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शुक्रवार, 19 जुलाई 2024

'लिए लुकाठी हाथ' के लेखक प्रवीण प्रणव का वक्तव्य

 

ऋषभदेव शर्मा  के साहित्य पर एकाग्र अपनी आलोचना पुस्तक 'लिए लुकाठी हाथ' (2024: हैदराबाद; बिभूति प्रकाशन) पर लेखक प्रवीण प्रणव का

           लेखकीय ...

एक साहित्यिक परिवेश से आने की वजह से साहित्य में रुचि होना स्वाभाविक है लेकिन यह रुचि बस शौकिया ही रही। 2007 में मैं नौकरी के सिलसिले में हैदराबाद आया। तब तक मेरी कविताओं में रुचि थी, यदा-कदा कुछ लिख भी लेता था लेकिन इससे ज्यादा मेरी निकटता साहित्य से नहीं रही। 2014-15 के आस-पास मेरी सक्रियता हैदराबाद में साहित्यिक जगत में हुई और जल्द ही मेरा परिचय प्रो. ऋषभदेव शर्मा से हुआ।


कम ही लोग ऐसे होते हैं जिनके साथ बात करते हुए आप हर बार कुछ नया सोचने पर विवश होते हैं, हर बार आप कुछ नया सीखते हैं, हर बार आप कुछ नया करने की प्रेरणा पाते हैं और प्रो. ऋषभदेव शर्मा ऐसे ही व्यक्ति हैं। आरंभ में मेरी पहचान उनसे सिर्फ साहित्यिक कार्यक्रमों से हुई जहाँ उनके वक्तव्यों को सुनते हुए और उनकी कविताओं को सुनते हुए मैं उनसे प्रभावित होता रहा। तब तक यह ज्ञात भी नहीं था कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा विपुल साहित्य के रचयिता भी हैं। धीरे-धीरे मेरा परिचय उनके साहित्य से हुआ और फिर मैं उनके साहित्य से इस कदर प्रभावित हुआ कि आज शायद ही उनके द्वारा लिखा हुआ कुछ प्रकाशित/अप्रकाशित हो, जिसे मैंने न पढ़ा हो। उनकी कुछ किताबों की मैंने समीक्षा लिखी, उनके साहित्य पर आधारित कुछ साहित्यिक लेख लिखे, कुछ साहित्यिक कार्यक्रमों में प्रो. ऋषभदेव शर्मा के साहित्य पर वक्तव्य दिया।  विगत दस वर्षों में इस तरह प्रो. ऋषभदेव शर्मा के साहित्य पर मेरी समीक्षात्मक टिप्पणियों की एक लंबी फेहरिस्त बन गई। मैंने कई बार सोचा कि इन आलेखों को एक जगह एकत्रित कर पुस्तकाकार कर दिया जाय ताकि प्रो. ऋषभदेव शर्मा के साहित्य को समझने वालों के लिए यह एक उपयोगी किताब साबित हो सके। जो प्रो. ऋषभदेव शर्मा से या उनके साहित्य से परिचित नहीं हैं उनके लिए भी इन आलेखों को पढ़ना रुचिकर होगा। इसी सोच की परिणति के रूप में यह किताब ‘लिए लुकाठी हाथ’ आपके सामने है। 



प्रो. #ऋषभदेवशर्मा का रचनाकर्म जनवादी है। बिना ‘वामपंथ’ या ‘प्रगतिशील’ होने का ठप्पा लगाए, उनकी रचनाएँ सत्ता के विरुद्ध एवं जनता के हक़ में आवाज़ उठाती रही हैं। शोषक वर्ग के विरुद्ध और शोषितों के साथ खड़े होना उनकी कविताओं की मूल भावना है। #तेवरी आंदोलन के प्रवर्तकों में से एक प्रो. ऋषभदेव शर्मा की रचनाएँ किसी ‘वाद’ का समर्थन नहीं करतीं बल्कि उनके लिए ‘वाद’ का अर्थ ही वंचित वर्ग है। ऐसे में स्वाभाविक है कि उनकी रचनाओं पर दृष्टिपात करते हुए, इन बिंदुओं की चर्चा हो। अपनी समीक्षाओं में मैंने कोशिश की है कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की रचनाओं का मूल्यांकन करते हुए इनकी तुलना समकालीन और कालजयी साहित्य के साथ भी की जाए ताकि पाठकों के लिए न सिर्फ अधिक जानकारी मिले बल्कि इस तुलनात्मक अध्ययन से प्रो. ऋषभदेव शर्मा के साहित्य को वृहत अर्थों में समझा जा सके। 


जिनके साहित्य पर इस संग्रह के सभी लेख आधारित हैं, उन प्रो. ऋषभदेव शर्मा को धन्यवाद कहना उनकी शख्सियत को छोटा करने जैसा है। सच यह है कि मैं और मेरे जैसे कई नवांकुरों ने साहित्य की समझ प्रो. ऋषभदेव शर्मा से ही पाई है। उन्होंने अपना अमूल्य समय और सुझाव देकर, कई साहित्यकारों को इस योग्य बनाया है कि आज वे हिंदी साहित्य का जाना-पहचाना चेहरा बन सके हैं। उनके मार्गदर्शन के बिना इस किताब की कल्पना नहीं की जा सकती थी। 


विगत कई वर्षों से आदरणीय प्रो. गोपाल शर्मा (Gopal Sharma)   और आदरणीय अवधेश कुमार सिन्हा (Awadhesh Sinha)  से लगातार साहित्यिक विचार-विमर्श होता रहा है और यह मेरी खुशकिस्मती है कि इस किताब के लिए इन दोनों ने ही अपना आशीर्वचन दिया है। आदरणीया प्रो.निर्मला मौर्य जी (Nirmala S Mourya)  के प्रति विशेष रूप से आभारी हूँ कि उन्होंने इस पुस्तक को अपने आशीर्वचन से सुशोभित किया है। प्रो. देवराज (Dev Raj) जिनकी विद्वता का मैं कायल रहा हूँ और उससे भी ज्यादा उनकी सौम्यता और सरलता का। प्रो. ऋषभदेव शर्मा के तो वे गुरु भी रहे हैं। ऐसे में उनकी तरफ से इस पुस्तक के लिए लिखे गए शब्द हमारे लिए साहित्य के उत्कृष्ट सम्मान से कम नहीं हैं। मैं इन सभी महानुभावों के प्रति एक बार पुनः धन्यवाद ज्ञापित करता हूँ। पुस्तक के प्रकाशन के लिए बिभूति प्रकाशन और मुद्रण के लिए हरिओम प्रिंटर्स का भी विशेष धन्यवाद और आभार।


इस किताब पर आपकी प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा रहेगी।   


              -प्रवीण प्रणव            @Praveen Pranav 

praveen.pranav@gmail.com

फ़ोन :  9908855506

                    हैदराबाद 

                   4 जुलाई, 2024.




गुरुवार, 18 जुलाई 2024

शुभाशंसा_प्रो. निर्मला एस. मौर्य_'लिए लुकाठी हाथ' के लिए

 


 शुभाशंसा .....

जीने-भोगने के यथार्थ पलों का कच्चा चिट्ठा

  • निर्मला एस. मौर्य

… जो मंद-मंद मुस्कुराते हुए चुप रहते हैं और अचानक हँस कर कह देते हैं- ’प्रेम बना रहे!’... उनका यह कथन बरबस ही सामने वाले का मन अपनी ओर आकर्षित कर लेता है। कुछ न कह कर अपने व्यवहार से बहुत कुछ कह जाने वाला एक अनोखा व्यक्तित्व… जिसका नाम है डॉ. ऋषभदेव शर्मा… पारिवारिक मित्र, सहकर्मी, बड़े भाई सा स्नेह रखने वाले, अग्रज… ऐसे कई संबोधन हैं जो उनके ऊपर जँचते हैं!...


जब जब मन में आक्रोश अपने पाँव पसारता है, तब-तब ‘लेखनी से शब्द उतरते हैं पन्नों पर चुपचाप’ और पाठकों के हृदय को आंदोलित तथा आलोड़ित कर देते हैं।… डॉ. ऋषभदेव शर्मा का साहित्य संसार बहुआयामी है और इनकी रचनाओं में कहीं अकेलापन है, कहीं आदमी और धूप की कथाएँ हैं, कहीं बूँदे बरसती हैं तो कहीं अधूरे सपनों को पूरा करने का ख़्वाब है। वह कई अनुभवों से गुजरते हैं; ऐसा लगता है मानो उनका रचना संसार स्वयं गुपचुप बतियाता है। कहीं वह मन से आह्लादित होते हैं तो कहीं रिक्त मन की व्यथाएँ और वेदनाएँ पंक्तियों में उतर आती हैं। उनका साहित्य मानव के अस्तित्व का साहित्य है। अब आसपास का संसार बड़ी तेजी से बदल रहा है। इन बदलती हुई परिस्थितियों को आपकी रचनाओं में देखा जा सकता है क्योंकि, इन घटती हुई घटनाओं ने रचनाकार के मन को लगातार प्रभावित किया है और इन्हीं में से रचनाकार ने अपनी कृतियों के लिए पंक्तियाँ ढूँढ़ ली हैं तथा शब्दों के सहारे अपनी अभिव्यक्तियाँ दे दी हैं।  उनकी इन्हीं अभिव्यक्तियों को ‘लिए लुकाठी हाथ’ समीक्षा कृति में बहुत शिद्दत से महसूस किया जा सकता है। इस समीक्षा कृति के समीक्षक प्रवीण प्रणव कहते हैं- ‘शोषक वर्ग के विरुद्ध और शोषितों के साथ खड़े होना उनकी कविताओं की मूल भावना है। उनकी रचनाएँ किसी वाद का समर्थन नहीं करतीं बल्कि उनके लिए वाद का अर्थ ही वंचित वर्ग में है।’ वह लिखते हैं कि- ‘ऋषभ जी की रचनाओं का मूल्यांकन करते हुए उनकी तुलना समकालीन और कालजयी साहित्य के साथ की जानी चाहिए।’ 


मैं यहाँ एक बात स्पष्ट कर दूँ कि किसी भी कृतिकार या रचनाकार की रचनाओं का मूल्यांकन अन्य कोई कर ही नहीं सकता, उस पर दृष्टिपात  करते हुए विचार अवश्य किया जा सकता है; मूल्यांकन तो रचनाकार स्वयं अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व से करता है तथा लगातार अपने कृतित्व में सुधार करते हुए आगे बढ़ता चला जाता है। रचनाकार का अपना संसार और अपनी दुनिया होती है। मानव जीवन सम और विषम रेखाओं के बीच पलता है तथा  रचनाकार इन्हीं रेखाओं की अभिव्यक्ति, शब्दों को संवेदनाओं के धागों में पिरोकर करता है। 



प्रवीण प्रणव द्वारा लिखित यह समीक्षा कृति अपने आप में अनूठी है। इसमें कुल 9 आलेख शामिल हैं। ‘दीवानों की बस्ती में उम्मीदों का रोशनदान’ में ऋषभ जी के साहित्यिक व्यक्तित्व और उनके अवदान की चर्चा है। प्रणव जी कहते हैं- ‘साहित्य समाज दर्पण होता है लेकिन साहित्य साहित्यकार का भी दर्पण होता है।’ इस आलेख में ऋषभ जी के कवि कर्म की विस्तार से चर्चा की गई है और इसके साथ ही ‘देहरी’ जैसी कृति में किस प्रकार स्त्री पक्ष की चर्चा ऋषभ जी ने की है इसका बड़ा ही सूक्ष्म अवलोकन दिखाई देता है। समीक्षक कहते हैं- ‘प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा की कविताओं की नायिका किसी भी जुल्म को खामोशी से सह जाने की परंपरा के खिलाफ आवाज़ उठाती है।’ ‘प्रेम बना रहे’, ताकि सनद रहे, धूप ने कविता लिखी है,कविता के पक्ष में, कथाकारों की दुनिया, हिंदी कविता : अतीत से वर्तमान, कविता का समकाल, हिंदी भाषा के बढ़ते कदम, जैसी अनेकानेक रचनाओं पर विचारोत्तेजक समीक्षा देखने को मिलती है।  समय-समय पर लिखे जाने वाले संपादकीयों  की चर्चाओं को ‘संपादकीयम - भविष्य का आईना, वर्तमान की नज़र’ में समेटा गया है। एक अच्छा व्यंग्य भी है ‘तू न समझेगा सियासत, तू अभी नादान है’। यह रचना सियासत का कच्चा चिट्ठा खोलती है। ‘हम हैं बिलोकना चाहते जिस तरु को फूला- फला’ जैसे लंबे लेख में भाषिक संस्कृति के प्रति चिंता की दृष्टि दिखाई देती है। ‘कबहूँ न जाइ ख़ुमार’ बहुत ही सुंदर प्रस्तुति है। ये सभी शीर्षक अपने आप में एक-एक पुस्तक के समान हैं और कभी मौका मिला तो इस समीक्षा पुस्तक पर अलग से अपने विचार अवश्य विस्तार से व्यक्त करूँगी। 


इसी प्रकार ‘अपने शिल्प की सीमा से बाहर जाकर लिखने की कला’ में डॉक्टर ऋषभ जी के लेखन सौंदर्य और लेखन प्रक्रिया की चर्चा है। ‘आज की रात बचेंगे तो सहर देखेंगे’ में जीवन के भिन्न-भिन्न रंग दिखाई देते हैं। कोरोना काल की विभीषिकाओं के कई रंग इस आलेख को विचारोत्तेजक बनाते हैं। कोरोना महामारी के समय पूरा विश्व मृत्यु की काली छायाओं में लिपटा हुआ था, शहरों में सन्नाटा था। इस समीक्षा को पढ़ना उस लंबी काली रात के अँधेरों की याद दिलाता है।


