फ़ॉलोअर

जन्मदिन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
जन्मदिन लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 7 सितंबर 2018

(पुस्तक) प्राचीन भारत में खेल-कूद : स्वरूप एवं महत्व

अवधेश कुमार सिन्हा (ज. 9 सितंबर, 1950) की 68वीं वर्षगाँठ पर उनकी शोधपूर्ण कृति "प्राचीन भारत में खेल-कूद (स्वरूप एवं महत्व)" (2018. हैदराबाद : मिलिंद प्र.) का प्रकाशन/लोकार्पण हैदराबाद के हिंदी जगत के लिए अत्यंत हर्षकारी है।  अवधेश जी बहुज्ञ लेखक हैं। उनका वैज्ञानिक और तर्कपूर्ण दृष्टिकोण उन्हें सतत अनुसंधाता बनाता है। एक स्वतंत्र जिज्ञासु शोधार्थी के रूप में रचित उनकी यह कृति भारतीय इतिहास और संस्कृति विषयक उनकी गहन अंतर्दृष्टि का परिचायक है।

सिंधुघाटी सभ्यता और वैदिक काल से लेकर गुप्त काल तक भारतीय समाज और उसकी संस्कृति को मनोविनोद और खेलकूद के साधनों और प्रकारों के क्रमिक परिवर्तन और विकास के माध्यम से उकेरने वाला यह ग्रंथ हिंदी के साथ ही अन्य भारतीय भाषाओं के पाठकों तक भी पहुँचना चाहिए। आशा है, इसकी राष्ट्रीय उपादेयता को देखते हुए  विभिन्न भाषाओं के अनुवादक इस ओर आकृष्ट होंगे। 


शुक्रवार, 14 जून 2013

सौम्य, अनाक्रामक और पुरुषार्थी साहित्यकार विष्णु प्रभाकर

शताब्दी संदर्भ

  • मैं ईश्वर में अखंड विश्वास नहीं रखता. मैं तो समझता हूँ, अध्यात्म भी एक खोज है. जिस तरह विज्ञान भौतिक खोज करता है, अध्यात्म पराभौतिक खोज करता है. दोनों और खोज जारी है. उनके प्रश्न जारी हैं – उत्तर तो किसी को मिला नहीं है. – विष्णु प्रभाकर
  • मेरे साहित्य की प्रेरकशक्ति मनुष्य है. अपनी समस्त महानता और हीनता के साथ, अनेक कारणों से मेरा जीवन मनुष्य के विविध रूपों से एकाकार होता रहा और उसका प्रभाव मेरे चिंतन पर पड़ता रहा. कालांतर में वही भावना मेरे साहित्य की प्रेरकशक्ति बनी. त्रासदी में से ही मेरे साहित्य का जन्म हुआ.   – विष्णु प्रभाकर  
  • आजादी से पहले अधिसंख्य लोग देश-प्रेम के कारण ही आंदोलन में भाग लेते थे, लेकिन पेशेवर नेताओं में देश-प्रेम कहाँ? अब कोई भी ऐसा नेता नहीं, जिसे लोग आदर्श मानते हों. फिर भी सांस्कृतिक दृष्टि से भारत एक है. आज भी दक्षिण भारतीय हिमालय की यात्रा करता है और उत्तर का आदमी कन्याकुमारी – रामेश्वरम की. इन यात्राओं में केवल हिंदी का प्रयोग करके काम चलाया जा सकता है. यानी हिंदी जनता की संपर्क भाषा बन चुकी है, राजनीतिज्ञ चाहे कुछ भी कहते रहें. – विष्णु प्रभाकर 


  • अपनी अमर कृति ‘आवारा मसीहा’ (1974) के माध्यम से कालजयी रचनाकार शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के ग्रंथावतार को संभव बनाने वाले विष्णु प्रभाकर (21 जून, 1912 – 11 अप्रैल, 2009) को भारतीय वाग्मिता और अस्मिता को व्यंजित करने वाला साहित्यकार माना जाता है. एक शताब्दी पहले उत्तर प्रदेश के जनपद मुजफ्फरनगर के एक छोटे से कस्बे मीरांपुर के जिस संयुक्त परिवार में उनका जन्म हुआ वह अपनी एकजुटता के लिए दूर दूर तक जाना जाता था. यहाँ तक कि पेरिस टीवी वाले जब भारत की नारी पर एक फ़िल्म बना रहे थे तो संयुक्त परिवार किस प्रकार रहता है यह दर्शाने के लिए उन्होंने इस परिवार का फिल्मांकन किया था. 
विष्णु प्रभाकर का बचपन लाड़-प्यार में बीता लेकिन किशोरावस्था में उन्हें शिक्षा-दीक्षा के लिए पंजाब में अपने मामा के पास जाना पड़ा. भावुक और अंतर्मुखी प्रकृति के बालक के मन पर माँ से दूर जाने का गहरा असर हुआ. दूसरी ओर कम आयु में बड़प्पन की जिम्मेदारियाँ भी उठाने के कारण उनकी मानसिकता जटिल और परिपक्व होती गई. कुछ विपरीत परिस्थितियों के कारण एक समय ऐसा भी आया कि वे मनुष्य की छाया से भी डरने लगे. ऐसे में स्वाध्याय और लेखन ने उन्हें संभाला. आर्थिक परेशानी के कारण वे कॉलिज तक न पहुँच पाए और आजीविका के लिए उन्हें चपरासी की नौकरी करनी पड़ी. बाद में प्रभाकर परीक्षा उत्तीर्ण करने पर वे विष्णु दयाल/ विष्णु दत्त से विष्णु प्रभाकर बने. संस्कृत में प्राज्ञ और अंग्रेज़ी में बी.ए. भी किया. इस आरंभिक जीवन संघर्ष ने उन्हें मानव चरित्र की जो पहचान दी उसका उपयोग उन्होंने आगे चलकर अपने कथा साहित्य और नाटकों में अत्यंत सफलतापूर्वक किया. बाद में उन्होंने कुछ समय एकाउंटेंट का काम भी किया लेकिन वह उन्हें रास नहीं आया तथा उन्होंने स्वतंत्र लेखन के सहारे जीवन यापन का निर्णय लिया. 1955 -1957 तक वे आकाशवाणी, दिल्ली के नाटक निर्देशक भी रहे. दरअसल आकाशवाणी से जुड़ने पर ही उनका आर्थिक संकट दूर हो पाया.

विष्णु प्रभाकर के लेखकीय व्यक्तित्व के निर्माण में उनके जीवन संघर्ष और स्वाध्याय के अतिरिक्त महात्मा गांधी के चिंतन का भी बड़ा हाथ रहा. वे एक प्रकार से कांग्रेस के साहित्यिक सदस्य थे. इसी प्रकार आर्य समाज का भी उन पर गहरा असर पड़ा. उन्होंने त्याग, बलिदान, समर्पण, हिंदू-मुस्लिम एकता, कमजोर वर्गों के प्रति सहानुभूति आदि नैतिक मूल्यों को अपने साहित्य में भी व्यक्त किया और जीवन में भी अपनाया. 

विष्णु प्रभाकर ने विभिन्न विधाओं में प्रभूत लेखन किया. उन्होंने हिंदी साहित्य को कहानी, उपन्यास, नाटक, जीवनी, निबंध, एकांकी, यात्रावृत्तांत आदि प्रमुख विधाओं में शताधिक कृतियाँ रचकर संपन्न बनाया. ‘आवारा मसीहा’ पर उन्हें पाब्लो नेरुदा सम्मान और सोवियत भूमि नेहरु पुरस्कार से नवाज़ा गया तो ‘सत्ता के आर-पार’ पर भारतीय ज्ञानपीठ का मूर्तिदेवी पुरस्कार और हिंदी अकादमी, दिल्ली का शलाका सम्मान भी उन्हें प्रदान किया गया. अपनी तरह के अभिनव स्त्रीविमर्शात्मक उपन्यास ‘अर्द्धनारीश्वर’ पर विष्णु प्रभाकर को साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त हुआ. अभिप्राय यह है कि वे आकाशवाणी, दूरदर्शन, पत्र-पत्रिकाओं और प्रकाशन संबंधी मीडिया के विविध क्षेत्रों में लोकप्रिय हिंदी के ऐसे पूर्णकालिक मसिजीवी रचनाकर थे जिन्होंने स्वयं को साहित्यिक जगत की तमाम तरह की गुटबंदियों से अलग रखा और निरंतर भारतीयता को ध्यान में रखकर साहित्य सृजन किया.

