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सोमवार, 7 जुलाई 2014

बरषा काल मेघ नभ छाए





जुलाई का महीना काफी चढ़ गया है. सब ओर से मानसून की खबरें मिल रही हैं. कहीं बौछारें हैं तो कहीं मूसलाधार पानी गिर रहा है. पर हैदराबाद सूखा है. मानो बादल तेलंगाना से कन्नी काट गए हैं. दूर दूर तक फैले पत्थर के जंगल में दिन दिन भर आग बरसती है. पानी की कमी है, यों बिजली नहीं आती. आकाश वाली बिजली भी गायब है. बादल नहीं तो बिजली कहाँ से आए.

बादल और बिजली की जब भी बात चलती है ‘रामचरित मानस’ के किष्किंधा कांड का वह प्रसंग बरबस याद हो आता है जब प्रवर्षण पर्वत पर चौमासा बिताते राम आकाश में बादलों की घमंड भरी गर्जना सुनकर इसलिए डर से सिहर सिहर जाते थे कि जाने सीता कहाँ होंगी, कैसी होंगी, इस भीषण वर्षा में उन्हें कहीं कोई छप्पर  भी नसीब होगा कि नहीं, कहीं ऐसा न हो कि इस बार की यह निष्ठुर बरसात हमें सदा के लिए अलग कर दे. इस प्रसंग से पहली बार लगा कि राम भी डर सकते हैं. राम अपनी खातिर नहीं डरते. डरते हैं सीता की खातिर जिनकी रक्षा का दायित्व लिया था. 

तुलसी बाबा बड़े चतुर संप्रेषक हैं – बड़े गुनी गुरु. मौका निकालकर धीरे से उपदेश की घुट्टी पिला देते हैं और कवित्व की क्षति भी नहीं होने देते. वर्षा वर्णन के बहाने भी उन्होंने जीवन और जगत की अनेक मार्मिक सीखें हमें दी हैं. तुलसी सीधे सीधे शिक्षा पर उतर आते तो शायद हम अचकचाने लगते. पर उन्होंने राम का सहारा ले लिया. वर्षा काल के मेघ नभ में छा गए हैं. धारासार जल बरस रहा है. रास्ते जलमग्न हो गए हैं. जो जहाँ हैं मानो वहीं कैद हैं. राम और लक्ष्मण भी इसी कारण ठहर गए हैं. राम लक्ष्मण को अनेक कथाएँ सुनाते हैं – भक्ति, वैराग्य, राजनीति और विवेक की कथाएँ. चौमासे का हमारी परंपरा में ऐसा ही विधान रहा है. 

राम वार्तालाप शुरू तो अपने मनोभाव के उद्घाटन के साथ करते हैं – प्रियाहीन डरपत मन मोरा. लेकिन क्रमशः एक एक सोपान वे एक एक सूक्ति वर्षा के बहाने गढ़ने लगते हैं. इन सूक्तियों में जीवन के खट्टे मीठे जाने कितने अनुभव तुलसी ने गूँथ दिए हैं. लक्ष्मण ने कहा होगा राम के मन को अन्यत्र ले जाने के लिए – भैया! वह देखो बिजली चमकी, और गुम भी हो गई. राम अपने में डूबे कहीं भीतर से बोले होंगे - हाँ लक्ष्मण, दुष्टों का प्रेम स्थायी नहीं होता – खल कै प्रीति जथा थिर नाहीं. कुछ देर बाद लक्ष्मण ने फिर प्रयास किया होगा – देखिए न! उस ओर बादल धरती के कितने नजदीक आकर बरस रहे हैं. भले लोग विद्या पाकर और भी झुक जाते हैं – राम ने कहा होगा. तभी मोटी मोटी बूँदों की बौछार हुई होगी – टपाटप टपाटप. लक्ष्मण फिर मचले होंगे - कहाँ खोए हो भैया? उधर पर्वतों पर जैसे वर्षा ने आक्रमण ही कर दिया; झमाझम तीर से बरस रहे हैं पर्वतों पर आसमान से. राम ने गहरी सांस ली होगी - दुष्टों के वचन सज्जन इसी तरह सह जाते हैं जैसे ये पर्वत बूँदों के प्रहार झेल रहे हैं. गुफा से बाहर आ गए होंगे दोनों भाई. अनुज ने अग्रज को वह पहाड़ी नदी दिखाई होगी जो कल तक बिलकुल सूखी थी और अब किनारों को तोड़कर उमड़ी पड़ रही है – अब इस क्षुद्र नदी के उफान को देखकर आप यही कहेंगे न कि दुष्टों को थोड़ा सा भी कुछ मिल जाता है तो इतराकर चलने लगते हैं. राम अनुज की इस चतुराई पर ईषत् मुस्काए होंगे. तभी लक्ष्मण ने ध्यान दिलाया होगा कि इधर मिट्टी से मिलकर पानी कितना गँदला हो गया है. और राम को कहते देर न लगी होगी – माया से लिपटकर जीव का यही हाल होता है. साथ ही यह भी बता दिया होगा कि सारा जल सिमट सिमटकर तालाबों को भर रहा है. जैसे सद्गुण सिमट सिमटकर सज्जन व्यक्ति के पास आ जाते हैं; और उफनाती हुई ये नदियाँ समुद्र की ओर दौड़ रही हैं जैसे जागृत जीव अपने इष्ट की ओर दौड़ता है, वहीं उसे चिर शांति मिलती है. लक्ष्मण ने सोचा होगा कि राम अधिक गंभीर होते जा रहे हैं, तो फिर से उनका ध्यान पलटाने के लिए कह बैठे होंगे – बरसात में घास भी तो इतनी बड़ी हो गई है कि रास्ता ही नहीं सूझता. और तुलसी के राम ने झट से जड दिया होगा – पाखंड बढ़ने से सद्ग्रंथ छिप ही जाते हैं – जिमि पाखंड बाद तें गुप्त होहिं सद्ग्रंथ. हम यहाँ कहना चाहते हैं कि पाखंड और भ्रष्टाचार की घास जब बहुत ऊँची हो जाती है तो न्याय और संविधान लुप्त हो ही जाते हैं. 

वर्षा के इस वर्णन को आगे बढ़ाते हुए तुलसी ने मेंढ़कों की टर्र टर्र की तुलना वेद पढ़ते बटु समुदाय से की है. हमें लगता है, इसमें व्यंग्य है. परंपरा की रटंत शिक्षा मेंढ़कों की टर्राहट भर है – भले ही वह वेद क्यों न हो! इस ओर भी ध्यान दिलाया है उन्होंने कि वर्षा में वृक्ष नए पल्लवों से लद गए हैं, जैसे सच्चे साधकों को विवेक मिल गया हो. लेकिन वे यह भी बताते हैं कि अर्क और जवास भरी बरसात में पत्रहीन नग्न गाछ हैं. इसके लिए बहुत सुंदर उत्प्रेक्षा लाए हैं तुलसी. आक और जवास बिना पत्ते के हो गए हैं जैसे सुराज में दुष्ट जन बेरोजगार हो जाते हैं – जस सुराज खल उद्यम गयेऊ. धूल तो इस तरह गायब हो गई है जैसे क्रोध आने पर धर्म गायब हो जाता है. उपकारी की संपत्ति के समान शस्य श्यामला भूमि सुशोभित हो रही है. और हाँ, घने अंधेरे में रात भर जुगनू चमकते हुए भला कैसे लगते हैं? जैसे दंभियों का समाज आ जुड़ा हो और अपनी अपनी झूठी प्रशंसा कर रहा हो. 

आगे एक बड़ी पते की बात तुलसी बाबा कह गए हैं जो कम से कम हमारे तो दिल में चुभती है. भारी वर्षा के कारण खेतों की मेडें अर्थहीन हो गई हैं, निस्सीम पानी क्यारियों की सीमाएँ तोड़कर भरता चला जा रहा है – सब ओर पानी ही पानी है. और इसे देखकर तुलसी के राम को स्वतंत्र होने पर स्त्रियों का बिगड़ जाना याद आता है. 

बाबा तुलसी! आप तो ऐसे न थे! आप तो राम से पहले सीता को पूजते आए हैं. आपने तो अग्निपरीक्षा को भी पूर्व नियोजित नाटक की तरह प्रस्तुत किया है. और तो और, सीता परित्याग का जिक्र तक नहीं किया ‘मानस’ में. उधर बालकांड में ही उमा की विदाई के समय व्यथित माँ के मुँह से नारी जीवन के इस यथार्थ को कहलवा आए – ब्रह्मा ने सृष्टि में स्त्रियों को बनाया ही क्यों जबकि वे सर्वत्र पराधीन हैं और सपने में भी सुख नहीं पातीं? तब हे बाबा! आज इतने निष्ठुर कैसे हो गए स्त्री के प्रति कि उसकी स्वतंत्रता आपको भ्रष्टता दिखने लगी! ‘ताडन के अधिकारी’ वाली बात आपने खल रावण के पड़ोसी समुद्र के मुँह से कहलवाई थी इसलिए हम उसका बचाव करते रहे. पर यहाँ आपने राम के मुँह से कहलवा दिया. लगता है, रत्नावली के कॉप्लेक्स से आप कभी मुक्त नहीं हो पाए. वैसे अगर यहाँ स्वतंत्र होने का अर्थ स्वच्छंद होना है, मर्यादाहीन होना है, अनुशासन का अतिक्रमण करना है तो ऐसा करने से तो कोई भी बिगड़ता है – नर हो या नारी. इसलिए यह लैंगिक भेदभाव आपको शोभा नहीं देता. वैसे हमारा कवि मन तो यही कह रहा है कि रचना की तरंग में ‘कियारी’ का तुक ‘नारी’ से मिला दिया होगा. पर ऐसे बेतुके तुक अनर्थ भी कर सकते हैं – और वह भी तब जब वे तुलसी जैसे कविर्मनीषीपरिभूःस्वयंभू के मुँह से निकले हों. क्षमा करना बाबा! आपके राम ऐसा वाक्य नहीं कह सकते! 

तुलसी के राम न्याय का सदा ध्यान रखते हैं. इसीलिए जब वे देखते हैं कि दूर दूर तक चक्रवाक का नामोनिशान नहीं है तो लक्ष्मण से कहते हैं – अन्याय का युग आने पर न्याय इसी तरह भाग जाता है. लेकिन फिर जब वे देखते हैं कि नाना प्रकार के जंतु समूह से पृथ्वी सुशोभित हो उठी है तो उन्हें याद आता है कि सुराज्य मिलने पर जनता इसी प्रकार समृद्ध होती है – प्रजा बाढ़ जिमि पाइ सुराजा. 

तो हे आदरणीय पाठकगण! हम इस बरसात में यही कामना करते हैं कि देश में सुराज्य स्थापित हो और जनता की समृद्धि और संपन्नता में निरंतर इज़ाफ़ा हो. 

- ऋषभ देव शर्मा

बुधवार, 4 जून 2014

परमप्रेम रूपा है भक्ति

भक्ति प्रेम की उच्चतम स्थिति का नाम है. वह परमप्रेम रूपा है. यों भी कहा जाता है कि प्रेम के साथ जब श्रद्धा का योग हो जाता है तो प्रेमी भक्ति की ओर अग्रसर होने लगता है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसकी व्याख्या करते हुए ठीक ही कहा है कि “जब पूज्य भाव की वृद्धि के साथ श्रद्धाभाजन से सामीप्यलाभ की प्रवृत्ति हो, उसकी सत्ता के कई रूपों के साक्षात्कार की वासना हो, तब ह्रदय में भक्ति का प्रादुर्भाव समझना चाहिए. जब श्रद्धेय के दर्शन, श्रवण, कीर्तन, ध्यान आदि से ही आनंद का अनुभव न हो, जब उससे संबंध रखने वाले श्रद्धा के विषयों के अतिरिक्त बातों की ओर भी मन आकर्षित होने लगे, तब भक्ति रस का संचार समझना चाहिए. जब श्रद्धेय का उठाना, चलना, फिरना, हँसना, बोलना, क्रोध करना आदि भी हमें अच्छा लगने लगे तब हम समझ लें कि हम उसके भक्त हो गए.”