इस तरह, लेखक प्रवीण प्रणव का यह समीक्षा ग्रंथ अपने हर शीर्षक में अनुभूतियों का ज़खीरा समेटे हुए है। समग्रतः, यह ग्रंथ पाठक के मन को बाँध लेने में समर्थ है, क्योंकि पाठक अपने मन  के सभी भावों और रंगों को  इन शीर्षकों में पाता है और स्वयं को इनसे जोड़ पाता है। चारों तरफ नज़र दौड़ाएँ तो यह  देखने में आता है कि अब समय जितनी तेज़ी से बदल रहा है, उतनी ही तेज़ी से मानव का अस्तित्व भी बदल रहा है। आज का साहित्य अपनी परिधि से बाहर निकल कर विश्व के विशाल प्रांगण में आ खड़ा हुआ है। रचनाकार बदलती हुई घटनाओं से तेज़ी से प्रभावित होता है और इन्हीं घटनाओं को अपनी कृतियों में जगह देता है। इन जीती- जागती कृतियों को समीक्षक ने जीने-भोगने के यथार्थ पलों का कच्चा चिट्ठा बनाकर प्रस्तुत कर दिया है। हर व्यक्ति जिस लक्ष्य को लेकर चलता है; उसका वह लक्ष्य पूरा हो, वह नव-सृजन कर पाए, यही मेरी कामना है। मनुष्य और मनुष्य के बीच संवाद अत्यंत आवश्यक होता हैं, तभी एक मजबूत रिश्ता बनता है।  यदि संवाद सार्थक न हो तो बरसों से बंद  हृदय के कपाट भी नहीं खुल पाते। प्रवीण प्रणव की समीक्षात्मक कृति ’लिए लुकाठी हाथ’ एक व्यक्तित्व  ही नहीं बल्कि एक अस्तित्व के मन के सफ़र की दास्तां है। साहित्य जगत में यह समीक्षा कृति सदैव अपनी उपस्थिति दर्ज कराती रहेगी। 

शुभमस्तु…

  • प्रो. निर्मला एस. मौर्य 

    पूर्व कुलपति 

वीर बहादुर सिंह पूर्वांचल विश्वविद्यालय, जौनपुर, उत्तर प्रदेश  





मंगलवार, 16 जुलाई 2024

अभिमत_प्रो. गोपाल शर्मा_'लिए लुकाठी हाथ' पर


आत्मीय संस्मरणों से संचित, सुवासित और सुव्यवस्थित

                     - गोपाल शर्मा

यदि हम किसी साहित्यकार को जानते, पहचानते और सम्मानते हैं तो उन पर लिखना और उनकी रचनाओं पर स्वाधीन समीक्षात्मक लेखन की पेशकश करना कठिन हो जाता है।  कभी- कभी  इन्ही कारणों से आसान  भी हो जाता है।  इसलिए इस पुस्तक में संकलित   9  आलेखों  की पाठकोन्मुख समीक्षा करना कठिन और उनका क़िस्त-दर-क़िस्त पाठ करना आसान है।  

'लिए लुकाठी हाथ' के रचयिता (डॉ.) प्रवीण प्रणव उन जातकों में से हैं जो अंक 9 के प्रभाव से दूसरों की मदद करने वाले और अपनी ऊर्जा को परहित में लगाना पसंद करते हैं। आप भी अब जब इन 9 आलेखों का पाठ करने वाले हैं तो इस पुस्तक के शीर्षक के तीन बीज  शब्दों   का ध्यान रखें । लेखक प्रवीण प्रणव के 'लिए'  प्रो. ऋषभदेव शर्मा  की तेवरियाँ कबीर की 'लुकाठी' सी मार करती - मार्ग दिखाती हैं जो  अंतर 'हाथ' का सहारा देती है। इसलिए जब आलोचक प्रवर के रूप में कवि प्रवीण  इनका गूढ़ अध्ययन करके प्रसन्न होकर प्रसन्नवदन कवि ऋषभ को विलोकते हैं तो उनके रचना संसार में कभी भविष्य का  आईना  देखते हैं और कभी वर्तमान की नज़र।

इस रचना कर्म में इस बात को रेखांकित तो किया ही गया है कि कवि साहित्यकार  के रूप में  ऋषभ शिल्प की सीमा के पार जाकर अर्थ की खुमारी को उम्मीदों के रोशनदान से आलोकित करते हैं, यह भी बता दिया गया है कि कवि ऋषभ दीवानों की जिस बस्ती में रहते हैं  उसमें  नादान का प्रवेश कठिन है। यही इस संग्रह के सहेजक का मंतव्य दिखाई देता है जिसे वे इन पंक्तियों से क्या खूब समेटते हैं-  मुमकिन नहीं कि  शाम-ए-अलम की सहर न हो!  'खूबसूरत फूलों की खुशबू और बारूद की गंध से लबरेज़ होकर लिखी कविताओं से मानस मुकुल सुवासित होता है'-  क्या खूब पकड़े हैं!

अतः  इस संग्रह के पाठक इन आलेखों को उस कुंजी के समान लें, उस कर-ताली के मानिंद समझें जिससे भावों का अनुवाद कविता के अनुवाद से कई गुना बेहतर हो जाता है।  इस संग्रह में  उस तरफ भी दृष्टि दौड़ाई गई है जिस तरफ कवि की कविता का पुनर्जन्म होता है और  न ख़त्म होती कविता अंग्रेजी अनुवाद के माध्यम से पुनः  प्रकट हो जाती है।  यही नहीं, जब ‘गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति' सूक्ति को  सत्य चरितार्थ करते नित्य प्रति बरसों से संपादकीय लिखते उस गद्यकार  के चोखे गद्य से आलोचक प्रवीण   परिचय कराते हैं जिनके नाम में ही 'देव' है तो पाठक नए आलोक में  ऋषभदेव शर्मा के रचना कर्म को देखने-जाँचने-परखने का  सलीका और सुभीता सहज में ही पा जाता है।  

आत्मीय और आदरयुक्त संस्मरणों से संचित, सुवासित और सुव्यवस्थित इन आलेखों के पाठ से  पाठक को गंभीर  समीक्षाओं के साथ-साथ यत्र-तत्र इनके रचनाकार के लेखन अनुभवों से परिचय भी हो जाता  है। यह 'लुकाठी' भावी लेखकों के लिए दिग्दर्शक भी  होगी, इसमें संदेह नहीं। 

साहित्यिक अभिरुचि रखने वाले पाठकों   को पुस्तक की  अपनी  प्रति सुलभ हो, इसी अभिलाषा को पूरी होते देखना चाहता हूँ। इन आलेखों को पुस्तक के रूप में देखकर अपनी प्रसन्नता को व्यक्त करने का यह सुअवसर मैं क्यों  गँवाता? मेरी भी आभा इसमें है और रहे। इसके लिए  उन सब  हाथों को  धन्यवाद जिन्होंने इस पुस्तक के प्रकाशन को संभव बनाया।  

पुस्तकों की शताधिक भूमिकाएँ  लिखकर संवीक्षक, संरक्षक और  साहित्य-संपन्न हो गए  ऋषभदेव शर्मा के सम्मुख एक और  यथायोग्य  प्रस्तुति !   

- गोपाल शर्मा            

पूर्व प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, 

भाषा विज्ञान विभाग, 

अरबा मींच विश्वविद्यालय, इथोपिया।

सोमवार, 15 जुलाई 2024

भूमिका_श्री अवधेश कुमार सिन्हा_'लिए लुकाठी हाथ' के लिए

 ::भूमिका::


लुकाठी की चिनगारियों से बनता दीप-स्तंभ

अवधेश कुमार सिन्हा

कोई ‘किसी’ के साथ बात करते हुए हर बार कुछ नया सोचने पर विवश हो जाए, हर बार कुछ नया सीखे, कुछ नया करने की प्रेरणा पाए, तो वह ‘किसी’ व्यक्ति निश्चित ही बहुमुखी और विलक्षण प्रतिभा का धनी होगा। और खासकर तब जब सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दुनिया की सबसे बड़ी बहुराष्ट्रीय कम्पनी में दैनन्दिन इनोवेट, दूसरों को इनफ्लुएंस व कनविन्स करने वाला कॉर्पोरेट जगत का एक उच्चस्थ प्रबंधन विशेषज्ञ उस ‘किसी’ से मिलने के बाद स्वयं इनफ्लुएंस हो रहा हो, इनोवेट करने की प्रेरणा पा रहा हो तो वह ‘किसी’ व्यक्ति कई मामलों में वाकई असाधारण एवं अनुकरणीय होगा। इस पुस्तक ‘लिए लुकाठी हाथ’  में वह ‘किसी’ प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा हैं और कॉर्पोरेट जगत का वह प्रबंधन विशेषज्ञ प्रवीण प्रणव हैं यानि इस कृति के रचनाकार। 


जिस प्रवीण प्रणव के लिए सत्रह वर्षों पूर्व जॉब के लिए हैदराबाद आने के समय साहित्य में अभिरुचि शौकिया थी, लेकिन वही प्रवीण जब पिछले लगभग नौ वर्षों के अंतराल में एक मुकम्मल कवि, ग़ज़लकार, कहानीकार, समीक्षक, संपादक बन जाते हैं, राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक पत्रिका का संपादन करने लगते हैं, इस कृति को लेकर सात पुस्तकों के लेखक/संपादक बन जाते हैं, अनेकों साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित होते हुए भारत के सौ प्रमुख युवा साहित्यकारों की सूची में शामिल हो जाते हैं, हैदराबाद के युवा आईटी प्रोफेशनल्स के बीच कविता के प्रति अभिरुचि पैदा करने के लिए कई मंचों के द्वारा अलख जगाते हैं, साहित्य उनके लिए मानसिक शांति का पर्याय बन जाता है, तो इन परिवर्त्तनों के पीछे कहीं-न-कहीं सहृदय प्रेरणा के स्रोत गुरुवर ऋषभदेव शर्मा का प्रभाव होना स्वाभाविक लगता है।

उच्च शिक्षा और शोध संस्थान में हिंदी साहित्य के आचार्य रहे तथा वर्तमान में एक केंद्रीय विश्वविद्यालय में हिंदी साहित्य के परामर्शी के तौर पर कार्यरत कवि, भाषाविद, समीक्षक, पत्रकार, संपादक एवं मंत्रमुग्ध कर देने वाले प्रखर वक्ता तथा सम्मोहक व्यक्तित्व वाले प्रोफेसर ऋषभदेव शर्मा का साहित्यिक वर्णपट सतरंगी और उसका फलक विस्तृत है। सत्य की लुकाठी लेकर पाखंड में चिनगारियाँ लगाने वाले (सत्य की लेकर लुकाठी/ वह खड़ा बाजार में;/ पाखंड ने/ चिनगारियाँ महसूस कीं/ अपने परों में !)  तेवरी काव्यांदोलन के प्रवर्तकों में से एक प्रो. शर्मा एक ओर अपनी कविताओं में जहाँ आक्रोश में निरंकुश सत्ता के विरुद्ध जनमानस को आंदोलन के लिए उठ खड़े होने का आह्वान करते हैं, युग के स्वरों में आग बोते हैं- ‘बो रहा है आग वह/ युग के स्वरों में/ और हम दुबके हुए/ अपने घरों में’,  वहीं दूसरी ओर वह इतने कोमल हो जाते हैं कि फूल की पंखुड़ियों को नोचने से भी परहेज करते हैं- ‘उस दिन मैंने फूल को छुआ/ सहलाया और सूँघा/ हर दिन की तरह/ उसकी पंखुड़ियों को नहीं नोचा’। पुरानी ज़मीन की मिट्टी से काफी खुबसूरत एवं सार्थक मूर्तियाँ गढ़ने में सिद्धहस्त प्रो. शर्मा  अपनी कई कविताओं में पौराणिक आख्यानों  का उद्धरण लेकर आज की समस्याओं की जटिलताओं का बखूबी विश्लेषण करते हैं, बदलते परिवेश में उनकी स्वीकार्यता पर सवाल खड़े करते हैं- ‘मैं मेघदूत की यक्षिणी नहीं थी/ नहीं थी मैं नैषध की दमयंती/ मैं शकुंतला भी नहीं थी/ राधा बनना भी मुझे स्वीकार न था’। स्त्री-विमर्श पर उनकी कविताएँ उस स्त्री के साथ मज़बूती के साथ खड़ी दिखाई देती हैं ‘जिसका एक पैर/ ज्वालामुखी के मुँह पर है/ और दूसरा/ समुद्र की गहराई में छिपी/ सबसे निचली पहाड़ी पर’। ये कविताएँ न केवल स्त्रियों को उनके अधिकारों के प्रति जागृत कर उन्हें मुक्ति का मार्ग दिखाती हैं, वरन् पुरुषों को भी उनके दायित्वबोध का अहसास कराती हैं। एक दैनिक समाचार-पत्र के संपादकीय लेखक/ पत्रकार के रूप में भी उनके प्रतिदिन के साहित्यिक फ्लेवर से संपृक्त संपादकीय लेख समसामयिक होते हुए भी भविष्य की राह दिखाते हैं और सत्ता को सचेत करते हुए जन-साधारण के लिए दीप-स्तंभ का काम करते हैं। एक समीक्षक के तौर पर बिना किसी सख़्त टिप्पणी के कंसट्रक्टिव फीडबैक वाली उनकी समीक्षाएँ लेखकों को प्रोत्साहित करते हुए उन्हें आगे बढ़ने को प्रेरित करती  हैं। यही कारण है कि बहुसंख्यक नवोदित लेखकों के वे सबसे पसंदीदा समीक्षक, भूमिका-लेखक हैं। आज के लगातार बदल रहे आधुनिक परिवेश में जहाँ भारत की प्राचीन गुरु-शिष्य परंपरा का क्षरण होता जा रहा है, वहीं प्रो. ऋषभदेव शर्मा उन विरले आचार्यों में से हैं जिनके वर्षों पुराने परा-स्नातक छात्र-छात्राएँ, एमफिल व पीएचडी के शोधार्थी आज भी अपने गुरु प्रो. शर्मा को वही सम्मान देते हैं, वही आदर-भाव रखते हैं जो वर्षों पूर्व उनकी कक्षा में पढ़ते हुए और उनके निर्देशन में शोध करते हुए देते थे । आज के समाज का यह एक अनुकरणीय उदाहरण है। 


