो मैं हीले हवाले करने लगा. पर वेंकटेश्वर जी के आगे किसी की चली है? दिन ढले हम लोग पहुँचे. घंटे भर दुनिया जहान की बातें हुईं – लगा यह कोई गोमुख है जिससे निरंतर ज्ञान की गंगा झरती है. पर यह ग्लेशियर उतना भी ठंडा नहीं था – बल्कि बिल्कुम भी ठंडा नहीं : गरमाहट से भरा हुआ, ऊर्जा से भरपूर. खुद उन्होंने अपने हाथों से चाय बनाकर पिलाई, फोटो खींचे-खिंचवाए. अरे! ये तो बिल्कुल आदमी निकले – हाड मांस वाले; मैं तो ज्ञान की पाषाणमूर्ति समझकर आया था. अस्तु! हैदराबाद के अपने उस प्रवास को रमेशचंद्र शाह ने अपनी डायरी में टाँककर अमर कर दिया है.

किताबघर ने उनकी डायरी के चतुर्थ भाग और यात्रावृत्त को ‘जंगल जुही’ (2014) के नाम से प्रकाशित किया है. प्रो. सुवास कुमार सहित हैदराबाद के तीन सहचरों को समर्पित यह डायरी प्रकारांतर से हैदराबाद को ही समर्पित है. 2 खंड हैं : पहले में डायरी – जंगल जुही, हैदराबाद (जुलाई-दिसंबर 2012). दूसरे में यात्रावृत्त - हैदराबाद और प्राग प्रवास के.

डायरी हो या यात्रावृत्त - मूलतः रचनाकार ने दोनों में स्मृति में अंकित हो गए अनुभवों को शब्दों में पुनः जिया है. यह ग्रहण किए हुए का, भावन किए हुए का, व्यक्तिगत अनुभवों का, निजता की सीमाओं को लांघकर सार्वजनीकरण है. जो देखा, भोगा, महसूसा उसे अपनी सौंदर्यदृष्टि से अभिमंडित करके सारे समाज को वापस लौटा दिया. इसे आत्मदान कहें या प्रतिदान! खैर, कुछ भी हो, पर इसमें दो राय नहीं कि इस अकाल्पनिक गद्य में लेखक का अंतस सहज अनावृत्त हुआ है. बड़ी ललक से, इसीलिए, यह गद्य पाठक की ओर बढ़ता है और उसे अपने औदात्य के आभाचक्र में समेट लेता है. यानि ‘जंगल जुही’ का गद्य सहज-प्रसन्न-उदात्त गद्य है : उत्फुल्ल भी, प्रशमित भी. गज़ब का संतुलन. गज़ब का सम्मोहन.

‘जंगल जुही’ को संदर्भ संबलित और प्रसंग गर्भित अच्छे गद्य की तरह पढ़ने का अपना मजा है. विधा का नाम कुछ भी हो लेकिन कवित्व और लालित्य इस गद्य में सर्वत्र विद्यमान है – दर्शन, चिंतन और आत्मोद्घाटन के साथ. यही कारण है कि यह कृति जीवन के अर्थ की खोज की लेखकीय व्याकुलता का भी पूरा बोध कराती है. अरविंद और गुर्जिएफ़ जैसे संत इस यात्रा में लेखक के साथ साथ चलते हैं – और पाठक के भी. इसी कारण अंत तक पहुँचते पहुँचते यह बात पुख्ता हो जाती है कि अपने प्रति और मानवीय बिरादरी के प्रति जवाबदेही के निर्वाह से प्राप्य कृतार्थता का संतोष इस कृति से लेखक को अवश्य ही मिला होगा.

देखे गए देश और काल के विवरण तो सभी डायरियों और यात्रावृत्तों में होते हैं, लेकिन डायरी और यात्रावृत्त को टूरिस्ट गाइड नहीं बनना होता है. इसलिए इन विवरणों की तुलना में वे पक्ष अधिक महत्वपूर्ण होते हैं जहाँ लेखक की निजता और संवेदनशीलता, वैचारिकता और भावुकता रमणीय अर्थ के साथ व्यंजित होती है. इसी भावाभिव्यंजना के कारण ‘जंगल जुही’ का गद्य पठनीय, मर्मस्पर्शी और प्रीतिकर बन सका है. अनेक स्थलों पर अपने विचार प्रवाह में रमेशचंद्र शाह पाठक को बहाए ले जाते हैं. उदाहरण के लिए जब किसी अंतरराष्ट्रीय काव्योत्सव के बाहने वे पूछते हैं कि ‘पृथ्वी पर इतने देश हैं. सभी में कविता होती है. पर सबको तो ऐसा चाव नहीं जगता *** क्या हमें सचमुच कविता पर, उसकी आह्लादिनी शक्ति पर ही नहीं – उसकी ज्ञानदायिनी शक्ति पर भी इतना विश्वास है?’ तो हमारे मन में भी यह सवाल उठता है कि ‘क्या यह महज हमारी उत्सवधर्मी और प्रदर्शनप्रिय मानसिकता की ही एक और अभिव्यक्ति है? या कि इसके पीछे कोई गहरी सृजनधर्मी सत्यान्वेषिणी चेतना सक्रिय है?’

यह जानना भी अच्छा लगा कि लेखक रमेशचंद्र शाह शास्त्र पर अंतिम विश्वास नहीं करते. लोक में उनकी बड़ी आस्था है. रामटेक में अगस्त्य मुनि का आश्रम होने की लोक मान्यता पर वे विस्मय अवश्य व्यक्त करते हैं, लेकिन अविश्वास नहीं. वाग्देवी से कालिदास को प्रतिभा का वरदान मिलने की मान्यता भी ऐसी ही है. अन्यत्र, वे बड़ी पते की बात कहते हैं ‘और किंवदंतियाँ हमारे देश में यूँ ही नहीं बन जातीं. उनके पीछे कोई न कोई आधार अवश्य होता है.’ दशावतारों की कल्पना को वे इवोल्यूशन की द्योतक मानते हैं. आंध्र प्रदेश भर में नृसिंह अवतार की प्रसन्न और उग्र मूर्तियों की बड़ी महिमा है. यादगिरीगुट्टा की यात्रा में लेखक ने इस महिमा की विवेचना का अवसर निकाल लिया – ‘नृसिंह अवतार तो विशेष रूप से हमारी मानवीय संरचना के आदिम और परवर्ती विकास-स्तरों को आपस में जोड़ने वाला है और यह एक बात इस अवतार की विलक्षण लोकप्रियता के रहस्य के मूल में है. हमारे यहाँ लोक और शास्त्र अन्योन्याश्रित रहे हैं. लोकानुभव ही कालांतर में शास्त्र में रूपांतरित और उन्नीत होता रहा है.’ यह लोक लेखक की धमनियों में निरंतर बजता रहता है. यही कारण है कि प्राग (चेक गणराज्य की राजधानी) में ग्याकोमो पुसीनी के विश्वविख्यात ऑपेरा ‘ला बोहेमे’ को देखते समय उनके भीतर अचानक लड़कपन की रामलीला और नौटंकियों के भूले बिसरे संस्मरण जाग उठते हैं और संबोधि का यह पूर्वप्रश्न उभरता है – ‘तो क्या कला की दुनिया विचारधारा या धर्म विश्वास की दुनिया की तुलना में कहीं अधिक व्यापक-मानवीय और कहीं अधिक सर्वनिष्ठ दुनिया है?’

और अंत में बिना टिप्पणी के, 77 वर्षीय साहित्यकार की ये टिप्पणियाँ -– 
  • इस प्रतीति तक पहुँचने में ही एक पूरा जन्म खप गया./ 
  • समकालीनों से मुझे क्या मिला है? सिवा एक निहायत औपचारिक अंतःकरण की नुमाइशी यारबाशी और उतनी ही ‘समझदार चुप्पियों’ के?/ 
  • आजकल भूल जाता हूँ सब *** क्या यही वृद्धावस्था का पहला लक्षण है?/ 
  • मैं तो इस जंगल जुही की प्राणशक्ति देखकर दंग हूँ./ 
  • असुविधाजनक सत्य बोलना ही चाहिए सार्वजनिक स्थलों पर.

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Ø  रमेशचंद्र शाह/ जंगल जुही/ 
किताब घर, नई दिल्ली/ 2014/
 पृष्ठ 182/ मूल्य – रु. 320/-

-ऋषभ देव शर्मा 

भास्वर भारत / जून 2014 / पृष्ठ 59

शुक्रवार, 31 मई 2013

हिंदी के नाम पर हो रहा तमाशा

नवम विश्व हिंदी सम्मलेन 
क्या हिंदी की तकनीकी जटिलता उसकी अलोकप्रियता का कारण है?

22 से 24 सितंबर को जोहानिसबर्ग [दक्षिण अफ्रीका] में हिंदीभाषियों के गौरव के प्रतीक के रूप में नौवां विश्व हिंदी सम्मलेन निर्धारित विधिविधान के साथ संपन्न हो गया. सम्मलेन पर लगातार नज़र रखने वालों का कहना है कि भले ही इस बहाने दक्षिण अफ्रीका की गांधी जी के आंदोलन की स्मृतियों से जुडी पावन धरती का दौरा कर आए तमाम राज्याश्रित बुद्धिजीवी और अधिकारीगण अनेक उपलब्धियां गिना रहे हों, भीतरी सच्चाई यह है कि 'गांधी की हिंदी'  के लिए पिछले कई अन्य विश्वस्तरीय मेलों की तरह यहाँ भी कुछ खास हो नहीं सका.

ऐसे में सारे प्रयास को तमाशा कहने की अतिवादिता से बचते हुए चलें तो भी कई बातें ध्यान खींचती हैं. एक बात तो पहले से चली आ रही है कि हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के लिए क्या रणनीति तय की गई है, यह साफ़ नहीं है. क्या हर तीन साल में नियमित रूप से सम्मलेन करने से हिंदी को घर-बाहर वह स्थान मिल जाएगा जिसके लिए ये सारे के सारे कथित अंतरराष्ट्रीय प्रपंच रचे जाते हैं?

दूसरी, और निश्चय ही अधिक महत्वपूर्ण, बात यह है कि हिंदी के पक्ष में तमाम तरह के संख्याबल और बाजार के दबाव के बावजूद कम्प्यूटर और इंटरनेट पर उसका प्रसार अपेक्षित गति से क्यों नहीं हो रहा है. यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि हिंदी, जैसा कि कहा जाता है, कम्प्यूटर-फ्रेंडली भाषा है और देवनागरी सर्वाधिक वैज्ञानिक लिपि, तो विद्वानों से लेकर दुकानों तक अभी तक हिंदी के व्यवहार को स्वीकृति क्यों नहीं मिल पा रही है? दरअसल विश्व हिंदी सम्मलेन का एक विचार सत्र ‘’सूचना प्रौद्योगिकी - देवनागरी लिपि और हिंदी का सामर्थ्य’’ इसी चिंता को संबोधित था. लेकिन अभी तक  नहीं पता कि इस सत्र में हिंदी और देवनागरी के तकनीकी प्रसार को सरल और क्षिप्र बनाने के लिए क्या योजनाएं सामने आईं. फोनेटिक के बहाने कहीं हम हिंदी को देवनागरी से मुक्त करने और रोमन लिपि को स्वीकारने की ओर तो प्रौद्योगिकी के हिंदी-प्रयोक्ता को नहीं धकेल रहे हैं? अगर ऐसा है तो कहना होगा कि संकेत खतरनाक हैं. 

