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मंगलवार, 25 नवंबर 2014

सोनिया

16/11/2014 को कादंबिनी क्लब, हैदराबाद द्वारा दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सभागार में आयोजित समारोह में अरुणाचल प्रदेश की युवा लेखिका डॉ. जोराम यालाम नाबाम ने नजीबाबाद के वरिष्ठ कवि डॉ. अशोक स्नेही  की काव्यकृति ''सोनिया'' का लोकार्पण किया. इस अवसर पर प्रो. देवराज [वर्धा] और डॉ. अहिल्या मिश्र [हैदराबाद] ने कवि को बधाई दी तथा प्रो. ऋषभ देव शर्मा ने लोकार्पित प्रेमकाव्य के अंशों का वाचन किया. प्रकाशक अमन कुमार त्यागी ने 'सोनिया' की समीक्षा प्रस्तुत की तथा डॉ. अशोक स्नेही ने फोन-वार्ता करते हुए सबके प्रति आभार व्यक्त किया.


भूमिका


प्रेम सृष्टि की मूल शक्ति है. वही आकर्षण और चेतना का स्रोत है, मुक्त मनोभाव है. प्रेम व्यक्ति को मनुष्य और मनुष्य को देवता बनाता है. प्रेम जीवन को सार्थकता प्रदान करता है और प्रेम का अभाव जीवन को भटका देता है. सारे भाव प्रेम में से ही उपजते हैं, उसी में विलसते हैं  और उसी में लीन हो जाते हैं. प्रेम की यह लीला देश और काल की सीमाओं से परे देह और दैहिकता के पार मन और आत्मा की लीला है. प्रेम ऐसा अहोभाव है जो हमारे अस्तित्व पर कोमलता के किसी क्षण में गुलाब की पंखुड़ियों पर बरसती हुई ओस की बूंदों की तरह उतरता है. जब हमारे अस्तित्व पर प्रेम उतरता है तो हम रूपांतरण की प्रक्रिया से गुजरते हैं, सहज संवेदनशील हो उठते हैं. प्रेम में पाना महत्वपूर्ण नहीं होता, प्रेम में होना महत्वपूर्ण होता है. खोने-पाने का गणित व्यापारी रखा करते हैं, प्रेमीजन नहीं. प्रेम जब उतरता है तो कविता फूटती है. यह हो सकता है कि हर प्रेमी कवि न होता हो पर कविता फूटती अवश्य है. भले ही निःशब्द रह जाए. 

यही विस्मयकारी अनुभव अशोक स्नेही (1954) के अस्तित्व पर भी उतरा है. स्वभावतः कविता भी फूट पड़ी है. निःशब्द नहीं सशब्द; क्योंकि अशोक स्नेही आतंरिक अनुभूतियों को कलात्मक अभिव्यक्ति प्रदान करना जानते हैं. प्रणय के स्पंदनों को, अपरिचिता के साथ कल्पना लोक में विहार की विविध मनोदशाओं को, शब्दचित्रों में बाँधना उन्हें भली प्रकार आता है. उनके मनोजगत की सर्वथा निजी अनुभूतियों का मुकुलित और प्रस्फुटित रूप है – ‘सोनिया’. यह अनपाए प्यार की अद्भुत गाथा है. 

‘सोनिया’ डॉ. अशोक स्नेही की काव्यकला का सुंदर नमूना है. इसमें कवि ने अपरिचित प्रेयसी के साथ कल्पना में रास रचाया है. मिलन और विरह के सारे अनुभव कोमल मन के झनझनाते तारों पर झेले हैं. मनवीणा के तारों की इस झंकार में कभी अप्रतिम रूप की अभ्यर्धना बज उठती है तो कभी उत्कंठित मानस की इच्छाएँ तरंगित होने लगती हैं. प्रिया का रूप कवि को प्रकृति के साथ एकाकार प्रतीत होता है और प्रकृति प्रिया के एक एक अंग में समाई लगती है. इस अपरिचित कविप्रिया के होंठ दहकते लाल टेसू हैं, नयन बहकते मस्त भँवरे हैं, अंग अंग चहकता है, चंचल चितवन दुधारी तलवार चलाती है और गालों पर अंगार खिलते हैं. यह नायिका अत्यंत कोमल है, चंचल है, मोहिनी है. कभी कवि को वह इतनी निकट लगती है कि मिलन की मन्नतें माँगकर इच्छाओं की पूर्ति का द्योतक कलावा कलाई में बाँध लेती है और रविवार की छुट्टी में कवि उसे पीपल पर नाम गोदने चलने के लिए आमंत्रित करता है; तो कभी कवि स्वयं को सम्मोहित अनुभव करता है – ऐसे हर क्षण में प्रिया अपनी नरम उँगलियों से छूकर नवरस रंग बहार का संचार करती है, काव्य की प्रेरणा बन जाती है. चरम समर्पण के क्षणों में यह कविप्रिया गंगा और माँ भी बन जाती है. वही सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक मूल्य क्षरण के बीच नई मूल्य चेतना का प्रतीक बनकर प्रकट होती है और वही सारे प्रवादों और अपवादों के बीच सहज संबल प्रदान करती है. 