भारतीय समाज की गहरी पहचान के कारण विष्णु प्रभाकर ने यह महसूस किया कि स्त्री को आधुनिक सामाजिक जीवन में समुचित सम्मान प्राप्त नहीं है. इसलिए उन्होंने अपनी रचनाओं में स्त्री समस्या को पूरी शिद्दत से उठाया. ‘तट के बंधन’ (1955) में उन्होंने मध्यवर्गीय नारी की समस्याओं का चित्रण किया तो ‘कोई तो’ (1980) और ‘अर्द्धनारीश्वर’ (1992) में स्त्री-पुरुष संबंधों की जटिलता और स्त्री मुक्ति के भारतीय स्वरूप पर विचार किया. उनके कथा साहित्य में स्त्री अपने सम्मान के लिए लड़ती नज़र आती है. वे मानते हैं कि पुरुष प्रधान समाज ने नारी की अवमानना की कभी चिंता नहीं की और सदा ही पुरुष के पापों का दंड स्त्री को भोगना पड़ता है. ऐसे में उन्होंने स्त्री-पुरुष के मुक्त आसंग के प्रतिदर्श के रूप में शिव-पार्वती के युगल स्वरूप अर्द्धनारीश्वर की प्रस्तावना की है. 

जीवन मूल्यों के निरंतर ह्रास से विष्णु प्रभाकर बहुत चिंतित दिखाई देते हैं. उन्होंने अपने साहित्य में मानवीय मूल्यों और राष्ट्रीय मूल्यों को व्यापक स्थान दिया. उनके अनुसार जब तक राष्ट्रीय मूल्यों का विकास नहीं होगा तब तक पृथकतावादी ताकतों को पराजित नहीं किया जा सकता. राष्ट्रीय मूल्यों के अभाव के कारण ही सांप्रदायिकता, जातीयता और क्षेत्रीयता को हवा मिलती है. वे मानते हैं कि इन समस्याओं से मुक्ति के लिए छात्रों को बचपन से ही देशभक्ति का पाठ पढ़ाना चाहिए. इसीलिए उन्होंने स्वामी दयानंद सरस्वती, बंकिमचंद्र, सरदार पटेल, शरतचंद्र, काका कालेलकर, शंकराचार्य, रवींद्रनाथ ठाकुर, बाजीप्रभु देशपांडे, भगत सिंह, गुरुनानक, कमाल पाशा, अहिल्या बाई, गोपबंधु दास, गिजु भाई, हारूँ-अल-रशीद और हजरत उमर जैसे महापुरुषों की बालोपयोगी जीवनियाँ भी लिखीं. 

‘आवारा मसीहा’ विष्णु प्रभाकर की साहित्य साधना का सुमेरु है. इसमें उन्होंने शरत की प्रामाणिक जीवनी एक सच्चे समर्पित शोधकर्ता की तरह खोजकर साहित्य की दुनिया के सामने रखी. यह जानना रोचक होगा कि इस रत्न के लिए उन्होंने चौदह बरसों तक साहित्य और समाज की ख़ाक छानी. ‘धर्मयुग’ के हवाले से यह कहना उचित होगा कि विष्णु प्रभाकर ने न केवल शरत के उपन्यासों, कहानियों, नाटकों, निबन्धों और भाषणों के सागर में डुबकियाँ लगाईं, बल्कि उनके जो संबंधी और मित्र मिल सके उनके साथ भेंटवार्ता की तथा उनके पास उपलब्ध शरत के निजी पत्रों का भी अध्ययन किया. इसके लिए उन्होंने बंगाल, बिहार और बर्मा के उन सभी स्थानों की यात्रा भी की जहाँ शरत रहे अथवा गए थे. इस साधना का ही यह परिणाम हुआ कि हिंदी को ‘आवारा मसीहा’ जैसा गौरवग्रंथ मिल सका.

इसमें संदेह नहीं कि विष्णु प्रभाकर ने अपने सृजनकर्म द्वारा संस्कृति, समाज, इतिहास और सभ्यता पर स्थायी प्रभाव छोड़ा है. वे भारतीय साहित्य के एक कालजयी हस्ताक्षर हैं. अत्यंत सौम्य, चारु और अनाक्रामक अतः दुर्लभ व्यक्तित्व के स्वामी विष्णु प्रभाकर का जीवन पुरुषार्थ और स्वावलंबन का उदाहरण है और उनका साहित्य भारत की राष्ट्रीय-सांस्कृतिक परंपरा का प्रतिबिंब. 
[भास्वर भारत / अप्रैल 2013 / पृष्ठ 37]

रविवार, 1 जनवरी 2012

श्रीलाल शुक्ल के जन्मदिन पर ...


पिछले कई वर्षों से उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद की शोधछात्रा श्रीमती सीमा मिश्रा ३१ दिसंबर को श्रीलाल शुक्ल के जन्मदिन पर संगोष्ठी का आयोजन करती रही हैं. उन पर एमफिल के बाद पीएचडी भी वे उन्हीं पर कर रही थीं. इस बार श्रीलाल शुक्ल कों ज्ञानपीठ पुरस्कार से नवाजा गया लेकिन कुछ ही दिन बाद वे पंचतत्व में लीं हो गए. यों इस वर्ष [३१.१२.२०११] की संगोष्ठी उनकी स्मृति कों समर्पित की गई.

अध्यक्षता अपुन के जिम्मे आई. मुख्य अतिथि रहे चंडीगढ से पधारे प्रो. अमर सिंह वधान. ''हिंदी साहित्य को श्रीलाल शुक्ल का प्रदेय'' पर मुख्य व्याख्यान प्रो. टी. मोहन सिंह ने दिया ; सीमा मिश्र भी बोलीं. विशेष अतिथि डॉ. अहिल्या मिश्र थीं और संचालक डॉ. जी.नीरजा. सीमा की किताब ''श्रीलाल शुक्ल के उपन्यास 'राग  दरबारी' का राजनैतिक संदर्भ'' का लोकार्पण किया डॉ. राधेश्याम शुक्ल ने. अच्छी-खासी चर्चा हुई.

संपत देवी मुरारका जी ने खूब फोटो खींचे ; और मुझे भेज भी दिए.

मंगलवार, 11 अक्टूबर 2011

वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक पुरस्कार 2011 समारोह संपन्न

हैदराबाद, 5 अक्तूबर, 2011.


                श्री वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक ट्रस्ट द्वारा प्रतिष्ठित हिंदी सेवी स्वर्गीय वेमूरि आंजनेय शर्मा के 95 वें जयंती समारोह के संदर्भ में वर्ष 2011 के स्मारक पुरस्कार प्रदान किए गए। यह समारोह स्थानीय रवींद्र भारती सभागार में संपन्न हुआ। समारोह की अध्यक्षता आंध्र प्रदेश भूदान यज्ञ बोर्ड के अध्यक्ष श्री सी.वी.चारी ने की तथा आंध्र प्रदेश के पूर्व शिक्षा मंत्री डॉ. पी.वी. रंगाराव मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित रहे। वर्ष २०११ का वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक पुरस्कार हिंदी साहित्य के लिए वरिष्ठ व्यंग्यकार मटमरि उपेंद्र को प्रदान किया गया जबकि  तेलुगु साहित्य के लिए यह पुरस्कार विख्यात तेलुगु कथाकार डी. कामेश्वरी ने  एवं तेलुगु रंगमंच के लिए सुप्रसिद्ध कलाकार रेकेंदर  नागेश्वर राव ‘बाब्जी’ ने प्राप्त किया. तीनों सम्मानित विभूतियों को शालस्मृतिचिह्न तथा 10 हज़ार की नक़द राशि भेंट कर सम्मानित किया गया। इस अवसर पर ट्रस्ट की ओर से छात्र-छात्राओं को प्रतिभा पुरस्कार’ तथा सरस्वती पुरस्कार’ भी प्रदान किए गए। मुख्य अतिथि डॉ. पी.वी. रंगाराव ने सभा को संबोधित करते हुए कहा कि स्व. वेमूरि आंजनेय शर्मा बहुमुखी प्रज्ञाशाली थे जो हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं की उन्नति के लिए अपना सारा जीवन उत्कृष्ट सेवाएँ प्रदान करते रहे। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि भारतीय भाषाओं को सर्वप्रथम कंप्यूटर पर लाने का श्रेय वे. आंजनेय शर्मा को ही जाता है।

                

अपने अध्यक्षीय भाषण में श्री सी.वी. चारी ने आंजनेय शर्मा के साथ अपने 60 साल के निकट संबंधों  को स्मृतिपटल पर लाते हुए बताया कि आंजनेय शर्मा का जीवन भावी पीढ़ी के लिए अनुकरणीय तथा आदर्श है। उन्होंने  आगे यह भी कहा कि श्री पी.वी. नरसिंहा राव तथा आंजनेय शर्मा के अथक प्रयास से ही दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के उच्च षिक्षा विभाग में विभिन्न चुनौतीपूर्ण पाठ्यक्रम आरंभ किए गए जो आज़ भी अबाध  चल रहे हैं।
                
