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बुधवार, 29 जनवरी 2020

(भूमिका) प्रो.एन. गोपि का कविता संकलन 'वसीयतनामा'

भूमिका

प्रोफ़ेसर एन. गोपि  (1948) समकालीन भारतीय कविता और तेलुगु आलोचना के प्रथम पंक्ति के रचनाकारों में शामिल हैं। उनकी कविताओं का देश-विदेश की 25 से अधिक भाषाओं में अनुवाद हो चुका है। उन्होंने अपने साहित्य अकादमी से पुरस्कृत काव्य 'समय को सोने नहीं दूँगा' के माध्यम से तो प्रभूत यश अर्जित किया ही है, नई काव्य विधा 'नानीलु' के प्रवर्तन के माध्यम से समकालीन तेलुगु मुक्तक काव्य जगत में एक आंदोलन का श्रेय भी अर्जित किया है। 'जलगीतम'  जैसी लंबी कविता से उन्होंने जल-चेतना फैलाने के लिए साहित्य के सार्थक उपयोग का अन्यतम उदाहरण प्रस्तुत किया है, तो 'वृद्धोपनिषद' के रूप में वृद्धावस्था विमर्श को नया सकारात्मक आयाम प्रदान किया है। उनके विभिन्न संकलनों से गृहीत कुछ कविताओं का यह हिंदी अनुवाद पाठकों को उनकी काव्य-प्रतिभा के विविध आयामों के दर्शन एक स्थान पर कराने की सदिच्छा से प्रेरित है। 'अनुवाद श्री' के विरुद से सम्मानित हिंदी और तेलुगु के प्रकांड विद्वान और संवेदनशील कवि डॉ. एम. रंगैया ने यह अनुवाद-कार्य अत्यंत समर्पण भाव के साथ संपन्न किया है। निस्संदेह यह कार्य भारतीय साहित्य की श्रीवृद्धि करने वाला तथा तेलुगु-हिंदी-सेतु को और सुदृढ़ करने वाला सिद्ध होगा।

प्रो. एन. गोपि समकालीन कवियों के बीच अपनी विशिष्ट काव्य-शैली के कारण निजी पहचान रखते हैं। वे वक्तव्य और विचारधारा की प्रधानता के इस युग में इस अर्थ में एक अपवाद की तरह हैं कि वे काव्यार्थ को संप्रेषित करने के लिए दैनिक जीवन से जुड़े चित्रों, रूपको,  उपमाओं, प्रतीकों और बिंबों की सहायता से अपनी काव्य-भाषा को गढ़ते हैं। सूक्ष्म लक्षणाओं और व्यंजनाओं से लबालब उनकी कविताएँ देखने में बड़ी मासूम लगती हैं, लेकिन तनिक निकट आते ही पाठक को अनुभूतियों के गहन गह्वर में खींच ले जाती हैं। साधारण से साधारण अनुभवों को काव्य-सत्य में ढलते हुए देखना हो, तो एन. गोपि की कविताओं में उसे बखूबी देखा जा सकता है। सड़क हो, या बस स्टॉप, या गुदड़ी, या बगीचा - प्रो. एन. गोपि  की सृजनात्मक कल्पना का संस्पर्श पाते ही सब नए-नए अर्थों से अभिमंत्रित विंबो में बदल जाते हैं। आँसू, काल (समय भी, मृत्यु भी), वर्षा और सूरज तो उनकी कविताओं के बीज-शब्द हैं ही; किसान, मजदूर, गाँव, शहर, भीड़ और प्रकृति के विभिन्न उपादान भी उनकी कविता के सर्व-परिचित प्रस्थान-बिंदु हैं, जहाँ से वे अपने पाठक को जीवन-यथार्थ और उसके पार तक की अंतरिक्ष यात्रा पर ले जाते हैं। यहाँ कवि और उसका परिवेश अलग-अलग नहीं रह जाते, बल्कि बिंब-प्रतिबिंब-भाव से एक दूसरे में गुँथ जाते हैं, मथ जाते हैं।

इस संकलन की कविताओं का एक मुख्य स्वर स्मृतियों का भी है।  वे स्मृतियाँ हैं - रिश्तों की, परिवार की और लोक की। कहना न होगा कि आज के मनुष्य के हाथ से स्मृतियों की यह संपदा छूटती जा रही है। इस स्मृतिविहीन  होते जा रहे उत्तरआधुनिक और अमानुषिक समय में कवि प्रो. एन. गोपि इन स्मृतियों को और मनुष्यता को केवल सहेजते और पुनः पुनः सिरजते ही नहीं हैं, अगली पीढ़ी को सौंपते भी हैं 