श्रद्धा और प्रेम का यह दुर्लभ संयोग जिसके अनुभव में आ गया वह ही सच्चा भक्त है. कबीर हों या मीरा, आंडाल हों या रामदासु – उनका जीवन भक्ति के इसी परम प्रेममय स्वरूप का दर्शन कराता है. कबीर के वचन इस परमप्रेम को तरह तरह से समझाने की कोशिश करते प्रतीत होते हैं. कबीर के लिए प्रेम ऐसी ज्योति है जिसके प्रकाशित होने से अनंत योग का जागरण हो जाता है. यह प्रकाश संशय को जड़ से मिटा देता है क्योंकि प्रेम और संशय एक साथ रह नहीं सकते. संशय मिटा तो समझो कि प्रिय आन मिला. यह प्रिय कबीर के लिए दुलहिन आत्मा का कंत राजाराम भरतार है. उसके आने की सूचना मिलते ही भक्त का मन नाचने लगता है, मंगलाचरण गूँजने लगते हैं.

कैसे पाता है कोई कबीर अपने इस भरतार को? प्रेम से. क्या है प्रेम? कबीर बताते हैं कि प्रिय के हिय में प्रवेश के लिए बस एक शर्त है. प्रेमी को केवल इतना करना होगा कि अपने सिर को उतार कर धरती पर रख दे. बहुत नीचा है इस घर का दरवाज़ा, सिर उठा कर आप इसमें घुस नहीं सकते. सिर ज़मीन पर रखा, अहं रहित हुए तो यह दरवाज़ा खुद ब खुद खुल जाता है. विचित्र दरवाज़ा है. सांकल भीतर की तरफ लगी है और खुलता बाहर से है. बाहर से खोलने के लिए ज्ञान काम नहीं आता, पांडित्य का वश नहीं चलता. समर्पण काम आता है, प्रेम के ढाई आखर का एकमात्र मंत्र चलता है.

पंडित-ज्ञानी भला क्या प्रेम करेंगे? वे तो ज्ञान के रास्ते चलते हैं और अज्ञात तत्व को खोजते हैं. कबीर जैसे भक्त प्रेम के रास्ते चलते हैं और खुद को खोकर प्रिय को पाते हैं. भक्ति का मोती डूबने से मिलता है, गहरे पैठने से मिलता है, किनारे बैठे रहने से नहीं. गहरे पैठोगे, तो ही साक्षात्कार संभव होगा. इस साक्षात्कार का रहस्य भी कबीर संकेत से समझा गए हैं. बस इतना करना है कि अपने अंतर्चक्षुओं को प्रिय मिलन का कक्ष बना लेना है. पुतलियाँ सेज बन जाएँगी. पलकें आप से आप पर्दे गिरा देंगी. इस एकाग्र मनोदशा में ही उस प्रिय को रिझाना है –
पिंजर प्रेम प्रकासिया, जाग्या जोग अनंत
संसा खूटा सुख भया, मिल्या पियारा कंत
 
यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं
शीश उतारे भुईं धरे, सो पैठे इहि माहि
 
पोथी पढि-पढि जग मुआ, पंडित भया न कोय
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय
 
जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ
मैं बपुरी बूड़न डरी, रही किनारे बैठ
 
नयनन की कर कोठरी, पुतली पलंग बिछाय
पलकों की चिक डारिके, पिय को लियो रिझाय

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सोमवार, 13 मई 2013

अहेतुक परमप्रेम के अमर गायक सूरदास

उन्होंने कृष्ण को पंडितों की कैद से मुक्त किया


वैशाख शुक्ल पंचमी को महाकवि सूरदास की जयंती मनाई जाती है. सूरदास के जन्मस्थान, नाम, जाति, संप्रदाय और जन्मांधता को लेकर अनेक मत हो सकते हैं, किम्वदंतियां हो सकती हैं लेकिन इस सत्य पर कोई मतभेद नहीं कि वे कृष्ण भक्ति काव्य परंपरा ही नहीं बल्कि समूचे हिंदी काव्य के सर्वश्रेष्ठ कवियों में सम्मिलित हैं. वे कृष्ण-प्रेम के अमर गायक हैं. सूर के यहाँ भक्ति और प्रेम परस्पर पर्याय हैं. जाति-पांति, कुल-शील आदि यहाँ नगण्य हैं, सर्वथा तुच्छ – ‘जाति गोत कुल नाम गनत नहिं, रंक होय कई रानो!’ कृष्ण स्वयं प्रेम हैं. उन्हें केवल प्रेम से ही पाया जा सकता है –
प्रेम प्रेम सो होय, प्रेम सों पारहि जैये.
प्रेम बंध्यो संसार, प्रेम परमारथ पैये.
एकै निश्चय प्रेम को, जीवन्मुक्ति रसाल.
सांचो निश्चय प्रेम को, जिहिं तैं मिलैं गुपाल. 

कहना न होगा कि सूर हिंदी के भागवतकार हैं जिन्होंने कृष्ण को पंडितों की कैद से निकालकर जनसाधारण के आँगन में खेलने के लिए उन्मुक्त किया. उन्होंने ‘सूरसागर’ के दसवें स्कंध में अपने काव्य नायक कृष्ण की बचपन और किशोरावस्था की लीलाएँ गाई हैं. परिवार, प्रेम और गाँव की निरंतर उपस्थिति ने इन लीलाओं को भारतीय लोकमानस का कंठहार बना दिया है. परिवार और प्रेम दोनों ही के केंद्र में हैं कृष्ण. कृष्ण अवतारी पुरुष और राजपुत्र नहीं हैं यहाँ. वे तो पूरे नंदगाँव के बेटे हैं. उनका जन्म गाँव भर को उछाह से भर देता है. सूरदास स्वयं इस उछाह में भागीदार बने हैं और तब तक नंदबाबा की ड्योढ़ी पर अड़े रहने की ज़िद बाँधे हुए हैं जब तक बालक कृष्ण हँसकर उनसे कुछ बोल नहीं लेते. विचित्र है यह अंधा बाबा भी. अरे बाबा अब जाओ भी. पर नहीं, अड़े हैं कि जब गोवर्धन से दौड़कर आए हैं तो भला ऐसे ही थोड़े चले जाएँगे. बड़े गँवार हो बाबा. कोई ऐसे भी हठ करता है? बधावे और आशीष दिए जा रहे हैं – 
(नंद जू) मेरे मन आनंद भयौ, मैं गोवर्धन तैं आयौ.
तुम्हारे पुत्र भयौ, हौं सुनि कै, अति आतुर उठि धायौ.
नंदराइ सुनि बिनती मेरी तबहि बिदा भल है हौं.
जब हँसि कै मोहन कछु बोलैं, तिहि सुनि कै घर जाऊँ.
हौं तो तेरे घर कौ ढाढ़ी ‘सूरदास’ मोंहि नाऊँ. 

कृष्ण की समस्त बाललीला में सूरदास ने पूरे ब्रजमंडल को शामिल किया है जो उनके मन में बसे सामूहिकता के गँवई संस्कार का प्रतीक है. कृष्ण का सोना, जागना, रेंगना, रीझना, खेलना – सब कुछ सार्वजनिक हैं. वे सबके हैं. सबका उन पर एक-सा प्यार है. एक-सा अधिकार. ‘कृष्ण जितने यशोदा को प्रिय हैं, ब्रजवासियों को उससे कम प्रिय नहीं हैं. उलूखल बंधन के समय सारे ब्रजवासी यशोदा को क्या नहीं सुनाते – विशेषतः गोपियाँ. यशोदा का हृदय पत्थर है. उसमें दया-ममता नहीं है, वह निर्मोही है. उम्र में बड़ी और सयानी होने पर भी उसे यही बुद्धि मिली है. कितनी मनौतियाँ मानने पर एक बेटा हुआ है. उसे कितनी विपत्तियाँ झेलनी पड़ी हैं. उसी को मारकर पितरों को पानी दे रही है. ऐसे निर्दयी के पास कौन बैठे? अत्यंत खिन्न ब्रजबालाएँ अपने-अपने घर चली जाती हैं. बलराम भी दुखी हो उठते हैं. तात्पर्य यह है कि इस सुख-दुःख में पूरा समुदाय सम्मिलित है.’ (डॉ.बच्चन सिंह, हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, पृ.133). 

सबको भली प्रकार मालूम है कि कृष्ण बेहद उधमी, उपद्रवी और आतंककारी बालक हैं. पर नहीं, आप माँ हैं तो क्या हुआ? उन्हें इस तरह बाँधकर नहीं रख सकतीं. लगता है, सारा गाँव बच्चों के मानवाधिकारों का अलमबरदार बन गया हो. यशोदा की हिम्मत नहीं है कि कह दें तो ज़रा, हमारा घरेलू मामला है जी ये. ना, यह तो सबका मामला है, पूरे ब्रज का मामला है. तभी तो ये ही गोपियाँ शिकायत के बहाने जब-तब कृष्ण को देखने आती रहती हैं. इस सारे व्यवहार में लोकजीवन का वह रस झलकता और छलकता है जिसकी मधुरता का पान कराकर सूरदास ने मध्यकाल में दबी-कुचली भारतीय जाति को जीवनेच्छा का पाठ पढ़ाया. वास्तव में ‘यहाँ केवल वात्सल्य का चित्रण नहीं वरन उसे केंद्र में रखकर समूचा घर-परिवार-कुटुंब चित्रित होता है. कृष्ण की ब्यौरेवार दिनचर्या, संस्कारों और उत्सवों के क्रमिक चित्रण में एक पूरा परिवार और ग्रामीण समाज उभर कर सामने आता है. आगे चलकर युवा कृष्ण का जीवन भी एकदम निरपेक्ष या एकांतिक नहीं है, पूरा गाँव किसी-न-किसी रूप में उसमें भागीदार है. बसंतोत्सव और रास के विविध सामूहिक आयोजन इसके व्यावहारिक प्रमाण हैं.’ (डॉ.रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, पृ.54). 

गँवई संस्कार का प्यार भी किसी तरह की कुंठा और व्यक्तिगतता नहीं जानता. साहचर्य से उपजता है न. राधा और कृष्ण दोनों ही अपरूप रूपवान हैं. बड़ी-बड़ी आंखों वाली राधा. माथे पर रोली लगाने वाली राधा. गोरे तन पर नील वसन पहनने वाली राधा. पीठ पर वेणी लहराती राधा. बचपना है तो क्या – ‘सूर श्याम देखत ही रीझे नैन-नैन मिली पड़ी ठगौरी.’ बातों-बातों में रसिक शिरोमणि ने भोली बालिका को मोह लिया. संबंध पल-प्रतिपल बढ़ने लगा. एक अप्रतिम प्रेम जगा और गाँव की मिट्टी में परवान चढ़ा. अनन्य प्रेम. प्रगाढ़ प्रेम. प्रतिपल आत्मसमर्पण को विकल प्रेम. लड़कपन का यह प्यार तकरार में भी बढ़ता गया. गाय चराना हो या दुहना, प्यार भरी तकरार चलती रही और कभी दान के बहाने तो कभी मान के बहाने, कभी पनघट पर तो कभी मधुबन में गोपियाँ कृष्ण पर अपना सर्वस्व न्यौछावर करती रहीं. और तब आया वह क्षण. देह से प्राण को खींचकर ले जाने का क्षण ! कृष्ण तो पूरे ब्रजमंडल के थे – सबके अपने, सबके प्रिय, सबके वल्लभ, सबके प्राण. और वही मथुरा गए तो वहीं के हो गए. कहने को तो कहते रहे ‘ऊधो मोहि ब्रज बिसरत नाहीं.’ पर नदी पार करके मथुरा से गोकुल न आ सके. शहर से गाँव नहीं लौट सके. 