प्रवीण प्रणव समय-समय पर प्रो. ऋषभदेव शर्मा के कविता-संग्रहों, आलोचना ग्रंथों एवं संपादकीय संकलनों पर समीक्षाएँ लिखते रहे हैं जो यत्र-तत्र पत्रिकाओं एवं पुस्तकों में प्रकाशित होती रही हैं। ‘लिए लुकाठी हाथ ’ उन्हीं समीक्षाओं और टिप्पणियों का एकत्रित संकलन है जिसमें प्रो. शर्मा के व्यक्तित्व व कृतित्व का समग्र आकलन नौ आलेखों में शामिल है। पुस्तकाकार रूप में यह संकलन निश्चित तौर पर प्रो. ऋषभदेव शर्मा जैसे विलक्षण एवं बहुआयामी प्रतिभा के साहित्यकार के व्यक्तित्व एवं उनकी रचनाओं को एक ही जगह समग्रता में समझने, उससे कुछ सीखने, प्रेरणा लेने के लिए न केवल हिंदी साहित्य के अध्येताओं के लिए वरन् इसमें अभिरुचि रखने वाले सामान्य पाठकों के लिए भी उपादेय है, संग्रहणीय है। मुझे विश्वास है कि इस पुस्तक को पढ़ने के बाद अधिक से अधिक लोग प्रो. शर्मा के साहित्य के प्रति आकृष्ट होंगे और इनके साहित्य पर अधिक गहन विचार-विमर्श की प्रक्रिया आरंभ होगी ।


अवधेश कुमार सिन्हा

ग्रेटर नोएडा (पश्चिम), गौतमबुद्ध नगर

उत्तर प्रदेश

 

शनिवार, 13 जुलाई 2024

आशीर्वचन_प्रो. देवराज_'लिए लुकाठी हाथ' के लिए

 




::आशीर्वचन::

लुकाठी के गुणों का अंत नहीं...  


प्रिय प्रवीण जी, 

'लिए लुकाठी हाथ' की पाण्डुलिपि पढ़ने और फिर कुछ लिख भेजने के लिए इतना कम समय था कि गंभीरतापूर्वक लिखने लायक कुछ अधिक तत्व ढूँढना-खोजना मुश्किल हो गया। मैं जिस तरह का आलसी और कामचोर हूँ, उसके चलते यह काम और भी दुष्कर अनुभव हुआ। फिर भी आपने इतने परिश्रम पूर्वक प्रो. #ऋषभदेव_शर्मा के साहित्य की जो समालोचना की है, वह टुकड़े-टुकड़े ही सही, अपनी ओर खींचती रही। इसलिए जो कुछ और जितना कुछ पढ़ पाने पर जो भी अनुभव किया, चिट्ठी में लिखे दे रहा हूँ--


आपने अपनी विवेचना-बुद्धि का अधिकतम सदुपयोग करते हुए प्रो. ऋषभदेव शर्मा के काव्य (यद्यपि विवेचना के लिए कुछ ही काव्य-संकलन चुने हैं, लेकिन संदर्भानुसार बात उनके समग्र काव्य-संसार की कर दी है, अत: यह प्रो. ऋषभ के संपूर्ण काव्य-संसार की ही समालोचना है) में उनकी जन-पक्षधर-चेतना को प्रारंभ में ही मूल्यांकन के लिए चुना है। यह मेरे लिए अप्रत्याशित आश्चर्य और संतोष का विषय है कि आपने किसान-मजदूर, शोषित-पीड़ित, निर्धन-निर्बल तथा अधिकारहीन आम-जन में स्त्री को भी शामिल करके प्रो. ऋषभदेव शर्मा के काव्य में एक साथ सबकी खोज की है। आपके इस विवेचन-विश्लेषण के निष्कर्षों में प्रो. ऋषभदेव शर्मा के जन-पक्षधर-काव्य के कुछ वैशिष्ट्यों का उल्लेख है, जैसे--- ‘आम जन का जीवन, आम जन का दुख, आम जन का क्षोभ और क्रोध, आम जन की आवाज़ बन कर उनके साथ खड़े रहने की प्रतिबद्धता, आम जन को सावधान करना कि लड़ाई उस व्यवस्था से है, जिसकी मुट्ठी में हवा भी क़ैद है, आम जन का आह्वान कि अपनी लड़ाई खुद ही लड़नी होगी, जय-पराजय की न सोच कर सत्य के पक्ष में आवाज़ उठाने की जरूरत, धार्मिक उन्माद, भड़कते दंगे, भूखे पेट का व्यवस्था के खिलाफ आवाज़ उठाना हिंसा नहीं, न्याय की मांग,  स्त्रियों के भाव, क्षोभ, घुटन, प्रेम, दर्द का सजीव चित्रण, स्त्री सशक्तीकरण के नाम पर स्त्रियों के हाथों में पकड़ा दिए गए झुनझुने, स्त्रियाँ दोयम दर्जे की गुलाम, स्त्रियों को संगठित होकर आवाज़ उठाने की जरूरत’ आदि। कह सकता हूँ कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की तेवरियों और जनपक्षीय मुक्तछंद कविताओं को आपने उसी रचनात्मकता, समालोचक की ईमानदारी और संघर्ष-चेतना के दबाव में पढ़ा है, जिसने कवि से इन कविताओं की रचना कारवाई है।   

शायद इसीलिए, जब मैं आपके ‘लेखकीय’ में पढ़ रहा था कि “प्रो. ऋषभदेव शर्मा का रचना-कर्म जनवादी है। बिना ‘वामपंथ’ या ‘प्रगतिशील’ होने का ठप्पा लगाए उनकी रचनाएँ सत्ता के विरुद्ध एवं जनता के हक़ में आवाज़ उठाती रही हैं। शोषक वर्ग के विरुद्ध और शोषितों के साथ खड़े होना उनकी कविताओं की मूल भावना है”,  तभी लग गया था कि आपका निष्कर्ष होगा कि “प्रो. शर्मा वंचितों के कवि हैं, सदियों से दबी हुई स्त्रियॉं के कवि, किसान, मजदूरों के कवि हैं या यूँ कहें कि हर उस व्यक्ति के कवि हैं, जिसका रिश्ता पीड़ा से है और ऐसे हर व्यक्ति की आवाज़ प्रो. शर्मा की लेखनी उठाती रही है।”  

प्रो. ऋषभदेव शर्मा के काव्य-संसार में और गहरे उतरते हुए आप प्रेम के उस रूप तक पहुँच गए हैं, जिसकी आभा तो मोती की आभा को पराजित करती लगती है, लेकिन कहीं उसमें आपको खुरदरा प्रेम भी दिख गया है। यह आपकी बहुत पैनी अनुवीक्षण-दृष्टि की छाया लगी, जो मुझे अपने साए में नागार्जुन की उस एक कविता तक ले गई, जिसमें ‘कटहल के छिलके सी जीभ’ उपमा का प्रयोग है। बाबा की वह कविता पाठक को भीतर तक छील देती है और प्रो. ऋषभ की, आपकी नजर में आई यह प्रेम कविता भी प्रेम के साधक-अध्येताओं को सचाई के चाकू से चीर डालती है।   क्या आपको नहीं लगता की प्रो. ऋषभ की ये प्रेम कविताएँ ही उन कविताओं की भी स्रोत हैं, जिन्हें आपने ‘नदी, झील, संगम, फूल और मिठास’ की फुनगियों से बातें करती हुई कविताओं के रूप में बड़ी मेहनत से खोजा है और उन्हीं में से कुछ को ‘भेड़िए की बजाय मनुष्य बनने की कोशिश’ में लगे आदमी की कविताएँ कहा है; तभी तो कुल मिला कर प्रो. ऋषभ की ये कविताएँ ‘मानवता के बचे रहने की आशा’ की कविताएँ हैं। 

लेकिन भाई, एक अतिवादी निष्कर्ष से बच सके होते तो अच्छा लगता। आप कहते हैं कि “प्रेम को परिभाषित करने के लिए प्रयोग में लाए गए बिंब और प्रतीक न सिर्फ नए और अनसुने हैं, बल्कि ये प्रेम को लौकिक से अलौकिक और जीवन की क्षण भंगुरता से परे पवित्र, निश्चल और रूहानी प्रेम की तरफ ले जाते हैं।” इसमें बिंबों और प्रतीकों का नया या अनसुना होना तक तो बात ठीक है, परंतु यह प्रेम को अलौकिक या रूहानी दिशाओं की ओर ले जाने वाला निष्कर्ष धर्मराज के रथ की तरह ज़मीन से चार अंगुल ऊपर उठ गया लगता है। हाँ आपका यह अध्ययन-निष्कर्ष खूब गले उतरता है कि “प्रो. शर्मा की कविताओं में कुछ भी आयातित नहीं है--- कविता में जो भाषिक सौंदर्य है, पौराणिक घटनाओं या पात्रों का मिथक के रूप में प्रयोग है या बिलकुल ही अनोखे अलंकरणों के माध्यम से सौंदर्य की व्याख्या; सब कुछ प्रो. शर्मा के अपने हैं और जिन्हें कहीं और, किसी और की कविता में इस तरह नहीं पाया जा सकता।”         


प्रवीण जी, कमाल किया है आपने। आप अचानक प्रो. ऋषभदेव शर्मा की दो कालजयी कविताओं की ओर खींच ले गए। मुझे याद है, संग्रह में आने के पहले ही संयोगवश माँ और पिता पर रची गई ये कविताएँ पढ़ने को मिल गई थीं। मैं भी आप ही की तरह अपने आँसू नहीं रोक सका था। कविताओं में मुझे अपने अदेखे माँ-पिता बहुत याद आए थे। इन कविताओं की काव्यात्मकता अथवा काव्य-शिल्प पर मैं कभी विचार नहीं कर सका। साहित्य के पाठक का यह अक्षम्य दोष है, इस बात को स्वीकार करता हूँ, लेकिन क्या करूँ, ये कविताएँ काव्यशास्त्र की देहरी पर चढ़ने ही नहीं देतीं।   आपका मूल्यांकन सही है कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की “दो कविताएँ ऐसी हैं, जिन्हें पढ़ने के बाद एक लंबे विराम की आवश्यकता होती है। आँखें भर आती हैं, मन विचलित होता है, कई स्मृतियाँ मानस-पटल पर कौंध जाती हैं। माँ और पिता के बारे में लिखी गई इन दो कविताओं के लिए प्रो. शर्मा को किसी भी बड़े से बड़े पुरस्कार से सम्मानित किया जा सकता है।”   

काव्य की ही तरह प्रो. ऋषभदेव शर्मा के गद्य का विश्लेषण भी आपने अत्यंत व्यापक और बहुज्ञ अध्ययन-दृष्टि का प्रयोग करते हुए किया है। आपके अध्ययन-निष्कर्षों को (भी) निचोड़ कर प्रो. ऋषभ के पत्रकारितेतर गद्य की विशेषताओं की छोटी-सी सूची बनाना चाहूँ, तो काटाकूटी करने के बाद उसमें कुछ-कुछ ये विशेषताएँ होंगी--- ‘मूलत: कवि प्रो. ऋषभदेव शर्मा की आलोचना का मुख्य विषय भी कविता, गद्य में कविता जैसा ही भाषिक सौंदर्य, कम शब्दों में अपनी बात प्रभावशाली ढंग से कहने का कौशल, लेखकीय ईमानदारी का निर्वाह, भक्ति कालीन कवियों के मूल्यांकन में भक्ति से अधिक मानवीय मूल्यों की खोज, हिंदी के गोरखनाथ से लेकर अधुनातन कवियों और कथाकारों के मूल्यांकन के साथ ही तेलुगु, तमिल आदि भाषाओं के रचनाकारों का भी मूल्यांकन, हिंदी साहित्येतिहास में स्थान बना चुके छायावाद, प्रगतिवाद, समकालीन कविता आदि आंदोलनों की परीक्षा, लघुकथा जैसी चुनौतीपूर्ण विधाओं का विश्लेषण, कालजयी उपन्यासों की परीक्षा, कथा साहित्य में दलित और आदिवासी विमर्श की खोज, स्त्री-पुरुष संबंधों के चित्रण की परीक्षा, साहित्य में गाँव, बच्चे, मानवाधिकार, वैश्वीकरण का यथार्थ, इक्कीसवीं शताब्दी की कहानी की शक्ति और संभावनाओं की तलाश, हिंदी के भारतीय और वैश्विक संदर्भों का साक्षात्कार, कविता और कथा में शहरीकरण और जनपदीय चेतना की खोज’ आदि। प्रो. शर्मा के गद्य में इन विशेषताओं के खोजी होने के चलते आप समझ सकते हैं कि यह ‘आदि’ हाथी का पाँव है, जिसमें असंख्य पाँव समाए हुए हैं।   