समारोह का संचालन सी.सी.एम.बी. के हिंदी अधिकारी चंद्रशेखर ने किया तथा श्रीमती शारदा और बालाजी ने कार्यक्रम के आरंभ में सुगम संगीत प्रस्तुत किया। समारोह में ट्रस्ट के प्रबंधक न्यासी प्रो. वेमूरि हरिनारायण शर्मा तथा अन्य न्यासियों ने भी भाग लिया। इस कार्यक्रम में नगरद्वय के अनेक  विशिष्ट हिंदी सेवी और गणमान्य विद्वान उपस्थित थे।

चित्र परिचय ;
रवींद्र भारती, हैदराबाद में आयोजित वेमूरि आंजनेय शर्मा स्मारक पुरस्कार समारोह के अवसर पर पुरस्कृत हिंदी साहित्यकार मटमरि, तेलुगु कथाकार डी. कामेश्वरी एवं रंगमंच कलाकार रेकेंदर  नागेश्वर राव ‘बाब्जी’. साथ में डॉ. पी.वी. रंगाराव, सी. वी. चारी तथा स्मारक ट्रस्ट के पदाधिकरीगण. 
                                                                प्रस्तुति – वेमूरि ज्योत्स्ना कुमारी.

सोमवार, 8 अगस्त 2011

अन्य भाषा शिक्षण और अनुवाद के वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर प्रो.दिलीप सिंह की दो नई कृतियाँ

आज 8 अगस्त 2011 को प्रो. दिलीप सिंह जी साठ वर्ष के हो रहे हैं. मन में एक दशक पहले से यह साध है कि प्रोफ़ेसर सिंह की षष्ठिपूर्ति मनाई जाए और अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान पर एक ऐसी किताब उन्हें भेंट की जाए जो इस क्षेत्र में उनके व्यक्तित्व और कृतित्व के अनुरूप हो. दरअसल यह साध उस दिन जगी थी जिस दिन प्रो सिंह के दो प्रिय शोधार्थियों कविता वाचक्नवी और गोपाल शर्मा ने उनकी स्वर्ण जयंती मनाई थी. पर उसके बाद कालचक्र  ऐसा घूमा कि हैदराबाद से  दिलीप सिंह धारवाड़ चले गए - व फिर चेन्नई. कविता जी ब्रिटेन की हो गईं और शर्मा जी हिंदी की पीएचडी के बल पर लीबिया में अंग्रेज़ी के प्रोफ़ेसर हो गए.  इन दोनों के बिना मेरे  संकल्प को लुंज-पुंज होना ही था ; वही हुआ. लेकिन कुछ महीने पहले जाने कैसी आंतरिक प्रेरणा हुई और मैंने उस संकल्पित किताब के लिए ऊर्ध्वबाहु होकर आवाज़ लगाई. और देखिए चमत्कार कि इतनी सामग्री आ गई  है कि सहेज नहीं पा रहा हूँ!

सर! आज तो नहीं लेकिन शीघ्र ही आपके देश-विदेश के मित्रों, परिचितों, प्रशंसकों, शुभचिंतकों, शिष्यों और साथियों की ओर से ...............[अभी इस वाक्य को अधूरा ही छोड़ना उचित है.]

प्रो. दिलीप सिंह के साठवें जन्मदिन पर उनके दीर्घायुष्य और नित्य उत्कर्ष की शुभकामना प्रेषित करते हुए प्रस्तुत कर रहा हूँ उनके सद्यःप्रकाशित दो ग्रंथों पर यह संक्षिप्त सी चर्चा.  



अन्य भाषा शिक्षण और अनुवाद के वैश्विक परिप्रेक्ष्य पर प्रो.दिलीप सिंह की दो नई कृतियाँ

हिंदी में अनुप्रयुक्त भाषाविज्ञान पर प्रामाणिक लेखन करने वाले विरले ही हैं. उनमें प्रो. दिलीप सिंह का नाम अत्यंत सम्मान के साथ गिना जाता है क्योंकि उन्होंने भारतीय और पाश्चात्य भाषावैज्ञानिकों के विचारों का गहन अध्ययन करके उन्हें हिंदी के संदर्भ में विश्लेषित,व्याख्यायित और घटित किया है. व्यावसायिक हिंदी से लेकर पाठ विश्लेषण तक के व्यावहारिक प्रारूप प्रस्तुत करने वाली कई पुस्तकों के बाद गत दिनों उनकी दो नई पुस्तकें आई हैं जिनमें क्रमशः अन्य भाषा शिक्षण और अनुवाद चिंतन के आधुनिकतम संदर्भों के वैश्विक परिप्रेक्ष्य को रेखांकित किया गया है. परिपाटीगत अध्ययनों की तुलना में इन कृतियों की केंद्रीय चिंता भाषिक-सामाजिक संस्कृति और संप्रेषणीयता की रक्षा की है.

‘अन्य भाषा शिक्षण के बृहत् संदर्भ’ : संप्रेषण पर ज़ोर

प्रो.दिलीप सिंह [1951] तीस वर्ष से अधिक अवधि से हिंदी भाषा और साहित्य के शिक्षण और अध्यापन से जुड़े हुए हैं। इस लगभग सारी अवधि में उन्हें हिंदीतरभाषी छात्रों को पढ़ाने का अवसर मिला है – देशी भी विदेशी भी। अर्थात् वे हिंदी को द्वितीय और तृतीय भाषा के रूप में पढ़ाने का व्यापक अनुभव रखते हैं। अन्य भाषा शिक्षण के लिए पाठ्यक्रम बनाने से लेकर पाठ सामग्री तैयार करने, पाठ्यपुस्तकें लिखने-लिखवाने और हिंदीतरभाषी भारतीय तथा विदेशी  छात्रों के बीच उन्हें पढ़ाने के उनके अनुभव का निचोड़ है - अन्य भाषा शिक्षण के बृहत् संदर्भ (2010) शीर्षक पुस्तक। यह संयोग नहीं है कि उन्होंने यह पुस्तक अपने पिताजी को समर्पित करते हुए यह समर्पण वाक्य लिखा है - ‘‘पापा को - जो माँ भी थे और पिता भीशिक्षक भी थे और मित्र भीआदर्श भी थे और संस्कार भी।’’ वास्तव में भाषा शिक्षक  से ये ही सारी अपेक्षाएँ की भी जाती हैं। इससे पहले भाषासाहित्य और संस्कृति शिक्षण’ में भी प्रो. दिलीप सिंह इस तथ्य को प्रतिपादित कर चुके हैं कि भाषा सिखाने का अर्थ व्याकरणसम्मत वाक्यरचना भर सिखाना नहीं है बल्कि उस भाषा समाज के साहित्य और संस्कृति के मर्म से अध्येता को परिचित कराना है। अन्य भाषा शिक्षण  का यह सामाजिक सांस्कृतिक दृष्टिकोण इस पुस्तक अन्य भाषा शिक्षण के बृहत् संदर्भ’ में भी पूरी तरह सक्रिय दिखाई देता हैसाथ ही शैलीवैज्ञानिक आयाम भी।



जो खास बात प्रो. दिलीप सिंह के अन्य भाषा शिक्षण संबंधी लेखन में सबसे पहले ध्यान खींचती है वह है उनका सैद्धांतिकी की अपेक्षा व्यावहारिकता पर अधिक जोर देना। यह बात दीगर है कि इस विवेचन के माध्यम से सिद्धांत अपने आप हृदयंगम होने लगते हैं। ‘‘अन्य भाषा शिक्षण (द्वितीय और विदेशी) के इसी परिवर्तनशील स्वरूप को इस पुस्तक में प्रस्तुत किया गया है। बातें यहाँ सैद्धांतिक कमव्यावहारिक अधिक हैं। अन्य भाषा शिक्षण में इलेक्ट्रानिक मीडिया और कंप्यूटर की भूमिका पर चर्चा के साथ साथ संप्रेषणपरक द्वितीय भाषा शिक्षण पर यहाँ सम्यक विचार किया गया है। साहित्य भाषा शिक्षण के लिए इकबाल के तराना-ए-हिंदी’ का विश्लेषण उस नई प्रविधि का एक नमूना है जिसे भाषा शिक्षण के लिए अपनाने पर आज विशेष बल दिया जा रहा है। साहित्यिक पाठ के माध्यम से भाषा दक्षता को बढ़ावा देनेवाला यह ढाँचा अन्य भाषा शिक्षण के प्रमुख सिद्धांतों को भी सामने ले आता है।’’ (अन्य भाषा शिक्षण के बृहत् संदर्भपृष्ठ 7-8)। भाषा शिक्षण की आधुनिक भूमिका पर प्रकाश डालते हुए प्रो. दिलीप सिंह ने संप्रेषणपरक भाषा शिक्षण पर सर्वाधिक बल दिया है और यह दर्शाया है कि भाषा सीखने का अर्थ भाषा प्रयोग के नियमों को सीखना है न कि भाषा के व्याकरणिक नियमों को।