सूरदास जानते हैं, शहर आदमी को किस तरह चालाक बना देता है. इस काजल की कोठरी में जो गया, वही काला हो गया. गोपियों का प्रेम उज्ज्वल है, एकनिष्ठ है. गँवार जो ठहरीं! कृष्ण मथुरा में जाकर सचमुच काले हो गए हैं. उनमें वह पहले-सी पारदर्शिता नहीं रही. अब वे राजपुरुष हो गए हैं – ‘हरि हैं राजनीति पढ़ि आए.’ राजनीति मनुष्य को लंपट बना देती है. ‘भ्रमरगीत’ का भँवरा इस नगरीय लंपटता का भी प्रतीक है. इसी से कृष्ण और उनके संदेशवाहक उद्धव की कोई बात गोपियों की समझ में नहीं आती. डॉ.बच्चन सिंह ने इस ओर ध्यान खींचा है – ‘राजनीतिज्ञों की बात न तब समझ में आती थी और न अब आती है. सारी कथनी ऊलजलूल, सारी करनी छल-प्रपंच. वे कहती हैं कि राजधर्म तो वह है जहाँ प्रजा सताई न जाए. ‘राजगतिक लीला’ बेचारे अहीर क्या जानें. गोपियाँ जानती हैं कि मुरली धारण करना उन्हें अच्छा नहीं लगता, गोपियों का नाम लेने पर सहम जाते हैं, गायों का चित्र देखने से उनके बड़प्पन को धक्का लगता है. वे मर्माहत होकर व्यंग्य से कहती हैं – ‘वै राजा तुम ग्वारि बुलावत’. अरे वे राजा हैं, गँवारों के बीच क्यों आने लगे? कृष्ण की बाललीला, रासलीला आदि की ओर पंडितों का ध्यान गया है, पर ‘राजगतिक लीला’ की ओर नहीं गया है. सूर ने अन्य लीलाओं की तरह कृष्ण की ‘राजगतिक लीला’ भी लिखी है.’ 

कृष्ण तो आखिर कृष्ण ठहरे. कल तक ‘चोर-जार-शिखामणि’ थे. आज ‘अनासक्त-योगेश्वर’ बन गए. कल तक ‘राधा-वल्लभ’ थे. आज ‘रुक्मणि-रमण’ हो गए. जैसे ब्रज की गायों, कुंजों और यमुना का स्मरण करते थे, वैसे ही गोपियों और राधा का भी. पर राधा भी राधा ही थीं. कृष्ण वंशीधर से चक्रधर हो गए, लेकिन राधा की साड़ी नीली ही रही. कृष्ण की स्मृतियों की गंध से भरी साड़ी भला धोई कैसे जा सकती है. यह नीला वर्ण तो कृष्ण का वर्ण है. राधा से अलग कैसे हो सकता है. है न गँवई प्यार के पागलपन का चरम उत्कर्ष? अहेतुक परमप्रेम ही तो भक्ति है! सूर की राधा परमप्रेम रूपा हैं – स्वयं भक्ति हैं. 

‘सूरसागर’ के अंत में राधा-कृष्ण मिलते हैं - कुछ पल के लिए. यह मिलन भी कोई मिलन है? कृष्ण तो अपनी महारानी से राधा का परिचय कराने आए हैं. क्या गुजरी होगी राधा पर जब दूर से कृष्ण ने इशारा करके कहा होगा – ‘वह जो युवतियों के बीच में खड़ी है ना – अरे वही गोरे वाली – हाँ, जिसने नीली साड़ी पहनी है – वही तो है राधा.’ चरम कारुणिक है राधा के प्रेम का यह अंत जिसमें मिलकर भी मिलना संभव नहीं. ऊपर से कृष्ण का यह आश्वासन कि मैं तो निरंतर तुम्हारे ही साथ हूँ, अब लौट जाओ. एक परम विश्वासिनी स्त्री के समक्ष एक विश्वासघाती विवश पुरुष की खिसियानी हँसी – 
बिहँसि कह्यौ हम तुम नहिं अंतर,
यह कहि कै उन ब्रज पठई.
सूरदास प्रभु राधा-माधव,
ब्रज-बिहार नित नई-नई.

बुधवार, 4 जुलाई 2012

शाकम्भरी नीलवर्णा नीलोत्पल विलोचना



यों तो विभागीय कार्यवश समय-समय पर विजयवाडा जाना होता रहता है. पर इस बार एक पुस्तक लोकार्पण समारोह के सिलसिले में प्रो.एम. वेंकटेश्वर जी के साथ विजयवाडा यात्रा का अनुभव विशिष्ट रहा. पहली बात तो यह कि वे  हैदराबाद से विजयवाडा तक अपनी कार से ले गए. वापसी भी वैसे ही. सारथी वे थे और साथी डॉ. राधेश्याम शुक्ल. पूरे रास्ते दोनों के संस्मरणों की खूब जुगलबंदी चली. मैं खर्राटों की ताल देता रहा.....बीच बीच में कोई शेर ज़रूर चस्पां करता रहा उनकी अनुभवजनित सूक्तियों पर.....जताने को कि जाग रहा हूँ....कोई मुझे सोया हुआ न समझे.

दूसरी बात यह कि आतिथेय परिवार के अत्यंत धार्मिक और श्रद्धालु  होने के कारण हम लोगों को विजयवाडा और मछलीपत्तनम के एकाधिक महिमाशाली मंदिरों का दर्शन लाभ अयाचित ही हो गया. संभवतः कोई पुण्य उदय हुआ होगा. तभी तो संयोग देखिए कि जिन तिथियों में (! से 3 जुलाई 2012 तक) हम वहाँ थे उन्हीं तिथियों में ऐतिहासिक कनकदुर्गा मंदिर में वार्षिक शाकम्भरी उत्सव चल रहा था. हमारे लिए यह दृश्य विस्मयकारी था कि प्रतिमा से लेकर पूजासामग्री तक सर्वत्र शाक -भाजी का अद्भुत साम्राज्य था. इतनी हरी सब्जियां!. हम लोग ठहरे दंभी बौद्धिक कोटि के जीव. लगे बहसने कि यह टनों साग-भाजी हज़ारों गरीबों का पेट भरने के काम आ सकती थी - यों बरबाद की जा रही है - यह् तो आपराधिक विनाशलीला है. थोड़ी देर में सिर हल्का हुआ तो सौंदर्यबोध का कीड़ा कुलबुलाया. लगे सराहने कि क्या कला है कि भिन्डी और बैंगन से देवी और हाथी रच दिए गए हैं - करेले से ओम. थोडी और खोपड़ी ठंडी हुई तो लोक और उसका विश्वास सूझ आया - और यह भी कि जब शास्त्र और लोक टकराएं तो लोक  ही अनुकरणीय है. अभिप्राय यह कि ''यद्यपि शुद्धं लोक विरुद्धं ना करणीयं ना करणीयं'' का स्मरण करते हुए हम लोग भक्ति की कृष्णा (विजयवाडा कृष्णा नदी पर बसा हुआ है) में बह चले. छोड़ दिया अपने आप को उसी भावधारा में जो उस पूरे परिसर में हर ओर से उमड़ रही थी. सच में लगा जैसे शाकम्भरी देवी की कृपा बरस गई, हम भीगते रहे ; तब तक भी जब मल्लेश्वर स्वामी (शिव) का अभिषेक संपन्न हुआ. अर्चकों ने दर्शनोपरांत आशीर्वाद स्वरूप हम लोगों को जो अंगवस्त्र प्रदान किया था उसे डॉ वेंकटेश्वर जी और डॉ. शुक्ल जी तो कई घंटे बाद तक  भी धारण किए रहे - फब भी खूब रहे थे.

अब  हम लोग दुर्गा सप्तशती की चर्चा कर रहे थे. शुक्ल जी ने ग्यारहवें अध्याय में देवी का वरदान याद दिलाया-
''फिर जब पृथ्वी पर सौ वर्ष के लिए वर्षा रुक जाएगी और पानी का अभाव हो जाएगा.......उस समय मैं अपने शरीर से उत्पन्न शाकों द्वारा समस्त संसार का भरण पोषण करूँगी. जब तक वर्षा नहीं होगी तब तक वे शाक ही सबके प्राणों की रक्षा करेंगे. ऐसा करने के कारण पृथ्वी पर शाकम्भरी के नाम से मेरी ख्याति होगी [ शाकम्भरीति विख्यातिं तदा यास्याम्यहं भुवि]"..

मैंने भी अपना किताबी ज्ञान बघारा और मूर्तिरहस्य की ओर उनका ध्यान खींचा. ठीक ठीक श्लोक उस समय याद नहीं थे. अब पुस्तक में मेरे सामने हैं. माँ शाकम्भरी का दर्शन आप भी कीजिए-
"शाकम्भरी  नीलवर्णा नीलोत्पल विलोचना .
गम्भीर्नाभिस्त्रिवलीविभूषिततनूदरी.
सुकर्कश समोत्तुंग वृत्त पीन घनस्तनी.
मुष्टिं शिलीमुखापूर्णं कमलं कमलालया .
पुष्प पल्लव मूलादि फलाढ्यं शाक संचयं.
काम्यानंतर्सैर्युक्तं क्षुत्तृण्मृत्युभयापहम् .
कार्मुकं च स्फुरत्कान्ति बिभ्रती परमेश्वरी.
शाकम्भरी शताक्षी सा सैव दुर्गा प्रकीर्तिता".

द्रष्टव्य -सुरेन्द्र वर्मा के नाटकों में स्त्री विमर्श लोकार्पित 
            LOKARPAN OF 'SURENDRA VARMA KE NAATAKON MEN STREE VIMARSH'  

रविवार, 30 अक्टूबर 2011

नवलेखक शिविर के बहाने








































हिंदी की सार्वदेशिक स्वीकार्यता और सामासिक संस्कृति की दृष्टि से केंद्रीय हिंदी निदेशालय द्वारा चलाई गई योजनाओं में प्रतिवर्ष आठ ''हिंदीतरभाषी  हिंदी नवलेखक शिविर'' आयोजित करना भी शामिल है. नब्बे के दशक से कभी कभार अपुन को भी इनमें विशेषज्ञ के रूप में बुलाया जाता रहा है. अभी गत दिनों डॉ. भगवती प्रसाद निदारिया जी और डॉ.मोहम्मद नसीम जी  (नसीम बेचैन) के निमंत्रण पर ऐसे ही एक शिविर में आठ दिन के लिए अहमदनगर [महाराष्ट्र] जाने का अवसर मिला. खूब मस्ती रही. लगे हाथ शिर्डी और शनिशिंगनापुर की धार्मिक यात्रा भी हो गई. एक दिन यार लोग मुझे चकमा देकर अन्ना हजारे से भी उनके गाँव रालेगनसिद्धि जाकर मिल आए ( वैसे मेरी उतनी श्रद्धा भी नहीं थी कि शिर्डी की थकन के बावजूद वहां जाना चाहता ).

अहमदनगर खूबसूरत जगह है. लोग वहां के बहुत अच्छे हैं. बेहद खूबसूरत मन वाले - चाहे अध्यापक हों या छात्र. प्रो. ऋचा शर्मा अहमदनगर महाविद्यालय की हिंदी विभागाध्यक्ष हैं. अत्यंत सुरुचिसंपन्न विदुषी - पता चला कि उनका संबंध अपने सहारनपुर वाले कन्हैया लाल मिश्र प्रभाकर जी के परिवार से है. पतिदेव उनके राजीव शर्मा जी एयरफोर्स में रह चुके हैं और अब अपना व्यवसाय चलाते हैं.उन्होंने खूब नगर दर्शन कराया . एक रात तो ख़ास तौर से कढाई वाला दूध पिलाने ले गए. खैर नगर (मेरठ) के कई प्रसंग याद आ गए. इसी तरह दूसरी शाम किला [वह जेल जहाँ कभी पंडित जवाहर लाल नेहरु और मौलाना अबुल कलाम  आज़ाद सरीखे स्वतंत्रता सेनानी रखे गए थे और उन्होंने अपनी कालजयी कृतियाँ रची थीं] और सलावत खान का मकबरा दिखा लाए.