‘साहित्य, संस्कृति और भाषा’ पुस्तक के लेखों की समालोचना करते हुए आप लेखक प्रो. ऋषभदेव शर्मा से टकराने की ओर भी बढ़े हैं। इसके एक लेख ‘रामकथा आधारित एनिमेशन ‘सीता सिंग्स द ब्ल्यूज’ : एक अध्ययन’ में प्रो. ऋषभदेव शर्मा रामकथा और उसके चरित्रों के साथ नीना पेले द्वारा किए गए व्यवहार पर टिप्पणी करते हुए ‘आस्थावादी प्रतिबद्ध संस्कृतिकर्मी’ के बदले कलाकार और लेखक की स्वतंत्र चेतना के पक्षधर ‘उत्तर आधुनिक व्यक्ति’ का रवैया अपनाते हैं। प्रवीण जी, आप इससे भीतर ही भीतर बेहद आहत अनुभव करते हैं, इतने अधिक कि अपने आप को यह कहने से नहीं रोक पाते कि “इसमें दो-राय नहीं कि इस फिल्म, जिसमें स्क्रिप्ट, एनिमेशन से लेकर निर्देशन तक का बीड़ा नीना पेले ने उठाया, में उन्होंने बेहतर काम किया है, लेकिन स्थापित मान्यताओं के विरुद्ध जाकर संदर्भ से अलग परिस्थितियों का चित्रण, अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर उस सीमा-रेखा का उल्लंघन है, जहाँ जनमानस की भावनाएँ आहत होती हैं।” इसके बाद इस एनीमेशन से ही अपने समर्थन में उदाहरण देते हैं--- “दशरथ की मृत्यु के समय कैकेयी की गोद में उनका सिर होना और कैकेयी का अश्लील फिल्मों की नायिका की तरह नर्स के कपड़ों में अर्धनग्न और उत्तेजक चित्रण समझ के परे है।” सीता, रावण और राम के संबंध में भी वहीं से कुछ प्रसंग चुन कर प्रस्तुत करते हैं, जो आपके लिए इससे भी वीभत्स लगने वाले हैं। अंत में आपकी टिप्पणी है कि आपको यह “उदारमना लेखक द्वारा ‘मूँदें आँखि कतहुं कोउ नाहीं’ वाली उदारता को जारी रखने जैसा लगता है।” सच कहूँ, यद्यपि आप अपने क्षोभ को पचा गए हैं, बहस से भी विरत से ही हो गए हैं, टिप्पणी भी अति संकोच पूर्वक ही की है, फिर भी यहाँ (मूल पाठ के) ‘लेखक प्रो. ऋषभदेव शर्मा’ से (इस पुस्तक के) ‘लेखक प्रवीण प्रणव’ का जो भी थोड़ा-बहुत टकराव दिखता है, वह बहुत प्यारा और ईमानदारी भरा लगता है। वरना, हिंदी में जो लोग प्रशस्तिपरक लेखन के अभ्यस्त हैं, वे अपने प्रिय लेखक के लिखे पर न कोई शंका करते हैं, न सवाल उठाते हैं, न बहस खड़ी करते हैं और न कोई ऐसा आलोचनात्मक टकराव पैदा होने देते हैं, जो उनकी रीढ़ की हड्डी सीधी होने की गवाही दे।   

लेकिन भाई, आपकी इतनी प्रभावकारी लेखकीय ईमानदारी के बाद ‘साहित्य, संस्कृति और भाषा’ पुस्तक के ही बहाने प्रो. ऋषभदेव शर्मा के गद्य-लेखन में आई पुनरावृत्ति का स्पष्टीकरण मुझे नहीं जमा। आपने लेखन का एक नितांत सही पक्ष खोजा है--- समय-समय पर किए गए लेखन में कहीं-कहीं पुनरावृत्ति-दोष का आ जाना। यह किसी भी ऐसे लेखक के संदर्भ में होना संभव है, जो लगातार और बिना थके लिखता हो अथवा जिसे इतना अधिक लिखना पड़ता हो। यह एक अपरिहार्य लेखन-दोष है, जिसके लिए उस लेखक को कोई ऐसी कैफियत देने की जरूरत नहीं होती, जो पैरों न चल सके। और, उस लेखक के समालोचक को भी--- इस दोष का उल्लेख कर देने के अलावा--- कोई रक्षा-दीवार खड़ी करने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। अब आप अपना दिया स्पष्टीकरण देखिए, “साहित्य, संस्कृति और भाषा जैसे विषयों पर ये लेख अलग-अलग समय पर लिखे गए हैं, इसलिए कुछ बिंदुओं की पुनरावृत्ति हुई है; लेकिन यह खलती नहीं, क्योंकि हर लेख में पाठकों के लिए बहुत कुछ नया है और जिन बिंदुओं की पुनरावृत्ति हुई है, वे इतने महत्वपूर्ण हैं कि उन्हें बार-बार दुहराया ही जाना चाहिए। विपणन (Marketing) के क्षेत्र में ‘Rule of 7’  एक महत्वपूर्ण सिद्धांत है, जो यह कहता है कि यदि आप चाहते हैं कि ग्राहक कुछ याद रखे, तो कम से कम सात बार आप उसे ग्राहक के सामने लाएँ।” इसके बाद आप डॉ. राजेंद्रप्रसाद की ‘साहित्य, शिक्षा और संस्कृति’ पुस्तक के प्रकाशन का उदाहरण देते हैं, जो उनके 28-29 वर्ष की अवधि में समय-समय पर दिए गए भाषणों का संग्रह है। डॉ. राजेंद्रप्रसाद ने पुनरावृत्ति (और विरोधाभास) की संभावना को बड़े सहज रूप में स्वीकार किया है, लेकिन उसके लिए कोई सफाई नहीं दी है। मैं जो कहना चाहता हूँ, आशा है, आप उसे समझ रहे हैं।  

प्रो. ऋषभदेव शर्मा द्वारा पत्रकार की भूमिका निभाने के क्रम में किए गए लेखन का मूल्यांकन करते हुए पुन: आपके निष्कर्ष ध्यान खींचते हैं। आपके कुछ निष्कर्ष, जो मुझे खूब भाए, वे हैं--- ‘साहित्यकार होने के कारण पत्रकारीय लेखन में पठनीयता का सौंदर्य राजनीतिक विश्लेषकों से अधिक, सरल भाषा में पाठकों के सामने वस्तुस्थिति रखना, अपने विचार बिना किसी लाग-लपेट के प्रकट करने में विश्वास रखना, घटना के भीतरी-बाहरी वर्तमान प्रभाव के साथ ही उसके भविष्य में होने वाले फलितार्थ का संकेत करना, सत्ता-पक्ष और विपक्ष दोनों पर पैनी नज़र बनाए रखना, संवेदनशील मुद्दों पर सशक्त और संतुलित दृष्टिकोण को प्राथमिकता देना, मतदान के प्रति उदासीनता की प्रवृत्ति की आलोचना के साथ ही उसे मतदाता की ओर से ‘नोटा’ के रूप में भी देखने का सुझाव देने के बहाने सभी विषयों में राजनीतिक-सत्ता और नागरिक के संबंधों को परखने पर बल देना’ आदि। यहाँ आपका वस्तुनिष्ठ एवं संतुलित अभिमत और भी प्रभावित करता है--- “पत्रकारिता के क्षेत्र में, जहाँ पीतपत्रकारिता का बोलबाला है, जहाँ बहुसंख्यक लोग अंधभक्ति या अंधविरोध के खेमे में शामिल हो बिगुल बजा रहे हैं; जहाँ खबरों की प्रामाणिकता, टीआरपी या पाठक तक पहुँच के आधार पर तय की जाती हो; तटस्थ रह पाना इतनी मुश्किलों और चुनौतियों भरा विकल्प है कि ऐसे किसी भी व्यक्ति को आज विस्मय की नज़र से देखा जाता है। इन कठिन परिस्थितियों में प्रो. ऋषभदेव शर्मा (1957) के संपादकीय लेखों को पढ़ना जेठ की दुपहरी में मलय पवन की शीलता के समान है।”    

प्रवीण जी, ‘लिए लुकाठी हाथ’ में समय-समय पर लिखे गए आपके जितने समालोचना-लेख संकलित हैं, वे सभी निजी अध्ययन-निष्कर्षों, गहरी आत्मीयता, मूल्यांकन की गंभीर इच्छा और समालोचना के लिए अनिवार्य सत्यनिष्ठा का प्रतिफल हैं। जब आप कहते हैं कि “मुझे याद है, जब मैंने प्रो. शर्मा को जानना शुरू ही किया था, तब लगता था कि इनकी कविताओं की चर्चा होनी चाहिए। कई मंचों से बाद में यह हुआ भी। लगा कि इनकी कविताओं पर आलेख लिखे जाने चाहिए और वह भी हुआ। इनके समग्र साहित्य को पढ़ कर लगा कि इनके बारे में लोगों को और जानना चाहिए और एक विस्तृत किताब आनी चाहिए”, तो पता चल जाता है कि यह पुस्तक एक ऐसी नागरिक-ज़िम्मेदारी के निर्वाह के लिए सामने आ रही है, जो आज के साहित्य की लेखक-पाठक दुनिया में विलुप्त होने के कगार पर है। ऊपर से, जिस लेखक के साहित्य पर यह पुस्तक केंद्रित है, वह ऐसा है, जिसका व्यक्तित्व सभी के भीतर वैचारिक ऊर्जा जगाता आया है। आप भी अनुभव करते हैं कि “कम ही लोग ऐसे होते हैं, जिनके साथ बात करते हुए आप हर बार कुछ नया सोचने पर विवश होते हैं, हर बार आप कुछ नया सीखते हैं, हर बार आप कुछ नया करने की प्रेरणा पाते हैं और प्रो. ऋषभदेव शर्मा ऐसे ही व्यक्ति हैं।” 

ऐसी अगाध आत्मीयता के जल से भीगी हुई टटकी आलोचना हिंदी के पाठकों को एक अलग तरह का पठन-सुख देगी, यह सोच कर अच्छा लग रहा है। अपने ढंग के इस अभिनव कार्य के लिए आपको शुभकामनाएँ।  

सस्नेह--- 

देवराज 

पूर्व अधिष्ठाता : मानविकी संकाय 

मणिपुर विश्वविद्यालय, 

इम्फाल (मणिपुर)

मंगलवार, 13 फ़रवरी 2024

इंदुकांत आंगिरस की प्रेम कविताएँ "सहयात्री"

 


भूमिका

कभी न मुरझाने वाले वसंत का मदनोत्सव


बहुभाषाविद् तथा बहुमुखी सर्जनात्मक प्रतिभा के धनी साहित्यकार इंदुकांत आंगिरस की इस कृति “सहयात्री” के बहाने मुझे उनकी अनंत प्रेमयात्रा का साक्षी बनने का सौभाग्य मिला। यह अनंत प्रेमयात्रा अस्तित्व और सृजन की निरंतरता की यात्रा है। यहाँ तूलिका और लेखनी एक साथ यात्रा पर निकलती हैं और प्रेम का एक ऐसा निजी संसार रचती हैं, जिसमें समस्त जड़-चेतन सृष्टि समा जाती है। विश्व कला के साथ भारतीय कविता की इस चामत्कारिक जुगलबंदी के लिए कवि और चित्रकार दोनों अभिनंदनीय हैं। 


कलाकार और कवि दोनों ही मूलतः चित्रकार हैं। कलाकार ने रेखाचित्र रचे हैं और कवि ने शब्दचित्र आँके हैं। रेखाओं ने शब्दों को मूर्तित किया है और शब्दों ने रेखाओं को अमूर्त वाणी देकर चिर जीवन का वरदान दिया है। कहना न होगा कि कवि आंगिरस की ये कविताएँ आत्मा पर अंकित भित्तिचित्रों की प्रतिध्वनियाँ हैं। चित्रांकन और शब्दांकन का यह रिश्ता यों तो बहुत पुराना है। लेकिन कवि की नित्य नवोन्मेषकारी लेखनी ने चित्रों को कुछ इस तरह शब्दों में ढाला है कि प्रेम की प्रत्येक सूक्ष्मातिसूक्ष्म मनोदशा इन कविताओं में अत्यंत समर्थ उपमाओं, अप्रस्तुतों, रूपकों, प्रतीकों, बिंबों और पुराकथाओं के सहारे साक्षात साकार हो उठती है। अत्यंत कोमल शब्दों पर झेला गया चित्रकला का यह सौंदर्य इन कविताओं को अप्रतिम और अद्भुत आह्लाद का हेतु बनाता है। चित्रों का कविता में यह अनुवाद पाठक की स्मृति में अंकित होने की योग्यता रखता है। 