"कोई भी कल हो शायद मैं न रहूँ।
यदि कल सूरज उदित हो तो
कहिए कि निमिलीत मेरे नेत्रों में
आर्द्र एक अश्रु-बिंदु 
बचा रह गया है। 

"चाँद यदि दिखाई दे तो
अवश्य कहिए कि वह
किरणों का जाल बिछा रहा है लेकिन 
भीतर एक छोटी मछली 
अभी तक छटपटा रही है।

"… … …
कल की पीढ़ियों से 
विस्तार से कहिए कि 
मेरा अदृश्य होना मरण नहीं।
इस मिट्टी में
अक्षरों को बिखेरकर गया हूँ मैं।" 

इसके बाद कहने को क्या बचता है? 

समस्त शुभेच्छाओं सहित    
     
ऋषभदेव शर्मा 
परामर्शी (हिंदी),
मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी,  हैदराबाद-500032 
मोबाइल : 80 7474 2572

23 दिसंबर, 2019

बुधवार, 14 फ़रवरी 2018

अद्यतन तेलुगु कविता संग्रह ‘नया साल’ की भूमिका

नया साल (हिंदी में अनूदित तेलुगु कविताएँ)/
 संपादक : मामिडि हरिकृष्ण/
अनुवादक : गुड्ला परमेश्वर द्विवागीश/ 2017/  
250 रूपए  
भाषा सांस्कृतिक शाखा, तेलंगाना सरकार, कला भवन, रवींद्र भारती, हैदराबाद/
 

