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शुक्रवार, 29 मार्च 2013

कविता का समकाल -6) स्त्रीपक्षीय कविता के तेवर

कविता का समकाल/ आलोचना/
ऋषभ देव शर्मा/2011/लेखनी/ नई दिल्ली - 110059/
500 
रुपये/ 140 पृष्ठ/
ISBN 9788192082745
कविता के सामाजिक सरोकार का दायरा बड़ा व्यापक है। वह मानवजाति के प्रत्येक प्राणी की चिंता करती है। ऐसे में वह किसी समूह को हाशिए पर छोड़कर नहीं चल सकती। बल्कि हाशिए पर छूटे हुओं को फोकस में लाए बिना वह अपने सरोकार की व्यापकता को सिद्ध नहीं कर सकती। इसीलिए आज की कविता स्त्री और दलित से लेकर जल और पृथ्वी तक की चिंता करती है। इन सबकी उपेक्षा जो की जाती रही, उसकी कुछ तो भरपाई इस तरह हो सकती है। स्त्री को वस्तु बनाकर मनुष्य होने के अधिकार तक से वंचित कर दिया गया, यह मानव इतिहास की सच्चाई है। स्त्रीपक्षीय कविता इसीलिए स्त्री के मनुष्य होने को रेखांकित करती है। यह कविता न तो अनिवार्यतः केवल स्त्री रचनाकारों द्वारा रची गई है और न पुरुषविरोधी ही है। यह तो स्त्री के मानव अधिकारों के लिए आवाज उठानेवाली कविता है। निस्संदेह इस आवाज में स्त्री रचनाकारों का स्वर अग्रणी और प्रखर होना ही चाहिए। 

उल्लेखनीय है कि किसी रचना में निहित बेहतर मानवीय सरोकारों को लेकर हस्तक्षेप करने की काबिलीयत उसके स्त्रीपक्षीय होने की मूलभूत ज़रूरत है। भारतीय स्त्री के संबंध में गढ़े गए मिथों के संदर्भ में स्त्रीपक्षीय चिंतन का मानना है कि ‘नारी की भावशुद्धि‘ की लंबी गाथाएँ पुरुषनिर्मित सीमित मनोकामनाओं का परिणाम हैं। इसी का परिणाम है कि साहित्य में गंभीर स्त्री अंकन जितना कम मिलता है, लाजवंती देवियों की भरमार उतनी ही अधिक है। ऐसी स्थिति का खुलासा करती हुई स्त्रीपक्षीय कविता इस तथ्य को रेखांकित करती है कि घरेलू औरत सिर्फ रोटी नहीं बेलती, यदि उसे समाज चलाने और राष्ट्रनिर्माण का अवसर दिया जाए तो वह अपनी योग्यता प्रमाणित कर देगी और कर भी रही है। (प्रमीला के. पी., औरत की अभिव्यक्ति एवं आदमी का अधिकार, 2004) 

स्त्रीमुक्ति को प्रतिसंस्कृति की पहल बताते हुए लेखिका ने यह प्रतिपादित किया है कि हाशिए में अवस्थित स्त्रियों, बच्चों, मजदूरों, दलितों और प्रवंचितों की विभिन्न प्रकार के अधीशत्व से मुक्ति स्त्रीमुक्ति की चरमपरिणति होगी और इसके लिए स्त्रीपक्षीय कविता का संदेश है - 

‘‘मनुष्यता की रक्षा के लिए 
कहना नहीं, सहना तुरंत बंद कर देना होगा।"
                                               (कात्यायनी) 

स्त्रीकविता के तेवर का यह बदलाव काव्यभाषा के स्तर पर भी दिखाई देता है। इतिहास और परंपरा के हाथों निर्मित सभी भाषाओं में अधीशत्व के लक्षण पाए जाते है। इसीलिए स्त्री भाषा की माँग लिंग-समस्या की अपेक्षा अधिकारों के विनिमय के प्रश्न पर केंद्रित है। स्त्रीकविता इसीलिए प्रभुत्व की भाषा के स्थान पर कर्म की भाषा का विकास कर रही है जिसमें पुरुषवर्चस्ववादी यौन चुटकियों से आक्रांत अभिव्यक्ति को किनारे करके अभी तक अनकहे शब्दरूपों का चयन करने की प्रवृत्ति सामने आ रही है। इस प्रतिभाषा के निर्माण से असली संस्कृति का इजाफा हो रहा है, इसमें दो राय नहीं। 

इस संदर्भ में कुछ कविताओं की चर्चा भी यहाँ अपेक्षित है। ‘थपक थपक दिल थपक थपक‘ (2003 ई., राजकमल प्रकाशन, 1-बी, नेताजी सुभाष मार्ग, नई दिल्ली-110 002) की कविताओं में गगन गिल का स्वर मनुष्यता की ही चिंताओं से अनुप्रेरित है। उन्होंने विषय और भावों से लेकर भाषा और लय तक के चयन में इस कृति के गीतों में नई ज़मीन तोड़ी है। इन रचनाओं की सहजता, वेगशीलता, लोक संस्कृति के प्रति प्रीति, गाँव और प्रकृति की उन्मुक्तता, जूझते रहने की ज़िद तथा जीवन की ऊष्मा हिंदी की स्त्रीकविता के तेवर को परिपुष्ट करने वाली हैं। इस कथन को प्रमाणित करने के लिए ‘निचुड़ा-निचुड़ा‘ को देखा जा सकता है:- 

‘‘निचुड़ा निचुड़ा दिल था री माँ! 
मैला मैला डर था री माँ! 
माथा टुकता काग था री माँ! 
नीला हो गया साँस था री माँ!
 xxx
सूँघा सोती को नाग ने री माँ! 
ले गया वो मेरा श्वास था री माँ!
xxx 
अटक गया मेरा प्राण था री माँ! 
घुमड़ रुकी हर बात भी री माँ!
xxx 
जलता जलता ज़हर था री माँ! 
ऐंठ मुड़ी मेरी आँत थी री माँ! 
जड़ उखड़ गया मेरा मन था री माँ! 
कुचला गया जो एक साँप था री माँ!‘‘ 

गगन गिल की स्त्री का यह निचुड़ा निचुड़ा दिल अपनी अनिवार्य नियति से वाक़िफ है लेकिन अब अकेले रास्ते पर वापस लौटना संभव नहीं। खोल से बाहर निकलते ही नोंचने वाले पंजों, नाखूनों और डंकों के अनुभव के बाद तो शेर के पेट में चलते चले जाना भी मानो आसान हो जाता हो: 

‘‘जाऊँ हूँ जी जाऊँ हूँ 
रस्ते अकेले पे 
लौटे बिना ही कहीं 
दूर चली जाऊँ हूँ 
चुप हूँ जी बहुत चुप 
चाबी फेंक ताले बंद 
सुख में है अपना जी 
भटका करे था बहुत 
बच गई जी बच गई 
किसी घने दुख से 
बच गई 
देखा भले न था 
खोल से गुपचुप बाहर 
उसमें भी नोंच दें थे 
पंजे, नाखून और डंक 
दुनिया बुनिया का क्या जी 
मैल थी, मलाल थी 
आरी चलाती जी पे 
जी का जंजाल थी 
जाऊँ हूँ जी जाऊँ हूँ 
बीहड़ निराले में 
शेर के पेट में ही 
बैठी दूर जाऊँ हूँ।‘‘ 

लोकप्रतीकों और लोककथाओं से अभिव्यक्ति का नया तेवर प्राप्त करती हुई स्त्रीकविता स्त्री के लिए मानव अधिकार का सवाल ज़ोर देकर उठाती है। ‘मैं चल तो दूँ‘ (2005 ई.,सुमन प्रकाशन, 6-1-103/85, अभिनव कालोनी, पद्माराव नगर, सिकंदराबाद -500 025) में संकलित कविता वाचक्नवी की कविताएँ भी इसकी पुरज़ोर गवाही देती हैं। इसमें संदेह नहीं कि कविता वाचक्नवी व्यापक मानवीय सरोकारों वाली कवयित्री हैं। उनके कविता संग्रह में रिश्तों के छीजते जाने की कसक है, प्रणय की सुखद अनुभूतियाँ हैं, एकाकीपन से उपजनेवाले अवसाद का दंश है, सामाजिक विसंगतियों का खुलासा है, उपभोक्तावाद और उत्तर आधुनिकता पर व्यंग्य है, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय राजनीति के मुद्दे हैं, युद्ध से उपजा असुरक्षाभाव और आक्रोश है और साथ ही हैं प्रकृति, परिवेश और घर के विविधवर्णी चित्र। लेकिन जो एक स्वर इन सबमें व्यापता है, वह है - स्त्रीजीवन की मर्मांतक वेदना का स्वर। ‘भूकंप‘ कविता का एक अंश यहाँ द्रष्टव्य है: 

‘‘तुम्हारे घरों की नींव 
मेरी बाँहों पर थी 
अपने घर के मान में 
सरो सामान में 
भूल गए तुम। 
मैं थोड़ा हिली 
तो लो भरभराकर गिर गए 
तुम्हारे घर। 
फटा तो हृदय 
मेरा ही।‘‘ 

कविता ने स्त्री की यातना को कई कोणों से चित्रित किया है। इस संदर्भ में उनकी एक छोटी कविता ‘उसी दिन से‘ इस प्रकार है - 

‘‘जिस दिन 
धुनिये ने 
सेमल की रुई तक को 
धुन डाला 
हवा उसी दिन से 
चिपकी जाती है 
मेरे होठों पर।‘‘ 

अपनी अभिव्यक्ति की खोज करती हुई स्त्रीकविता प्रणय के लिए भी नई भाषा ईजाद करती है - 

‘‘यह सच है, सखे! 
मेरी भाषा की गढ़न 
कविता नहीं लिख सकती, 
वाक् और अर्थ के नियंता 
सुधीजन 
चकला बेलन की चतुर्दिक परिधि में फैले आटे में 
बु़झी तीलियों से 
कविता लिखने के अपराध में 
दंडित भी करेंगे मुझे, 
बवाल भी करेंगे खूब 
पर 
तुम्हारी दाल भात छुई उँगलियाँ 
आटे में उकेरी कविता को बचा लें 
इसी विश्वास से भर 
मैं, तुम्हें 
अपने चौके में बिठा 
अपने हाथों से परोस 
लवण और शक्कर 
सब चखाना चाहती हूँ ....।
 xxx 
बचा सको 
आटे में चींटियाँ लगी कविता को 
तो दाल-भात छुआ अपना हाथ दो, सखे!‘‘
                                                  (व्रतबंध)