अन्य भाषा शिक्षण पर विचार करते हुए प्रो. दिलीप सिंह ने जोर देकर इस धारणा का खंडन किया है कि मातृभाषाएँ आधुनिक या अंतरराष्ट्रीय संप्रेषण व्यापार के लिए अपर्याप्त एवं सीमित हो जाती हैं। अपर्याप्तता की इस अवधारणा को उन्होंने एक समाज-राजनैतिक मिथक माना है जिसे केवल इसलिए गढ़ा गया है कि एकजुट और जागरूक सामान्य जन को ज्ञान-विज्ञान और सत्ता से वंचित रखा जा सके। प्रो. सिंह मानते हैं कि कोई भी भाषा अपने में असक्षमअसमर्थ या अपघटित नहीं होती। वे याद दिलाते हैं कि जिस शिक्षार्थी को अपनी ही भाषा के प्रति शर्मिंदगी महसूस करने को बाध्य किया जाता है या जिसे अपनी भाषा आदत के प्रति शर्मसार बनाया जाता है वह कभी एक पूर्ण मानव के रूप में विकसित नहीं हो सकता। ‘‘किसी को भी विशेषकर एक बच्चे को अपनी ही भाषा के प्रति हीन भावना से भरना उतना ही अक्षम्य अपराध माना जाना चाहिए जितना कि किसी को उसकी त्वचा के रंग के कारण हीन घोषित करना। अतः द्वितीय भाषा शिक्षण और भाषा प्रकार्यों के संदर्भ में किसी भाषा की अक्षमता अथवा हीनता की चर्चा आज निरर्थक ही मानी जानी चाहिए। कहना यह है कि हर भाषा किसी भी भाव संदर्भ को व्यक्त कर पाने में पूरी तरह सक्षम होती है।’’ (वहीपृ. 78)। काश हमारे नीति निर्धारकों की समझ में इतनी सी मूलभूत सच्चाई आ जाती! प्रो. दिलीप सिंह ने अन्य भाषा सीखने की प्रक्रिया को मातृभाषा की तुलना में विशिष्ट माना है क्योंकि यह दो प्रकार के संबंधों के नेटवर्क को सीखने की प्रक्रिया है - ‘‘भाषिक और समाज-सांस्कृतिक। इसीलिए उन्होंने इस शिक्षण के लिए संप्रेषणपरक व्याकरण के विकास पर बल दिया है और विदेशी  भाषा के रूप में हिंदी सिखाने के लिए पारंपरिक पाठ्यपुस्तकों से अधिक महत्वपूर्ण मीडिया की सामग्री को माना है। अपने अनुभव के आधार पर उन्होंने सिनेमावीडियोरेडियो और टी वी के भाषा शिक्षण में उपयोग के लिए व्यावहारिक सुझाव दिए हैं जिनको अमल में लाकर संप्रेषणपरक क्षमता अर्जित की जा सकती है। इतना ही नहीं उन्होंने कंप्यूटरसाधित भाषा शिक्षण के भी प्रारूप प्रस्तुत किए हैं जिनकी सहायता से विद्यार्थी की संप्रेषणपरक लेखन क्षमता भी बढ़ाई जा सकती है।

दरअसल प्रो. दिलीप सिंह का ध्यान शिक्षाशास्त्री के रूप में भी लगातार सामाजिक संदर्भ पर केंद्रित रहता है। यही कारण है कि उन्होंने अन्य भाषा शिक्षण के समाजभाषिक पक्षों को इस पुस्तक में विस्तार से विवेचित किया है तथा सामाजिक मूल्यभाषा विकल्पनकोड प्रयोग और शब्द संदर्भ जैसी समाजभाषिक संकल्पनाओं के अन्य भाषा शिक्षण हेतु कारगर उपयोग के रास्ते सुझाए हैं। इसमें संदेह नहीं कि भाषा अध्येता को भाषा के संपर्कसापेक्ष प्रकार्यों से पूरी तरह संपन्न करने के लिए उनके ये सुझाव अत्यंत उपयोगी हैं और इन्हें हिंदी भाषा शिक्षण के सभी पाठ्यक्रमों में सम्मिलित किए जाने की जरूरत है।

‘अनुवाद की व्यापक संकल्पना’ : समाजभाषावैज्ञानिक संदर्भ    

प्रो. दिलीप सिंह मूलतः समाजभाषावैज्ञानिक और शैलीवैज्ञानिक हैं। उनके अनुवाद चिंतन में भी उनका यह रूप झलकता है।अनुवाद की व्यापक संकल्पना’ (2011) में उन्होंने जहाँ एक ओर अनुवादक की भूमिका को पाठभाषाविज्ञान और संकेतविज्ञान से जोड़ा है वहीं दूसरी ओर अनुवाद के सामाजिक दायित्वों और सामाजिक उद्देश्यों को समाजभाषाविज्ञान तथा सामाजिक अर्थविज्ञान के परिप्रेक्ष्य में पुनर्विवेचित किया है। वे अनुवाद के संदर्भ में कला और विज्ञान की प्रचलित बहस को निरर्थक मानते हैं और यह घोषित करते हें कि अनुवाद प्रक्रिया हमेशा वैज्ञानिक होती हैचाहे उसका लक्षित पाठ साहित्यिक हो या साहित्येतर। (अनुवाद की व्यापक संकल्पनापृ.12)। भारतीय साहित्य के एक होने की धारणा को पुष्ट करने और तुलनात्मक साहित्य के अध्ययन के लिए प्रो. दिलीप सिंह ने अनुवाद की भूमिका को निर्विवाद रूप से स्वीकार करते हुए साहित्येतर अनुवाद की उपादेयता को भी उभारा है। उनकी राय में इस उपादेयता के कारण ही अनुवाद को आज एक सामाजिक कार्य मानना आवश्यक है और उसे उपभोक्ता सापेक्ष स्वीकार करते हुए पाठ की प्रकृति पर प्रकार्यात्मक दृष्टि से विचार करना वांछित है। (वहीपृ. 16)

अनुवाद के इस सामाजिक संदर्भ को परिपुष्ट करते हुए प्रो. दिलीप सिंह ने समतुल्यता के सिद्धांत को व्यापक परिप्रेक्ष्य प्रदान किया है और प्रेमचंद की कहानी बाबाजी का भोग’ के दो अनुवादों के सहारे यह प्रतिपादित किया है कि ‘‘अगर अनुवाद का लक्ष्य मूलपाठ में निहित संस्कृतिस्थानीय परिवेश, सामाजिक तत्व आदि का संप्रेषण है तब समतुल्यता का सिद्धांत एक ढंग से सिद्ध होगा और अगर उसका लक्ष्य किसी साहित्यिक कृति को मात्र साहित्यिक रूप में लक्ष्यभाषा के पाठकों तक पहुँचाना है तब समतुल्यता का सिद्धांत दूसरे ढंग से प्रतिफलित होगा। एक में मूलपाठ के संस्कृतिनिष्ठ एवं सामाजिक अर्थ की द्योतक भाषिक अभिव्यक्तियों के यथातथ्य संप्रेषण के लिए समतुल्य भाषिक उपकरणों का चयन होगा और दूसरे में लक्ष्य भाषा की अपनी सांस्कृतिक चेतना के रूपांतरण के रूप में समतुल्यता के सिद्धांत का निर्वाह होगा। एक पाठधर्मी अनुवाद का परिणाम माना जाएगा और दूसरा प्रभावधर्मी अनुवाद का  उदाहरण समझा जाएगा। (वहीपृ.41)