और हाँ,  एक बहुत प्यारा दोस्त मिल गया इस प्रवास में - आनंद मणि त्रिपाठी - वे वहां प्राध्यापक हैं; हर पल मुस्तैद; हर ज़िम्मेदारी के लिए तैयार. चांदनी चौक [जी हाँ, अहमदनगर में रास्तों और मुहल्लों के नाम दिल्ली वाले ही हैं] पर उतरने से लेकर तारकपुर अड्डे पर विदा लेने तक वे छाया की तरह साथ रहे. मज़े की बात यह कि अन्य विशेषज्ञों का भी यही अनुभव रहा कि वे उनके साथ भी छाया की तरह रहे. पता नहीं उनके पास कोई प्रेतसिद्धि है क्या!

दिल्ली से आईं डॉ. शाहीना तबस्सुम जी से पहली बार भेंट हुई. हिंदी और उर्दू दोनों की ही साहित्यिक परंपराओं की  उन्हें गहरी जानकारी है. सारा व्यवहार उनका एकदम अनौपचारिक - लेकिन अत्यंत भद्र और शालीन. बोलीं, भाभी के लिए कुछ नहीं ले जाएंगे अहमदनगर से? मैंने बता दिया कि मैं कभी कहीं से कुछ नहीं ले जाता. यह तो अच्छी बात नहीं, ज़रूर कुछ तो पत्नी और बच्चों के लिए आपको ले जाना चाहिए- बहुत अच्छा लगता है- यह मैं जानती हूँ; उन्होंने कहा तो मैंने और डॉ नसीम ने अपने अपने परिवार के लिए वस्त्र खरीद ही डाले! और तो और अपने अहंकार के खोल में क़ैद भीषण महाकवि उद्भ्रांत जी पर भी उनकी बातों  का इतना असर हुआ कि पहली बार उन्होंने भी पत्नी और बेटी के लिए साड़ियाँ खरीद डालीं और वह भी अकेले बाज़ार जाकर.

अब जब बात उद्भ्रांत जी की छिड़ ही गई है तो कहना ही होगा कि वे भी हमेशा याद रहेंगे लेकिन कडवी याद की तरह. अरे साहब, पहली ही शाम उन्होंने शराब पीकर यश पैलेस के रूफ गार्डन में वह हंगामा बरपा किया कि बिना अपराध के मुझे उनके अपवित्र पाँव छूकर माफी माँगनी पडी कि आयोजकों के कहने से मैं उस सुबह उनके कमरे [डबल बेड रूम] में उतनी देर भर को टिकने चला गया था जितनी देर में दूसरा कमरा मेरे लिए व्यवस्थित किया गया. उनकी इस बदतमीजी का यह भी अपमानजनक प्रभाव हुआ कि अगली शाम जब मैं, नसीम जी और आनंद त्रिपाठी रूफ गार्डन में भोजन करने गए तो हमें वहां बैठने नहीं दिया गया. शिविर की बैठकों में भी उद्भ्रांत जी प्रायः अपनी आत्मकथा और आत्मश्लाघा में ही व्यस्त रहे. मेरे ख़याल से वे ऐसे शिविर के लिए एक सौ परसेंट अनफिट मार्गदर्शक हैं.

नवलेखक कई प्रांतों से आए थे - आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, ओडिशा और असम आदि से. सभी पर्याप्त संभावनाओं से लबरेज़ दिखाई दिए.  खास बात यह कि सभी में अपनी ज़मीन की सुगंध को हिंदी में भरने की ललक दिखाई दी.इस सृजनेच्छा को मैं विनम्रतापूर्वक प्रणाम करता हूँ!


गुरुवार, 27 अक्टूबर 2011

दीप ज्योति नमोस्तुते



दीप ज्योति नमोस्तुते 

प्रकाश सृष्टि का प्रतीक है; और दीपक उसका हमारे सबसे निकट स्थित वाहक. चेतना और प्राणशक्ति का ही एक नाम है दीप. उसने उस एक नूर की किरण को, चिंगारी को, स्फुलिंग को, अपने में समेट कर रखा है, जिससे यह सारा जग उपजा है. दीपक बीजमंत्र है - ऊर्जा के सारे स्फोट को अपनी बाती में संभाले हुए. दीप जलता है तो चाहे जितना ही मद्धिम जले, पर जहां तक उसकी किरण जाती है, अँधेरा कट जाता है. दीप जलता है, जलता ही है, अँधेरे को काटकर लोक का कल्याण करने के निमित्त. अँधेरे में पनपता है अज्ञान - अँधेरे में पनपते हैं रोग - अँधेरे में पनपता है शोक - अँधेरे में पनपती है दरिद्रता - अँधेरे में पनपते हैं अपराध. दीपक एक एक कर काटता है अज्ञान को - रोग को - शोक को - दरिद्रता को - अपराध को. इसीलिए तो दीपक को, दीपक की ज्योति को, प्रणाम किया जाता है. 

दीपक के अभाव में ज़िंदगी अंधेरी सुरंग थी. मैं तो बस चला जा रहा था. एक हाथ में लोक की लाठी थी, दूसरे में शास्त्र की बेंत. पर दीखता कुछ न था! तभी, तुम आए, और आगे-आगे दीपस्तम्भ बने चलने लगे! धीरे धीरे तुम्हारी ज्योति मेरे भीतर समाती रही, और मेरे अंतस्तल का जाने कब से अंधियारा पड़ा लोक आलोक से भर उठा. भीतर का दीया जल गया था! कैसा अंधा था मैं, आज से पहले ध्यान ही नहीं दिया था. जिस प्रकाश को, जन्म जन्म जाने कहाँ कहाँ खोजता फिरा, वह तो मेरे भीतर था. बड़ी कृपा की तुमने. भरपूर तेल से भरा दीया दिया. कभी न ख़त्म होने वाली बाती दी. अखंड ज्योति जल उठी. यह अखंड ज्योति अब दिन रात तेरी आरती बन गई  है. आकाश के थाल में, सूर्य, चंद्र और अग्नि ही नहीं, असंख्य तारे भी तेरी आरती उतार रहे हैं. यह महोत्सव है तेरे प्रकाश के मुझपर उतरने का. चौदह-चौदह चन्दा खिल उठे हैं, चौंसठ चौंसठ दीवों की मालाएं झिलमिला उठी हैं. स्वयंप्रकाशमय तुम जबसे मेरे घर आए हो, सब ओर अखंड प्रकाश है. अब चाहे जितनी अमावस घिरे, चाहे जितना तमस बरसे, चाहे जितनी कालिख उड़े, मेरे अस्थिचूड का दीपक लगातार जलता रहेगा - मेरी पुकार सुनकर कोई न भी आए, तो भी. 

जब जब तुम आए हो, तब-तब मेरे रोम रोम ने मंगलगीत गाए हैं, दीपमालिका सजाई है. सभी ने महसूस किया होगा कभी न  कभी, चाहे जितनी दूर रहो, एक कोई छोटी सी ज्योति, हमें निरंतर अपनी ओर खींचती रहती है. ज्योति - जो सरयू के जल में सिराये दोने में, जाने कबसे जल रही है. हर सांझ माँ कौसल्या आती है आंचल में दीपक छिपाए हुए, और जाने कितनी शुभकामनाएँ मन ही मन उच्चारती हुई, उस दिए को सरयू में प्रवाहित कर देती है. उधर राजभवन के शिखर पर, नंगे पैरों सात सात मंजिलों की सीढियां चढ़कर, उर्मिला आकाशदीप जला आती है. जहां भी हों, हमारे प्रिय, उनका मार्ग प्रकाशमय रहे! यह सरयू का दीया, यह राजभवन के शिखर का आकाशदीप, उनके लौटने के मार्ग में प्रकाश के पांवड़े बन जाए. लंका की चकाचौंध एक तरफ और साकेत की दीपशिखाओं की रुपहली सी झलमल एक तरफ. दीपशिखा के इस मधुर प्रकाश में ममत्व है, वात्सल्य है, स्नेह है, और है प्रतीक्षा. इसलिए, स्वर्णमयी लंका भी राम को लुभा नहीं पाती. और वे पुष्पक विमान से सीधे साकेत आ पहुँचते हैं. 

राम के लिए विलंब करना संभव नहीं है. आज अगर देर कर दी, तो वह पगला भरत, चिता में जल मरेगा. वैसे भी, भरत चौदह साल से एक सुलगती हुई चिता ही तो है. प्रतिक्षण जलती इस चिता से जाने कितना धुंआ उठ-उठ कर ब्रह्मांड में व्याप गया है. राम की आँखें अकेले में जाने कितनी बार, इस धुएं से कडुआ कर, झर झर बरसती आई हैं. इसलिए अब राम के लिए, और विलंब करना संभव नहीं. 

राम अयोध्या पहुँच रहे हैं. आज दीवाली है. दीवाली - ज्ञान और समृद्धि का त्यौहार. दीवाली - साधना की सिद्धि का पर्व. मिलन को उपलब्ध होने का महोत्सव है दीवाली. यही तो प्रिय की अगवानी का शुभ मुहूर्त है. भरत माताओं को राम के आगमन की सूचना देते हैं, तो वे विह्वल हो उठती हैं. पगला कर दौड़ पड़ती हैं - जैसे बछड़े की आहट पाकर गाय दौड़ पड़ी हो. नगर भर में समाचार फैल जाता है, और शोक की चौदह वर्ष की अमावस्या एक पल में अतीत हो जाती है. दीप जलाकर, लोकाभिराम राम की अगवानी की जाती है, और नगर जगर-मगर हो उठता है. राम आ पहुंचे हैं अयोध्या में. भरत-मिलाप जैसा मार्मिक अवसर कहीं दूसरा नहीं मिलता. पर राम तो सबके हैं. वे भरत से मिलते हैं, और एक एक पुरवासी से भी मिलते हैं. राम ने जैसे उतने ही रूप धर लिए, जितने नागरिक हैं. सबसे ‘यथायोग्य’ मिले वे, क्षण भर में. दीपक प्रज्वलित हो तो एक साथ सबको यथायोग्य उसका प्रकाश मिल जाता है. वह कोई भी तिथि हो, कोई भी वार हो, अगर प्रिय मिलन की तिथि हो, अगर यथायोग्य कृपा की वर्षा का वार हो, तो वह वेला अंधकार के समूल कटने की वेला बन जाती है. राम का पृथ्वी को निशिचरहीन करके लौटना, ज्योति बीज बोने का काल है. जब जब वह पल अनंत काल के प्रवाह में कहीं भी घटित होता है तब तब सजती है दीपावली और मनाया जाता है आलोक का पर्व – 

कंचन कलस विचित्र संवारे। सबहि धरे सजि निज निज द्वारे।। 

बंदनिवार पताका केतू। सबन्हि बनाए मंगल हेतू।। 

बीथीं सकल सुगंध सिंचाईं। गजमनि रचि बहु चौक पुराईं।। 

नाना भांति सुमंगल साजे। हरषि नगर निसान बहु बाजे।। 

जहं तहं नारि निछावरि करहीं। देहिं असीस हरष उर भरहीं।। 

कंचन थार आरती नाना। जुवती सजें करहिं सुभ गाना।। 

करहिं आरती आरतिहर कें। रघुकुल कमल विपिन दिनकर कें।। 

नारि कुमुदिनी अवध सर, रघुपति बिरह दिनेस। 

अस्त भए बिगसत भईं, निरखि राम राकेस।। 


कहाँ है अंधेरा? कहाँ है अमावस?? जिस रात के चंद्रमा राम हैं, उसमें कैसा अंधेरा??? जब तक राम नहीं थे - तभी तक अंधेरा था - तभी तक अमावस थी. राम आ गए. उजियारा छा गया. उजियारा - भीतर और बाहर सर्वत्र उजियारा!!!

मेरे दीपक, तू निष्कंप जलता चल. इस तरह जल कि कोई कहीं अँधेरे रास्ते पर न भटके. किसी चिड़िया चुरंग का भी घर न खोये. किसी को भी भयभीति न हो, और किसी का भी सपना न टूटे. ओ मेरे दीपक जल. इस तरह जल कि तुझसे अनेक दीप जल उठें. अँधेरा सब ओर से घिर रहा है, निशाचरों ने पृथ्वी पर तांडव मचा रखा है. मुझे दीपक राग गाने दो. हर मनुष्य के हृदय  का दीपक जल उठे. आखिर इसी दीपक के सहारे तो प्रलय निशा के पार जाना है हमें. जलो, मेरे दीपक, जलो, अनथक जलो. अकेले जलो, और फिर पंक्ति में जलो. जलो क्योंकि तुम्हारे भीतर वही हठीली आग सुलगती है, जो सृष्टि के आरंभ से हर अँधेरे को चुनौती देती चली आई है. जलो मेरे दीपक जलो. हर ओर से अँधेरे की सेनाएं टूट पड़ रही हैं. इसीलिए जलो, दीपमाला बनकर जलो!!!