इसमें संदेह नहीं कि डॉ. अशोक स्नेही के जीवन में प्रेम का यह अवतरण उस मोड़ पर हुआ है जब कवि को यह अनुभव हो चुका है कि संबंधों के ताने-बाने मकड़ी के जाले हैं, जीवन समझौतों का दूसरा नाम है. ऐसी स्थिति में इस प्रेम के सहारे कवि एक समानांतर दुनिया में, सपनों के संसार में, ही मुक्ति का बोध पाता है, इस समानांतर संसार में ही घने बबूलों के जंगल, दरिंदों के दंगल, विघ्न और अमंगल को विलीन करने वाला ऐसा जादू है, जिसके लोक में पहुंचकर कवि यथार्थ जगत के समस्त दुखों से निस्तार पाता है. यह समानांतर जगत ही डॉ. अशोक स्नेही की ‘सोनिया’ का जगत है, रूप के जादू का जगत है, प्रेम का जगत है. 

प्रेम के इस जादुई जगत के सृजन और प्रकाशन के लिए कवि को बधाई देते हुए मैं उनके यश की कामना करता हूँ. 

12 जून 2014                                                                                                         - ऋषभदेव शर्मा 
नजीबाबाद  (यात्रा)                                                                                                     

बुधवार, 4 जून 2014

परमप्रेम रूपा है भक्ति

भक्ति प्रेम की उच्चतम स्थिति का नाम है. वह परमप्रेम रूपा है. यों भी कहा जाता है कि प्रेम के साथ जब श्रद्धा का योग हो जाता है तो प्रेमी भक्ति की ओर अग्रसर होने लगता है. आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसकी व्याख्या करते हुए ठीक ही कहा है कि “जब पूज्य भाव की वृद्धि के साथ श्रद्धाभाजन से सामीप्यलाभ की प्रवृत्ति हो, उसकी सत्ता के कई रूपों के साक्षात्कार की वासना हो, तब ह्रदय में भक्ति का प्रादुर्भाव समझना चाहिए. जब श्रद्धेय के दर्शन, श्रवण, कीर्तन, ध्यान आदि से ही आनंद का अनुभव न हो, जब उससे संबंध रखने वाले श्रद्धा के विषयों के अतिरिक्त बातों की ओर भी मन आकर्षित होने लगे, तब भक्ति रस का संचार समझना चाहिए. जब श्रद्धेय का उठाना, चलना, फिरना, हँसना, बोलना, क्रोध करना आदि भी हमें अच्छा लगने लगे तब हम समझ लें कि हम उसके भक्त हो गए.”

श्रद्धा और प्रेम का यह दुर्लभ संयोग जिसके अनुभव में आ गया वह ही सच्चा भक्त है. कबीर हों या मीरा, आंडाल हों या रामदासु – उनका जीवन भक्ति के इसी परम प्रेममय स्वरूप का दर्शन कराता है. कबीर के वचन इस परमप्रेम को तरह तरह से समझाने की कोशिश करते प्रतीत होते हैं. कबीर के लिए प्रेम ऐसी ज्योति है जिसके प्रकाशित होने से अनंत योग का जागरण हो जाता है. यह प्रकाश संशय को जड़ से मिटा देता है क्योंकि प्रेम और संशय एक साथ रह नहीं सकते. संशय मिटा तो समझो कि प्रिय आन मिला. यह प्रिय कबीर के लिए दुलहिन आत्मा का कंत राजाराम भरतार है. उसके आने की सूचना मिलते ही भक्त का मन नाचने लगता है, मंगलाचरण गूँजने लगते हैं.