इसी प्रकार अनुवाद समस्या की व्यापक समीक्षा करते हुए प्रो. सिंह ने सवाल  उठाया है कि क्या अनुवाद का कार्य मात्र तात्पर्य को सुरक्षित रखते हुए लक्ष्य भाषा में परिवर्तित कर देना ही हैअथवा क्या भाषा की प्रकृति ऐसी स्थिर होती है कि एक भाषा की इकाई को दूसरी भाषा की इकाई द्वारा प्रतिस्थापित किया जा सके। दरअसल इस तरह के सवाल खुद अनुवादक को बहुत विचलित करते हैं क्योंकि जब वह तात्पर्य को सुरक्षित करने चलता है तो स्रोत भाषा और उसका सौंदर्य उसे छूटता सा लगता है और जब वह भाषा की इकाइयों पर ध्यान देता है तो कभी समान इकाई नहीं मिलती या कभी एक से अधिक इकाइयाँ मिल जाती हैं या फिर कभी यह अनुवाद मक्षिका-स्थाने-मक्षिका होने के कारण निर्जीव लगने लगता है। इसलिए डॉ. सिंह ने अनुवाद की समस्याओं को समतुल्यता की खोज की समस्याएँ माना है और भाषिक तथा भाषेतर संदर्भों पर इस दृष्टि से विस्तृत विमर्श किया है। वे मानते हैं कि संदेश की संप्रेषणीयता व प्रकार्यात्मक स्तरों पर जो कठिनाइयाँ आती हैं वे ही अनुवाद की समस्याएँ हैं और उन्होंने ही अनुवाद को चुनौतीपूर्ण कौशल बनाया है।

अनुवाद समीक्षा और अनुवाद मूल्यांकन अनूदित पाठों की विश्वसनीयता के लिए बेहद जरूरी हैं लेकिन अभी तक इनकी कोई सर्वमान्य प्रविधि हमारे पास नहीं है। इस संदर्भ में प्रो. दिलीप सिंह सैद्धांतिकी के जंजाल में फँसने-फँसाने के स्थान पर इन्हें अनुवाद करने की प्रणाली से जोड़ते हुए व्यावहारिक प्रारूपों द्वारा स्पष्ट करते हैं। इसके लिए उन्होंने जहाँ एक ओर गोदान’ के हिंदी-अंग्रेजी पाठों की व्यापक तुलना की है वहीं लाइट ऑफ एशिया’ के आचार्य रामचंद्र शुक्ल कृत काव्यानुवाद बुद्धचरित’ की गहरी पड़ताल  की है। अनुवाद मूल्यांकन/समीक्षा की दृष्टि से शुक्ल जी की समीक्षा शैली का अनुवाद के संदर्भ में विवेचन भी अनूदित पाठों के अध्ययन के लिए नया दरीचा खोलता प्रतीत होता है। यहाँ प्रो. दिलीप सिंह की यह स्थापना भी ध्यान खींचती है कि ‘‘शुक्ल जी ने जो अनुवाद किए हैं या जिन मूल अंग्रेजी ग्रंथों को अपने चिंतन में सहायक बनाया है उनमें उनकी दृष्टि अनुवाद-उन्मुखता से अधिक मूल के भावमंतव्य पर रही है। तभी वे उन मंतव्यों के विरोध में भी जा पाते हैं या उसमें अपना भी कुछ जोड़ पाते हैं। हिंदी समीक्षा और समीक्षा भाषा के विकास में शुक्ल जी जैसे अनुवादक की भूमिका मौलिक लेखक से कहीं ज्यादा कठिनश्रमसाध्य और उपयोगी सिद्ध होती है क्योंकि उनमें मौलिक लेखक जैसी (या उससे अधिक भी) पैनी संवेदनशीलता है।’’ (वही; पृ. 71)

इसमें संदेह नहीं कि संचार क्रांति को संभव बनाने में अनुवाद का बड़ा हाथ है - बल्कि सबसे बड़ा हाथ है। आज मीडिया के सभी रूपों - मुद्रित पत्र-पत्रिकारेडियोटीवीफिल्मइंटरनेटमोबाइल - का जो भूमंडलीकृत स्वरूप उभर कर आया है उसने अनुवाद को भाषाई, सामाजिक और सांस्कृतिक कार्य के साथ-साथ अनेक संभावनाओं से युक्त व्यावसायिक कर्म बना दिया है। प्रो. दिलीप सिंह ने साहित्यिक और साहित्येतर पाठों के हवाले से अनुवाद की इस निरंतर फैलती जा रही दुनिया की समुचित मीमांसा करते हुए एक समाजभाषावैज्ञानिक की तरह इसे हिंदी के वैश्विक प्रसार के संदर्भ में व्याख्यायित किया है। वे मानते हैं कि ‘‘अनुवाद के इन व्यापक होते आयामों को भारतीय भाषाओं के संदर्भ में काफी गहराई से देखने की आवश्यकता है। अनूदित पाठ की संप्रेषणीयता शुद्धता और बोधगम्यता का आकलन अनुवादकों को गंभीर बना सकता है। केवल दो भाषाओं की जानकारी ही अनुवादक की अर्हता नहीं है। अनुवाद का कार्य मुख्यतः प्रभाववादी है। मूल का भाव ग्रहण करके उसके प्रभाव को अन्य भाषा पाठ में प्रतिस्थापित करना ही उसका लक्ष्य है जिसे हम अनूदित पाठ की गुणवत्ता कह सकते हैं।’’(वहीपृ.149)। कहना होगा कि इस कृति के माध्यम से प्रो. दिलीप सिंह ने हिंदी अनुवाद चिंतन की दुनिया को सचमुच संपन्नतर बनाया है।

* अन्य भाषा-शिक्षण के बृहत् संदर्भ  / प्रो. दिलीप सिंह / वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली – 1100022010 / मूल्य 250 रुपए/ पृष्ठ 156.

** अनुवाद की व्यापक संकल्पना / प्रो. दिलीप सिंह / वाणी प्रकाशन, नई दिल्ली – 1100022011 / मूल्य 325 रुपए / पृष्ठ 156.                                                                                                      



गुरुवार, 10 फ़रवरी 2011

वसंत पंचमी : निराला जयंती समारोह


निराला की कविता आज के मनुष्य की चेतना से जुड़ने में सक्षम है - डॉ.राधेश्याम शुक्ल. 

हैदराबाद, ०८ फरवरी २०११(प्रेस विज्ञप्ति)| 

"वसंत पंचमी सृजन का पर्व है. सकल शब्दमयी सरस्वती की प्रतिमा मनुष्य के भीतरी और बाहरी अस्तित्वों के तादात्म्य का प्रतीक है. उसका सम्बन्ध ऐसे अजर-अमर संसार से है जो काव्य का संसार है. वास्तव में मनुष्य एक साथ तीन समानांतर संसारों में जीता है. पहला संसार दार्शनिकों और वैज्ञानिकों का अर्थात ज्ञान का संसार है, तो दूसरा संसार आम जीवन का अर्थात कर्म का संसार है. जबकि तीसरा संसार भावनाओं और संवेदनाओं का, स्वप्नों और संभावनाओं का तथा आत्म और अध्यात्म का संसार है - यही है कवि का संसार. इसीलिए, कविता का यथार्थ जीवन के यथार्थ का आइना नहीं होता, बल्कि कवि के मानस का आइना होता है. कवि का मानस, जितना उज्ज्वल  होगा, उसका कवित्व उतना ही उदात्त होगा. वाल्मीकि, व्यास, कालिदास और निराला इसीलिए महाकाव्य की चेतना के कवि हैं कि वे इस तीसरे संसार में जीते हैं. इसी से निराला की कविता में, वह शक्ति आई है कि वह आज के मनुष्य की चेतना से जुड़ने में सक्षम है. निराला ने कभी आत्म-पीड़ा और आत्म-दया का भाव नहीं दिखाया, बल्कि सतत जीवन संघर्ष का उदहारण अपने व्यक्तित्व और कृतित्व द्वारा सामने रखा." 

ये उदगार 'स्वतंत्र वार्ता'  दैनिक के सम्पादक डॉ. राधे श्याम शुक्ल ने वसंत पंचमी के अवसर पर उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के साहित्य-संस्कृति मंच द्वारा आयोजित निराला जयंती समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में बोलते हुए प्रकट किए. समारोह की अध्यक्षता प्रो.ऋषभ देव शर्मा ने की. वरिष्ठ गीतकार विनीता शर्मा और कवि  डॉ.देवेन्द्र शर्मा विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित रहे. इस अवसर पर विनीता शर्मा ने विशेष रूप से वसंत और निराला पर केन्द्रित अपने कई गीत प्रस्तुत किए. 
आरम्भ में सरस्वती-दीप-प्रज्वलन के उपरांत सभा के विशेष अधिकारी एस.के.हलेमनी की ओर से अतिथियों को अंगवस्त्र प्रदान कर सम्मानित किया गया.  के.नागेश्वर राव ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत की. संध्या रानी, गायकवाड भगवान विश्वनाथ, जटावत श्रीनिवास राव और डॉ.जी.नीरजा ने निराला की कविताओं का वाचन किया. डॉ.पेरीशेट्टी श्रीनिवास राव ने 'अभी न होगा मेरा अंत' का तेलुगु अनुवाद प्रस्तुत किया. डॉ.गोरखनाथ तिवारी, डॉ.मृत्युंजय सिंह और मिसाले उत्तम लक्ष्मण ने क्रमशः महादेवी वर्मा, डॉ.  रामविलास शर्मा और अमृतलाल नागर के निराला सम्बन्धी संस्मरण पढ़ कर सुनाए . हेमंता बिष्ट ने जब निराला की प्रसिद्ध कहानी 'देवी' का वाचन किया तो सब भावाभिभूत हो गए. 