 ‘कोत्त सालू’ या ‘नया साल’ तेलंगाना के 59 कवियों की कविताओं का संकलन है. ये कविताएँ मूलतः तेलुगु में रचित हैं और अनुवादक जी.परमेश्वर ‘द्विवागीश’ ने इनका हिंदी में अनुवाद प्रस्तुत किया है. यह कविता संकलन इस कारण ऐतिहासिक महत्व रखता है कि 2014 में तेलंगाना राज्य के निर्माण के बाद ‘मन्मथ’ नामक ‘उगादि’ (तेलुगु नववर्ष) के अवसर पर, नवगठित राज्य के प्रथम उगादि उत्सव के संदर्भ में तेलंगाना राज्य के तेलुगु कवियों ने एक मंच पर काव्यपाठ किया और जहाँ एक तरफ अपनी कविताओं के द्वारा उस लंबे संघर्ष को याद किया जिसके परिणामस्वरूप अंततः तेलंगाना की जनता को अपना न्यायसंगत राज्य-अधिकार प्राप्त हुआ, वहीँ दूसरी तरफ उन समस्त चुनौतियों को भी शब्दबद्ध किया जो इस नए राज्य के सम्मुख भविष्य की व्यवस्था के मार्ग में खड़ी हुई दिखाई दे रही हैं.
यहाँ यह भी स्मरण रखना आवश्यक होगा कि मनुष्य ने अपनी विकासयात्रा में जो भी कुछ प्राप्त किया है, उसमें भाषा और लिपि के आविष्कार का बड़ा महत्व है. इनके माध्यम से ही मनुष्य अपनी भावनाओं को व्यक्त कर पाता है और सही अर्थों में संवादधर्मी समाज की संभावनाओं को साकार कर पाता है. ‘नया साल’ शीर्षक यह आयोजन भी संवादधर्मी समाज के निर्माण की दिशा में युगों-युगों से चले आते मानवीय प्रयास की एक नई कड़ी है. इसमें संदेह नहीं कि तेलंगाना शासन ने इस प्रकार के आयोजन के माध्यम से जहाँ साहित्य और संस्कृति के प्रति अपनी पक्षधरता को व्यक्त किया है, वहीं अपनी लोकसंपदा और जनभाषा के प्रति आत्मीयता और गौरव को भी व्यक्त किया है. यहाँ संकलित सभी कवि किसी न किसी रूप में तेलंगाना की अस्मिता के लिए अपनी कविता को समर्पित करने वाले कवि हैं और यही वह बड़ा कारण है जो इस संकलन को भारतीय कविता के रूप में प्रतिष्ठित कराने के लिए काफी है.
तेलुगु साहित्य की लंबी परंपरा में तेलंगाना के साहित्य का अपना खास और अलग तेवर रहा है. इस खास और अलग तेवर को जनपक्षधरता एवं लोकसंपृक्ति के रूप में रेखांकित किया जा सकता है. तेलंगाना के आदिकवि पालकुरुकि सोमनाथ ने तेलुगु काव्य की क्लासिक परंपरा के समानांतर देशज परंपरा की नींव रखी थी. आगे चलकर जनभाषा के उन्नायकों ने इसे अलग पहचान दी. पोतना से लेकर कालोजी, दाशरथि और सिनारे तक के काव्य के अवलोकन से यह कहा जा सकता है कि वस्तु और शिल्प दोनों ही दृष्टियों से तेलंगाना की तेलुगु कविता अपनी अलग पहचान रखती रही है. इस पहचान का आधार वास्तव में इस भूखंड की आम जनता के अस्तित्व के संघर्ष, स्वाभिमान की भावना और आंदोलन की प्रकृति से निर्मित दिखाई देता है. विशेष रूप से बीसवीं शताब्दी के उत्तरार्ध और इक्कीसवीं शताब्दी के आरंभिक वर्षों में यहाँ की जनता ने अलग तेलंगाना राज्य के लिए जो संघर्ष किया, उसे वाणी प्रदान करके यहाँ की तेलुगु कविता सही अर्थ में जन-कविता बन गई.
बलिदान के लंबे इतिहास के मार्ग पर चलकर तेलंगाना राज्य के निर्माण की परिस्थितियाँ उपस्थित हुईं, तो संघर्ष अपने आप में स्मरणीय गाथा बन गया. नवगठन से जुडी चुनौतियों और अपनी अस्मिता को रेखांकित कर पाने की सफलता के उत्साह ने अद्यतन कविता को अत्यंत विस्तीर्ण फलक प्रदान किया है. इस संकलन की कविताएँ विशेष रूप से ‘विश्व कविता दिवस’ के साथ जुड जाने के कारण और भी विशिष्ट बन गई हैं. इस समग्र काव्य-आयोजन को संभव बनाने में इसके अत्यंत  समर्थ संपादक मामिडि हरिकृष्णा के साथ परामर्श मंडल के सदस्यों के रचनात्मक सहयोग का बड़ा हाथ है जिनमें डॉ. नंदिनी सिद्धा रेड्डी, डॉ. मसन चेन्नप्पा, डॉ. अम्मंगि वेणुगोपाल, डॉ. नालेश्वरम शंकरम, जूपाका सुभद्रा और अयिनंपूडि श्रीलक्ष्मी जैसे समर्थ हस्ताक्षर सम्मिलित हैं.
‘नया साल’ की कविताएँ एक ओर तो आम आदमी की अदम्य जिजीविषा को व्यक्त करती हैं तथा दूसरी ओर तेलंगाना के जनजीवन की लोक-सांस्कृतिक विशेषताओं को उभारकर सामने लाती हैं. ये कविताएँ उस आशा, विश्वास और स्वर्णिम भविष्य को भी रूपायित करती हैं जिसके लिए इस नए राज्य का स्वप्न देखा गया था.
इस अत्यंत महत्वपूर्ण काव्य-आयोजन को हिंदी में लाने का काम करके अनुवादक गुड्ला परमेश्वर द्विवागीश ने वास्तव में सांस्कृतिक सेतु निर्माण के लिए अपनी ज़िम्मेदारी निभाने का प्रमाण दिया है. वे तेलुगु और हिंदी दोनों भाषाओँ पर अच्छा अधिकार रखते हैं तथा दोनों के साहित्य की गतिविधियों के निरंतर संपर्क में रहते हैं. अपने व्यापक अनुभव और अध्ययन के द्वारा उन्होंने काव्य-संस्कार अर्जित किया है. अतः विश्वास किया जाना चाहिए कि उनके द्वारा किया गया अनुवाद प्रामाणिक तथा मूल काव्य की आत्मा की रक्षा करने वाला होगा. मुझे पूरा विश्वास है कि हिंदी जगत ‘नया साल’ का अत्यंत आत्मीयता और उदारता के साथ स्वागत करेगा. ... और हिंदी में भी ऐसे काव्य-आयोजनों की शृंखला चले; यह भी कामना है.
तेलंगाना के कवियों की सौंदर्य चेतना और सामाजिक पक्षधरता को समझने के लिए यह कविता  संकलन हिंदी पाठकों के समक्ष एक नया द्वार खोलेगा; इसमें संदेह नहीं.