गुरुवार, 5 मई 2011

मौसम का मिजाज़ और अपने चंद्रमौलेश्वर जी

बुधवार की बात है. यानी चार मई की. एन सी ई आर टी (दिल्ली) से डॉ. नरेश कोहली का फोन था. बोले - आज 'जनसत्ता' में आपका नाम देखा. मैं भौंचक. ऐसा क्या कारनामा कर दिया मैंने? शायद प्रताप सिंह ने कुछ लिखा हो - वे उसी अखबार में हैं. पर नहीं, कारनामा न मेरा था न प्रताप का. अपने चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी का था. तभी कोलकाता से डॉ. देवराज ने चलघंटी  की कोयल कुहका दी - अभी मेरे सामने जनसत्ता है. है क्या उसमें ,यह तो बताइये - मेरे पूछने पर उन्होंने तफसील में बताया कि मौसम के मिजाज़ पर च मौ प्र ने अपने ब्लॉग पर जो पोस्ट मेरे नामोल्लेख के साथ डाली थी, जनसत्ता ने समांतर में छाप दी है; और उन्हें हैदराबाद में होने का भ्रम हो रहा है! ओह, तो यह बात है! मैंने राहत की साँस ली. बाद में नेट पर वह पेज मिल गया . कटिंग पेशे-खिदमत है -



गुरुवार, 7 अप्रैल 2011

मुनींद्र जी और उनकी हिंदीनिष्‍ठा



स्मृति  लेख

मुनींद्र जी को याद करना मेरे लिए हैदराबाद के हिंदी परिवार के किसी पुरखे को याद करने जैसा है। स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर हिंदी आंदोलन तक उन्होंने जो भूमिका निभाई, उसके कारण वे राष्‍ट्रीयता और भाषा दोनों ही क्षेत्रों में हमारी पीढ़ी के आदरणीय और मार्गदर्शक बन गए। इन दोनों आंदोलनों ने मुनींद्र जी को उदारता का जो पाठ पढ़ाया उससे उनके व्यक्‍तित्व में एक खास तरह का बड़प्पन आ गया था, जिसके समक्ष सहज ही सम्‍मान से नतमस्तक होने की इच्छा होती थी। इसमें शक नहीं कि किसी व्यक्‍ति की करनी और कथनी में औदात्य तभी आता है जब उसने अपने जीवन को इस तरह तपाया हो कि अंतश्‍चेतना में औदात्य का उजाला जाग उठे। हमारे मन में उदात्तता का संस्कार होगा तो हमारे कर्मों और लेखन में भी उसे प्रभावी अभिव्यक्‍ति मिलेगी। मुनींद्र जी ने भी स्वतंत्रता आंदोलन के जमाने में अपनी किशोर अवस्था में इस औदात्य के संस्कार को तप तपकर अर्जित किया था।

मुनींद्र जी ने ‘कल्पना’ और ‘दक्षिण समाचार’ के माध्यम से, और अपने व्याख्यानों तथा वक्तव्यों के माध्यम से भी, हिंदी भाषा के मानकीकरण और पारिभाषिक शब्दावली की एकरूपता की जोरदार वकालत की। परिनिष्‍ठित भाषा का यह संस्कार उन्होंने ‘आज’ से पाया था। उल्लेखनीय है कि पूर्वी और पश्‍चिमी प्रभाव से मुक्‍त हिंदी अथवा खड़ीबोली को संस्कारित करनेवाले आंदोलन के इतिहास में हिंदी पत्रकारिता का महत्वपूर्ण योगदान रहा है। स्मरणीय है कि हिंदी पत्रकारिता का स्वरूप कभी भी ठेठ हिंदी क्षेत्र तक सीमित नहीं रहा। इसलिए भाषा वैविध्य के अप्राकृतिक रूपों को तो काटने छाँटने के प्रयत्‍न हुए, लेकिन समाज स्वीकृत शैलीय भेदों के प्रयोग को हमेशा पत्रकार की भाषाई और सर्जनात्मक शक्‍ति के रूप में देखा गया। मुनींद्र जी भी मानकीकरण और वैविध्य के इस समानांतर चलनेवाले दोहरे मार्ग के सतत यात्री थे। उन्होंने सदा इस बात पर बल दिया कि हिंदी के लिए प्रचार की अपेक्षा प्रयोग की ज्यादा जरूरत है। इसीलिए उन्हें यह बात कतई नापसंद थी कि लोग हिंदी के नाम पर वैसे तो बड़े बड़े जलसे करें लेकिन चिट्ठियों पर पते अंग्रेज़ी में लिखे अथवा विवाह जैसे पारिवारिक और सांस्कृतिक आयोजन के निमंत्रण पत्र अंग्रेज़ी में छपवाएँ। वे चाहते थे कि हम अपने दैनिक जीवन में हर छोटॆ बड़े कार्य में हिंदी लिखने बोलने के आग्रही बनें - प्रचार से आगे प्रयोग का यही अर्थ है। हिंदी के साथ वे प्रांतीय भाषाओं का चोली दामन का साथ मानते थे और उन्हें तब बहुत बुरा लगता था जब कोई व्यक्‍ति हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं को परस्पर प्रतिद्वन्द्वी के रूप में पेश करता था। उन्होंने एक स्थान पर लिखा भी है कि "भाषा अभिलेखागार की वस्तु नहीं है वह तो प्रयोग पर जीती और विकसित होती है। प्रयोगच्युत भाषा को सिर्फ परीक्षाओं के द्वारा न तो बचा सकते हैं न बढ़ा सकते हैं।"

हिंदी के प्रति यह आग्रह मुनींद्र जी ने स्वतंत्रता आंदोलन से ही विरासत में पाया था। स्मरणीय है कि महात्मा गांधी की राष्‍ट्रीय चेतना जितनी प्रखर थी उनका भाषा संबंधी दृष्‍टिकोण भी उतना ही प्रबल था। यही बात डॉ.राम मनोहर लोहिया पर भी सटीक उतरती है। मुनींद्र जी इन दोनों विभूतियों से प्रभावित थे। इस कारण उनके व्यक्‍तित्व और लेखन में राष्‍ट्रीयता और स्वभाषा के प्रति गहरा आग्रह दिखाई देता है। उनकी इस भाषा निष्‍ठा को कर्म रूप में परिणत करने में बद्रीविशाल पित्ती और डॉ.आर्येंद्र शर्मा की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही। पहले के संपर्क ने उन्हें शिष्‍ट, विनम्र, किंतु स्वाभिमानी एवं संघर्षशील पत्रकार का व्यक्‍तित्व विकसित करने में मदद की तो दूसरे ने ‘कल्पना’ के प्रधान संपादक के रूप में भाषा की शुद्धता, शब्दों के उपयुक्‍त चयन और हिंदी भाषा के विन्यास के अनुपालन की ओर प्रवृत्त किया। डॉ.आर्येंद्र शर्मा के निर्देशन में काम करते हुए ही मुनींद्र जी ने पहली बार यह अहसास किया कि लेखक और पाठक के बीच में संपादक की एक विशेष भूमिका होती है।

मुनींद्र जी के मन में एक संपादक या पत्रकार की भूमिका की धारणा एकदम साफ थी। वे चाहते थे कि स्वतंत्र भारत के निर्माण और उसके छवि गठन में पत्रकारिता अहम सर्जनात्मक भूमिका निभाए। परंतु आजादी के बाद जिस तरह से पत्रकारिता के मान मूल्यों का पतन हुआ उससे वे बड़े दुःखी थे। यह तथ्य उन्हें बहुत चुभता था कि जिस तरह राजनीति में हमने सेवा के बदले उपभोग को प्राथमिकता दी, उसी तरह पत्रकारिता क्षेत्र में जन शिक्षण के बदले मनोरंजन को महत्व दिया। उन्हें इस बात पर बड़ा खेद था कि "स्वतंत्र देश के नागरिकों का क्या दायित्व बनता है, यह बताने के बजाय हमने यह देखा कि हमारे नागरिकों की क्या पसंद है, और क्या पढ़ना पसंद करेंगे, इस दृष्‍टि से पत्र - पत्रिकाओं की सामग्री का संयोजन होने लगा। जिस तरह स्वतंत्रता सेनानियों का ध्यान सेवा और त्याग से हट कर सत्ता के उपयोग की ओर चला गया, उसी तरह पत्रकारों का ध्यान पाठकों के मनोरंजन की ओर चला गया। पत्रकारिता अब व्यवसाय और उद्‍योग बन गई।" 

जैसा कि मैंने पहले भी कहा मुनींद्र जी की पीढ़ी के लोगों के लिए राष्‍ट्रीयता और स्वभाषा एक ही सिक्के के दो पहलू भर थे - स्वदेशी का सिक्का। उनकी स्वदेशी भावना को संपूर्ण पृथ्वी को कुटुंब मानने की उदारता प्रिय थी। लेकिन अपने जीवन के अंतिम समय में जब उन्होंने इस भावना पर संपूर्ण विश्‍व को बाजार मानने की धारणा को हावी होते देखा तो वे विचलित हो उठे। उन्हें लगता था कि भारत को वैश्‍वीकरण के नारे ने अपने आकर्षण में फांस लिया है। उनका यह विचार आज भी अत्यंत प्रासंगिक है कि "अब ‘स्वदेशी’ जैसी कोई विचारधारा नहीं रह गई है। लेकिन हम लोग जो स्वतंत्रतापूर्व की पीढ़ी के हैं, उन्हें वैश्‍वीकरण का नारा एक छलावा लगता है, अंतरराष्‍ट्रीय आर्थिक शोषण का एक औज़ार लगता है। हमारी लगभग सभी राजनैतिक पार्टियाँ वैश्‍वीकरण के मोहजाल में फँस गई हैं। हम मानते हैं कि प्रत्येक देश को अपने प्राकृतिक संसाधनों और श्रम-शक्‍ति के आधार पर अपने आर्थिक ढ़ाँचे का निर्माण करना चाहिए। दूसरे देशों के साथ विनिमय अथवा लेनदेन के आधार पर संबंध बनाने चाहिए। यह जितना भारत के लिए लाभदायी है, उतना ही अमेरिका के लिए भी। अन्यथा हम अंतरराष्‍ट्रीय शोषण के शिकार हो जाएँगे।"

कहना न होगा कि मुनींद्र जी की यह राष्‍ट्रनिष्ठा उनकी हिंदीनिष्‍ठा को भी अधिक प्रशस्त और उन्मुक्त बनाती है। उनकी हिंदीनिष्‍ठा किसी एक भाषिक समाज का सपना नहीं देखती। बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि मुनींद्र जी की हिंदीनिष्‍ठा सही अर्थ में राष्‍ट्रीय निष्‍ठा है जिसमें बहुभाषी भारतीय समाज की समस्त भाषाओं का परस्पर सह अस्तित्व वांछनीय है। वे चाहते थे कि हिंदी भारत की सामासिकता को व्यक्‍त करनेवाली भाषा बने। इस मामले में वे शुद्धतावाद के पक्के विरोधी थे। वे मेल जोल की एक ऐसी भाषा की कल्पना करते थे जिसका विकास एक ऐसे दफ़्तर में हो जहाँ देश की सभी भाषाओं के लोग अपने अपने ढ़ंग से हिंदी में काम करते हैं। उनका खयाल था कि ऐसे दफ्तर में जो हिंदी बनेगी वही देश की साझा भाषा बनेगी, हिंदी बनेगी। हाँ, इतना जरूर है कि लिपि और वर्तनी की शुद्धता और मानकता का खयाल तो रखना ही होगा, नहीं तो अराजकता फैल जाएगी।