‘सहयात्री’ प्रेम की गहन अनुभूतियों का चित्रात्मक आख्यान है। एक ऐसा आख्यान जो सूर्य की पहली किरण बनकर आत्मा पर दस्तक देता है। यह दस्तक आत्मा के कभी न मुरझाने वाले वसंत की पहली आहट बन जाती है। वही वसंत जिसे प्रेमीजन प्रेमाग्नि में जलकर प्राप्त किया करते हैं। रंगों और गंधों का एक उल्लास पर्व। प्रेम पंथ पर एक-दूसरे का साथ सूर्य की ऐसी सुनहरी किरणों की तरह है जिनसे प्रेमी आत्माएँ जगमगा उठती हैं और मरुभूमि में भी प्रेम के वासंती फूल महमहाने लगते है। दो प्रेमियों की आत्म-गंध एक-दूसरे में गहरे रच-बस कर गंधस्नात पुष्पों की मुस्कान में बदल जाती है। साँसें भी फूलों की मानिंद खिल उठती हैं और आत्मा की पलकों पर प्रेम-पुष्पों का दीपक झिलमिलाने लगता है। 


वसंत की यह लीला फूलों में तो नाच ही रही है, लेकिन इस अभिव्यक्ति के मूल में कुछ ऐसा है जो अव्यक्त है, परोक्ष है। चित्रकार और कवि दोनों को ही पुहुप- बास से भी पतले उस तत्व की तलाश है। वे महसूस करते हैं कि प्रेम के अनंत वृक्ष ने अब अपनी जड़ें फैला ली हैं। इन जड़ों में प्रकृति और पुरुष का रक्त किसी उन्मुक्त झरने की तरह बह रहा है। प्रेमी हों या योगी सब इसी झरने में तो भींजना चाहते हैं। तभी तो जिंदगी की सरगम फूटती है और सदियों की चौखट पर चाँदनी के फूल मुस्कराने लगते हैं। कवि को चिंता है कि मुग्ध विरहिणी कहीं चंचल हवा की छद्म सादगी से भ्रमित न हो जाए और उसके साथ वासंती खुशबू वाले प्रेमपत्र न भेज दे। हवाएँ गोपनीय को सार्वजनिक बनाने में माहिर होती हैं न! और प्रेमीजन निजता में डूबे रहना चाहते हैं - ‘निपजी में साझी घणा, बाँटे नहीं कबीर’!


प्रेमी और प्रेमास्पद की यह सहयात्रा नित्य नए क्षितिजों का संधान करती है। प्रेम की इस अनंत यात्रा पर प्रेमपात्र का साथ उस नाव की तरह है जो साँसों की लहरों पर तिरकर उस पार उतरती है। दोनों को लगता है कि वे बेल की तरह एक-दूसरे की आत्मा के फूल पर लिपटते जा रहे हैं। उनका यह सामीप्य और सायुज्य चिर मिलन के अद्वैत की भूमिका है। उन्हें विश्वास है कि उनकी प्रेमाग्नि की तपन से बर्फ के पहाड़ पिघल जाएँगे और प्रेम की पावन नदी बह निकलेगी। यही नहीं, उनके प्रेमराग की धुन सुनकर आकाश गूँगा हो जाएगा और धरती बहरी बन जाएगी। यही तो है प्रेम की समाधि में गूँजने वाला दिव्य अनाहत नाद, जो तब सुन पड़ता है जब राधा और माधव एक हो जाते हैं। इसीलिए कवि इंदुकांत आंगिरस की राधा चाहती है कि सदा सदा के लिए माधव की हो जाए, अपनी पलकें बंद करे और उन्हीं में खो जाए। 


इस अवस्था में दो आत्माएँ एक होकर सौ रंगों वाला हरदिल अजीज़ अनूठा इंद्रधनुष सिरजती हैं। आसमान में इंद्रधनुष उगता है, तो धरती पर महुए का एक फूल मोतियों की तरह खिलता है। मुहब्बत के इस महमहाते महुए को जन्म और मृत्यु के घेरे भी आत्मा की धरती पर खिलने से नहीं रोक सकते। प्रेम के स्पर्श में एक ऐसी अलौकिकता है कि उसे पाकर प्रेमीजन सुगंधित फूलों की मानिंद खिल उठते हैं और वसंत के पंखों पर सवार होकर खुद भी पारस-हवा बन जाते हैं। आने को ऐसे विपरीत अवसर भी आते हैं जब ज़माने की आँधियाँ प्रेम-वृक्ष को झिंझोड़ डालती हैं, लेकिन प्रेमीजन पराजित नहीं होते और उनके प्रेम की किश्तियाँ प्रेम-झील में बेख़ौफ़ तिरती रहती हैं। उन्हें दृढ़ विश्वास है कि दो आत्माओं के मिलन का प्रेमफूल वसंत की दहलीज़ पर अनंत काल तक इसी तरह खिलता रहेगा। इस विश्वास का कारण यह अनुभूति है कि हमारे अनंत प्रेम की अग्नि लपटों की रोशनी अब अखिल ब्रह्मांड में फैल रही है और सूरज रोज़ इसी रोशनी से उगता है। इसी रोशनी से तो विनाशकारी महायुद्धों के बीच सृजन के शंखनाद से प्रेमऋचाएँ तरंगित होती हैं। पिंड से ब्रह्मांड तक की यह अनंत यात्रा  नित्य प्रकाशमयी और अमृतमयी है।


‘सहयात्री’ की ये चित्र-कविताएँ एक विशेष पैटर्न में रची गई हैं। हर कविता की अंतिम पंक्तियाँ उसमें व्यंजित चित्र को विशेष ‘उभार’ देती हैं, जैसे-


आओ प्रिय!


प्रेमकिश्ती के सब पालों को खोल दें

अनबूझी दिशा में प्रेमकिश्ती को छोड़ दें


दरिया की लहरों पर प्रेमदीपक जला दें

चाँदनी के फूलों से प्रेममंदिर सजा लें


हम एक-दूसरे की बाँहों में क़ैद हो जाएँ

इक-दूजे में खो जाएँ और ग़ैब हो जाएँ


इस प्रेमनदी में डूबकर हो जाएँ पार

युगों युगों तक कायम रहे अपना प्यार


इस तन्हा पंछी की पीड़ा में हम भी रोएँ

अपने अपने ग़मों के दाग़ प्रेमजल से धोएँ


चाँदनी की चादर ओढ़ सदा के लिए सो जाएँ

एक-दूसरे को ओढ़ लें, एक-दूसरे में खो जाएँ


प्रेम की इस अद्भुत रोशनी में हम मिलकर नहाएँ

और अपने महामिलन की कथा हम सबको सुनाएँ


प्रेमदीपक को अपने लहू से जलाते चलें

इस दुनिया के हर अँधेरे को मिटाते चलें


हम मिलकर शंखनाद करें,  प्रेमबिगुल बजाएँ

इस धरती से नफ़रत का नामोनिशान मिटाएँ


इन काव्यपंक्तियों से यह भी स्वतः स्पष्ट हो जाता है कि प्रेम की एकाग्रता और निजता के पल भी अंततः लोककल्याण के निमित्त समर्पित और संकल्पित होकर विश्वात्मा में लीन हो जाते हैं। यही तो प्रेममार्ग के सहयात्रियों की मुक्ति है! 


सर्जनात्मकता के इस मनोरम और रमणीय, दर्शनीय और पठनीय अभियान के प्रकाशन के अवसर पर कवि और कलाकार दोनों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ!


  • ऋषभदेव शर्मा


वसंत पंचमी 

14 फ़रवरी, 2024

मंगलवार, 30 जनवरी 2024

डॉ. रमा द्विवेदी की लघुकथाएँ : मैं द्रौपदी नहीं हूँ

 


डॉ. रमा द्विवेदी की लघुकथाएँ

  • ऋषभदेव शर्मा


डॉ. रमा द्विवेदी हैदराबाद के हिंदी जगत में एक सुमधुर स्वर की धनी कवयित्री के रूप में सुचर्चित और लोकप्रिय हैं। उनके सुरम्य गीत हर पीढ़ी के काव्यरसिकों को पसंद आते हैं। लेकिन उनका रचना संसार केवल कविता तक सीमित नहीं है। वे पुस्तक समीक्षा और कथा-कहानी भी उसी तरह डूब कर लिखती हैं जिस तरह गीत, दोहे, मुक्तक और हाइकू। इसका जीवंत प्रमाण है उनका गत दिनों प्रकाशित लघुकथा संकलन “मैं द्रौपदी नहीं हूँ”।


संकलन की शीर्ष कथा ‘मैं द्रौपदी नहीं हूँ’ में भारतीय समाज में प्रचलित घरेलू हिंसा की विकृति और स्त्री की विवशता को दर्शाया गया है। घर की शांति और एकजुटता के नाम पर बहुओं के उत्पीड़न की यह कहानी आज भी बहुत से घरों में दोहराई जाती है। अकेली पड़ने पर बहुत बार बहुएँ इस उत्पीड़न के समक्ष या तो झुक जाती हैं या टूट जाती हैं। लेकिन रमा द्विवेदी की कथानायिका अपने पति के दब्बूपन और देवर की उद्दंडता दोनों का प्रतिकार करती है तथा खुद को द्वापर की द्रौपदी जैसी भाइयों में बँट जाने वाली वस्तु नहीं बनने देती। कथा का अंत खुला हुआ है क्योंकि यह कल्पना पाठक पर छोड़ दी गई है कि आत्मसम्मान की रक्षा पर उतारू बहू के साथ दकियानूसी परिवार और पुरुषवादी समाज आगे क्या सुलूक करेगा! इस लिहाज से यह लघुकथा किसी दीर्घकथा की प्रस्तावना भी कही जा सकती है। 


इतिवृत्तात्मकता और उपदेशात्मकता को लघुकथा लेखन की चुनौती कहा जा सकता है। यह चुनौती कथाकार रमा द्विवेदी के सामने भी बार बार उपस्थित होती है। इसका मुकाबला करने के लिए वे संक्षेप और संवाद का रास्ता अपनाती हैं। इसमें उन्हें कितनी सफलता मिल पाई है, इस बारे में मतभेद हो सकता है। लेकिन ‘चैलेंज’ इसका अच्छा उदाहरण है जिसमें लेखिका ने सोशल मीडिया के खतरों के बारे में पाठकों को आगाह किया है। ‘चुंबक-सा आकर्षण’ में भी फेसबुक के आभासी मोहजाल में फँसने से बचने की सीख देने के लिए ऐसे ही संवाद की अवतारणा की गई है। अन्यत्र ‘धारणा’ में यात्रियों के संवाद के माध्यम से लेखिका ने अपनी यह धारणा स्थापित की है कि उत्तर प्रदेश भ्रष्टाचार और अव्यवस्था का गढ़ है और दक्षिण भारत, उसमें भी हैदराबाद, में सुकून ही सुकून है क्योंकि यहाँ राजनीतिक व्यवस्था उत्तर से बेहतर है। (यह बात अलग है कि इसी हैदराबाद में विधानसभा चुनाव में सत्ता परिवर्तन राजनीतिक भ्रष्टाचार के मुद्दे पर होते देखा गया है!) ऐसे सरलीकरणों से बचा जाना चाहिए, वरना उन बयानों की तरफ शायद ही उँगली उठाई जा सके जिनमें हिंदीभाषियों को गोमूत्र पीने और संडास साफ करने वाले कहकर गरियाया जाता है। वैसे भी लघुकथा एक व्यंजनाप्रधान विधा है। इस दृष्टि से ‘टैगियासुर’ अवश्य ही रोचक और व्यंजक है। 


इसमें दोराय नहीं कि लघुकथाकार का एक बड़ा प्रयोजन वैयक्तिक और सामाजिक जीवन की विसंगतियों और पाखंड पर चोट करना भी है। लेकिन उसे ध्यान रखना पड़ता है कि लघुकथा भी कथारस की माँग करती है। इसके बावजूद सामाजिक चेतना संपन्न लेखक बहुत बार अपने सामाजिक प्रयोजन की सिद्धि के लिए कथात्मकता की बलि चढ़ाने में भी संकोच नहीं करते। लेखिका रमा द्विवेदी भी रचनाकार के संदेश को कला से ऊपर मानती हैं। ‘प्री वेडिंग शूट’ में इसीलिए वे कथाकार पर समाजसुधारक को हावी हो जाने देती हैं। ‘यह कैसी शादी’ में यद्यपि लेखिका ने सोलोगेमी को अमान्य करार दिया है, लेकिन बड़े मार्के की यह टिप्पणी भी की है कि प्यार में धोखा खाने से और तलाक़ लेने से तो अच्छा है कि खुद से ही विवाह करो और खुद से ही प्यार करो!


लेखिका की यह सामाजिक जागरूकता प्रायः सभी लघुकथाओं में झलकती है। कहीं प्रत्यक्ष, तो कहीं प्रच्छन्न। यह हमारे समय की कुरूप सच्चाई है कि अर्थ-पिशाचों से भरे इस स्वार्थी समाज में अनुपयोगी और बोझ बन चुके बूढ़ों के लिए अपने ही बच्चों के घरों में जगह नहीं बची है - दिलों में भी नहीं। खासकर अकेली विधवा माताओं की स्थिति तो बेहद कारुणिक है। ‘माई की ममता’ में ऐसी ही एक माँ की त्रासद गाथा वर्णित है। लेकिन लेखिका माँ के लिए निष्ठुर बेटों को दंडित होते नहीं देखना चाहती और ज़रा सा दबाव पड़ते ही बेटों का हृदय परिवर्तन करा देती हैं। अब यह आगे की बात है कि इन कृतघ्न बेटों का यह बदला चरित्र कितनी देर टिकता है। कहीं ऐसा न हो कि थाने से निकलते ही वे फिर से कपूत साबित हों! सोचने को मजबूर करती यह लघुकथा काफी संभावनापूर्ण कही जा सकती है। 


कुल मिलाकर, ‘मैं द्रौपदी नहीं हूँ’ सामाजिक चेतना संपन्न  तथा सोद्देश्य लघुकथाओं का सुरुचिपूर्ण संकलन है। ये लघुकथाएँ अपनी सहज भाषा और प्रवाहपूर्ण कथन शैली के सहारे पाठक को देर तक बाँधे रखने में सक्षम हैं। 000

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2023

(समीक्षा) कहीं कुछ कम है: पूर्णमेवावशिष्यते!