हिंदी के लिए जिनके मन में तड़प है, उन्हें इस सम्मेलनोत्तर परिवेश में मथने वाले कुछ मुद्दे इंटरनेट पर अत्यंत सक्रिय कई मंचों पर अलग तरह से चर्चा का विषय बने. उदाहरण के लिए ‘हिंदी भारत’ और ‘हिंदी शिक्षक बंधु’ जैसे चर्चा-समूहों पर हरिराम ने एक प्रश्नावली जारी करके नवम विश्व हिंदी सम्मलेन के अंग बने विद्वानों से 10 ‘तथ्यपरक व चुनौतीपूर्ण प्रश्न’ किए. उन्होंने अत्यंत बलपूर्वक सबसे पहले तो यह कहा  कि ‘’हिंदी को संयुक्त राष्ट्र की भाषा बनाने के लिए कई वर्षों से आवाज़ उठती आ रही है. कहा जाता है कि इसमें कई सौ करोड का खर्चा आएगा. बिजली व पानी की तरह भाषा/ राष्ट्रभाषा/ राजभाषा भी इन्फ्रास्ट्रक्चर [आनुषंगिक सुविधा] होती है; अतः चाहे जितना भी खर्च हो, भारत सरकार को इसकी व्यवस्था के लिए प्राथमिकता देनी चाहिए.’’ सहज जिज्ञासा है कि सम्मलेन ने इस दिशा में क्या कार्य-योजना बनाई. केवल पुराने प्रस्ताव पर नई मुहर लगाना इसके लिए काफी नहीं माना जा सकता. हिंदी जगत को नियमित रूप से बताया जाना चाहिए कि इस दिशा में क्या-क्या किया जा रहा है और क्या किया जाना है.

प्रश्नावली में यह अत्यंत महत्वपूर्ण और ठोस सवाल उठाया गया है कि तकनीकी रूप से जटिल मानी गई हिंदी को कम्प्यूटर-सहज बनाने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं. भावुकता से बचते हुए इस तथ्य को स्वीकार करना ही होगा कि कम्प्यूटरीकरण के बाद से हिंदी का ‘’आम प्रयोग’’ काफी कम होता जा रहा है. डाकघरों से लेकर रेलवे बुकिंग के चार्ट तक यह प्रमाणित करते हैं कि या तो अंग्रेज़ी लिखी जा रही है या गलत-सलत लिप्यन्तरण हो रहा है. छोटे से छोटे दूकानदार भी अब अंग्रेज़ी में लिखी कम्प्यूटर-पर्ची दे रहे हैं जबकि पहले वे हिंदी/ देवनागरी हाथ से लिखते थे. अतः यह पूछना सही है कि डाकघर जैसे सार्वजनिक क्षेत्रों में मूलतः हिंदी में कम्प्यूटर में डेटा-प्रविष्टि के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं और रेलवे आरक्षण आदि के अवसर पर मूलतः हिंदी में डेटा-प्रविष्टि और प्रोग्रामन के लिए क्या व्यवस्था की जा रही है. इसके अलावा मोबाइल में हिंदी का विकल्प होना भर काफी नहीं; बल्कि हिंदी-संदेशों को सस्ता बनाने के उपाय किए जाने अपेक्षित हैं क्योंकि फिलहाल हिंदी का संदेश अंग्रेज़ी से तिगुना महँगा पड़ता है.

हिदी के नए प्रयोक्ता आकर्षित करने के लिए उसके प्रयोग को आसान बनाना बेहद ज़रूरी है. प्रयोक्ता को परेशान  करने वाली एक समस्या यह भी है कि हिंदी शब्दकोष के लिए विभिन्न डेटाबेस देवनागरी के अलग-अलग सॉर्टिंग-ऑर्डर का प्रयोग कर रहे हैं. सवाल है कि हिंदी/देवनागरी को अकारादि क्रम से यूनीकोड में मानकीकृत करने तथा सभी के उपयोग के लिए उपलब्ध कराने हेतु क्या कदम उठाए जा रहे हैं. यहीं यह भी कि ऑनलाइन फ़ार्म आदि हिंदी में प्रस्तुत करने के लिए डेटाबेस उपलब्ध कराने की दिशा में क्या किया जा रहा है. साथ ही, ‘’अभी तक हिंदी की मानक वर्तनी के अनुसार यूनीकोड आधारित कोई वर्तनी संशोधक प्रोग्राम आम जनता के उपयोग के लिए निःशुल्क उपलब्ध नहीं है.’’ यह भी चौकाने वाला तथ्य है कि इनबिल्ट हिंदी-समर्थन के बावजूद कम्प्यूटर के अधिकांश उपयोक्ता इससे अनभिज्ञ हैं. इसलिए ज़रूरी है कि आम जनता को इस संबंध में अवगत कराया जाए और स्कूल स्तर से ही कम्प्यूटर पर हिंदी के अनुप्रयोग को पाठ्यक्रम का अनिवार्य हिस्सा बनाया जाए. पूछा जा सकता है कि नवम विश्व हिंदी सम्मलेन ने इन चिंताओं को दूर करने के लिए क्या-क्या फैसले लिए हैं. 

बेशक इन सारे सवालों के जवाब में ठीकरा किसी के भी सिर पर फोड़ा जा सकता है. मसलन कहा जा सकता है कि हम हिंदी वालों की अपनी भाषा के प्रति श्रद्धा बेहद छूँछी है; या यह कि हमारे राजनैतिक नेतृत्व के पास संकल्पशक्ति और ईमानदारी का अभाव है; या कि हमारे बुद्धिजीवी दोगले आचरण के शिकार हैं; मगर विचारणीय समस्या यह है कि कहीं हिंदी की लोकप्रियता और वैश्विक स्वीकार्यता के मार्ग में उसकी तकनीकी जटिलता ही तो रोडे नहीं अटका रही है. 

नवम विश्व हिंदी सम्मलेन के आयोजन से लेकर इसके फलितार्थ तक पर चल रही बहस का समाहार करते हुए डॉ. कविता वाचक्नवी ने विभिन्न इंटरनेट-मंचों के अलावा अपने ब्लॉग ‘’वागर्थ’’ पर पर्याप्त संतुलित और निष्पक्ष विचार व्यक्त किए. वे कहती है कि ‘’विश्वहिंदी सम्मेलन पर युद्ध करने और ताल ठोंकने वालों के लिए आवश्यक है कि वे इसका अर्थ समझें कि इसका अर्थ हिंदी का एक बड़ा अंतर-राष्ट्रीय सम्मेलन नहीं है, अपितु विश्वहिंदी अर्थात् हिंदी के  वैश्विक स्वरूप और स्थिति से संबन्धित एक सम्मेलन है। जिस दिन यह बात लोग आत्मसात कर लेंगे उस दिन सम्मेलन पर और हिंदी पर बड़ा उपकार करेंगे, वरना इस सम्मेलन के लिए मचने वाली बंदरबाँट यों ही चलती रहेगी और जिन्हें प्रसाद नहीं मिलेगा वे वंचित रहने की पीड़ा के चलते हाय-तौबा मचाते रहेंगे। इन सब के बीच जो वास्तविक लोग हैं, उनकी यथावत् न पूछ होगी, न आवाज बचेगी और जाने किस दिन कौन सच्चा सिपाही थक-हार कर कूच कर जाएगा....पर तमाशा यों ही चलता रहेगा। यों राजनीति और हायधर्म, दौड़धर्म और जुगाड़धर्म आदि सारे धर्मों का अस्तित्व विदेशों में बसे हिंदीभाषी हिंदी  वालों में भी भारत की बराबरी का ही है। इसलिए मैं हिंदी को लेकर कोई बड़ा स्वप्न फिलहाल नहीं देखती। संयुक्त राष्ट्र संघ की भाषा बनने के बाद हमारे इन सब धर्मों को नाम का अंतरराष्ट्रीय स्वरूप ही मिलना बचा है, वस्तुतः ये वैश्विक तो पहले से हैं ही।‘’ 

कुछ स्वनामधन्य हिंदी प्रेमियों ने तो विश्व हिंदी सम्मेलनों को बंद किए जाने तक की माँग कर डाली है. उन्हें लक्ष्य करके कविता वाचकनवी का यह कहना दूरदर्शितापूर्ण लगता है कि सम्मेलन को बंद किया जाना भी कोई समझदारीपूर्ण समाधान नहीं है। तब तो हिंदी के लिए सरकार के नाममात्र के दायित्व की भी इतिश्री हो जाएगी। वस्तुतः चीजों को पारदर्शी बनाना, गुणवत्ता को तय करना, ठोस कार्यरूप देना आदि के लिए कड़ाई से कुछ करना होगा। अर्थात् सम्मेलन का विरोध नहीं, सम्मेलन की विधि और दोष का विरोध हो।

एक दूसरे को गरियाने की अपेक्षा हिंदी/देवनागरी को तकनीकी दृष्टि से सहज और सुगम बनाने के प्रयासों की बड़ी आवश्यकता है वरना-
आज यदि सो जाएँगे हम तान कर चादर;
रोज़ ओढ़े जाएँगे फिर मान कर चादर.
- भास्वर भारत [प्रवेशांक]- अक्टूबर 2012- पृष्ठ 8-9.

बुधवार, 29 मई 2013

साहित्य, संस्कृति व शिक्षा : वर्तमान संदर्भ में

राष्ट्रीय संगोष्ठी/ मुंबई/ 23-24 मई 2013 

23 - 24 मई 2013 को गोखले सोसायटी के शिक्षा महाविद्यालय में संगोष्ठी थी. विषय रहा – “साहित्य, संस्कृति व शिक्षा : वर्तमान संदर्भ में”. डॉ. त्रिभुवन राय के आदेश पर अपुन भी जा धमके. अच्छा रहा क्योंकि कई विभूतियों के दर्शन लंबे अरसे बाद करने का मौका मिल गया – प्रो. सुरेश उपाध्याय, प्रो. एस. बी. पंडित, श्री कैलाश चंद्र पंत, प्रो. रामजी तिवारी, डॉ. दामोदर खडसे, प्रो. केशव प्रथमवीर, डॉ. विद्या केशव चिटको, डॉ. इंदिरा शुक्ला आदि. और हाँ, कथालेखिका सूर्यबाला जी भी तो थीं. डॉ. महेंद्र कार्तिकेय बहुत याद आए – उन्होंने ही तो समकालीन साहित्य सम्मलेन के माध्यम से इन सबसे बरसों पहले मुझ साधनहीन का परिचय कराया था; और भी तमाम साहित्यकारों से रूबरू होने का अवसर देने वाले कवि महेंद्र कार्तिकेय को सभी ने याद किया. सुनने में आया कि श्रद्धेय चंद्रकांत बांदिवडेकर को भूलने की बीमारी ने घेर लिया है – वैसे स्वस्थ हैं; उनसे मिलने न जा सकने का मलाल है. खैर! संगोष्ठी विचारोत्तेजक रही. इसलिए भी मेरे लिए स्मरणीय कि जिस सत्र की अपुन ने अध्यक्षता की प्रो. रामजी तिवारी उसके प्रमुख वक्ता थे – गौरव दिया उन्होंने इस अकिंचन को. एक सत्र में अपुन को प्रमुख अतिथि की भूमिका निभानी पडी, तो कुछ दिन पहले इस विषय पर जो फोनिक गुफ़्तगू प्रो.देवराज से हुई थी उसे चिपका दिया. वे ही कुछ बिंदु यहाँ सहेज रहा हूँ ताकि सनद रहे.