विश्व मातृभाषा दिवस                                                  - ऋषभदेव शर्मा
21 फ़रवरी, 2017                                                 पूर्व प्रोफ़ेसर एवं अध्यक्ष
                                                         उच्च शिक्षा और शोध संस्थान  
                                                 दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद          

शुक्रवार, 24 मार्च 2017

मिल जाएँ दो पानियों जैसे : तेलुगु काव्य 'शुकोपनिषद' की भूमिका

मिल जाएँ दो पानियों जैसे


वैयक्तिकता और निजी अस्मिता के चरम विस्फोट के इस दौर में जो सामाजिक संस्था सर्वाधिक विचलित हुई दिखाई देती है, वह है विवाह व्यवस्था. भारतीय समाज की नींव माने जाने वाले परिवार के हिलने से इस समाज-सभ्यता की पूरी संरचना काँपने लग गई है. विदेशी आर्थिक चकाचौंध इस खतरे को और बढ़ा देती है. ऐसे में साहित्य की ज़िम्मेदारी बनती है कि वह लोक को मंगलकारी श्रेयस्कर मार्ग पर चने के लिए प्रेरित और प्रवृत्त करे. इस उदात्त विषय को अभिव्यक्त करने के लिए ऐसे साहित्यकार की आवश्यकता है जो भारतीय परिवार-संस्कृति के उच्च आदर्शों और जीवनमूल्यों से अनुप्रेरित और अनुप्राणित हो. समकालीन तेलुगु साहित्य के अग्रणी हस्ताक्षर डॉ. मसन चेन्नप्पा ऐसे ही उदारमना कवि हैं.  

प्रस्तुत काव्यशुकोपनिषद’ में डॉ. मसन चेन्नप्पा ने आस्ट्रेलिया की अपनी साहित्यिक यात्रा के बहाने, भारतीय साहित्य की शुक-संवाद की काव्यरूढि का सहारा लेकर भारतीय विवाह पद्धति की व्याख्या करके, वहाँ जाकर एक दूसरे से अलग रह रहे पति-पत्नी के मन में परिवार के प्रति निष्ठा की पुनर्स्थापना की संक्षिप्त सी गाथा लिखी है. मूलतः इतिवृत्तात्मक और उपदेशात्मक कथन में रोचकता की सिद्धि के लिए कवि ने यह मनोरंजक फैंटेसी गढ़ी है कि आस्ट्रेलिया में कवि को ऐसा तेलुगुभाषी शुक-शुकी युगल मिल जाता है जो अपने पालक दंपति के एक दूसरे से अलग हो जाने के कारण आश्यहीन हो गया है. संयोगवश वह दंपति कवि से मिलने और उसका व्याख्यान सुनने वालों में शामिल है. बस यह बोध होते ही कवि भारतीय परिवार व्यवस्था और विवाह पद्धति के प्रतीकों की व्याख्या करके उन पति-पत्नी के अहं को पिघलाने में सफलता प्राप्त कर लेता है. वे दोनों पुनः मिल जाते हैं और लोक कथाओं के दंपतियों की सुखमय जीवन व्यतीत करते हैं.

इस प्रकार, इस सुखांत कथा-काव्य में यह प्रतिपादित किया गया है कि भारतीय दृष्टिकोण के अनुसार विवाह अथवा स्त्री-पुरुष संबंध कोई बंधन, समझौता या अनुबंध नहीं है, बल्कि एक ऐसा संस्कार है जिसके माध्यम से स्त्री और पुरुष आदिम दैहिक आवेगों का उदात्तीकरण  करके मानसिक, आत्मिक, सामाजिक और नैतिक धरातलों पर परस्पर समर्पण द्वारा समरसता की प्राप्ति हेतु इस प्रकार एक दूसरे से मिलते हैं जिस प्रकार भिन्न दिशाओं से आने वाली जलधाराएँ एक दूसरे में विलीन हो जाती हैं. पारस्परिक सम्मान और परिवार के प्रति साझा दायित्व उन्हें सदा जोड़कर रखता है. अहं और वर्चस्व इस व्यवस्था के ऐसे शत्रु हैं जो किसी भी हँसते-खेलते परिवार को तिनका-तिनका बिखरा सकते हैं. अतः पति-पत्नी को सत्ता के संघर्ष जैसी स्थिति से बचकर बराबरी, साझेदारी और जिम्मेदारी के बलपर विवाह और परिवार की रक्षा करनी होती है. कहना न होगा कि इस औदात्य की कमी होते जाने के कारण ही आज परिवार विखंडित और विघटित हो रहे हैं. यह कृति  पाठकों को परिवार से जुड़े उदार मूल्यों को अपनाने और अपने मानस को संस्कारित करने की सत्प्रेरणा दे सकेगी, ऐसी आशा की जानी चाहिए.