 


कहीं कुछ कम है:

पूर्णमेवावशिष्यते!

  • ऋषभदेव शर्मा



अनिल कुमार शर्मा (1955) के कविता संकलन 'कहीं कुछ कम है' (2020; दिल्ली : विजया बुक्स) में प्रवेश करना किसी किले में प्रवेश करने जैसा है। आप इस कविता संकलन की कविताओं से सीधे-सीधे नहीं मिल सकते। पहले आपको अनेक महान नामों और उनके वक्तव्यों रूपी प्राचीर से होकर गुजरना पड़ेगा। इस प्राचीर के कंगूरों अशोक चक्रधर सुशोभित हैं जिन्हें अनिल कुमार शर्मा की काव्योक्तियाँ सूक्तियाँ बनती प्रतीत होती हैं;  हरीश नवल हैं जिन्हें ये कविताएँ सादगी से लिखी गई सशक्त कविताएँ लगती हैं; विमल कुमार शर्मा के लिए ये कविताएँ जीवन के सभी पहलुओं को उजागर करने वाली हैं।  कमलानंद झा शब्दों और अवधारणाओं में नए अर्थ भरने के प्रयास को लक्षित करते हैं, तो ब्रज श्रीवास्तव को इन कविताओं का अलग, अनूठा और अविरल होना आकर्षित करता है। बजरंग बिहारी तिवारी इस संकलन को पाठक वर्ग को भागीदार बनाने में समर्थ मानते हैं, तो श्याम लाल यादव राजेश का मन इन कविताओं को पढ़ने में खूब रमता है। चंद्रकांत पाराशर के लिए इन कविताओं का प्रवाह सहज और नैसर्गिक है, तो अखिलेश श्रीवास्तव के विचार से कवि शिल्प को अलग ढंग से बरतने में समर्थ  है। कुसुम भट्ट को मन की भीतरी तह पर नमी की परत से उपजी ये कविताएँ शांत झील के साफ पानी सी प्रतीत होती हैं, जबकि विजय कुमार सिंह यह निष्कर्ष देते हैं कि हर रचना अनूठी है जो मन पर छाप छोड़ देती है। इसीलिए हरिहर झा ने उचित ही यह विश्वास प्रकट किया है कि साहित्य जगत इस कृति का स्वागत करेगा। करेगा भी क्यों नहीं जब किले के प्रवेश द्वार पर ओम निश्चल यह यकीन दिलाने के लिए उपस्थित हों कि अनिल कुमार शर्मा की कविताएँ जीवन की वास्तविकताओं का निर्मम आख्यान हैं तथा भूपेंद्र अजीज परिहार हाथ उठाकर यह घोषणा कर रहे हों कि भाषा के माध्यम से कवि ने कल्पना की है एक पुनःजागरण की जिसकी प्रतीक्षा हम सभी को है! वे यह भी बताते चलते हैं कि 'कम' तो हर दौर में रहा है, आज हमारे जीवन में कितना कुछ कम हो रहा है इसका चित्रण इन कविताओं की एक बड़ी खूबी है, हमारे लिए एक संस्कार, एक दीक्षा। आप कहीं इधर-उधर भटक न  जाएँ, इस हेतु हरीश नवल ने आमुख में यह स्पष्ट निर्देश कर दिया है कि कवि अनिल कुमार शर्मा की रचनात्मकता की रेंज बहुत बड़ी व महत्वपूर्ण है। उन्होंने बताया है कि इस संकलन में अतीत को याद करती कविताएँ नॉस्टैल्जिया से संपन्न हैं, तो कुछ कविताएँ प्रेम से पगी हुई हैं।  साथ ही यह भी कि न्याय प्रक्रिया, नारी सुरक्षा, सैनिक स्मरण, आम जन संवेदनशून्यता, मानवता, मृत्यु बोध व विसंगति दर्शन इस संकलन की कविताओं के मुख्य विषय हैं। इन सूत्रों का विस्तार करते हुए प्रांजल धर ने विस्तृत भूमिका में अनिल कुमार शर्मा को सृष्टि और सभ्यता के सूत्रों की गहन पड़ताल करने वाले कवि के रूप में सप्रमाण प्रस्तावित किया है। वे यह बताते हैं कि इस संग्रह की कविताएँ हमारे समय, संबंधों और समाज की गहरी विडंबनाओं और अंतर्विरोधों को केंद्र में लाते हुए गहरे सरोकारों और प्रतिबद्धता के मर्मवेधी चित्र खींचती हैं। ये चित्र अनेकानेक देशी बिंबों से भरे पड़े हैं और इस बात को सत्यापित करते हैं कि हजार शब्द मिलकर भी जो बात नहीं कह पाते उसे एक चित्र यूँ ही अभिव्यक्त कर दिया करता है। उन्होंने यह भी रेखांकित किया है कि अनिल बतौर कवि  किसी नवीन विकल्प की तलाश में व्याकुल हैं। वे ज़ोर देकर यह भी कहते हैं कि उनकी कविताओं में प्राचीनता को याद करना निष्क्रिय या नॉस्टैल्जिक हो जाना नहीं है बल्कि विवेकवान और समतावादी हो जाना है। बड़े मार्के की बात यह है कि उनके मतानुसार इस संग्रह में विवशता के लोक में विचरण करते उस आधुनिक मानव की विडंबना व्यंजित है जो छीजते चले जा रहे मानवीय मूल्यों से त्रस्त हो और अनावश्यक संत्रास से ग्रस्त हो गया है। वे मानते हैं कि कवि अनिल शर्मा के इस नवीनतम संग्रह में देशी सरोकार लबरेज हैं और यहाँ बिना लाग लपेट के कही जाने वाली वज़नदार सपाटबयानी मौजूद है; और निष्कर्ष देते हैं कि अनिल कुमार शर्मा के इस कविता संग्रह में अनेक ऐसी कविताएँ हैं जो हमारी जड़ों, गुम होती चली जा रही हमारी विरासत, हमारी सोच और चिंतन की विसंगतियों की ओर इशारा करती हैं। इसी क्रम में उपमा ऋचा ने प्राक्कथन में यह आह्वान किया है कि इससे पहले कि अर्ध सत्यों के साथ जीना हमारी विवशता बन जाए या हमारे अर्थ पूरी तरह स्वार्थ का शिकार हो जाएँ और हमारी संवेदना की चिड़िया को कठोरता के बाज खा जाएँ, बेहतर यही है कि हम भी गुनगुनाएँ एक गीत कल के लिए; फिर भले ही कहीं कुछ कम रह भी जाए, तब भी स्याहियों का कर्ज़ ढोने का मलाल नहीं रहेगा!


इतने सारे समीक्षात्मक वक्तव्यों, भूमिकाओं और प्रस्तावनाओं आदि के पार कहीं अनिल कुमार शर्मा की 66 कविताएँ पाठक का स्वागत करने के लिए आतुर हैं। कहना न होगा कि सामान्य पाठक इतनी सारी विद्वत्तापूर्ण मार्गदर्शक उक्तियों से कुछ सीमा तक उकता भी जाता है और आतंकित भी होता है। लेकिन इस सबसे उसके मन पर यह प्रभाव तो पड़ता ही है कि जिस कवि की कविताओं का साक्षात्कार अब उससे होने जा रहा है वह ज़रूर कोई बड़ी चीज़ है जिसको बड़े बड़ों ने इतना मान दिया है और वह कविता के भीतरी मंदिर में प्रवेश करने से पहले सम्मान से कवि के समक्ष नतशिर हो जाता है।  यह बात अलग है कि यदि इस सारी दीक्षा के बिना पाठक को सीधे अनिल कुमार शर्मा के कविता जगत में छोड़ दिया जाता तो भी वह इन कविताओं से सहज ही संवाद स्थापित कर लेता। कहने का अभिप्राय यह है कि 'कहीं कुछ कम है' संग्रह की कविताओं में एक समर्थ संप्रेषणीयता का गुण विद्यमान है, जिसके कारण ये कविताएँ बड़ी ललक के साथ अपने पाठक से जुड़ने का प्रयास करती हैं और बिना किसी आलोचककीय दावे के, उसके चित्त को अपने साथ बाँध कर बहा ले जाती हैं। इसलिए यह तो ज़रूर कहा जा सकता है कि कंगूरे से लेकर प्रवेश द्वार तक पर अंकित विद्वानों और समीक्षकों का वैदुष्य पूरी तरह प्रामाणिक और विश्वसनीय है,  लेकिन यह भी कहना होगा कि अगर उँगली पकड़ कर ले जाने वाले इतने सारे मार्गदर्शक न भी होते तो भी काव्योत्सुक पाठक सीधे इन कविताओं के मर्म तक पहुँच जाता, क्योंकि ये कविताएँ उसी वास्तविक लोक की कविताएँ हैं जिस लोक में आज की कविता का पाठक जीता है। 


कुछ तो कम है


कुछ न कुछ न्यूनता या अभाव तो जीवन में रहता ही है। पूर्णता जीवन के पार कहीं स्थित हो सकती है, जीवन में नहीं। लेकिन इन अपूर्णताओं के प्रति सजग रहना हर किसी के बस में नहीं होता। कई न्यूनताएँ ऐसी भी होती हैं जिन्हें हम स्वीकार नहीं करना चाहते और एक भ्रम में जीते रहते हैं कि हम तो पूर्ण हो गए, हमने तो पूर्णता प्राप्त कर ली। लेकिन कवि अनिल कुमार शर्मा ईमानदारी से यह मानते हैं कि प्रिय का स्पर्श तक पूर्ण नहीं हो सका और जीवन बीत चला। मन को न छुआ जा सका क्योंकि वह आकाश की तरह पकड़ के परेऔर विस्तृत था। साँसों के उद्गम को ना खोजा जा सका क्योंकि वे पवन के स्रोत की तरह अलक्षित थीं। आलिंगन के ठहराव को न नापा जा सका क्योंकि वह धरती के धीरज जैसा अमाप था, अपरिमेय था। और तो और प्रिय के नैकट्य में त्वचा की तरलता को अकेले महसूस न किया जा सका क्योंकि वह तरलता सात्विक थी, आंगिक नहीं। प्रेम की अग्नि  को कवि ने इतनी शिद्दत के साथ महसूस किया है कि उसके बिना जीने की कल्पना भी नहीं की जा सकती।  इतनी सारी न्यूनताओं के बोध के कारण ही यह इच्छा उत्पन्न हुई है कि 'जब हो तुम पंचतत्व में विलीन/ मुझे भी समाहित कर लेना'।  सहमरण की यह कामना शाश्वत सामीप्य प्राप्त करने की कामना का ही दूसरा रूप है। यहाँ पहुँच कर प्रेम पंचतत्व से निर्मित देह का अतिक्रमण करके भक्ति में विलीन होता दिखाई पड़ता है और इस तरह कहीं कम रह गए 'कुछ' का संधान एक आध्यात्मिक यात्रा की प्रेरणा बनता है। 