साहित्य, संस्कृति व शिक्षा : वर्तमान संदर्भ में


• दूसरे विश्वयुद्ध के बाद में, खासकर जैसे जैसे हम बीसवीं शताब्दी के अंत की ओर बढ़े वैसे वैसे ही दुनिया में नए ध्रुव बनने शुरू हुए – संस्कृति में भी; शिक्षा में भी और साहित्य में भी 

• इस नए परिवेश के बारे में तीन चीज़ें खास तौर से विचारणीय हैं. एक तरफ तो ‘सभ्यताओं के संघर्ष’ का मुद्दा उठाया गया – पहली चीज़ तो यही है.

• दूसरी यह है कि उपनिवेशवाद से आगे बढ़ करके ‘नव-उपनिवेशवाद’ शुरू हुआ. 

• और तीसरी चीज यह है कि एक ‘सुरक्षित साम्राज्यवाद’ की धारणा शुरू हुई जो इंग्लैंड से शुरु होती है. बाकायदा जो कूटनीतिक लॉबी रही इंग्लैंड में, इन चालीस सालों में उसने बहुत कुशलता से लेख लिख करके, पुस्तकें प्रकाशित करके इस संदर्भ में एक पारिभाषिक चीज गढी जिसे उन्होंने ‘सुरक्षित साम्राज्यवाद’ कहा. 

• इस तरह जिसे हम आज साहित्य, संस्कृति और शिक्षा विषयक विमर्श का ‘वर्त्तमान संदर्भ’ कह रहे हैं उसका निर्माण तीन चीज़ों से हुआ है – 1. सभ्यताओं के संघर्ष का सिद्धांत, 2. नव-उपनिवेशवाद और 3. सुरक्षित साम्राज्यवाद. 

• इसमें संदेह नहीं कि इन सबके पीछे कुछ देशों के, और कुछ समाजों के, उच्च अहम् की भावना काम करती रही है क्योंकि दूसरे विश्वयुद्ध के बाद में जो एक नई दुनिया बनी उसमें गरीब देशों ने अपने बारे में सोचना शुरू किया और उसमें एक उभार शुरू हुआ. यह उभार जो पश्चिम के देश हैं - खासकर ब्रिटेन है, और अमेरिका है, उन देशों के लिए खतरनाक साबित होने जा रहा था. 

• तो इन लोगों ने मिल करके, यूरोप और अमेरिकन लोगों ने मिल करके; और इंग्लैंड के लोग साथ में शामिल हो गए इनके; और इन देशों ने उन देशों को दबाना शुरू किया जिन्हें वे तीसरी दुनिया के देश कहते थे.

• और इसमें एक नया परिवर्तन यह हुआ कि तीसरी दुनिया के कुछ देश ऐसे भी थे जिनके पास बहुत सारे प्राकृतिक संसाधन तो नहीं थे पर एक-दो ऐसे प्राकृतिक संसाधन थे जिनसे वे पूरी दुनिया को अपने पक्ष में मोड़ सकते थे या दुनिया के निर्णयों को प्रभावित कर सकते थे. जैसे अरब देश. या पश्चिम एशिया के वे देश खासकर जिनके पास तेल का अपूर्व भंडार था; अभी भी है. तो जब इन देशों ने अपने बारे में सोचना शुरू किया और जब ईरान जैसे देश में लोकतंत्र की थोड़ी सी हवा बहनी शुरू हुई, कठमुल्लापन को पराजित करके और कुछ नई धारणाएँ शुरू हुईं, फैशन शुरू हुआ, नई तरह की शिक्षा शुरू हुई; तेहरान विश्वविद्यालय में बहुत खुला वातावरण शुरू हुआ और अरब के बहुत सारे लोग वहाँ आकर पढ़ने लगे – तो इस सबने कुछ खास देशों या कुछ साम्राज्यवादी देशों के कान खड़े कर दिए. 

• और वहाँ से इन देशों ने एक नया टर्म विकसित किया – सभ्यताओं का संघर्ष. इस सभ्यताओं के संघर्ष ने युद्धों को जन्म दिया नए सिरे से. और यह जो सभ्यता के संघर्ष के पीछे का जो छद्म है – इसको भी तीसरी दुनिया के देश जानते हैं, पहचानते हैं – खासकर बुद्धिजीवी पहचानते हैं.

• और युद्ध वास्तव में किस कारण से हुए या खड़े किए गए, इस चीज को भी अनुभव करते हैं – गरीब देशों के लोग. तो उन्होंने इसका प्रतिरोध करना शुरू किया और क्योंकि वे शक्तिशाली ज्यादा नहीं थे इसलिए वे अधिक कुछ कर नहीं सके. और सभ्यता के संघर्ष के नाम पर घोषित कर दिया गया कि जो पश्चिम एशिया और अरब देशों की सभ्यता है वह हिंसक है और रूढ़ है और प्रगतिविरोधी है – उसको दबाना जरूरी है – और उसे दबाने की कोशिश भी हुई. इसने पूरी दुनिया की संस्कृति को नए सिरे से प्रभावित किया. तो यह एक बड़ा मुद्दा है. 

• उधर इंग्लैंड में जो धारणा शुरू हुई थी – मतलब एक तरह से साम्राज्यवाद का पुनर्जन्म जो इंग्लैंड में हुआ - उनके मन में, लोगों ने, कहना चाहिए कि उसे आगे बढ़ावा दिया – उन्होंने एक नया टर्म गढा – जिसे ‘सुरक्षित साम्राज्यवाद’ उन्होंने कहा. 

• सुरक्षित साम्राज्यवाद यह है कि इंग्लैंड के लोग और पश्चिम के लोग – यूरोप के लोग खासकर, यह मानते हैं कि उनकी जो व्यवस्था है वह बहुत सफल व्यवस्था है – आदर्श व्यवस्था है – और उस व्यवस्था को सुरक्षित रखना जरूरी है; और उसे सुरक्षित रखने के लिए उन देशों को दबाना जरूरी है जो खासकर एशियन देश हैं या अफ्रीकन देश हैं. तो यह जो अपने साम्राज्य को सुरक्षित रखने के लिए दूसरे देशों को दबाने की नीति है यह सुरक्षित साम्राज्यवाद है. 

• और इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण यह है कि ये जो साम्राज्यवादी शक्तियां है इनमें भी आपस में प्रतिस्पर्धा है. इसीलिए जब यूरोपीय संघ बना तो इंग्लेंड ने सायास उससे अपने को अलग रखा – अपनी पहचान के नाम पर – वह शामिल नहीं हुआ . यह उनका आतंरिक सुरक्षित साम्राज्यवाद था 

• यह जो एक आतंरिक साम्राज्यवाद था – केवल इंग्लैंड का था – और एक सुरक्षित साम्राज्यवाद इंग्लैंड और यूरोप का मिला-जुला साम्राज्यवाद था. इसने पूरी दुनिया का नया वातावरण बनाकर खड़ा कर दिया 

• और उधर अमेरिकी नीति के तहत खुली अर्थ व्यवस्था के नाम पर जो बाजारवाद शुरू हुआ और सारी दुनिया को बाजार के रूप में बदलने की जो कोशिशें हुईं, उसके पीछे भी अमेरिकन हित खासकर जुड़े हुए हैं. चूंकि उसका उत्पादन बिकना है या समृद्ध देशों का उत्पादन बिकना है - जो उसके बाजार की जरूरत है. 

• इसने भाषा बदल दी पूरी तरह से. भाषा बदल दी – मतलब भाषा का छद्म पहले की अपेक्षा सबसे अधिक बढ़ गया. 

• और शिक्षा का छद्म भी बढ़ा. 

• इससे नई समस्याएं पैदा हुईं – नई चुनौतियां पैदा हुईं.

• भाषा का छद्म बढ़ा – भाषा में अपने स्वार्थों को छिपाने की कोशिशें पहले की अपेक्षा अधिक हो गईं. जो चालाक देश हैं उन्होंने इसको किया. 

• यह जो भाषा का छद्म है इसे हम देख ही रहे हैं. यहाँ तक कि अमेरिकन नीति यह है कि जो उसके हितों के पक्ष में है वह उसका दोस्त है और जो उसके हितों के काम नहीं आ रहा है वह उसका दुश्मन है – बीच का कोई रास्ता नहीं हैं उसके यहाँ. लेकिन इसे कभी कहता नहीं है वह. वह हमेशा या तो लोकतंत्र का नाम लेता है, या सभ्यता को बचाने का नाम लेता है, या जनता को तथाकथित तानाशाहों के पंजों से मुक्त करने का नाम लेता है – चाहे वह सद्दाम के हाथ से मुक्त करना हो या फिर चाहे सीरिया के सुलतान के हाथ से मुक्त करना हो या कि त्रिपोली के गद्दाफी के हाथ से मुक्त करना हो. वह कभी यह नहीं कहता कि वह अपने स्वार्थों के लिए ऐसा कर रहा है. बल्कि लोकतंत्र का मसीहा बनने का पाखंड रचता है. यह भाषा का सबसे बड़ा छद्म है जो किसी भी शताब्दी से ज्यादा है. 

• भारतीय राजनीति और प्रशासन से लेकर मीडिया और विज्ञापन तक के लिए भी यह बात उतनी ही लागू है. भाषा अभिव्यक्ति का नहीं पाखंड का माध्यम बन कर रह गई है.

• इसी प्रकार शिक्षा का छद्म यह है कि शिक्षा के नाम पर एक मूल्यहीन दुनिया गढ़ी जा रही है. हम बहुत आसानी से देख सकते हैं कि आज शिक्षा के कौन से रूप प्रभावशाली बन गए हैं. अगर हम यह मानते हैं कि शिक्षा सुधार के लिए होती है – संशोधन के लिए होती है - तो यह वह अर्थ है जिसे बहुत पीछे फेंक दिया गया है 

• अब तो संस्कृति, इतिहास और समाजबोध विहीन आई टी है. मनुष्यता के सारे मूल्यों से विहीन कंप्यूटर शिक्षा है. यह शिक्षा का छद्म है. 

• हम कह रहे हैं कि हम दुनिया में शिक्षा बढ़ा रहे हैं और इसको स्थापित करने के लिए हमने एक नया शब्द गढ़ लिया है – जॉब ओरियंटेड – रोजगारोन्मुख. रोजगारोन्मुख वह है जिसमें मशीनीकरण सबसे अधिक है या सूचनाओं का संग्रह सबसे अधिक है – और जीवन का विश्लेषण सबसे कम है. यह शिक्षा का छद्म है. 

• यह जो परिवर्तन हुआ है दुनिया में– इसने एक नया परिदृश्य रच दिया है और इस परिदृश्य में शिक्षा हो – चाहे संस्कृति हो – चाहे साहित्य हो, इन तीनों की भूमिकाएँ बदल गई हैं, इन तीनों की विश्वसनीयता भी बदल गईं हैं और इन तीनों की जिसे हम कहते हैं रचनात्मक शक्ति -जो इन तीनों में होती है एक साथ मिल करके – उसके उद्देश्य भी बदले गए हैं पूरी तरह से.