लोक और शास्त्र दोनों के प्रतीकों और प्रसंगों का अद्भुत जख़ीरा कविता वाचक्नवी के स्मृतिकोश में विद्यमान है। वे इस सबका उपयोग स्त्री के मानवाधिकार के संघर्ष की कविता रचने के लिए बखूबी करती हैं। ‘मैं चल तो दूँ‘, ‘जल समाधि‘, ‘उत्तरकांड‘, ‘कालपुरुष‘ और ‘गार्गी उवाच‘ में मिथकीय प्रसंगों का नया निर्वचन स्त्रीकविता के खास तेवर को उभारता है: 

‘‘ऋषि! 
तुम भले ही हाँक ले जाओ सब गाय 
और भले ही, तत्वदर्शी होने का 
अहं तुम्हारा 
रहे जीवित 
पर 
आकाश में गूँजते 
तरंगों में लहराते 
विद्युत से कौंधते 
मेरे प्रश्न तो सुनते जाओ। 
शास्त्रार्थ से तुम न दे सकोगे 
इनके उत्तर 
छूट जाएगा सारा दंभ। 
छोड़ दो गउएँ 
मूक प्राणी हैं ..... 
कुछ न कहेंगी 
हकाल ले जाओ भले, 
किंतु मैं 
रोकती हूँ तुम्हारा मार्ग, 
ठहरो .....!! 
प्रश्न तो सुनो, याज्ञवल्क्य!!!‘‘
                               (गार्गी उवाच)

इसी भाँति सविता सिंह के कविता संग्रह ‘नींद थी और रात थी‘ (2005 ई., राधाकृष्ण प्रकाशन, जी-17, जगतपुरी, दिल्ली-110 051) की कविताओं में भी स्त्रीपक्ष व्यापक मानवीय सरोकारों के साथ जुड़कर ही अभिव्यक्त हुआ है। इससे कवित्व को गरिमा मिली है तथा नारेबाजी के सतही मोह से मुक्ति भी। सविता सिंह की कविताएँ ज़ोर देकर स्त्री के सच होने की बात उठाती हैं: 

‘‘चारों तरफ़ नींद है 
प्यास है हर तरफ़ 
जागरण में भी 
उधर भी जिधर स्वप्न जाग रहे हैं 
जिधर समुद्र लहरा रहा है 
दूर तक देख सकते हैं 
समतल पथरीले मैदान हैं 
प्राचीनतम-सा लगता विश्व का एक हिस्सा 
और एक स्त्री है लाँघती हुई प्यास।‘‘
                                          (स्त्री सच है)

स्त्रीपक्षीय कविता देह की राजनीति को भी भलीभाँति समझती है और उसके पैंतरों को नाकामयाब करने पर कटिबद्ध है। ‘जैसे सौंदर्य में स्वायत्त स्त्रियाँ‘ में सविता सिंह आगाह करती हैं कि चमक कई तरह की होती है - आँख की, मन की, आत्मा की और देह की - ठीक उसी तरह जैसे भूख भी कई तरह की होती है - मन की, तन की और ज्ञान की। जो लोग चमक और भूख के सारे प्रकारों को जान लेते हैं वे मीठे जलवाले झरने के पास अपने स्वयं चुने रास्ते से पहुँचते हैं और जीवन की विरल अनंतता को जी पाते हैं और: 

‘‘वे खुश वैसी स्त्रियों की तरह होते हैं 
जो स्वायत्त होती हैं अपने सौंदर्य में।‘‘ 

और तब आता है वह मुकाम ‘जहाँ चट्टानें भाषा जानती हैं‘

‘‘मैं उन सुरम्य घाटियों से गुज़र रही हूँ 
जहाँ चट्टानें भाषा जानती हैं 
ठंड महसूस करती हैं 
सिहरन में इनके भी काँपते हैं होंठ 
हरी काली कहीं 
कहीं बदरंग भूरी 
रंगों के प्रति सजग फिर भी 
जिस्म की ठोस इच्छाओं से बंधी 
प्रकृति की हर आवाज़ को सुनती हैं ये चट्टानें 
एक-एक शब्द बचाती हैं अपने भीतर 
सारे आत्मीय स्पर्श लौटाने के लिए हमें 
मैं उन सुरम्य घाटियों से गुजर रही हूँ 
एक झरना जहाँ बह रहा है 
एक लाल चिड़िया जहाँ मेरा इंतजार कर रही है।‘‘ 

निश्चय ही इस मुकाम पर पहुँचकर कविता की भाषा में स्त्री का मानुषीकरण और प्रकृति का स्त्रीकरण एक दूसरे के पूरक हो जाते हैं।


स्त्रीपक्षीय कविता के तेवर 
'कविता का समकाल'
- ऋषभ देव शर्मा

गुरुवार, 25 अक्टूबर 2012

कविता का समकाल -5) लोकचेतना और अद्यतन हिंदी कविता



कविता का समकाल/ आलोचना/
ऋषभ देव शर्मा/2011/लेखनी/ नई दिल्ली - 110059/
500 
रुपये/ 140 पृष्ठ/
ISBN 9788192082745
लोक चेतना के संदर्भ में हिंदी की अद्यतन कविता की चर्चा करते समय यह स्मरणीय है कि कविता की सार्थकता की एक कसौटी ‘लोकसंग्रह‘ (आचार्य रामचंद्र शुक्ल) की कसौटी रही है जो उसकी समाजोन्मुखता अथवा समाजपराङ्मुखता का निर्धारण करती है। हिंदी कविता अपने उदयकाल से ही लोकधर्मी रही है, इसीलिए उसे ‘संस्कृत और अपभ्रंश के ह्रासशील रूढ़ साहित्य के गर्भ से उत्पन्न लोकशक्ति की नवीन आकांक्षा‘ (डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी) की अभिव्यक्ति के रूप में भी व्याख्यायित किया गया है। इसमें संदेह नहीं कि साहित्य और उसके नियमों की जड़ें वातावरण, परिस्थिति और समाज में होती हैं तथा अद्यतन हिंदी कविता भी इसका अपवाद नहीं है। उसकी जड़ें व्यापक हिंदी लोक से ही पोषण प्राप्त कर रही हैं। यह संभव है कि ऊपरी सतह पर यह लोक-प्रभाव साफ-साफ न दीख पड़ता हो, परंतु अंतःसलिला के रूप में उसकी निरंतर उपस्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता - वहाँ भी नहीं, जहाँ कविता अभिजन की अभिव्यक्ति प्रतीत होती है क्योंकि अभिव्यक्ति के उपकरणों का चुनाव तो हर हाल में उसे लोक से ही करना पड़ता है (अन्यथा संप्रेषण के सीमित और बाधित हो जाने का ख़तरा जो है)। इसमें संदेह नहीं कि लोक और कविता का संबंध मिट्टी और फूल के संबंध के समान है (डॉ. नामवर सिंह)। जिस प्रकार अपने मौलिक रंग-रूप-गंध के बावजूद फूल पूरी तरह मिट्टी पर निर्भर है उसी प्रकार कविता लोक पर। इस प्रकार कविता का लोकसचेतन होना उसकी अस्तित्वगत अनिवार्यता है जिसकी अभिव्यक्ति दो स्तरों पर खोजी जा सकती है। एक तो यह कि क्या कविता लोक और लोकमानस को उनके तत्वों के साथ आत्मसात करके अपनी सचेतनता का प्रमाण दे रही है और दूसरा यह कि लोकविरोधी शक्तियों के प्रतिरोध के लिए लोकशक्तियों के संग्रह की चेतना को पहचानने और व्यंजित करने में यह कविता सक्षम है या नहीं। इसी से अद्यतन कविता की लोकचेतना और समाजोन्मुखता को रेखांकित किया जा सकता है।


यदि परंपरा का विहंगावलोकन करें तो, जैसा कि डॉ. नामवर सिंह ने ‘इतिहास और आलोचना‘ में लक्षित किया है, हिंदी के आरंभिक नाराशंसी वीरकाव्यों और प्रेमगीतों पर राजस्थानी लोकवार्ताओं का गहरा प्रभाव रहा है। रासो काव्य में संस्कृत से अपभ्रंश काव्य तक की परंपरागत काव्यरूढ़ियों का भी प्रभाव दिखाई देता है परंतु इनमें जिन लोकप्रचलित किंवदंतियों का समावेश हुआ है वे अभिजात साहित्य और पुराणों की परंपरा से भिन्न हैं। प्रेमकाव्य को कभी सूफी तो कभी अद्वैत सिद्धांतों के साथ जोड़ने की मशक्कत में हम यह भूल जाते हैं कि हिंदी के प्रेमाख्यानों के मूल में अनेक लौकिक आख्यानों और लोकगीतों की प्रेरणा विद्यमान है और अनेक स्थलों पर तो वे लोकगीतों के संग्रह जैसे भी प्रतीत होते हैं। वास्तव में मौखिक लोकगीतों और प्रेमाख्यानों की पृष्ठभूमि से पोषण प्राप्त करके ही संत और भक्तिकाव्य के कबीर, सूर, तुलसी और जायसी जैसे उन्नायक ऐहिक लोकानुभवों को आध्यात्मिक और भक्तिपरक महिमा से मंडित कर सके। रीतिकाव्य का लक्ष्य श्रोता भले ही अभिजात वर्ग था तथापि लौकिक गार्हस्थिक जीवन के रसमय चित्रों ने ही उसे जीवंतता प्रदान की, अन्यथा शास्त्र ने उस काल में कवित्व का गला घोटने के लिए क्या क्या नहीं किया! इसके बाद उन्नीसवीं शती के राष्ट्रीय पुनर्जागरण को भी हम पंद्रहवीं शती के सांस्कृतिक पुनर्जागरण के साथ रखकर देख सकते हैं। इन दोनों ही अवसरों पर जागरण की परिणति शिष्ट और लोक के सान्निध्य के रूप में सामने आई। समाज में नीचे से ऊपर तक रागात्मक संबंध और सहभाव की धारा प्रवाहित होने लगी, जिसके परिणामस्वरूप संतों और भक्तों की भांति ही जागरण और सुधार काल के रचनाकार भी सौमनस्य के अमर गायक बनकर उभरे। कुलीनतंत्र द्वारा निर्मित विविध खाँचों को खंडित करके दोनों ही जागरण कालों की कविता ने मानवता की जो सरस धारा बहाई, वह भारतीय लोक चेतना की सहज अभिव्यक्ति ही थी। भारतेंदु युग से लेकर छायावाद युग तक के कवि भी संतों और भक्तों की भांति ही लोकदर्शी  रचनाकार थे तथा उनकी कविता सामान्य जन के हृदय को पूरी संवेदना के साथ उजागर करने में समर्थ थी। बहुजनस्पर्शी लोकचेतना और सहानुभूति  से संपन्न होने के कारण ही दोनों जागरण कालों की हिंदी कविता महान कृतियों की सर्जना कर सकी। वास्तव में वही युग महान कृतियों की सर्जना कर सकता है जो अदम्य जनसमूह की अजस्र लोकधारा के प्रति जागरूक रहता है। जिस युग में लोकधारा की उपेक्षा करके विदेशी सिद्धांतों, वादों और प्रभावों का आयात किया जाता है, उसकी जीवंतता सदा संदेह के घेरे में रहती है। हिंदी की आधुनिक कविता भी जब तक समाजवाद, मनोविश्लेषणवाद और अस्तित्ववाद का काव्यानुवाद भर करती रही, तब तक वह असंप्रेषणीय ही बनी रही, परंतु जब कवियों ने इन विचारों को आत्मसात करके भारतीय लोकचेतना के साथ इनका सामंजस्य स्थापित किया तथा सैद्धांतिक नामजप को छोड़कर लौकिक सहजसमाधि का मार्ग अपनाया, तो लोकचेतना का जादू विचारधाराओं के भी सिर पर चढ़कर बोलने लगा। यही कारण है कि बीसवीं शताब्दी की हिंदी कविता की छायावादोत्तर परंपरा में नागार्जुन, त्रिलोचन, मुक्तिबोध, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर, धूमिल, सर्वेश्वर और रघुवीर सहाय जैसे लोकसचेतन कवि महत्वपूर्ण स्थान के अधिकारी बन सके। अद्यतन हिंदी कविता इसी कवि-परंपरा की उत्तराधिकारिणी है तथा विभिन्न स्तरों और उपस्तरों पर लोकचेतना की अभिव्यक्ति द्वारा अपनी लोकप्राणता को प्रमाणित कर रही है।