कैसे पाता है कोई कबीर अपने इस भरतार को? प्रेम से. क्या है प्रेम? कबीर बताते हैं कि प्रिय के हिय में प्रवेश के लिए बस एक शर्त है. प्रेमी को केवल इतना करना होगा कि अपने सिर को उतार कर धरती पर रख दे. बहुत नीचा है इस घर का दरवाज़ा, सिर उठा कर आप इसमें घुस नहीं सकते. सिर ज़मीन पर रखा, अहं रहित हुए तो यह दरवाज़ा खुद ब खुद खुल जाता है. विचित्र दरवाज़ा है. सांकल भीतर की तरफ लगी है और खुलता बाहर से है. बाहर से खोलने के लिए ज्ञान काम नहीं आता, पांडित्य का वश नहीं चलता. समर्पण काम आता है, प्रेम के ढाई आखर का एकमात्र मंत्र चलता है.

पंडित-ज्ञानी भला क्या प्रेम करेंगे? वे तो ज्ञान के रास्ते चलते हैं और अज्ञात तत्व को खोजते हैं. कबीर जैसे भक्त प्रेम के रास्ते चलते हैं और खुद को खोकर प्रिय को पाते हैं. भक्ति का मोती डूबने से मिलता है, गहरे पैठने से मिलता है, किनारे बैठे रहने से नहीं. गहरे पैठोगे, तो ही साक्षात्कार संभव होगा. इस साक्षात्कार का रहस्य भी कबीर संकेत से समझा गए हैं. बस इतना करना है कि अपने अंतर्चक्षुओं को प्रिय मिलन का कक्ष बना लेना है. पुतलियाँ सेज बन जाएँगी. पलकें आप से आप पर्दे गिरा देंगी. इस एकाग्र मनोदशा में ही उस प्रिय को रिझाना है –
पिंजर प्रेम प्रकासिया, जाग्या जोग अनंत
संसा खूटा सुख भया, मिल्या पियारा कंत
 
यह तो घर है प्रेम का, खाला का घर नाहिं
शीश उतारे भुईं धरे, सो पैठे इहि माहि
 
पोथी पढि-पढि जग मुआ, पंडित भया न कोय
ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय
 
जिन खोजा तिन पाइयां, गहरे पानी पैठ
मैं बपुरी बूड़न डरी, रही किनारे बैठ
 
नयनन की कर कोठरी, पुतली पलंग बिछाय
पलकों की चिक डारिके, पिय को लियो रिझाय

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मंगलवार, 4 फ़रवरी 2014

तेलुगु कवि के.एस. रमणा के काव्यानुवाद की 'भूमिका'

गहन जीवनानुभवों की कलापूर्ण अभिव्यक्ति में माहिर विलक्षण प्रतिभावान कवि के. एस. रमणा (1956) यद्यपि मध्यायु में ही यह जगत छोड़ गए तथापि तेलुगु जगत को उन्होंने अपनी लेखनी से मेधा का जो प्रसाद दिया है वह उनकी कीर्ति को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए पर्याप्त है. वक्तव्य और नारेबाजी से आक्रांत सपाट कविता के युग में सघन बिंबों वाली कविता रचने वाले के. एस. रमणा ‘निशि’ कविता के पुरोधा माने जाते हैं. घोर नैशांधकार से संत्रस्त वैयक्तिक, सामाजिक, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय परिवेश के त्रास को झेलने, देखने, भोगने वाले आज के मनुष्य की चिंताओं, मनोदशाओं और छटपटाहटों को व्यंजित करने वाली इन कविताओं में विशेष रूप से आकृष्ट करने वाली बात यह है कि कवि अंधकार के समक्ष आत्मसमर्पण नहीं करता तथा प्रकाश की छोटी से छोटी किरण को पूरा सम्मान देता है. इसका रहस्य उसकी अटूट जिजीविषा और अथाह जीवनासक्ति में निहित है. 