तेलुगु के इस संक्षिप्त कथा-काव्य को हिंदी जगत के सम्मुख प्रस्तुत करने का स्तुत्य कार्य वरिष्ठ हिंदी-तेलुगु-हिंदी काव्यानुवादक डॉ. एम. रंगय्या ने अत्यंत निष्ठापूर्वक किया है. यह कृति मूल कवि और अनुवादक दोनों के लिए यशस्कारी हो, इसी शुभेच्छा के साथ ...
-         ऋषभदेव शर्मा
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बुधवार, 30 नवंबर 2016

तेलुगु ग्राम-जीवन की कहानियाँ

भूमिका 


भारत की विविध भाषाओँ में अनेक रचनाकार विविध विधाओं में साहित्य सृजन करते हुए इस महादेश की साझा सांस्कृतिक विरासत को सहेजते और अगली पीढ़ियों को हस्तांतरित करने का कार्य करते रहते हैं. इनमें से केवल कुछ को भाषा और साहित्य के गढ़ों और मठों का सान्निध्य मिल पाता है और उनके कार्य को व्यापक पहचान मिल जाती है. लेकिन अन्य बहुत सारे रचनाकार प्रकाशन-सरणियों से अपरिचित होने के कारण अपने छोटे से संप्रेषण-क्षेत्रों तक सीमित रहकर सेवा भाव से लिखते और संतुष्ट रहते हैं. सही अर्थ में ऐसे रचनाकार प्रायः लोकाश्रयी होते हैं और लोक के जीवन को लाग-लपेट के बिना अभिव्यक्त करते हैं. तेलुगु से हिंदी में अनूदित इस कथा-संग्रह के लेखक नरसिम्हा राजु और अनुवादक वेत्सा पांडुरंगा राव, दोनों ही, इसी कोटि के रचनाकार हैं. 

कहानीकार नरसिम्हा राजु इस समय 78 वर्ष के हैं. वे लंबे समय तक ओरिएंटल कॉलेज, एलुरु [आंध्र प्रदेश] के प्राचार्य पद पर आसीन रहे. अपने सेवाकाल में तथा सेवामुक्ति के उपरांत उन्होंने तेलुगु में कुछ कहानियों की रचना की. उनमें से छह कहानियों का हिंदी अनुवाद यहाँ प्रस्तुत है. अनुवादक वेत्सा पांडुरंगा राव यों तो 40 वर्ष एलुरु [आंध्र प्रदेश] में ग्रामीण सहकारी बैंक की सेवा में रहे, लेकिन दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के प्रमाणित प्रचारक और उनके एक संगठन ‘हिंदी प्रचार रुचिकर्म प्रमाणित प्रचारक’ के अध्यक्ष के रूप में निरंतर हिंदी भाषा के प्रचार-प्रसार में भी लगे रहे. उनकी हिंदी-निष्ठा का इससे सहज अनुमान किया जा सकता है कि आज 79 वर्ष की आयु में भी उन्होंने अनथक श्रम करके यह अनुवाद तैयार किया है ताकि हिंदी के पाठक गढ़ों और मठों से दूर स्थित एक मौन साहित्य-साधक के रचनाकर्म से परिचित हो सकें.

नरसिम्हा राजु की ये तेलुगु कहानियाँ इस अर्थ में विशेष मानी जा सकती हैं कि इनमें प्रस्तुत तेलुगु लोक जीवन लेखक का जिया और भोगा हुआ, अतः पूर्णतः विश्वसनीय और प्रामाणिक, है. इनका रचनाकाल लगभग तीन दशकों तक फैला है और इन्हें इस कालावधि में आंध्र-जीवन में उपस्थित हुए बदलावों के संदर्भ में भी देखा जा सकता है. आंध्र लोक की सुंदरता और सहजता को अभिव्यंजित करने के साथ-साथ लेखक ने उसकी कुरूप होती शक्ल को भी उघाड़कर सामने रखा है. 