हिंदी की आज की कविता अपने समय और समाज के वैविध्यों के अनुरूप अपने आपको ढालने में लगी है। इसका परिणाम अनेक परस्पर विरोधी प्रतीत होने वाली प्रवृत्तियों के रूप में देखा जा सकता है। एक ओर जहाँ उत्तर आधुनिक विमर्श के अलग अलग रंग इस कविता में दीख पड़ते हैं, वहीं परंपरा और पौराणिकता के प्रति प्रेम भी। विचारधाराओं के व्यामोह के टूटने से उत्पन्न निर्वात को भरने के लिए परिधि पर के जिन विमर्शों को केंद्रीय महत्व मिलता दीख रहा है, उनमें लोक-विमर्श भी है। समाज के असंतुलित आधुनिकीकरण और औद्योगिकीकरण तथा अब कथित भूमंडलीकरण के कारण लोक का उपेक्षित छूटना स्वाभाविक था। अब जब उसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं और मनुष्य की जीवनीशक्ति निरंतर दोहन से त्रस्त होकर छीजने लगी है, तब लोकधारा की ओर मुड़ना समय की आवश्यकता है, युगधर्म है। इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक वर्षों की हिंदी कविता का अवलोकन करने से पता चलता है कि वह इस युगधर्म के प्रति काफी सचेत है। उसे इस सत्य का आभास हो गया है कि आयातित विकास के पिछलग्गू बनकर हम स्मृतिहीनता के ऐसे गर्त में गिर सकते हैं जिसमें हमारी पहचान ही खो जाए। हमारी यह पहचान हमारी उन मातृभाषाओं में सुरक्षित है जिन्हें अंतरराष्ट्रीय बाजारवाद की भाषा निरंतर निगल रही है परंतु जिन्हें सामान्य जन अपने पिछड़ेपन के बावजूद बचाए हुए है -

‘‘पराई भाषा में खोजते थे
हम अपने होने के आशय
पारदर्शी किंतु स्मृतिहीन
हिंदी में थे और देश में
जैसे भौंचक परदेश  में
इस बार भी भाषा के सीमांत पर
दूर देहात में मिली वह कुंजड़िन
गाहक से करती ठिठोली
फिर परास्त हुआ वैयाकरण
और तरह पा गई एक पिछड़ी बोली 
(सवाई सिंह शेखावत, जीवन का दंश -  आठ, समकालीन भारतीय साहित्य, जनवरी-फरवरी, 2003, पृ. 50)।

लोकभाषा की इस शक्ति की व्याख्या इस रूप में भी की जा सकती है कि जब-जब साहित्य की भाषा जड़ीभूत होने लगती है, तब-तब उसे नवोन्मेष से भरने के लिए रचनाकार लोक से भाषिक उपादान ग्रहण करता है। देहात की कुंजडिन की तरह ही करघे पर कपड़ा बुनते हुए बुनकर से भी लोकशब्दावली और प्रयोजनवती अभिव्यक्ति ग्रहण करके आज का कवि अपनी अभिव्यंजना को टटकापन प्रदान करता है।  बुनकर, धागा, रेशा, करघा, रंग, कपड़ा और थान मिलकर रंगों के एक ऐसे मेले की रचना करते हैं जिसमें आकाश, बादल, परियों और बच्चों की उपस्थिति कविता, लोक और भाषा को एकमेक कर देती है -

‘‘धागे और बुनकर के बीच
पसरी  भाषा को ही
कहा जाता है कपड़ा।
धागे के रेशों में
बहती हुई ऊर्जा ही
प्रमाणित करती है
करघे का अस्तित्व
उसी का जादू
निरंतर बदलता रहता है करघे को
अगणित रंगों के असंख्य थानों में
जिन्हें पहन लेते हैं
गांव नगर घाटियां और पहाड़ जंगल
जैसे आकाश  ने
पहने हों सुबह शाम के बादल धुपहले कत्थई सुर्मई रेशमी आभा वाले
धागे के रेशों के गांव में
जुड़ता है रंगों का मेला
दौडे चले आते हैं सभी मेले में
परियों की दुनिया में दौड़ते हैं जैसे बच्चे सपनों में।‘‘ 
(देवराज/धागा: पांच अनुभव/समकालीन भारतीय साहित्य, जनवरी-फरवरी, 2003/पृ.66)।

आधुनिक मनुष्य जब कभी अपनी पहचान खोजने निकलता है तो उसे ‘अपनी खबर‘ इस लोक में ही मिलती है - कभी पेड़, तो कभी पात्र, या नाव, या पहिये के रूप में -

‘‘पर वैशाली में मैं आम का एक पेड़ था
श्रावस्ती में शायद एक भिक्षु का भिक्षापात्र
वाराणसी में एक नाव हो सकता था मैं,
अगर मेरे बढ़ई ने मुझे छीलछाल कर
एक पहिया न बना दिया होता। 
(केदारनाथ सिंह/अपनी खबर/समकालीन भारतीय साहित्य/ नवंबर-दिसंबर, 2002/पृ. 87. उद्धृत - परमानंद श्रीवास्तव)।

यह पहचान मिलते ही लोक के उत्सव और संस्कार अर्थवान हो उठते हैं और उनसे जुड़ने पर ही परिपूर्णता का अहसास हो पाता है। यही कारण है कि कविता लोकोत्सवों में पूरे मन से सम्मिलित हो रही है -

‘‘धान की बालियों वाली झालर
मैंने लटकाई
दरवाजे की चौखट पर
और गृहप्रवेश से पहले
न्योता भेजा चिडियों को विधिवत। 
(सतीश जायसवाल /गृहप्रवेश /समकालीन भारतीय साहित्य/ जनवरी-फरवरी, 2003/पृ. 53)।

लोक के जुड़ाव से जीवन की समझ पैदा होती है और कविता की भाषा में लोकानुभव से उपजे कथन स्थान लेते दिखाई देते हैं -
‘‘कटाई का समय सिर पर खड़ा है
फसल अब खेत में क्या बो रहे हैं
सुना है आप हैं बेदाग अब तक
तो दामन फिर भला क्यों धो रहे हैं।‘‘ 
(सरवत जमाल/तीन गज़लें/अभिनव कदम, मई-अक्तूबर, 2001/पृ. 212)।

इस लोकानुभव का एक पक्ष लोककथाओं द्वारा भी पुष्ट होता है। अद्यतन कविता अपने पाठक को संबोधित करने के लिए विदेशी  कथानायकों और आयातित प्रतीकों का इस्तेमाल नहीं करती, बल्कि लोककथाओं के उन पात्रों और कथास्थितियों का सहारा लेती है जिनके प्रतीकार्थ हिंदी जाति के सामूहिक अचेतन में आदिबिंबों की तरह सुरक्षित हैं। लोकचेतना के जागरण के लिए इन आदिबिंबों का प्रयोग आज की काव्यभाषा को अद्भुत प्रभाविष्णुता तथा मारकता से मंडित करता है -

‘‘बेटों के बेटे, नाती-पोते बड़े हो गए
तो पता चला-
यही मेरा राजा
यही राजा का घर
यही उसकी चोंच, यही उसका पर
यहीं सब कुछ तय होता
संदर्भित व्यक्ति रहता
इतनी बकबक के बाद
राजा ने पोल खोल दी
पिंज़रे में बंद तोते ने गरदन सिकोड़ी
पंख समेटा, ठोर चलाया
राजा की जान इसी में है
बाकी है गरदन मरोड़ना।‘‘ 
(वीरेंद्र सारंग/अब पता चलता है/अभिनव कदम/मई- अक्तूबर, 2001/पृ. 194)।

लोकचेतना को झकझोरने और जगाने के लिए आज की कविता लोकधारा के प्रवाह में आए व्याघात की भी जोर देकर चर्चा करती है तथा कल और आज की तुलना करके विरोधी समांतरता की सृष्टि करती है।  इससे पाठक भावमग्न होने के स्थान पर बेचैन और चिंतित होता है जिससे वर्तमान की विसंगतियों के प्रति उसका असंतोष क्रमशः व्यंग्य और आक्रोश  के रूप में अभिव्यक्त होने लगता है -

‘‘उजड़ते जा  रहे हैं मेले
 यहाँ पिपहिरी की आवाज
नहीं सुनाई पड़ती
बजते नहीं ढोल और मजीरे
नट नहीं दिखाते
अपने खेल
जादूगर दिल्ली की तरफ
चले गए हैं  x x x
जिन मेलों को देखते हुए
मैं बड़ा हुआ
वहाँ स्त्रियों के बिकने की
सूचना है।‘‘ 
(स्वप्निल श्रीवास्तव/मेले/अभिवन कदम/ मई- अक्तूबर, 2001/पृ. 70-71)।

मेलों में स्त्रियों के बिकने की सूचना यदि लोक की दुर्दशा  का संकेत करती है, तो सदा मर्यादित रहे मिट्टी के चूल्हे की आग की मर्यादा लाँघने की तत्परता इस दुर्दशा  के प्रतिकार के संकल्प को रूपायित करती है -
‘‘माँ मिट्टी के चूल्हे को लीप-पोतकर रोज सुबह
उसमें लकड़ियाँ डाल आग जलाती थी
भोजन पकता था और हम सभी तृप्त होते थे
उसके भीतर भी तो एक आग ही धधका करती थी
और बाहर हवन का सामान रहता था ......
फिर हम इसे अनहोनी कैसे कह सकते हैं
कि एक दिन वह पूरी की पूरी सुलग उठी।
ऐसे में तो कोई भी अपनी
मर्यादा लाँघ सकता है न?‘‘ 
(संध्या गुप्ता/जब तक न लगाओ/समकालीन भारतीय साहित्य (104)/नवंबर- दिसंबर, 2002/पृ. 34)।