इसमें संदेह नहीं कि आज का मनुष्य अपने अंतरंग से लेकर जागतिक जीवन तक सर्वत्र युद्धरत है. ये युद्ध तरह तरह के हैं. बाहर के युद्ध देह के मर्मस्थलों पर वार करते हैं तो भीतर के युद्ध गोपनगुह्य अंतरलोकों को क्षत-विक्षत करते हैं. ऐसे में कवि युद्ध और प्रेम को आमने-सामने रखकर यह सूक्ति गढ़ता है – युद्ध में/ घाव होते हैं/ अनिवार्य है/ प्रेम के समान ही. प्रेम के अनुभवों को सर्वथा नई भंगिमा में व्यंजित करते हुए के.एस. रमणा ‘एक काला प्रेम गीत’ रचते हैं. कवि को एक सपने से प्रेम है, सपने को सच करते आंदोलन से प्रेम है, आंदोलन को जीवन मान चुके ‘तुम’ से प्रेम है, ‘तुम’ के साथ इस राह पर चलना अत्यंत कष्टकर है लेकिन कवि को संतोष है कि यह उसका अपना चयन है - भले ही इसके बदले में कचहरी का कटघरा, जेल की दीवार, लाठियों का चुंबन और संगीन के कटाक्ष मात्र मिलें. संतोष यह है कि - “तुम तो रोबेन द्वीप के बंदी हो/ मैं मैं हूँ न, सहज ही/ मेरे हृदय में उमड़ते प्रेम का बंदी बना.” प्रेम के इस पंथ में जब अकेलेपन से सामना होता है तब इसकी करालता समझ में आती है – “ हाँ ! अकेलापन एक सूली-सा है/ यह बिलकुल सच है/ सूली पर छितरे जीसस के/ खून की कसम खाकर कहता हूँ.” पर प्रेमपथिकों को इसकी परवाह कब रही है? वे तो आग के दरिया में डूबकर जाने के लिए अभिशप्त हैं; और इसी में उनका आनंद निहित है – “अग्निकुंड में चलने का निर्णय/ जब मैंने लिया/ तभी मैंने ताप की चिंता छोड़ दी./ तेरे ओठों की लालिमा का मूल/ मेरे रुधिर का उफान जब बना/ मेरे अस्तित्व का दुःख/ तुझे शहनाई के गीत-सा भासित हुआ.”

मृत्यु और अंधकार ने आज के मनुष्य को सब ओर से अपनी अजगरी गुंजलक में लपेट रखा है - कुछ इस तरह कि लपेट का कसाव दिनानुदिन बढ़ता जाता है. ऐसे में ‘निशि’ कविता में यदि मृत्यु बारंबार आती है तो इसे कवि की आतंकित मनोदशा न मानकर मृत्युबोध का प्रतीक मनाना उचित होगा. थेनेटॉस और पैथॉस की विषम सच्चाइयों का बयान करती कविताओं में मृत्यु के अनेक चित्र हैं – मनुष्य और मुर्दे को कौन अलग करता है/ कपाल मोक्ष के लिए इंतजार करती आँखों में नमी नहीं/ जीवन यात्रा को रोकना/ मृत्यु में जीवन की इच्छा को तलाशना/ अचानक मर जाना/ मरणोपरांत ही बतियाना/ सूली पर चढ़ने के बाद ही जीवन को समझना/ समाधि से ही जागरण के लिए प्रार्थना करना/ मृत व्यक्तियों को भी जीवित रखने के प्रयत्न शुरू करना/ आँखों पर वसंत की चिता सुलगना/ मृत्यु को वश में करना/ पल पल मृत्यु बाधा की प्रतीक्षा में तार का टूटना. लेकिन कवि का यह विश्वास इन सारी मृत्युओं से बड़ा है कि “अस्तित्व सागर के उस ओर है एक आकाश/ काली शीतल रात के जागरण में मुकुलित/ तिनकों के माथे पर/ दमकती पसीने की बूँदें.” यह विश्वास कवि को उस भारतीय चेतना से विरासत में मिला है जो मृत्यु को सत्य मानते हुए भी उसे अंतिम सत्य नहीं मानती. 

जीवन संघर्ष और भीषण अमानुषिक यथार्थ का बोध रमणा की कविताओं को एक झील-सा गहरा ठहराव प्रदान करता है. यह ठहराव रचना-प्रौढ़ि के क्षणों में सूक्तिवत झलकता छलकता है – सौ पुरस्कारों से बढ़कर एक तिरस्कार महान है/ नग्नता से बढ़कर कोई सौंदर्य नहीं/ मरण की पहचान के लिए जीवित होना जरूरी है न !/ किसी भी विश्वास में डूब जाना ही अच्छा है – किनारे पर पड़ी मछली-सा पल-पल तड़पते मरने की अपेक्षा/ युद्ध और युद्ध के बीच का विराम ही शांति है/ अज्ञात एवं आदिम भय के देव चिरंजीव हैं.”