इन कहानियों का परिवेश अधिकतर ग्रामीण है. लेखक को गाँवों से प्यार है. उनका मन बार-बार गाँव की ओर जाना चाहता है. जाता भी है; लेकिन सब कुछ बदला-बदला देखकर अपने पूर्व-परिचित, अतीत के अथवा बचपन के गाँव को खोजने लगता है. यही कारण है कि ये कहानियाँ अनेक स्थलों पर पूर्वदीप्ति शैली और गर्भकथा सुनाने की तकनीक को अपनाती दिखाई देती हैं. लोक संस्कृति में ग्रामदेवता की आराधना, लोकगाथाओं, लोककथाओं, लोकगीतों और लोकशैलियों के जो प्रसंग इन कहानियों में गूँथे गए हैं, उनसे हिंदी पाठक तेलुगु लोक के बारे में जानकारी तो प्राप्त करता ही है, उसके मन में इस भाषा-समाज के विश्वासों और अनुष्ठानों के बारे में नई जिज्ञासाएँ भी करवटें बदलती हैं. यह चिता केवल तेलुगु समाज की ही नहीं है बल्कि पूरे देश की है कि मनुष्य और मनुष्य के बीच सहज संबंध टूट रहे हैं और व्यावसायिक तथा औपचारिक रिश्ते भर बचे रह गए हैं. लेखक ने ध्यान दिलाया है कि पारंपरिक समाज में धर्म और जाति की मर्यादाओं के बावजूद जाति-द्वेष नहीं था जबकि वर्तमान परिदृश्य इसके एकदम उलट है. 

इस संग्रह की कहानियों में आपको लेखक की मूल्य-चिंता बार-बार झकझोरेगी. ग्रामीण स्वभाव की निश्छलता, कर्म सिद्धांत में विश्वास, नगण्य व्यक्ति का बलिदान, तथाकथित भद्रजन की स्वार्थपरता और क्रूरता, ग्रामीण पंचायत का न्याय, गम होता हुआ बचपन, शिक्षा और परीक्षा तंत्र की हृदयहीनता, संवेदनशील व्यक्ति की सहृदयता, आंचलिक भूगोल और प्राकृतिक पर्यावरण, बाल मनोविज्ञान, ग्रामाधिकारी की निरंकुशता, बाढ़ की विनाशक विकरालता, निर्धन का स्वाभिमान, पौराणिक प्रसंग, लोभ जनित भष्टाचार और संयोग की संभावना इन कहानियों में कहीं आधिकारिक तो कहीं प्रासंगिक कथासूत्रों के रूप में विद्यमान हैं. 

सभी कहानियाँ रोचक और पठनीय बन पडी हैं. साथ ही, लोक शब्दावली, लोकोक्तियों और मुहावरों का समावेश इस पुस्तक की रोचकता और पठनीयता बढ़ाने में विशेष भूमिका निभाता है. अनुवादक ने नामों के अलावा भी तेलुगु के बहुत से सांस्कृतिक शब्दों को ज्यों का त्यों रखते हुए उनका अर्थ भी साथ में सूचित किया है. जैसे - मदुरु दीवार [ताड़ के पत्तों से बनी छप्परदार ऊँची दीवार, गाजुल मुसलय्या [कंगन बूढा], मुसलम्मा [बुढ़िया], गोल्लसुद्दलु [ग्वालों के लोकगीत], रागाल सत्ति [गानेवाला सत्ति], गुंडिगा [पीतल का बड़ा बरतन]. निश्चय ही, इससे हिंदी पाठक की शब्द-संपदा और समृद्ध होगी, तेलुगु-हिंदी-सेतु और सुदृढ़ होगा तथा हिंदी भारत की सामासिक संस्कृति के अनुरूप नए स्वरूप में ढल सकेगी.

पुस्तक के प्रकाशन के अवसर पर लेखक और अनुवादक को हार्दिक बधाई! 