• तो हमें इन सबको सोच करके यह ध्यान करना होगा – सबसे पहले यह तय करना होगा - कि शिक्षा के सामने कौन सी नई चुनौतियां आ गईं हैं, संस्कृति के सामने कौन सी नई चुनौतियां आ गईं हैं और साहित्य के सामने कौन सी नई चुनौतियां आ गई हैं 

• उदाहरण के लिए आज साहित्य खुद अपनी भाषा से सबसे अधिक जूझ रहा है और बहुत चालाकी से जो साहित्य के मरने की घोषणाएं की जाती रही हैं – साहित्य को उन घोषणाओं से भी जूझने को बाध्य होना पड़ रहा है 

• इस तरह, ये कुछ मुद्दे हैं साहित्य, संस्कृति और शिक्षा के वर्त्तमान संदर्भ से जुड़े हुए; जिन पर विचार करके ही हमें मनुष्यता के भविष्य की रणनीति बनानी होगी और पुरानी चीजों को न दोहरा करके नई परिस्थितियों में ही इनकी नई भूमिका को देखना होगा.

शनिवार, 6 अप्रैल 2013

"भारतीय साहित्य की प्रवृत्तियाँ" : प्रश्न डॉ. ऋषभ के, उत्तर डॉ. देवराज के


1 अप्रैल 2013, हैदराबाद.
 प्रो. देवराज (अधिष्ठाता, अनुवाद एवं निर्वचन विद्यापीठ, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा) 
और
 प्रो. ऋषभ देव शर्मा (हैदराबाद)
 की फोन वार्ता :
 प्रश्न डॉ. ऋषभ के, उत्तर डॉ. देवराज के. विषय : "भारतीय साहित्य की प्रवृत्तियाँ"

बुधवार, 1 अगस्त 2012

प्रेमचंद जयंती पर 'दूध का दाम' पर परिचर्चा संपन्न


हैदराबाद, 1 अगस्त 2012. 

यहाँ खैरताबाद स्थित दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के विश्वविद्यालय विभाग में कल मंगलवार को 'प्रेमचंद जयंती'  के अवसर पर अमर कथाकार प्रेमचंद की कहानी 'दूध का दाम' पर परिचर्चा आयोजित की गई. आरम्भ में उच्च शिक्षा और शोध संस्थान के अध्यक्ष प्रो.ऋषभ देव शर्मा ने प्रेमचंद की बहुमुखी प्रतिभा, व्यापक विश्व दृष्टि और कालजयी लोकप्रियता की चर्चा की. प्राध्यापक डॉ.मृत्युंजय सिंह ने प्रेमचंद का परिचय देते हुए उनकी कहानी 'दूध का दाम' का वाचन किया. अपनी समीक्षात्मक टिप्पणी में उन्होंने कहा कि यह कहानी पाठक को भद्र समाज के दोगले आचरण के बारे में सोचने के लिए विवश करती  है और सामाजिक परिवर्तन की प्रेरणा देती  है. 

परिचर्चा को आगे बढ़ाते हुए प्राध्यापिका डॉ. जी.नीरजा ने प्रेमचंद की कथा भाषा के सामाजिक पहलू की ओर  ध्यान दिलाया और कहा कि इस कहानी में साफ़ साफ़ दो भाषा रूप देखे जा सकते हैं - संपन्न वर्ग की भाषा और विपन्न वर्ग की भाषा. इसी क्रम में टी.उमा दुर्गा देवी, के.अनुराधा, बिमलेश कुमार सिंह, प्रतिभा मिश्रा, नम्रता भारत, के.अमृता और टी.परवीन सुलताना ने 'दूध का दाम' में निहित स्त्री विमर्श, दलित विमर्श और सामाजिक यथार्थ पर अपने विचार प्रकट किए. प्रायः सभी वक्ताओं ने जाति प्रथा और वर्ण व्यवस्था के संदर्भ  में भारतीय समाज में व्याप्त दोगले आचरण के प्रभावी चित्रण की दृष्टि से 'दूध का दाम' को  उच्च कोटि  की कहानी बताया. {प्रस्तुति  : डॉ.जी.नीरजा} 

शनिवार, 5 नवंबर 2011

भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा [ऑडियो]

गत दिनों हमने अपने यहाँ [उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद में] भारतीय काव्यशास्त्र पर त्रिदिवसीय व्याख्यानमाला आयोजित की थी. इस अवसर पर प्रो. जगदीश प्रसाद डिमरी जी ने अपने छह घंटे से अधिक के संबोधन में भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा को उजागर करते हुए विभिन्न विचारधाराओं की मूलभूत स्थापनाओं की सुबोध व्याख्या की.

मित्रों और छात्रों के आग्रह पर तीनो दिन की ऑडियो रिकॉर्डिंग के लिंक यहाँ दे रहा हूँ ताकि ज़रूरतमंदों के काम आ सके.....



मंगलवार, 1 नवंबर 2011

भारतीय काव्यशास्त्रीय समीक्षादृष्‍टि पर त्रि-दिवसीय व्याख्यानमाला संपन्न

उच्च शिक्षा और शोध संस्थान में आयोजित त्रिदिवसीय व्याख्यानमाला 'भारतीय काव्यशास्त्रीय समीक्षादृष्टि '  के दूसरे दिन मुख्य वक्‍ता प्रो.जगदीश प्रसाद डिमरी के सान्निध्य में लिया गया सामूहिक चित्र

हैदराबाद, 1  नवंबर, 2011.

"भारत में काव्यशास्त्रीय चिंतन के बीज  ऋग्वेद  काल से ही उपल्ब्ध होने लगते हैं यहाँ तक कि दसवें मंडल में आम भाषा और साहित्य भाषा के अलग होने का भी  संकेत प्राप्‍त होता है. किसान जिस तरह छलनी की सहायता से अच्छे अनाज का चुनाव करता है रचनाकार भी लोक से उसी प्रकार श्रेष्‍ठ भाषा को छाँटकर उसका सर्जनात्मक उपयोग करता है. आगे चलकर वैदिक और बौद्ध साहित्य में वाक्‌ विषयक चिंतन का विकास हुआ तथा ईसा की पहली शताब्दी के आस पास भरतमुनि ने नाट्‍यशास्त्र की रचना की. उन्होंने इसकी सामग्री का आधार पाठ, गीत, अभिनय और रस के रूप में चारों वेदों को बनाया."

ये विचार यहाँ उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में ''साहित्य संस्कृति मंच'' द्वारा आयोजित त्रि-दिवसीय व्याख्यानमाला ''भारतीय काव्यशास्त्रीय समीक्षादृष्टि''  के अंतर्गत संस्कृत और रूसी भाषा के मूर्धन्य विद्वान प्रो.जगदीश प्रसाद डिमरी ने प्रकट किए. 

प्रो.ऋषभ देव शर्मा की अध्यक्षता में संपन्न इस व्याख्यानमाला के पहले दिन शुक्रवार को प्रो.डिमरी ने विस्तार से भारतीय काव्यशास्त्र की परंपरा का विश्‍लेषण किया और ऐतिहासिक तथा सामाजिक परिस्थितियों के साथ जोड़कर उसकी व्याख्या की. 

व्याख्यानमाला के दूसरे दिन शनिवार को प्रो.जे.पी.डिमरी ने अलंकारवाद, गुण-रीति वाद और रस-ध्वनि का विवेचन करते हुए यह प्रतिपादित किया कि भारतीय सौंदर्यशास्त्र इन्हीं सिद्धांतों की नींव पर खड़ा हुआ है. रसों की चर्चा करते हुए जब उन्होंने हर रस के अलग अलग देवता और रंग पर प्रकाश डाला तथा भाव विवेचन के संदर्भ में इस सिद्धांत की मनोवैज्ञानिकता का मर्म समझाया तो उपस्थित छात्र और शोधार्थी ही नहीं अध्यापकगण भी चमत्कृत रह गए. 

व्याख्यानमाला के  समापन सत्र में मंगलवार 1 नवंबर, 2011 को अतिथि वक्‍ता ने व्यावहारिक समीक्षा द्वारा प्राचीन और आधुनिक साहित्य के विवेचन के लिए भारतीय काव्यशास्त्र की प्रासंगिकता पर प्रकाश डाला. रस और वक्रोक्ति की कसौटी पर क्रमशः सूरदास के पद 'मधुवन, तुम कत रहत हरे' और सुमित्रानंदन पंत की कविता 'उच्छ्वास' के विवेचन द्वारा उन्होंने इस समीक्षा प्रणाली को सोदाहरण स्पष्ट किया.

व्याख्यान के उपरांत चर्चा परिचर्चा में डॉ.साहिरा बानू, डॉ.बलविंदर कौर, डॉ.जी.नीरजा, डॉ.गोरखनाथ तिवारी, डॉ.मृत्युंजय सिंह, डॉ.पी.श्रीनिवास राव, डॉ.बी.बालाजी, डॉ.पूर्णिमा शर्मा, राधा कृष्ण मिरियाला, सरिता मंजरी, जी.संगीता, राजीव कुमार, रामप्रकाश साह, अजय कुमार मौर्य, अंजु  कुमारी, टी.सुभाषिणी, प्रमोद कुमार तिवारी आदि ने विचारोत्तेजक टिप्पणियाँ की.

संस्थान की ओर से संपर्क सचिव ने उत्तरीय और स्मृतिचिह्न प्रदान कर प्रो.डिमरी के प्रति कृतज्ञता प्रकट की तथा छात्रों ने भी वाग्देवी की प्रतिमा समर्पित कर सम्मान किया.   