अंत में एक और बात याद आती है कि मुनींद्र जी सदा इस बात पर जोर देते थे कि हिंदीभाषियों को हिंदी के अतिरिक्‍त कम से कम एक अन्य भारतीय भाषा अवश्‍य सीखनी चाहिए और उसमें इतनी महारत हासिल करनी चाहिए कि उस भाषा के साहित्य को मूल रूप में पढ़ सकें, आत्मसात कर सकें और हिंदी की प्रकृति के अनुसार हिंदी में अनुवाद कर सकें। मुनींद्र जी का यह सपना अभी अधूरा है, लेकिन इसमें आनेवाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनने की अपार शक्‍ति विद्‍यमान है। 

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

बच्चन की बेचैनी

बच्चन मस्ती के कवि हैं। होंगे। मुझे तो वे बेचैनी के कवि दिखते हैं। ऐसी बेचैनी जो मेरी अपनी भी है। पता ही नहीं चलता, कब बच्चन की बेचैनी मेरी बेचैनी हो जाती है और मेरी बेचैनी बच्चन की। कवि के रूप में बच्चन बच्चन हैं और मैं मैं हूँ। बच्चन के सम बस बच्चन हैं। पर मनुष्य के रूप में बच्चन बेचैन हैं। उनकी बेचैनी अकेले उनकी नहीं है। उनकी बेचैनी मेरी भी है। और भी न जाने किस किस की। इन सारे अपने जैसे बेचैनों को ही लक्ष्य करके कवि ने यह वसीयत की होगी - प्राणप्रिये, यदि श्राद्ध करो तुम मेरा तो ऐसे करना/पीनेवालों को बुलवाकर खुलवा देना मधुशाला। बेचैन आत्माओं की कितनी चिंता है बच्चन को। होगी ही। जो बेचैन है वही तो दूसरे की बेचैनी को समझेगा। जिसने अभाव नहीं देखा, मृत्यु नहीं देखी, अपमान नहीं देखा, उदासी नहीं देखी, वह भला किसी और के अभाव को, मृत्यु को, अपमान को, उदासी को क्या जानेगा? पर बच्चन ने इन सबको देखा है, भोगा है, जिया है इसलिए वे खुद भी बेचैन दिखते हैं और औरों की बेचैनी भी बिना कहे देख लेते हैं।

बहुत बेचैनी है। चैन कहाँ है? जीवन की आपाधापी में कब वक्त मिला? कहीं नहीं। कभी नहीं। बस बेचैन दग्ध-उर व्यंग्यपूर्वक ‘आनंद करो’ की पुकार लगाता है जैसे कोई मस्त फक़ीर अलख जगा रहा हो। यह दग्ध-उर की बेचैनी ऐसी अनबुझ आग है जो मधुपान से बुझ सके शायद - कुछ आग बुझाने को पीते/ये भी, कर मत इन पर संशय। लेकिन बुझती नहीं यह आग। और भड़कती है। इसी बेचैनी में हर पीनेवाला और-और की रटन लगाता जाता है। इस बेचैनी ने लाल सुरा की धार को लपट बना दिया है। पर पीनेवाला इस ज्वाला को गटागट पी जाता है क्योंकि उसके भीतर विषम अनुभवों की इससे कहीं भयानक ज्वाला दहक रही है। इतनी कि नशे में भी दर्द बना रहता है। मदहोशी में भी विगतस्मृतियाँ हरी रहती हैं। सच ही भीतरी बेचैनी की ज्वाला मदिरा की ज्वाला से बड़ी है। बच्चन ने इस आग को ही आनंद बना दिया। उनकी मधुशाला में उस हर प्राणी का स्वागत है जो अपनी बेचैनी को उत्सव बना सके - पीड़ा में आनंद जिसे हो, आए मेरी मधुशाला।

कितनी कितनी बेचैनी! कैसी कैसी बेचैनी! एक अनादि-अनंत तृषा से भरी बेचैनी। कवि स्वयं प्यासा प्याला बन गया। पात्र और हाला ने एक दूसरे को खूब छका, खूब पिया। पर प्यास वैसी की वैसी रही। वह क्षण भी आ उपस्थित हुआ जब साकी ने मधुपात्र से गरल ढालना शुरू कर दिया। हाथ प्याले का स्पर्श भूल गए। जिह्वा सुरा का स्वाद भूल गई। एक एक कर पाँचों तत्व संज्ञा को छोड़ चले। पर तृषा न छूटी। भर्तृहरि होते तो ‘वैराग्य शतक’ लिखते। ठीक ही तो है, भोग नहीं भुगते गए, हमीं भुगतते रहे। तप कहाँ तपे गए, हमीं तपते रहे। वक़्त कहाँ चुका, हमीं चुक गए। इस तरह हम जीर्ण-जर्जर हो गए लेकिन तृषा आज भी वैसी की वैसी चिरयौवना है। पर बच्चन ‘वैराग्यशतक’ नहीं लिखते, राग का चरम उत्कर्ष लिखते हैं। साक़ी के हाथों ेमें भले ही गरल का पात्र हो, मेरे कानों में मधु का अनाहत नाद गूँजता रहे - कानों में तुम कहती रहना,मधुकण,प्याला,मधुशाला। होगा राम नाम सत्य उनके लिए जिन्हें मरकर चैन मिल जाता है, मेरी अमर बेचैनी के लिए तो मधुशाला ही अंतिम सत्य है। मेरी बेचैन मिट्टी से मरजीवा पाँखी की तरह नया जीवन जन्म लेगा। मेरी बेचैनी फिर एक प्याले में ढलेगी - किन सरस करों का परस आज, करता जाग्रत जीवन नवीन? मिट्टी का तन और मस्ती का मन इस सरस परस से फिर बेचैनी से भर जाएगा। मैं खोजूँगा इसी सरस परस को। जब तक यह न मिलेगा मैं भटकता रहूँगा। नहीं, मुझे धन-कुबेरों का ठाट-बाट नहीं चाहिए; किसी राजा-महाराजा का माल-ख़ज़ाना और राज-पाट भी नहीं। मेरी बेचैनी को अमरों का लोक भी नहीं सुहाता; अमरित भी नहीं। मैं तो बस सरस-हृदय की खातिर हर बार बिना मोल बिका हूँ। उसके मिलते ही हर ओर मधुशाला सज उठती है। पर बेचैनी तब भी बनी रहती है। बेचैनी बच्चन को छोड़ती नहीं। मधुपूर्ण मिलन के क्षण में भी एक खटका सा लगा रहता है - जब दिनकर की तमहर किरणें तम के अंदर छिप जाएँगी/जब निज प्रियतम का शव रजनी तम की चादर से ढक देगी ग् ग् ग् तब हम दोनों का नन्हा सा संसार न जाने क्या होगा? बेचैन है कवि कि जब रस-रूप-गंध-शब्द-स्पर्श जैसे सारे साधन छिन जाएँगे, तब मानव की चेतनता का आधार न जाने क्या होगा? होगा; मानव की चेतनता का आधार अवश्य होगा - कवि की बेचैनी!

यह बेचैनी बच्चन को रात रात भर जगाती है। सुखिया संसार खाता है और सोता है, दुखिया कवि जागता है और रोता है। दुनिया भर की बेचैनी को सीने पर धरकर सोया जा सकता है क्या? रोया तो जा सकता है। कबीर रोएँ या बच्चन, जब रोते हैं तो लोक उनके साथ रोता है। सब ओर बेचैनी का पारावार लहराने लगता है। इसे तनिक नज़दीक जाकर देखो, दोस्त, तो समझोगे कितनी व्यापक है बच्चन की बेचैनी। यह निज की पीड़ा भर नहीं, सृष्टि की वेदना है। सार्वजनीन बेचैनी।

कौन बेचैन नहीं है यहाँ? बच्चन की आँख से देखो। तुम जिन लहरों को सागर का शृंगार समझते हो, वे उसकी बेचैनी हैं। वायु को आकाश की क्रीड़ा मत समझ लेना, वह आकाश की बेचैनी है। यह रंग-बिरंग जगत मिट्टी की मूरत नहीं, उसकी बेचैनी है। कली की बेचैनी का नाम है गंध। मधुवन की बेचैनी की संज्ञा है पुष्प। कोयल की कूक को मनुहार मान लोगे तो चूक जाओगे, उसमें छिपी बेचैनी को पहचानने की कोशिश करो तो कुछ बात बने। बेचैन है हर सच्चा गायक। बेचैन वीणा भी है। भावनाओं के पीछे साँसों की बेचैनी छिपी है और कवि की कृति में उसके दग्ध-उर की बेचैनी। कविता यदि हृदय की अभिव्यक्ति है तो कहना ही होगा कि सचमुच, कविता बेचैनी का दूसरा नाम है - गान गायक का नहीं व्यापार, उसकी विकलता है;/राग वीणा की नहीं झंकार, उसकी विकलता है;/भावनाओं का मधुर आधार साँसों से विनिर्मित,/गीत कवि-उर का नहीं उपहार, उसकी विकलता है।

जिस दिन यह बेचैनी चुक जाएगी, उस दिन कविता भी चुक जाएगी। लेकिन कविता कभी नहीं चुकेगी क्योंकि बेचैनी कभी नहीं चुकती। बेचैनी पहचान है मनुष्य होने की। बच्चन मनुष्य हैं। मनुष्य होकर कवि; और कवि होकर मनुष्य। उनकी बेचैनी - मधु की प्यास - शाश्वत है। यह बेचैनी उन्हें विवश करती है प्यार के पल में भी जलन खोजने को। उन्हें अधर के रस कणों से तृप्ति नहीं मिलती। वे उन्मत्त होकर मानो चीखते हैं - खींच लो तुम प्राण ही इन चुंबनों से। नहीं, यह आत्मपीड़न नहीं है। प्यार के क्षण में मरण की इच्छा है। प्यार के क्षण में भी जो जीवित रह गया - जिसने आपा नहीं मेटा, जिसने हथेली पर सिर नहीं धरा - उसने प्रेम जाना ही नहीं: प्यार के क्षण में मरण भी तो मधुर है। कवि को यह मरण प्रिय है क्योंकि इसमें भी मधु है। अजीब लग सकती है बच्चन की यह बेचैनी। पर सच यही है कि मौन प्रिय को मुखर करके प्रणय की जय का उल्लास भले मिलता हो, कवि के हृदय की तृष्णा परितृप्त नहीं होती। कहा न, बच्चन मनुष्य हैं। जो मिल जाता है, उससे उन्हें चैन नहीं मिलता। तन मिल जाता है तो वे मन की खोज में निकल पड़ते हैं। रस मिल जाता है तो वे संतोष के लिए बेचैन होने लगते हैं। जिसने अमृत कलश की ओर कभी भूलकर भी देखा नहीं, उसे जब मधु मिल गया तो वह अमृतकण के लिए बेचैन हो उठा। बच्चन जी, मधु तो प्रतिध्वनि है जिसके लिए इतने बेचैन रहे; ध्वनि तो अमृतकण ही है -

है अधर में रस, मुझे मदहोश कर दो,/किंतु मेरे प्राण में संतोष भर दो,
मधु मिला है, मैं अमृतकण खोजता हूँ; /मैं प्रतिध्वनि सुन चुका, ध्वनि खोजता हूँ।

शनिवार, 16 अक्टूबर 2010

गांधी जी सफलतम ब्लॉगर हुए होते : वर्धा आयोजन का भरत वाक्य



अभी ९-१० अक्टूबर २०१०  को महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय में दो दिन का आयोजन था - हिंदी ब्लॉगिंग की आचार संहिता पर केंद्रित राष्ट्रीय संगोष्ठी और कार्यशाला. अपने कस्बाई काम्प्लेक्स के कारण मैं ऐसे आयोजनों से कन्नी काट जाया करता हूँ जहाँ महान व्यक्तित्व पधार रहे हों - चाहे सचमुच के या फिर भरम के. इस आयोजन के बारे में भी मन  में द्वंद्व था - जाऊँ या न जाऊँ. न जाने का जेनुइन कारण भी उपस्थित था - हमारे संस्थान में दूरस्थ माध्यम के छात्रों का संपर्क कार्यक्रम. पर मुझे इनकार करके भी जाना पड़ा - सिद्धार्थ जी [संयोजक] के आग्रह को टालना संभव नहीं था मेरे लिए. उन्होंने जब फोन पर पहला ही वाक्य कहा- 'आपके निर्णय ने तो मुझे उदास कर दिया' - तो उनकी आवाज़ से  लगा कि वे सच बोल रहे हैं, औपचारिकता नहीं निभा रहे. सोचा - जाना पड़ेगा ही शायद. और जब उन्होंने मेरे बताए सब कारणों को निरस्त करते हुए कहा - 'मैं आपका आना निश्चित मान कर चल रहा हूँ' - तो लगा, किसी ने बहुत आत्मीयता से हथेली पर उष्ण सा दबाव दिया हो. ऊपर से कविता जी के फोन और ईमेल ने मेरे लिए कुछ कहने की गुंजाइश ही नहीं छोडी.