उच्च शिक्षा और शोध संस्थान में संपन्न निराला पर केन्द्रित शोधकार्यों की प्रदर्शनी भी इस अवसर पर आयोजित की गई. जिसमें, उनकी कविताओं, कहानियों, उपन्यासों और संस्मरणों के विविध  पहलुओं  पर तो अनुसन्धान किया ही गया है, साथ ही उनकी तुलना 'अमृतं कुरिसिन रात्रि' और 'कृष्णपक्षमु' जैसी तेलुगु रचनाओं के साथ भी की गई है. 

कार्यक्रम के अंतिम चरण में प्रो.ऋषभ देव शर्मा ने निराला की क्लासिक कृति 'राम की शक्तिपूजा' का भावपूर्ण सस्वर वाचन किया. संचालन डॉ.बलविंदर कौर ने किया तथा कार्यक्रम संयोजिका डॉ.साहिरा बानू बी बोरगल ने धन्यवाद ज्ञापित किया.
प्रस्तुति - डॉ.जी. नीरजा 

शुक्रवार, 27 नवंबर 2009

शत्रु मेरा बन गया है छलरहित व्यवहार मेरा

जन्मदिवस [27 नवंबर] पर विशेष
बच्चन के काव्य में मनुष्य


Picture of Harivansh Rai Bachchan

‘‘मैं छुपाना जानता तो जग मुझे साधू समझता
शत्रु मेरा बन गया है छलरहित व्यवहार मेरा।’’


कविता और गद्य दोनों में निरंतर निश्छल रूप से अपने आपको पाठकों में समक्ष प्रस्तुत करने वाले अनन्य शब्दशिल्पी डॉ. हरिवंश राय ‘बच्चन’ (27 नवंबर 1907 - 18 जनवरी 2003) ने कभी इसकी परवाह नहीं कि जग उन्हें साधु समझता है या शैतान। उन्होंने तो सहृदय लोक को अपनी कसौटी माना और उसे ही अपना प्रियतम मानकर अपनी ‘मधुशाला’ समर्पित कर दी, जग तो प्रसाद पाता ही -

'‘पहले भोग लगा लूं तेरा, फिर प्रसाद जग पाएगा।’'


छलरहित व्यवहार, जो जाने कितने अयाचित शत्रुओं को तलवारें भाँजने को प्रेरित करता है - बस निश्छल प्यार भर है। यों तो जग और जीवन भार ही है पर प्यार इसे सह्य और मधुर बना देता है -

'‘मैं जग जीवन का भार लिए फिरता हूँ,
फिर भी जीवन में प्यार लिए फिरता हूँ।’'


प्यार लिए फिरोगे तो जग तुम्हें ऐसे कभी न जाने देगा! पर प्यार करने वाले भला जग की परवाह कब करते हैं? यों भी स्नेह-सुरा का सेवन करने वालों को इतनी फुरसत कहां कि दुनिया वालों का कुत्सित प्रलाप सुनते बैठें -

'‘मैं स्नेह सुधा का पान किया करता हूँ,
मैं कभी न जग का ध्यान किया करता हूँ।’'


लुकाछिपी की जरूरत भी क्या है ? छिपाते तो वे हैं जो प्यार को पाप समझते हैं। बच्चन के मूल्य बोध में प्रेम कोई वर्जित फल नहीं है। वह तो सृष्टि का हेतु है - उतना ही सहज और निष्कलुष जितना दिवा-रात्रि का प्रत्यावर्तन:

'‘सृष्टि के आरंभ में मैंने उषा के गाल चूमे।
बाल रवि के भाग्य वाले दीप्त भाल विशाल चूमे।।
प्रथम संध्या के अरुण दृग चूमकर मैंने सुलाए।
तारिका कलिका सुसज्जित नव निशा के बाल चूमे।।’’


बच्चन के लिए प्रेम प्रकृति का उत्सव है। प्रकृति और पुरुष जब भी जहाँ भी मिल गए, वहीं आनंद की वृष्टि हो गई, वहीं उल्लास की सृष्टि हो गई -

'‘जहाँ कहीं मिल बैठे हम-तुम, वहीं हो गई मधुशाला।’'


मधुशाला भी ऐसी वैसी नहीं, इंद्रधनुष को चुनौती देने वाली -

‘‘महँदी रंजित मृदुल हथेली
में माणिक मधु का प्याला,
अंगूरी अवगुंठन डाले
स्वर्णवर्ण साकी बाला,
पाग पैंजनी जामा नीला
डाट डटे पीने वाले -
इंद्रधनुष से होड़ रही ले
आज रंगीली मधुशाला।’’


ऐसा अवसर मिले और छद्म ओढ़कर मनुष्य उसे छिपने-छिपाने के पापबोध में ही गँवा दे, यह न उचित है न वांछित। यह अवसर है मनुष्य होने का सौभाग्य, और यह मधुशाला है जीवन। मधु शराब नहीं है, प्रेम है - अनिवार प्रेम । काम तो मनुष्य और पशु दोनों में सामान्य है।प्रेम के रूप में आत्मा का विस्तार केवल मनुष्य जीवन की उपलब्धि है। उसे ओक से पीने में कैसी लाज-

‘‘आज मिला अवसर तब क्यों
मैं न छकूँ जी भर हाला,
आज मिला मौका तब फिर क्यों
ढाल न लूं जी भर प्याला ;
छेड़छाड़ अपने साकी से
आज न क्यों जी भर कर लूं -
एक बार ही तो मिलती है
जीवन की यह मधुशाला।’’


जीवन रूपी यह मधुशाला अनंत उल्लास का स्रोत बनी रहे, इसके लिए प्रेमपात्र और प्रिय के मध्य द्वैताद्वैत की क्रीड़ा चला करती है। थकना और सोना इस क्रीड़ा में नहीं चलता। एक सतत चलने वाला रास-महारास! निरंतर चलने वाला संवाद! तभी तो बच्चन को कहना पड़ा :

‘‘साथी! सो न, कर कुछ बात।
बात करते सेा गया तू,
स्वप्न में फिर खो गया तू!
रह गया मैं और आधी बात, आधी रात।’’
असल बात तो यह है कि सो जाना मर जाना है -

‘आओ, सो जाएँ , मर जाएँ ।’


पर मरना न तो कवि स्वीकार करता है, न प्रेमी (‘‘हम न मरैं, मरिहै संसारा’' - कबीर) इसलिए ‘अग्निपथ’ का भी वरण करना पड़े तो बच्चन को स्वीकार है! इस पथ पर धोखा भी मिल जाए, तो कोई शिकवा नहीं-

‘‘किस्मत में था खाली खप्पर
खोज रहा था मैं प्याला,
ढूंढ़ रहा था मैं मृगनयनी
किस्मत में थी मृगछाला ;
किसने अपना भाग्य समझने में
मुझ सा धोखा खाया -
किस्मत में था अवघट मरघट
खोज रहा था मधुशाला।’’


कवि बच्चन के लिए काव्य साधना मानव जीवन को बेहतर और उच्चतर बनाने की साधना थी। साहित्यकार के दायित्व के संबंध में उनका प्रश्न था कि क्या यूरोप के सारे साहित्यकार मिलकर प्रथम और द्वितीय विश्वयुद्ध को रोक सके। उनकी दृष्टि में साहित्यकार का अपना क्षेत्र या स्वधर्म मानव को अधिक मानवीय चेतना देना है। वे चाहते थे कि साहित्य मनुष्य को केवल मनुष्य के नाते समझे और उसके अहं को इतना छील दे कि वह दूसरे मनुष्य के साथ अपनी समता देख सके। इससे उसका व्यवहार छलरहित हो सकेगा और तब उसे कुछ भी छिपाने की जरूरत नहीं होगी। वैसे प्रेम तो न छिपाया जा सकता है, न बताया। जिसे छिपाना संभव हो, वह प्यार ही क्या! पर जिसे बताना पड़े, वह प्यार भी क्या -

‘‘प्यार किसी को करना,
लेकिन कहकर उसे बताना क्या?’’