गुरुवार, 5 मई 2011

मौसम का मिजाज़ और अपने चंद्रमौलेश्वर जी

बुधवार की बात है. यानी चार मई की. एन सी ई आर टी (दिल्ली) से डॉ. नरेश कोहली का फोन था. बोले - आज 'जनसत्ता' में आपका नाम देखा. मैं भौंचक. ऐसा क्या कारनामा कर दिया मैंने? शायद प्रताप सिंह ने कुछ लिखा हो - वे उसी अखबार में हैं. पर नहीं, कारनामा न मेरा था न प्रताप का. अपने चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी का था. तभी कोलकाता से डॉ. देवराज ने चलघंटी  की कोयल कुहका दी - अभी मेरे सामने जनसत्ता है. है क्या उसमें ,यह तो बताइये - मेरे पूछने पर उन्होंने तफसील में बताया कि मौसम के मिजाज़ पर च मौ प्र ने अपने ब्लॉग पर जो पोस्ट मेरे नामोल्लेख के साथ डाली थी, जनसत्ता ने समांतर में छाप दी है; और उन्हें हैदराबाद में होने का भ्रम हो रहा है! ओह, तो यह बात है! मैंने राहत की साँस ली. बाद में नेट पर वह पेज मिल गया . कटिंग पेशे-खिदमत है -



शुक्रवार, 29 अप्रैल 2011

अज्ञेय के साहित्य का पुनर्पाठ आवश्यक - डॉ. त्रिभुवन राय


'अज्ञेय साहित्य समारोह' का उद्‍घाटन 30 को 

हैदराबाद, 29 अप्रैल, 2011 (विज्ञप्‍ति)।

"सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन 'अज्ञेय' उत्तरछायावादी युग के एक गंभीर चिंतक और अपनी विचारणाओं के प्रति गहराई से प्रतिबद्ध एवं निष्‍ठावान साहित्यकार रहे हैं। अज्ञेय एक बहुअधीत, प्रातिभ साहित्यकार होने के साथ साथ भारतीय सांस्कृतिक चेतना को आत्मसात करने वाले विचारवान कवि रहे हैं। परंपरा उनके लिए उपेक्षा की वस्तु नहीं रही है। नवता का जहाँ वे स्वागत करते हैं वहीं परंपरा की विरासत के मूल्य को भी समझते हैं। इसीलिए भारतीय चिंतन, दर्शन, संस्कृति और काव्यशास्त्र की मूलभूत स्थापनाओं से उन्हें न तो कोई गुरेज़ है और न ही परहेज़।" 

ये विचार यहाँ दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा में आयोजित 'अज्ञेय जन्म शती समारोह' का उद्‍घाटन करने के लिए मुंबई से पधारे प्रतिष्‍ठित काव्यशास्त्रीय विद्वान प्रो.त्रिभुवन  राय ने एक खास बातचीत में प्रकट किए। 30 अप्रैल, शनिवार को होने वाले कार्यक्रम की पूर्व संध्या पर प्रो.त्रिभुवन राय ने अज्ञेय के संबंध में बताते हुए यह कहा कि अज्ञेय के साहित्य का, खासतौर से उत्तरवर्ती साहित्य का पुनर्पाठ करने से यह बात स्पष्‍ट होती है कि वे भारतीय रस दृष्‍टि से अत्यधिक प्रभावित हैं। प्रो.राय ने कहा कि अज्ञेय के साहित्य में संकुचित नियता को विस्तृत समष्‍टि चेतना को अभिमुख करने की जो प्रवृत्ति पाई जाती है वह उन्हें भारतीय रस दृष्‍टि से जोड़ती है। इसी बिंदु पर वे हमारी संस्कृति और सौंदर्य चेतना के प्रगाड़ रचनाकार के रूप में सामने आते हैं।

डॉ.त्रिभुवन राय ने यह भी याद दिलाया कि पूर्वाग्रह और असहृदय भाव से न अज्ञेय के साहित्य का अनुशील किया जा सकता है और न सही अर्थ में मूल्यांकन। उन्होंने कहा कि आवश्‍कता इस बात की है कि हम अज्ञेय को अज्ञेय के धरातल पर समझने और मूल्यांकित करने का प्रयत्‍न करें। उन्होंने आशा प्रकट की कि उच्च शिक्षा और शोध संस्थान द्वारा 'अज्ञेय और उनका साहित्य' पर आयोजित इस एकदिवसीय राष्‍ट्रीय संगोष्‍ठी और पोस्टर प्रदर्शनी से अज्ञेय के साहित्य को विचारधाराओं से मुक्‍त वस्तुपरक दृष्‍टि से समझने में सहायता मिलेगी।

इस एकदिवसीय समारोह का उद्‍घाटन दक्षिण भारत हिंदी प्रचार, खैरताबाद स्थित परिसर में शनिवार को प्रातः 9.30 बजे होगा, जिसकी अध्‍यक्षता भाषाचिंतक प्रो.दिलीप सिंह करेंगे। अज्ञेय साहित्य के विशेषज्ञ डॉ.सच्चिदानंद चतुर्वेदी बीज व्याख्यान देंगे। विभिन्न सत्रों में डॉ.राधेश्याम शुक्ल, डॉ.टी,मोहन सिंह, डॉ.एम.वेंकटेश्‍वर, डॉ.जे.पी.डिमरी, डॉ.टी.वी.कट्टीमनी, डॉ.विष्‍णु भगवान शर्मा, डॉ.आलोक पांडेय, डॉ.गोपाल शर्मा, डॉ.घनश्याम, डॉ.साहिरा बानू, डॉ.मृत्युंजय सिंह, डॉ.जी.नीरजा, डॉ.बलविंदर कौर, डॉ.गोरखनाथ तिवारी, डॉ.पी.श्रीनिवास राव, डॉ.बी.बालाजी, चंदन कुमारी, मोहम्मद कुतुबुद्‍दीन और एम.राजकमला अज्ञेय जी के व्यक्‍तित्व और कृतित्व के विविध आयामों पर प्रकाश डालेंगे। सभी साहित्य प्रेमियों से समारोह में पधारने का अनुरोध है।

शनिवार, 2 अप्रैल 2011

हैदराबाद में शमशेरियत का पूरा चाँद देखने को मिला - नामवर सिंह


शमशेर  राजनीति नहीं,  सौंदर्य  के कवि हैं    - नामवर  सिंह
हैदराबाद  में   शमशेरियत का पूरा  चाँद  देखने  को मिला -  नामवर सिंह

हैदराबाद, 2  अप्रैल, 2011। 

‘शमशेर  बहादुर   सिंह   हिंदी और उर्दू  दोनों    भाषाओं   के  बड़े   कवि थे।   गद्यकार भी  वे   उतने  ही बड़े   थे। वे  इकलौते ऐसे  आलोचक  हैं जिन्होंने  हाली  की उर्दू    रचना ‘मुसद्दस’   और मैथिलीशरण गुप्त  की हिंदी  रचना ‘भारत  भारती’  की गहराई  से तुलना करते हुए  दोनों   के रिश्ते   की पहचान की। इक़बाल  पर भी हिंदी     में  उन्होंने ही  सबसे  पहले  लिखा।  वे  हिंदी  और  उर्दू  के  बीच  किसी  भी    प्रकार   के  भेदभाव और    टकराव  के   विरोधी थे।  इसीलिए  तो    उन्होंने कहा था  -   ‘वो    अपनों  की बातें,   वो  अपनों     की खू    बू / हमारी  ही  हिंदी हमारी    ही  उर्दू।’  इतना ही  नहीं, नितांत   निजी क्षणों    में   भी    उन्हें     उर्दू   ज़बान  ही याद आती थी।   उदाहरण  के लिए  मुक्तिबोध  पर उनकी उर्दू  में  लिखी  कविता  को  देखा  जा सकता है।’’

ये विचार हिंदी   समीक्षा  के  शलाका पुरुष प्रो.  नामवर सिंह  ने  30-31मार्च,  2011 को  हैदराबाद में  आयोजित द्विदिवसीय राष्ट्रीय  संगोष्ठी  ‘शमशेर शताब्दी समारोह’  के उद्घाटन  सत्र में   बुधवार  को बीज व्याख्यान देते हुए  व्यक्त   किए। यह  समारोह  उच्च शिक्षा  और  शोध संस्थान,  दक्षिण   भारत   हिंदी  प्रचार   सभा  और  मौलाना आजाद राष्ट्रीय  उर्दू  विश्वविद्यालय के  संयुक्त  तत्वावधान में    संपन्न हुआ। प्रो. नामवर  सिंह ने  इसे एक अच्छी शुरुआत  मानते  हुए  कहा कि शमशेर हिंदी-उर्दू की गंगा-जमुनी  तहजीब  के  अपने ढंग  के  विरले अदीब थे। हिंदी  और  उर्दू  की  राष्ट्रीय  महत्व  की  दो  बड़ी  संस्थाओं  ने  हिंदी-उर्दू  के  इस  दोआब  को  पहचाना  है,  यह  बहुत महत्वपूर्ण  घटना  है।  इस बहाने  इन दोनों   भाषाओं   के परस्पर  नज़दीक   आने का जो  सिलसिला  शुरू हुआ है  वह  हैदराबाद से आरंभ  होकर देश  भर में  फैलना चाहिए।  डॉ.    नामवर  सिंह ने  याद दिलाया कि शमशेर   बहादुर   सिंह  ने  1948    में  निजामशाही के  खिलाफ  भी    एक छोटी   सी नज़्म लिखी   थी  -   ‘ये   चालबाज हुकूमत    दुरंगियों का गढ़/बनी  हुई  है  अभी  तक फिरंगियों  का  गढ़ / लगे  अवाम  की  ठोकर  निज़ाम  शाही  को।’  साथ  ही  डॉ.  सिंह  ने यह भी    ध्यान दिलाया कि आप शमशेर को सियासी  कवि न समझें,  वे   सही अर्थों  में ऐस्थीट  थे - सुंदरता  के कवि थे।  वे   रंगों  से खेलते थे,  शब्दों    से खेलते  थे।   उनके रचनाकार  व्यक्तित्व का एक हिस्सा अपने प्यारे शायर मजाज़ का है  पर वे  उतने  पॉलिटिकल   नहीं हैं ।  वे   चित्रकार  भी   थे   और  एक खास किस्म की  एम्बिगुइटी,  एक खास किस्म का पेंच,   उनकी  कविताओं   में    है। इसीलिए  वे    उतने    पॉपुलर  नहीं  है     जितने  कि  गर्जन-तर्जन  करनेवाले सियासी  कवि हुआ  करते हैं।’’

डॉ.  नामवर सिंह ने शमशेर  के  संकोची  व्यक्तित्व   से लेकर  उनके चित्र और  कविताओं  के  संबंध तक की व्याख्या  की और  कहा कि उनकी कविता इशारा ज्यादा  करती है,   बोलती  कम  है।   शमशेर   के गद्य  की शक्ति  को भी  उन्होंने    वाणी के  संयम में   निहित माना।  उन्होंने   कहा कि शमशेर  की समग्र  रचनावली आनेवाली  है  और   उनकी  रचनाएँ  हिंदी  तथा  उर्दू  दोनों  भाषाओं  का  साझा  सरमाया  है।  इसलिए  उनके  साहित्य  पर,  उसके  हर  एक पक्ष  पर साझा  दृष्टिकोण  से विचार करने की जरूरत है।   अंत  में   उन्होंने      निष्कर्ष  दिया कि दूसरा  शमशेर नहीं हुआ -  न हिंदी  में, न उर्दू  में।   उन्होंने    इस बात की ओर  भी   ध्यान दिलाया कि यह  वर्ष   मजाज़ का भी   शताब्दी वर्ष  है,परंतु साहित्य   जगत का इस ओर   कोई ध्यान नहीं है जबकि अपने समकालीन फैज  अहमद फैज जैसे शायरों  की तुलना में  वे   कहीं बड़े   शायर हैं।