दरअसल के.एस. रमणा बिंबों के कवि हैं. वे प्रत्यक्ष अनुभवों को अप्रस्तुत छवियों के साथ जोड़कर ऐसे शाब्दिक दृश्यबंध रचते हैं कि बोध के विविध धरातल सहज ही अग्रप्रस्तुत हो उठते हैं. शाम होती है तो कवि को लगता है कि सूरज अपनी तलवार तेज कर रहा है और चाँद जख्मों को कुरेदता निकल पड़ा है. इसी प्रकार जब भोर फूटती है तो कवि को लगता है कि सारे पंछी निशांत गायन के लिए पर खोल रहे हैं और निद्रा में मग्न नयन पलकों की अंजुली से प्रकाश का पान कर रहे हैं. कवि का यह लगना उसे औरों से अलग करता है क्योंकि इस लगने में ही सौंदर्यबोध का वह मर्म निहित है जिसे काव्यशास्त्री कभी व्यंजना, कभी ध्वनि तो कभी प्रतीयमानता कहते हैं. कवि की सफलता इसमें है कि उसकी यह प्रतीति सबकी प्रतीति बन जाए. कहना न होगा कि कवि के.एस. रमणा इस दृष्टि से सफल कवि हैं. कुछ और बिंबों का सौंदर्य विधान उल्लेखनीय है – पूरब की दिशा में दीप को देख/ प्रकाश नदी में डुबकी लगाकर/ सारी बातें अपने मौन से मुक्त हुईं *** निश्चल दीप के अतराफ हिलती काली लहरें/ कल की यादें हैं और भविष्य की आशाएँ हैं *** नमी विहीन धारा की छाती पर/ कोलाहल-सा बरसता आदिम भय *** बचपन के कोमल गाल पर नटखट हवा की पुलकावालियाँ. रमणा की काव्यभाषा की यह बिंबात्मकता तब और भी प्रभविष्णु हो उठती है जब वे सृजनात्मक विशेषण-विशेष्य संबंधों की सृष्टि करते हैं. जैसे –विकृत चर्म, कोको बालिका, पेप्सी बाबू, ऊष्मल सूर्योदय, शीतल सूर्यास्त, प्रथम प्राणी, अंतिम सांस, शैशव धूप, चौंकती मछलियों के बच्चे, फिसलते शौक़ीन पत्थर, पसीजते दिल, डरावनी निशानियाँ, घोर निशा, मृदुल गहन मधुरता.

अंततः यह रेखांकित करना आवश्यक है कि जीवनासक्ति और मृत्युबोध के बीच के.एस. रमणा की कविताओं में सपनों के टूटने की आहटें हैं, अपनों के छूटने की पीड़ा है, गिरते मानवीय मूल्यों की चिंता है, अत्याचार के आगे अवश होते जनसामान्य की करुणा है, मानवाधिकारों के प्रति सजग नागरिक चेतना है, सामाजिक न्याय को निरंतर स्थगित करती हुई आर्थिक विषमता से उपजी हताशा है – और इन सबसे ऊपर संवेदना से उपजे जीवन सौंदर्य के प्रति आस्था है : “वेदना और वेदना के बीच का विराम भले ही एक पल का हो/ जीवन सौंदर्य का रहस्य हमारी समझ में आ ही जाता है.”

विषम अनुभवों की जटिल अभिव्यक्ति के कवि के रूप में के.एस. रमणा एक चुनौतीपूर्ण कवि हैं. वे अपने पाठक से विशिष्ट काव्य दीक्षा की अपेक्षा रखते हैं. ऐसे में स्वाभाविक है कि उनकी कविताओं का अनुवाद और भी चुनौतीपूर्ण कार्य है. अनुवादश्री डॉ. एम. रंगैया ने इस चुनौती को स्वीकार किया है और रमणा के काव्य का यह हिंदी अनुवाद कार्य अत्यंत मनोयोगपूर्वक संपन्न किया है. इसमें संदेह नहीं कि उनकी यह अनुवाद साधना पूर्णतः सार्थक और सफल है. आशा ही नहीं बल्कि मुझे पूरा विश्वास है कि हिंदी जगत उनके इस सारस्वत अभियान का स्वागत और सम्मान करेगा. 