चूल्हा केवल आग जलाने और रोटी पकाने भर का स्थान नहीं, बल्कि लोक संस्कृति का एक प्राणवंत तत्व है। उसके साथ पूस की रातों की वे स्मृतियाँ जुड़ी हैं जिनका संबंध घर-परिवार के तमाम रिश्ते-नातों की सहज अंतरंगता से है। हमारा दुर्भाग्य है कि आधुनिक सभ्यता ने हमें चौके-चूल्हे की उस सौंधी गंध से वंचित कर दिया है -

‘‘पूस की रात
चूल्हे को घेरे बैठी
ननदें-देवर-सास
और चूड़ियों की खनखनाहट सान
मकई की रोटी सेकती
चौके की वो ठिठोली गंध कहाँ गई?‘‘ 
(वीरेन नंदा/कहाँ गई/कब करोगी प्रारंभ (पुरुष काव्य पुस्तिका)/पृ. 75)।

आत्मीय संबंधों की गंध के लुप्त होते ही लोक को भी आतंक ने अपने घेरे में ले लिया है। जिस युग में बच्चे की नींद और सपने भी भय और हिंसा से लथपथ हों, उसमें भला लोक स्वस्थ कैसे रह सकता है -

‘‘बच्चे की नींद और
सपनों के बारे में सोचती हुई
दहशतजदा हैं -
खिड़कियाँ, छत और दीवारें
मंदिर, गुरुद्वारे और मीनारें
न जाने कब
राख का ढेर हो जाएँ।
भाषा से किताब तक की जद्दोजहद
समझने लगा है बच्चा।‘‘ 
(मीठेश  निर्मोही /बच्चा/समकालीन भारतीय साहित्य/जनवरी-फरवरी, 2003/    पृ. 57)।

लोकजीवन को अपनी कुंडली  में समेटनेवाले इस भय, हिंसा और आतंक के अजगर को कविता न पहचानती हो, ऐसा नहीं है। उसे मालूम है कि लोग किसके डर से तालाब में नहाने नहीं जाते। उसे यह भी अहसास है कि धनबल और भुजबल द्वारा निरंतर जनबल के दमन के कारण संघर्षषीलता के ईमानदार संस्कार के क्षरण की भी पूरी संभावना है -

‘‘जब से पटवारी ने
पट्टा कर दिया है रामखेलावन सिंह के नाम
तालाब! बिना छिनगाये बाँसों से
भरा है तालाब। आदमी यूँ भी
नहाने नहीं जाते
उलझ जाने के डर से
x x x 
तालाब महसूसने लगा है
अगर इसी तरह मुट्ठी में बंद रहा
उसका अस्तित्व
आनेवाली पीढ़ियाँ
नहीं सीखेंगी तैरना
पानी से डरेंगी।‘‘ 
(जिलेदार सिंह /पानी/कृति ओर/अक्तूबर- दिसंबर, 2001/ पृ. 10)।

लोकचेतना का आधार सामूहिकता के संस्कार से निर्मित होता है। राजनीतिक कुचक्र ने इसकी जड़ों को काट डाला है जिससे सामूहिकता की मूलभूत इकाई के रूप में सदियों से स्वीकृत घर नष्ट हो गया है।  बेघरबार बच्चे दंगाइयों का डर झेलते हुए बड़े हो रहे हैं। उनकी समझ में नहीं आता कि घरेलू अपनेपन से भरे-पूरे इस पर्वत-लोक में आकाश  में उड़ती पतंगों, चिड़ियों और तितलियों तक को आतंकित करने के लिए वृक्षों में विषबुझे तीर किसने मारे हैं-

‘‘मैं आधा जलकर बच गया, लेकिन मेरा घर पूरा जलकर हो गया राख
अभी भी मैं डर के मारे आँखें बंद कर लेता हूँ
मुझे नींद नहीं आती
नींद में भी मैं डर से चिल्लाने लगता हूँ।
किसने बिछाया बारूद इन पहाड़ों में
यहाँ मेरी पतंगे उड़ती थीं
किसने मारे विषबुझे तीर इन वृक्षों में
यहाँ मेरे पक्षी रहते थे
जिन रास्तों पर मैं दौड़ता था,
जो ढंक गए थे घास के गुलाबी फूलों से
तितलियाँ नहीं
अब वहाँ राख उड़ती है
किसने मारे विषबुझे तीर इन वृक्षों में
यहाँ मेरे पक्षी रहते थे
जिन रास्तों पर मैं दौड़ता था,
जो ढंक गए थे घास के गुलाबी फूलों से
तितलियाँ नहीं
अब वहाँ राख उड़ती है।‘‘ 
(एकांत श्रीवास्तव/कैंप में बच्च: दो (मोहम्मद यासीन, उम्र 8 वर्ष)/वागर्थ, नमंबर-दिसंबर, 2002/पृ. 74)।

ये विषबुझे तीर जिन्होंने पेड़, पहाड़ और घर-सब कुछ को जलाकर राख कर दिया है, सांप्रदायिकता में बुझी राजनीति के तीर हैं।  अद्यतन कविता लोकगीत के लयपूर्ण रचना साँचे का सहारा लेकर लोकचेतना के उस रूप को अभिव्यक्त करने का भी प्रयास कर रही है जो मंदिर-मस्जिद की इस संप्रदायवादी राजनीति के हिंसक चेहरे के उघड़ जाने की प्रतिक्रिया के रूप में प्रकट हो रही है। कवि लोकजीवन के उन बुनियादी रिश्तों  की याद दिलाता है जिन पर इस पुंश्चली राजनीति ने आघात किया है और लोक के रागात्मक संबंधसूत्रों को छिन्नभिन्न करने का अमानुषिक कृत्य किया है -

‘‘अगल भी चिनना बगल भी चिनना
उस माँ को लेना संभाल
जिसका लाल कटा दंगे में

अगल भी चिनना  बगल भी चिनना
उस बहू का करना ख्याल
जिसका कंत मरा दंगे में

अगल भी चिनना बगल भी चिनना
उस बाल को लेना पाल
जिसकी माँ न बाप बचा दंगे में

अगल भी चिनना बगल भी चिनना
नहीं मन साफ तो कुछ नहीं माफ
चाहे जितने मंदिर लो चिनवा।‘‘ 
(अनूप सेठी/ रामशिला की प्रार्थना/वागर्थ/नवंबर-दिसंबर, 2002/पृ. 77)।

आज की लोक-सचेतन कविता अपने पाठकों की मानसिकता को लोकचेतना के संस्कार से संबलित  करना चाहती है।  इसके लिए वह घर, रिश्ते-नातों और आपसी सद्भाव की ओर ध्यान आकर्षित करती है क्योंकि ये ही वे शक्तियाँ हैं जो विकट विपरीत झंझावात के बीच सहज मानवीय रागात्मकता रूपी लोक के प्राण की रक्षा करने में समर्थ हैं -

‘‘घर अडिग विश्वास
निश्छल स्नेह है घर
दादियों और नानियों की आँख में
तैरते सपने हमारे घर

घर पिता का है पसीना
घर बहन की राखियाँ हैं
भाइयों की बाँह पर ये घर खड़े हैं,
पत्नियों की मांग में ये घर जड़े हैं

आपसी सद्भाव माँ की
मुट्ठियों में
घर कसे हैं,

क्यों भला अचरज
कि अब तक
घर बसे हैं
घर बचे हैं।‘‘ 
(ऋषभदेव शर्मा/घर बसे हैं/गंध/मार्च 2002/पृ. 45)।

इसमें संदेह नहीं कि बाजार की ताकतें आज पूरी दुनिया को तेजी से मंड़ी में तब्दील करने पर उतारू हैं, पर कवि भी हार मानने को तैयार नहीं। वह प्रेम के बल पर इस बाजार से होड़ लेने को सन्नद्ध है। इस संबंध में अपनी रणनीति का खुलासा वह प्रेमिका के नाम प्रेमपत्र में इस प्रकार करता है -
‘‘तेजी से मंडी बदलती हुई दुनिया में
बिकने से पेशतर
एक गोदनहारू बुलाऊँगा 
माथे पर, बाजू पर, छाती पर
तुम्हारे नाम का गोदना 
गोदवा लूँगा।‘‘ 
(सदानंद शाही/ प्रेमपत्र/अभिनव कदम/मई-अक्तूबर, 2001/ पृ. 229)।

इस रणनीति के तहत कविता को सीधे सीधे लोक से जुड़ना होगा तथा उसी की अभिव्यक्ति प्रणाली के सहज स्वाभाविक उपकरण ग्रहण करने होंगे जिनका संबंध लोक के खेती और मजदूरी जैसे दैनंदिन जीवनक्रम से हो।  लोक के सामूहिकता और समरसता जैसे मूल्यों को आत्मसात् करने पर ही यह संभव है कि सद्भाव और सहानुभूति की छाँह और गंध के सहारे युग की तपन और घृणा पर विजय प्राप्त की जा सके -

‘‘पीर के कुछ बीज
जिस दिन बो दिए
अंतःकरण में
थी उसी दिन से प्रतीक्षा
एक दिन अंकुर उगेंगे
x x x
चाहती हूँ
किसी का ताप हर लें
तपन हर लें
छाँह दें
विश्राम दें
दें गंध अपनी
और ऊँचे उठ
सभी ये।‘‘ 
(कविता वाचक्नवी/ पीर के कुछ बीज/गंध, मार्च, 2002/   पृ. 42-43)।

लोकमंगल की यह कामना कवि और कविता को उसकी अपनी जड़ों से जोड़ती है, मिट्टी की पहचान कराती है-

‘‘मिट्टी से दोस्ती
पुरानी कहानी
हम उतने पुराने
जितनी मिट्टी।‘‘ 
(नरेंद्र जैन/मिट्टी में चेहरे/वागर्थ/नवंबर- दिसंबर, 2002/ पृ. 69)।

यह मिट्टी प्रतीक है उस संस्कार का जो हमारी चेतना को लोक से प्राप्त होता है-

‘‘माटी ने जो दिया है
लेप की तरह है
रंग की तरह है
पक्के संग की तरह है
 x x x
मेरी माटी ने मुझे पैदा किया
पैदा किए मुझमें ऐसे संस्कार
जो बार बार करते मुझे तैयार।‘‘ 
(सुदर्शन वशिष्ठ /मेरी माटी/समकालीन भारतीय साहित्य (104)/नवंबर- दिसंबर, 2002/पृ. 42)।