समारोह का उद्घाटन  करते  हुए  डॉ.  गंगा  प्रसाद विमल  ने  कहा  कि  लोक  में  शमशेर लोकप्रिय  कवियों से ज्यादा  रमे  हुए  हैं।  वे    मुकम्मिल  तौर  से हिंदुस्तान  में  रचे  बसे ऐसे  कवि हैं जिन्होंने प्रेमचंद   की तरह  उम्दा  हिंदी   और   बेजोड़ उर्दू    में    लिखा  है।  उन्होंने हिंदी    की कविताभाषा   को  हिंदुस्तानियत  के  लहजे से पुष्ट किया।  इसी  के  कारण  उनकी  शमशेरियत लोगों  से  अपना  लोहा  मनवा  लेती  है।  डॉ.  गंगा  प्रसाद  विमल  ने  आगे  कहा कि  यद्यपि शमशेर बहुत  मुश्किल  कवि हैं  लेकिन  उनके  साहित्य  से  यह  पता  चलता  है  कि  वे  हिंदुस्तान  से बेइंतहा मुहब्बत  करनेवाले कवि हैं।  यही कारण  है कि गुरबत,  युद्ध  और आतंक  के  जो  चित्र उन्होंने  अपनी रचनाओं  में उकेरे  हैं वे   ज्यादा  प्रभावी     हैं।  खास तौर  से हिंदुस्तानी  भाषा   के  अपने  संस्कार   के  कारण वे   आज हमारे  लिए  बेहद  प्रासंगिक  हैं।  गंगा  प्रसाद  विमल  ने  अपने  खास  अंदाज  में  जब  यह  कहा  कि  मैं  तो  चाहता  हूँ कि हिंदी  और  उर्दूवाले  उनके  लिए  इस तरह  लडें  जिस तरह  कभी  हिंदू  और  मुसलमान  कबीर  के  लिए  लड़े  थे,  तो  सभाकक्ष   करतल ध्वनियों  से गूँज  उठा।  डॉ.  गंगा  प्रसाद  विमल  ने  अपनी  बात समाप्त  करते हुए  कहा कि जमहूरियत के इलाके  में   सेक्यूलर बनकर  अपनी बातें  कहनेवाले शमशेर  हिंदुस्तानियत  की मुहिम  का आधार  बन सकते  हैं।

उद्घाटन सत्र के   आरंभ में    संयोजक  प्रो.  दिलीप  सिंह  ने   कहा कि शमशेर  जैसी शख्सियत हिंदी-उर्दू दोनों  जबानों  में    दूसरी बहुत  मुश्किल से मिलेगी।  उन्होंने  नामवर सिंह   के  हवाले  से कहा कि हम लोग  यहाँ शमशेरियत  की खोज  के  लिए  ही   जुटे  हैं। प्रमुख  भाषाचिंतक  दिलीप सिंह    ने  यह  भी    कहा कि  शमशेर   उर्दू काव्यभाषा  के संस्कार  को  हिंदी  में  संभव  बनानेवाले  कवि हैं  इसलिए उन्हें   हिंदी के  साथ  साथ  उर्दू    भाषा  और साहित्य  के पाठ्यक्रम  में   भी   शामिल  किया जाना चाहिए।

विषिष्ट अतिथि   के रूप में   बोलते हुए  प्रो.   आमिना  किशोर  ने  शमशेर  के साहित्य   को  अंतरअनुशासनीय शोध  का विषय  बनाने की जरूरत बताई  और  कहा कि हिंदी-उर्दू  के  ऐसे  रचनाकारों  को खोजा  जाना चाहिए जिनमें दोनों ज़बानों  का मेल है।   उन्होंने  भारत-पाक   क्रिकेट  मैच वाले दिन भी   खचाखच भरे   सभागार  की ओर इशारा  करते हुए  यह  कहा कि साहित्य  के  द्वारा  जो  वैश्विक संदेश   दिया जा सकता  है,  कोई  क्रिकेट   वैसा  नहीं कर सकता।

उद्घाटन सत्र की अध्यक्षता मौलाना  आजाद राष्ट्रीय  उर्दू   विश्वविद्यालय  के कुलपति  प्रो.  मोहम्मद  मियाँ ने  की।   अध्यक्षीय वक्तव्य  में    उन्होंने  संगोष्ठी  की समसामयिक प्रासंगिकता  और  हिंदी-उर्दू  को  नज़दीक लाने  के लिए इसके स्थायी  महत्व  का  समर्थन  किया  और  कहा  कि  भविष्य  में  शमशेर   और  मजाज़  पर संयुक्त  संगोष्ठी  की जानी चाहिए।

उद्घाटन के   बाद    ‘शमशेर की स्मृति’  पर केंद्रित   सत्र में     प्रो.  दिलीप  सिंह  ने  'शमशेर : व्यक्ति    और रचनाकार’  शीर्षक  आलेख  प्रस्तुत  किया। उन्होंने   मुक्तिबोध के  हवाले  से कहा कि शमशेर की जिंदगी ठहराव में  रवानी  की दास्तान  है।    अनेक प्रमाणों  के  साथ  उन्होंने    शमशेर   के  इस  वक्तव्य  की भी    परीक्षा  की कि ‘सारी कलाएँ एक दूसरे  में    समोई  हुई     हैं’  और  यह  दर्शाया   कि शमशेर  चित्र,  संगीत,  नाटक और  नृत्य  को भी   संप्रेषण युक्ति की तरह  इस्तेमाल करते हैं।   प्रो.    दिलीप सिंह  ने जहाँ   एक ओर  यह  कहा कि शमशेर  ने  निराला से आगे जाकर  नए  नए  काव्यरूप  और   भाषा    की संभावना  की तलाश  की है,   वहीं    यह  भी    कहा कि निरंतर निज  से संवाद करनेवाले इस कवि की उर्दू  साहित्य  के लिए  दीवानगी  अद्वितीय है। डॉ. दिलीप सिंह  के अनुसार  शमशेर  विचलन के  कवि हैं  जो  उनकी  मानसिक जटिलता के  साथ  साथ  भाषा कौशल  को जाँचने   की उनकी  ताकत का भी   प्रतीक है।     डॉ.  सिंह   ने याद दिलाया कि सुंदरता समशेर की कविता का बड़ा   हिस्सा   घेरती है,   ‘लीला’ उनका  प्रिय  शब्द  है,  वे  विराम  चिह्नों  और  रिक्त  स्थान  तक का  बहुत  सतर्कता  से  प्रयोग  करनेवाले  लेखक  हैं तथा   सभी  प्रमुख  कवियों   और  आलोचकों  ने  उन    पर  लिखा  है   और     उन्होंने     भी    इन पर लिखा  है    जो  अपने समकालीनों  से उनके रिश्तों   का पता देता   है।

प्रो. तेजस्वी  कट्टीमनी  ने   इसी बात को  आगे   बढ़ाते हुए   ‘लोगों    की स्मृतियों  में बसे  हुए  शमशेर'  पर प्रकाश    डाला। खास तौर    से नरेंद्र  शर्मा,  केदारनाथ  अग्रवाल,   नामवर   सिंह  और   रंजना अरगडे   के  हवाले  से उन्होंने    कहा कि  संकोची   स्वभाव वाले   शमशेर     अपने समय के   सबसे   अधिक  बहुमुखी   प्रतिभावाले   कवि  थे।  उन्होंने   शमशेर की उदारता   के  किस्से  सुनाते  हुए  बताया कि वे   तंगदिल नहीं  थे    और विपन्न   लोगों   के  प्रति उनके मन में  बड़ी   करुणा थी।  चरित्र के  ऐसे  ही गुण शमशेर   को केवल  अच्छा  कवि ही नहीं अच्छा  आदमी   भी  बनाते हैं।

इस सत्र में   डॉ.  गंगा  प्रसाद विमल ने शमशेर बहादुर   सिंह   से जुड़े   कई रोचक  प्रसंग  सुनाए   और उनकी नज़ाकत-नफ़ासत  का खासतौर  पर ज़िक्र  करते हुए  यह  भी    बताया कि उनका  कलाओं के  प्रति   इतना लगाव था   कि प्रायः  कला दीर्घाओं  के  चक्कर  लगाते रहते थे।  फ़ारसी  साहित्य   के प्रति  शमशेर के  प्रेम पर भी   उन्होंने  प्रकाश डाला। 

मुंबई   से पधारे   ‘हिंदुस्तानी’ के  समर्थक  भाषावैज्ञानिक  डॉ.  अब्दुस्सत्तार  दलवी  ने  स्मृति   सत्र की अध्यक्षता करते  हुए  कहा कि ‘‘शमशेर  महात्मा गांधी की हिंदुस्तानी  भाषानीति का सबसे  खूबसूरत उदाहरण पेश   करते  हैं। वे  ऐसे  अदीब  हैं  जिनका  साहित्य  हमारी  तहज़ीबी जिंदगी  का  बड़ा  सरमाया  है,  जिसमें  भारत  की संस्कृति   को पहचाना  जा  सकता है।’’  उन्होंने   कहा कि शमशेर  बहादुर  सिंह  के साहित्य   को  पढ़कर यह  बात समझ  में  आती  है  कि हिंदी.  के  बिना  उर्दू, और  उर्दू  के  बिना  हिंदी,  पूरी  नहीं  हो  सकती।  प्रो.  दलवी  ने  इस  बात की ओर भी   इशारा  किया कि शमशेर की भाषा में   सामाजिक  शैली  की विविधता अहेतुक  नहीं है  बल्कि उनके काव्यरूप  और  भाषारूप  में  गहरा भीतरी  नाता  है।    'शमशेर   की स्मृति’   विषयक  इस  सत्र  का  संयोजन  प्रो. ऋषभदेव  शर्मा  ने  किया तथा  डॉ.  मृत्युंजय  सिंह  ने वक्ताओं के  प्रति   आभार प्रकट   किया।

‘शमशेर की कविता’ पर केंद्रित विचार   सत्र की अध्यक्षता इंदिरा  गांधी  राष्ट्रीय  मुक्त  विश्वविद्यालय से पधारे  प्रो.सत्यकाम  ने  की।   उन्होंने  इस बात पर जोर दिया कि शमशेर   बहादुर सिंह  जैसी बड़ी  प्रतिभा   को  प्रगतिवाद,   प्रयोगवाद या अतियथार्थवाद  जैसे  किसी  खेमे   में कैद  नहीं  किया जा  सकता। उन्होंने    शमशेर को लोककवि  और  जनकवि  बताते  हुए कहा कि उनकी  बहुत सी कविताएँ  सीधे  मजदूर या संघर्ष  करने वालों से जुड़ती हैं, उनकी  कविता में   धर्मनिरपेक्षता   की बातें    निहित हैं और  वे चिंतनपरक  होने    के   बावजूद   अपनी संवेदनशीलता के  कारण हमारे  हृदय  को   भेदती  हैं। डॉ.  सत्यकाम ने  कहा कि शमशेर  एक कवि नहीं, कवियों के पुंज हैं  क्योंकि  उनकी कविताओं  में   परस्पर  विरोधी  प्रतीत होनेवाले कई  कवि झाँकते प्रतीत  होते    हैं।

अलीगढ़ विश्वविद्यालय   से आए डॉ.  अब्दुल  अलीम  ने 'शमशेर : काव्यानुभूति  के  आयाम’  विषय  पर अपने आलेख  में  कहा कि शमशेर की कविताओं  का रेंज  बहुत  व्यापक है,  वे न विषय  का सीमाबंधन स्वीकार कर सकते  हैं  और  न किसी एक भाषारूप  का।  विजयदेव  नारायण  साही  के हवाले से   शमशेर को  बिंबों  का कवि बताते  हुए  उन्होंने कहा कि उनके  काव्य  में  मानवीयता  और  विश्वव्यापी  चेतना  मौजूद     है  जो   यथार्थसापेक्ष है, और   समयसापेक्ष  भी।
  