शुभकामनाओं सहित 
ऋषभ देव शर्मा 

वसंत पंचमी :  4 फरवरी 2014

रविवार, 14 जुलाई 2013

अनिर्वचनीय है परमप्रेम

[भारतेंदु हरिश्चंद्र ने नारदीय भक्तिसूत्र का 'तदीय सर्वस्व' नाम से 1874 में अनुवाद और भाष्य किया था. उसी के कतिपय अंश........]

ॐ अथातो भक्तिं व्याख्यास्यामः
[अब हम यहाँ से भक्ति की व्याख्या करते हैं].
सा कस्मै परम प्रेम रूपा/ अमृत स्वरूपा च 
[वह ईश्वर से परम प्रेम रूपा है/ और अमृत स्वरूप है].
यल्लब्ध्वा पुमान् सिद्धो भवति  अमृतो भवति  तृप्तो भवति
[जिसको पाकर मनुष्य सिद्ध होता है, अमृत होता है और तृप्त होता है].

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ॐ अनिर्वचनीयम् प्रेमस्वरूपं
[प्रेम का स्वरूप कहा नहीं जा सकता].
मूकास्वादनवत्
[गूंगे के स्वाद की भाँति].
प्रकाशते क्कापि पात्रे
[(तथापि) कभी किसी पात्र (अधिकारी) में स्वयं प्रकाश पाता है].
गुणरहितं कामनारहितं प्रतिक्षण वर्द्धमानम् अविच्छिन्नम् सूक्ष्मतरम् अनुभवरूपं
[(प्रेम का स्वरूप) गुणों से रहित, कामनाओं से रहित, प्रतिक्षण में वृद्धिगत, अविच्छिन्न, सूक्ष्मतर केवल अनुभवरूप है].
तम्प्राप्य तदेवावलोकयति तदेव शृणोति तदेव भाषयति तदेव चिन्तयति
[उसको पाकर उसी को देखता है, उसी को सुनता है, उसी को बोलता है और उसी का चिंतन करता है].

शनिवार, 23 जून 2012

प्रेम बना रहे : ऋषभ देव शर्मा की 68 प्रेम कविताएँ


अरसे से मन में था कि एक किताब अपनी सहधर्मिणी डॉ. पूर्णिमा शर्मा जी को समर्पित करूँ , पर यह संकोच भी था कि पता नहीं उन्हें कैसा लगे - प्रेम को प्रदर्शित करने में सदा कंजूसी बरतने की अपनी फिलासफी के अनुरूप इसे भी प्रदर्शन और बडबोलापन न मान लें. फिर भी साहस करके गत चार मई 2012 को विवाह की 28वीं वर्षगाँठ पर  बेटे-बेटी से गुपचुप परामर्श करके ''प्रेम बना रहे'' की टंकित पांडुलिपि श्रीमतीजी के सामने धर दी. और सौभाग्यवश उन्होंने न तो रोष जताया और न ही उपहास किया ('प्रेम बना रहे' मेरा तकियाकलाम है न कुछ वर्षों से!). अर्थात प्रकाशन की स्वीकृति मिल गई. और अब वह कविता-संग्रह छप कर आ गया है, प्रकाशित हो गया है.

''प्रेम बना रहे'' में मेरी 68 प्रेम कविताएँ हैं; या कहें कि प्रेम पर केंद्रित कविताएँ हैं. ये कविताएँ अलग अलग समय पर लिखी गई हैं - अलग अलग काव्यरूपों में. यों तो इनमें से कुछ कविताएँ अंतरंग गोष्ठियों में और मित्रों के बीच पसंद की गई हैं, कुछेक यत्र तत्र छपी भी हैं - परंतु अधिकतर ऐसी हैं जो डायरी के पन्नों से पहली बार बाहर आई हैं. अवलोकनार्थ विवरण के अलावा ऑनलाइन संस्करण का लिंक यहाँ सहेज रहा हूँ.

पुस्तक का शीर्षक -   प्रेम बना रहे 
विधा - काव्य [प्रेम कविताएँ]

प्रकाशक -
 अकादमिक प्रतिभा, सरस्वती निवास,
 यू-9, सुभाष पार्क, नज़दीक सोलंकी रोड, उत्तम नगर, 
नई दिल्ली - 100 059.  फोन : +91 9811892244.

प्राप्ति स्थान -
 डॉ. ऋषभ देव शर्मा, 208 - ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स, 
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500 013 . 
फोन :  +91 8121435033.

प्रथम संस्करण : 2012.
पृष्ठ संख्या -120 .
मूल्य - :INR  250/=

आई एस बी एन : 978-93-80042-59-6.