वस्तुतः बच्चन का काव्य उनके जीवनक्रम के साथ-साथ मधुकाव्य, विषादकाव्य, प्रणयकाव्य और राजनैतिक-सामाजिक काव्य जैसे सोपान पार करते हुए अपनी विकासयात्रा संपन्न करता है (डॉ. बच्चन सिंह, हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, 428)। इस विकासयात्रा में उनका काव्यनायक अथवा अभिप्रेत मनुष्य भी निरंतर विकास करता चलता है। मधुकाव्य (मधुशाला, मधुबाला, मधुकलश) का मनुष्य उत्तरछायावाद की प्रवृत्ति के अनुरूप शरीर के अनुभवों को अधिक महत्व देता दिखाई पड़ता है। वह नियति, भाग्यवाद और मृत्युबोध से ग्रस्त होने के दौर को पार करता हुआ क्रमशः यौवन का उल्लास, साहस और चुनौतियों का सामना करने का उत्साह संजोकर अवसाद को जीतने का प्रयास करता है। अकेलेपन के घनघोर अँधेरे के पार झिलझिलाते प्रकाश के प्रति आस्था बच्चन के मधुकाव्य के मनुष्य को ‘साधारण मनुष्यों का नायकत्व’ प्रदान करती है। यह मनुष्य विषादकाव्य (निशानिमंत्रण, एकांत संगीत, आकुल अंतर) में अवसाद की कड़ी चोटें झेलता दिखाई देता है परंतु नीड़ उजड़ जाने पर भी हताश नहीं है तथा अपने शोक को इस प्रकार श्लोकत्व प्रदान करता है कि अनुभूति की सघनता और करुणा के योग से उसमें देवत्व को भी ललकार सकने वाली तेजस्विता जन्म लेती है। इस तेजस्विता में दुर्बलता को दुलराने वाली दुर्लभ मानवता (‘‘दुर्बलता को दुलराने वाली मानवता दुर्लभ है’’- डॉ. बच्चन सिंह, हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास, 429) निहित है। इस मनुष्य का अनुभूतिजन्य करुण आत्मविश्वास द्रष्टव्य है :

‘‘मुझ में है देवत्व जहाँ पर,
झुक जाएगा लोक वहाँ पर,
पर न मिलेंगे मेरी दुर्बलता को दुलराने वाले!’’
(निशा निमंत्रण, गीत 70)|


इसी से वह संकल्पवान और आस्थाशील मनुष्य प्रकट होता है जो ‘क्षतशीश’ होकर भी ‘नतशीश’ होने को तत्पर नहीं है। इस मनुष्य का अगला विकास प्रणयकाव्य (सतरंगिनी, मिलनयामिनी, प्रणय पत्रिका) में नीड़ का फिर-फिर निर्माण करने तथा अँधेरी रात के अस्तित्व को स्वीकार करते हुए भी अँधेरे के सामने आत्मसमर्पण किए बिना दीवा जलाकर अंधकार पर प्रकाश की जीत को सुनिश्चित करने वाले धीर नायक के रूप में सामने आता है। सामाजिक-राजनैतिक कविताओं (बंगाल का काल, खादी के फूल, सूत की माला, धार के इधर-उधर, आरती और अंगारे, बुद्ध और नाचघर, त्रिभंगिमा, चार खेमे चौंसठ खूँटे, दो चट्टानें, जाल समेटा) तक आते-आते बच्चन का यह काव्य-नायक मनुष्य अपने व्यक्तित्व के रूपांतरण और समाजीकरण में सफल हो जाता है ; और यही मनुष्यत्व की सार्थकता है - कवित्व की भी :

‘‘ओ जो तुम बाँधकर चलते हो हिम्मत का हथियार,
ओ जो तुम करते हो मुसीबतों व मुश्किलों का शिकार,
ओ जो तुम मौत के साथ करते हो खिलवार,
ओ जो तुम अपने अट्टहास से डरा देते हो मरघटों का सुनसान,
भर देते हो मुर्दों में जान,
ओ जो तुम उठाते हो नारा - उत्थान, पुनरुत्थान, अभ्युत्थान!
तुम्हारे ही लिए तो उठता है मेरा क़लम,
खुलती है मेरी ज़बान।
ओ जो तुम ताजे़,
ओ जो तुम जवान!’’
(‘आह्वान’, बुद्ध और नाचघर, 28)


बच्चन की दृष्टि में वह मनुष्य मनुष्य नहीं, पशु है जिसका स्वाभिमान जीवित न हो। उनका काव्य ऐसे मनुष्य की ख़ोज का काव्य है जो युद्धक्षेत्र में भुजबल दिखलाता हुआ प्रतिपल अविचल और अविजित रहे। यह मनुष्य अपने खून-पसीने से प्राप्त अधिकार का उपभोग करता है तथा भाग्यवाद का प्रचार करने वाले मठ, मस्जिद और गिरजाघरों को ‘मनुज-पराजय के स्मारक’ मानता है :

‘‘झुकी हुई अभिमानी गर्दन,
बँधे हाथ, नत-निष्प्रभ लोचन!
यह मनुष्य का चित्र नहीं है, पशु का है, रे कायर!
प्रार्थना मत कर, मत कर, मत कर!’’
(बच्चन रचनावली - 1, एकांत संगीत, 254)

बच्चन अपनी कविता में जिस मनुष्य को गढ़ते हैं, वे चाहते हैं कि वह भले ही दोस्तों की बेवफाई का शिकार बनकर अभागा रह जाए लेकिन उनके चेहरे पर पड़े मित्रता के उस आवरण को छिन्न-भिन्न न करे जिसके आधे तार उसके अपने हाथ के काते और बुने हैं ;परंतु शत्रु के समक्ष किसी भी प्रकार की भीरुता उन्हें सह्य नहीं है, तभी तो -

‘‘शत्रु तेरा
आज तुझ पर वार करता
तो तुझे ललकारता मैं -
उठ,
नहीं तू यदि
नपुंसक, भीरु, निर्बल,
चल उठा तलवार
औ’ स्वीकार कर उसकी चुनौती।’’
(बुद्ध और नाचघर, ‘दोस्तों के सदमे’, 91)


यहाँ यह भी स्पष्ट कर देना उचित होगा कि कवि को अपनी कविता के लिए भले और बुरे दोनों ही तरह के मनुष्य मिले हैं, परंतु उसकी खोज का लक्ष्य केवल वही मनुष्य है जो मनुष्यता के उदात्त गुणों से संपन्न हो। यह खोज तब तक चलती रहेगी जब तक विश्वासघात करने वाला आदमजात सचमुच अपने दृष्टिकोण को कम-से-कम इतना बड़ा न बना ले कि किसी का सम्मान कर सके, किसी की कमज़ोरी का आदर कर सके, क्योंकि इसी गुण से मनुष्य को देवत्व प्राप्त होता है :

‘‘बहुत बड़ा कलेजा चाहिए
किसी का करने को सम्मान,
और किसी की कमज़ोरियों का आदर -
यह है फ़रिश्तों के बूते की बात,
देवताओं का काम!’’
(बुद्ध और नाचघर, ‘कडुया अनुभव’, 105)


पहाड़ी चिड़िया के बहाने अपने काव्य नायक को संबोधित करते हुए बच्चन उसे किसी भी प्रकार का प्रलोभन या बंधन स्वीकार करने से रोकते हैं तथा उसे मुक्त आकाश, पृथ्वी और पवन से प्रेरणा प्राप्त करने को कहते हैं। कवि अपने मनुष्य से चाहता है कि वह कभी पराजय स्वीकार न करे बल्कि चुनौतियों का डटकर मुक़ाबला करे -

‘‘बादलों के गर्जनों से,
बात करते तरु-दलों से,
साँस लेते निर्झरों से
राग सीखो। xxx
नीड़ बिजली की लताओं पर बनाओ।
इंद्रधनु के गीत गाओ।’’
(बुद्ध और नाचघर, ‘काल विहंगिनी’, 116)


चिड़िया से आगे बढ़कर कवि चील-कौए और पपीहे के द्वंद्व के माध्यम से मनुष्य की अंतर्वृत्तियों के संघर्ष को रूपायित करता है। सब कुछ को हस्तगत करने की अविवेकपूर्ण क्षुद्र वासना के चील-कौए मनुष्य की अंतश्चेतना में तभी बस पाते हैं जब वह केवल स्वाति-जल की रट लगाने वाले पपीहे की गर्दन तोड़ देता है। मनुष्यत्व का संस्कार जगता है तो मनुष्य फिर से पपीहे की प्रतीक्षा करता है :

‘‘पालना उर में
पपीहे का कठिन है,
चील-कौए का, कठिनतर,
पर कठिनतम
रक्त, मज्जा,
मांस अपना
चील-कौए को खिलाना,
साथ पानी
स्वप्न स्वाती का
पपीहे को पिलाना। xxx
तुम अगर इंसान हो तो
इस विभाजन,
इस लड़ाई
से अपरिचित हो नहीं तुम!’’