मिट्टी से पहचान स्थापित हो जाने पर मनुष्य अपने चारों ओर विद्यमान लोक परिवेश की महत्ता और महिमा से परिचित होता है जिससे उसकी लोक चेतना पुंजीभूत होती है। इस पुंजीभूत लोकचेतना की व्याप्ति पिंड और ब्रह्मांड में एक साथ रूपांतरण का हेतु बनती है और आज का कवि भी स्वयं को लोकचेता ऋषियों की परंपरा में सम्मिलित करके प्रार्थना में लीन हो जाता है -

‘‘पर्वत! देना मुझे अपना सा धैर्य
सिखाना अपना धर्म
चमकें चाहे लाख बिजलियाँ
अपनी सी दमक देना
मैं जाऊँ चाहे मैदान
चाहे समंदर किनारे
अपना-सा घर देना
देना मुझे गुफा-सा गांभीर्य
चोटी-सी ऊँचाई देना
चट्टान-सा बल देना
मुझे कस्तूरी से भर देना।‘‘ 
(सुदर्शन वशिष्ठ /मेरे पर्वत/समकालीन भारतीय साहित्य (104)/नवंबर-दिसंबर, 2002/पृ. 41)।

प्रार्थना धीरे-धीरे संकल्प में बदलती है और लोक चेतना के जागरण को अभिव्यक्ति की सतेज भंगिमा प्राप्त होती है -

‘‘हम सूरज को
अपने लाल तवे के ऊपर
पकता हुआ देखना चाहते हैं
सूरज: नहीं है किसी की बपौती
हर बस्ती की उम्मीद है वह
गोया हर हाथ की रोटी।‘‘ 
(गोविंद प्रसाद/ सूरज/अभिनव कदम/मई-अक्तूबर, 2001/ पृ. 234)

ऐसी स्थिति में लोक के सामूहिक अचेतन में बसा कल्पवृक्ष का आदिबिंब एक बार फिर कवि के आंगन में फूट पड़ता है जिसे प्रकट करती है सारे लौकिक-अलौकिक संबंधों की गंगोत्री माँ, क्योंकि वही तो मनुष्य को लोक के सद्भाव पर विचारने की मंगलमयी प्रेरणा देती है-

‘‘एक बार फिर से
प्राणियों के सद्भाव पर सोच कर तो देखो प्रेमशंकर 
मैं अपने अंचल में सहेजे
अदृश्य कल्पवृक्ष को
तुम्हारे आंगन में प्रकट कर दूँगी।‘‘ 
(प्रेमशंकर रघुवंशी /कल्पवृक्ष/समकालीन भारतीय साहित्य (104)/नवंबर-दिसंबर, 2002/पृ. 40)।

लोकमंगल के वरण की इस शुभकामना में लोक के अमंगल का निषेध भी निहित है। कविता में लोकचेतना की अभिव्यक्ति को यदि मंगलभवन अमंगलहारी बनना है तो ग्रहण और त्याग का यह विवेक अनिवार्य है। अद्यतन/समकालीन कविता रागात्मकता के जिस धागे से अपने अस्तित्व को बुन रही है, वह धागा अपनी दुनिया से लोकविरोधी और युद्धजीवी तत्वों को निष्कासित करता है-

‘‘धागा
उन्हें भी नहीं बनाना चाहता नागरिक
अपनी दुनिया का
जो शांति के लिए
जरूरी मानते हों विचारों की हत्या
चिडियों से छीनते हों घोंसले
जंगलों से हँसी
नदियों से पानी के साथ जुड़ा मादक प्रेम
बच्चों से किलकारियाँ
और घरौंदे बनाने की आजादी।
 (देवराज/धागा: पांच अनुभव/समकालीन भारतीय साहित्य /जनवरी-फरवरी, 2003/पृ. 67-68)।

यदि शब्दों के धागे की यह सदिच्छा पूरी होगी तो लोक भी बचेगा और लोकचेतना भी सुरक्षित रहेगी। अपसंस्कृति के आक्रमणों के बीच हम अपनी पहचान को लोकमंगल की इसी साधना के बल पर बनाए रख सकते हैं।

गुरुवार, 9 अगस्त 2012

(कविता का समकाल - 4) समकालीन कविता की जनपदीय चेतना


 समकालीन कविता की जनपदीय चेतना

कविता का समकाल/ आलोचना/
ऋषभ देव शर्मा/2011/
लेखनी/ नई दिल्ली - 110059/
500
रुपये/ 140 पृष्ठ/
ISBN 9788192082745


‘जनपद‘ शब्द को जहाँ प्राचीन भारत में राज्य व्यवस्था की एक इकाई के अर्थ में प्रयुक्त किया जाता था और आजकल उत्तर प्रदेश में ‘जिले‘ के अर्थ में व्यवहृत किया जाता है, वहीं आंध्र प्रदेश में इसका ‘लोक‘ के व्यापक अर्थ में इस्तेमाल होता है। हिंदी कविता में ‘जनपद‘ की चर्चा इन संदर्भों के अलावा कभी किसी क्षेत्र विशेष और कभी किसी अंचल विशेष के रूप में भी पाई जाती है। कुछ पत्रिकाओं ने ऐसे कविता विशेषांक भी प्रकाशित किए हैं जो क्षेत्र विशेष, अंचल विशेष, जिला विशेष या प्रांत विशेष की रचनाधर्मिता को एकांततः समर्पित हैं।
               
‘जनपद‘ से आगे बढ़कर जब ‘जनपदीय चेतना‘ की चर्चा की जाए तो यह सोचना पड़ेगा कि क्या उसे जनपद की भौगोलिक सीमा तक संकीर्ण बनाया जाना चाहिए, अथवा इस शब्दयुग्म को किसी विशिष्ट पारिभाषिक अर्थ से मंडित करना होगा? यदि जनपदीय चेतना को किसी भौगोलिक सीमा से आवृत्त किया जाएगा तो निश्चय ही एक भारतीय चेतना के भीतर पचीसों क्षेत्रीय चेतनाएँ या सैंकड़ों आंचलिक चेतनाएँ जनपदीय चेतना के नाम पर सिर उठाती दिखाई देंगी। विखंडनवादी उत्तरआधुनिकता को यह स्थिति भले ही प्रिय हो, साहित्य के अध्ययन विश्लेषण के लिए इसे काम्य प्रवृत्ति नहीं माना जा सकता - और न ही जनपदीय चेतना का यह अर्थ होना भी चाहिए।
                
जनपदीय चेतना का काम्य अर्थ शक्ति और सत्ता के केंद्रों से परे उस भारतीय जन की जागरूकता में निहित है जो महानगरीय बोध के प्रदूषण से अछूता अभी तक अपनी सांस्कृतिक जड़ों से रस ग्रहण करता हैं। जनपदीय चेतना की अवधारणा को आभिजात्य चेतना की विरोधी समांतरता में उभरते देखा जा सकता है। आभिजात्य चेतना विशिष्टतावाद का पोषण करती है जिसके विपरीत जनपदीय चेतना कथित भदेसपन के वरण से भी परहेज नहीं करती। समकालीन कविता के संदर्भ में जनपदीय चेतना का वैशिष्ट्य आभिजात्य चेतना की प्रतिचेतना के रूप में रेखांकित किया जाना प्रासंगिक है। यह चेतना कहीं से अचानक फूट पड़ी हो, ऐसा कतई नहीं है। बल्कि नई कविता अथवा उससे भी पहले की कविता के काल से यह एक सूक्ष्म अंतर्धारा के रूप में प्रवाहित होती आई है। जैसे जैसे नई कविता का आभिजात्यवादी तिलिस्म टूटता है, वैसे वैसे समकालीन कविता में जनपदीय चेतना की धारा क्रमश: स्पष्ट और प्रखर होती जाती है। ‘स्थानिकता‘ से बंधे रहकर नहीं, बल्कि उसका अतिक्रमण करके ही श्रेष्ठ कविता संभव होती है। जनपदीय चेतना से संपन्न कविता के समक्ष यह चुनौती स्वाभाविक है कि वह ‘जनपद‘ को अपने आप पर झेले भी, अपने आप में समोए भी; और उसके पार जाकर व्यापक ‘लोक‘ से जुड़ जाए। कविता में जनपदीय चेतना के उभार को राजनीति में क्षेत्रीय भावनाओं के उभार तथा समाज में लंबे समय तक हाशिए पर रहे वर्गों के उभार के साथ जोड़कर भी देखा जा सकता है। उपेक्षित पड़ी अस्मिताएँ इस उभार के माध्यम से स्वयं को रेखांकित करती दिखाई देती है।
                
जनपदीय चेतना को समकालीन कवियों ने लोकजीवन के दैनिक संघर्ष के रूप में आत्मसात किया है और उस संघर्ष को अभिव्यक्त करने के लिए भाषाई आभिजात्य को सचेतन रूप में खंडित किया है। काव्यभाषा में जनपद की उपस्थिति आकस्मिक नहीं, बल्कि सुचिंतित है जो महानगरीय बोध को मुँह चिढ़ाती है। चूल्हा, पतीली, बाल्टी, चौका, सोहर, गोबर, बघार, डाँगर, हँसिया, भैंसा, बैल, बकरी, कुल्हड़, पत्तल और बीड़ी से लेकर छुआछुई, चोरसिपाही और राजारानी तक ऐसे शब्दों का चयन इस चेतना से संपन्न कविता में हुआ है जिनके माध्यम से काव्यनायक के रूप में आम भारतीय चेहरा उभर कर सामने आता है और कविता के लगाव के सही बिंदु पकड़ में आ पाते हैं। लोकचेतन कविता के लगाव के ये बिंदु लोक के उस दैनिक संघर्ष के बिंदु है जिसके तहत -

‘‘औरत
गवें-गवें उठती है-गगरी में
हाथ डालती है
फिर एक पोटली खोलती है
उसे कठवत में झाड़ती है
लेकिन कठवत का पेट भरता ही नहीं।
पतरमुँही सरर-फरर बोलती है और बोलती रहती है
बच्चे आँगन में
आँगड़-बाँगड़ खेलते हैं
घोड़ा-हाथी खेलते हैं
चोर-साव खेलते हैं
राजा-रानी खेलते हैं और खेलते रहते हैं।‘‘ 