30 नवंबर, 2016.                                                                                                      ऋषभदेव शर्मा 

[पूर्व आचार्य-अध्यक्ष,
उच्च शिक्षा और शोध संस्थान,
दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, हैदराबाद]

आवास : 208 -ए, सिद्धार्थ अपार्टमेंट्स,
गणेश नगर, रामंतापुर, हैदराबाद - 500013.
मोबाइल : 08121435033 / 0807474257

मंगलवार, 16 दिसंबर 2014

तेलुगु काव्य 'धरती माँ' :सुद्दाला अशोक तेजा


भूमिका 
धरती माँ / तेलुगु कविताओं का हिंदी अनुवाद /
रचनाकार - सुद्दाला अशोक तेजा /
अनुवादक - एम. रंगय्या /
 एमेस्को बुक्स, हैदराबाद-29 /
2014 / 144  पृष्ठ  / 90 रूपए. 


समकालीन तेलुगु कविता का फलक अत्यंत विस्तीर्ण और पहुँच अत्यंत पैनी है. यह कविता अपने चारों ओर के घटनाचक्र के प्रति अत्यंत सजग होने के साथ साथ मनोभावों और भावोद्वेलनों के प्रति भी पूरी ईमानदार है. यह देखकर विस्मय होता है कि तेलुगु कविता प्रकृति और पर्यावरण के प्रति मनुष्य की जिम्मेदारी को रेखांकित करने में कोई कोरकसर नहीं उठा रखती – भले ही इसमें कवित्व की क्षति का ख़तरा भी हो. उसके लिए कला से अधिक महत्वपूर्ण है जीवनराग. इस जीवनराग की बहुविध अभिव्यक्ति करते हुए आज की तेलुगु कविता कभी जल तो कभी वायु, या कभी पृथ्वी, और कभी आकाश से स्वयं को संबद्ध करके अभिव्यंजना के नए मुहावरे की तलाश करती है. तेलंगाना के प्रतिष्ठित सिने कवि सुद्दाला अशोक तेजा ने भी अपने इस कविता संग्रह ‘धरती माँ’ की साठ कविताओं में पर्यावरण विमर्श का ऐसा ही नया व्यंजना-मुहावरा तलाश करने की कोशिश की है. 

‘धरती माँ’ की कविताएँ इस सनातन विश्वास से संप्रेरित प्रतीत होती हैं कि पृथ्वी माँ है और हम उसकी संतान हैं. पृथ्वी की यह गरिमा वेदों से चलकर रामायण-महाभारत से होती हुई कवि अशोक तेजा तक पहुँची है. वैदिक ऋषि ने अत्यंत उल्लासपूर्वक 'पृथिवी सूक्त' रचा था, जो मनुष्य जाति की अब तक की श्रेष्ठतम कविताओं में परिगणित है. धरती माँ के प्रति वैसी मुग्धता, निष्ठा और दायित्व भावना आज के मनुष्य में कहाँ? कवि उसी पावन संबंध की खोज कर रहा है. इस खोज में उसे धरती माँ, अपनी माँ और वन माँ एक ही वात्सल्य की विस्तीर्ण व्यंजनाएँ प्रतीत होती हैं. पृथ्वी और मनुष्य के इस संबंध ने ही सभ्यता एवं संस्कृति का आविष्कार और विकास किया है. पृथ्वी सारी प्रकृति को धारण करती है. संरक्षण देती है. पृथ्वी मनुष्य को वह ऊर्जा प्रदान करती है जिसके बल पर वह जीवन का युद्ध लड़ता है, जीतता है. जीवन के इस युद्ध में मनुष्य ने अनेकानेक आविष्कार किए हैं, यंत्र निर्मित किए हैं. कवि मानव सभ्यता के पूरे विकास को यंत्रों के इस रूपक के माध्यम से व्याख्यायित करते हुए इस सत्य का प्रतिपादन करता है कि श्रम ही वेद है और मानव जीवन का वास्तविक सौंदर्य श्रमसीकर में है, स्वेद में है.