‘शमशेर की काव्यभाषा’   पर दक्षिण  भारत  हिंदी प्रचार   सभा  के  कुलसचिव प्रो.  दिलीप  सिंह  ने  आलेख   प्रस्तुत   करते हुए  यह  माना  कि भाषा  के  स्तर  पर शमशेर का पाठ-विश्लेषण  कठिन काम है  जो  पाठक की मानसिकता और  भावना  के  बिना  संभव     नहीं    है।  उन्होंने कहा कि शमशेर   की कविता जीवन में    प्रेम  और  सत्य का स्थान खोजती   हुई   कविता है।    प्रो.   सिंह   ने सिद्ध   किया कि  आंतरिक  स्तर पर शमशेर   की समस्त  कविता ‘हिंदवी की लय’ से युक्त है   और उनकी काव्यभाषा  बहुत लचीली  और  संकेतात्मक  है।  इस लचीलेपन  के कारण  ही  वह अर्थ-सघन  और संश्लिष्ट  बन सकी  है।  शमशेर   की काव्यभाषा  में  सूफियाना ढब को रेखांकित  करते हुए प्रो.   दिलीप सिंह   ने कहा कि सांप्रदायिक  सौहार्द को  संभव  बनानेवाली  लोकभाषा  के  साथ  शमशेर   के  पास  उर्दू शब्दावली   ही  नहीं, उर्दू   साहित्य की पूरी  परंपरा और  भाषिक विधान   भी   मौजूद  है। उन्होंने  शमशेर को शैली के संयम  और  भाषा के  नियंत्रण  में कुशल   भाषा-सर्जक कवि सिद्ध किया।

काव्यभाषा विषयक चर्चा  को  आगे   बढ़ाया उच्च  शिक्षा और शोध संस्थान,  हैदराबाद के डॉ. ऋषभदेव शर्मा   ने। उन्होंने समाजभाषाविज्ञान  की एक संकल्पना  का आधार  लेकर ‘शमशेर की कविता में    रंग’  पर पर्चा पढ़ा। डॉ.ऋषभ के  अनुसार ‘‘शमशेर की  कविताओं  में   विविध  रंगों   का विविध  रूपों में   प्रयोग  सर्वथा समाजसिद्ध है  और  यह  सिद्ध  करने  में  समर्थ  है  कि  अपनी  समग्र  निजता  में  कवि  शमशेर बहादुर  सिंह  लोक, समाज और संस्कृति  के विविधवर्णीय  सौंदर्य  से  अनुप्राणित   रचनाकार हैं।  रंगों के  प्रति   उनका   आकर्षण  उनके   विविध अभिप्रायों   की  गहरी  समझ से जुड़ा   हुआ     है।’’  उन्होंने  ख़ासतौर  पर शमशेर  की -  ये  शाम  है,  कत्थई    गुलाब,  पूरा आसमान का आसमान, एक पीली  शाम, यह  गुलदाउदी  शाम,   सूर्यास्त,  उषा, प्रभात, एक स्टिल  लाइफ, फिर गया है समय का रथ,  वसंत आया, शंख पंख, धूप कोठरी   के  आईने में   खड़ी,  दिन किशमिशी ,  पूर्णिमा  का  चाँद, भुवनश्वर, शरीर  स्वप्न, एक नीला दरिया बरस रहा, वो  एक हरा-नीला सा कगार न था,  अम्न का राग, सौंदर्य, होली : रंग  और दिशाएँ  तथा सावन जैसी  कविताओं  का समाजभाषिक विश्लेषण  करते हुए प्रतिपादित   किया कि ‘‘शमशेर  बहादुर  सिंह   की संवेदनशीलता  का प्रसार पौराणिक   और  छायावादी   संस्कारों  से लेकर अंग्रेज़ी और ख़ासतौर   पर उर्दू    परंपरा तक परिव्याप्त  है।   समाजसिद्ध भाषा   के  अनेक धरातलों  और  संस्कारों  को  एक साथ साध  पाने के सामर्थ्य  के कारण  ही वे   बड़े  कवि हैं - महान, कालजयी और अद्वितीय; जिनका अनुकरण नहीं   हो सकता।’’

जोधपुर से पधारे  डॉ.  श्रवण  कुमार   मीणा  ने शमशेर की गज़लों  का विश्लेषण किया और  कहा कि इनमें प्रेम  और  सौंदर्य  के  साथ  साथ  तत्कालीन  कविता के  वर्ण्य  विषयों   मोहभंग,   निराशा   और  आम आदमी  की पीड़ा को   भी    अभिव्यक्ति  प्राप्त  हुई   है।    उन्होंने  यह  भी  दिखाने  की कोशिश  की  कि शमशेर  के  गज़लकार  पर उनका कवि रूप हावी  है।

दिल्ली से पधारे कविवर डॉ. हीरालाल  बाछोतिया के  सुचिंतित   आलेख  का विषय  था   ‘शमशेर : शोक गीतों के आईने  में’  जिसमें उन्होंने  जवाहरलाल नेहरु,  सुभद्राकुमारी  चौहान,  मुक्तिबोध,  भुवनेश्वर   और   मोहन  राकेश  पर लिखी  शमशेर  बहादुर  सिंह की कविताओं  की संवेदनशीलता , गहरे  मानवीय बोध और   शैलीय  बुनावट की व्याख्या करते हुए कहा  कि मौत  को  भी   रोमांटिक  रूप में   प्रस्तुत करना केवल  शमशेर  के लिए  ही   संभव    है। अध्यक्ष मंडल  के  सदस्य  प्रो.  टी.मोहन  सिंह   ने  शमशेर  की जनपक्षधरता और  प्रयोगधर्मिता  को  तेलुगु साहित्यकार श्रीश्री से तुलनीय बताया जो  कि शमशेर के  समवयस्क  और  समकालीन  थे।

इस  सत्र  का  संयोजन  डॉ.  जी.वी. रत्नाकर ने  किया  तथा  डॉ.  जी.  नीरजा  ने वक्ताओं  और  श्रोताओं का धन्यवाद प्रकट  किया।

दूसरे दिन यानी   31  मार्च, 2011   (गुरुवार)  को  आयोजित विशेष सत्र में   प्रो.  नामवर  सिंह  ने  लगभग   पौन घंटा  शमशेर   से संबंधित संस्मरण   सुनाकर श्रोताओं   को  भावविगलित  तो   किया ही,  वैचारिक  रूप से समृद्ध  भी  बनाया।  उन्होंने   बनारस, इलाहाबाद,  दिल्ली,  उज्जैन   और अहमदाबाद में    शमशेर   से अपनी मुलाकातों  की चर्चा करते हुए  बताया कि एक समय शमशेर   कम्युनिस्ट  पार्टी  के  कम्यून  में    रहते थे  जहाँ  उनकी  घनिष्ठता बच्चन  और   नरेंद्र शर्मा  के अलावा  प्रकाश  चंद्र  गुप्त  और तीन अग्रवाल बहनों  से थी।  नामवर जी ने  बताया कि शमशेर  की आँखों  पर  कम उम्र  में  ही   मोटा चश्मा चढ़  गया था।  वे   नरेंद्र   शर्मा   की गिरफ्तारी और  देवरी कैंट जेल में  कारावास से काफ़ी  विचलित हुए  थे और उस समय आयोजित  कविगोष्ठी  में   उन्होंने अपने से पहले नरेंद्र  शर्मा  की कविता सुनाई   थी। अतीत में   गोता  लगाते  हुए डॉ. नामवर  सिंह ने  याद किया कि शमशेर  थरथराती काँपती सी आवाज  में काव्यपाठ  करते थे  और  उस समय भावावेश के  कारण उनकी इकहरी  काया खुद  बेंत  की तरह थरथराती थी -सरापा खुद   नज़्म हो जैसे।  डॉ.  नामवर  सिंह   ने यह  भी   बताया कि सड़क  साहित्य की रचना  में  भी शमशेर   बहादुर सिंह  का जोड़  नहीं    था।  उनकी सरलता  और  भावुकता के  भी    किस्से  नामवर जी ने  सुनाए  और यह  भी    बताया कि किस तरह  उनका  छोटा   सा कमरा अनेक  साहित्यकारों  का मिलन स्थल  बन गया था।  नामवर  सिंह के  अनुसार  शमशेर  बहादुर सिंह सही अर्थों  में  ‘उखड़े हुए लोग’ थे   जो  कभी कहीं  ढंग  से बस न सके और  जीवन भर शरणार्थी बने रहे।  उन्होंने  कहा कि  ‘‘बेसिकली शमशेर उर्दू  के आदमी  थे,  उनकी  मादरी ज़बान और  पढ़ाई-लिखाई की भाषा उर्दू ही  थी।  इसीलिए  उर्दू  की  उनकी  काबिलियत  को   देखते   हुए  ही ख्वाजा अहमद फारूक़ी ने  उन्हें उर्दू-हिंदी  शब्दकोष के  संपादन  का काम सौंपा  था।’’

दूसरे दिन के   दो विचार  सत्र शमशेर   के  गद्य   को समर्पित रहे।  इन सत्रों  की अध्यक्षता केंद्रीय हिंदी संस्थान   के   प्रो.  हेमराज  मीणा  और  ‘स्वतंत्र    वार्ता’ के   संपादक डॉ.  राधेश्याम  शुक्ल  ने   की तथा  संयोजन डॉ. करनसिंह ऊटवाल और  डॉ.  शेषुबाबु  ने  किया।  डॉ.  हेमराज  मीणा  ने  अपने  पीएच.डी. शोध कार्य   के  दौरान  तीन वर्ष   शमशेर  के  साथ  रहने  के  मार्मिक  संस्मरण  सुनाए। शमशेर  जी साधारण  चाय के  स्थान पर हल्दी  की चाय खुद  बनाकर  पीते  थे  और  आर्थिक  विपन्नता  का  आलम  यह  था    कि  घिसे  और  फटे  हुए  कुर्ते  को  हाथ  से सिलकर काम चलाना पड़ता   था।

डॉ.  राधेश्याम शुक्ल  ने शमशेर बहादुर सिंह   को हिंदी और  उर्दू   की गंगा  जमुनी  तहज़ीब का कवि मानते हुए  उनकी  काव्यभाषा को  हिंदवी   मानने  पर ज़ोर दिया।  डॉ. शुक्ल ने  कहा कि भारतेंदु, प्रेमचंद और शमशेर  बहादुर  सिंह जैसे  साहित्यकारों  की  भाषा मेलजोल और सामंजस्य  की  भाषा है  जिसे   अपनाकर   देश में  सांप्रदायिक  सद्भाव   को  मजबूत किया जा  सकता  है।   उन्होंने   कहा  कि यह  मिली  जुली काव्यभाषा  संगम  की भाँति   है  जहाँ  भाषारूपी  जल तीर्थ  बन जाता है।

एरणाकुलम (केरल)  से आई  प्रो.  सुनीता मंजनबैल  ने  शमशेर  के डायरी लेखन  पर केंद्रित आलेख   में   यह बताया कि  उन्होंने    अपनी डायरी  में  अपनी चिंताएँ, इच्छाएँ, वैचारिकता  और  सपनों    को  स्वभावगत    भावुकता, संवेदनशीलता और  संकोच   के   साथ   व्यक्त   किया  है।   उदाहरण  देकर उन्होंने    बताया कि  इनमें लेखक के अकेलेपन,   गहरी पीड़ा,   तनाव और  निजी अनुभूतियों  को  अकृत्रिम अभिव्यक्ति  प्राप्त  हुई    है।   डॉ.  सुनीता  ने  यह भी   जानकारी  दी  कि अपनी डायरी  में शमशेर ने हिंदी नॉवल का ऐसा इतिहास  लिखने की ख्वाहिश  भी   अंकित की है  जिसमें  हिंदी  और  उर्दू   दोनों    के उपन्यास  शामिल हों।