(धूमिल: किस्सा जनतंत्र)।

ये औरतें और बच्चे उस चेतना के वाहक हैं जो महानगरीय आपाधापी से भरी कृत्रिम जिंदगी और उसकी कविता में खोजे भी नहीं मिलती। वास्तविक जीवन के संस्पर्श की ऊष्मा उस हताशा को काटती है जिसका प्रचार लंबे समय से शहरी आधुनिकता कुंठा और मृत्युबोध के नाम पर करती रही है। मृत्युबोध की ओढ़ी हुई मानसिकता को काटने के लिए कविता में जनपद, अथवा अधिक व्यापक शब्दों में कहें तो लोक, का होना अनिवार्य है। कविता और संस्कृति - दोनों ही - को यदि जड़ता और मृत्यु से बचना है तो उधार की विचारधाराओं का मोह छोड़कर लोक की जीवनीशक्ति को पहचानना और उससे जुड़ना बेहद ज़रूरी है। ऐसी लोक-सजग कविता के प्रति समकालीन कवियों ने अपने रुझान को अलग-अलग रूपों में व्यंजित किया है। जहाँ अवधारणात्मक कविताओं की बहुलता के कारण हिंदी कविता की काव्यात्मकता में चिंतनीय स्तर तक कमी आई, वहीं जिन कवियों ने अवधारणा का उल्था करने के बजाय भारतीय देहातों और कस्बों की जीवनशैली को नजदीक से देखकर और झेलकर परिचित संदर्भों का सहारा लिया, उनकी कविता सादगी और काव्यात्मकता से एक साथ भरकर चमक उठी है। खिड़की, रोशनी, राखी, मनीआर्डर और चिट्ठी के मर्मस्पर्शी संदर्भों से जुड़कर आर्थिक तंगी और विपन्नता का बोध गहन हो उठता है और लोकचेतना के ये तत्व वर्गचेतना के सहज उभार को संप्रेषित करने लगते हैं -
‘‘जिन घरों में खिड़कियाँ नहीं होतीं
वहाँ के बच्चों को रोशनी की प्रतीक्षा-
कुछ इस तरह से होती है
जिस तरह राखी के कुछ दिनों के बाद
घर के सामने से
पोस्टमैन के गुजर जाने के बाद
माँ पहले पोस्टमैन को कोसती है
बाद में रसोई में जाकर
अपने भाई की मजबूरी को समझकर
बहुत रोती है।‘‘
(कुमार विकल: खिड़कियाँ)।               
आभिजात्य सौंदर्यबोध प्रकृति को विलासिता की दृष्टि से देखता है और उसके इस हद तक दोहन में विश्वास रखता है कि प्रकृति का स्थान विकृति ले ले। यही कारण है कि आभिजात्यवादी कविता एक सीमा के बाद केवल विद्रूप और अवसाद की कविता बनकर रह जाती है। प्रकृति का सौंदर्य और उल्लास एकरसता को ही अपना जीवन बना चुके नगरीय व्यक्ति को रास भी नहीं आता। परंतु तमाम असुविधाअें के बीच जीता हुआ जनपद स्वभाव से उत्सवधर्मी है। उसकी इस उत्सवधर्मिता का अतिक्रमण पिछले दशकों में नगरों ने बड़ी तेजी से किया है और गाँव, कस्बे तथा छोटे शहर तेजी से उस ज़हर की ज़द में आते जा रहे हैं जो विद्रूप, अवसाद और परिणामतः मृत्यु का संचार करने वाली उपभोक्ता संस्कृति की देन है। इसी का असर है कि युगों से मौसम के आसरे खेती करने वाला भारतीय किसान आज चरम हताशा और आत्महत्या के दौर से गुज़र रहा है। लोक-सजग कविता इस खतरे से सदा से परिचित रही है और इसीलिए उसने जनपदीय चेतना के ऊर्जास्रोतों को बार-बार रेखांकित किया है। जीवन संघर्ष की प्रेरणा सदा से इस देहाती जन को प्रकृति के सौंदर्य और उल्लास से मिलती रही है। कविता इस उल्लास और उत्सवी मानसिकता को बचाकर रखना चाहती है ताकि लोक आत्महत्या को मजबूर न हो। जनपदीय चेतना प्रकृति के दोहन में नहीं, बल्कि उसके साथ जीने में विश्वास रखती है -
‘‘वह एक अद्भुत दृश्य था
मेह बरसकर खुल चुका था
खेत जुतने को तैयार थे
एक टूटा हुआ हल मेड़ पर पड़ा था
और एक चिड़िया बार-बार, बार-बार
उसे अपनी चोंच से
उठाने की कोशीश कर रही थी
मैंने देखा
और मैं लौट आया
क्योंकि मुझे लगा वहाँ होना
जन हित के उस काम में
दखल देना होता।‘‘
(केदारनाथ सिंह: जनहित का काम)।              
जनपदीय चेतना से संपन्न कवि प्रकृति और जीवन को अलग-अलग करके न तो ग्रहण करता है, और न अभिव्यक्त। उसके लिए तो प्रकृति और जीवन के अद्वैत में से ही प्रेम और जिजीविषा के स्रोत फूट पड़ते हैं। वह मनुष्य को यौन वर्जनाओं के पुंज के रूप में नहीं वरन सहज प्रकृत आनंद की संभावनाओं के रूप में चित्रित करता है -
‘‘देखता हूँ मैं: स्वयंवर हो रहा है
प्रकृति का अनुराण अंचल हिल रहा है
इस विजन में,
दूर व्यापारिक नगर से
प्रेम की प्रियभूमि उपजाऊ अधिक है।‘‘
(केदारनाथ अग्रवाल: चंद्रगहना से लौटती बेर)।
इस प्रेम की उपजाऊ भूमि में, वातानुकूलित कक्षों में बैठकर, मौसम को झुठलाने के बजाय कवि उसे अपने आप पर झेलता है। उत्तर प्रदेश के मैदानी भागों का जनपद-सचेतन कवि अरहर की यौवनोन्मादित पत्तियों के साथ आइस-पाइस खेलती ज्योत्स्ना के उल्लास में शामिल होकर ताली बजाता है। शिवालिक की पहाड़ियों को अपने भीतर जीने वाला कवि चीड़वन की ढोलक पर हिमालय को रिझाने के लिए रंग भरे लोकगीतों की तान छेड़ता है। उधर मध्यप्रदेश का बस्तर जनपद जब उसकी कविता में धड़कता है तो भीलों की तान से जंगल-भर झूम उठता है जिसका भरपूर साथ वनपाखी नाच-नाच कर देते हैं। वे पर्वतीय जनपद भी कवि को झिंझोड़ते हैं जहाँ एक ओर तो बड़े-बड़े बांध बनाने का विरोध करने वाली जनता पर व्यवस्था गोलियाँ बरसा रही है और दूसरी ओर -


           ‘‘कुछ लोग
     बाढ़ में गले-गले डूब
     रस्सियों के सहारे
     छप्परों को हवा में उछाले रखने की
     कोशिश कर रहे हैं
और बूढ़ी महिलाएँ
और गर्भवती स्त्रियाँ
और दूध पीते बच्चे
हाड़ उभरी भैंसों की पीठ पर
और पेड़ों की टहनियों पर
पूरी ताकत से
छिपकली से चिपके
डूबते-उतराते
दहाड़ मारती जलराशि के साथ
समुद्र की ओर जा रहे हैं।‘‘
(देवराज: चिनार)।              
इस तमाम विनाशलीला के लिए उपभोक्तावादी आभिजात्य चेतना का मायावी प्रसार जिम्मेदार है जिसने हमारे समय को हिंसा और असंवेदनशीलता से भर दिया है। जनपद का आज का नागरिक भी इस हिंसा और असंवेदनशीलता से बचा नहीं है। इसके विपरीत तेजी से वह भी शहरी खलनायक में तब्दील होता जा रहा है। ऐसे में कवि का मूल जनपदीय संस्कार उसे इस प्रवृत्ति पर प्रहार करने को प्रेरित करता है और वह पुनः संवेदनशीलता की तलाश करते हुए पारिवारिकता की शरण में जाता है। जिस समय में तमाम तरह की आधुनिकताओं और उत्तरआधुनिकताओं ने समस्त संबंधों की हत्या कर दी हो, ऐसे में परिवार, रिश्ते नाते और कोमल संवेदनाओं की कविताओं का बड़ी संख्या में रचा जाना केवल सांयोगिक नहीं है, वरन वह संबंधित रचनाकारों के भीतर विद्यमान जनपद चेतना की अभिव्यक्ति है। नागार्जुन, त्रिलोचन, सर्वेश्वर और केदारनाथ अग्रवाल से लेकर उदयप्रकाश, मंगलेश डबराल, अरुण कमल, केदारनाथ सिंह, राजेश जोशी, कुमार विकल, महेंद्र कार्तिकेय, विश्वनाथ प्रसाद तिवारी, प्रताप सिंह तथा राजेंद्र उपाध्याय आदि की कविताओं में मानवीय संबंधों और पारिवारिक रिश्तों की खोज को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए। ऐसी कविताएँ उस आभिजात्य विशिष्टतावाद का विकल्प रचने का प्रयास कर रही हैं जिसने मनुष्य और प्रकृति दोनों को बिकाऊ माल बनाकर छोड़ दिया है।
                