सभ्यता और संस्कृति की पड़ताल करते हुए कवि अशोक तेजा ने धरती का स्तवन उसके जाये वृक्ष-लता- गुल्मों, वन-पर्वत-नदियों की आराधना के रूप में अत्यंत प्रभावी शैली में किया है. कवि का हृदय यह देखकर चीत्कार कर उठता है कि जो मानव संस्कृति मूलतः प्रकृति-निर्भरा थी. वह यांत्रिकता के चरम उत्कर्ष से उपजी अंधी उपभोक्ता संस्कृति के कारण विकृत होकर प्रकृति-विरोधी हिंसक और विध्वंसक बन गई है. वृक्षों और वनों के प्रति ममता तथा धरती और प्रकृति के प्रति पूज्य भाव जगाने की कोशिश करने वाली ये कविताएँ तथाकथित उत्तरआधुनिक बाजारवादी और युद्धक मनुष्य जाति को चेतावनी देती हुई प्रतीत होती हैं. मनुष्य का अस्तित्व पृथ्वीग्रह के अस्तित्व के साथ नाभिनालबद्ध है. पृथ्वी मिटेगी तो मनुष्य भी मिटेगा. मनुष्य को बचना है तो पृथ्वी को बचाना होगा. पृथ्वी को बचाने का एक ही रास्ता है कि उसके प्रति पूज्य बुद्धि पुनः स्थापित हो. सही अर्थ में आज के बुद्धिवादी मनुष्य को धरती के प्रति माँ जैसा भावात्मक संबंध पुनः स्थापित करना होगा. इसी के लिए कवि नई पीढ़ी को उद्बोधित करता है कि वह पृथ्वी का दोहन करने की प्रवृत्ति से गुरेज करे और अपने राष्ट्र ही नहीं संपूर्ण पृथ्वी गृह की रक्षा के लिए उठ खड़ा हो. 

धरती माँ की रक्षा केवल भूमि, जल और पर्यावरण आदि की रक्षा से ही नहीं जुड़ी है, बल्कि इसका संबंध लोक संस्कारों की रक्षा से भी  है. स्त्री जाति का सम्मान भी इसी का एक पक्ष है. बच्चों की सुरक्षा के बिना पृथ्वी के भविष्य की रक्षा भला कैसे की जाती है. यही कारण है कि कवि सुद्दाला अशोक तेजा लोक के विभिन्न उपादानों, खेतीबाड़ी, गीत-संगीत, रिश्ते-नाते और गाँव-घर के प्रति गहरा लगाव रखते हैं. वे कन्या भ्रूण हत्या को अमानुषिक मानते हैं,  मातृत्व को व्यक्तित्व की परिपूर्णता समझते हैं,  स्त्री को अमृत का पर्याय घोषित करते हैं और अर्धांगिनी को नमन करते हैं.  मनुष्य और मनुष्य के बीच जाति, धर्म, लिंग अथवा अन्य किसी भी प्रकार के भेदभाव को वे पृथ्वी की रक्षा में बाधक मानते हैं. उन्हें ऐसे परिवर्तन की आकांक्षा है जो मनुष्य की जीत के लिए जीवन से भरे गीत से उत्प्रेरित हो और सृष्टि यजन में प्रत्येक नागरिक की समिधा से परिपुष्ट हो. अभिप्राय यह है कि कवि अशोक तेजा परस्पर आत्मीयता से परिपूर्ण ऐसे भूमंडल की कल्पना करते हैं जिसमें प्रकृति और मनुष्य साहचर्य भाव से निवास करें. भोग्य और भोक्ताभाव से नहीं. 

21वीं शताब्दी के दूसरे दशक में आज जब समस्त भूमंडल बाजारवाद की आंधी में उड़ा जा रहा है और मनुष्य के हाथ से मनुष्यता का साथ छूटा जा रहा है, ऐसे में ये कविताएँ अत्यंत आश्वस्तिकर हैं, क्योंकि ये कविताएँ भटके हुए मानव शिशु की उंगली धरती माँ के हाथ में थमाना चाहती है. 

तेलुगु की उत्कृष्ट कविताओं को हिंदी समाज के समक्ष प्रस्तुत करने का स्तुत्य उद्यम सुप्रतिष्ठित कवि और अनुवादक डॉ. एम. रंगय्या ने अत्यंत निष्ठापूर्वक किया है. डॉ. एम. रंगय्या बहुभाषाविद साहित्य साधक हैं और कविताओं के मर्म को पहचान कर पूरी सावधानी के साथ लक्ष्यभाषा पाठ रचते हैं. ‘धरती माँ’ के प्रति उनकी यह आराधना सफल हो, इसी शुभकामना के साथ ..... 



28 अप्रैल 2014                                                                                     - डॉ. ऋषभदेव शर्मा