इसके पश्चात   डॉ.  मृत्युंजय  सिंह  ने   ‘घनत्व    और    प्रसार का गद्य’  शीर्षक    अपने आलेख   में      यह प्रतिपादित  किया  कि  शमशेर  का  गद्य  अमूर्तन  से  मूर्तन  की  ओर  बढ़नेवाला  गद्य  है  जिसमें  उनका  चिंतन  और अनुचिंतन  समाहित है।   डॉ.  सिंह   ने कहा  कि चाहे  कविता हो,  या कहानी,  या  फिर संस्मरण जैसी अकाल्पनिक  गद्य विधा   ही   हो -   तीनों     में  शमशेर   के व्यक्तित्व की निश्छलता, भावप्रवणता,  अध्ययनशीलता और  सौंदर्य दृष्टि के  वैशिष्ट्य  को  साफ साफ पहचाना जा सकता है।

‘शमशेर की कहानियाँ’  विषयक आलेख  में    डॉ.जी.  नीरजा  ने   खासतौर  से युद्ध पर केंद्रित शमशेर की  कहानी    ‘प्लाट  का मोर्चा’    के   वस्तु  और  शिल्प  का विश्लेषण  किया और   बताया कि  इतने    मर्मस्पर्शी ढंग   से महायुद्ध के   प्रभाव को   चित्रित करनेवाले  वे    अज्ञेय के बाद  अकेले कहानीकार  हैं।     इस कहानी  की भाषा      में  खड़ीबोली  क्षेत्र  का ठेठपन  और खुरदरा अंदाज   पाठक को  आकर्षित  करता  है।

गद्य  संबंधी  इस  सत्र  के  अंत  में डॉ.  बलविंदर  कौर  ने सभी  के  प्रति  धन्यवाद ज्ञापित   किया।

इसी क्रम में     संगोष्ठी के   अंतिम विचार  सत्र में    प्रो. अमर ज्योति  (धारवाड)   ने   ‘शमशेर की आलोचना दृष्टि’  शीर्षक  अपने आलेख  में यह  बताया कि शमशेर  एक आलोचक कवि के  रूप में    अत्यंत  अध्ययनशील  और विचारशील  हैं। इसलिए उनके  आलोचना-गद्य  को पढ़ते  हुए  गालिब,  निराला,  त्रिलोचन,  मुक्तिबोध और  पाब्लो नेरुदा   को  ढूँढ़ा  जा  सकता है।    उन्होंने   यह  भी    कहा कि  संघर्ष और   चुनौतियों से भरे जीवन को कलात्मक प्रयोगशाला   मानने   के   कारण अन्य कवियों   की तुलना  में     शमशेर  की आलोचना  रचनात्मक,  कलात्मक  और सृजनशील है।

अलीगढ़ विश्वविद्यालय   से आए डॉ.  राजीव  लोचन  नाथ  शुक्ल  ने  ‘शमशेर  की भाषादृष्टि’  पर अपने शोधपत्र  में    कहा कि ‘‘शमशेर भाषा  के  व्यावहारिक  रूप को  अभिव्यक्ति  का माध्यम  बनाते  हैं।  वे   अभिव्यक्ति  में  निकटता,   आत्मीयता,  गंभीरता   और   विस्तार   लाने   के   लिए   सर्वनामों,   संज्ञाओं,   अव्ययों    तथा   अनुवर्तन का रचनात्मक   प्रयोग करते हैं।’’ डॉ. राजीव लोचन ने  आगे   कहा कि शमशेर ‘संवेदना  की भाषा और भाषा की संवेदना’ के  रचनाकार हैं।

इस सत्र के  अंत  में    डॉ.  गोरख  नाथ  तिवारी  ने   आगंतुकों  के  प्रति  कृतज्ञता प्रकट की।

समापन  सत्र में     मौलाना   आजाद राष्ट्रीय   उर्दू     विश्वविद्यालय  के   हिंदी  विभाग  के  अध्यक्ष प्रो.  टी.वी. कट्टीमनी    ने  समाकलन   भाषण  दिया  और   इस आयोजन को  शमशेर के  बहाने  हिंदी-उर्दू   सामंजस्य की नई पहल  बताया।  श्रीवेंकटेश्वर  विश्वविद्यालय,  तिरुपति  के  डॉ. आई.एन.  चंद्रशेखर  रेड्डी   तथा  दक्षिण   भारत   हिंदी प्रचार   सभा  की डॉ.  साहिरा बानू  ने  अपनी टिप्पणियों  में   कार्यक्रम की भूरि   भूरि   प्रशंसा की और  कहा कि शमशेर को  समझने में    इस संगोष्ठी  से बड़ी   सहायता मिली।

कार्यक्रम  के परिकल्पक  प्रो.  दिलीप  सिंह ने  संतोष   जताया कि पूरा   आयोजन योजना   के  अनुरूप  चला और  शमशेर   के  व्यक्तित्व   और  कृतित्व  से संबंधित  कई   गुत्थियाँ खुलीं।  उन्होंने  हर्ष  व्यक्त  किया  कि  सभी   शोध  पत्रों  में वादनिरपेक्ष और  पाठकेंद्रित  आलोचनादृष्टि   देखने  को मिली।

समापन  समारोह   के  मुख्य अतिथि   के  आसन  से संबोधित   करते  हुए  डॉ.  नामवर सिंह  ने बताया, ‘‘पिछले   दिनों दिल्ली  मैं  तथा  अन्य स्थानों   पर शमशेर   पर कई   गोष्ठियाँ हुईं  परंतु उनमें पुनरावृत्ति  ही  अधिक दिखाई दी  तथा  कविता पर ही  अधिक  ज़ोर  रहा।  इसके विपरीत  हैदराबाद  के  इस समारोह  की यह  उपलब्धि रही  कि यहाँ   नई  बातें हुईं;  अलग  अलग  दृष्टि  से बातें  हुईं,  सब विधाओं  की बातें  हुईं  और  एक खास  बात यह है  कि  शमशेर  की  नई  रचनाएँ  उद्धृत  की  गईं।  वक्ताओं  ने  हिंदी  और  उर्दू  दोनों  को  उद्धृत  किया।’’  डॉ.  नामवर सिंह  ने  इस  तुलना  को  आगे  बढ़ाते  हुए  कहा  कि  लोग  आधा  चाँद  लिए  नाच  रहे थे,   यहाँ  पूरा चाँद  देखने को मिला   -  शमशेर  की शमशेरियत का पूरा  चाँद।   उन्होंने   कहा  कि इस समारोह की सारी सामग्री   को पुस्तक रूप में जरूर छापा  जाना चाहिए।  अंत  मे नामवर जी  ने   अपने गुरुवर  डॉ.  हजारी  प्रसाद  द्विवेदी  का स्मरण करते हुए  ऋषि विश्वनिंदक  का  पौराणिक  संदर्भ  सुनाया और  कहा कि ‘इतना    अच्छा   होना भी  अच्छा    नहीं’ तो ऑडिटोरियम  तालियों   और  ठहाकों से गूँज  उठा।

समापन सत्र की अध्यक्षता करते हुए  डॉ.  गंगा  प्रसाद  विमल ने  भी   इस  बात  का  समर्थन  किया  कि  यह संगोष्ठी विषयकेंद्रित  रही   और शमशेर  की रचनात्मक प्रतिभा  के  जो  आयाम पहले नहीं   देखे  गए थे, उन्हें यहाँ भली प्रकार उद्घाटित किया गया। उन्होंने कहा कि ‘‘शमशेर  जैसी बड़ी सर्जनात्मक  प्रतिभाओं  के  अर्थ खोलना  नई  दुनिया    के दर्शन  सरीखा है।   इस आयोजन  से  यह  भी   स्पष्ट  हुआ  है  कि  ''शमशेर   का  काव्य  ही  नहीं,  गद्य भी   कम विस्मय में  डालने  वाला  नहीं है   क्योंकि   वे  भाषिक   संरचनाओं का खेल  खेलनेवाले पहले दर्जे  के  खिलाड़ी हैं।’’

समापन  समारोह का संयोजन  शमशेर की उक्तियों के  माध्यम  से प्रो.  ऋषभदेव शर्मा  ने  इतनी रोचक शैली में   किया कि स्वयं प्रो. नामवर  सिंह ने  उनकी संयोजन  शैली  की मंच से मुक्तकंठ  से प्रशंसा   की।

इस द्विदिवसीय  समारोह में    राष्ट्रीय  संगोष्ठी  के  अतिरिक्त तीन अन्य विशिष्ट कार्यक्रम   भी    संपन्न   हुए। एक तो   यह  कि, डॉ.     नामवर सिंह    ने  डॉ.     टी.वी. कट्टीमनी   द्वारा   संपादित समीक्षाकृति  ‘दक्खिनी  भाषा  और साहित्य’  तथा  हैदराबाद   के   प्रतिष्ठित  क्रांतिकारी  कवि शशि नारायण  ‘स्वाधीन’   की काव्यकृति  ‘भूख,    धान  और चिड़िया’  का लोकार्पण किया।   दूसरा  यह  कि, पहले दिन की साँझ एकपात्री नाटक  ‘मैं    राही  मासूम’  का मंचन किया गया जिसके अभिनेता  विनय  वर्मा का अभिनंदन  करते हुए  डॉ. नामवर  सिंह  इतने  गद्गद  हो   गए कि उनका गला  भर  आया  और आँखें  नम हो  आईं  जब उन्होंने  कहा कि मैं तो हैदराबाद   में   शमशेर  से मिलने आया था   पर मुझे  मालूम   न था   कि आप मुझे यहाँ   मेरे    भाई डॉ.  राही  मासूम  रज़ा  से मिलवा देंगे। और    तीसरा कि, संगोष्ठी के   समापन  सत्र के  उपरांत   ‘अलिफ’   के  तत्वावधान  में    प्रो.     खालिद  सईद  ने   ‘बहुभाषा  कवि  सम्मेलन’ आयोजित  किया  जिसमें  हिंदी,  उर्दू  और  तेलुगु  के  कवियों  ने  डॉ.  नामवर  सिंह,  डॉ.  गंगा  प्रसाद  विमल,  डॉ. अब्दुस्सत्तार  दलवी   और डॉ.  हीरालाल बाछोतिया  के सान्निध्य  में   काव्यपाठ किया।

बेशक  हिंदी  और   उर्दू    की दो   अग्रणी  संस्थाओं  के  संयुक्त   तत्वावधान  में आयोजित यह  समारोह  लंबे समय तक प्रतिभागियों  की यादों  में  गूँजता  रहेग!

(रिपोर्टर : संगोष्ठी स्थल से  डॉ. मृत्युंजय  सिंह, डॉ जी. नीरजा, डॉ.बलविंदर कौर एवं  डॉ.गोरख नाथ तिवारी)
[चित्र  : डॉ. जी. नीरजा, डॉ. बी. बालाजी एवं राधाकृष्ण मिरियाला]