बच्चन की कविता के मनुष्य का आदर्श वह स्फटिक निर्मल और दर्पण-स्वच्छ हिमखंड कदापि नहीं हो सकता जो गल-पिघल और नीचे को ढलककर मिट्टी से नहीं मिलता। उसका आदर्श तो वह नदी है जो मिट्टी के कलंक को भी अपने अंक में लेकर जीवन की गत के साथ मचलती है। समाज का वह कथित कुलीन वर्ग जो साधारण जीवन के लोकानुभवों से वंचित है, बच्चन का काव्यनायक नहीं है। हिमखंड अपने ठोस दुर्लभ आभिजात्य में कितना भी इतरा ले, कवि के मनुष्य का आदर्श तो नदी जल की सर्वत्र अयत्न सुलभता ही है -

‘‘उतर आओ
और मिट्टी में सनो,
ज़िंदा बनो,
यह कोढ़ छोड़ो,
रंग लाओ,
खिलखिलाओ,
महमहाओ।
तोड़ते हैं प्रेयसी-प्रियतम तुम्हें ?
सौभाग्य समझो,
हाथ आओ,
साथ जाओ।’’
(बुद्ध और नाचघर, ‘चोटी की बरफ’, 126)


मनुष्यता की जययात्रा के मूल में मनुष्य की अदम्य जिजीविषा तथा अपराजेय संघर्षशीलता की परंपरा विद्यमान रही है। कवि बच्चन का मनुष्य इस परंपरा के दाय को स्वीकार करता है और इसके प्रति अपने उत्तरदायित्व से विमुख नहीं है। परंपरा का ऋण-शोधन करके ही विकास के क्रम को आगे बढ़ाया जा सकता है -

‘‘जो शकट हम
घाटियों से
ठेलकर लाए यहाँ तक,
अब हमारे वंशजों की
आन ,
उसको खींच ऊपर को चढ़ाएँ
चोटियों तक।’’
(बुद्ध और नाचघर, ‘युग का जुआ’, 129)


मनुष्य का जीवन निरंतर ऊहापोह, उत्थान-पतन और परिवर्तन की गाथा है : ऐसे परिवर्तन जो उसके ऊपर एकांत और निर्वासन की त्रासदी को नियति की तरह छोड़ देते हैं। इस एकाकी और निर्वासित मनुष्य की बेचैनी और उदासी साँझ के उस पिछड़े पंछी की तरह है जिसका नीड़ उजड़ चुका है। नीड़ का यह पंछी वह अनिकेतन मनुष्य है जिसकी पीड़ा को कवि ने अपने अनुभव से जाना है -

‘‘अंतरिक्ष में आकुल-आतुर,
कभी इधर उड़, कभी उधर उड़,
पंथ नीड़ का खोज रहा है पिछड़ा पंछी एक - अकेला!
बीत चली संध्या की वेला!’’
(निशानिमंत्रण, गीत - 5)


साँझ की बेला बीतती है, तो अँधियारा और घनघोर तथा भयावह हो जाता है, लेकिन बच्चन का पथिक-मनुष्य इस अँधरे से डरकर न तो रुककर बैठ जाता है, न चुपचाप दबे पाँव चलता है ; इसके विपरीत वह सुनसान अंधकार के डर को ऊँचे स्वर के गीत की आरी से काटता है -

‘‘डर न लगे सुनसान सड़क पर,
इसीलिए कुछ ऊँचा कर स्वर,
विलग साथियों से हो कोई पथिक, सुनो, गाता आता है।
अंधकार बढ़ता जाता है।’’
(निशानिमंत्रण, गीत - 8)


अंधकार बढ़ता है, तो रात और गहरी होती है। रात गहराती है, तो प्रवंचनाओं की संभावना बढ़ जाती है। असंभव सपनों में खोए अपने काव्यनायक को सावधान करते हुए कवि कहता है -

‘‘सत्य कर सपने असंभव!
पर, ठहर, नादान, मानव --
हो रहा है साथ में तेरे बड़ा भारी प्रवंचन
अब निशा देती निमंत्रण।’’
(निशानिमंत्रण, गीत - 17)


काल की प्रवंचना और मनुष्य के प्रयत्न के द्वंद्व से ही मनुष्यता निखरती है। काल से जूझता हुआ यह मनुष्य अब कोई एकाकी व्यक्ति मात्र नहीं है, संपूर्ण मानवजाति का प्रतिनिधि है। कवि इस विश्वमानव के लिए शुभकामना व्यक्त करता है -

‘‘मानव का सच हो सपना सब,
हमें चाहिए और न कुछ अब,
याद रहे हमको बस इतना - मानव जाति हमारी !
जय हो, हे संसार, तुम्हारी!’’
(निशानिमंत्रण, गीत - 98)


इस विश्वमानव का दर्शन कवि बच्चन ने अपनी काव्ययात्रा के आरंभ में ही कर लिया था। उन्हें वह मनुष्य नहीं चाहिए जो संपूर्ण जगत को धर्म, जाति, वर्ग, संप्रदाय आदि के आधार पर बाँटता हो, बल्कि वे केवल ऐसे विद्रोही मनुष्य का ही स्वागत करने को तैयार हैं जो इन तमाम भेदों का अतिक्रमण कर चुका हो और ‘वसुधैव कुटुम्बकं' तथा ‘विश्वबंधुत्व’ का प्रतीक हो -

‘‘धर्म-ग्रंथ सब जला चुकी है
जिसके अंतर की ज्वाला,
मंदिर, मस्जिद, गिरजे-सबको
तोड़ चुका जो मतवाला,
पंडित, मोमिन, पादरि़यों के
फंदों को जो काट चुका,
कर सकती है आज उसी का
स्वागत मेरी मधुशाला।’’
(बच्चन रचनावली -1, ‘मधुशाला’, 47)


अपनी शक्ति पर विश्वास तथा संघर्ष के प्रति दृढ़ संकल्प वे मूल्य हैं जिनसे कवि बच्चन ने अपने काव्यनायक के सहज मानवीय व्यक्तित्व को गढ़ा है। ये मूल्य उनके काव्य में अनेक स्थलों पर अनेक प्रकार से व्यक्त हुए हैं। विपरीत परिस्थितियों की भीषणता से भयभीत होकर अपने प्रयत्न को छोड़ बैठना या अंतिम क्षण तक लड़े बिना ही हार मान बैठना बच्चन के मनुष्य का स्वभाव नहीं है ; उसे साधनहीनता के
बावजूद असाध्य ध्येय को भी साध लेने की अपनी क्षमता पर अटूट विश्वास है :
‘‘जायगा उड़ पाल होकर तार-तार विशद गगन में,
टूटकर मस्तूल सिर पर आ गिरेगा एक क्षण में,
नाव से होकर अलग पतवार धारा में बहेगी,
डाँड छूटेगा करों से, पर बचा यदि प्राण तन में

तैर कर ही क्या न अपने ध्येय को मैं जा सकूंगा ;
मथ चुके हैं कर न जाने बार कितनी विश्व-सागर!

धूलिमय नभ, क्या इसी से बाँध दूँ मैं नाव तट पर ?’’
(बच्चन रचनावली -1, 140)


इस सतत संघर्षशील, सहज संकल्पशाली, दृढ़व्रती तथा अपराजेय मनुष्य को अग्नि के अनंत पथ पर चलना स्वीकार है परंतु किसी बड़े वृक्ष से एक पत्ता-भर भी, छाँह माँगना गवारा नहीं। इसने कभी भी न थकने, न थमने और न मुड़ने की शपथ ली है। आँसू, पसीने और खून से लथपथ साधारण मनुष्य का यह संघर्ष असाधारण है; और इसीलिए महान भी :

‘‘अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

वृक्ष हों भले बड़े,
हों घने, हों बड़े,
एक पत्र-छाँह भी माँग मत, माँग मत,माँग मत!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

तू न थकेगा कभी!
तू न थमेगा कभी!
तू न मुड़ेगा कभी! - कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

यह महान दृश्य है -
चल रहा मनुष्य है
अश्रु-स्वेद-रक्त से लथपथ, लथपथ, लथपथ!
अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!’’
(बच्चन रचनावली -1, ‘एकांत गीत’, 247)|