इसका अर्थ यह कदापि नहीं है कि कवि अभावों को खोज खोज कर अपने व्यक्तित्व को हीनता ग्रंथि में जकड़ देना चाहता हो। बल्कि इसके विपरीत कवि को तो वर्तमान में जीना पसंद है। भले ही इसके लिए अपने चाक़ जिगर को सीना पड़े। उसे तो अभावों को याद करके अपने भावों को दयनीय स्थिति में लाना असामान्य लगता है। इसलिए इन अभावों की पूर्ति के लिए वह वर्तमान का जश्न मनाने में विश्वास रखता है और उस वैचारिक औदात्य को आयत्त करना चाहता है जो  हर अभाव, न्यूनता और 'कहीं कुछ कम' के परे परिपूर्णता के परम लक्ष्य की ओर प्रेरित कर सके। यही कारण है कि बिना किसी प्रकार की कुंठा के कवि यह स्वीकार कर सका है कि 'जीवन की सरिता अपनी लय में बही/  कमियाँ थीं/ कमियाँ रहीं।' लेकिन उनके अहसास ने कवि-मन  को परेशान नहीं किया। बल्कि जीवन की उमंग ने कमियों का समायोजन किया।  अनिल कुमार शर्मा यह मानते हैं कि अभाव या कमी का अहसास कहीं न कहीं मनुष्य का स्वभाव है और इसकी जड़ इस मूल प्रवृत्ति में है कि जिस वस्तु को व्यक्ति जितनई अधिक उत्कटता के साथ पाने के लिए व्यग्र होता है उसके पास आने पर उसे न पाने की प्यास और हुडके उतनी ही तेजी से बुझ जाती है। लेकिन यह प्यास और इस प्यास का बुझना संवेदनशील व्यक्ति को यह जरूर सिखा जाता है कि जीवन की सरिता की गति हमारी प्यास से नियंत्रित नहीं होती, वह तो सदा अपनी लय में बहा करती है। इसलिए वे यह भी संदेश देते हैं कि महान व्यक्तित्व में कमी निकलते रहने वाले लोग इस बहाने खुद अपने व्यक्तित्व की कमियों को छिपाने और लोक में स्वीकृति और प्रतिष्ठा पाने के ओछे प्रयासों में लगे रहते हैं। इस न्यूनता  के बोध से ग्रस्त कुंठित लोग किसी भी विराट व्यक्तित्व को जाने-परखे बिना वैसे ही दोषारोपण करते रहते हैं, जैसे प्राय: कृष्ण-द्वेषी लोग कृष्ण के चरित्र पर उँगली उठाया करते हैं। न्यूनताबोध का यह चक्र केवल व्यक्तिगत जीवन तक सीमित नहीं है बल्कि इसमें जीवन और जगत का तमाम विस्तार भी समाया हुआ है। कवि को लगता है कि हम आज एक ऐसे संवेदनशून्य युग में जी रहे हैं जहाँ सब कुछ होते हुए भी कहीं कुछ तो ज़रूर कम है;  और वह है संवेदना जो लगातार घटती जा रही है। कवि को अफसोस है कि सभ्यता की तथाकथित दौड़ में बहुत आगे निकलते हुए मनुष्य ने बहुत कुछ खो दिया है और एक ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है जहाँ संवेदनाओं की चिड़िया को कठोरता के बाज़ लील रहे हैं। कवि की राय में यह सारा का सारा विकास इसलिए विनाश का पर्याय बनता जा रहा है क्योंकि हमें संहार,  घोटालों और आतंक की चटपटी खबरें देखने की बुरी लत पड़ गई है।  इस विकृति की हद तक संवेदनशून्य हो चुके दौर में कवि उदास है और पूछता है कि 'क्या इसका हल आपके पास है?'  इसका उत्तर शायद किसी हद तक कविता के पास हो। लेकिन कवि को मालूम है कि किसी सियासी साहित्यकार के पास तो यह हल हो नहीं सकता,  क्योंकि सियासी साहित्यकार न तो उन महिलाओं के दर्द को लिखने का साहस कर सकता है जो निरंतर अत्याचार झेले हैं, न देश के  बँटवारे का ज़िक़्र कर सकता है, न उस क़त्ले-आम का चित्रण कर सकता है जिसमें अनगिनत बच्चे रातों-रात अनाथ बना दिए गए, न उन छद्म जननायकों और जनसेवकों के मुखौटे ही उतार सकता है जो यह मानते हैं कि भेदभाव के मसले अगर हल हो गए तो वे क्या करेंगे! प्रकारांतर से कवि अनिल कुमार इस और इशारा करते हैं कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से लेकर अब तक यद्यपि हमने बहुत प्रगति की है, बहुत विकास किया है, बहुत कुछ पाया है, लेकिन अभी भी कहीं तो कुछ कम है। यह कमी शायद सियासी पार्टियों की इस मानसिकता पर चोट करके पूरी की जा सकती है कि 'प्रेम करना ही है तो खुद से करो/ अपने परिवार से करो/ देश से भी कोई प्रेम होता है!'  कवि बड़े सहज भाव से उन कथित महापुरुषों की भी खबर लेता है जिनके कारण स्वतंत्रता के समर में कहीं कुछ कम रह गया और 'फांसी पर लटका दिए गए/ देश से प्रेम करने वाले/ और उनके पक्ष में/ उनको माफ करने की सिफारिश में / किसी तथाकथित ने न तो कोशिश की/ और न किसी को करने दी!'  कहना न होगा कि कवि अनिल कुमार शर्मा की रचनाएँ निज से पर तक व्याप्त  इन तमाम अभावों को पहचानने और उनकी पूर्ति के लिए अपनी रचनात्मक ऊर्जा को समर्पित करने के साक्ष्य की कविताएँ हैं। 


लोकतंत्र और मानवाधिकार


कवि अनिल कुमार शर्मा अपने समय के सभी सवालों और सरोकारों का सामना और निर्वाह अपनी कविताओं में बखूबी करते हैं। एक बड़ी विशेषता है कि वे हर तरह की नारेबाजी और बड़बोलेपन से परहेज करते हैं और अपनी बातों को, प्रतिक्रियाओं को बिना आवेश और उत्तेजना के व्यक्त करने में विश्वास रखते हैं। अपने इस खास लहजे में वे बहुत बार गहरी सामाजिक और राजनीतिक टिप्पणियाँ सहज प्रवाह की तरह कर जाते हैं। रामराज्य को लेकर उनकी टिप्तत्ववेत्ता की तरह सलाह देते हैं कि हमें तथ्यों को निर्मल दृष्टि से परख कर देखना चाहिए और सत्य को अपनी अंतर्दृष्टि प्रदान करनी चाहिए। वे अपने समशील रचनाधर्मियों से यह अपेक्षा रखते हैं कि वे इतिहास और वर्तमान के बीच घालमेल न करें, 'अन्यथा/ इतिहास में वर्तमान व्यवस्था को भी तुम/ रामराज्य ही लिख जाओगे/ वह रामराज्य  जो तुमने कभी देखा ही नहीं/  जिसमें निर्दोष पत्नी का परित्याग किया गया/ और रामराज्य के सभासद चुप रहे/ आज की तरह उसे समय भी राजा के निर्णय के/ विरुद्ध बोलने वाले/ राष्ट्रद्रोही कहे जा सकते थे।' स्पष्ट है कि यहाँ एक ओर तो कवि का स्त्रीपक्षीय विमर्श सामने आया है, लेकिन दूसरी ओर इन पंक्तियों में गहरा समकालीन राजनीतिक विमर्श भी बड़ी कुशलता से पिरोया गया है और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर राज्य द्वारा लगाए जाने वाले अंकुश ही नहीं, विरोधी विचार रखने पर राष्ट्रद्रोह के मुकदमे चलाए जाने की प्रवृत्ति पर गहरी चोट की गई है। इस तरह रामराज्य के मिथकीय महावृत्तांत का विखंडन करके उसे तानाशाही का पर्याय बताना कवि की मानवाधिकार चेतना का व्यंजक तो है ही, वर्तमान व्यवस्था के प्रति असंतोष का भी प्रतीक है। 


भारत ने स्वतंत्रता प्राप्त होने पर बड़े उल्लास के साथ लोकतांत्रिक व्यवस्था को अपनाया था और यह कामना की थी कि एक ऐसा सर्व कल्याणकारी राज्य स्थापित होगा जो सचमुच रामराज्य होगा। लेकिन यह सपना बहुत जल्दी खंडित हो गया और भारतीय जनता ने अपने आप को छला हुआ महसूस किया। छलने वाले वे लोग थे जिन्हें जनता ने अपना पूरा विश्वास देकर इस रामराज्य के सपने को साकार करने के लिए चुना था और सर्वजन के योग और क्षेम के वहन का दायित्व सौंपा था। इस प्रवंचना को कवि ने सीधे-सीधे इस तरह शब्दबद्ध किया है 'शंकित हूँ/ आज मैं/ उस आदमी के बदले हुए रुख से/ भयभीत हूँ उसकी नजरों से/ जिसे चुना था मैंने/ अपना अमूल्य 'मत' देकर।'  यहाँ बिना लिखे ही कवि ने लिख दिया है कि उसकी निगाह में भारत में लोकतंत्र विफल रहा है। लेकिन इसे कहने के लिए उसने किसी प्रकार के आक्रोश और आक्रमण की मुद्रा नहीं अपनाई है। कहना ही होगा कि कवि की ये अभिव्यक्तियाँ बड़ी हद तक साक्षी भाव की अभिव्यक्तियाँ हैं। अब वह उनके प्रति निर्लिप्त है और एक हद तक अनासक्त भी। यही कारण है कि राजनीतिक किस्म की कविताओं में भी अनिल कुमार शर्मा का अंदाज़ बड़ी हद तक ठंडेपन से आवृत प्रतीत होता है। लेकिन इसका यह अर्थ न समझा जाए कि कवि की राजनीतिक चेतना में किसी प्रकार का झोल है। उसकी जनपक्षधरता एकदम स्पष्ट है जिसे व्यक्त करने के लिए वह अपने चारों ओर से ही कोई रोचक प्रसंग या सुलभ प्रतीक उठाता है। जैसे, लोक में आम को फलों का राजा कहा जाता है, माना जाता है। लेकिन कवि इसे आप्त कथन की तरह स्वीकार करने के लिए तत्पर नहीं है। उसके लिए आम साधारण का वाचक है। राजा विशिष्ट का। जो साधारण है वह विशिष्ट हो नहीं सकता; और जो विशिष्ट बन गया वह साधारण रह नहीं सकता। आम है तो राजा होगा नहीं। राजा हुआ तो आम रहेगा नहीं। इस लिहाज से आज राजगद्दी पा चुके कल तक आम रहे जनप्रतिनिधियों के चरित्र के दोगलेपन पर कवि का कटाक्ष बहुत गहरा है, 'राजा कोई आम व्यक्ति नहीं होता/  तो फिर उसे आम कहना/ गुस्ताखी नहीं तो और क्या है/… राजा आम तो नहीं हो सकता/ हाँ! यह तो संभव है कि आम राजा बन जाए/ लेकिन एक बार राजा बन कर वह आम हो जाए/ ऐसा हो नहीं सकता।' संकेत स्पष्ट है कि सत्ता पा लेने पर जनप्रतिनिधि जनता का नहीं राजन्य वर्ग का हितैषी बन जाता है। 


भारत में लोकतांत्रिक व्यवस्था की विडंबनाओं पर टिप्पणी करने के लिए कवि ने प्राय: बेहद परिचित और साधारण प्रतीकों को चुनकर उनमें विशिष्ट अर्थ भरने में संप्रेषण का विशेष कौशल दिखाया है। काले रंग के माध्यम से की गई यह टिप्पणी सचमुच मार्मिक बन  पड़ी है कि  'संसद में बहुत सावधानी से बोलिए/ कहीं ऐसा न हो कि कोई मुझे आपके मुँह पर पोत दे।' कहीं न कहीं यह वक्तव्य जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ जनता को भी संबोधित है। जहाँ जनप्रतिनिधियों को कवि सचेत करता है कि संसद में भाषिक मर्यादा का पालन करें, अन्यथा जनता भी मर्यादाहीन हो सकती है।  वहीं दूसरी ओर जनता से भी प्रकारांतर से यह कह रहा है कि संसद में अमर्यादित आचरण करने वाले जनप्रतिनिधियों को अब उसे और अधिक बर्दाश्त नहीं करना चाहिए तथा उनकी निशानदेही करके उन्हें दंडित करना चाहिए। लोकतंत्र में किसी नेता को दंडित करने का सहज मार्ग यही है न कि उसे आगे समर्थन न दिया जाए? लेकिन विडंबना यह है कि जनता अपने प्रतिनिधियों को इस प्रकार दंडित करने के अधिकार का प्रयोग करने के बजाय बार-बार उन्हीं को चुनौती है और अमर्यादित आचरण का कलंक हमारी लोकतांत्रिक प्रणाली के माथे पर लगता है। असली अपराधी तो दूध के धुले बने रहते हैं। यह स्थिति किसी भी संवेदनशील नागरिक की तरह कवि के मन को भी कचोटती है और वह कामना करता है कि कोई तो आगे आए और इन बेशर्मों के चेहरे पर काला रंग पोत दे।


प्रेम


प्रेम कविता का शाश्वत विषय है। लेकिन हम एक ऐसे विडंबनापूर्ण समय में जी रहे हैं जहाँ प्रेम पर अनेक प्रकार के प्रतिबंध लागू हैं। शायद यह केवल हमारे समय का ही द्वंद्व नहीं है। बल्कि प्रेम के समक्ष सदा ही तरह-तरह की चुनौतियाँ रही हैं। कहने को प्रेम व्यक्तित्व की पूर्णता और मुक्ति का प्रतीक है। लेकिन समाज इस पूर्णता और मुक्ति के मार्ग में खलनायक बनकर खड़ा दिखाई देता है। प्रेमीजन समाज की बनाई दीवारों को तोड़ने और खाइयो को पटाने के लिए सदा से प्रयासरत रहे हैं।  लेकिन समाज नई-नई दीवारें खड़ी करने और खाइयाँ खोदने में लगा ही रहता है। कथात्मक शिल्प में बुनी गई कविता में कवि ने इस संकट की ओर मार्मिक ढंग से इशारा किया है,  'अब/ जब यह पत्र मेरे हाथ में आया है/ मैं धर्म संकट में हूँ/  मुझे और थोड़ा समय दो/ कहीं ऐसा न हो/ कोई खाप की पंचायत/ सुना दे एक तानाशाही फरमान।'  कहना न होगा कि यह कविता एक सुंदर प्रेम कविता तो है ही, एक सटीक व्यंग्य भी है जाति व्यवस्था से ग्रस्त रूढ़िवादी समाज पर। इन रूढ़ियों के बावजूद लोग प्रेम करते हैं और प्रेम जीते हैं। इसीलिए दुनिया में मनुष्यता बाकी है, कविता बाकी है और बाकी हैं सपने। तभी तो अनिल की कविता की मुग्धा स्त्री यह भोला प्रश्न कर पाती है कि 'क्या/ मैं भी तुम्हारे ख्वाब में आती हूँ जैसे तुम आते हो?' कवि अनिल सपनो के पर अगले जन्मों और अगली पीढ़ियों के लिए प्रेम-बेल बोना चाहते हैं, यह जानते-बुझते कि 'प्रेम करना शायद आसान हो सकता है/ वैसे इतना आसान भी नहीं/ लेकिन प्रेम/ बोना बहुत कठिन प्रयत्न है/ बहुत सींचना होता है इसे/  देखभाल, रखवाली, धूप जाड़े पाले से बचाव, न जाने क्या क्या!'


