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शुक्रवार, 16 अगस्त 2013

[VIDEO] WHO IS RISHABHA? ऋषभ का परिचय लक्ष्मी नारायण अग्रवाल के शब्दों में

11 अगस्त 2013 को तेलुगु विश्वविद्यालय, हैदराबाद के सभागार में संपन्न समारोह में 'कमला गोइन्का फाउंडेशन' द्वारा मुझे 'भाभीश्री रमा देवी हिंदी साहित्य सम्मान' दिए जाने और मेरी पंचम काव्य-कृति 'प्रेम बना रहे' के प्रथम तेलुगु अनुवाद 'प्रेमा इला सागिपोनि' [अनुवादक : जी. परमेश्वर] के विमोचन के अवसर पर मित्रवर लक्ष्मी नारायण अग्रवाल ने अपने विरले लेकिन सहज  अंदाज़ में मेरा परिचय दिया. उस परिचय-वक्तव्य का बिटिया लिपि ने वीडियो बना लिया था जिसे आज डॉ. जी. नीरजा ने यू-ट्यूब पर भी सहेज दिया. तीनों के प्रति कृतज्ञता प्रकट करते हुए उस वीडियो को यहाँ आप सबके साथ बाँट रहा हूँ.

रविवार, 14 जुलाई 2013

अनिर्वचनीय है परमप्रेम

[भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नारदीय भक्तिसूत्र का 'तदीय सर्वस्व' नाम से 1874 में अनुवाद और भाष्य किया था. उसी के कतिपय अंश........]

ॐ अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः
[अब हम यहाँ से भक्ति की व्याख्या करते हैं].
सा कस्मै परम प्रेम रूपा/ अमृत स्वरूपा च 
[वह ईश्वर से परम प्रेम रूपा है/ और अमृत स्वरूप है].
यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति  अमृतो भवति  तृप्तो भवति
[जिसको पाकर मनुष्य सिद्ध होता है, अमृत होता है और तृप्त होता है].

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ॐ अनिर्वचनीयम् प्रेमस्वरूपं
[प्रेम का स्वरूप कहा नहीं जा सकता].
मूकास्वादनवत्
[गूंगे के स्वाद की भाँति].
प्रकाशते क्कापि पात्रे
[(तथापि) कभी किसी पात्र (अधिकारी) में स्वयं प्रकाश पाता है].
गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षण वर्द्धमानम् अविच्छिन्नम् सूक्ष्मतरम् अनुभवरूपं
[(प्रेम का स्वरूप) गुणों से रहित, कामनाओं से रहित, प्रतिक्षण में वृद्धिगत, अविच्छिन्न, सूक्ष्मतर केवल अनुभवरूप है].
तम्प्राप्य तदेवावलोकयति तदेव शृणोति तदेव भाषयति तदेव चिन्तयति
[उसको पाकर उसी को देखता है, उसी को सुनता है, उसी को बोलता है और उसी का चिंतन करता है].

शनिवार, 23 जून 2012

प्रेम बना रहे : ऋषभ देव शर्मा की 68 प्रेम कविताएँ


अरसे से मन में था कि एक किताब अपनी सहधर्मिणी डॉ. पूर्णिमा शर्मा जी को समर्पित करूँ , पर यह संकोच भी था कि पता नहीं उन्हें कैसा लगे - प्रेम को प्रदर्शित करने में सदा कंजूसी बरतने की अपनी फिलासफी के अनुरूप इसे भी प्रदर्शन और बडबोलापन न मान लें. फिर भी साहस करके गत चार मई 2012 को विवाह की 28वीं वर्षगाँठ पर  बेटे-बेटी से गुपचुप परामर्श करके ''प्रेम बना रहे'' की टंकित पांडुलिपि श्रीमतीजी के सामने धर दी. और सौभाग्यवश उन्होंने न तो रोष जताया और न ही उपहास किया ('प्रेम बना रहे' मेरा तकियाकलाम है न कुछ वर्षों से!). अर्थात प्रकाशन की स्वीकृति मिल गई. और अब वह कविता-संग्रह छप कर आ गया है, प्रकाशित हो गया है.

''प्रेम बना रहे'' में मेरी 68 प्रेम कविताएँ हैं; या कहें कि प्रेम पर केंद्रित कविताएँ हैं. ये कविताएँ अलग अलग समय पर लिखी गई हैं - अलग अलग काव्यरूपों में. यों तो इनमें से कुछ कविताएँ अंतरंग गोष्ठियों में और मित्रों के बीच पसंद की गई हैं, कुछेक यत्र तत्र छपी भी हैं - परंतु अधिकतर ऐसी हैं जो डायरी के पन्नों से पहली बार बाहर आई हैं. अवलोकनार्थ विवरण के अलावा ऑनलाइन संस्करण का लिंक यहाँ सहेज रहा हूँ.

पुस्तक का शीर्षक -   प्रेम बना रहे 
विधा - काव्य [प्रेम कविताएँ]

प्रकाशक -
 अकादमिक प्रतिभा, सरस्वती निवास,
 यू-9, सुभाष पार्क, नज़दीक सोलंकी रोड, उत्तम नगर, 
नई दिल्ली - 100 059.  फोन : +91 9811892244.

प्राप्ति स्थान -
 डॉ. ऋषभ देव शर्मा, 208 - ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, 
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500 013 . 
फोन :  +91 8121435033.

प्रथम संस्करण : 2012.
पृष्ठ संख्या -120 .
मूल्य - :INR  250/=

आई एस बी एन : 978-93-80042-59-6.