दो गाड़ियों का आरक्षण कराया था. उस दिन सवेरे आठ बजे बेटी ने  स्थान कन्फर्म होने की बात कही तो मैंने सोचा - रात १० बजे वाली गाडी है,और प्रथम नवरात्र की औपचारिकताओं में लग गया. लेकिन मेरी हालत उस वक़्त शायद देखने लायक रही होगी जब मुझे बताया  गया कि गाड़ी  दिन के १० बजे है. जेट स्पीड  से तैयार होकर भागना पड़ा. भला हो उस अपरिचित भले आदमी का जिसने मुझे लिफ्ट दे दी वरना स्कूल का समय होने के कारण कोई भी ऑटो चलने को तैयार न था. इसीलिए घर से निकलते वक़्त बेटी को देवीस्वरूप मानते हुए चरणस्पर्श किए थे  और मन ही मन माँगा था  कि गाड़ी छूट न जाए. वह मेरे इस आचरण पर पहले तनिक हकबकाई , और फिर हँस दी.

गाड़ी पकड़ी गई तो  जान में जान आई. वर्धा उतरते ही शोधार्थी जोशी जी ने मुझे सहज ही चीन्ह लिया और फादर कामिल बुल्के के नाम पर स्थापित अतिथिशाला में प्रस्थापित कर दिया. उस समय वहाँ खुले में कुछ ज़ोरदार चर्चा चल रही थी. मैंने अनुमान  किया कि अवश्य ही यह 'आज की कहानी के सरोकार' पर गोष्ठी होगे जिसकी सूचना गत दिन कविता जी दे चुकी थीं. मैं शामिल नहीं था पर अच्छा लगा विद्वानों को इस तरह साहित्यचर्चा में शाम बिताते देखकर. 

गोष्ठी से छूटते ही  कविता जी आईं. मुझे उनके कुछ महीने पहले के एक्सीडेंट की जानकारी थी; फिर भी उन्हें छड़ी के सहारे धीरे धीरे संभल संभल कर चलते देखना मेरे लिए सहज नहीं था. मैं धक् से रह गया. अभिवादनादि का भी शायद मैं ठीक से उत्तर न दे पाया होऊँ, क्योंकि मेरी इच्छा हो रही थी कि आयु में बड़े होने के अधिकार के साथ उन्हें खूब डाँटूं. [पर नहीं, मैंने वापस लौटने तक भी एक बार भी उनसे उस दुर्घटना की चर्चा तक नहीं उठाई.] कविता जी अनेक वर्षों बाद इतनी प्रसन्न और उत्साहपूर्ण दिखीं  - उनकी बिटिया का रिश्ता तय हो गया है न! [ अभी कल ही की तो बात लगती है जब पहली बार घर जाने पर उसने मुझे बेहद संकोच के साथ अपनी पहली कविता दिखाई थी - और छोटी सी हथेली भी!]

सिद्धार्थ जी आए. गले मिले और प्रथम परिचय में ही इतने अपने लगे कि अब तक विस्मित हूँ. मैंने उन्हें आर्यसमाजी समझा था - उनका ब्लॉग है न 'सत्यार्थ मित्र' [ 'सत्यार्थ प्रकाश' की याद दिलाने वाला नाम.बाद में जाना कि सत्यार्थ उनके सुपुत्र का शुभनाम है.] मेरे उपवास का मज़ाक उड़ाया जा सकता है और मूर्तिपूजा के खिलाफ उपदेश भी दिया जा सकता है - इसका पूरा खतरा था. संकोच सहित मैंने भूमिका बनाई कि प्रगतिशील होते हुए भी कुछ मामलों में रूढ़िग्रस्त हूँ. पर जब उन्होंने बताया कि वे स्वयं नवरात्र का उपवास रखे हुए हैं तो दुविधा मिट गई. मुझे उन्होंने अपने आवास पर फलाहार के लिए आमंत्रित किया तो कविता जी ने लगभग चहकते हुए कहा - 'वहाँ आपको देवी के दर्शन होंगे'. और ये पंक्तियाँ लिखने का मेरा उद्देश्य इतना भर है कि यह स्वीकार करूँ कि सचमुच सिद्धार्थ जी के घर में मैंने देवी के दर्शन किए. सौभाग्यवती रचना अत्यंत सौम्य हैं - बेहद स्नेहमयी. इस  तरह उन्होंने स्वागत किया कि वात्सल्य ने मुझे औपचारिक शिष्टाचार का अतिक्रमण करने को बाध्य कर दिया - मैं हर आयु की महिला को बरसों मैडम कहते रहने का अभ्यासी हूँ पर श्रीमती त्रिपाठी को मैंने कुछ ही मिनटों में कई बार बेटी [बेटा] कहकर संबोधित किया -  खासकर जब वे और फलादि लेने के लिए आग्रह कर रही थीं .

और हाँ , याद आया - सिद्धार्थ जी ने सेब और मौसमी अपने हाथों छीले और काटे. वे बड़ी तन्मयता से यह कार्य कर रहे थे. मुझे देखते देखा तो बताने लगे कि उन्हें किसी के भी काटे फल पसंद नहीं आते. इस पर मैंने खाद्य पदार्थों के सौंदर्यशास्त्र पर एक संक्षिप्त प्रवचन दे डाला जिसे आतिथेय दंपति ने अत्यंत श्रद्धा से सुनकर अपनी सहिष्णुता का परिचय दिया. साबूदाने की खीर और सेंधा नमक से सुवासित आलू का स्वाद दिव्य था. मैं धन्यता की अनुभूति में गद्गद  था.

कुछ देर घरेलू बातचीत करके अतिथिगृह लौटने पर आलोकधन्वा जी और जय कुमार झा जी के सत्संग का लाभ लिया. आलोकधन्वा बड़े कवि हैं, लेकिन सहज मनुष्य. वेणुगोपाल जी का उल्लेख करते ही खुल पड़े.उन्हें अगले दिन  संगोष्ठी के मंच पर सुना, और शाम को कविगोष्ठी में भी.कुछ तेवरियों के अंश सुनाने का मौका मुझे भी मिला. मुझे सदा अचरज रहेगा कि इतने बड़े कवि ने तीसरे दिन विदा के समय मेरी दो पंक्तियाँ दुहराते हुए रचनाधर्म का स्मरण कराया - 'बर्फ पिघलाना ज़रूरी हो गया चूँकि / चेतना की हर नदी पर्वत दबाता है.' दरअसल उन्होंने बहुत ध्यान से सबकी कविताएँ सुनी थीं.कविता जी को तो उन्होंने विधिवत कवि घोषित  किया. प्रियंकर पालीवाल जी की कविताएँ मुझे ख़ास लगीं. हमारे कई बड़े कवियों की कविताओं के अलावा जब रवि नागर जी ने एक पाकिस्तानी कवयित्री की रचना हारमोनियम पर सुनाई - '' सीता को देखे सारा गाँव / आग पे कैसे धरेगी पाँव'' - तो मन भीतर तक भींज सा गया. मेरी इच्छा हुई एक पल को कि नागर जी को कंधे पर उठाकर गोल गोल दौडूँ. पर बात मन में ही रखनी पडी क्योंकि अपनी ताक़त का मुझे अनुमान है!

दो दिन के आयोजन में कई नए मित्र बने. शायद उन सबसे भविष्य में परोक्ष या अपरोक्ष संपर्क बना रहे. फिलहाल नाम परिगणन करना औपचारिक लगेगा. पर कई पुराने मित्र भी मिले. प्रो.कृष्ण  कुमार सिंह भी उतने ही भाव विभोर थे जितना मैं. प्रो.ए. अरविन्दाक्षन वहाँ प्रतिकुलपति हैं ,लेकिन कोच्चिं की यादों के साथ बेहद अपनेपन से बतियाए. उन्होंने ही संगोष्ठी के उद्घाटन  सत्र में सबका स्वागत किया - ह्रदय की भाषा में. विस्मय है कि कुछ मित्रों ने उनके उच्चारण में मलयालम के संस्पर्श पर विनोद किया है, यदि वे अरविन्दाक्षन जी के मौलिक और अनूदित साहित्य से परिचित होते तो उनकी टोन कुछ और होती. हिंदीवालों की हठधर्मिता  और स्वयं को बिग ब्रदर समझने की प्रवृत्ति ने पहले ही हिंदी का बहुत नुकसान कर लिया है - ब्लॉगर मित्रों को इसे जानना चाहिए. उद्घाटन कुलपति विभूति नारायण राय जी ने किया . बढ़िया बोले - दो टूक बातें, ब्लॉगर बिरादरी की अपेक्षा प्रभावित पक्षकार की तरह. मुझे अध्यक्ष के नाते उनके निकट कुछ देर बैठने का अवसर मिला तो मैंने १९८४ के नजीबाबाद के लेखक सम्मलेन की याद दिलाई जो बाबा नागार्जुन के संरक्षण में संपन्न हुआ था. इस बहाने 'उन्नयन' के संपादक श्रीप्रकाश मिश्र जी का भी सन्दर्भ आ गया. 

संगोष्ठी और कार्यशाला की गतिविधि और उपलब्धि पर अलग से लिखा जा चुका  है. यहाँ इतना भर कि आयोजकों ने महात्मा  गांधी के नाम पर खड़े किए गए  हिंदी विश्वविद्यालय की परिक्रमा कराने के साथ ही सेवाग्राम स्थित बापू कुटी और पवनार स्थित विनोबा आश्रम के दर्शन की भी व्यवस्था की थी. बड़े तडके उठकर सब साथी तैयार हो गए. उत्साह सभी का देखने लायक था.खास करके प्रो.अनीता कुमार, डॉ.अजीत गुप्ता,अनूप शुक्ल, गायत्री शर्मा, सुरेश चिपलूणकर, अशोक कुमार मिश्र, अविनाश वाचस्पति , विवेक सिंह, रवींद्र प्रभात और शैलेश भारतवासी अत्यंत उत्सुक दिखे. पूरे रास्ते सभी चीख चीख कर गांधी दर्शन पर चर्चा करते रहे.सभी दोनों ऐतिहासिक स्थलों से अभिभूत थे. गांधी जी  की प्रगतिशीलता पर काफी विचार विमर्श चला और कई चिट्ठाकारों ने यह सामूहिक निष्कर्ष दिया कि - यदि गांधी जी आज के समय में  होते तो वे सफलतम ब्लॉगर हुए होते क्योंकि उन्हें जनसंचार माध्यमों की शक्ति की पहचान थी और वे इनका देशहित में सटीक उपयोग करना जानते थे.

दस अक्टूबर की सांझ बड़ी भारी थी. और भी भारी बना दिया उसे सिद्धार्थ-रचना दंपति के निश्छल शिशुवत आचरण ने. दोनों ने हर साथी के साथ खड़े होकर बीसियों फोटो खिंचवाए. हम लोग गोल दायरे में बैठे थे. वे दोनों एक एक के पीछे आकर खड़े होते और फोटो खिंचवाते. इतना ही नहीं जो मित्र अपने कमरों में थे, उनके साथ फोटो के लिए कमरे में पहुँच  गए. होगा यह आयोजन विश्वविद्यालय का , पर हमारे लिए तो यह शुद्ध रूप से सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी के परिवार का उत्सव बन गया. यहाँ तक ही बस नहीं, सबको पाथेय  के रूप में गरमागरम पूरी सब्जी का पार्सल भी दिया गया. 