रिश्ते और यादें


आज का समय बड़ी हद तक स्मृतिविहीन और जडविहीन होते जाने का समय है। कविता किसी न किसी तरह इन्हें बचा लेना चाहती है। अचरज नहीं कि कवि अनिल कुमार शर्मा बार बार अतीत को आवाज़ लगाते हैं, सिमटती जा रही पारिवारिक संवेदनाओं को सींचते हैं, ग्राम जीवन और लोक संस्कृति को पोसते हैं, मूल्य विघटन को देख कर कलपते हैं और घर-परिवार पर बाज़ार के आक्रमण से दुखी होते हैं। वे गाँव और प्रकृति को वापस पाना चाहते है क्योंकि ऐसा करके ही नैसर्गिकता और आत्मीयता को बचाया जा सकता है। यही कारण है कि उन्हें चिड़िया और दादी के समय से जागने और मेहनत करके खाने में बिंब-प्रतिबिंब संबंध दिखाई देता है। पितृत्व में जीवन की पूर्णता नज़र आती है। वे याद दिलाते हैं कि एक समय था जब घर सभी रिश्तों को मजबूती से पकड़कर दिन-रात खड़े रहते थे। उन घरों के आँगन दिल में बने होते थे जबकि आज की शहराती ज़िंदगी में दिलों के वैसे उदात्त रिश्ते गायब हो गए है। इन घरों में जगह तो बहुत है लेकिन रिश्तों की मजबूती का कंक्रीट नहीं है। जहाँ ये रिश्ते हैं वहाँ आज भी एक दूसरे के लिए सर्वस्व वरन का जज़्बा बाकी है, भले ही गरीबी में पूछे गए भूख के कठिन सवालों के जवाब में किसी अंगूरी को सकुचाकर डबडबाई आँखें फेर लेनी पड़ती हों। ऐसी ही स्थिति में तो हँसिया अधिक से अधिक गेहूँ काटने के लिए व्यग्र हो उठता है। ज़्यादा से ज़्यादा काटने को बेचैन यह हँसिया कवि की दमित क्रांति कामना का भी प्रतीक है। कवि ने महसूस किया है कि शहर और बाजार की ओर बेतहाशा दौड़ में पीछे छूट गए गाँव और परिवार के साथ ही प्रायः रिश्ते-नातों की नैसर्गिक ऊर्जा और सहज निश्छलता भी कहीं बिला जाती है। तब जाकर समझ में आता है कि सब कुछ पाने में बहुत कुछ छूट गया। कहीं कुछ बढ़ गया तो कहीं कुछ कम हो गया - 'क्या नहीं था वहाँ/ बस बनावट ही तो नहीं थी/ जो शहर में है!


प्रश्न और सुभाषित


अनिल की कई कविताएँ बड़ी हद तक एक विविध प्रकार के जीवनानुभवों से संपन्न व्यक्ति के मन में ऊभ-चुभ करते रहने वाले प्रश्नों की उपज हैं। यह प्रश्नाकुलता बहुत सारी कविताओं में सीधे-सीधे प्रश्नवाचक संरचना के रूप में मुखर होती है और पाठक को सोचने के लिए विवश करती है। जैसे कवि का प्रश्न है, 'किसको जीत लेना है? किसके लिए जीत लेना है? दिखावे के लिए? आत्म संतुष्टि के लिए? या कुछ और हासिल कर लेने के लिए?'  कहना न होगा कि विजय प्राप्त करने की जो अदम्य इच्छा मनुष्य को अपने दैनिक जीवन के तमाम घात-प्रतिघातों के बीच सक्रिय रहने के लिए प्रेरित करती है, वही जब घनीभूत हो जाती है तो विस्तार की ऐसी महत्वाकांक्षा को जन्म देती है जिससे युद्ध, षड्यंत्र, विनाशलीला,  परतंत्रता और दासता के कुटिल और कुत्सित वृत्तांत रचे जाते हैं। हद तो यह है कि जीत की यही इच्छा अनेक बार किसी विजिगीषु व्यक्ति या जाति के भीतर दूसरे व्यक्तियों या जातियों को अपना बौद्धिक उपनिवेश तक बनाने के लिए प्रेरित करती है। विजय कामना के चिंतन से निकला कवि का प्रश्न अंततः एक सूक्ति के रूप में इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि 'जीत के लिए योग्यता नहीं/ चाहिए हथकंडे।' प्रश्न से आरंभ करके निष्कर्ष तक पहुँचने वाली इस तार्किक रचना प्रक्रिया को कवि अनिल ने अनेक कविताओं में अपनाया है और इस बहाने बहुत सी सूक्तियाँ गढ़ने में सफलता पाई है। जैसे 'कि रेखाएँ होती नहीं हैं/ बनाई जा सकती हैं/ अपनी मेहनत से, सतत परिश्रम से/ ईमान से, ज़मीर से/ संयम से, धैर्य से।'  ऐसे अवसरों पर कई बार यह जरूर लगता है कि कवि ने उपदेशक का बाना ओढ़ लिया है और कवित्व तार्किकता का शिकार हो गया है। सूक्ति उपलब्ध करने के लिए काव्य का इतना बलिदान सह्य कहा जा सकता है। लेकिन ध्यान रखा जाना चाहिए कि सतह पर तैरता विचार कविता का शत्रु होता है। विचार को कविता में ढालना रचना-प्रक्रिया की एक बड़ी चुनौती है और 'कहीं कुछ कम है' के कवि ने उसका भली प्रकार सामना करते हुए अपने ये सुभाषित रचे हैं।


अन्यत्र कवि का यह प्रश्न बहुत स्वाभाविक है कि पेट भर खाकर भी पेट भर संतुष्टि नहीं होती, आखिर क्यों? या छुवन से पहले का अहसास छुवन के बाद नहीं रहता, ऐसा क्यों?  बात यहीं तक नहीं रुकती बल्कि प्रेमास्पद को प्राप्त कर लेने पर प्रेम के उथले हो जाने की आशंका के रूप में आगे बढ़ती जाती है। और तब प्राप्त होता है निष्कर्ष के रूप में यह सुभाषित कि 'क्या प्रेम परिपक्व हो गया है/ जिस्म की नदी के उथले किनारों से हटकर/  गहरा उतर गया है/ रूह के चिदानंद सागर की थाह लेने/  उस मोती की चाह में/ जिसे विशुद्ध प्रेम कहते हैं/ हाँ,  प्रेम विजय पा चुका है अपनी भूख पर/ प्यास पर।' यहाँ फिर लेखक का प्रेम विषयक वही जीवन दर्शन उभरता है जिसका मूल मंत्र यह है कि दैहिक अनुभवों के पार प्रेम का एक ऐसा आध्यात्मिक लोक है जहाँ देह पीछे छूट जाती है!


कुछ कविताएँ तो ऐसी भी हैं जो विचार को सीधे-सीधे सूक्ति में ढालती प्रतीत होती हैं। ऐसे अवसरों पर किसी मार्मिक दृष्टांत, सादृश्य विधान, लोक संदर्भ या मुहावरे का प्रयोग उक्ति को काव्यात्मक सौंदर्य से अभिमंडित कर देता है। घर की चर्चा करते हुए वैचारिकता के बोझ को कवि ने इसी तकनीक के सहारे हल्का किया है। यथा, 'अक़्ल की बात परिपक्व होने पर समझ आती है/ जैसे वृक्ष पर समय से पहले फल नहीं आते/… जैसे परिंदों को नहीं रहती शाम के खाने की चिंता/ मैं क्यों न सीख सका यह सीख उनसे/…  रघुनंदन फूले न समाएँ लगुन आई हरे हरे/ उस मधुर शब्द लहरी को याद कर तबीयत आज भी हरी हो जाती है/…  क्या मैं कभी/ इस घर के कृतित्व व मोह के सुखद भार से/  मुक्त हो सकता हूँ?'


समांतरता और विपथन


अपनी कविताओं में शैलीगत चमत्कार उत्पन्न करने के लिए अनिल कुमार शर्मा अनेक स्थलों पर बहुत सहज ढंग से समांतरता और विपथन जैसे शैलीय उपकरणों का प्रभावी तथा सफल प्रयोग करते दिखाई देते हैं।  जब वे तरह-तरह की शिकायतों को सूचीबद्ध कर रहे होते हैं तो केवल एक कुछ आंकड़े भर संचित नहीं कर रहे होते हैं; बल्कि एक ओर तो घरौंदों, वृक्षों, पर्वतों, रस्मों, खेलों, दिहाड़ी और व्यवस्था को तथा दूसरी और परिंदों, हवाओं, नदियों, महिलाओं, बच्चों, मजदूरों और सैनिकों को अलग अलग  सहयोगी समांतरता में रखकर दोनों समूहों को एक दूसरे के विरोध में प्रस्तुत करके अर्थस्तरीय द्वंद्वात्मक समांतरता भीउपस्थित करते हैं। खास बात यह है कि इन सारे द्वंद्वों और शिकायतों के परिणाम में जहाँ मुस्कुराने से लेकर खुलकर हँसने तक की प्रतिक्रिया व्यक्त की गई है, वहीं इससे आगे के अंश में जब शिकायत का संबंध आदमी और आदमी से जुड़ता है तो प्रतिक्रिया एकदम विपरीत होती है और पाठक कविता के इस विपथित अंत से चमत्कृत ही नहीं होता, विचलित भी हो उठता है,  'अब/ आदमी को लेकर आदमी ने शिकायत की है/ आदमी कहे जाने वाले/ आदमी से/ तो वह धर्म संकट में है/  हँस नहीं पा रहा है!'


कवि और कविता


कवि अनिल कुमार शर्मा को भली प्रकार यह भी मालूम है कि कवि और कविता की भूमिका में भी कहीं तो कुछ 'कम' ज़रूर है। इस 'कम' को वे एक मंचीय चुटकुले से बुनी गई कथात्मकता के सहारे बखूबी व्यंजित करते हैं। विडंबना ही तो है कि एक ओर कवि को मनीषी, परिभू, स्वयंभू और प्रजापति कहा गया है तथा दूसरी ओर कवि होना समाज में व्यापक उपहास, तिरस्कार और व्यंग्य का विषय बन गया है। इसके लिए निश्चय ही कुकुरमुत्तों की तरह फैलने वाली वह तथाकथित कवि नस्ल जिम्मेदार है जिसने अपनी कुकविता से कवि और विदूषक के बीच के अंतर को ही मेट दिया है। ऐसे किंकवियों को लक्षित करके कवि अनिल कुमार शर्मा एक कवि के मच्छर के रूप में पुनर्जन्म की मनोरंजक कल्पना करते हैं। वह मच्छर जिसे भी काटता है वही लिखने लग जाता है। इस संक्रामक रोग के फैलने से घर-घर कवि पैदा हो जाते हैं और लोग ऐसे आत्ममुग्ध कवियों के पुनर्जन्म पर उन्हें मारने के लिए तालियाँ बजाने लगते हैं। कहना न होगा कि इन आत्ममुग्ध रचनाकारों ने समकालीन कविता का बेड़ा ग़र्क़ किया है। वरना सही कविता तालियों की अभिलाषी नहीं होती, बल्कि अपने श्रोता के मानस में हौले से पैठकर उसकी संवेदनशीलता जगा कर उस भावनात्मक समृद्धि प्रदान करती है। अन्यथा तो सरस्वती के समक्ष भी सिर धुनकर पछताने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचता। 


कविता में गीति तत्व और स्वच्छंदता के द्वंद्व को भी कवि अनिल ने बखूबी समझा और समझाया है। उनकी पीड़ा यह भी है कि 'लड़की की स्वच्छंदता पसंद नहीं जैसे समाज को/ ऐसे ही मेरी कविता की स्वच्छंद बात/  छंद के समाज द्वारा दुत्कारी गई।' लेकिन संतोष यह है कि साहित्य के पाठकों ने उसे स्वीकारा। कवि की निगाह में गीत और स्वच्छंद कविता का रिश्ता भाई-बहन जैसा है और उसे बदला नहीं जा सकता। तमाम तरह के वर्गीकरणों के बावजूद साहित्य तो साहित्य ही है - अखंड और अविभाज्य। इन वर्गों और नामों से ज़्यादा ज़रूरी और महत्वपूर्ण है कवि की दृष्टि, अंतर्दृष्टि और विश्वदृष्टि 'जो पहुँच रखती है उस अंतर्मन के स्याह कूप तक/ जहाँ रवि की पहुँच नहीं/ जो चित्र बना सकती है शब्दों से उसका/ जिसको देखा नहीं।' कहना न होगा कि 'कहीं कुछ कम है'  की कविताएँ इसी व्यापक और सूक्ष्मवेधी दृष्टि की सारस्वत साधना की निष्पत्तियाँ हैं। 000



  • ऋषभदेव शर्मा, पूर्व आचार्य एवं अध्यक्ष, उच्च शिक्षा और शोध संस्थान, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद। आवास : 208 ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद- 500013/ मो. 8074742572.