आभिजात्य महानगरीय संस्कार तथा खाँटी जनपदीय संस्कार के संघर्ष की परिणति को लोकसचेतन कविता के शब्द और वस्तु के चयन में ही नहीं, उसके शैली शिल्प में भी परिलक्षित किया जा सकता है। जनपदीय चेतना को काव्य में ढालने के लिए जिस सहज शिल्प की जरूरत पड़ती है, वह बड़बोली, अवधारणात्मक तथा गद्यप्रधान कृत्रिम कविता के शिल्प से भिन्न है। कविता की मुक्ति के उद्देश्य को लेकर जब छंदों के बंध तोड़े गए थे, तो यह पता न था कि वह मुक्ति भी आगे चलकर काव्यरूढ़ि को जन्म देगी और कविता तथा गद्य का भेद मिट जाएगा। लेकिन ऐसा हुआ क्योंकि स्वातंत्र्योत्तर काल में कविता को बलपूर्वक उसकी अपनी हजारों साल पुरानी वाचिक परंपरा से काट दिया गया। आभिजात्य चेतना से संपन्न कविता किसी अनुपस्थित अमूर्त पाठक को संबोधित होने के कारण दुरूह, जटिल और कृत्रिम है तथा अपने लिए विशिष्ट संस्कारवाले पाठक की अपेक्षा करती है। इसके विपरीत जनपदीय चेतना से संपन्न कविता का आग्रह कविता को पुनः वाचिक बनाने का है क्योंकि उसके समक्ष अपना श्रोता है जो रचनाकार के कवित्व को हर पल सहज संप्रेषणीयता की माँग करते हुए ललकारता है और अपने जीवन में भागीदारी का न्यौता भी देता है। इस ललकार और न्यौते के प्रति ईमानदार होने के लिए कविता को पुनः छंद और गेयता की ओर लौटना पड़ रहा है। यह जनपदीय चेतना का ही दबाव है कि आज गीतों, गज़लों, दोहों और पदों का प्रचलन पुनः हो रहा है। नवगीत, गज़ल और तेवरी आंदोलन के बाद ‘दोहा‘ और हाइकू भी आजकल आंदोलन के स्तर पर विकसित हो रहे हैं। अन्य भी जिन छंदों को आज का कवि अपना रहा है, उनमें शास्त्रीयता की अपेक्षा लौकिकता की प्रमुखता दिखाई देती है। दोहे और पद की लोकप्रियता का कारण लोक परंपरा में निरंतर उनकी विद्यमानता में निहित है। इन छंदों में आज का कवि जनपद-चेतना को पिरोते समय कबीर से चली आ रही काव्य परंपरा से बल प्राप्त करता है और आभिजात्य शिल्प के समक्ष लोक शिल्प की चुनौती खड़ी करता है -
‘‘कविजन खोज रहे अमराई।
जनता मरे मिटे या डूबे, इनने ख्याति कमाई।।
शब्दों का माठा मथ मथकर, कविता को खट्टाते।
और प्रशंसा के मक्खन कवि, चाट-चाट रह जाते।।
सोख रहीं गहरी मुशकइलें, डाँड हो रहा पानी।
गेहूँ के पौधे मुरझाते हैं अधबीच जवानी।।
बचा-खुचा भी चर लेते हैं, नील गाय के झंड।
ऊपर से हगनी-मुतनी में, खेत बन रहे कुंड।।
कुहरे में रोता है सूरज, केवल आँसू-आँसू।
कविजन उसे रक्त कहकहकर कविता लिखते धाँसू।।‘‘
(अष्टभुजा शुक्ल: पद-कुपद)।            
तथाकथित धाँसू किस्म की आभिजात्यवादी कविताओं के विकल्प के रूप में ही जनपद-सचेतन कविता सामने आ रही है तथा वस्तु, शैली और शिल्प के विविध स्तरों पर अपनी मिट्टी की महक को आत्मसात कर सुवासित हो रही है। कविता में किस्सागोई तथा बातचीत की लय का समावेश भी इसी चेतना की देन है -
‘‘चाँद में चरखा
चरखा में पोनी
पोनी में कतती
चाँदनी।
चाँदनी में क्या?
चाँदनी में पेड़
पेड़ पर चिड़िया 
चिड़ियों की चोंच में
संदेशा ऋतु का।
ऋतु में क्या?‘‘
(राजेश जोशी : तितलियाँ)।
मैं जोड़ना चाहूँगा:
ऋतु में कविता/ कविता के भीतर/ चेतना जनपद की;/ जनपद में क्या? .......


मंगलवार, 31 जुलाई 2012

(कविता का समकाल -३) समकालीन संवेदना एवं रचनाधर्मिता


समकालीन संवेदना एवं रचनाधर्मिता

कविता का समकाल/ आलोचना/
ऋषभ देव शर्मा/2011/
लेखनी/ नई दिल्ली - 110059/
500
रुपये/ 140 पृष्ठ/
ISBN 9788192082745

समकालीन रचनाधर्मिताके समकालीन संवेदनाके साथ रिश्तों की चर्चा को रचनाधर्मिता के बिंदु से शुरू करना चाहें तो यों कहा जा सकता है कि जीवन में रस की तलाश रचना का धर्म है जिसे सौंदर्य-सृजन भी कहा जा सकता है। इस सृजनात्मक खोज में रचनाकार को समकालीनता का निर्वाह भी करना होता है और अतिक्रमण भी - उसकी यात्रा डूबकर पार उतरने जैसी है - पानी में रहकर भी पानी का दाग़ न लगने जैसी नहीं। रचनाधर्म न तो समय का अनुकरण करके निभ सकता है और न तिरस्कार करके ही,  दोनों में सहयोग और संतुलन की अपेक्षा सदा बनी रहती है। अपने समय को पूरी ऊर्जा के साथ जीने वाली रचनाधर्मिता ही समकालीनता का प्रमाण देते हुए उसका अतिक्रमण कर सकती है। तभी वह आत्म के विस्तार को इस प्रकार उपलब्ध कर पाती है कि रचनाकार के माध्यम से सबकी आत्मस्थितियों का अंकन और सबकी प्रश्नाकुलता का सहसंवेदन समानुभूति के धरातल पर संभव हो सके। उदाहरण के लिए आज का रचनाकार जब समकालीन राजनीति और समाज के संबंधों पर दृष्टिपात करता है, उनके बीच से गुजरता है तो उसे एक ओर तो राजनैतिक दुरभिसंधियों की व्याख्या करना आवश्यक जान पड़ता है जिसके लिए वह सपाटबयानी और विवरणात्मकता का खतरा उठाकर भी अपनी रचना में वर्णनात्मकता को प्रश्रय देता दीखता है 
-
‘‘समय गुजर जाता है
जैसे सरकारी वसूली के लिए साहब दौरे पर
फिलहाल सूखा है
इसलिए वसूली स्थगित
पिटने पर आदमी के बेहोहोने पर
जैसे पीटना स्थगित।‘‘
(विनोद कुमार शुक्ल, रायपुर बिलासपुर संभाग)।

जबकि दूसरी ओर समकालीन राजनीति की दुष्चरित्रता की यह पहचान उसके भीतर अरुचि और जुगुप्सा जगाती है जिसकी अभिव्यक्ति आक्रो और व्यंग्य के माध्यम से स्वाभाविक प्रतीत होती है। तंत्र की विराटता के समक्ष व्यक्ति की साधनहीनता और तटस्थता के खतरे को देखते हुए समकालीन रचनाधर्मिता आज ही नहीं, बल्कि आज जैसे हर संकट काल में - संघर्षशीलता को बचाए रखने की चुनौती का सामना करने के लिए अभिव्यक्ति के नए उपकरणों की खोज करती है और पुराने उपकरणों पर नई धार रखती है-
‘‘गायब हो जाएगा
यदि नमक बाजार से
समुद्र दुश्मनों के कब्जे़ में भी होगा
हम थोड़ा-सा बचा रखेंगे नमक
अपने पसीनों में
अपने रक्त में
अपने आँसुओं में
आखिरी दिनों तक।‘‘
(विनोद दास, नमक)।

इक्कीसवीं शताब्दी में हिंदी कविता में एक बार फिर कथात्मकता, छंद और लय की वापसी को रचनाधर्म के इसी अभियान के हिस्से के रूप में देखा जा सकता है।
                
इसमें संदेह नहीं कि साहित्य की सार्थकता संवेदना का विस्तार करने में निहित है, तभी वह संस्कृति का अंग बन पाता है। संवेदना का इतना विस्तार हो कि स्व-पर के भेद विलीन हो जाएँ और व्यक्ति अपनी उपलब्धि का लोक की खातिर विसर्जन करते हुए आत्मदान को तत्पर हो सके -
‘‘जो लिखते हैं कविताएँ
और करते हैं प्यार
वो धरती को थोड़ा और चौड़ा करते हैं
थोड़ा और गहरा
थोड़ा और नम।‘‘
(विश्वनाथ प्रसाद तिवारी/बेहतर दुनिया के लिए)।
               
संवेदना के विस्तार का यह मार्ग निवृत्ति और विरक्ति का नहीं, उपलब्धि और आत्मदान का मार्ग है। निवृत्ति यदि अविकारी पुरुष का धर्म है तो संवेदना विकारी प्रकृति का गुण; और रचना इन दोनों के बीच आवाजाही का उभयमुखी मार्ग, कर्मयोग! संवेदना ही वह शक्ति है जिसके सहारे साहित्य समाज में निरंतर चलनेवाली अमानवीकरण की प्रक्रिया के विरुद्ध सार्थक हस्तक्षेप करता है। आज साहित्यिक रचनाधर्मिता की प्रासंगिकता को बार-बार प्रश्नांकित किया जा रहा है परंतु साहित्य का ऐसा कोई विकल्प अभी तक नहीं खोजा जा सका है जो समकालीन जगत को अमानवीकरण के विरुद्ध सुरक्षा प्रदान कर सके - जीवन और प्रेम के शाश्वत मूल्यों को विकसित कर सके। इस सुरक्षा और विकास के धर्म का निर्वाह करने के लिए रचनाकार की संवेदना आज भी सामाजिक संरचना के साथ लगातार टकराती और नए सपने सिरजती चल रही है। चित्तवृत्तियों के निरंतर जड़ीभूत बिखराव के बीच रचनाधर्मिता उनके संश्लेषण और समन्वय द्वारा संवेदना को मानवजाति का सुरक्षा कवच बनाती है। कालगति के साथ बदलती लोक की चित्तवृत्ति और संवेदना को आत्मसात करते हुए अपनी अभिव्यक्ति को उसके अनुरूप ढाल कर ही रचनाधर्म का निर्वाह किया जा सकता है। इसी से कृति में समकालीनता का समावे होता है। वर्तमान समय में जबकि निस्संगता का संक्रमण मनुष्यता को निरंतर आत्महत्या के लिए प्रेरित कर रहा है, संवेदनशीलता और भावुकता की प्रतिष्ठा अपरिहार्य प्रतीत होने लगी है, तभी रचनाकार प्रामाणिक रूप में व्यक्तिगतहोने के साथ-साथ मार्मिक रूप में सार्वभौमहो सकता है। यही समकालीन संवेदना के संदर्भ में रचनाधर्मिता की सार्थकता होगी।
               
किसी भी समय की समकालीन संवेदना का निर्माण व्यक्ति, वर्तमान संदर्भ में रचनाकार, के अपने अनुभवों से होता है। उत्तरधुनिकता के आज के दौर में संवेदना के स्तर पर रचनाकार पश्चिम और पूर्व के संस्कारों के कराव को झेल रहा है। एक समय था कि बड़े जोर-शोर से विराट के विरुद्ध लघु के व्यक्तित्व को रचनाधर्मिता की केंद्रीय चिंता के रूप में मान्यता दी गई थी और क्रमश: लघुचेतना को ही मानवचेतना का पर्याय बना दिया गया। इधर कुछ दकों से हर केंद्र के टूटने की चर्चाएँ जोरों पर हैं तथा हाशिए के नाम पर स्त्री विमर्श, दलित विमर्श, अल्पसंख्यक विमर्श, पर्यावरण विमर्श तथा काव्य और कथा के स्थान पर आत्मकथा, संस्मरण, जीवनी, साक्षात्कार और यात्रावृत्त की प्रतिष्ठा की बातें की जा रही हैं। रचनाधर्मिता को मनुष्यता और साहित्य के खंडसत्यों के रूप में इनका वरण करने के लिए कहना पूर्णसत्य के साक्षात्कार से इंकार करने जैसा है। इसीलिए यह देखने में आया है कि विगत दशकों में किसी भी कथित परिधिगत विमर्श से जुड़ी रचनाधर्मिता आरंभ में विस्फोट का आभास देने के बाद क्रमश: पूर्णतर होने की खातिर केंद्रीय सरोकारों से संबंद्ध हो गई है। नए रचनाकार को उपेक्षित और बंजर पड़ी ज़मीनें तो तोड़नी ही पड़ती हैं।  इसी से यह तय होता है कि उसका अपने समय के साथ कैसा संबंध है -
‘‘उसके बारे में कविता करना
हिमाकत की बात होगी
और वह मैं नहीं करूँगा
मैं सिर्फ आपको आमंत्रित करूँगा
कि आप आएँ और मेरे साथ सीधे
उस आग तक चलें
उस चूल्हे तक जहाँ वह पक रही है
एक अद्भुत ताप और गरिमा के साथ
समूची आग को गंध में बदलती हुई
दुनिया की सबसे आश्चर्यजनक वस्तु
वह पक रही है।‘‘
(केदारनाथ सिंह, रोटी)।