सिद्धार्थ जी स्वयं स्टेशन पहुँचाने आए थे. विदा का क्षण सत्य ही भावुकता का क्षण था!   
   

मंगलवार, 26 जनवरी 2010

बथुआ प्रेम की पराँठा परिणति

खतौली से लौटकर हलके-फुल्के अंदाज़ में लिख दी थी पिछली पोस्ट " सुंदर सुंदर सब्जियाँ तो मिलेंगी बुढापे में! " मित्रों के समक्ष प्रस्तुत करते हुए मन में संकोच सा भी था. लेकिन मैं विस्मित रह गया यह देखकर कि अपने डॉ.राधे श्याम शुक्ल जी ने उसे २४ जनवरी को अपने पत्र ''स्वतंत्र वार्ता'' के साहित्य वाले साप्ताहिक पन्ने पर छाप डाला. कई सारे मित्रों और छात्रों ने फोन करके विधिवत उस आलेख का नोटिस लिया. कुछ व्यक्तिगत ईमेल भी आए.और हाँ, ''हिन्दी भारत'' समूह पर भी अच्छा प्रतिसाद मिला. अपने ऐसे सभी मित्रों के प्रति आभार व्यक्त करने के साथ ही उन प्रतिक्रियाओं को यहाँ सहेजने का मोह मैं संवरण नहीं कर पाया. सो,यह पोस्ट तैयार हो गई.


भारत डायनेमिक्स के वरिष्ठ हिंदी अधिकारी होमनिधि शर्मा ने लिखा है-

पंडित जी, बढ़िया संस्‍मरण. इस बहाने हम भी थोड़ा-बहुत आपका गृह-नगर देख आए. पढ़कर फिल्‍म माचिस का वह गीत ताजा हो गया 'चप्‍पा-चप्‍पा चरखा चले, गोरी-चट गोरी जो कटोरी से खिलाती थी......' उम्‍मीद है 'गपशप' में महबूबनगर पर लिखा संस्‍मरण पसंद आया होगा.

होमनिधि शर्मा



शर्मा जी की ही तरह सैयद मासूम रज़ा भी एक अन्य वैज्ञानिक संस्थान में वरिष्ठ हिंदी अधिकारी हैं - नाभिकीय ईंधन सम्मिश्र में. उन्हें इलाहाबाद के दिल में छिपा अपना गाँव याद हो आया -

धन्यवाद सर,
मज़ा आ गया (कम से कम सुंदर सुंदर सब्जियाँ तो मिलेंगी खाने को बुढापे में) को पढ़कर. हाल ही लगभग ऐसा ही आनंद मैंने भी उठाया अपने गाँव इलाहाबाद में. मजबूरी ये है कि कुछ पाने के लिए बहुत कुछ खोना पड़ता है.
शुभ रात्रि
रज़ा



हैदराबाद विश्वविद्यालय के डॉ.आलोक पांडे जी को शायद सुकरात और कन्फ्युशीयस वाला आत्मव्यंग्य भा गया -

अच्छा लगा. वैसे भी सागरो मीना में दर्शन का सुख कहाँ!


अंग्रेज़ी एवं विदेशी भाषा विश्वविद्यालय के रूसी विभाग के प्रोफ़ेसर डॉ. जगदीश प्रसाद डिमरी मेरे प्रति अकारण परम स्नेह रखते हैं. गलती हो गई कि उनके लिए गुड़ नहीं लाया गया.ज्ञात हो कि हमारा जिला [मुज़फ्फर नगर] एशिया की सबसे बड़ी गुड़-मण्डी माना जाता है. तो डिमरी सर ने लिखा -

प्रिय ऋषभदेव जी ,
सुंदर सुंदर सब्जियों वाला आलेख मिला. बहुत अच्छा लगा. खतौली और चीतल की याद ताजा कर दी. ये दोनों मेरे घर जाने के रास्ते में पड़ते हैं. बथुवे की याद तरो ताजा कर दी. मोंडा से एक दिन बथुवा लाया था, लेकिन मजा नहीं आया. बथुवा मरा जैसा था .खतौली में गुड़ भी अच्छा बनता है. लाये हैं क्या?

जे पी. डिमरी



अपने सत्य नारायण शर्मा कमल जी तो सदा मेरी हर रचना पर आशीर्वाद देते ही हैं. उन्हें भी खतौली की जलेबियाँ पसंद हैं. अत्यंत स्नेहपूर्वक उन्होंने लिखा -

प्रिय ऋषभ देव जी,
आपके खतौली प्रवास पर आपके वरिष्ठ मित्र कवि-साहित्यकारों के साथ
बीते समय का वृत्तान्त पढ़ कर मन आनंद से भर गया | गाज़ियाबाद
से मुज़फ्फरनगर देहरादून या हरिद्वार आते जाते खतौली से कई बार
गुज़रा हूँ | मुख्य मार्ग पर नहर से मिले होटल में उस समय बढ़िया
खाना और जलेबी आदि मिलती थी | हरी ताज़ी सब्जियों का मज़ा
तो पश्चिम उत्तर प्रदेश में देखते और खाते ही बनता है | यादें ताज़ा
हो गईं |
सस्नेह
कमल


आदरणीय अनूप भार्गव जी ने तेवरी में रूचि दर्शाई है -

आदरणीय ऋषभ जी:
आप के सुन्दर और स्वादिष्ट संस्मरण के लिये धन्यवाद :-) बहुत रोचक और मन से लिखा हुआ लगा ।
मेरा अनुमान है कि यह वही प्रो. देवराज हैं जिन की ज्योति बसु जी पर लिखी कविता आप ने कुछ दिन पहले भेजी थी । बहुत सशक्त कविता है ।
मेरी अज्ञानता समझ लीजिये लेकिन ’तेवरी काव्यांदोलन’ के बारे में और जानने की इच्छा है । आप की कुछ तेवरी पढी हैं और बहुत अच्छी लगीं, बस जानकारी वहीं तक सीमित है ।
सादर
अनूप भार्गव


अब शीघ्र ही कुछ पोस्टें तेवरी के इतिहास और प्रवृत्तियों पर लिखनी होंगी. प्रिय डॉ.बी. बालाजी को भी तेवरी से जुड़ा प्रसंग रोचक लगा. उन्होंने अपने चंद्रमौलेश्वर प्रसाद जी के स्वास्थ्य के बारे में भी पूछा है. दरअसल प्रसाद जी के कोलिक अल्सर के ऑपरेशन से दो दिन पहले ही बालाजी और मैं उनके आवास पर गए थे. बालाजी लिखते हैं -

नमस्कार सर.
'सुंदर सुंदर सब्जियाँ तो मिलेंगी बुढापे में!'
संस्मरण पढ़ने का मौका मिला. पढ़कर अच्छा लगा .तेवरी आन्दोलन की जानकारी मिली. तेवरी आन्दोलनकारियों की दोस्ती भी अच्छी लगी. यह 'अपनापन' का दर्पण है. बहुत से स्थल मन को छूते हैं.
आपके द्वारा इस तरह के संस्मरणों के संकलन की प्रतीक्षा रहेगी.
एक संस्मरण का संकलन हो ही जाए.
चंद्रमौलेश्वर जी का क्या हाल है.

शुभ रात्रि.
आपका
बालाजी


संकलन-फंकलन तो खैर अभी सपने में भी नहीं सोचा - कोई संभावना नहीं. हाँ, चन्द्र मौलेश्वर जी ऑपरेशन के बाद स्वास्थ्यलाभ कर रहे हैं - अभी अस्पताल में ही हैं और आज कुछ चले-फिरे भी. अरे हाँ, उन्होंने भी बथुवे में रुचि प्रदर्शित की थी फोन करके.अब यह सुरुचि सम्पन्नता ही तो है कि वरिष्ठ कवयित्री डॉ. प्रतिभा सक्सेना जी को गन्ने से लेकर सब्जियों तक सब कुछ प्रत्यक्ष हो आया -

भावनाओं के सहज और आत्मीय उद्गार, विगत की स्मृतियों के साथ और प्रभावी हो गये हैं, सीधे मन में उतर जाते हैं.
उत्तरप्रदेश का वह भाग कुछ दूसरे ही हवा-पानी से युक्त है. मैं बारह वर्ष से भी अधिक उधर रही हूँ, वहीं से एम.ए.किया. वहाँ के लोग, वहाँ का गन्ना, मेवा पड़ा ताज़ा गुड़, लुकाट, लीचियाँ और सब्ज़ियां - आपने कह ही दिया (मेरे बोलने को कुछ नहीं बचा)! यह जान कर अच्छा लगा कि अभी भी यथावत् हैं.
आपका आभार कि फिर वही सब प्रत्यक्ष-सा हो गया..
सादर,
प्रतिभा सक्सेना


डॉ. शकीला खानम जी, डॉ अंबेडकर ओपन यूनिवर्सिटी में हिंदी विभाग की अध्यक्ष हैं. उन्हें भी अपना गाँव याद आया -

आदरणीय,
आप का आलेख पढ़कर मुझे बहुत अच्छा लगा. मेरे मन में भी अपने गाँव की पुरानी स्मृतियाँ ताज़ी हो गयी.
सादर,
शकीला.



प्रो. शकीला जी ने स्लाइड शो बाद में देखा - और ध्यान से देखा. दो तस्वीरें हिंदी की उपेक्षा को उजागर करने को लगाई गयी थीं - मैडम ने उनका सटीक नोटिस लिया -

नमस्कार !
अभी-अभी तस्वीरें भी देखी है ! इनमें से अंग्रेज़ी की दीवार-हिंदी लाचार वाली तस्वीर और स्लोगन - दोनों बहुत अच्छे लगे. ऐसी तस्वीरों को राजभाषा विभाग की दृष्टि में ले जाना चाहिए. संसदीय राजभाषा समिति अपने निरीक्षण के बहाने जबतब अधिकारियों को परेशान करती रहती हैं तब क्या उनकी नज़र इनपर पडती नहीं? या तेवरी की प्रजा सिर्फ अंग्रेज़ी ही जानती हैं ? !
सादर,
शकीला



उड़न तश्तरी ने ब्लॉग पर टिप्पणी में कहा -

गांव की चौपाल सी महकती सुन्दर संस्मराणात्मक पोस्ट.
आनन्द आ गया.


और आदरणीय गुरुदयाल अग्रवाल जी ने तो कृपा की बरसात ही कर दी -

I was away to Bangalore for a couple of days having returned to Hyderabad only on 23.1.10
night. I read this article in Varta yesterday which truely depicts the picture of the heavenly
pleasures of meeting old friends (for 'friends' read 'friends who are only friends and nothing
else'). This is further loaded with 'bathua' the miracle in green leaves. This also happens to be
my weakness and stands certified from the fact that during this season if ever I happen to go
to Delhi all my relations keep a packed of boiled 'bathua' for me and sometimes I have to
carry more than 2/3 kg of the same to Hyderabad and enjoy it for a long long time
Now it is available here also but not always
With happly bathua greetings
as ever yours
g.d.agarwala


गुरुदयाल जी के बथुवा-प्रेम से अभिभूत होकर उन्हें फोन किया तो लंबी बात हुई. वे बोले - ''आपका संस्मरण पढ़कर एक बात समझ में आई कि आपके जीवन में एक बड़ी कमी है.'' ''वह क्या?''-मेरी उत्सुकता स्वाभाविक थी. उनका उत्तर परम स्वादिष्ट था -''यह कि आपने अभी तक मेरे हाथ के पराँठे नहीं खाए. एक बार खाएँगे तो बार बार संस्मरण लिखेंगे.'' अब आप समझ सकते हैं कि आगे क्या हुआ होगा.
जी हाँ, फरवरी के दूसरे सप्ताह उन्होंने मुझे सपरिवार अपने घर पराँठों के आस्वादन के लिए न्यौत दिया है.
अब लिखने को रह क्या गया?