रचनाधर्मिता की पूर्णता तभी है जब वह रचना और समय के संबंध के उन बिंदुओं को भी उभारे जहाँ विरोध और असामंजस्य है, अन्यथा बेहतर जीवनस्थितियों की खोज के रूप में रस की खोज का उद्देश्य संपन्न नहीं हो सकता। समकालीनता से असहमति को दृढ़ शब्दों में व्यक्त करने से ही समकालीन रचनाधर्मिता की पुष्टि होती है। यह असहमति ही रचनाकार को अपना एक प्रतिसंसार रचने को प्रेरित करती है, एक अधिक संगत और सामंजस्यपूर्ण समाज का स्वप्न देखने को प्रेरित करती है।

समकालीन संवेदना को काल के पार ले जाने वाला तत्व परंपरा को उसकी देन के रूप में रेखांकित किया जाता है। देने से पहले जरूरी है यह जानना कि परंपरा से प्राप्त क्या हुआ है। यदि आज का रचनाकार परंपरा को कुछ देना चाहता है तो वह ऐसा परंपरा से कटकर कदापि नहीं कर सकता। परंपरा उसे श्रुति और स्मृति के रूप में प्राप्त हुई है अर्थात् मिथकों तथा इतिहासवृत्तों के रूप में। साहित्य में अतीत की वर्तमानता के ये दो सृजनात्मक उपकरण हैं: और वर्तमान को भविष्य तक भी ये ही ले जाएँगे। अतः समकालीन संवेदना और रचनाधर्मिता श्रुति और स्मृति के प्रति उदासीन नहीं हो सकती।

साहित्य यदि संवेदना का विस्तारक है तो आज भी उसकी मूलभूत चिंता व्यक्ति, वर्ग या वर्ण न होकर मनुष्य है। इस चिंता का एक आयाम है मनुष्य का प्रकृति के साथ संबंध अथवा परिवे। परिवे के प्रति समकालीन संवेदनशीलता एक ओर जहाँ पेड़, चिड़िया, झरने और पर्यावरण के माध्यम से व्यक्त हो रही है, वहीं गाँव और शहर के बीच रचनाकार के मन की सतत आवाजाही संस्कृति और सभ्यता के विविध तत्वों के विरोधों में सामंजस्य की तला का प्रतीक है
‘‘अभी-अभी धरती की नाभि खोल जो बाहर आया
कौन जानता कितनी सदियों यह पृथ्वी की नस नाड़ी में घूमा
जीवन के आरंभ से लेकर आज अभी तक
धरती को जो रहा भिगोए
वही पुराना जल यह अपना
पहली ही पहली बार हमने तुमने देखा झरना
झरते जल को देख हिला
अपने भीतर का भी
जल।‘‘
(अरुण कमल, झरना)।

मनुष्य और मनुष्य के संबंधों को आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक परिप्रेक्ष्य में देखने के साथ-साथ घर-परिवार और रिश्ते-नातों के अमानवीकरण के कारणों की पड़ताल समकालीन संवेदनशीलता की चिंता का दूसरा आयाम है जिसकी रचनात्मक परिणति स्त्री, माँ, बहन, लड़की, पिता और घर के प्रति जागरूकता के रूप में सामने आ रही है -
‘‘लहर लहर पर
डोल रहा, पर
खेल रहा है
अपना घर,
बादल मत गरजो-बरसो
चट्टानों से
लगता है डर
x x x
घर रचाया था
हथेली पर किसी ने
उंगलियों से,
आँसुओं से धुल
मेहंदियाँ
धूप में फीकी हुई।‘‘
(कविता वाचक्नवी, घर)।

इस चिंता का तीसरा आयाम पूरी तरह मानसिक है जो एक ओर प्रेम से जुड़ता है और दूसरी ओर अध्यात्म से -
‘‘ईश्वर एक लाठी है
जिसके सहारे अब तक चल रहे हैं पिता
मैं जानता हूँ कहाँ कहाँ
दरक गई है उनकी कमज़ोर लाठी
रात में जब सोते हैं पिता
लाठी के अंदर चलते हैं घुन
वे उनकी नींद में पहुँच जाते हैं।‘‘
(स्वप्निल, श्वर एक लाठी है)।

इसी का संबंध मनुष्य के अस्तित्व बोध से है। व्यक्तिगत और वर्गगत अस्मिताओं के टकराव तथा लोकतंत्र और युद्ध की समस्या के प्रति रचनाकार की जागरूकता इसी का प्रमाण है। मनुष्य,  उसके परिवेऔर अस्तित्व से संबंधित इन समस्त चिताओं को रचना में ढालने के लिए सृजनात्मक कल्पना की आवश्यकता होती है जिसके लिए गहन जीवनानुभव और साक्षात्कार चाहिए। साहित्य के नाम पर लिखित और मुद्रित शब्दों के भंडार में यदि मानवचेतना को ऊर्जा का संस्कार देने की संभावनाएँ न दीख रही हों, तो समझना चाहिए कि समकालीन रचनाकार के अपने अनुभव और साक्षात्कार में अभी कुछ अपरिपक्वता है -
‘‘बुनियादी हैं आपके सरोकार
जैसे इस दुनिया की नींव में धंसाए हुए
हवा, पानी, धूप, कुछ भी उन तक नहीं पहुँचता
इतिहास के पन्ने चाटने वाले
नमक से भी अपरिचित हैं आप।‘‘
(मंगले डबराल, सरोकार)।

समकालीनता जब पक जाती है तो अपनी साखीआप देती है। रचनात्मक परिपक्वता आने पर रचनाकार में नैतिक साहस आता है जिसके सहारे वह रूढ़ियों पर चोट करता है - भले ही वे रूढ़ियाँ नैतिकता की ही क्यों न हों!

रूढ़ियाँ समकालीनता की भी हैं। स्मृतिविहीनता हमारे समय की एक ऐसी ही रूढ़ि है जो सारी समकालीनता को वायवीय और सारे आक्रो को प्रलाप बना देती है। स्त्री विमर्श और दलित विमर्श ने स्मृतिविहीनता से ग्रस्त होकर खूब गलतबयानी की है। डिस्पोजे़बल कल्चर की उपभोगवादी दृष्टि समकालीनता की दूसरी ख़तरनाक रूढ़ि है जिसका प्रचार उदारवादी व्यवस्था के नाम पर तेजी से हो रहा है और मनुष्य तथा उसके परिवे के बीच की संवेदनशीलता छीजती जा रही है। इस रूढ़ि का केंद्र है बाज़ार, जिसका तोड़ है परिवार। बाज़ार ने नई तरह की पाखंड-प्रियता को जन्म दिया है जिससे वचन और कर्म में भयंकर दूरी पैदा हो गई है। झूठ बोलना और दादागिरी करना, विश्वासघात करना और उपदे देना सामाजिक और राजनैतिक आचरण की नई अंतरराष्ट्रीय रूढ़ियाँ हैं जिन्हें निर्लज्जता की ही संज्ञा दी जा सकती है। सामाजिक घृणा, आतंक और हिंसा के माहौल में जब लोक और लोकतंत्र का अस्तित्व खतरे में पड़ा हुआ हो, तब सामाजिक न्याय और मानवाधिकार की दुहाई भी समकालीन संवेदना को रूढ़िग्रस्त बना सकती है। बौद्धिक निर्भीकता के ह्रास के कारण ये नई रूढ़ियाँ पनप रही हैं। समकालीन रचनाधर्मिता के समक्ष साहित्य की जो नई रूढ़ियाँ हैं उनमें व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सामाजिक दायित्व में विरोध,  स्वानुभूति और सहानुभूति में विरोध,  परिधि और केंद्र में विरोध,  सृजन और संचार में विरोध - जैसी रूढ़ियाँ प्रमुख हैं। एक रूढ़ि साहित्य की वाचिक परंपरा और मुद्रित शब्द के विरोध की भी है जिसके कारण समकालीन साहित्य पठनीयता के संकट से घिरा हुआ प्रतीत होता है।

अंत में, कुछ चर्चा उन बिंदुओं की भी की जा सकती है जो समकालीन रचनाधर्मिता की विश्वसनीयता के बिंदु हो सकते हैं। इसमें संदेह नहीं कि आज का मनुष्य जानकारियों के घटाटोप से आक्रांत है,  इसलिए रचना में संवेदना की तनिक सी भी अपर्याप्तता या दुर्बलता उसे अस्वीकार्य बना सकती है। यों रचना की शक्ति का पहला बिंदु है संवेदना की गहनता और परिपक्वता, जिससे मानव अनुभूति की प्रामाणिकता की पुनः स्थापना हो सके। सृजन क्ति का दूसरा बिंदु है लोकचित्त की पहचान का। समकालीन रचनाकार को लोकचित्त में बसे बिंबों और विश्वासों से तादात्म्य स्थापित करना होगा अन्यथा प्रेषणीयता की समस्या और भी जटिल हो जाएगी। समकालीन रचनाधर्मिता की ऊर्जा का तीसरा बिंदु विचार है, पंरतु यह भी सत्य है कि यदि संवेदना में न ढल सके तो विचार साहित्य का विलोम सिद्ध होता है। समकालीन रचनाधर्मिता के समक्ष विचार को संवेदना में ढालने की चुनौती उपस्थित है और इसका समाधान तभी संभव है जबकि रचनाकार यह ध्यान रखे कि वह जीवनरस का खोजी और सौंदर्य का अन्वेषक है। ऐसा करके वह स्थानीयता और तात्कालिकता के बावजूद सार्वभौमता और विश्वदृष्टि को साध सकता है। साहित्यिक ऊर्जा का चौथा और सबसे महत्वपूर्ण बिंदु है - नई भाषा की तला का बिंदु। जब जब साहित्य भाषा जड़ीभूत होती है तब तब रचनाकार अपनी भाषिक संवेदना को संपन्नतर बनाने के लिए लोकभाषा की शरण में जाता है। आज भी समकालीन संवेदना और रचनाधर्मिता को देसीपन के इसी संस्कार की आवश्यकता है।